नारद महा पुराण
काशी-यात्राका काल, यात्राकालमें यात्रियोंके लिये आवश्यक कृत्य, अवान्तर तीर्थ और शिवलिङ्गोंका वर्णन
पुरोहित वसु कहते हैं- मोहिनी! अब मैं यात्राकालका वर्णन करता हूँ, जिसे देवता आदिने नियत किया है। वह यात्रा यथायोग्य फलकी प्राप्ति करानेवाली है। पूर्वकालमें देवताओंने काशीमें रहकर, चैत्र मासमें यह तीर्थयात्रा की थी। वे कामकुण्डपर स्थित होकर स्नान एवं पूजनमें तत्पर रहते थे। शुभानने । ज्येष्ठ मासमें रुद्रावास कुण्डपर सान-पूजामें तत्पर रहनेवाले सिद्धोंने वहाँकी शुभ यात्रा की है। गन्धर्वोने आषाड़ मासमें यहाँकी यात्रा की थी। वे प्रियादेवी- कुण्डपर रहकर स्नान-पूजन किया करते थे। मोहिनी। विद्याधरोंने श्रावण मासमें यह यात्रा की थी। ये लक्ष्मीकुण्डपर रहकर स्नान पूजन करते थे। वरानने। यक्षोंने आश्विन मासमें यह यात्रा सम्पन्न की है। वे मार्कण्डेय कुण्डपर रहकर
स्नान-पूजन में संलग्न थे। मोहिनी ! नागोंने मार्गशीर्ष मासमें यह यात्रा की है। वे कोटितीर्थमें रहकर स्रान-पूजन आदि करते थे। शुभलोचने! गुह्यकोंने कपालमोचनतीर्थमें रहकर स्नान-ध्यान एवं पूजन आदि करते हुए पौष मासमें यहाँकी यात्रा सम्पन्न की है। शोभने! पिशाचोंने फाल्गुन मासमें काशीकी यात्रा की थी। वे कालेश्वर-कुण्डपर रहकर स्नान-पूजन आदिमें तत्पर रहते थे। देवि! शुभ फाल्गुन मासमें शुक्ल पक्षकी जो चतुर्दशी है, उसीमें पिशाचोंने यात्रा की थी। इसीलिये उसे 'पिशाच चतुर्दशी' कहते हैं।
शुभानने! अब मैं यात्राका आवश्यक कृत्य बतलाऊँगा, जिसके करनेसे मनुष्य यात्राका फल पाता है। यात्राका समय जलसे भरे हुए सुन्दर पहोंको वस्वसे ढककर फल, फूल और मिष्ठानके साथ उनका दान करना चाहिये। चैत्रके शुक्लपक्षामें महान् फल देनेवाली जो तृतीया है, उसमें मनुष्योंको भक्तिभावसे गौरी- देवीका दर्शन करना चाहिये। वरानने! स्नान करके गोप्रेक्षतीर्थ में जाना चाहिये और स्वर्गद्वारमें जो कालिका देवी हैं, उनकी यापूर्वक पूजा करनी चाहिये। उनके सिवा संवर्ता और ललिता भी श्रेष्ठ एवं कल्याणमयी देवी कही गयी हैं, उनका भी भक्तिभावसे दर्शन करना चाहिये। वे सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाली हैं। तदनन्तर पवित्र व्रतका पालन करनेवाले शिवभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना और वस्त्र तथा भरपूर दक्षिणाद्वारा उनका यथायोग्य सत्कार करना चाहिये।
अब मैं उन विनायकोंका परिचय देता हूँ, जो काशीधोत्रके निवासमें विघ्न डालनेवाले हैं। देवि ! उनका पूजन करके मनुष्य काशीवासका निर्विघ्र फल प्राप्त करता है। पहले दुद्धिविनायक, फिर किलविनायक, देवीविनायक, गोप्रेक्षविनायक, हस्तिहस्तीविनायक तथा सिन्दधिनायकका दर्शन करना चाहिये। देवि! चतुर्षीको इन सभी विनायकोंका दर्शन करे और इनकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको मिठाई खिलावे। इस कार्यसे मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है।
अब मैं काशीक्षेत्रकी रक्षा करनेवाली चण्डिकाओंका वर्णन करता हूँ। दक्षिण दिशामें दुर्गा रक्षा करती हैं। नैर्ऋत्य कोणमें अन्तरेश्वरी, पश्चिममें अङ्गारेश्वरी, वायव्य कोणमें भद्रकाली, उत्तर दिशामें भीमचण्डा, ईशानकोणमें महामत्ता, पूर्व दिशामें ऊर्ध्वकेशीसहित शाङ्करीदेवी, अग्निकोणमें अध:केशी तथा मध्यभागमें चित्रघण्टादेवी रक्षा करती हैं। जो मानव इन चण्डिका देवियों का दर्शन करता है, उसपर प्रसन्न होकर वे सब-की-सब तत्परतापूर्वक उसके लिये क्षेत्रकी रक्षा करती हैं। देवि! ये पापियोंके लिये सदा विघ्न उपस्थित करती हैं, अत: रक्षाके लिये विनायकोंसहित उक्त देवियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये।
भीष्मजी काशीपुरीमें आकर उत्तम पञ्चायतनरूपसे देवेश्वर शिवकी आराधना करते हुए कुछ कालतक यहाँ रहे। सुभगे ! उस स्थानपर भगवान् शिव स्वयं प्रकट हुए थे, जो 'गोप्रेक्षक' के नामसे विख्यात हुए। सम्पूर्ण देवता उनकी स्तुति करते हैं। गोप्रेक्षेश्वरके पास आकर उनका दर्शन और पूजन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। एक समय वनकी गौएँ दावानलसे दाध हो इधर-उधर भटकती हुई इस कुण्डके समीप आयीं और यहाँका जल पीकर शान्त हुई। तबसे यह 'कपिलाहद' कहलाता है। यहाँ प्रकट होकर साक्षात् भगवान् शिव 'वृषध्वज' नामसे विख्यात हुए। भगवान् शिवन न केवल वहाँ निवास किया, वे वहाँ सबको प्रत्यक्ष दर्शन देते हुए शिवलिङ्गरूपमें विराजमान हैं। जो एकाग्रचित्त हो इस पिलाहद-तीर्थ खान करके वृषध्वज शिवका दर्शन करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता है। वह स्वर्गलोकमें जाता है। भगवान् वृषध्वजकी पूजा करके वहाँ मरा हुआ पुरुष शिवरूप हो जाता है। अथवा शरीर-भेदसे अत्यन्त दुर्लभ शिवगणका स्वरूप धारण करता है। इसी प्रदेशमें गौओंने स्वयं ब्रह्माजीके अनुरोधसे सम्पूर्ण लोकोंकी शान्तिके लिये तथा सबको पवित्र करनेके उद्देश्यसे अपना दुग्ध दान किया था; जिससे 'भद्रदोह' नामक सरोवर प्रकट हुआ, जो पवित्र, पापहारी एवं शुभ है। उस स्थानमें स्नान करनेवाला मनुष्य साक्षात् वागीश्वर होता है। वहाँ परमेष्ठी ब्रह्माजीने स्वयं ले आकर एक शिवलिङ्ग स्थापित किया है। फिर ब्रह्माजीसे लेकर भगवान् विष्णुने दूसरा शिवलिङ्ग स्थापित किया, जो 'हिरण्यगर्भ' के नामसे वहाँ विद्यमान है। तदनन्तर ब्रह्माजीने पुनः इसी कारणसे 'स्वलकिश्वर' नाम शिवलिङ्ग स्थापित किया; जो स्वर्गीय लीलाका दर्शन करानेवाला है। देवताओंके स्वामी उन स्वर्लोकेश्वरका दर्शन करके मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यहाँ प्राणत्याग करनेसे फिर कभी वह संसारमें जन्म नहीं लेता। उसकी वह अक्षयगति होती है, जो केवल योगियोंके लिये सुलभ बतायी गयी है।
भूमण्डलके उसी प्रदेशमें देवताओंके लिये कण्टकरूप दैत्य व्याघ्रका रूप धारण करके रहता था। वह बड़ा बलवान् और अभिमानी था। भगवान् शङ्करने उसे मारा और उस स्थानपर च्यालेश्वर नामसे प्रसिद्ध होकर नित्य निवास किया। उन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। हिमवान्के द्वारा स्थापित एक शिवलिङ्ग है, जो 'शैले घर के नामसे विख्यात है। भरे। शैलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। उत्पल और विदल नामके जो दो दैत्य ब्रह्माजीके वरदानसे बलोन्मत्त हो रहे थे, वे दोनों स्त्री-विषयक लोलुपताके कारण पार्वतीजीके हाथसे मारे गये। एक शार्ङ्गधनुषसे मारा गया और दूसरा कुन्तक अर्थात् भालेसे। इन दोनों शस्त्रोंके नामपर दो शिवलिङ्ग स्थापित किये गये हैं। भद्रे! जो मनुष्य श्रेष्ठ स्थानमें विद्यमान उक्त दोनों लिङ्गोंका दर्शन करता है, वह जन्म-जन्ममें सिद्ध होकर कभी शोक नहीं करता। देवताओंने उनके सब ओर बहुत-से शिवलिङ्ग स्थापित किये हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य देहत्यागके पश्चात् भगवान् शिवका गण होता है। वाराणसी नदी परम पवित्र और सब पापोंका नाश करनेवाली है। यह इस पवित्र क्षेत्रको सुशोभित करके गङ्गामें मिली है। उसके सङ्गमपर ब्रह्माजीने उत्तम शिवलिङ्गको स्थापना की है, जो 'सङ्गमेश्वर के नामसे संसारमें विख्यात है, उसका दर्शन करना चाहिये। शुभे! जो मानव इन देवनदियोंके सङ्गममें स्नान करके सङ्गमेश्वरका पूजन करता है, उसे जन्म लेनेका भय कैसे हो सकता है? भद्रे! भृगुपुत्र शुक्राचार्यने यहाँ एक शिवलिङ्ग स्थापित किया है, जो 'शुक्रेश्वर के नामसे विख्यात है। सम्पूर्ण सिद्ध और देवता भी उसकी पूजा करते हैं। इसका दर्शन करके मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। मोहिनी ! महादेवजीने यहाँ जम्बुक नामक दैत्यका वध किया था। तत्सम्बन्धी शिवलिङ्गका दर्शन करके मानव सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा स्थापित किये हुए इन शिवलिङ्गोको तुम पुण्यलिङ्ग समझो। ये समस्त कामनाओंको देनेवाले हैं। मोहिनी। इस प्रकार इस अविमुक्तक्षेत्रमें मैंने तुम्हें ये सब शिवलिङ्ग बताये हैं।