गयामें पांचवें दिनका कृत्य, गयाके विभिन्न तीर्थोंकी पृथक्-पृथक् महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं- मोहिनी ! पाँचवें दिन मनुष्य गदालोल-तीर्थमें पूर्ववत् मान आदि करके अक्षयवटके समीप पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करे। वहाँ श्राद्ध आदि करके वह अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुंचा देता है। वहाँ ब्राह्मणों को भोजन करावे और उनकी पूजा करे। अक्षयवटके निकट श्राद्ध करके एकाग्रचित्त हो वटेश्वरका दर्शन, नमस्कार तथा पूजन करे। ऐसा करनेसे श्राद्धकर्ता पुरुष अपने पितरोंको अक्षय तथा सनातन ब्रह्मलोकमें भेज देता है। (गदालोल-तीर्थमें नान करते समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-)

गदालोले महातीर्थे गदाप्रक्षालने वरे॥

स्नानं करोमि शुद्ध्यर्थमक्षय्याय स्वराप्तये।

एकान्तरे वटस्याग्रे यः शेते योगनिद्रया।

बालरूपधरस्तस्मै नमस्ते योगशायिने।

संसारवृक्षशस्त्रायाशेषपापक्षयाय

अक्षय्यब्रह्मदात्रे च नमोऽक्षय्यवटाय वै।

(ना० उत्तर० ४७/४-७)

'जहाँ भगवान्की गदा धोयी गयी है, उस गदालोल नामक श्रेष्ठ महातीर्थमें मैं आत्मशुद्धि तथा अक्षय स्वर्गकी प्राप्तिके लिये स्नान करता हूँ। जो बालरूप धारण करके वटकी शाखाके अग्रभागपर एकान्त स्थलमें योगनिद्राके द्वारा शयन करते हैं, उन योगशायी श्रीहरिको नमस्कार है। जो संसाररूपी वृक्षका उच्छेद करनेके लिये शस्त्ररूप हैं, जो समस्त पापोंका नाश तथा अक्षय ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले हैं, उन अक्षयवटस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है।'

(इसके बाद लिङ्गस्वरूप प्रपितामहको नमस्कार करे-)

कलौ माहेश्वरालोका येन तस्माद् गदाधरः ।

लिङ्गरूपोऽभवत्तं च वन्दे त्वां प्रपितामहम्॥७-८॥

'कलियुगमें लोग प्रायः शिवभक्त होते हैं, विभिज तीर्थोकी पृथक्-पृथक् महिमा इसलिये भगवान् गदाधर वहाँ शिवलिकरूपमें प्रकट हुए हैं। प्रभो। आप पितामह ब्रह्माके भी पिता होनेसे प्रपितामहरूप हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।' इस मन्त्रसे उन प्रपितामहदेवको नमस्कार करके मनुष्य अपने पितरोंको रुद्रलोकमें पहुंचा देता है। हेति नामसे प्रसिद्ध एक असुर था; भगवान्ने में अपनी गदासे उस असुरके मस्तकके दो टुकड़े में कर दिये। तत्पश्चात् जहाँ वह गदा धोयी गयी, वह गदालोल नामसे विख्यात श्रेष्ठ तीर्थ हो गया। हेति राक्षस ब्रह्माजीका पुत्र था। उसने बड़ी अद्भुत तपस्या की। तपस्यासे वरदायक ब्रह्मा आदि देवताओंको सन्तुष्ट करके यह वर माँगा-'मैं दैत्य आदिसे, शस्त्र आदिसे, नाना प्रकारके मनुष्योंसे तथा विष्णु और शिव आदिके चक्र एवं त्रिशूल आदि आयुधोंद्वारा अवध्य और महान् बलवान् होऊँ।' 'तथास्तु' कहकर देवता अन्तर्धान हो गये। तब हेतिने देवताओंको जीत लिया और स्वयं इन्द्रपदका उपभोग करने लगा। तब ब्रह्मा और शिव आदि देवता भगवान् विष्णुकी शरणर्मे गये और बोले-'भगवन् ! हेतिका वध कीजिये।'

भगवान्ने कहा-'देवताओ! हेति तो समस्त सुर और असुरोंके लिये अवध्य है। तुम लोग को मुझे कोई ब्रह्माजीका अस्त्र दो, जिससे मैं हेतिको मारूँ।' उनके ऐसा कहनेपर ब्रह्मादि देवताओंने भगवान् है, विष्णुको वह गदा दे दी और कहा-'उपेन्द्र! आप हेतिको मार डालिये। देवताओंके ऐसा को कहनेपर भगवान्ने वह गदा धारण की। फिर युद्धमें गदाधरने गदासे हेतिको मारकर देवताओंको स्वर्गलोक लौटा दिया।

तदनन्तर महानदीमें स्थित गायत्री-तीर्थम उपवासपूर्वक सान करके गायत्रीदेवीके समक्ष

सन्ध्योपासना करे। वहाँ पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य अपने कुलको ब्राह्मणत्वकी ओर ले जाता है। समुद्यत-तीर्थ स्रान करके सावित्री-देवीके समक्ष मध्याह्नकालकी सन्ध्योपासना करके द्विज अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। तत्पश्चात् प्राची सरस्वती स्रान करके सरस्वती-देवीके समक्ष सायंकालीन सन्ध्योपासना करके मनुष्य अपने कुलको सर्वज्ञताकी प्राप्ति कराता है। वह अनेक जन्मोतक किये हुए सन्ध्यालोषजनित पापसे सर्वथा शुद्ध हो जाता है। विशालामें लेलिहान-तीर्थमें, भरताश्रममें पदाध्रित-तीर्थ में, मुण्डपृष्ठमें गदाधरके समीप, आकाशगङ्गातीर्थ में तथा गिरिकर्ण आदिमें श्राद्ध एवं पिण्डदान करनेवाला, गोदा वैतरणीमें स्नान करनेवाला एवं देवनदीमें, गोप्रचारमें, मानसतीर्थमें, पदस्वरूप-दीर्थों में, पुष्करिणीमें, गदालोल-तीर्थमें, अमस्तीर्थमें, कोटितीर्थ में तथा रुक्मकुण्डमें पिण्ड देनेवाला पुरुष्व अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। सुलोचने! मार्कण्डेयेश्वर तथा कोटीश्वरको नमस्कार करके मनुष्य अपने पितरोंको तार देता है तथा पुण्यदायिनी पाण्डुशिलाका दर्शनमात्र करनेसे मानव अपने नरकनिवासी पितरोंको भी पवित्र करके उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचाता है। पाण्डुशिलाके विषय में यह उदार प्रकट करके राजा पाण्डु अविनाशी शाश्वत पदको प्राप्त हुए थे। फ़्तकुल्या, मधुकुल्या, देविका और महानदी-ये शिलामें संगत होकर मधुलवा कही गयी हैं। वहाँ स्नान करनेसे मानव दस हजार अश्वमेध-यज्ञोका फल पाता है।

दशाश्वमेधतीर्थ और हंसतीर्थमें श्राद्ध करनेसे श्राद्धकर्ता स्वर्गलोकमें जाता है। मतङ्गपदमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष ब्रह्मलोकका निवासी होता है। ब्रह्माजीने विष्णु आदिके साथ शमीग में अग्निका मन्थन करके एक नूतन तीर्थको उत्पात किया, जो मन्थोकुण्डके नामसे विख्यात है। वह पितरोंको मुक्ति देनेवाला तीर्थ है। वहाँ नान करके तर्पण और पिण्डदान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। रामेश्वर और करकेश्वरको नमस्कार करके मानव अपने पितरोंको स्वर्गमें भेज देता है। गयाकूपमें पिण्डदान करनेसे अश्वमेष-यज्ञका फल प्राप्त होता है। भस्मकूटमें भस्मस्नान करनेसे मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। निःक्षौरा-संगममें स्नान करनेवाले मनुष्यके सारे पाप धुल जाते हैं। रामपुष्करिणीमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुंचाता है वशिष्ठतीर्थमें वशिष्ठेश्वरको प्रणाम करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञके पुण्यका भागी होता है। धुनेकारण्यमें कामधेनु-पदोंपर स्नान करके पिण्ड देनेवाला पुरुष वहाँके देवताको नमस्कार करके पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुंचाता है। कर्दमालतीर्थमें, गयानाभिमें और मुण्डपृष्ठके समीप स्नान करके श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। चण्डीदेवीको नमस्कार तथा फल्गुचण्डीश नामक संगमेश्वरका पूजन करनेसे भी पूर्वोक्त फलकी ही प्राप्ति होती है। गयागज, गयादित्य, गायत्री, गदाधर गया और गयाशिर—ये छ: प्रकारको गया मुक्ति देनेवाली है। श्राद्धकर्ता जिस-जिस तीर्थ में जाय, वहीं जितेन्द्रियभावसे आदिगदाधरका ध्यान करते हुए ब्राह्मणके कथनानुसार श्राद्ध एवं पिण्डदान करे। तदनन्तर भगवान् जनार्दनका विधिपूर्वक पूजन करके दही और भातका उत्तम नैवेद्य अर्पण करे- तत्पथात् पिण्डदान करके भगवत्प्रसादसे ही जीवननिर्वाह करे। दैत्यके मुण्डपृष्ठपर वह शिला स्थित है, इसलिये मुण्डपृष्ठ नामक पर्वत पितरोंको ब्रहालोक देनेवाला है। श्रीरामचन्द्रजीके बन जानेके बाद उनके भाई भरत उस पर्वतपर आये थे। उन्होंने पिताको पिण्ड आदि देकर वहाँ रामेश्वरको स्थापना की थी। जो एकाधित होकर वहाँ लान करके रामेश्वरको तथा राम और सीताको नमस्कार करता और ब्राड एवं पिण्डदान देता है, वह धर्मात्मा अपने पितरों के साथ भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। शिलाके दक्षिण हाथमें स्थापित मुण्डपृष्ठतीर्थके समीप श्राद्ध आदि करनेसे मनुष्य अपने समस्त पितरोंको ब्रह्मलोक पहुँचा देता है। कुण्डने सीतागिरिके दक्षिण पर्वतपर बड़ी भारी तपस्या की थी, अतः उनके नामपर कुण्डपृष्ठतीर्थ विख्यात हुआ।

पुण्यमय मतङ्गपदमें पिण्ड देनेवाला पुरुष अपने पितरोंको स्वर्गमें पहुँचा देता है। शिलाके बायें हाथमें उद्यन्तक गिरिकी स्थापना हुई। यहाँ महात्मा अगस्त्यजीने उदयाचलको ले आकर स्थापित किया था। वहाँ पिण्ड देनेवाला पुरुष अपने पितरोंको ब्रहालोक भेज देता है। अगस्त्यजीने अपनी तपस्याके लिये वहाँ उद्यन्तक नामक कुण्डका निर्माण किया था। वहाँ ब्रह्माजी अपनी देवी सावित्री और सनकादि कुमारोंके साथ विराजमान हैं। हाहा, हूहू आदि गन्धर्वोने वहाँ सङ्गीत और वायका आयोजन किया था। अगस्त्यतीर्थमें स्नान करके मध्याह्नकालमें सावित्रीकी उपासना करनेपर पुरुष कोटि जन्मोंतक धनाढ्य तथा वेदवेत्ता ब्राह्मण होता है। अगस्त्यपदमें स्नान करके पिण्ड देनेवाला पुरुष पितरोंको स्वर्गकी प्राप्ति कराता है। जो मनुष्य ब्रह्मयोनिमें प्रवेश करके निकलता है, वह योनिसंकटसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होता है । गयाकुमारको प्रणाम करके मनुष्य ब्राह्मणत्व पाता है। सोमकुण्डमें स्नान आदि करनेसे वह पितरोंको चन्द्रलोककी प्राप्ति कराता है। काकशिलामें कौओंके लिये दी हुई बलि क्षणभरमें मोक्ष देनेवाली है। स्वर्गद्वारे घरको नमस्कार करके मनुष्य अपने पितरोंको स्वर्गसे ब्रह्मलोकको भेज देता है। आकाश गन्ना पिण्ड देनेवाला पुरुष स्वयं निर्मल होकर पितरोंको स्वर्गलोक भेज देता है। शिलाके दाहिने हाथमें धर्मराजने भस्मकूट धारण किया था। अत: वहाँ महादेवजीने अपना वही नाम रखा है। मोहिनी ! जहाँ भस्मकूट पर्वत है, वहीं भस्म नामधारी भगवान् शिव हैं। जहाँ वट है वहाँ वटेश्वर ब्रह्माजी स्थित हैं। उनके सामने रुक्मिणी-कुण्ड है और पश्चिममें कपिला नदी है। नदीके तटपर कपिलेश्वर महादेव हैं, वहीं उमा और सोमकी भेंट हुई थी। मनुष्य कपिलामें स्नान करके कपिलेश्वरको प्रणाम एवं उनका पूजन करे। वहाँ श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष स्वर्गलोकका भागी होता है। महिषीकुण्डपर मङ्गलागौरीका निवास है, जो पूजित होनेपर पूर्ण सौभाग्यको देनेवाली है। भस्मकूटमें भगवान् जनार्दन हैं। उनके हाथमें अपने या दूसरेके लिये बिना तिलके और सव्यभावसे भी पिण्ड देनेवाला पुरुष जिनके लिये दधिमिश्रित पिण्ड देता है, वे सब विष्णुलोकगामी होते हैं। (वहाँ पिण्ड देकर भगवान्से इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-)

एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन।

गयाश्राद्धे त्वया देयो मह्यं पिण्डो मृते मयि ।।

तुभ्यं पिण्डो मया दत्तो यमुद्दिश्य जनार्दन ।

देहि देव गयाशीर्षे तस्मै तस्मै मृते ततः॥

जनार्दन नमस्तुभ्यं नमस्ते पितृरूपिणे।

पितृपात्र नमस्तुभ्यं नमस्ते मुक्तिहेतवे।।

गयायां पितृरूपेण स्वयमेव जनार्दनः ।

तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं मुच्यते च ऋणत्रयात्॥

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष ऋणत्रयविमोचन।

लक्ष्मीकान्त नमस्तेऽस्तु नमस्ते पितृमोक्षद॥

(ना० उत्तर० ४७। ६३-६७)

'जनार्दन ! मैंने आपके हाथमें यह पिण्ड दिया है। मेरे मरनेपर आप गयाश्राद्धमें मुझे पिण्ड दीजियेगा। जनार्दन । जिसके उद्देश्यसे मैंने आपको पिण्ड दिया है, देव। उसके मरनेपर आप गयाशीर्षमें उसके लिये अवश्य पिण्ड दें। जनार्दन!

आप पितृस्वरूप है,आपको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है। पितरोकि पात्रताप नारायण सापको नमस्कार है। आप सबकी मुक्तिके हेतुभूत है, आपको नमस्कार है। गया साक्षात् जनार्दल ही पितृरूपसे विद्यमान है। ठन कमलनेत्र श्रीहरिका दर्शन करके मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। पुण्डरीकाक्ष। आपको नमस्कार है। तीनों ऋणोंसे मुक्त करनेवाले लक्ष्मीकान्त। आपको नमस्कार है। पितरोंको मोक्ष देनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार कमलनयन भगवान् जनार्दनका पूजन करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। पृथ्वीपर बायाँ घुटना गिराकर भगवान् जनार्दनको नमस्कार करे। तत्पश्चात् पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करनेवाला पुरुष भाइयोंसहित विष्णुलोकमें जाता है। शिलाके वाम भागमें प्रेतकूटगिरि स्थित है। प्रेतकूटगिरिको धर्मराजने धारण किया है। वहाँ प्रेतकुण्ड है, जहाँ पदोंके साथ देवता विद्यमान हैं। उसमें सान करके श्राद्ध-तर्पण आदि करनेवाला पुरुष पितरोंको प्रेतभावसे मुक्त कर देता है। कीकट प्रदेशमें गया, राजगृह वन, महर्षि च्यवनका आश्रम, पुनपुना नदी, वैकुण्ठ, लोहदण्ड तथा सौणग गिरिकूट-

ये सब पवित्र हैं। उनमें श्राद्ध-पिण्डदान आदिम करनेवाला पुरुष पितरोंको ब्रहाधाममें पहुँचा देता है है। शिलाके दक्षिण पादमें गृध्रकूटगिरि रखा गया है। धर्मराजने शिलाको स्थिर रखनेके लिये वहाँ उस पर्वतको स्थापित किया है। वह शीष पवित्र करनेवाला है। वहाँ 'गोवर' नामक भगवान् शिव विराजमान हैं। गधेश्वरका दर्शन और उनके समीप खान करके मनुष्य शिवधाममें जाता है। ऋणमोक्ष एवं पापमोक्ष नामवाले शिवजीका दर्शन के करके मनुष्य शिवलोकमें जाता है। वह विघ्नोंका नाश करनेवाले विनेश्वर गणेशजी गजरूपसे निवास करते है। उनका दर्शन करके मनुष्य विघ्नोंसे मुक्त होता है और पितरोंको भगवान् शिवके लोकमें पहुंचा देता है। स्नान करके गायत्री और गयादित्यका दर्शन करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। प्रथम पादमें विराजमान ब्रह्माजीका दर्शन करके पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। जो नाभिमें पिण्ड देता है, वह पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। मुण्डपृष्ठकी शोभाके लिये श्रेष्ठ कमल उत्पन्न हुआ है। मुण्डपृष्ठ और अरविन्द दोनोंका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो हाथियों अथवा सोका अपराध करके मारा गया है। जो परायी स्त्रियोंसे रमण करते समय उनके पतियोंद्वारा मारे गये हैं; जो गौओंको आगमें जलाने या विष देनेवाले हैं, पाखण्डी तथा क्रूर बुद्धिवाले हैं; जो नराधम क्रोधमें आकर प्रायः विष खा लेते, आगमें जल मरते, अपने ऊपर हथियार चला लेते, फाँसी लगाकर मर जाते, पानीमें डूब मरते तथा वृक्ष एवं पर्वतसे नीचे कूदकर प्राण दे देते हैं; जो पाँच प्रकारकी हत्याके अधिकारी हैं तथा जो महापातकी हैं, वे सब-के-सब पतित कहे गये हैं। वे गयाकूपके नानसे तथा वहाँकी भस्म रमानेसे अवश्य शुद्ध हो जाते हैं। देवि! इस प्रकार, गयातीर्थका उत्तम माहात्म्य सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा पितरोंको मुक्ति देनेवाला है। जो मनुष्य इसे प्रतिदिन अथवा श्राद्ध एवं पर्वके दिन भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह भी ब्रह्मलोकका भागी होता है। वह कल्याणका आश्रय, पवित्र, धन्य तथा मानवोंको स्वर्गीय गति प्रदान करनेवाला है। यह माहात्य यश, आयु तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है।