नारद महा पुराण
मोहिनीकी दुर्दशा, ब्रह्माजीका राजपुरोहितके समीप जाकर उनको प्रसन्न करना, मोहिनीकी याचना
वसिष्ठजी कहते हैं- राजन् ! मोहिनी मोहमय शरीर त्यागकर देवताओंके लोक गयो। वहाँ देवदूत (वायुदेव) ने उसे डाटा-'पापिनो। तेरा स्वभाव पापमय है। तेरी बुद्धि अत्यन्त खोटी है।
तू सदा एकादशी व्रतके लोपमें संलग्न रही है, अत: स्वर्गम तेरा रहना असम्भव है।' इस प्रकार कठोर वचन कहकर वायुदेवने उसे बडेसे पीटा और यातनामय नरक भेज दिया। राजन् !
देवदूत (वायुदेव)-से इस प्रकार वाड़ित होनेपर मोहिनी नरकमें गयी। वहाँ धर्मराजकी आज्ञासे दूतोंने उसे खूब पीटा और दीर्घकालतक क्रमशः सभी नरकोंमें उसे गिराया, साथ ही उससे यह बात भी कही-'ओ पापिनी! तूने पतिके हाथों अपने पुत्र धर्माङ्गदकी हत्या करनेको कहा, अतः अपने किये हुए उस पापकर्मका फल यहाँ अच्छी तरह भोग ले।' नृपश्रेष्ठ! यमदूतोंके इस प्रकार धिक्कारनेपर यमकी आज्ञाके अनुसार वह क्रमशः सब नरकोंकी यातनाएँ भोगती रही। मोहिनी ब्राह्मणके शापसे मरी थी, अत: उसके शरीरके स्पर्शसे उन नरक-यातनाओंकी अभिमानिनी चेतनशक्तियोंका सारा अङ्ग जलने लगा। वे अधिष्ठात्री देवियाँ उसको धारण करने में असमर्थ हो गयौं। राजन् ! तब वे सभी नरक (नरकके अभिमानी देवता) धर्मराजके समीप आये और हाथ जोड़कर भयभीत हो बोले-'देवदेव! जगन्नाथ! धर्मराज ! हमपर दया कीजिये और इस मोहिनीको हमारी यातनाओंसे शीघ्र अलग कीजिये, जिससे हमें सुख मिले। नाथ ! इसके शरीरके स्पर्शसे हम लोग क्षणभरमें भस्म हो जायेंगे; अत: इसे यहाँसे निकाल बाहर कीजिये।' उनकी बात सुनकर धर्मराज बड़े विस्मित हुए और अपने दूतोंसे बोले-'इसे मेरे लोकसे निकाल बाहर करो। जो ब्रह्मशापसे दग्ध हुआ है, वह स्त्री हो, पुरुष हो या चोर ही क्यों न हो, उस पापीका स्पर्श हमारी नरक यातनाएँ भी नहीं करना चाहती हैं। अत: इस पापिनीको, जो पतिके वचनका लोप करनेवाली, पुत्रघातिनी, धर्मनाशिनी तथा ब्रह्मदण्डसे मारी गयी है, यहाँसे जल्दी निकालो।'
भूपते! धर्मराजके ऐसा कहनेपर वे दूत अस्त्र-शस्त्रोका प्रहार करते हुए मोहिनीको यमलोकसे बाहर कर आये। राजन्। तब मोहयुक्त मोहिनी अत्यन्त दुःखित होकर पाताललोकमें गयी, किंतु पातालवासियोंने भी उसे रोक दिया। तब मोहिनीने अत्यन्त लज्जित हो अपने पिताके समीप जाकर सारा दुःख निवेदन किया-'वात! चराचर प्राणियोसहित समस्त त्रिलोकीमें मेरे रहनेके लिये कोई स्थान नहीं है। जहाँ-जहाँ जाती हूँ वहाँ-वहाँ सब लोग मेरी निन्दा और तिरस्कार करते हैं। नाना प्रकारके आयुधोंसे मुझे खूब मारकर लोगोंने अपने स्थानसे बाहर निकाल दिया है। पिताजी! मैं तो आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके ही रुक्माङ्गदके समीप गयी थी और वहाँ ऐसी-ऐसी चेष्टाएँ की, जो सम्पूर्ण लोकोंमें निन्दित हैं। पतिको कष्टमें डाला, पुत्रको तीखी तलवारसे कटवा देना चाहा और संध्यावलीको भी क्षोभमें डाल दिया, इसीसे मेरी यह दशा हुई है। देव! मुझ पापिनीके लिये अब कहीं कोई सहारा नहीं है। विशेषत: ब्राह्मणके शापसे मुझे अधिक दुःख भोगना पड़ रहा है। पिताजी! जो ब्राह्मणके शापसे मरे हैं, आगसे जले हैं, चाण्डालके हाथों मारे गये हैं, व्याघ्र-सिंह आदि वन-जन्तुओंद्वारा भक्षण किये गये हैं तथा बिजली गिरनेसे नष्ट हुए हैं, उन सबको मोक्ष देनेवाली केवल गङ्गा नदी हैं। यदि आप जाकर मुझे शाप देनेवाले उस ब्राह्मणको प्रसन्न कर लें तो मेरी सति हो सकती है।'
राजन् ! तब लोकपितामह ब्रह्माजी शिव, इन्द्र, धर्म, सूर्य तथा अग्नि आदि देवेश्वरों और मुनियोंको साथ ले उपर्युक्त बातें कहनेवाली मोहिनीको आगे करके ब्राह्मणके समीप गये। वहाँ जाकर देवता आदिसे घिरे हुए स्वयं ब्रह्माजीने बड़े गौरवसे उन्हें जमस्कार किया। यद्यपि ब्रह्माजी रुद्र आदि देवताओंके लिये भी पूजनीय और माननीय हैं, तथापि मोहिनीके स्नेह के कारण उन्होंने स्वयं ही नमस्कार किया। राजन् ! जब तीनों लोकोंमें असाध्य एवं महान् कार्य प्राप्त हो जाय, तम बड़े के द्वारा छोटेका अभिवादन दूषित नहीं माना जाता। वे ब्राह्मण देवता वेद-वेदाङ्गोंके पारदर्शी विद्वान् और तपस्वी थे। लोककर्ता ब्रह्माजीको देवताओंके साथ आया देख ब्राह्मणने उठकर मुनियोंसहित उन सबको प्रणाम किया और आसनपर बिठाकर भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीका स्तवन किया, तब प्रसन्न होकर लोककर्ता जगद्गुरु भगवान ब्रह्माने मोहिनीके-लिये उन राजपुरोहित ब्राह्मणसे इस प्रकार प्रार्थना की-'तात! आप ब्राह्मण हैं, सदाचारी हैं और परलोकमें उपकार करनेवाले हैं। कृपासिन्धो। कृपा कीजिये और मोहिनीको उत्तम गति प्रदान कीजिये। ब्रह्मन् ! मोहिनी मेरी पुत्री है। मानद। यमलोकको सूना देखकर रुक्माङ्गदको मोहनेके लिये (प्रकारान्तरसे उस भक्तका गौरव बढ़ाने के लिये) मैंने ही उसे भेजा था। धर्मकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है। वह सम्पूर्ण लोकका कल्याण करनेवाली है। यह मोहिनी एक कसौटी थी, जिसपर सुवर्णरूपी राका रुपमादकी परीक्षा करके उन्हें स्त्री-पुत्रसहित भगवान्के धामको भेज दिया गया है। राजाने अविचल भक्तिसे एकादशी-व्रतका पालन करने और करानेके कारण यमराजकी लिपिको मिटाकर यमपुरीको सूना कर दिया था। ब्राह्मन् ! सांख्यवेत्ताको जिसकी प्राप्ति असम्भव है, अपाङ्गयोगाके साधनसे भी जो मिलनेवाला नहीं है, उस भक्तिगम्य पदकी प्राप्ति राजा, राजकुमार और देवी संध्यावलीको हुई है। मोहिनीने जो उस पुण्यशील भूपशिरोमणिके प्रतिकूल आचरण किया है, उस पापके वेगसे उसकी बड़ी दुर्दशा हुई है। आपके शापसे दग्ध होकर यह राखकी ढेरमात्र रह गयी है। इसके द्वारा जो अपकार हुआ है, उसे क्षमा कर दीजिये। दया कीजिये, शान्त होइये! आपके शाप देनेसे यह अधोगतिमें डाली गयी है। इसपर प्रसन्न होइये और इसे उत्तम गति दीजिये।'
ब्रह्माजीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन विप्रशिरोमणिने बुद्धिसे विचार करके क्रोध त्याग दिया और मोहिनीके पिता देवेश्वर श्रीब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा–'देव! आपकी पुत्री मोहिनी बहुत पापसे भरी हुई है, अत: प्राणियोंसे परिपूर्ण लोकोंमें उसकी स्थिति नहीं हो सकती। सुरेश्वर! जिस प्रकार आपका और मेरा भी वचन सत्य हो, देवताओंका कार्य सिद्ध हो और मोहिनीकी आवश्यकता भी पूर्ण हो जाय, वही करना चाहिये। अतः जो भूतसमुदायसे कभी आक्रान्त न हुआ हो, उसी स्थानपर मोहिनी रहे।'
नृपश्रेष्ठ! तब ब्रह्माजीने सम्पूर्ण देवताओंसे सलाह लेकर मोहिनी देवीसे कहा-'तुम्हारे लिये कहीं स्थान नहीं है।' यह सुनकर मोहिनी सम्पूर्ण देवताओंको प्रणाम करके बोली- 'सुरश्रेष्ठगण] आप सब देवता सम्पूर्ण लोकके साक्षी हैं। पुरोहितजीके साथ आप लोगोंको सौ-सौ बार प्रणाम करके मैं हाथ जोड़ती हूँ। आप प्रसन्न हृदयसे मेरी याचना पूर्ण करें। मुझे या स्थान दें, जो सबके लिये प्रीतिकारक हो। दूसरोंको मान देनेवाले महात्माओ। किसी दोषसे दूषित एकादशीका दिन जिस प्रकार मेरा हो जाय, ऐसा कीजिये-यही मेरी याचना है। इसे आप अवश्य पूर्ण कर दें। यह मांग मैने स्वार्थसिद्धिके लिये की है।'