नारद महा पुराण
राजाकी मोहिनीसे प्रणय-याचना, मोहिनीकी शर्त तथा राजाद्वारा उसकी स्वीकृति एवं विवाह तथा दोनोंका राजधानीकी ओर प्रस्थान
वसिष्ठजी कहते हैं- मोहिनीके इस प्रकार सुन्दर वचन बोलनेपर राजा रुक्माङ्गद आँखें खोलकर गद्गद कण्ठसे बोले-'बाले । मैंने पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाली बहुत-सी रमणियोंको देखा, किंतु ऐसा रूप मैंने कहीं नहीं देखा है, जैसा कि विश्वविमोहन रूप तुमने धारण किया है। वरानने। तुम्हारे दर्शनमात्रसे इतना मोहित हो गया कि तुमसे बातत्तक न कर सका और पृथ्वीपर गिर पड़ा। मुझपर कृपा करो। तुम्हारे मनमें जो भी अभिलाषा होगी, यह सब मैं तुम्हें दूंगा। मैं सम्पूर्ण पृथ्वीको तुम्हारी सेवामें दे दूंगा। इसके साथ ही कोष, खजाना, हाथी, घोड़े, मन्त्री और नगर आदि भी तुम्हारे अधीन हो जायेंगे। तुम्हारे लिये मैं अपने-आपको भी तुम्हें अर्पण कर दूंगा; फिर धन, रज आदिकी तो बात ही क्या है? अतः मोहिनी। मुझपर प्रसन्न हो जाओ।'
राजाका मधुर वचन सुनकर मोहिनीने मुसकराते हुए उस समय उन्हें उठाया और इस प्रकार कहा-'वसुधापते ! मैं आपसे पर्वतोंसहित पृथ्वी नहीं माँगती। मेरी इतनी ही इच्छा है कि मैं समयपर जो कुछ कहूँ, उसका निःशङ्क होकर आप पालन करते रहें। यदि यह शर्त आप स्वीकार कर लें तो मैं नि:संदेह आपकी सेवा करूंगी।'
राजा बोले- देवि! तुम जिससे संतुष्ट रहो, वही शर्त मैं स्वीकार करता हूँ।
मोहिनीने कहा-आप अपना दाहिना हाथ मुझे दीजिये; क्योंकि वह बहुत धर्म करनेवाला हाथ है। राजन्! उसके मिलनेसे मुझे आपकी बातपर विश्वास हो जायेगा। आप धर्मशील राजा हैं। आप समय आनेपर कभी असत्य नहीं बोलेंगे। राजन्। मोहिनीके ऐसा कहनेपर महाराज रुक्माङ्गदका मन प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले-'सुन्दरि। जन्मसे लेकर अबतक मैंने कभी क्रीडाविहारमें भी असत्य भाषण नहीं किया है। लो, मैंने पुण्य-चिह्नसे युक्त यह दाहिना हाथ तुम्हें दे दिया। मैंने जन्मसे लेकर अबतक जो भी पुण्य किया है, वह सब यदि तुम्हारी बात न मानें तो तुम्हारा ही हो जाय। मैंने धर्मको ही साक्षीका स्थान दिया है। कल्याणी। अब तुम मेरी पत्नी बन जाओ! मैं इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। मेरा नाम रुक्माङ्गद है। मैं महाराज ऋतध्वजका पुत्र हूँ और मेरे पुत्रका नाम धर्माङ्गद है। तुम मेरी प्रार्थनाका उत्तर देकर मेरे ऊपर कृपादृष्टि करो।'
राजाके ऐसा कहनेपर मोहिनीने उत्तर देते हुए कहा-'राजन्! मैं ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ। आपकी कीर्ति सुनकर आपके लिये ही इस स्वर्णमय मन्दराचलपर आयी हूँ। केवल आपमें मन लगाये यहाँ तपस्यामें तत्पर थी और देवेश्वर भगवान् शङ्करका संगीतदानके द्वारा पूजन कर रही थी। मुझे विश्वास है कि संगीतका दान देवताओंको अधिक प्रिय है। संगीतसे संतुष्ट हो भगवान् पशुपति तत्काल फल देते हैं। तभी तो अपने प्रियतम आप महाराजको मैंने शीघ्र पा लिया है। राजन्! आपका मुझपर प्रेम है और मैं भी आपसे प्रेम करती हूँ।' राजासे ऐसा कहकर मोहिनीने उनका हाथ पकड़ लिया।
तदनन्तर राजाको उठाकर मोहिनी बोली- महाराज ! मेरे प्रति कोई शङ्का न कीजिये। मुझे कुमारी एवं पापरहित जानिये। महीपाल | गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार मेरे साथ विवाह कीजिये। राजन् !यदि अविवाहिता कन्या गर्भ धारण कर ले तो वह सब वर्गों में निन्दित चाण्डाल पुत्रको जन्म देती है। पुराणमें विद्वान् पुरुषोंने तीन प्रकारकी चाण्डाल-योनि मानी है- एक तो वह जो कुमारी कन्यासे उत्पन्न हुआ है, दूसरा वह जो विवाहिता होनेपर भी सगोत्र कन्याके पेटसे पैदा हुआ है। नृपश्रेष्ठ। शूद्रके वीर्यद्वारा ब्राह्मणीके गर्भसे तत्पन्न हुआ पुत्र तीसरे प्रकारका चाण्डाल है।* महाराज। इस कारण
*चाण्डालयोनघस्तिसः पुराणे कवयो बिदुः।
कुमारीसम्भवा त्वेका सपोश्रपि द्वितीश्रका।
ब्राह्मण्यां शूद्रजनिता तृतीया नृपपुङ्गव।।
मुझ कुमारीके साथ आप विवाह कर लें।
तब राजा रुक्माङ्गदने मन्दराचलपर उस चपलनयना मोहिनीके साथ विधिपूर्वक विवाह किया और उसके साथ हँसते हुए-से रहने लगे।
राजाने कहा-वरानने! स्वर्गकी प्राप्ति भी मुझे वैसा सुख नहीं दे सकती, जैसा सुख इस मन्दराचल पर्वतपर तुम्हारे मिलनेसे प्राप्त हो रहा है। बाले! तुम यहीं मेरे साथ रहोगी या मेरे राजमहलमें? राजा रुक्माङ्गदकी बात सुनकर मोहिनीने अनुरागपूर्वक मधुर वाणीमें कहा-'राजन् ! जहाँ आपको सुख मिले, वहीं मैं भी रहूँगी। स्वामीका निवासस्थान धन-वैभवसे रहित हो तो भी पत्रीको वहीं निवास करना चाहिये। उसके लिये पतिके सामीप्यको ही सुवर्णमय मेरु पर्वत बताया गया है। नारीके लिये पतिके निवासस्थानको छोड़कर अपने पिताके घर भी रहना वर्जित है। पिताके स्थान और माय भासत होनेवाली स्त्री नरकमें डूबती है। यह सब धर्मसे रहित होकर सूकर- योनिमें जन्म लेती है।* इस प्रकार पतिक निवासरणानसे अन्यत्र रहने में जो दोष है, ठसे में जानती हूँ। अतः मैं आपके साथ ही चलूंगी। सुख और दुःखमें आप ही मेरे स्वामी हैं।'
मोहिनीका यह कथन सुनकर राजाका हृदय प्रसनतासे खिल उठा। वे उस सुन्दरीको हृदयसे लगाकर बोले-'प्रिये। मेरी समस्त पत्रियों तुम्हारा स्थान सर्वोपरि होगा। मेरे घरमें तुम प्राणोंसे भी अधिक प्रिय बनकर रहोगी। आओ, अब हम लोग सुखपूर्वक राजधानीकी ओर चलें।' राजा रुक्माङ्गदने जब ऐसी बात कही, तब चन्द्रमाके समान मुखवाली मोहिनी उस पर्वतकी शोभाको अपने साथ खींचती हुई (राजा रुक्माङ्गदके साथ राजधानीकी ओर) चली।