नारद महा पुराण
धर्माङ्गदका दिग्विजय, उसका विवाह तथा उसकी शासन-व्यवस्था
वसिष्ठजी कहते हैं-रानज् ! इस प्रकार मोहिनीक विलाससे मोहित हुए राणा रुकमाङ्गदके आठ वर्ष बड़े सुखसे बीते। नवम वर्ष आनेपर उनके बलवान् पुत्र धर्माङ्गदने मलयपर्वतपर पांच विद्याधरोंको परास्त किया और उनसे पाँच मणियोंको छीन लिया, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली और शुभकारक थीं। एक मणिमें यह गुण था कि वह प्रतिदिन कोटि-कोटि गुना सुन्दर सुवर्ण दिया करती थी। दूसरी लाखकोटि वस्त्राभूषण आदि दिया करती थी। तीसरी अमृतकी वर्षा करती और बुढ़ापेमें भी पुनः नयी जवानी ला देवी थी। चौथीमें यह गुण था कि वह सभाभवन तैयार कर देती और उसमें इच्छानुसार अन्न प्रस्तुत किया करती थी। पाँचवीं मणि आकाशमें चलनेकी शक्ति देती और तीनों लोकोंमें भ्रमण करा देती थी। उन पाँचों मणियोंको लेकर धर्माङ्गद मन:-शक्तिसे पिताके पास आये। राजकुमारने पिता रुक्माङ्गद और माता मोहिनीके चरणों में प्रणाम किया और उनके चरणों में पाँचों मणि समर्पित करके विनीत भावसे कहा- 'पिताजी! पर्वतश्रेष्ठ मलयपर मैंने वैष्णवास्त्रद्वारा पाँच विद्याधरोंपर विजय पायी है। नृपश्रेष्ठ ! वे अपनी स्त्रियोंसहित आपके सेवक हो गये हैं। आप ये मणियाँ मोहिनी देवीको दे दीजिये। वे इनके द्वारा अपनी बाँहोंको विभूषित करेंगी। ये मणियाँ समस्त कामनाओंको देनेवाली हैं। भूपते! आपके ही प्रतापसे मैंने सातों द्वीपोंको बड़े कष्टसे अपने अधिकारमें किया है। तदनन्तर कुमार धर्माङ्गदने नागोंकी भोगपुरी, विशाल दानवपुरी और वरुणलोकके विजयकी बात सुनाकर वहाँसे जीतकर लाये हुए करोड़ों रन, हजारों श्वेतरंगके श्यामकर्ण घोड़े और हजारों कुमारियोंको पिताको दिखाया और कहा-'पिताजी। मैं और यह सारी सम्पत्तियाँ आपके अधीन हैं। तात। पुत्रको पिताके सामने आत्मप्रशंसा नहीं करनी चाहिये। पिताके ही पराक्रमसे पुत्रकी धनराशि बढ़ती है। अत: आप अपनी इच्छाके अनुसार इनका दान अथवा संरक्षण कीजिये। मेरी माताएँ भी अपनी इस सम्पदाको देखें।'
वसिष्ठजीने कहा- पुत्रकी बात सुनकर नृपश्रेष्ठ रुक्माङ्गद बड़े प्रसन्न हुए और अपनी प्रियाके साथ उठकर खड़े हो गये। उन्होंने वह सारी धन-सम्पत्ति देखी। उन विष्णुषरायण राजाने एक क्षणतक हर्षमें मग्न रहकर बड़े प्रेमके सहित वरुण-कन्यासहित समस्त नागकन्याओंको अपने पुत्र धर्माङ्गदके अधिकारमें दे दिया। शेष सब वस्तुएँ बहुत-से रनों तथा दानव-नारियोंके साथ उन्होंने मोहिनीको अर्पित कर दी। धर्माङ्गदके लाये हुए धन-वैभवका यथायोग्य विभाजन करके राजाने समयपर पुरोहितजीको बुलाया और कहा- 'ब्रह्मन्। मेरा पुत्र सदा मेरी आज्ञाके पालनमें स्थित रहा है और अभीतक यह कुमार ही है। अतः इन सब कुमारियोंका यह धर्मपूर्वक पाणिग्रहण करे। धर्मको इच्छा रखनेवाले पिताको पुत्रका विवाह अवश्य कर देना चाहिये। जो पिता पुत्रोंको पन्नी और धनसे संयुक्त नहीं करता, उसे इस लोक और परलोकमें भी निन्दित जानना चाहिये। अतः पुत्रोंको स्त्री तथा जीवन-निर्वाहके योग्य धनसे सम्पन्न अवश्य कर देना चाहिये।'
राजाका यह वचन सुनकर पुरोहितजी बड़े प्रसन्न हुए और धर्माङ्गदका विवाह करानेके उद्योगमें लग गये। धर्माङ्गद युवा होनेपर भी लज्जावश स्त्री-सुखकी इच्छा नहीं रखते थे तथापि पिताके आदेशसे उन्होंने उस समय स्त्री-संग्रह स्वीकार कर लिया। तदनन्तर महाबाहु धर्माङ्गदने वरुण- कन्याके साथ, मनोहर नागकन्याओंके साथ भी विवाह किया, जो पृथ्वीपर अनुपम रूपवती थीं। शास्त्रीय विधिके अनुसार उन सबका विवाह करके धर्माङ्गदने ब्राह्मणोंको धन, रत्न तथा गौओंका प्रसन्नतापूर्वक दान किया। विवाहके पश्चात् उन्होंने माता और पिताके चरणों में हर्षके साथ प्रणाम किया। तदनन्तर राजकुमार धर्माङ्गदने अपनी माता संध्यावलीसे कहा- 'देवि! पिताजीकी आज्ञासे मेरा वैवाहिक कार्य सम्पन्न हुआ है। मुझे दिव्य भोगों तथा स्वर्गसे भी कोई प्रयोजन नहीं है। पिताजीकी तथा तुम्हारी दिन रात सेवा करना ही मेरा कर्तव्य है।'
संध्यावली बोली-'बेटा! तुम दीर्घकालतक सुखपूर्वक जीते रहो। पिताके प्रसादसे मनके अनुरूप भोगोंका उपभोग करो। वत्स! तुम जैसे गुणवान् पुत्रके द्वारा मैं इस पृथ्वीपर श्रेष्ठ पुत्रवाली हो गयी हूँ और सपनियोंके हृदयमें मेरे लिये उच्चतम स्थान बन गया है।'
ऐसा कहकर माताने पुत्रको हृदयसे लगाकर बार-बार उसका मस्तक संघा। तत्पश्चात् उसे राजकाज देखनेके लिये विदा किया। माता संध्यावलीसे विदा लेकर राजकुमारने अन्य माताओंको भी प्रणाम किया और पिताकी आज्ञाके अधीन रहकर वे राज्यशासनका समस्त कार्य देखने लगे। वे दुष्ठोंको दण्ड देते, साधु-पुरुषोंका पालन करते और सब देशोंमें घूम-घूमकर प्रत्येक कार्यकी देखभाल किया करते थे। सर्वत्र पहुँचकर प्रत्येक मासमें वहाँके कार्योका निरीक्षण करते थे। उन्होंने हाथी और घोड़ोंके पालन-पोषणकी अच्छी व्यवस्था की थी। गुप्तचर-मण्डलपर भी उनकी दृष्टि रहती थी। इधर उधरसे प्राप्त समाचारों को वे देखते और उनपर विचार करते थे। प्रतिदिन माप और तौलकी भी जाँच करते रहते थे। राजा धर्माङ्गद प्रत्येक घरमें जाकर वहाँक लो!की रक्षाका प्रबन्ध करते थे। उनके राज्यमें कहीं दूध पीनेवाला बालक माताके स्तन न मिलनेसे रोता हो, ऐसा नहीं देखा गया। सास अपनी पुत्रवधूसे अपमानित होकर कहीं भी रोती नहीं सुनी गयी। कहीं भी समर्थ पुत्र पितासे याचना नहीं करता था। उनके राज्यभरमें किसीके यहाँ वर्णसंकर संतानकी उत्पत्ति नहीं हुई। लोग अपना धन- वैभव छिपाकर नहीं रखते थे। कोई भी धर्मपर से दोषारोपण नहीं करता था। सधवा नारी कभी भी बिना चोलीके नहीं रहती थी। उन्होंने यह घोषणा करायी थी कि 'मेरे राज्यमें स्त्रियाँ घरोंमें सुरक्षित ही रहें। विधवा केशन रखावे और सौभाग्यवती कभी केश न कटावे। जो दूसरोंको साधारणवृत्ति
(जीवन निर्वाहके लिये अन्न आदि) नहीं देखा, वह निर्दयी मेरे राज्य में निवास न करे। दूसरोंको सद्गुणोंका उपदेश देनेवाला पुरुष स्वयं सद्गुण शून्य हो और ऋत्विा यदि शास्त्रज्ञानसे वशित हो तो वह मा राज्य में निवास न को। जो नौलका उत्पादन करता है अथवा जो नोलके रंगो अधिकातर वस्त्र सा करता है, उन दोनोको मेरे इसे राज्यस निकाल देना चाहिये। जो मदिरा बनाता है, वह भी यहाँसे निर्वासित होने योग्य ही है। जो मांस भक्षण करता है तथा जो अपनी स्त्रीका अकारण परित्याग करता है, उसका मेरे राज्यम निवासन हो। जो गर्भवती अथवा सधःप्रसूता युवतीसे समागम करता है, वह मनुष्य मुला-जैसे शासकोंके द्वारा दण्डनीय है।'