त्रिस्कन्ध ज्यौतिषके वर्णन-प्रसङ्गमें गणितविषयका प्रतिपादन सनन्दन उवाच

ज्यौतिषाङ्गं प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा।

यस्य विज्ञानमात्रेण धर्मसिद्धिर्भवेत्रणाम्॥१॥

त्रिस्कन्धं ज्योतिष शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहृतम्।

गणितं जातकं विप्र संहितास्कन्धसंज्ञितम्॥२॥

गणिते परिकर्माणि खगमध्यस्फुटक्रिये।

अनुयोगश्चन्द्रसूर्यग्रहणं चोदयास्तकम्॥३॥

छाया शृङ्गोन्नतियुती पातसाधनमीरितम्।

श्रीसनन्दनजी कहते हैं-देवर्षे! अब मैं ज्यौतिष नामक वेदाङ्गका वर्णन करूँगा, जिसका पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने उपदेश किया है तथा जिसके विज्ञानमात्रसे मनुष्योंके धर्मकी सिद्धि हो सकती है॥१॥ ब्रह्मन् ! ज्योतिषशास्त्र चार लाख श्लोकोंका बताया गया है। उसके तीन' स्कन्ध हैं, जिनके नाम ये हैं-गणित (सिद्धान्त), जातक (होरा) और संहिता ॥२॥ गणितमें परिकर्म, ग्रहोंके मध्यम एवं स्पष्ट करनेकी रीतियाँ बतायी गयी हैं। इसके सिवा अनुयोग (देश, दिशा और कालका ज्ञान), चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन्द्र-शृङ्गोन्नति', ग्रहयुति (ग्रहोंका योग) तथा पात (महापात-सूर्य-चन्द्रमाके क्रान्तिसाम्य)-का साधन प्रकार कहा गया है ॥२६॥

जातके राशिभेदाश ग्रहयोनिवियोनिजे ॥४॥

निषेकजन्मारिष्टानि ह्यायुर्दायो दशाक्रमः ।

कर्माजीवं चाष्टवर्गों राजयोगाश्च नाभसाः ॥५॥

चन्द्रयोगाः प्रव्रज्याख्या राशिशीलं च दृक्फलम्।

ग्रहभावफलं चैवाश्रययोगप्रकीर्णके ॥६॥

अनिष्टयोगा: स्त्रीजन्मफलं निर्याणमेव च।

नष्टजन्मविधानं च तथा द्रेष्काणलक्षणम्॥७॥

जातकस्कन्धमें राशिभेद, ग्रहयोनि, (ग्रहों की जाति, रूप और गुण आदि) वियोनिज (मानवेतर- जन्मफल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय, दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग, राजयोग, नाभसयोग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्यायोग, राशिशोल, ग्रहदृष्टिफल, ग्रहोंके भावफल, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातक फल, निर्याण (मृत्युविषयक विचार), नष्ट-जन्म-विधान (अज्ञात जन्म-कालको जाननेका प्रकार) तथा द्रेष्काणों के स्वरूप-इन विषयोंका वर्णन है॥४-७॥

संहिताशास्त्ररूपं च ग्रहचारोऽब्दलक्षणम्।

तिथिवासरनक्षत्रयोगतिथ्यर्द्धसंज्ञकाः ॥८॥

मुहूर्तापग्रहा: सूर्यसंक्रान्तिर्गोचरः कमात्।

चन्द्रताराबलं चैव सर्वलग्नातवाह्रयः ॥९॥

आधानपुंससीमन्तजातनामानभुक्तयः

चौलं कर्णचिदा मौनी रिकाबचनं तथा ॥१०॥

१. किसी-किसीके मतसे ज्यौतिषके पाँच स्कन्ध हैं-सिद्धान्त, होरा, संहिता, स्वर और सामुद्रिक। सिद्धान्तको ही गणित कहते हैं। होराका ही दूसरा नाम जातक है।

२. योग, अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन और घनमूल-ये परिकर्म कहे गये हैं।

३. द्वितीयाको जो चन्द्रोदय होता है, उसमें कभी चन्द्रमाका दक्षिण सौंग और कभी उत्तर सींग (नोक) ऊपरको ठठा रहता है, उसीको 'चन्द्रशृङ्गोन्नति' कहा गया है। ज्योतिषमें उसके परिणामका विचार किया गया है।

४. राशिके तृतीय भाग (१० अंश)-की 'ट्रेष्काण' संज्ञा है।

समावर्तनवैवाहप्रतिष्ठासद्मलक्षणम् ।

यात्रा प्रवेशन सद्योवृष्टिः कर्मविलक्षणम्॥११॥

उत्पत्तिलक्षणं चैव सर्व संक्षेपतो हुवे।

अब संहितास्कन्धके स्वरूपका परिचय दिया जाता है। उसमें ग्रहचार (ग्रहोंकी गति), वर्षलक्षण, तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त, उपग्रह सूर्य-संक्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रमा और ताराका बतान सम्पूर्ण लग्नों तथा ऋतुदर्शनका विचार, गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न- प्राशन, चूडाकरण, कर्णवेध, उपनयन, मौञ्जीबन्धन (वेदारम्भ), क्षुरिकाबन्धन, समावर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा, गृहलक्षण, यात्रा, गृहप्रवेश, तत्काल वृष्टिज्ञान, कर्मवलक्षण्य तथा उत्पत्तिका लक्षण-इन सब विषयोंका संक्षेपसे वर्णन करूँगा (८-११३॥

एकं दश शतं चैव सहस्त्रायुतलक्षकम् ॥१२॥

प्रयुतं कोटिसंज्ञा चार्बुदमब्जं च खर्वकम्।

निखर्वं च महापर्दा शङ्कर्जलधिरेव च ॥१३॥

अन्त्यं मध्यं परार्द्ध च संज्ञा दशगुणोत्तराः ।

क्रमादुत्क्रमतो वापि योग: कार्योऽन्तरं तथा॥१४॥

हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात् तेनैवोपान्तिमादिकान्।

शुद्धयेद्धरो यद्गुणश्च भायान्त्यात् तत्फलं मुने॥१५॥

 [अब गणितका प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है-] एक (इकाई), दश (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्त्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि (करोड़), अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खर्व (दस अरब), निखर्व (खर्व), महापद्म (दस खर्व), शङ्कु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शङ) इत्यादि संख्याबोधक संज्ञाएँ उत्तरोत्तर दसगुनी मानी गयी हैं। यथास्थानीय अङ्कोंका योग या अन्तर क्रम या व्युत्क्रमसे करना चाहिये ॥ १२-१४ ॥ गुण्यके अन्तिम अङ्कको गुणकसे गुणना चाहिये। फिर उसके पार्श्ववर्ती अङ्कको भी उसी गुणकसे गुणना चाहिये। इस तरह आदि अङ्कतक गुणन करनेपर गुणनफल प्राप्त हो जाता है, मुने! इसी प्रकार भागफल जाननेके लिये भी यत्न करे। जितने अङ्कसे भाजकके साथ गुणा करनेपर भाज्यमेंसे घट जाय, वही अङ्क लब्धि अथवा भागफल होता है ॥१५॥

समाङ्कघातो वर्ग: स्यात् तमेवाहुः कृतिं बुधाः ।

अन्त्यातुविषमात्यक्त्वा कृत्ति मूलं न्यसेत्पृथक्॥१६॥

१. यथा-२+५+३२+१९३+१८+१०+१००-इन्हें क्रम या युक्रम (इकाई या सैकड़ाकी और)-से जोड़ा जाय, समान स्थानीय अङ्कों का परस्पा योग किया जाय-अर्थात् इकाईको इकाईके माश्य और दहाई आदिके दहाई आदिके साथ जोड़ा जाय तो सर्वथा योगफल ३६० ही होगा। इसी प्रकार १००००-३६० इसमें ३६० को १०००० के नीचे लिखकर पूर्ववत् समान स्थानीय असे उसी स्थानवाले अङ्कको क्रम या व्युत्क्रमसे भी घटाया जाय तो शेष सर्वया ९६४० ही होगा।

२. यहाँपर 'अङ्कानां वामतो गतिः' इस उक्ति के अनुसार आदि-अन्त समझने चाहिये। जैसे–'१३५४१२' इसमें १३५ गुण्य है और १२ गुणक है। गुण्यका अन्तिम अङ्कहुआ १ उसमें १२ से गुणा पहले होगा, फिर उसके बादवाले ३ के साथ फिर ५ के साथ। यथा-वास्तवमें यह गुणन-शैली उस समयकी है, जब लोग धूल बिछाकर उसपर अङ्गलिसे गणित किया करते थे। आधुनिक शैली उससे भिन्न है। रूप विभाग और स्थान-विभागसे इस गुणनके अनेक प्रकार हो जाते है। इसका विस्तार लीलावती में देखना चाहिये। ३. १६२०-१२-१३५ भागफल हुआ। जैसे-

भाजक भाज्य भागफल

१२)१६२०(१३५

 ૧૨

 ३६

 ६०

द्विगुणेनामुना भक्ते फलं मूले न्यसेत् क्रमात्।

तत्कृतं च त्यजेद्विप्र मूलेन विभजेत् पुनः॥१७॥

एवं मुहुर्वर्गमूलं जायते च मुनीश्वर।

दो समान अटोंके गुणनफलको वर्ग कहा गया है। विद्वान् पुरुष उसीको कृति कहते हैं। (जैसे ४ का वर्ग ४४४ १६ और ९ का वर्ग ९४९-८१ होता है) [वर्गमूल जाननेके लिये दाहिने अङ्कसे लेकर बायें अङ्कतक अर्थात् आदिसे अन्ततक विषम और समका चिह्न कर देना चाहिये। खड़ी लकीरको विधमका और पड़ीको समका चिह्न माना गया है] । अन्तिम विषममें जितने वर्ग घट सकें उत्तने घटा देना चाहिये। उसवर्गका मूल लेना और उसे पृथक् रख देना चाहिये ॥ १६ ॥ फिर द्विगुणित मूलसे सम अङ्कमें भाग दे और जो लब्धि आवे उसका वर्ग विषममें घटा दे, फिर उसे दूना करके पङ्क्ति में रख दे। मुनीश्वर! इस प्रकार बार-बार करनेसे पङ्क्तिका आधा वर्गमूल' होता है ।।१७॥

समयकहतिः प्रोक्तो धनस्तत्र विधिः पदे ॥१८॥

प्रोच्यते विषम त्वाध समेटे च ततः परम् ।

विशोध्यं विधमादन्त्याधनं तन्मूलमुच्यते॥१९॥

त्रिनिष्याप्तं मूलकृत्या समं मूले न्यसेत् फलम्।

तत्कृतिज्ञान्त्यनिहतात्रिघ्नीं चापि विशोधयेत् ॥२०॥

घनं च विषमादेवं घनमूलं मुहुर्भवेत्।

समान तीन अङ्कोंके गुणनफलको 'घन' कहा गया है। अब घनमूल निकालनेकी विधि बतायी जाती है दाहिनेके प्रथम अङ्कपर घन या विषमका चिह्न (खड़ी लकीरके रूपमें) लगावे, उसके वामभागमें पार्श्ववर्ती दो अङ्कोंपर (पड़ी लकौरके रूपमें) अघन या समका चिह्न लगावे। इसी प्रकार अन्तिम अङ्कतक एक घन (विषम) और दो अघन (सम)-के चिह्न लगाने चाहिये। अन्तिम या विषम घनमें जितने घन घट सकें उतने घटा दे। उस घनको अलग रखें। उसका घनमूल ले और उस घनमूलका वर्ग करे, फिर उसमें तीनसे गुणा करे। उससे आदि अङ्कमें भाग दे, लब्धिको अलग लिख ले, उस लब्धिका वर्ग करे और उसमें अन्त्य (प्रथम मूलाङ्क) एवं तीनसे गुणा करे, फिर उसके बादके अङ्कमें उसे घटा दे तथा अलग रखी हुई लब्धिके घनको

१. वर्ग या कृति निकालनेके और भी बहुत-से प्रकार लीलावतीमें दिये गये है।

२. जैसे १६३८४ का वर्गमूल उपर्युक्त विधिसे निकालनेपर १२८ आता है-

१६३८४

१९८

१९२

६४

६४

x

अङ्लोंको स्थापनकर दायेंसे बायें

तरफ खड़ी-पड़ी रेखा देकर विषम-

सम अङ्क समझना चाहिये।

३. जैसे ३ का पन हुआ ३४३४३-२७।

अगले घन अङ्कमें घटा दे, इस प्रकार बार-बार | करनेसे घनमूल' सिद्ध होता है ॥१८-२० ॥

अन्योन्यहारनिहतौ हरांशी तु समच्छिदा॥२१॥

लवा लवघ्नाच हरा हरना हि सवर्णनम्।

भागप्रभागे विज्ञेयं मुने शास्त्रार्थचिन्तकैः॥ २२ ॥

अनुबन्धेऽपवाहे चैकस्य चेदधिकोनकः।

भागास्तलस्थहारेण हारस्वांशाधिकेन तान्॥२३॥

ऊनेन चापि गुणयेद्धनणं चिन्तयेत् तथा।

कार्यस्तुल्यहरांशानां योगश्चाप्यन्तरो मुने॥२४॥

अहारराशौ रूपं तु कल्पयेद्धरमप्यथ।

अंशाहतिश्छेदघातहद्भित्रगुणने फलम्॥ २५ ॥

छेदं चापि लवं विद्वन् परिवर्त्य हरस्य च।

शेषः कार्यो भागहारे कर्तव्यो गुणनाविधिः ॥२६॥

भिन्न अङ्कोंके परस्पर हरसे हर (भाजक) और अंश (भाज्य) दोनोंको गुण देनेसे सबके नीचे बराबर हर हो जाता है। भागप्रभागमें अंशको अंशसे और हरको हरसे गुणा करना चाहिये। भागानुबन्ध एवं भागापवाहमें यदि एक अङ्क अपने अंशसे अधिक या ऊन होवे तो तलस्थ हरसे ऊपरवाले हरको गुण देना चाहिये। उसके बाद अपने अंशसे अधिक ऊन किये हुए हरसे (अर्थात् भागानुबन्धमें हर अंशका योग करके और भागापवाहमें हर अंशका अन्तर करके) अंशको गुण देना चाहिये। ऐसा करनेसे भागानुबन्ध और भागापवाहका फल सिद्ध होगा। जिसके नीचे हर न हो उसके नीचे एक हरकी कल्पना करनी चाहिये। भिन्न गुणन-साधनमें अंश-अंशका गुणन करना और हर-हरके गुणनसे भाग देना चाहिये । इससे भिन्न गुणनमें फलकी सिद्धि होगी। (यथा २/७४३/८ यहाँ २ और ३ अंश हैं और ७, ८ हर हैं, इनमें अंश-अंशसे गुणा करनेपर २४३-६ हुआ और हर-हरके गुणनसे ७५८-५६ हुआ।

१. उदाहरण इस प्रकार है-

१९६८३ का घनमूल निकालना है। मूलोक्त विधिके अनुसार इसकी क्रिया इस प्रकार होगी-

२४२४३-. १२)११६(२७ - घनमूल

२का वर्ग-४

८४

४४३ - १२

३२८

७ का वर्ग ४९

७xx२४३ २९४

४९४२ -९८

३४३

९८४३ - २९४

xx७-

३४३

०००

२. यथा- यहाँ परस्पर हरसे हर और अंश दोनोंको गुणित किया जाता है। जिस इरसे गुणा करते हैं, वह अपने सिवा दूसरे हर और अंशको ही गुणित करता है। जैसे- इस प्रकार यहाँ सबका हर समान हो गया। ऐसा करके ही भिन्नाटोंका योग या अन्तर किया जाता है। यथा-

२४

२४

३. किसी भागको जोड़नेको भागानुबन्ध और घटानेको भागापवाह कहते हैं।

४. उदाहरणके लिये यह प्रश्र है-१८ का १/२ उसमेंसे घटाओ और शेषका १/२ उसी शेषमें जोड़ो, इसको न्यास-

विधि (लिखनेकी रीति) इस प्रकार होगी-

210 १४३४२

१/२

८४२४३

उत्तर हुआ।

फिर ६५६ करनेसे ६/५६ जिसे दोसे काटनेपर ३/२८ उत्तर हुआ) ॥२१-२५॥ विद्वन्! भिन्न संख्याके भागमें भाजकके हर और अंशको परिवर्तित कर (हरको अंश और अंशको हर बनाकर) फिर भाज्यके हर-अंशके साथ गुणन-क्रिया करनी चाहिये, इससे भागफल सिद्ध होता है। (यथा ३/ ८ ४/५ में हर और अंशके परिवर्तनसे ३/८४५/ ४-१५/३२ यही भागफल हुआ) ॥२६॥

हरांशयोः कृती वर्गे घनौ घनविधी मुने।

पदसिद्धथै पदे कुर्यादथो खं सर्वतश्च खम्॥२७॥

भिन्नाङ्कके वर्गादि-साधनमें यदि वर्ग करना हो तो हर और अंश दोनोंका वर्ग करे तथा घन करना हो तो दोनोंका घन करे। इसी प्रकार वर्गमूल निकालना हो तो दोनोंका वर्गमूल और घनमूल निकालना हो तो भी दोनोंका घनमूल निकालना चाहिये। (यथा-३१७ का वर्ग हुआ ९४४९ और मूल हुआ ३/७, इसी प्रकार ३/७ का घन हुआ २७/३४३ और मूल हुआ ३/७) ॥ २७ ॥

छेदं गुणं गुं छेदं वर्ग मूलं पदं कृतिम्।

ऋण स्वं स्वमणं कुर्याददश्ये राशिप्रसिद्धये॥२८॥

अथ स्वांशाधिकोने तुलवाड्योनो हरो हर।

अंशस्त्वविकृतस्तत्र विलोमे शेषमुक्तवत् ॥२९॥

विलोमविधिसे राशि जाननेके लिये दृश्यमें हरको गुणक, गुणकको हर, वर्गको मूल, मूलको वर्ग, ऋणको धन और धनको ऋण बनाकर अन्तमें उलटी क्रिया करनेसे राशि (इष्ट संख्या) सिद्ध होती है। विशेषता यह है कि जहाँ अपना अंश जोड़ा गया हो वहाँ हरमें अंशको जोड़कर और जहाँ अपना अंश घटाया गया हो, वहाँ हरमें अंशको घटाकर हर कल्पना करे और अंश ज्यों-का-त्यों रहे। फिर दृश्य राशिमें विलोम क्रिया उक्त रीतिसे करे तो राशि सिद्ध होती है ॥ २८ २९ ।।

उद्दिष्टराशि: संक्षुण्णो हृतोऽशै रहितो युतः ।

इष्टघ्नदृष्टमेतेन भक्तं राशिरितीरितम् ॥३०॥

अभीष्ट संख्या जानने के लिये इष्ट राशिकी कल्पना करनी चाहिये। फिर प्रश्नकर्ताक कथनानुसार उस राशिको गुणा करे या भाग दे। कोई अंश घटानेको कहा गया हो तो घटावे और जोड़नेको कहा गया हो तो जोड़ दे अर्थात् प्रश्नमें जो जो क्रियाएँ कही गयी हों, वे इष्टराशिमें करके फिर जो राशि निष्पन्न हो, उससे कल्पित इष्ट-गुणित दृष्ट में भाग दे, उसमें जो लब्धि हो, वही इष्ट राशि है ॥३०॥

१. उदाहरणके लिये यह प्रश्र लीजिये—वह कौन-सी संख्या है, जिसको तीनसे गुणा करके उसमें अपना ३/४ बीड़ देते हैं, फिर सातका भाग देते हैं, पुनः अपना ३ घटा देते हैं, फिर उसका वा करते हैं, पुनः उसमें ५२ घटाकर उसका मूल लेते हैं, उसमें ८ जोड़कर १० का भाग देते हैं तो २ लब्धि होती है। उस संख्या अथवा राशिको निकालना है। इसमें मूलोक्त नियमके अनुसार इस प्रकार क्रिया की जायगी-

गुणक ३ हर

८४+३-२८ राशि

धन

अपना ३/७ऋण

१४७-६३-८४

हर

गुणक

२१४७-१४७

अपना १/२ धन

१४+७-२१

वर्ग

मूल

१९६-१४

५२

१४४+५२-१९६

मूल

वर्ग

१२-१४

ऋण

२०-८-१२

हर

१० गुणक

२४१०-२०

दृश्य

अतः विलोम गणितकी विधिसे वह संख्या २८ निशित हुई।

२. इसको स्पष्टरूपसे जाननेके लिये यह उदाहरणात्मक प्रश्र प्रस्तुत किया जाता है-वह कौन-सी संख्या है, जिसे ५ से गुणा करके उसमें उसीका तृतीयांश घटाकर दससे भाग देनेपर जो लब्धि हो उसमें राशिके १/३.१/२.१/४ भाग

योगोऽन्तरेणोनयुतोऽधितो राशी तु संक्रमे।

राश्यन्तरहतं वर्गान्तर योगस्ततश्च तौ॥३१॥

संक्रमण-गणितमें (यदि दो संख्याओंका योग और अन्तर ज्ञात हो तो) योगको दो जगह लिखकर एक जगह अन्तरको जोड़कर आधा करे तो एक संख्याका ज्ञान होगा और दूसरी जगह अन्तरको घटाकर आधा करे तो दूसरी संख्या ज्ञात होगी- इस प्रकार दोनों राशियाँ (संख्याएँ) ज्ञात हो जाती है। वर्गसंक्रमणमें (यदि दो संख्याओंका वर्गान्तर तथा अन्तर ज्ञात हो तो) वर्गान्तरमें अन्तरसे भाग देनेपर जो लब्धि आती है, वही उनका योग है; योगका ज्ञान हो जानेपर फिर पूर्वोक्त प्रकारसे दोनों संख्याओंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ ३१ ॥

गजनीष्टकृतित्र्येका दलिता चेष्टभाजिता।

एकोऽस्य वर्गोदलित: सैको राशिः परो मतः ॥३२॥

द्विगुणेष्टहतं रूपं सेष्टं प्राग्रूपकं परम् ।

वर्गयोगान्तरे व्येके राश्योर्वगौ स्त एतयोः ॥३३॥

इष्टवर्गकृतिश्चेष्टयनोऽष्टनी च सैककः।

आद्यः स्यातामुभे व्यक्त गणितेऽव्यक्त एव च॥३४॥

वर्गकर्मगणितमें इष्टका वर्ग करके उसमें आठसे गुणा करे, फिर एक घटा दे, उसका आधा करे। तत्पश्चात्-उसमें इष्टसे भाग दे तो एक राशि ज्ञात होगी। फिर उसका वर्ग करके आधा करे और उसमें एक जोड़ दे तो दूसरी संख्या ज्ञात होगी ॥ ३२ ॥ अथवा कोई इष्ट-कल्पना करके उस द्विगुणित इष्टसे १ में भाग देकर लब्धिमें इष्टको जोड़े तो प्रथम संख्या होगी और दूसरी संख्या १ होगी। ये दोनों संख्याएँ वे ही होंगी, जिनके वर्गोके योग और अन्तरमें एक घटाने पर भी वर्गाङ्क ही शेष रहता है ॥३३॥ किसी इष्टके वर्गका वर्ग तथा पृथक् उसीका घन करके दोनोंको पृथक्-पृथक् आठसे गुणा करे। फिर पहलेमें एक जोड़े तो दोनों संख्याएँ ज्ञात होंगी। यह विधि व्यक्त और अव्यक्त दोनों गणितीमें उपयुक्त है ॥३४॥

जोड़नेसे ६८ होता है। इसमें गुणक ५। ऊन १/३ । हर १० । युक्त होनेवाले रायश १, २, १/४ और दृश्य संख्या ६८ है। कल्पना कीजिये कि इष्ट राशि ३ है। इसमें प्रश्नकर्ताक कथनानुसार ५ से गुणा किया तो १५, इसमें अपना १/३ अर्थात् ५ घटा दिया तो १० हुआ। इसमें दससे भाग दिया तो १ लब्धि अङ्क हुआ, उसमें कल्पित राशि ३ के १/३, १/२, १/४ जोड़नेसे १/१.३/३+३/२+३/४-१२+१२+१८+९-५१/१२-१७/४ हुआ। फिर दृश्य ६८ में कल्पित इष्ट ३ से गुणा किया और १७/४ से भाग दिया तो ६८४३४४-४८ यही इष्ट संख्या हुई।

२. जैसे किसीने पूछा-वे दोनों कौन-सी संख्याएं हैं, जिनका योग १०१ और अन्तर २५ है? यहाँ योगको दो

जगह लिखा-

१०१

१०१

२५ जोड़ा

२५ घटाया

१२६-२-६३ ७६+२-३८ उत्तर-वे दोनों संख्याएँ ६३ एवं ३८ हैं।

३. उदाहरणके लिये यह प्रश्र है-जिन दो संख्याओंका अन्तर ८ और वर्गान्तर ४०० है, उन्हें बताओ। ४००+८-५० यह योग हुआ ५०८-२-२९ एक संख्या। ५०-८५२-२१ सरी संख्या हुई। अथवा वर्गान्तरमें राशियोगका भाग देनेसे अन्तर ज्ञात होगा। यथा-४००-५०-८ यह राश्यन्तर है। फिर पूर्वोक्त प्रक्रियासे दोनों राशियाँ ज्ञात होगी।

४. जहाँ किन्हीं दी संख्याओंका वर्गयोग और वर्गान्तर करके दोनोंमें पृथक्-पृथक् १ घटानेपर भी वर्गात ही शेष रहता है उसको 'वर्गकर्म' कहते हैं।

५. कल्पना कीजिये कि इष्ट १/२ है, उसका वर्ग हुआ १/४ उसको आठसे गुणा किया तो २ हुआ। उसमें ? घटाकर आधा किया तो १/२ हुआ, उसमें इष्ट १/२ से भाग दिया तो १ हुआ-यह प्रथम संख्या है। उसका वर्ग किया तो एक ही हुआ। इसका आधा करनेसे १/२ हुआ। इसमें एक जोड़नेसे ३/२ हुआ यह दूसरी संख्या हुई।

६. कल्पना कीजिये कि इष्ट १ है, उसको दोसे गुणा किया तो २ हुआ, उससे १ में भाग दिया तो १+२/१-१४१/ २-१/२ हुआ। उसमें इष्ट १ जोड़ दिया तो १ १/२-३/२ प्रथम संख्या निकल आयो और दूसरी संख्या १ है हो।

७. कल्पना कीजिये कि इष्ट २ है। इसके वर्गका वर्ग हुआ १६ और उसका घन हुआ ८। दोनोंको अलग

गुणनमूलोनयुते सगुणार्धकृतेः पदम्।

दृष्टस्य च गुणोंनयुतं वर्गीकृतं गुणः ॥३५॥

यदा लवोनयुग्राशिद्देश्य भागोनयुग्भुवा।

भक्तं तथा मूलगुणं ताभ्यां साध्योऽथ व्यक्तवत् ॥३६॥

गुणकर्म अपने इष्टाङ्कगुणित मूलसे ऊन या युक्त होकर यदि कोई संख्या दृश्य हुई हो तो मूल गुणकके आधेका वर्ग दृश्य-संख्या में जोड़कर मूल लेना चाहिये। उसमें क्रमसे मूल गुणकके आधा जोड़ना और घटाना चाहिये। (अर्थात् जहाँ इष्टगुणितमूलसे ऊन होकर दृश्य हो वहाँ गुणकार्धको जोड़ना तथा यदि इष्टगुणितमूलयुक्त होकर दृश्य हो तो उक्त मूलमें गुणकाध घटाना चाहिये) फिर उसका वर्ग कर लेनेसे प्रश्नकर्ताकी अभीष्ट राशि (संख्या) सिद्ध होती है। यदि राशि मूलोन या मूलयुक्त होकर पुनः अपने किसी भागसे भी ऊन या युत होकर दृश्य होती हो तो उस भागको १ में ऊन या युत कर (यदि भाग ऊन हुआ हो तो घटा करके और यदि युत हुआ हो तो जोड़ करके) उसके द्वारा पृथक्-पृथक् दृश्य और मूल गुणकमें भाग दे; फिर इस नूतन दृश्य और मूलगुणकसे पूर्ववत् राशिका साधन करना चाहिये॥ ३५-३६ ॥

प्रमाणेच्छे सजातीये आद्यन्ते मध्यर्ग फलम्।

इच्छाघ्नमाद्यहृत्स्वेष्ट फलं व्यस्ते विपर्ययात्॥३७॥

(त्रैराशिकमें) प्रमाण और इच्छा ये समान जातिके होते हैं, इन्हें आदि और अन्तमें रखे, फल भिन्न जातिका है, अत: उसे मध्यमें स्थापित करे। फलको इच्छासे गुणा करके प्रमाणके द्वारा भाग देनेसे लब्धि इष्टफल होती है। (यह क्रम राशिक बताया गया है।) व्यस्त राशिकमें इससे विपरीत क्रिया करनी चाहिये। अर्थात् प्रमाण-फलको प्रमाणसे गुणा करके इच्छासे भाग देनेपर न लब्धि इष्टफल होती है। (प्रमाण, प्रमाण-फल और इच्छा-इन तीन राशियोंको जानकर इच्छाफल जानने की क्रियाको त्रैराशिक कहते हैं। ॥३७॥

८ से गुणा करनेपर एक हुआ १२८ और दूसरा हुआ ६४। यहाँ पहले १ जोड़नेसे १२९ हुआ, यह पहली संख्या है और ६४ दूसरी संख्या हुई।

१. यदि कोई पूछे-किसी हंस-समूहके मूलका सप्तगुणित आधा (७/२) भाग सरोवरके तटपर चला गया और बचे हुए २ हंस जलमें ही कौड़ा करते देखे गये तो उन हौंको कुल संख्या कितनी थी? यहाँ मूल गुणक ७/२ है। दृष्ट संख्या २ है। गुणार्थ हुआ ७४ उसका वर्ग हुआ ४९/१६ उससे दृष्ट २ का योग करनेपर ८१/१६ हुआ। इसका मूल हुआ १/४ फिर इसे गुणा ४ ४ से युक्त किया तो १६/४-४ हुआ, इसका वर्ग किया तो १६ हुआ, यही हंसकुलका मान है। (यह मूतोन दृष्ट का उदाहरण है।)

भागोन दृष्टका उदाहरण इस प्रकार है-किसी व्यक्तिने अपने धनका आधा १/२ अपने पुत्रको दिया और धन-संखयाके मूलका १२ गुना भाग अपनी स्वीको दे दिक। इसके बाद उसके पास १०८०) बच गये तो बताभी उसके सम्पूर्ण धनकी संख्या क्या है?

उत्तर-इस प्रश्रमें मूलगुणक १२ है और १/२ भागसे ऊन दृष्ट १०८० है। अत: मूल श्लोकमें वर्णित रौतिके अनुसार भागको एकमें घटानेसे १-१/२-१/२ हुआ। इससे मूल गुणक १२ और दृश्य १०८० भाग देनेसे क्रमशः नवीन मूलगुणक २४ और नवीन दृस्य २१६० हुआ। पुनः उपर्युक्त रीतिसे इस मूलगुणकके आधे १२ के वर्ग १४४ को दृश्यमें जोड़नेसे २३०४ हुआ। इसके मूल ४८ में गुणक २४ के आधे १२ को जोड़नेसे ६० हुआ और उसका वर्ग ३६०० हुआ; यही उत्तर है।

भागयुत दृष्टका उदाहरण-एक भगबद्धत प्रात:काल जितनी संख्या में हरिनामका जप करते हैं; उस संख्या के पञ्चन्नांशम हसी उपसंख्याके भूलका १२ गुना जोड़नेमे जो संख्या हो, उतना जप सायंकालमें करते हैं, यदि दोनों समयकी जपसंत्रा मिलकर १३२०० है तो प्रात:काल और सायंकालको क-पृथक् जपसंख्या बताइये। मूलगुणक १२ और भाग १/५से युत दृष्ट १३२०० है। अत: उक्त रीतिके अनुसार भागको १ में जोड़ा गया तो हुआ। इससे मूलगुणक १२ और दृश्य १३२०० में भाग देनेपर नवीन मूलगुणक १० और नवीन दृश

पाराश्यादिकेन्योन्यपक्ष कृत्वा फलच्छिदाम्।

बहुराशिवधे भक्ते फलं स्वल्पवधेन च ॥३८॥

इष्टकर्मविधेर्मूलं च्युतं मिश्रात् कलान्तरम्।

मानजकालश्चातीतकालघ्नफलसंहताः ॥३९॥

स्वयोगभक्ता मिश्रजाः सम्प्रयुक्तदलानि च।

पञ्चराशिक, सतराशिक (नवराशिक, एकादशराशिक) आदिमें फल और हरोंको परस्पर पक्षमें परिवर्तन करके (प्रमाण-पक्षवालेको इच्छा- पक्षमें और इच्छा-पक्षवालेको प्रमाण-पक्षमें रखकर) अधिक राशियोंके घातमें अल्पराशिके घातसे भाग देनेपर जो लब्धि आवे, वही इच्छाफल है ॥३८॥ मिश्रधनको इष्ट मानकर इष्टकर्मसे मूलधनका ज्ञान करे, उसको मिश्रधनमें घटानेसे कलान्तर (सूद) समझना चाहिये। अपने-अपने

फल १०० को इच्छासे गुणा करके प्रमाणसे भाग दिया जायगा तो १००४७ - १४० यह इच्छाफल हुआ (अर्थात् सात रुपयेके १४० आमहुए)।

जहाँ इच्छाकी वृद्धि में फलकी वृद्धि और इच्छाके ह्रासमें फलका हास हो, वहाँ क्रम-त्रैराशिक होता है। जहाँ इच्छाकी वृद्धिमें फलका हास और इच्छाके हासमें फलकी वृद्धि हो, वहाँ व्यस्तत्रैराशिक होता है। वैसे स्थलोंमें प्रमाणफलको प्रमाणसे गुणा करके उसमें इच्छाके द्वारा भाग देनेसे इच्छाफल होता है। इस प्रकारके व्यस्त-त्रैराशिकके कुछ परिगणित स्थल है- 'जीवानां बयसो मौल्ये तौल्ये वर्णस्य हैमने। भागहारे च राशीनां व्यस्तं त्रैराशिकं भवेत् ॥' अर्थात् जीवोंकी वयस्के मूल्यमें, उत्तमके साथ अधम मोलवाले सोनेके तौलमें तथा किसी संख्यामें भिन्न-भित्र भाजकसे भाग देने में व्यस्तत्रैराशिक होता है। एक उदाहरण लीजिये-३ आदमी मिलकर १० दिनमें एक काम पूरा करते हैं तो १५आदमी कितने दिनमें करेंगे? यहाँ १०४३+१५ करनेसे उत्तर आया २: अतः २ दिनमें काम पूरा करेंगे।

१. इसका प्रश्रात्यक उदाहरण इस प्रकार है-यदि १ मासमें १००) के ५) ब्याज होते हैं तो १२ महीनेमें १६) के कितने होंगे? इसका न्यास इस प्रकार है-

प्रमाण-पक्ष इच्छा-पक्ष

अल्प

१२

परस्पर पक्षनयन करके इस प्रकार

१२

१००

न्यास किया गया।

१६

१६

बहुराशिके घात (गुणन) से-१२४१६४५-९६०

अल्पराशिके घात (गुणन) से-१४१००-१००

९६०+१००-९०-९६ रुपये व्याज हुए।

इसी तरह मूलधन तथा व्याज जानकर काल बताना चाहिये और काल तथा ब्याज जानकर मूलधन बताना चाहिये। सप्तराशिकका उदाहरण इस प्रकार है-यदि ४ हाथ चौड़ी और ८ हाथ लम्बी १० दरियोंका मूल्य १००) रुपया है तो ८ हाथ चौड़ी तथा १० हाथ लम्बी २० दरियोंका मूल्य क्या होगा?

शलोकोक्त रीतिके अनुसार ८x१०x२०x१०० पौर सौ रुपये।

प्रमाण धनसे अपने-अपने कालको गुणा करना, उसमें अपने-अपने व्यतीत काल और फलके घात (गुणा)-से भाग देना, लब्धिको पृथक् रहने देना, उन सबमें उन्हींके योगका पृथक्-पृथक् भाग देना तथा सबको मिश्रधनसे गुणा कर देना चाहिये। फिर क्रमसे प्रयुक्त व्यापार में लगाये हुए धनखण्डके प्रमाण ज्ञात होते हैं ॥३९॥

बहुराशिफलात् स्वल्पराशिमासफलं बहु ॥४०॥

चेद्राशिजफलं मासफलाहतिहतं चयः।

पञ्चराशिकादिमें फल और हरको अन्योन्य पक्षनयन करनेसे इच्छा-पक्षमें फलके चले जानेसे इच्छापक्ष बहुराशि और प्रमाण पक्ष स्वल्पराशि माना गया है। इसी गणितके उदाहरणमें जब इच्छाफल जानकर मूलधन जानना होगा तो फलोंको परस्पर पक्षमें परिवर्तन करनेसे प्रमाण- पक्ष (स्वल्पराशि) का फल ही बहुराशि (इच्छापक्ष)-से अधिक होगा। यहाँ राशिजफलको इष्टमास और प्रमाण-फलके गुणनसे भाग देनेपर मूलधन होता है ॥४०॥

क्षेपा मिश्रहताः क्षेपयोगभक्ताः फलानि च ॥४१॥

भजेच्छिदोंऽशैस्तैर्मि रूपं कालश्च पूर्तिकृत् ।

प्रक्षेप (पूँजीके टुकड़े)-को पृथक्-पृथक् मिश्रधनसे गुण देना और उसमें प्रक्षेपके योगसे भाग देना चाहिये। इससे पृथक्-पृथक् फल ज्ञात

१. कल्पित ब्याज हुआ। कल्पित मिअधन ५+३-८, इससे इष्टगुणित दृश्यमें भाग देनेसे उद्दिष्ट मूलधन १०००४५-६२५) इसको मिश्रधन १००० में घटानेसे ३७५) याजके हुए। संक्षेपसे इस प्रकार न्यास करना चाहिये- लब्धिक्रमसे मूल ६२५)

ooo

ब्याज ३७५)

१००

.

अथवा इष्टकर्मसे कल्पित इष्ट १

पूर्वोक्त रीतिसे कलान्तर (सूद) ३/५ इससे युक्त १-८/

+ ८.१०००४५ -२८) मूलन

१०००-६२५-३७५) ब्याज

२. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है-किसीने अपने ९४) रुपये मूलधनके तीन भाग करके एक भागको माहवारी पाँच रुपये सैकड़े ब्याज, दूसरे भागको तीन रूपये और तीसरे भागको चार रुपये सैकड़े ब्याजपर दिया। क्रमशः तीनों भागोंमें सात, दस और पाँच मासमें बराबर ब्याज मिले तो तीनों भागोंकी अलग-अलग संख्या बताओ।

भाग १ भाग २ भाग ३

मिश्रधन (सम्मिलित प्रमाणकाल १व्यतीतकाल ७ प्र०का०१व्य०का०१० प्र० का १ व्य० का०५ मूलधन)

प्रमाण धन १००

प्रमाण धन १०० प्रमाण धन १००

९४

प्रमाण फल ५

प्रमाण फल

प्रमाण फल ४

अपने प्रमाणकान और प्रमाणधनके गुणनफलमें व्यतीतकाल और प्रमाण- फलके गुणनफलसे भाग देनेपर-

१००x१-१०० २० १००४११०० १०

१००४१ 200

७४५-३५-७ ३४१० 3o. 3

४४५ २०

इनमें इनके योग २३५/२१ से भाग देने और मिश्रधन (९४)-से गुणा करनेपर पृथक्-पृथक् भाग इस प्रकार होते हैं-

२. उदाहरण-एक मासमें १००) मूलधनक रुपया ब्याज होता है तो १२ मासमें १६ रुपयेका कितना होगा? उत्तरार्थ न्यास- अन्योन्य पक्षनयनसे प्रमाण इच्छा स्वल्प राशि बहुराशि

होते हैं। वापी आदि पूरणके प्रश्रमें-अपने- अपने अंशोंसे हरमें भाग देना, फिर उन सबके योगसे १ में भाग देनेपर वापीके भरनेके समयका ज्ञान होता है। ॥४१॥

गुणो गच्छेऽसमे व्येके समे वर्गोऽधितेऽन्ततः ॥४२॥

यद् गच्छा-तफलं व्यस्तं गुणवर्गभवं हि तत् ।

व्येकं व्येकगुणाप्तं च प्रारघ्नं मानं गुणोत्तरे॥४३।।

(द्विगुणचयादि-वृद्धिमें फलका साधन)- (जहाँ द्विगुण-त्रिगुण आदि चय हो वहाँ) पद यदि विषम संख्या (३, ५, ७ आदि) हो तो उसमें १ घटाकर गुणक लिखे। यदि पद सम हो तो आधा करके वर्गचिह्न लिखे। इस प्रकार एक घटाने और आधा करनेमें भी जब विषमाङ्क हो तब गुणकचिह्न, जब समाङ्क हो तब वर्गचिह्न करना एवं जबतक पदकी कुल संख्या समाप्त न हो जाय तबतक करते रहना चाहिये। फिर अन्त्य चिह्नसे उलटा गुणज और वर्गफल साधन करके आद्य चिहतक जो फल हो, उसमें १ शेषमें एकोन गुणकसे भाग देना चाहिये। लब्धिको आदि अङ्कसे गुणा करनेपर

श्लोकोक रीतिके अनुसार-ए-इच्छाफल।

इसी उदाहरणमें मूलधन जाननेके लिये-

न्यास- प्रमाण-पक्ष इच्छा-पक्ष

यहाँ फल और हरके अन्योन्य पक्षनयन करनेसे-

'बहुराशिफलात्' इत्यादि ४० वें श्लोकके अनुसार-

x१००x४८/१२४५४५ - ६ - मूलधन।

1. मान लीजिये फिच्यापारियोंके क्रमसे ५१, ६८,८५ रुपये मूलपन हैं। तीनोंने एक साथ मिलकर प्यापारसे ३४५) रुपये प्राप्त किये तो इन तीनोंके पृथक्-पृथक् कितने धन होंगे? यहाँ मूलोळ नियमके अनुसार प्रक्षेपों (५१, ६८,८५)-को मिश्रधन ३०० से गुणाकर प्रक्षेपोंके योग २०४ के द्वारा भाग देनेपर लब्धिक्रमसे तीनों के पृथक्-पृथक् भाग हुए।

२. कल्पना कीजिये कि एक झरना या नल किस गुलाबको १ दिन (१२ घंटे) में, दूसरा दिनमें, तीसरा दिनमें और चौथा १/६ दिनमें अलग-अलग खोलनेपर भर देता है तो यदि चारों एक ही साथ खोल दिये जायें तो दिनके जितने भागमें तालाबको भरेंगे।

मूलोक्त रीतिस अपने-अपने अंशसे हरमें भाग देनेसे ३.३.३३ रनके योग १२/१ से १ में भाग देनेपर,आ। अर्थात् १ दिनके १२ भागमें (१ घंटेमें) तालाब भर जायगा।

सर्वधन होता है ॥४२-४३।।

भुजकोटिकृतेर्योगमूलं कर्णश्च दोर्भवेत्।

श्रुतिकोटिकृतेरन्तः पदं दो:कर्णवर्गयोः॥४४॥

विवराद् यत्पदं कोटि: क्षेत्रे त्रिचतुरस्रके।

राश्योरन्तरवर्गेण द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥४५॥

वर्गयोगोऽध योगान्तहतिर्वर्गान्तरं भवेत्।

(क्षेत्रव्यवहार-प्रकरण)-भुज और कोटिके वर्गयोगका मूल कर्ण होता है, भुज और

कर्णक वर्गान्तरका मूल कोटि होता है तथा कोटि एवं कर्णके वर्गान्तरका मूल भुज होता है-यह बात त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रके लिये कही गयी है। अथवा राशिके अन्तरवर्गमें उन्हीं दोनों राशियोंका द्विगुणित द्विगुणित घात (गुणनफल) जोड़ दें तो वर्गयोग होता है अथवा उन्हीं दोनों राशियोंके योगान्तरका घात वर्गान्तर होता है ॥ ४४-४५३ ॥

१.कल्पना कीजिये कि किसी दाताने किसी याचकको पहले दिन २ रुपये देकर उसके बाद प्रतिदिन द्विगुणित करके देनेका निश्चय किया तो बताइये कि उसने ३० दिनमें कितने रुपये दान किये।

उत्तर-यहाँ आदि-२, गुणात्मकचय-२, पद-३० है। पद सम अंक है। अत: आधा करके १५ के स्थानमें वर्गचिह्न लगाया, यह विषमाङ्क हुआ, अतः उसमें १ घटाकर १४ के स्थानमें गुणकचिह्न लिखा। फिर यह सम हो गया, अतः आधा ७ करके वर्गचिह्न किया, इस प्रकार पद-संख्याकी समाप्तिपर्यन्त न्यास किया। न्यास देखिये-

न्यास- अन्तमें गुणचिह्न हुआ। वहाँ गुणकाङ्क २ को रखकर उलटा प्रथम १०७३७४१८२४ चिहतक गुणक-वर्गज फल-साधन किया तो १०७३७४१८२४ हुआ।

इसमें एक घटाकर एकोनगुण (१)-से भाग देकर आदि (२)-से गुणा किया तो २,१४,७४,८३,६४६ रुपये सर्वधन हुआ।

२. लीलावती (क्षेत्रव्यवहार श्लोक १,२) में इस विषयको इस प्रकार स्पष्ट किया है-'त्रिभुन या चतुर्भुजमें जब एक भुजपर दूसरा भुज लम्बरूप हो, उन दोनों में एक (नीचेकी पड़ी रेखा) को 'भुज' और दूसरी (कपरकी खड़ी रेखा)-को 'कोटि' कहते हैं। तथा उन दोनोंक वर्गयोग मूलको 'कर्ण' कहते हैं। भुज और कर्णका चर्गान्तर मूल कोटि तथा कोटि और कर्णका वर्गान्तर मूल भुज होता है। यथा-'क, ग, च' यह एक त्रिभुज है।'क, ग' इस रेखाको कोटि कहते हैं। 'ग, च' इस रेखाका नाम भुज है, 'क, च' का नाम कर्ण है।

उदाहरण-जैसे प्रश्न हुआ कि जिस जात्य त्रिभुजमें कोटि-४, भुज-३ है यहाँका कर्णमान क्या होगा? तथा भुज..और कर्ण जानकर कोटि बताओ और कोटि, कर्ण जानकर भुज बताओ।

उक्त रीतिसे '४ का वर्ग १६ और ३ का वर्ग ९, दोनोंके योग २५ का मूल ५ यह कर्ण हुआ। एवं कर्ण ५ और भुज ३, इन दोनोंके वर्गान्तर २५-९-१६, इसका मूल ४ कोटि हुई तथा कर्णके वर्ग २५ में कोटिके वर्ग १६ को घटाकर शेष ९ का मूल ३ भुज हुआ।

इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिये।

व्यास आकृतिसंपुण्णोऽन्याप्तः स्यात् परिधिमुने।। ४६ ।'

ज्याव्यासयोगविवराहतमूलोनितोऽर्धितः ।

व्यासः शरः शरोनाच्च व्यासाच्छरगुणात् पदम्॥४७॥

द्विघ्नं जीवाथ जीवार्धवर्गे शरहते युते।

व्यासो वृत्ते भवेदेवं प्रोक्तं गणितकोविदैः॥४८॥

मुने! व्यासको २२ से गुण देना और ७ से भाग देना चाहिये, इससे स्थूल परिधिका ज्ञान होता है ।। ४६ ॥ ज्या (जीवा) और व्यासका योग एक जगह रखना और अन्तरको दूसरी जगह रखना चाहिये। फिर इन दोनोंका घात (गुणा)

नारदपुराणके इस गणितविभागमें क्षेत्रव्यवहारको चर्चामात्र होकर दूसरे विषय आ गये हैं; त्रिभुजादि क्षेत्रफलका विवेचन न होनेसे यह प्रकरण अधूरा-सा लगता है। जान पड़ता है, इस विषयके स्लोक लेखकके प्रमादसे छूट गये हैं। अतः टिप्पणीमें संक्षेपतः उक्त न्यूनताकी पूर्ति की जाती है।

भुजयोर्योगस्तदन्तरगुणो इतः । भुवा लण्या युतोना भूठिा च दलिता पृथक् ॥

आबाचे भुजयोर्जेये क्रमशक्षाधिकाल्पयोः । स्वाबाधाभुजयोवान्तरान्मूलं च लम्बकः॥

लम्बभूमिहतेरध प्रस्फुटं विभुजे फलम् । ततो बहुभुजान्तःस्थत्रिभुजेभ्यक्ष तत्फलम् ॥

(त्रिभुजादि क्षेत्रफलानयन) त्रिभुजका फल जानना हो तो उसके तीन भुजोंमें एकको भूमि और शेष दौको भुज मानकर क्रिया करे। यथा-दोनों भुजके योगको उन्हीं दोनोंके अन्तरसे गुणा करके गुणनफलमें भूमिसे भाग देनेपर जो लब्धि हो, उसको भूमिमें जोड़कर आधा करे तो बहे भुजको 'आवाधा' होती है और उसी लब्धिको भूमिमें घटाकर आधा करनेसे लधुभुजको 'आबाधा' होती है। अपने-अपने भुज और आबाधाके 'वर्गान्तर' करके शेषका मूल लेनेसे लम्बका मान प्रकट होता है। लम्ब और भूमिके गुणनफलका आधा त्रिभुजका क्षेत्रफल होता है।

उदाहरण-कल्पना कीजिये कि किसो त्रिभुजमें तीनों भुजोंके मान क्रमसे १३, १४, १५ हैं तो उस त्रिभुजका क्षेत्रफल क्या होगा? तो यहाँ १४ को भूमि और १३, १५ को भुज मानकर क्रिया होगी। यथा-दोनों भुजके योग २८ को उन्हीं दोनोंके अन्तर २ से गुणा करनेपर ५६ हुआ। इसमें भूमि १४ के द्वारा भाग देनेसे लब्धि ४ हुई। इस चारको भूमि १४ में जोड़कर आधा करनेसे ९ हुआ-यह बड़े भुजको 'आबाधा' का मान है। एवं भूमिमें लब्धिको घटाकर आधा करनेसे ५ हुआ। यह लघुभुजको 'आबाधा' हुई। भुज और आबाधाके वर्गान्तर (२२५-८१-१०४) अथवा (१६९-२५-१४४) का मूल १२ हुआ। यह लम्बका मान है। लम्ब और भूमिके गुणनफल (१२४१४)-१६८ का आधा ८४ हुआ, यह उक्त

करना चाहिये। उस गुणनका मूल लेना और उसको व्यासमें घटा देना चाहिये। फिर उसका आधा करे, वही 'शर' होगा। व्यासमें शरको घटाना, अन्तरको शरसे गुण देना, उसका मूल लेना और उसे दूना करना चाहिये तो 'जीवा' हो जायगी। जीवाका आधा करके उसका वर्ग करना, शरसे भाग देना और लब्धिमें शरको जोड़ देना चाहिये, तो व्यासका मान होगाः ॥ ४७-४८ ॥

चापोननिघ्नः परिधिः प्रागाख्यः परिधेः कृतेः ।

तुर्याशेन शरजेनाद्योनेनाद्यं चतुर्गुणम्॥४९॥

व्यासन प्रभजेद्विप्रज्यका संजायते स्फुटा। देन

ज्यामीषुघ्नो वृत्तवर्गोऽस्थिघ्नव्यासाढ्यमौर्विहृत् ।। ५०॥

लब्धोनवृत्तवर्गाङ्ग्रे: पदेऽर्धात् पतिते धनुः ।

परिधिसे चापको घटाकर शेषमें चापसे ही गुणा करनेपर गुणनफल 'प्रथम' कहलाता है। परिधिका वर्ग करना, उसका चौथा भाग लेना, उसे पाँचसे गुणा करना और उसमें 'प्रथम' को घटा देना चाहिये। यह भाजक होगा। चतुर्गुणित व्यासको प्रथमसे गुण देना, यह भाज्य हुआ। भाज्यमें भाजकसे भाग देना, यह जीवा हो जायगी ॥ ४९३ ॥ व्यासको चारसे गुणा करके उसमें जीवाको जोड़ देना, यह भाजक हुआ। परिधिके वर्गको जीवाकी चौथाई और पाँचसे गुण देना, यह भाज्य हुआ। भाजकसे भाज्यमें भाग देना, जो लब्धि आवे, उसे परिधिवर्गके चतुर्थाशमें घटा देना और शेषका मूल लेना, उसे वृत्त (परिधि) के आधेमें घटा देनेपर तो धनु (चाप) होगा ॥५०॥

१. उदाहरणार्थ प्रथ-जिस 'वृत्त' का व्यास १० है, उसमें यदि 'जीवा' का मान ६ है तो 'शर' का मान क्या होगा? 'शर' का ज्ञान हो तो जीवा बताओ तथा 'जीवा' और 'शर' जानकर व्यासका मान बताओ।

उत्तर-क्रिया-मूलोक्त नियमके अनुसार व्यास और जीयाका योग १०+६=१६ हुआ। व्यास और जीवाका अन्तर १०-६-४ हुआ। दोनोंका गुणनफल १६x४-६४ हुआ। इसका मूल ८ हुआ। इसे व्यास १० में घटाया तो २ हुआ। इसका आधा किया तो १ 'शर' (याण) हुआ। व्यास १० में शर १ घटाया तो ९ हुआ। इसे शर १ से गुणा किया तो ९ हुआ। इसका मूल लिया तो ३ हुआ। इसे द्विगुण किया तो ६ जीवाका प्रमाण हुआ। इसी तरह 'जीवा' और 'शर' का ज्ञान होनेपर जीवा ६ के आधे ३ का वर्ग किया तो हुआ। इसमें शर १ से भाग दिया और लब्धिमें शरको जोड़ दिया तो 11-१० हुआ। यही व्यासका मान है। २. उदाहरण-जिस वृत्तका व्यासार्ध १२० (अर्थात् व्यास २४०) है, उस वृत्तके अष्टादशांश क्रमसे १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८,९ से गुणित यदि चापमान हों तो अलग-अलग सबको जीवा बताओ।

उत्तर-क्रिया-व्यासमान २४० । इसपरसे परिधि ७५४। इसका अठारहवाँ भाग ४२ क्रमसे एकादि गुणित ४२, ८४, १२६, १६८, २१०, २५२, २९४, ३३६ और ३७८-ये ९ प्रकारके चापमान हुए। मूल-सूत्रके अनुसार इन चाप और परिधिपरसे जो जीवाओंके मान होंगे, वे ही किसी तुल्याङ्कसे अपवर्तित चाप और अपवर्तित परिधिसे भी होंगे। अत: ४२ से अपवर्तन करनेपर परिधि १८ तथा नापमान १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९ हुए। अब प्रथम जीवामान साधन करना है, तो प्रथम अपवर्तित चाप १ को परिधिसे घटाकर शेषको चाप १ से गुणा करनेपर १७ यह 'प्रथम' या 'आद्य' संज्ञक हुआ। तथा परिधिवर्ग चतुर्थाशको ५ से गुणा कर ३२४४६-४०५ इसमें आद्य १७ को घटाकर शेष ३८८ से चतुर्गुणित व्यासद्वारा गुणित 'प्रथम' में भाग देनेस २५०४४४१७-४२ लब्धि हुई। यह (स्वल्पान्तरसे) प्रथम जीवा हुई। एवं द्वितीय चाप २ को परिधिमें घटाकर शेषको चापसे गुणा कर देनेपर ३२ यह 'प्रथम' या 'आद्य' हुआ। इसे पञ्चग

स्थूलमध्याण्वन्नवेधोवृत्ताङ्काशेशभागिकः॥५१॥

वृत्ताङ्गांशकृतिर्वेधनिजी घनकरा मितौ।

वारिव्यासहतं दैर्घ्य वेधाङ्गुलहतं पुनः॥५२॥

खखेन्दुरामविहृतं मानं द्रोणदि वारिणः ।

विस्तारायामवेधानामङ्गुल्योऽन्योन्यताडिताः ॥५३॥

स्साङ्काभाब्धिभिर्भक्ता धान्ये द्रोणादिका मितिः ।

उत्सेधव्यासदैाणामङ्गुलान्यश्मनो द्विज ॥५४॥

मिथोनानि भजेत् खाक्षेशैर्दोणादिमितिर्भवेत्।

विस्ताराद्यगुलान्येवं मिथोनान्ययसां भवेत् ॥५५।।

बाणेभमार्गणैर्लब्धं द्रोणाधं मानमादिशेत्।

(अन्नादि राशि-व्यवहार) राशि-व्यवहारमेंस्थूल, मध्यम, सूक्ष्म, अनराशियोंमें क्रमश: उनकी परिधिका नवमांश, दशमांश और एकादशांश वेध होता है। परिधिका षष्ठांश लेकर उसका वर्ग करना और उसे वेधसे गुण देना चाहिये। उसका नाम 'घनहस्त' होगा। जलके व्यास (चौड़ाई)- से लंबाईको गुण देना, फिर उसीको गहराईक अंगुल-मानसे गुण देना तथा ३१०० से भाग देना चाहिये। इससे जलका द्रोणात्मक मान ज्ञात होगा ॥५१-५२३ । चौड़ाई, गहराई और लंबाईके अंगुलात्मक मानको परस्पर गुण देना और उसमें ४०९६ से भाग देना तो अन्नका द्रोणादि मान होगा। ऊँचाई, व्यास (चौड़ाई) और लंबाईके अंगुलात्मक मानको परस्पर गुण देना और ११५० से भाग देना चाहिये; वह पत्थरका द्रोणात्मक मान होगा। विस्तार आदिके अंगुलात्मक मानको परस्पर गुणा करना चाहिये और ५८५ से भाग देना चाहिये, तो लब्धि लोहेके द्रोणात्मक मानका सूचक होती है ॥५३-५५३ ॥

दीपशङ्कतलच्छिद्रघ्नः शङ्कर्भा भवेन्मुने।।५६ ॥

नरोनदीपकशिखौच्यभक्तो ह्यथ भोद्धृते।

शङ्को नृदीपाधश्छिद्रने दीपौव्यं नरान्विते॥५७॥

१.उदाहरणके लिये प्रत्र-समतल भूमिमें रखे हुए स्थूल धान्यकी परिधि यदि ६० हाय है तो उसमें कितने घनहस्त (खारी-प्रमाण) होंगे? तथा सूक्ष्म धान्य और मध्यम धान्यकी परिधि भी यदि ६० हाथ हों तो उनके अलग-अलग खारी- प्रमाण क्या होंगे?

उत्तर-क्रिया-मूलोक्त नियमके अनुसार परिधि-मानका दशमांश ६ यह मध्यम धान्यका वेध हुआ। परिधिके षष्टांश १० के वर्गको वेधसे गुणा करनेपर १००४६-६०० घनहस्त-मान हुए। एवं सूक्ष्म धान्यका वेध है। इससे परिचिके षष्ठाशके वर्ग १०० को गुण देने से सूक्ष्म धान्यके घनहस्त-मान - ५४५३ हुए। तथा स्थूल धान्यका वेध है। इससे परिधिके षष्ठाशके वर्गको गुण देनेपर स्थूल धान्यके घनहस्त-मान 400- ६६६ हुए।

२.उदाहरणार्थ प्रभ-किसी नावलौकी लंबाई ६२ हाश, नौदाई २० हाश और गहराई १० हाथ है तो बतागो, उरा बावलोमें कितने दोण जल है?

उत्तर-यहाँ मूलोक्त नियमके अनुसार इस प्रश्रको यों हल करना चाहिये-पहले हाथके मापको अंगुलके माप में परिणत करनेके लिये उसे २४ से गुणा करना चाहिये। ६२४२४-१४८८ अंगुल लंबाई है। २०४२४-४८० अंगुल चौड़ाई है। १०४२४-२४० अंगुल गहराई है। इन तीनोंके परस्पर गुणनसे १४८८४४८०४२४०-१७१४१७६०० गुणनफल हुआ। इसमें ३१०० से भाग दिया तो १७१४१७६००-५५२९६ लब्धि हुई। इतने ही द्रोण जल उस बावलीमें है।

३.उदाहरणके लिये प्रश्र–किसी अन्न-राशिकी लंबाई ६४ अंगुल, चौड़ाई ३२ अंगुल और ऊंचाई १६ अंगुल है तो उसका द्रोणात्मक मान क्या है? अर्थात् वह अन्त्रराशि कितने द्रोण होगी? मूलकथित नियमके अनुसार ६४४३२४१६ इनके परस्पर गुणनसे ३२७६८ गुणनफल हुआ। इसमें ४०९६ से भाग देनेपर लब्धि हुई। उत्तर निकला कि वह अनराशि ८ द्रोण है।

४.उदाहरणके लिये प्रश्न-किसी पत्थरके टुकड़े की लंबाई २३, चौड़ाई २० और ऊँचाई १० अंगुल है तो वह पत्थर कितने द्रोण वजनका है ? (उत्तर) मूलोत नियमके अनुसार लंबाई आदिको परस्पर गुणित किया-२३४२

विशङ्खदीपौच्यगुणा छाया शङ्कद्धता भवेत्।

 दीपशवन्तर चाथच्छायानविवरघ्नभा॥५८॥

मानान्तरहृता भूमिः स्यादयो भूनराहतिः।

प्रभाता जायते दीपशिखौच्यं स्यात् विराशिकात् ।।५९॥

एतत् संक्षेपत: प्रोक्तं गणिते परिकर्मकम्।

ग्रहमध्यादिकं वक्ष्ये गणिते नातिविस्तरात्॥६०॥

छाया-साधनमें प्रदीप और शंकुतलका जो अन्तर हो उससे शङ्कुको गुण देना और दीपककी ऊँचाईमें शंकुको घटाकर उससे उस गुणित शंकुमें भाग देना तो छायाका मान होगा। शंकु और दीपतलके अन्तरसे शंकुको गुण देना और छायासे भाग देना; फिर लब्धिमें शंकुको जोड़ देना तो दीपककी ऊँचाई हो जायगी। शंकुरहित दीपककी ऊँचाईसे छायाको गुण देना और शंकुसे भाग देना. और तो शंकु तथा दीपकका अन्तर ज्ञात होगा। छायाग्रके अन्तरसे छायाको गुण देना छायाके प्रमाणान्तरसे भाग देना तो 'भू' होगी। 'भू' और शंकुका घात (गुणा) करना और छायासे भाग देना तो दीपककी ऊँचाई होगी। उपर्युक्त सब बातोंका ज्ञान राशिकसे ही होता है। यह परिकर्मगणित मैंने संक्षेपसे कहा। अब ग्रह का मध्यादिक गणित बताता हूँ, वह भी अधिक विस्तारसे नहीं ॥ ५६-६०॥

युगमानं स्मृतं विप्र खचतुष्करदार्णवाः ।

तद्दशांशास्तु चत्वारः कृताख्यं पदमुच्यते॥६१।।

त्रयस्त्रेता द्वापरो द्वौ कलिरेक: प्रकीर्तितः।

मनुः कृताब्दसहिता युगानामेकसप्ततिः ।।६२।।

विधेर्दिने स्युर्विप्रेन्द्र मनवस्तु चतुर्दश।

१. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है-शङ्ख और दीपके बीचको भूमिका मान ३ हाथ और दीपककी ऊँचाई ७४२ हाथ है तो बारह अंगुल (१/२ हाथ) शडकी छाया क्या होगी?

इस क्षेत्रमें 'अ' से 'उ' तक दीपककी ऊँचाई है। 'ग' से 'त' तक शङ्ख है। 'अ' 'त'-'क' 'ग'-शङ्ख और दीपतलका अन्तर है।

यहाँ शङ्कुको शङ्ख-दीपान्तर-भूमि-मानसे गुणा किया तो १/२४३-३/२ यह गुणनफल हुआ। फिर दीपककी ऊँचाईमें शङ्खको घटाया तो ३३.३ यह शेष हुआ। पूर्वोक्त गुणनफल ३/२ में शङ्कु घटायी हुई दीपककी ऊँचाई ३ से भाग दिया तो १२ ६ लब्धि हुई। यही छायाका मान है।

२. यदि शङ्क १।२ हाथ, शङ्कदीपान्तर भूमि ३ हाथ और छाया १६ अंगुल है तो दीपकी ऊँचाई कितनी होगी? इस प्रश्रका उत्तर यों है-शङ्कको शङ्खदीपान्तरसे गुणा किया तो १/२४३-३४२ हुआ। इसमें छाया १६ अंगुल अर्थात् २/३ हाथसे भाग दिया तो १२+२/३-३/२४३/२=९/४ हुआ। इसमें शङ्ख १/२ को जोड़ दिया तो ११/४-२ ३/४ हाथ दीपककी ऊँचाई हुई।

३. उपर्युक्त दीपककी ऊँचाई ११/४ मेंसे शङ्ख १।२ को घटाया तो ११४४-१४२-९/४ शेष हुआ। इससे छायाको गुणित किया तो ९/४४२/३-१२ हुआ, इसमें शङ्कसे भाग दिया तो ३ लब्धि हुई। अतः शङ्ख और दीपके बोचकी भूमि ३ हाथकी है।

४. अभ्यासार्थ प्रश्र-१२ अंगुलके शङ्ककी छाया १२ अंगुल थी, फिर उसी शद्धको छायाग्रको ओर २ हाथ बढ़ाकर रखनेसे दूसरी छाया १६ अंगुल हुई तो छायाग्र और दीपतलके बीचको भूमिका मान कितना होगा? तथा दीपकी ऊँचाई कितनी होगी?

उत्तर-यहाँ प्रथम शसे दूसरे शतक भूमिका मान २ हाथ । प्रथम छाया १४२ हाथ, द्वितीय छाया २/३ हाथ। शङ्ख-अन्तर २ में प्रथम छाया १/२ को घटाकर शेष ३/२ में द्वितीय छाया २/३ को जोड़नेसे १३४६ यह छाया का अन्तर हुआ। तथा छायान्तर २/३-१२-१/६ हुआ। अब मूलोक्त नियमके अनुसार प्रथम छाया १/२ को छायाग्रान्तरसे गुणा किया तो १४२४१३/६-१२/१२ हुआ। इसमें छायान्तर ११६ से भाग दिया तो १३/१२४६/१-१३/२६ (या ६२) यह प्रथम भूमिमान हुआ। इसी प्रकार द्वितीय भूमि से भी दीपककी ऊँचाई इतनी ही

तावत्येव निशा तस्य विप्रेन्द्र परिकीर्तिता ॥६३॥

स्वयाभुषः सृष्टिगतालव्दान्सम्पिण्या शारद।

खचरानयन कार्यमयवेष्टयुगादितः ॥६४॥

विप्रवर! चारों युगोंका सम्मिलित मान तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष बतलाया गया है। उसके दांशमें चारका गुणा करनेपर सत्ययुग नामक पाद होगा। (ठसका मान १७ लाख २८ हजार वर्ष है)। दशांशमें तीनका गुणा करनेपर (१२९६००० वर्ष) त्रेता नामक पाद होता है। दशांशमें दोका गुणा करनेपर (८६४००० वर्ष) द्वापर नामक पाद होता है और उक्त दशांशको एकगुना ही रखनेपर (४३२००० वर्ष) कलियुग नामक पाद कहा गया है। कृताब्दसहित (एक सत्ययुग अधिक) इकहत्तर चतुर्युगका एक मन्वन्तर होता है॥६१-६२ ॥

ब्रह्मन् ! ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं और उतने ही समयकी उनकी एक रात्रि होती है ॥६३॥ नारद! ब्रह्माजीके वर्तमान कल्पमें जितने वर्ष बीत गये हैं, उन्हें एकत्र करके ग्रहानयन (ग्रह-साधन) करना चाहिये। अथवा इष्ट युगादिसे ग्रह-साधन करे॥६४॥

युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्करदार्णवाः।

कुजार्किगुरुशीघाणां भगणाः पूर्वयायिनाम्॥६५॥

इन्दो रसानित्रित्रीषुसप्तभूधरमार्गणाः।

दसत्र्यष्टरसाङ्काक्षिलोचनानि कुजस्य तु॥६६॥

बुधशीघ्रस्य शून्यर्तुखाद्रियङ्कनगेन्दवः।

बृहस्पतेः खदस्वाक्षिवेदषड्वह्रयस्तथा ॥६७॥

सितशीघ्रस्य षट्सप्तत्रियमाश्विखभूधराः ।

शनेर्भुजङ्गषट्पञ्चरसवेदनिशाकरा: ।।६८।।

चन्द्रोच्चस्याग्निशून्याश्विवसुसार्णवा युगे।

वामं पातस्य बरबनियमाधिशिखिदलकाः॥६९॥

एक युगमें पूर्व दिशाकी ओर चलते हुए सूर्य, बुध और शुक्रके ४३२०००० 'भगण' होते हैं। तथा मङ्गल, शनि और बृहस्पतिके शीघ्रोच भगण भी उतने ही होते हैं ॥६५॥ एक युगमें चन्द्रमाके भगण ५७७५३३३६ होते हैं। भौमके २२९६८३२. बुधके शीघ्रोच्चके १७९३७०६०, बृहस्पतिके ३६४२२०, शुक्रके शीघ्रोच्चके ७०२२३७६, शनिके १४६५६८ तथा चन्द्रमाके उच्चके भगण ४८८२०३ होते हैं। चन्द्रमाके पातकी वामगतिसम्बन्धी भगणों की संख्या २३२२३८ है ॥६६-६९ ॥

उदयादुदयं भानो मिसावनवासराः।

वसुद्यष्टाद्रिरूपाङ्कसप्ताद्रितिथयो युगे॥७0॥

घड्वह्नित्रिहुताशातिथयश्चाधिमासकाः ।

तिथिक्षया यमार्थाश्चिद्वयष्टव्योमशराश्विनः ॥७१॥

खचतुष्कसमुद्राष्टकुपञ्च रविमासकाः।

घट्यग्नित्रयवेदाग्रिपञ्च शुभ्रांशुमासकाः॥७२॥

प्राग्गतेः सूर्यमन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवह्नयः ।

कोजस्य वेदखयमा बौधस्याष्टर्तुवह्नयः ।।७३।।

खखरन्ध्राणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणेषवः ।

गोऽग्नयः शनिमन्दस्य पातानामथ वामतः ॥७४।।

मनुदस्त्रास्तु कोजस्य बौधस्याष्टाष्टसागराः।

कृताद्रिचन्द्रा जैवस्य शौक्रस्याग्निखनन्दकाः॥७५ ॥

शनिपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः ।

सूर्यके एक उदयसे दूसरे उदयपर्यन्त जो दिनका मान होता है, उसे भौमवासर या सावन वासर कहते हैं। वे एक महायुग (चतुर्युग)-में १५७७९१७८२८ होते हैं। (चान्द्र दिवस १६०३००००८० होते हैं)। अधिमास १५९३३३६ होते हैं तथा तिथिक्षय २५०८२२५२ होते हैं ।। ७०-७१ ॥ रविमासोंकी संख्या ५१८४०००० है। चान्द्र मास ५३४३३३३६ होते हैं ।। ७२ ।। पूर्वाभिमुख गतिके क्रमसे एक कल्पमें सूर्यके मन्दोच्च भगण ३८७, मङ्गलके मन्दोच्च भगण, २०४, बुधके मन्दोच्च ३६८, गुरुके मन्दोच्च ९००, शुक्रके गन्दोच्च ५३५ तथा शनिके मन्दोच्च भगण ३९ होते हैं। अब मङ्गल आदि ग्रहों के पातोंकी विलोमगति (पश्चिम-गमन) के अनुसार एक कल्पमें होनेवाले भगण बताये जाते हैं ।। ७३-७४ ॥ भीमपातके भगण २१४, बुधपातके भगण ४८८, गुरुपातके भगण १७४, भृगुपातके

भगण ९०३ तथा शनिपातके भगण ६६२ होते हैं।।७५।।

वर्तमानयुगे याता वत्सरा भगणाभिधाः ॥७६ ॥

मासीकृता युता मासैमधुशुक्लादिभिर्गतैः ।

पृथवस्थास्तेऽधिमासना: सूर्यमासविभाजिताः ॥७७ ॥

लब्धाधिमासकैयुक्ता दिनीकृत्य दिनान्विता।

द्विष्ठास्तिविक्षयाभ्यस्ताश्चान्द्रवासरभाजिताः ।। ७८ ॥

लब्धोनरात्रिरहिता लङ्कायामार्धरात्रिकः।

सावनो धुगण: सूर्या दिनमासाब्दपास्ततः ॥७९ ।।

सप्तभिः क्षयितः शेष: सूर्यायो वासरेश्वरः।

मासाब्ददिनसंख्याप्तं द्वित्रिघ्नं रूपसंयुतम् ।।८०॥

सप्तोद्धृतावशेषौ तौ विज्ञेयौ मासवर्षपौ।

वर्तमान युग (जिस युगमें, जिस समयके अहर्गण या ग्रहादिका ज्ञान करना हो उस समय)-में सृष्ट्यादि काल या युगादिकालसे ( अबतक जितने वर्ष बीत चुके हों, वे सूर्यके ऊ भगण होते हैं। भगणको बारहसे गुणा करके मास बनाना चाहिये। उसमें 'वर्तमाने वर्षके' चैत्र शुक्ल | सं प्रतिपदासे लेकर वर्तमान मासतक जितने मास च बीते हों, उनकी संख्या जोड़कर योगफलको दो ला स्थानों में रखना चाहिये। द्वितीय स्थानमें रखे हुए दे। मासगणको युगके उपर्युक्त अधिमासोंकी संख्यासे हो गुणा करके गुणनफलमें युगके सूर्यमासोंकी संख्यासे भाग दे। फिर जो लब्धि हो, उसे अधिमासकी संख्या माने और उसको प्रथम स्थानस्थित मासगणमें जोड़े। (योगफल बीते हुए चान्द्रमासोंकी संख्याका सूचक होता है) उस संख्याको तीससे गुणा करे (तो गुणनफल तिथि-संख्याका सूचक होता है), उसमें वर्तमान मासकी शुक्ल प्रतिपदासे इष्टतिथितककी संख्या जोड़े, (जोड़नेसे चान्द्र दिनकी संख्या ज्ञात होती है) इसको भी दो स्थानोंमें रखे। दूसरे स्थानमें स्थित संख्याको युगके लिये कथित तिथिक्षय संख्यासे गुणा करे। गुणनफलमें युगकी चान्द्र दिन (तिथि) संख्याके द्वारा भाग दे। जो लब्धि हो, वही तिथिक्षय-संख्या है, उसको प्रथम स्थानमें स्थित चान्द्र दिन-संख्या से घटा दे तो अभीष्ट दिनका लंकार्धरात्रिकालिक सावन दिनगण (अहर्गण) होता है। इससे दिनपति, मासपति और वर्षपतिका ज्ञान करे।। ७६-७९ ॥ यथा- दिनमा ७ से भाग देनेपर शेष बचे हुए १ आदि संख्याक अनुसार रवि आदि वारपति समझने चाहिये। तथा दिनगणमें ३० से भाग देकर लब्धिको २ से गुणा करके गुणनफलमें १ जोड़ दे। फिर उसमें ७ से भाग देकर १ आदि शेष होनेपर रवि आदि मासपति समझे। इसी प्रकार दिनगणमें ३६० से भाग देकर लब्धिको ३ से

१.इस प्रकार अहर्गण-साधनमें कदाचित् एक दिन अधिक या न्यून भी होता है, उस स्थितिमें १ घटाकर या जोड़कर अहर्गण ग्रहण करे।

कलियुगादिसे अहर्गणका उदाहरण-शाके १८७५ कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा शुक्रवारको अहर्गण बनाना है तो कलियुगादिसे गत युधिष्ठिरसंवत्को वर्षसंख्या ३१७९ में शाके १८७५ जोड़नेसे ५०५४ हुआ; इसको १२ गुणा करनेसे ६०६४८ हुआ। इसमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे गत मास-संख्या ७ जोड़नेपर ६०६५५ सौर मासगण हुए। इसको पृथक् युगकी अधिमास-संख्या १५९३३३६ से गुणा करनेपर ९६६४३७९५०८० हुआ। इसमें युगकी सौर माससंख्या ५१८४०००० से भाग देनेपर लब्धि अधिमास संख्या १८६४ को पृथस्थित और मासगण ६०६५५ में जोड़नेसे ६२५१९ यह चान्द्र मास-संख्या हुई। इसको ३० से गुणा करके गुणनफलमें तिथिसंख्या १५ जोड़नेसे १८७५५८५ यह चान्द्र दिनसंख्या हुई। इसको युगकी क्षय-तिथिसंख्या २५०८२२५२ से गुणा करके गुणनफल ४७०४३८९५६१७४२० में युगको चान्द्र दिनसंख्या १६०३००००८० से भाग देनेषर लब्धि तिथिक्षयसंख्या २९३४७ को उपर्युक्त चान्द्र दिनसंख्या १८७५५८५ में घटानेसे १८४६२३८ अहर्गण हुए। इसमें ७ का भाग देनेसे २. शेष बचते हैं, जिससे शुक्र आदि गणनाके अनुसार शनिवार आता है। किंतु होना चाहिये १ शेष (शुक्रवार); इसलिये इसमें १ घटाकर वास्तविक अहर्गण १८४६२३७ हुआ। प्रस्तुत उदाहरणमें पूर्णिमाका क्षय होनेके कारण १ दिनका अन्तर पड़ा है।

गुणा करके गुणनफलमें १ जोड़े, फिर उसमें ७ से भाग देनेपर १ आदि शेष संख्याके अनुसार रवि आदि 'वर्तमान' वर्षपति होते हैं ॥८०३।।

ग्रहस्य भगणाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासरैः ।। ८१॥

विभाजितो मध्यगत्या भगणादिग्रहो भवेत्।

एवं स्वशीघ्रमन्दोच्चा ये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः ।। ८२ ॥

विलोमगतय: पातास्तद्वच्चक्राद् विशोधिताः ।

(मध्यमग्रहजान)-युगके लिये कथित भगणको संख्यासे दिनगणको गुणा करे गुणनफलमें युगको कुदिन (सावनदिन)-संख्यासे भाग देनेपर भगणादि' ग्रह लंकाधरात्रिकालिक होता है। इसी प्रकार पूर्वाभिमुख गतिवाले जो शीघ्रोच्च और मन्दोच्च कहे गये हैं, उनके भगणके द्वारा उनका भी साधन होता है । विलोम (पश्चिमाभिमुख) गतिवाले जो ग्रहोंके पातभगण कहे गये हैं, उनके द्वारा इसी प्रकार जो पात सिद्ध हों, उनको १२ राशिमें घटानेसे शेषको मेषादि-क्रमसे राश्यादिपात समझना चाहिये ।। ८१-८२३॥

योजनानि शतान्यष्टौ भूकर्णो द्विगुणानि तु ॥८३॥

तद्वर्गतो दशगुणात् पदं भूपरिधिर्भवेत् ।

लम्बानस्त्रिजीवाप्तः स्फुटो भूपरिभिः स्वकः ॥८४॥

(भूपरिधिप्रमाण)-पृथ्वीका व्यास १६०० योजन है। इस (१६००) के वर्गको १० से गुणा करके गुणनफलका मूल भूमध्यपरिधि होता है; अर्थात् वर्गमूलकी जो संख्या हो, उतने योजनकी पृथ्वीकी परिधि जाननी चाहिये। इस भूमध्य- परिधिको संख्याको अपने अपने लम्बाश-ज्यासे गुणा करके उसमें त्रिज्या (३४३८) से भाग देकर

१. कलियुगके आदिमें शुक्रवार था, इसलिये कलियुगादि अहर्गणमें ७ का भाग देनेसे १ आदि शेष होनेपर शुक्र आदि वारपति होते हैं । मासपति जाननेके लिये अहर्गण १८४६२३७ में ३० से भाग देकर लब्धि ६१५४१ को २ से गुणा करनेपर १२३०८२ हुआ। इसमें १ जोड़कर ७ का भाग देनेसे शेष २ रहे, अतः शुक्रसे द्वितीय शनि वर्तमान मासपति हुआ।

एवं अहर्गणमें ३६० का भाग देकर लब्धि ५१२८ को ३ से गुणा कर गुणनफल १५३८४ में १ जोड़कर १५३८५ हुआ। इसमें ७ का भाग देनेसे शेष ६ रहे; अत: शुक्रादि गणनासे बुध वर्तमान वर्षपति हुआ।

२. प्रथम लब्धि भगण होती है। शेषको १२ से गुणा करके गुणनफलमें युग-कुदिनसे भाग देनेपर जो लब्धि होगी, वह राशि है। पुनः शेषको ३० से गुणा करके गुणनफलमें युग-कुदिनसे पा देनेपर जो लब्धि हो वह अंश है। अंश- शेष ६० से गुणा करके गुणनफलमें कुदिनका भाग देनेसे लब्धि कला होती है। कला-शेषको ६० से गुणा करके पूर्ववत् युग-कुदिनसे भाग देनेपर जो लब्धि हो, वह विकला होती है। इनमें भगणको छोड़कर राश्यादि ही ग्रह कहलाता है। इस प्रकार मध्यम ग्रह होता है।

३. उदाहरण-जैसे युगके सूर्यभगण ४३२०००० को अहर्गण १८४६२३७ से गुणा करनेपर ७९७५७४३८४०००० हुआ। इसमें युगके कुदिन १५७७९१७८२८ से भाग देनेपर लब्ध भगण ५०५४ हुए। शेष ९४७१३७२८८ को १२ से गुणा कर गुणनफल ११३६५६४७४५६ में कुदिनका भाग देनेसे लब्धि राशि ७ हुई। राशिशेष ३२०२२२६६० को ३० से गुणा करके गुणनफल ९६०६६७९८०० में कुदिनका भाग देनेसे लब्ध अंश ६ हुआ। अंश-शेष १३९१७२८३२ को ६० से गुणा करके गुणनफल ८३५०३६९९२० में कुदिनसे भाग देनेपर लब्धि कला ५ हुई। कलाशेष ४६०७८०७८० को ६० से गुणा कर गुणनफल २७६४६८४६८०० में कुदिनका भाग देनेसे लमि विकला १८ हुई। एवं भगण प्रयोजनमें नहीं आता है, इसलिये उसको छोड़कर राश्यादि फल ७।६।५ । १८ यह लङ्कार्धरात्रिकालिक मध्यम सूर्य हुआ। इसी

प्रकार अपने-अपने भगणद्वारा सब ग्रह, उच्च और पातका साधन होता है। तथा पातकी विपरीत गति होती है। अहर्गणद्वारा साधित पातको १२राशि में घटाने से शेषको मेषादि-क्रम से राश्यादि-पात समझना चाहिये, यह बात आगे कही जायगी।

४. इस प्रकार साधित ग्रहरेखादेशीय होता है। इसमें आगे कहे हुए देशान्तर-संस्कार करने से स्वदेशीय मध्यम ग्रह होता है।

जो लब्धि हो, वह स्पष्ट भूपरिधिकी योजन- संख्या होती है ॥८३-८४॥

तेन देशान्तराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता।

कलादि तत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः परिशोधयेत्॥८५॥

रेखाप्रतीचीसंस्थाने प्रक्षिपेत् स्युः स्वदेशजाः ।

राक्षसालयदेवौकःशैलयोर्मध्यसूत्रगा: ॥८६॥

अवन्तिकारोहितकं यथा सन्निहितं सरः।

वारप्रवृत्तिः प्राग्देशे क्षपार्धेऽभ्यधिके भवेत्॥८७॥

तद्देशान्तरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत्।

(ग्रहों में देशान्तर-संस्कार )-ग्रहकी कलादि मध्यम गतिको देशान्तर-योजन (रेखादेशसे जितने योजन पूर्व या पश्चिम अपना स्थान हो उस)-से गुणा करके गुणनफलमें 'स्पष्टभूपरिधि-योजन' के द्वारा भाग देनेपर जो लब्धि हो, वह कला आदि है। उस लब्धिको रेखासे पूर्व देशमें पूर्वसाधित ग्रहमें घटानेसे और पश्चिम देशमें जोड़नेसे स्वस्थानीय अर्धरात्रिकालिक ग्रह होता है ॥ ८५॥

(रेखा-देश)-लङ्कासे सुमेरुपर्वतपर्यन्त याम्योत्तर-रेखामें जो-जो देश (स्थान) हैं, वे स रेखा देश कहलाते हैं। जैसे उज्जयिनी, रोहितक, कुरुक्षेत्र आदि ॥ ८६ ३॥

(वार-प्रवृत्ति)-भूमध्यरेखासे पूर्वदेशमें रेखा-देशीय मध्यरात्रिसे, देशान्तर घटीतुल्य पीछे और रेखासे पश्चिम देशमें मध्यरात्रिसे देशान्तर घटीतुल्य पूर्व ही वार-प्रवृत्ति (रवि-आदि वारोंका आरम्भ) होती है। ॥ ८७॥

इष्टनाडीगुणा भुक्तिः षष्ट्या भक्ता कलादिकम्॥८८॥

गते शोद्धयं तथा योज्य गम्ये तात्कालिको ग्रह ।

भचक्रलिप्ताशीत्यंशं परमं दक्षिणोत्तरम्॥८९॥

विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यन्तादनुष्णगुः ।

तनवांश द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः ॥ ९० ॥

बुधशुकार्कजाः पातैर्विक्षिप्यन्ते चतुर्गुणम्।

(इष्टकालमें मध्यम गृह जाननेकी विधि)-

मध्यरात्रिसे जितनी घड़ी बाद ग्रह बनाना हो, उस संख्यासे ग्रहकी कलादि गतिको गुणा करके गुणनालमें ६० से भाग देकर लब्धितुल्य कलादि फलका पूर्वसाधित ग्रहमें जोड़नेसे तथा जितनी घड़ी मध्यरात्रिसे पूर्व ग्रह बनाना हो, उतनी संख्यासे गतिको गुणा करके गुणनफलमें ६०से भाग देकर कलादि फलको पूर्वसाधित ग्रहमें

यथा-१६०० के वर्गको १० गुना करनेसे २,५६,००००० हुआ। इसका मूल (स्वल्पान्तरसे) ५०५८ हुआ। इतना ही योजन स्थूलमानसे मध्यभूपरिधिका प्रमाण है।

गोरखपुरमें स्पष्ट भूपरिधि-साधन-यदि लम्बांश ६३ । १५ है, तो उसकी ज्या आगे ९३, ९७ श्लोकोंमें वर्णित रीतिके अनुसार ३०७० हुई। मध्यभूपरिधि ५०५८ को गोरखपुरकी लम्बज्या ३०७० से गुणा कर गुणनफल १५५२८०६० में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेसे लब्धि ४५१६ स्पष्ट भूपरिधि हुई।

देशान्तर-कालज्ञान इस प्रकार होता है-गणितद्वारा सिद्ध चन्द्रग्रहण स्पर्शकालसे जितने घड़ी-पलके पश्चात् स्पर्श होता है, उतनी ही घडीको रेखादेशसे 'पूर्व देशान्तर' तथा जितनी पड़ी पहले ग्रहणका स्पर्श होता है, उतनी घडीको 'पशिम देशान्तर' समझा जाता है। गोरखपुरमें इस प्रकारसे १ घड़ी और १३ पल पूर्वदेशान्तर है।

इस देशान्तर-पलसे देशान्तर-योजनका ज्ञान त्रैराशिकसे होता है-जैसे ३६०० पलमें स्पष्ट भूपरिधियोजन ४५१६ है तो देशान्तर पलमें कितना होगा? इस प्रकार गोरखपुरमें देशस्तर ७३ पलद्वारा रेखादेशसे देशान्तर-योजन ९१ हुआ। इसके द्वारा ग्रहोंमें देशान्तरसंस्कार होता है।

 रेखादेशसे गोरखपुरके पूर्व देशान्तर-योजन ९१ को सूर्यको मध्यगतिकला ५९।८ से गुणा कर गुणनफल ५३८१॥ ८ में स्पष्ट भूपरिधि-योजन ४५१६ से भाग देनेपर लब्धि कलादि १ । ११ हुई। इसको अहर्गणसाधित मध्यम सूर्य ७॥ ६१५। १८ में पूर्व देशान्तर होनेके कारण घटानेसे ७ । ६१४१७ यह मध्यरात्रिकालिक मध्यम सूर्य हुआ।

१. पात (राहु) में देशान्तरसंस्कार विपरीत होता है।

२. रेखा-देशके मध्यरात्रि-समयसे ही सृष्टिका आरम्भ माना गया है। इसलिये रेखा-देशके मध्यरात्रि-समयमें ही वारप्रवेश होता है।

घटानेसे इष्टकालिक ग्रह होता है ॥८८३ ॥

(चन्द्रादि ग्रहोंके परम विक्षेप)-भचक्रकला (२१६००) के ८० वा भाग (२७०) कलापर्यन्त क्रान्तिवृत्त (सूर्यके मार्ग)-से परम दक्षिण और उत्तर चन्द्रमा विक्षिस होता (हटता) है। एवं गुरु ६० कला, मङ्गल ९० कला, बुध, शुक्र और शनि-ये तीनों १२० कलापर्यन्त क्रान्तिवृत्तसे दक्षिण और उत्तर हटते रहते हैं। ॥ ८९-९०३ ॥

राशिलिप्ताष्टमो भाग: प्रथमं न्यार्द्धमुच्यते ।। ९१ ॥

तत्तद् विभक्तलब्धोनमिश्रितं तद् द्वितीयकम्।

आये नवं क्रमान् पिण्डान् भवत्या लब्धोनसंयुताः ।। १२ ।।

खण्डका: स्युश्चतुर्विशज्यार्द्धपण्डा: क्रमादमी।

परमापक्रमज्या तु सप्तरन्धगुणेन्दवः ॥ १३ ॥

तगुणा ज्या त्रिजीवाप्ता तच्चार्प क्रान्तिरुच्यते।

(अभीष्ट जीवासाधनके लिये उपयोगी २४ जीवासाधन)-१ राशि-कला १८०० का आठवाँ भाग (२२५ कला) प्रथम जीवाध होता है। उस (प्रथम जीवार्ष) से प्रथम जीवार्धमें भाग देकर लब्धिको प्रथम जीवार्धमें ही घटाकर शेष (प्रथमखण्ड) को प्रथम जीवार्धमें ही जोड़नेसे द्वितीय जीवार्ध होता है। इसी प्रकार प्रथम जीवासे ही द्वितीय जीवामें भाग देकर लब्धिको द्वितीय खण्डमें घटाकर शेषको द्वितीय जीवार्धमें जोड़नेसे तृतीय जीवार्ध होता है। इसी तरह आगे भी क्रिया करनेसे क्रमश: २४ जीवार्ध सिद्ध होते हैं ॥९१-९२॥

इस प्रकार सूर्यको परमक्रान्तिज्या १३९७

१. मान लीजिये, शुक्रवार मध्यरात्रिकालिक ग्रह जानकर अग्रिम प्रात: छ: बजेका मध्यम सूर्य बनाना है तो- इष्टकाल ६ घंटा (१५ घड़ी) हुआ। इसलिये सूर्यको कलादि गति ५९४८ को १५ से गुणा करके ६० का भाग देनेसे लब्धि १४ कला ४७ विकलाको मध्यरात्रिके सूर्य ७।६।४।७ में जोड़नेसे ७।६।१८।५४-यह शनिवारके प्रात: छ: बजेका मध्यम सूर्य हुआ।

२. सूर्य और अन्य ग्रहोंके मार्गोका योगस्थान (चौराहा) पात कहलाता है। जब ग्रह अपने मार्गपर चलता हुआ पात-स्थानमें आता है, उस समय वह क्रान्तिवृत्तमें होनेके कारण अपने स्थानमें ही होता है; क्योंकि सब ग्रहोंके स्थान क्रान्तिवृत्तमें ही होते हैं। पात-स्थानसे आगे-पीले होनेपर क्रान्तिवृत्तसे जितनी दूर विक्षिप्त होते (हटते) हैं, उतना उस ग्रहका 'विक्षेप' (शर) कहलाता है। सूर्यके मार्गको 'क्रान्तिमण्डल' और अन्य ग्रहोंके मार्गको उन-उन ग्रहोंका 'विमण्डल' कहते हैं तथा चन्द्रमाके पातस्थानको हो 'राहु' और 'केतु' कहते हैं।

३. जीवा, जया, शिञ्जिनी, मौर्वी गुण, रजु-ये पर्यायवाचक शब्द है। ज्योतिष में चाप और जीवाके द्वारा ही ग्रहगणित होता है। क्योंकि ग्रहका मार्ग वृत्ताकार है। वृत्त परिधिका खण्ड चाप कहलाता है। जैसे अ, ग, प, ल, अ यह यर्तुल मार्ग वृत्तपरिधि है। इसमें अ-क, अ-ग आदि परिधिखण्ड चाप कहलाते हैं। जैसे अ, इ, के चाप है तो अ, क सरलरेखा अ, इ, क, चापर्क ज्या कहलाती है तथा अ, त, सरलरेखा अ, इ, क चापकी उत्क्रमज्या तथा क, त रेख अ, इ, क चापका जीवार्ध वा ज्यार्ध कहलाती है। इसीको अर्धया भी कहते हैं। गणितमें अर्धज्या (ज्या)-से हो काम लिया जाता है; इसलिये ज्यौतिषग्रन्थमें ज्यार्धको ही ज्या जीवा मौर्वी आदि कहते हैं। ये जीवार्ध या जीवा वृत्तके चतुर्थाशमें ही बनते हैं। इस वृत्तके चतासको पद कहा गया है। अतः सम्पूर्ण वृत्तमें ४ पद होते हैं। १, ३ विषम और २, ४ सम पद कहलाते हैं। वृत्तकी सम्पूर्ण परिधिमें राशि या अंश होते है इसलिये एक-एक पद में तीन-तीन राशि या अंश होते हैं। प्रथम और तृतीय पदमें गत चाप को भुज और गम्य चापको कोटि कहते हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ पद में गत चापको कोटि और गम्य चापको ही भुज कहते हैं। जैसे-प्रथम पद में अ क-भुज और क ग कोटि है तथा द्वितीय पद में ग च कोटि और च प भुज है। प्रत्येक पदमें चापको अंश में घटाने से शेष उस चापकी कोटि होती है इसलिये क ग चाप अ क चापकी कोटि, तथा क न सरल रेखा कोटिज्या है एवं सम(द्वितीय) पदमें च र भुजज्या और च व कोटिज्या कहलाती है। इसी क्रमसे तृतीया और चतुर्थ पदमें भुजज्या और कोटिज्या समझनी चाहिये। केवल ज्या शब्द से सर्वत्र भुजज्या ही समझी जाती है।

४.उदाहरण- जैसे- प्रथमज्या में प्रथमज्या से भाग देकर लब्धि १ को प्रथमज्यामें घटाकर २२४(प्रथम खण्ड) हुआ। इसको प्रथमज्यामें जोड़ने से २२४+२२५-४४१ में प्रथमज्या २२५ का

होती है। इस (परमक्रान्तिज्या)-से ग्रहकी ज्या (भुजण्या) को गुणा करके त्रिज्याके द्वारा भाग देनेसे 'इष्टक्रान्ति-ज्या' होती है। उसका चाप बनानेसे 'इष्टक्रान्ति' (मध्यमा) कहलाती है।।९३३ ॥

ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात् तथा शीघ्राद्विशोध्य च ॥१४॥

शेषं केन्द्रपदं तस्माद्धजग्या कोटिरेव च।

गताद्धुजज्याविषमे गम्यात् कोटिः पदे भवेत्॥१५॥

युग्मे तु गम्यादाहुज्या कोटिज्या तुगताद्भवेत्।

लिप्तास्तत्त्वयमैर्भक्ता लब्धं ज्यापिण्डुकं गतम्॥९६ ॥

गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्त्वलोचनैः।

तदवाप्तफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञके ॥१७॥

स्यात्नमया विधिरयमुत्क्रमन्यास्वपि स्मृतः ।

ज्या प्रोह्य शेष तत्त्वाश्चिहतं तद्विवरोद्धृतम्।। ९८॥

संख्यातत्त्वाश्विसंवर्गे संयोज्य धनुरुच्यते।

('भुजज्या' और 'कोटिया बनानेकी रीति-)

ग्रहों को अपने-अपने मन्दोच्चमें घटानेसे शेष उस ग्रहका 'मन्द केन्द्र' तथा शीघ्रोच्चमें घटानेसे शेष उस ग्रहका 'शीघ्र केन्द्र' कहलाता है। उस राश्यादि केन्द्रकी 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनानी चाहिये। विषम (१, ३) पदमें 'गत' चापकी जीवा भुजज्या और 'गम्य' चापकी जीवा कोटिज्या कहलाती है। सम (२, ४) पदमें 'गम्य' चापकी जीवा 'भुजज्या' और 'गत' चापको जीवा 'कोटिज्या' होती है' ॥ ९४-९५३ ।।

(इष्टज्या-साधन विधि)-जितने राश्यादि चापकी जीवा बनाना हो, उसकी कला बनाकर उसमें २२५ से भाग देकर जो लब्धि हो, उतनी संख्या (सिद्ध २४ ज्या-पिण्डमें) गत ज्यापिण्डकी संख्या समझे। शेष कलाको 'गत ज्या' और 'गम्य ज्या' के अन्तरसे गुणा करके २२५ से भाग देकर लब्ध कलादिको 'गत ज्या'-पिण्डमें जोड़नेसे 'अभीष्ट ज्या' होती है। 'उत्क्रमज्या' भी इसी विधिसे बनायी जाती है ॥ ९६-९७।।

(जीवासे चाप बनानेकी विधि)-इष्ट जीवाको कलामें सिद्ध जीवापिण्डोंमेंसे जितनी संख्यावाली . जीवा घटे, उसको घटाना चाहिये। शेष कलाको

भाग देकर लब्धि २ को प्रथम खण्ड २२४ में घटानेसे शेष २२२ द्वितीय खण्ड हुआ; इसको द्वितीय जीवामें जोड़नेसे ६७१ तृतीय जीवा हुई। फिर तृतीय जीवामें प्रथमज्यासे भाग देकर लब्धि ३ को द्वितीय खण्डमें घटानेसे शेष २१९ तृतीय खण्ड हुआ। इसको तृतीय जीवा ६७१ में जोड़नेसे ८९० यह चतुर्थ जीवा हुई। इसी प्रकार आगे भी साधन करनेपर निम्नाङ्कित सिद्ध २४ व्यार्थकी कलाएँ होती है-२२५, ४४९, ६७६, ८९०, ११०५, १३१५, १५२०, १७१९, १९१०, २०९३, २२६७, २४३१, २५८५, २७२८, २८५९, २९७८, ३०८४, ३१७७, ३२५६, ३३२१, ३३७२, ३४०९, ३४३१ तथा ३४३८। ये १ पदमें (३ राशिम) २४ ज्यार्ध-पिण्ड हैं।

१. ३ राशि (९० अंश)-का १ पद होता है। उस पदमें 'गत' चापको घटानेसे शेष 'गम्य' चाप कहलाता है। जैसे सूर्यराश्यादि ८।१०।१५। २५ है, उसका पन्दोच्च ३। १७ । ३५ । ४० मन्दोच्चमें सूर्यको घटानेसे राश्यादि शेष ६।७। १७११५ केन्द्र हुआ। यहाँ केन्द्र ६ राशिसे अधिक है, अतः तृतीय (विषम) पदमें पड़ा। इसलिये तृतीय पदके गतांशादि ७१ १७।१५ को ९० अंशमें घटानेसे अंशादि ८२ । ४२ ॥ ४५-ये 'गम्य' अंशादि हुए।

२. जैसे स्वल्पान्तरसे सूर्यका मन्दोच्च २॥ १७॥ ४८१५४ है। इसमें माध्यम सूर्य ७।६।१८/५४ को घटानेसे शेष ७६११॥ ३०० यह मन्द केन्द्र हुआ। यह ६ राशिसे अधिक होने के कारण तुलादिमें पड़ा तथा तृतीय पदमें होने के कारण इसमें ६ राशि घटाकर शेष ।।११।३०१० यह भुज हुआ। इसको ९० अंश (३ राशि) में घटानेसे शेष १।१८।३०॥ यह कोटि हुई। भुजब्या बनाने के लिये आगे कही हुई रीतिसे राश्यादि भुज १ । ११ । ३० को कला बनानेसे २४९० कला हुई। इसमें रख से भाग देनेपर लब्धि गतज्या ११ हुई। शेष २५ को गतज्या, एयया (११ वीं और १२ वीं ज्या) के अन्तर (२४३१- २२६७)-१६४ से गुणा करनेपर २४६० हुआ। इसमें २२५ का भाग देनेपर लब्धि ११ कलाको गतया २२६७ में जोड़नेसे सूर्यकी भुजज्या २२७८ हुई। इसी प्रकार कोटिकी कलाद्वारा कोटिज्या २६७५ हुई।

३. जैसे परम क्रान्ति ९0 को गतज्या एष्यज्या के अन्तर से गुणा कर उसमें २२५ से भाग देनेपर लब्धि को गतज्या में जोड़नेपर यह परम क्रान्ति (२४अंश)-की ज्या हुई।

२२५ से गुणा करके गुणनफलमें गत, गम्य जीवाके अन्तरसे भाग देकर जो लब्धि कलादि हो, उसको घटायी हुई सिद्ध-जीवा-संख्यासे गुणित २२५ में जोड़नेसे इष्टण्याका चाप होता है ॥९८॥

रवेर्मन्दपरिध्यंशा मनवः शीतगो रदाः॥ १९॥

युग्मान्ते विषमान्ते तु नखलिस्रोनितास्तयोः ।

युग्मान्तेऽद्रियः खाग्निसुराः सूर्या नवार्णवाः ॥१०॥

ओजे द्वयगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाब्धय।

कुजादीनामतः शैभ्या युग्मान्तेऽर्थाग्रिदत्रकाः॥१०१॥

गुणाग्निचन्द्रा खनगा द्विरसाक्षीणि गोऽग्नयः।

ओजान्ते द्वित्रियमला द्विविश्वे यमपर्वताः ॥१०२॥

खर्तुदस्वा वियद्वेदाः शीघ्रकर्मणि कीर्तिताः।

ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धृता ॥ १०३॥

युग्मवृत्ते धनर्ण स्यादोजादूनाधिके स्फुटम्।

( रवि और चन्द्रमाके मन्दपरिध्यंश)-समपदके अन्तमें सूर्यके १४ अंश और चन्द्रमाके ३२ अंश मन्दपरिधि मान होते हैं और विषमपदके अन्त में २० कला कम अर्थात् सूर्यके १३।४० और चन्द्रमाके ३१ । ४० मन्दंपरिध्यंश हैं ।। ९९।।

(मङ्गलादि ग्रहोंकी मन्द और शीघ्र परिधि)- समपदान्तमें मङ्गलके ७५, बुधके ३०, गुरुके ३३, शुक्रके १२ और शनिके ४९ तथा विषमपदान्त में मङ्गलके ७२, बुधके २८, गुरुके ३२, शुक्रके ११ और शनिके ४८ मन्द परिध्यंश हैं। इसी प्रकार समपदके अन्तमें मङ्गलके २३५, बुधके १३३. गुरुके ७०, शुक्रके २६२ और शनिके ३९ तथा विषमपदान्तमें मङ्गलके २३२, बुधके १३२. गुरुके ७२, शुक्रके २६० और शनिके ४० शीघ्र परिध्यश कहे गये हैं ॥ १००-१०२ ॥

 (अभीष्ट स्थानमें परिधिसाधन-) अभीष्ट स्थानमें मन्द या शीघ्र परिधि बनानी हो तो उस ग्रहकी भुजज्याको विषम-समपदान्त-परिधिके अन्तरसे गुणा करके गुणनफलमें त्रिज्या (३४३८)- से भाग देकर जो अंशादि लब्धि हो, उसको समपदान्त-परिधिमें जोड़ने या घटानेसे (विषमपदान्तसे समपदन्ति कम हो तो जोड़ने अन्यथा घटानेसे) इष्टस्थानमें स्पष्ट मन्द या शीघ्र परिध्यंश होते हैं ॥१०३॥

तद्गुणे भुजकोटिज्ये भगणांशविभाजिते॥१०४॥

तद्धजज्याफलधनुर्मान्दं लिप्तादिकं फलम्।

शैघ्यं कोटिफलं केन्द्र मकरादौ धनं स्मृतम्॥१०५॥

संशोध्यं तु विजीवायां कादौ कोटिज फलम्।

तदाहुफलवर्गक्यान्मूलं कर्णश्चलाभिधः ॥१०६ ॥

त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चलकर्णविभाजितम्।

लब्धस्य चापं लिप्तादिफलं शैघ्रयमिदं स्मृतम्॥१०७॥

एतदाद्ये कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि।

मान्दं कमैकमर्केन्द्वोभीमादीनामथोच्यते ॥१०८ ॥

शैघ्यं मान पनर्मान्दं शैवं चत्वार्यनुक्रमात्।

(भुजपाल-कोटिफल-साधन- )इस प्रकार साधित स्पष्ट परिधिसे ग्रहकी 'भुजज्या' और 'कोटिज्वा' को पृथक् पृथक् गुणा करके भगणांश (३६०)-से भाग देकर लब्ध (भुजयासे) भुजफल और (कोटिज्यासे) कोटिफल होते हैं। एवं मन्द परिधिद्वारा मन्दफल और शीघ्र परिधिद्वारा शीघ्र-फल समझने चाहिये। यहाँ मन्द परिधिवश भुजज्याद्वारा जो भुजफल आवे, उसका चाप बनानेसे मन्द कलादि फल होता है ॥१०४॥

(शीघ्र कर्णसाधन-) पूर्वविधिसे शीघ्र

१. जैसे परमक्रान्तिज्याका चाप बनाना है, तो परमक्रान्तिग्या १३९७ में कथित छठी जीवा १३१५ को घटाकर शैव ८२ को २२५ से गुणाकर गत, गम्य ज्याके अन्तर २०५ से भाग देनेपर लब्धि ९० को ६४२२५-१३५० मैं जोड़नसे १४४० हुआ। इसको अंश बनानेसे २४ परम कान्ति-अंश हुए।

२. जैसे-सूर्यको भुजज्या २२७८ को विषम-सम परिधिके अन्तर २० से गुणा करनेपर १५५६० हुआ। इसमें १६८ का भाग देनेसे लब्धि १३ कलाको समपदान्त परिधि-अंश १४ में घटानेसे १३ । ४७ सूर्यकी स्पष्ट मन्द परिधि हुई।

३. जैसे-सूर्यको भुजग्या २२७८ को स्पष्ट मन्द परिधि १३ । ४७ से गुणा कर ३१३१८ । २६ हुआ। इसमें ३३० का भाग देनेसे लब्धि कलादि ८७।१३ यह भुजफल हुआ। यह २२५ से कम है, अत: इसका चाप भी इतना ही हुआ और यही सूर्यका कत्तादि मन्दफस हुआ। इसके अंशादि बनानेसे १। २७।१३ हुआ, इसको तुलादि केन्द्र होने के कारण मध्यम सूर्य ७।६।१८॥

परिधिद्वारा जो कोटिफल आवे, उसको मकरादि केन्द्र हो तो त्रिज्या (३४३८)-में जोड़े। कर्कादि केन्द्र हो तो घटावे। जोड़ या घटाकर जो फल हो, उसके वर्गमें शीघ्र भुजफलके वर्गको जोड़ दे। फिर उसका मूल लेनेसे शीघ्र कर्ण होता है॥१०५-१०६॥

(शीघ्र फलसाधन-) पूर्वविधिसे साधित शीघ्र भुजफलको त्रिज्यासे गुणा करके शीघ्र कर्णके द्वारा भाग देनेपर जो कलादि लब्धि हो, उसके चाप बनानेसे शीघ्र 'भुजफल' होता है। यह शीघ्रफल मङ्गलादि ५ ग्रहोंमें प्रथम और चतुर्थ कर्ममें संस्कृत (धन या ऋण) किया जाता है ।।१०७१॥

रवि और चन्द्रमामें केवल एक ही मन्दफलका संस्कार (धन या ऋण) किया जाता है। मुने! अब मङ्गलादि ५ ग्रहोंके संस्कारका वर्णन करता हूँ। उनमें प्रथम शीघ्रफलका, द्वितीय मन्दफलका, तृतीय भी मन्दफलका और चतुर्थ शीघ्रफलका संस्कार किया जाता है ॥१०८॥

अजादिकेन्द्रे सर्वेषां शैघ्ये मान्दं च कर्मणि॥१०९॥

धनं ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृणमेव तत् ।

अर्कबाहुफलाभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता ।।११०॥

भचक्रकलिकाभिस्तु लिसाः कार्या ग्रहेऽर्कवत् ।

(संस्कारविधि-) शीघ्र या मन्द केन्द्र मेषादि (राशिके भीतर) हो तो शीघफल और मन्दफल जोड़े जाते हैं। यदि तुलादि केन्द्र (६ राशिसे ऊपर) हो तो घटाये जाते हैं ॥१०९३॥

(रविभुजफल-संस्कार-) प्रत्येक ग्रहकी गतिकलाको पृथक्-पृथक् सूर्यके मन्द भुजफल- कलासे गुणा करके उसमें २१६०० के द्वारा भाग देनेसे जा कलादि लब्धि हो, उसको पूर्वसाधित उदयकालिक ग्रहोंमें रविमन्दफलवत् संस्कार (मन्दफल धन हो तो धन, ऋण हो तो ऋण) करना चाहिये। इससे स्पष्ट सूर्योदयकालिक ग्रह होते हैं ॥११०३॥

स्वमन्दभुक्तिसंशुद्धेमध्यभुक्तेर्निशापतेः ॥१११॥

ग्रहभुक्तेः फल कार्य ग्रहवन्मन्दकर्मणि।

दोजर्यान्तरगुणा भुक्तिस्तत्त्वनेत्रोद्धृता पुनः॥११२।।

स्वमन्दपरिधिक्षुण्णा भगणांशोद्धृताः कलाः।

कर्कादौ तु धनं तत्र मकरादावृणं स्मृतम्।।११३॥

मन्दस्फुटीकृतां भुक्ति प्रोज्य शीघ्रोच्च भुक्तितः ।

तच्छेषं विवरेणाथ हन्यात्रियान्त्यकर्णयोः ।।११४॥

चलकर्णहृतं भुक्तौ कर्णे त्रिज्याधिके धनम्।

ऋणमूनेऽधिके प्रोज्झय शेषं वक्रगतिर्भवेत्॥११५॥

(स्पष्टग्रहगतिसाधनार्थ गतिफल-) चन्द्रमध्यगतिमें चन्द्रमन्दोच्चगतिको घटाकर उससे (अर्थात् चन्द्रकेन्द्र-मत्तिसे) तथा अन्य ग्रहोंकी (स्वत पन्तरसे) अपनी-अपनी गतिसे हो मन्दरा तिसाधनमें फल साधन करे। यथा- उक्त गति (चन्द्रको केन्द्रगति और अन्य ग्रहोंको गति) को दोजर्यान्तर (गम्यज्या और गतज्याके अन्तर)-से गुणा करके उसको २२५ के द्वारा भाग देकर लब्धिको अपनी-अपनी मन्दपरिधिसे गुणा करके धगणांश (३६०)-के द्वारा भाग देनेसे जो कलादि फल लब्धि हो, उसको कर्कादि (३ से ऊपर १ राशिके भीतर) केन्द्र हो तो मध्यातिमें धन करने (जोड़ने) तथा मकरादि (९ राशिसे ऊपर ३ राशितक) केन्द्र हो तो पटानेसे मन्दस्पष्ट गति होती है। पुन: इस मन्दसाट गतिको अपनी

५४ में घटानेसे शेष ७।४ । ५१ । ४१ यह स्पष्ट सूर्य हुआ।

१. पूर्वसाधित मध्यम या स्पष्ट सूर्य मध्यमार्कोदयकालिक होता है। उसको स्पष्ट सूर्योदयकालिक बनानेके लिये भुजफल-संस्कार किया जाता है। जैसे-सूर्यके भुजफल ८७ । १३ को सूर्यको स्पष्टगति ६० ॥ ४७ से गुणा करने पर ५३०१।२० हुआ। इसमें २१६०० का भाग देनेसे लब्धि कलादि । १५ अर्थात् १५ विकलाको स्पष्ट सूर्यमें मन्दफल ऋण होने के कारण घटानेसे स्पष्ट सूर्योदयकालिक स्पष्ट सूर्य ७।४।५१ । २६ हुआ।

२. ग्रहोंकी केन्द्रगतिके द्वारा मन्दस्पष्टगातिफल साधन होता है। वहाँ चन्द्रमाको अधिक गति होने के कारण केन्द्रगति ग्रहण की जाती है। अन्य ग्रहकी १ दिनमें मन्दोच्च गति शून्य होने के कारण ग्रहगतिके तुल्य ही केन्द्रगति होती

शीघ्रोच्च गतिमें घटाकर शेषको त्रिज्या तथा अन्तिम शीघ्रकर्णके अन्तरसे गुणा करके पूर्वसाधित शीघ्रकर्णके द्वारा भाग देनेसे जो लब्धि (कलादि) हो, उसको यदि कर्ण त्रिज्यासे अधिक हो तो मन्दस्पष्ट गतिमें धन करने (जोड़ने) और अल्प हो तो घटानेसे स्पष्ट गति होती है। यदि साधित ऋणगतिफल मन्दस्पष्ट गतिसे अधिक हो तो उसी (ऋणगतिफल)-में मन्दस्पष्ट गतिको घटाकर जो बचे, वह वक्रगति होती है। इस स्थितिमें वह ग्रह वक्र-गति रहता है ॥१११-११५॥

कृततुचन्द्रैर्वेदेन्द्रैः शून्यत्र्येकैर्गुणाष्टिभिः ।

शतरुद्रैश्चतुर्थेषु केन्द्रांशै सुतादयः ॥११६ ॥

वक्रिणश्चक्रशुद्धैस्तैरंशैरुज्झन्ति वक्रताम्।

क्रान्तिया विषुवद्भानी क्षितिज्या द्वादशोद्धता॥११७॥

त्रिज्यागुणा दिनव्यासभक्ता चापं चरासव।

तत्कार्मुकमुदक्क्रान्तौ धनहीने पृथक स्थिते॥११८॥

स्वाहोरात्रचतुर्भागे दिनरात्रिदले स्मृते।

याम्यक्रान्तौ विपर्यस्ते द्विगुणे तु दिनक्षपे॥११९।।

(ग्रहोंकी वक्र केन्द्रांश-संख्या-) मङ्गाल अपने चतुर्थ शीघ्रकेन्द्रोश १६४ में, बुध १४४ केन्द्रांशमें, गुरु १३० केन्द्रोशमें, शुक्र १६२ केन्द्रांशमें और शनि ११५ शीघ्रकेन्द्रोशमें वक्रगति होता है। अपने-अपने वक्रकेन्द्रांशको ३६० में घटानेसे शेषके तुल्य केन्द्रांश होनेपर फिर वह मार्ग-गति होता है' ॥ ११६॥

( कालज्ञान-) रवि क्रान्तिज्याको पलभा गुणा करके गुणनफलमें १२ से भाग देनेपर लब्धि 'कुज्या' होती है। उस (कुज्या)-को त्रिज्यासे गुणा करके धुज्या (क्रान्तिकी कोटिज्या) से भाग देकर लब्धि (चरज्या)-के चाप बनानेसे चरासु' होते हैं। उस चर-चापको यदि उत्तर क्रान्ति हो तो १५ घटीमें जोड़नेसे दिनार्ध और १५ घटीमें घटानेसे रात्र्यध होता है। दक्षिणक्रान्ति हो तो विपरीत (यानी १५ घटीमें घटानेसे दिनार्ध और जो से राज्यर्ध) होता है। दिनार्धको दूना करनेसे दिनमान और रात्र्यर्धको दूना करनेसे रात्रिमान होता है ।। ११७-११९ ।।

भभोगोऽष्टशतीलिमाः खाश्विशैलास्तथा तिथेः ।

है तथा रवि और चन्द्रमाकी मन्दस्पष्ट गति ही स्पष्ट गति होती है। मङ्गलादि ग्रहोंके शीघ्रोच्चवश शीघ्र गतिफलका पुनः संस्कार करनेसे स्पष्ट गति होती है।

१. जैसे सूर्यको गति ५९।८ को गत-एष्यज्याके अन्तर १६४ से (जो भुजण्यासाधनमें गतैष्ययान्तर हुआ था) गुणा करनेपर ९३९७१५२ हुआ। इसमें २२५ से भाग देनेपर लब्धिकला ४३ को मन्दपरिधि १३ । ४७ से गुणा करके

गुणनफल ५९२ ॥ ४१ में ३६० से भाग देनेपर लब्धिकलादि गतिफल १।३९ हुआ। इसको कर्कादि केन्द्र होनेके कारण सूर्यकी मध्यगति ५९।८ में जोड़नेसे ६०। ७७ यह मन्दस्पष्ट गति हुई। यही सूर्यको स्पष्ट गति भी होती है।

२. जैसे मङ्गलके चक्रकेन्द्रांश १६४ को ३६० में घटानेसे शेष १९६ -केन्द्रांश हुए। इससे सिद्ध हुआ कि जब मङ्गलका शीघ्रकेन्द्रांश १६४ से १९६ तक रहता है, तबतक मङ्गल वक्र रहता है। इसी प्रकार सब ग्रहोंक मार्गकेन्द्रांश समझने चाहिये।

३. ३०घड़ीका दिन हो तो उस दिनके दोपहरमें बारह अङ्गुल शकुकी छायाका नाम ‘पलभा' है।

४. दीर्घ अक्षरके दस बार उच्चारणमें जितना समय लगता है, उतना काल १ असु (प्राण) कहलाता है। ६ असुका १पल और ६० पलकी १ घड़ी होती है। अतः चरासुमें ६ के भाग देकर, पल बनाकर दिनमान साधन करना चाहिये।

५. क्रान्ति बनाने में अयनांश जोड़ना होता है, इसलिये १३२ वें श्लोकके अनुसार अयनांश-साधन किया जाता है। अहर्गण १८४६२३७ को ६०० से गुणा कर गुणनफल ११०७७४२२०० में युग-कुदिन १५७७९१७८२८ से भाग देनेपर लब्धि राश्यादि८।१२।४ हुई। इसके भुज २ । १२ । ४४ के अंशादि ७२ । ४४को ३ से गुणा कर गुणनफल २१८।१२ में १० से भाग देनेपर लब्धि अंशादि २१ । ४९ ॥ १२ यह अयनांश हुआ। इस अयनांशको स्पष्टसूर्य ७।४।५११२ में जोड़नेसे सायन सूर्य ७ । २६ ॥४०॥ २४ हुआ, इसका भुज १॥२६॥ ४० । २४ है और इस भुजकी ज्या २८७२ हुई। इस भुजज्याको परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल ४०१२१८४ में त्रिज्या से भाग देनेपर लब्धि क्रान्तिज्या हुई। इसकी चापकता ११११ के अंश १९।५१ क्रान्त्यंश हुए। इनको ९0 अंश में घटाने से शेष ७0।९

ग्रहलिप्सा भभोगाप्ता भानि भुक्त्या दिनादिकम् ॥१२०॥

रवीन्दुयोगलिप्ताभ्यो योगा भभोगभाजिताः।

गतगम्याश्च षष्टियो भुक्तियोगाप्सनाडिकाः॥१२१॥

अर्कोनचन्द्रलिसाभ्यस्तिथयो भोगभाजिताः ।

गता गम्याश्च षष्टिभ्यो नाइयो भुक्त्यन्तरोद्धृताः॥१२२॥

(पश्चाङ्ग-साधन-) ८०० कला एक-एक नक्षत्रका और ७२० कला एक-एक तिथिका भोगमान होता है। (अत: ग्रह किस नक्षत्रमें है, यह जानना हो तो) राश्यादि ग्रहको कलात्मक बनाकर उसमें भभोग (८००) के द्वारा भाग देनेसे जो लब्धि हो, उसके अनुसार अश्विनी आदि गत नक्षत्र समझने चाहिये। शेष कलादिसे ग्रहकी गतिके द्वारा उसकी गत और गम्यघटीको समझना चाहिये ॥१२०॥ उदयकालिक स्पष्टरवि और चन्द्रका योग करके उसकी कलामें भभोग (८००)-के द्वारा भाग देकर लब्धि-गत विष्कुम्भ आदि योग होते हैं। शेष वर्तमान योगको गतकला है। उसको ८०० में घट देनेसे गम्यकला होती है। उस गत और गम्यकलाको ६० से गुणा करके उससे रवि और चन्द्रको गति-कलाके योगसे भाग देनेपर गत और गम्यघटी होती है। ॥१२१।।

स्पष्टचन्द्रमें स्पष्टसूर्यको घटाकर शेष राश्यादिको कला बनाकर उसमें तिथिभोग (७२०)-से भाग देनेपर लब्धि गततिथि संख्या होती है। शेष वर्तमान तिथिकी गतकला है। उसको ७२० में घटानेसे गम्यकला होती है। बात और गम्यकलाको पृथक् ६० से गुणाकर चन्द्र और रविके स्पष्ट गत्यन्तरसे भाग देकर लब्धि-क्रमसे भुक्त (गत) और गम्य घटी होती हैं। (पञ्चाङ्ग में वर्तमान तिथिके आगे गम्यघटी लिखी जाती है)॥१२२।।

क्रान्तिका कोटिचाप हुआ। इसकी ज्या ३२३३ हुई, इसको घुज्या कहते हैं।

गोरखपुरकी पलभा ६ के वर्ग ३६ को १२ के वर्ग १४४ में जोड़नेसे १८० हुआ। इसका मूल स्वल्पान्तरसे १३+१ पलकर्ण हुआ। क्रान्तिज्या ११६७ को पलभा ६ से गुणा कर गुणनफल ७००२ में १२ से भाग देनेपर लब्धि स्वल्पान्तरसे ५८३ कुज्या हुई। इसको त्रिज्या ३४३८ से गुणा कर गुणनफल २००४३५४ में छुज्या ३२३३ से भाग देनेपर लब्धि ६२० चरज्या हुई। इसका चाप ६२६ यह चरासु हुआ, इसमें ६ से भाग देनेपर लब्य चरपल १०४ हुए: इनकी घड़ी १।४४ हुई। इसको सायनसूर्यके दक्षिणगोलमें रहनेके कारण १५ घड़ीमें घटानेसे १३ ॥ १६ यह दिनार्ध और चरको १५ घड़ीमें जोड़नेसे रायर्ध १६ । ४४ हुआ। दिनार्धको दूना करनेसे घट्यादि २६ । ३२ दिनमान हुआ तथा राज्यर्धको दूना करनेसे ३३ । २८ रात्रिमान हुआ।

१. उदाहरण-जैसे स्पष्टचन्द्रमाकी गति ८१९, राश्यादि २।।१५। २५ है, तो इसको कलात्मक बनानेसे ४२१५ । २५ हुई। कलामें ८०० के द्वारा भाग देनेसे लब्धि ५ हुई यह गत नक्षत्र अश्विनीसे ५ वें मृगशिराका सूचक है। शेष २१५। २५ यह वर्तमान आर्द्रा नक्षत्रकी गतकला हुई। इसको भभोग (८००)-में घटानेसे शेष ५८४ | ३५ यह आर्द्राको गम्यकला हुई। इस प्रकार उदयकालिक चन्द्रकलासे नक्षत्रकी गम्यकलाद्वारा त्रैराशिकसे नक्षत्रको गम्यघटी साधनकर पञ्चाङ्गमें लिखी जाती है। राशिक इस प्रकार है- यदि चन्द्रगतिकलामें ६० घड़ी तो गत, गम्यकलामें क्या? इसका उत्तर आगे श्लोक १२२ की टिप्पणीमें देखिये, तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण-इन ५ को पञ्चाङ्ग कहते हैं। स्पष्टचन्द्रमासे उक्त रीतिद्वारा साधित नक्षत्र ही पञ्चाङ्गोपयोगी नक्षत्र होता है। अर्थात् वही नक्षत्र पञ्चाङ्ग में लिखा जाता है।

२. योग-साधनस्पष्टसूर्य और चन्द्रमाके योग ७१२९५७। ४० की कला १४३९७। ४० में ८०० से भाग देनेपर लब्धि १७ गत योग व्यतीपात हुआ; शेष ७९७।४0 यह वर्तमान वरीयान् योगका भुत्क हुआ इसको ८00 कलामें घटानेसे शेष २।२0 वरीयान् का भोग्य हुआ। उपर्युक्त विधिसे भुत्क और भोग्य २।२0 कलाको पृथक्-पृथक् ६0 घड़ी से गुणा कर गुणनफलमें सूर्य और चन्द्रमाकी गतिके योग से भाग देनेपर लब्धि क्रमशः भुत्क घड़ी-पल और भोग्य घड़ी-पल हुई।

जैसे आर्द्रा नक्षत्रकी गम्यकला है तो उसको से गुणा करने से गुणनफल में चन्द्रगतिकला से भाग देनेपर लब्धि घट्यादि यह आर्द्राका गम्य(उदय से आगे का) मान हुआ।

तिथि-साधन-यदि उदयकालमें चन्द्रमा सूर्य चन्द्रगति सूर्य-गति

तिथयः शुक्लप्रतिपदो याता द्विना नगोद्धताः।

शेष बबो बालवश्च कौलवस्तैतिलो गरः॥१२३॥

वणिजश्च भवेद्विष्टिः कृष्णभूतापरार्द्धतः।

शकुनि गश्च चतुष्पदः किंस्तुलमेव च ॥१२४॥

(तिथिमें करण जाननेकी रीति-)

शुक्लपक्षको प्रतिपदादि गत-तिथि-संख्याको दूना करके ७ के द्वारा भाग देनेसे १ आदि शेषमें

क्रमसे १ बव, २ बालव, ३ कौलव, ४ तैतिल, ५ गर, ६ वणिज, ७ विष्टि (भद्रा)-ये करण वर्तमान तिथिके पूर्वार्धमें होते हैं । (ये ७ करण शुक्ल प्रतिपदाके उत्तरार्धसे कृष्ण १४ के पूर्वार्धतक (२८) तिथियों में ८ आवृत्ति कर आते हैं। इसलिये ये ७ चर करण कहलाते हैं। कृष्णपक्ष १४ के उत्तरार्धसे शुक्ल प्रतिपदाके पूर्वार्धतक, क्रमसे १ शकुनि, २ नाग, ३ चतुष्पद और ४ किंस्तुघ्न- ये चार स्थिर करण होते हैं ॥ १२३ १२४॥

शिलातलेऽम्बुसंशुद्धे बज्रलेपेऽपि वा समे।

तत्र शङ्कवङ्गुलैरिष्टः समं मण्डलमालिखेत्॥१२५ ॥

तन्मध्ये स्थापयेच्छाएं कल्पनाद्वादशाङ्गुलम्।

तच्छायाग्रं स्पृशेद्यत्र वृत्ते पूर्वापरार्द्धयोः ॥ १२६ ॥

तत्र विन्दु विधायोभौ वृत्ते पूर्वापराभिधौ।

तन्मध्ये तिमिना रेखा कर्तव्या दक्षिणोत्तरा॥१२७॥

याम्योत्तरदिशोमध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमा।

दिमध्यमत्स्यैः संसाध्या विदिशस्तदेव हि ॥१२८ ।।

चतुरस्त्रं बहिः कुर्यात् सूत्रैर्मध्याद्विनिःसृतैः।

भुजसूबाङ्गुलैस्तत्र दत्तैरिष्टप्रभा स्मृता ॥१२९॥

प्रापश्चिमाश्निता रेखा प्रोज़्यते सममण्डले।

उन्मण्डले च विषुवन्मण्डले परिकीर्त्यते॥१३०॥

रेखा प्राच्यपरा साध्या विषुवद्भाग्रगा तथा।

इष्टच्छायाविषुवतोर्मध्यमग्राभिधीयते ॥ १३१॥

(दिक्साधन-) जलसे संशोधित (परीक्षित) शिलातल या बज्रलेप (सीमेंट) से सम बनाये हुए भूतलमें जिस अङ्गुलमानसे शंकु बनाया गया हो, उसी अङ्गुलमानसे अभीष्ट त्रिज्याङ्गलसे वृत्त बनाकर उसके मध्य (केन्द्र)-में समान द्वादश विभाग (कल्पित अङ्गुल)-से बने हुए शंकुको स्थापना करे। उस शकुकी छायाका अग्र भाग दिनके पूर्वार्ध में जहाँ वृत्त-परिधिये स्पर्श करे, वहाँ पश्चिम बिन्दु जाने और दिनके उत्तरार्धमें फिर उसी जी छायाका अग्रभाग जहाँ वृत्तपरिधिको स्पर्श करे, वहाँ पूर्व बिन्दु समझे। इस प्रकार पूर्व और पशिगम बिन्दुका ज्ञान करे। अर्थात् उन दोनों बिन्दुओंमें एक सरल रेखा खींचनेसे पूर्वापर रेखा होगी। उस पूर्वापर रेखाके दोनों अगोंको केन्द्र मानकर दो वृत्तार्थ बनानेसे मत्स्याकार होगा। उसके मुख एवं पुच्छमें रेखा करनेसे दक्षिणोत्तर- रेखा होगी। यह दक्षिणोत्तरेखा केन्द्रबिन्दुमें होकर जाती है। यह रेखा जहाँ वृत्तमें स्पर्श करे, वहाँ

५७।३६ है तो चन्द्रमा ६ । २४।१५। ३ में सूर्य १।५।४२ । ३७ को घटानेसे शेष ५ ॥१८॥ ३२ ॥ २६ की कला १०११२। २६ में ७२० से भाग देनेपर लब्धि १४ गत तिथि हुई: शेष ०।३२।२६ पूर्णिमाकी गत कलादि है। इसको छ२० कलामें घटानेसे शेष ६८७ । ३४ पूर्णिमाकी भोग्य कलादि हुई। गत कला ३२॥ २६ को ६० से गुणा कर गुणनफल १९४६ में चन्द्रमा और सूर्यको गत्यन्तरकला ७६१ । २४ से भाग देनेपर लब्ध घड़ी- -पल २।३३ पूर्णिमा तिथिका भुक्त हुआ। तथा भोग्य कला ६८७। ३४ को ६० से गुणाकर गुणनफल ४१२५४ में गत्यन्तरकला ७६१ । २४ से भाग देनेप लब्ध घट्यादि ५४ । १२ पूर्णिमा तिथिका भोग्य (सूर्योदयसे आगेका मान) हुभा।

१. जैसे शुक्लपक्षकी द्वादशीमें करणका ज्ञान प्राप्त करना है तो गत तिथि-सच्या ११ को दूना करने २२ हुआ। इसमें से भाग देनेपर शेष १ रहा। अत: द्वादशीके पूर्वार्धमें बव और जरार्धमें बालव नामक करण हुआ। कृष्ण पक्षकी तिथि संख्या में १५ जोड़कर तिथि-संख्या ग्रहण करनी चाहिये। अ कृष्ण पक्षको द्वादशीमें करण जानना हो तो गत तिथि-संख्या २६ को २ से गुणा करके गुणनफल ५२ में ७ से भाग देनेपर शेष ३ रहा। अत: द्वादशीके पूर्वार्धमें तीसरा कौलव और उत्तरार्धम चौथा तैतिल नामक करण हुआ।

२. तिथिमानका आधा करण कहलाता है । इसलिये एक-एक तिथिमें २,२ करण होते हैं। बवादि ७ चर करण और शकुनि आदि ४ स्थिर करण हैं।

दक्षिण तथा उत्तर दिशाके बिन्दु समझे। फिर इस दक्षिणोत्तर-रेखापर पूर्व-युक्तिसे मत्स्योत्पादनद्वारा पूर्वापर-रेखा बनावे तो यह रेखा केन्द्रबिन्दुमें होकर ठीक पूर्व और पश्चिम-बिन्दुका वृत्तमें स्पर्श करेगी। इस प्रकार चार दिशाओंको जानकर पुन: दो-दो दिशाओंके मध्यबिन्दुसे मत्स्योत्पादनद्वारा विदिशाओं (कोणों)-का ज्ञान करना चाहिये ॥१२५-१२८॥

(इस प्रकार वृत्तमें दिशाओंका ज्ञान होनेपर) वृत्तके बाहर चारों दिशाओंके बिन्दुओंसे स्पर्शरेखाद्वारा चतुरस्त्र (चतुर्भुज) बनावे। वृत्तके मध्यकेन्द्रसे भुजामुलतुल्य (भुजकी दिशामें उत्तर या दक्षिण) बिन्दुपर छायारेखा होती है। उस छायारेखाको पूर्वापर-रेखाके समानान्तर बनावे। पूर्वापर -रेखा, पूर्वापर-वृत्त, उन्मण्डल और नाडी वृत्तके धरातलमें होती है। इसलिये क्षितिज धरातलगत वृत्तके केन्द्रसे पूर्वापर रेखा खींचकर फिर पलभान बिन्दुगत पूर्वापरके समानान्तर रेखा बनावे। इस प्रकार इष्ट छायाग्रगत तथा पलभा रेखाके बीच (अन्तर) को 'अना' कहते हैं ॥१२९-१३२॥

शङ्कुच्छायाकृतियुतेर्मूलं कर्णोऽस्य वर्गतः।

प्रोझय शकुकृति मूलं छाया शङ्कुर्विपर्ययात् ॥१३२॥

शकु (१२)-के वर्गमें छायाके वर्गको जोड़कर मूल लेनेसे छायाकर्ण होता है और भयाकर्णके वर्गम शङ्कके वर्गको घटानेसे मूल शाया होती है तथा छायाके-घटानेसे मूल शइक होता है ॥१३२॥

त्रिंशत्कृत्वो युगे भानां चकं प्राक् परिलम्बते।

तगुणादिनक्ताद् घुगणासादवाप्यते ॥ १३३॥

तहोस्विजाहशाप्तांशा विज्ञेया अबनाभिधाः ।

तत्संस्कृतागुहारतान्तिचायाचरदलादिकम् ॥ १३४॥

 (अयनांश-साधन-) एक युगमें राशिचक्र सृष्ट्यादि स्थानसे पूर्व और पश्चिमको ६०० बार चलित होता है। जो उसके भगण कहलाते हैं। इसलिये अहर्गणको ६०० से गुणा करके युगके कुदिनसे भाग देकर राश्यादि फलसे भुज बनावे। उस भुजको ३ से गुणा करके १० के द्वारा भाग दे तो लब्धि अयनांश होती है। इस अयनांशको अहर्गणद्वारा साधित ग्रहमें जोड़कर क्रान्ति, छाया और चरखण्ड आदि बनाने चाहिये' ॥१३३-१३४।।

शंकुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते।

लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा ॥१३५ ॥

स्वाक्षार्कापक्रमयुतिर्दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा।

शेषा नतांशा: सूर्यस्य तदाहुन्या च कोटिजा ॥१३६ ॥

शंकमानाङ्गलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम्।

कोटिज्यया विभज्याप्ते छायाकर्णावहर्दले ।। १३७॥

(लम्बांश और अक्षांश साधन-) शंकु (१२) और पलभाको पृथक् पृथक् त्रिज्यासे गुणा करके उसने पुलकणसे भाग देने पर लब्धि क्रमश: 'लम्बञ्चा' और 'अक्षज्या' होती है। दोनों के चाप बनानेसे 'लम्बांश' और 'अक्षांश' होते हैं। इनकी दिशा सर्वदा दक्षिण समझी जाती है ॥१३५ ॥

(सूर्य ज्ञानसे मध्याह्न-छाया साधन-) अपने अक्षांश और सूर्यके कान्यंश दोनों एक दिशाकी और हाँ तो योग करनेसे और यदि भिन्न दिशाके हों तो दोनोंको अन्तर करनेसे शेष सूर्यका 'नतांश' होता है। उस 'नतांश' की 'भुजज्या' और 'कोरिया' बताते। भुजज्या और बच्चाको पृथक पृथक शङ्कमान (१२) से गुणा करके उसमें कोटिज्यास भाग देनेरल मश: मध्याहकाल पाया और आकर्षक मानका

१. क्योंकि शंकुकोटि, छायाधुज और इन्हीं दोनोंके वर्गयोगका मूल छायाकर्ण कहलाता है।

२. अयनांश-साधनका उदाहरण काल-साधनमें पहले बतलाया जा चुका है।

३. जैसे-१२ अङ्गुल शंकुको त्रिज्याका ३४३८ से गुणा कर गुणनफल ४१२५६ में पलकर्ण १३+ देनेपर लब्धि ३०७९ लम्बज्या हुई, इसकी चापकला ३८१४ में ६० से भाग देनेपर अंशादि ६३ । ३४ लम्ब इसको ९० अंशमें घटानेसे २६ । २६ अक्षांश हुआ।

सूचक होती है ॥१३६-१३७ ॥

स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा।

दिग्भेदेऽपक्रमः शेषस्तस्य ज्या त्रिज्यया हता॥१३८॥

परमापक्रमज्यासा चापं मेषादिगो रविः ।

कादौ प्रोझय चक्रार्द्धात्तु लादौ भार्धसंयुतात्॥१३९ ॥

मृगादौ प्रोझय चक्रातु मध्याह्नेपर्कः स्फुटो भवेत्।

तन्मान्दमसकृद्वामं फलं मध्यो दिवाकरः ॥१४०॥

(मध्याह्न-छायासे-सूर्यसाधन-) अपने 'अक्षांश' और मध्याहकालिक सूर्यके 'नतांश' दोनों एक दिशाके हों तो अन्तर करनेसे और यदि भिन्न दिशाके हों तो योग करनेसे जो फल हो, वह सूर्यकी 'क्रान्ति' होती है। 'क्रान्तिज्या' को त्रिज्या से गुणा करके उसमें 'परमक्रान्तिज्या ' (१३९७)-से भाग देनेपर लब्धि सूर्यको 'भुजज्या' होती है। उसके चाप बनाकर मेषादि ३ राशिमें सूर्य हों तो वही स्पष्ट सूर्य होता है। कर्कादि ३ राशिमें हों तो उस चापको ६ राशिमें घटानेसे, तुलादि ३ राशिमें हों तो ६ राशिमें जोड़नेसे और मकरादि ३ राशिमें हों तो १२ राशिमें घटानेसे जो योग या अन्तर हो, वह मध्याह्नमें स्पष्ट सूर्य होता है। उस स्पष्ट सूर्यसे विपरीत, क्रियाद्वारा मन्दफलसाधन कर बार-बार संस्कार करनेसे मध्यम सूर्यका | ज्ञान होता है ॥ १३८-१४० ।।

ग्रहोदयाप्राणहता खखाटकोद्धृता गतिः ।

चक्रासवो लब्धयुताः स्वाहोरात्रासवः स्मृताः॥१४१॥

(ग्रहोंके अहोरात्र-मान-) जिस राशिमें तत्काल ग्रह हो, उस राशिके उदयमानसे उस ग्रहकी गतिको गुणा करके उसमें १८०० से भाग देकर लब्ध असुको 'अहोरात्रासु' (२१६००)- में जोड़नेपर उस ग्रहका अहोरात्रमान होता है। (असुसे पल और घड़ी बना लेनी चाहिये।) ।। १४१ ॥

यदि मध्याकालिक राश्यादि ०।९।५१ सायन सूर्य है तो उस दिन गोरखपुरमें मध्याह्रकालिक छायाका प्रमाण क्या होगा?

उत्तर-सायन सूर्य ०।९।५१ की भुजकला ५९१ की ज्या ५८७ को परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणनफल ८२००३९ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेसे लब्धि सूर्यको क्रान्तिज्या २३८ कलाका चाप भी स्वल्पान्तरसे इतना ही हुआ। अतः इसके अंश बनानेसे ३ । ५८ यह सूर्यको अंशादि क्रान्ति सूर्यके उत्तर गोलमें होनेके कारण उत्तरकी हुई। अत: अक्षांश २६ । २६ और क्रान्त्यंश ३।५८ का अन्तर करनेसे २२ । २८ यह नतांश हुआ। इसको ९० अंशमें घटानेसे नतांशकी कोटि ६७।३२ हुई। नांशको भुजज्या १३०८ और कोटिज्या ३१७८ हुई। भुजज्या १३०८ को १२ से गुणा कर गुणनफल १५६९६ में कौटिज्यासे भाग देनेपर लब्धि स्वल्पान्तरसै ५ अङ्गुल मध्याह्रकालिक छायाका प्रमाण हुआ।

२. गोरखपुरमें सायन मेष-संक्रान्तिके बाद वैशाख कृष्णपक्षमें यदि मध्याह्नके समय १२ अङ्गुल शंकुकी छाया ५ अङ्गुल उत्तर दिशाकी है तो उस दिन राश्यादि स्पष्ट सूर्य क्या होगा?

उत्तर-छाया ५ के वर्ग २५ में शंकु १२ का वर्ग ,४४ जोडनेसे १६९ हुआ। इसका वर्गमूल १३ छाया-कर्ण हुआ। छाया ५ को त्रिज्यासे गुणा करके गुणनफल ३४३८४५-१७१९० छाया व १३ का भाग देनेसे लब्धि १३२२ सूर्यको नतच्या हुई। इसका चाप १३५८ हुआ। इसको अंशात्मक बनानेसे २२।३८ सूर्यका नतांश हुआ। यह उत्तर छाया होनेके कारण दक्षिण दिशाका हुआ। अत: इसको गोरखपुरके अक्षांश २६ । २६ में घटानेसे ३ । ४८ यह सूर्यको क्रान्ति हुई, इसको कला २२८ की ज्या भी इतनी ही हुई। इस क्रान्तिज्या २२८ को विज्यासे गुणा करके गुणनफलमें परमक्रान्तिम्या १३९७ से भाग देनेपर लब्धि ५६१ सूर्यको भुजज्या हुई। इसकी चापकला ५६३ को अंशादि बनानेसे न ९। २३ राश्यादि सूर्य हुआ, यही मेषादि ३ राशिके भीतर होनेके कारण उस दिन मध्याहकालिक सायनसूर्य हुआ।

जैसे स्पष्ट सूर्य हो, उसकी गतिकला हो तो उसको मेषके स्वदेशोदयमान असुसे गुणा करके गुणनफल मे से भाग देनेपर लब्धि असु हुई। उसको अहोरात्रासु(२१६00) में जोड़ने से असु सूर्यके अहोरात्रका प्रमाण हुआ। इसका पल बनाने से अर्थात् नाक्षत्र अहोरात्रसे सूर्यका

विभाकर्णार्द्धगुणाः स्वाहोरात्रार्द्धभाजिताः।

क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्चापानि पृथक् पृथक् ॥१४२॥

स्वाधोऽधः प्रविशोध्याथ मेषाल्लङ्कोदयासवः ।

खागाष्टयोऽर्थगोऽगैका: शरत्र्यकहिमांशवः ॥१४३॥

स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः ।

व्यस्ता व्यस्तैर्युताः स्वैः स्वैः कर्कटाद्यास्ततस्वयः ॥१४४॥

उत्क्रमेण षडेवैते भवन्तीष्टास्तुलादयः ।

राशियोंके उदयमान–१ राशि, २ राशि, ३ राशिको ज्याको पृथक्-पृथक् 'परमाल्पाज्या' (परमक्रान्तिकी कोटिज्या)-से गुणा करके उसमें अपनी-अपनी धुज्या (क्रान्तिकोटिज्या) से भाग देकर लब्धियोंके चाप बनावे। उनमें प्रथम चाप मेषका उदय (लोदय) मान होता है। प्रथम चापको द्वितीय चापमें घटानेपर शेष वृषका उदयमान होता है एवं द्वितीय चापको तृतीय चापमें घटाकर जो शेष रहे, वह मिथुनका लङ्कोदयमान होता है। यथा-१६७० असु मेषका, १७९५ वृषका तथा १९३५ मिथुनका सिद्ध लङ्कोदयमान है । इन तीनोंमें क्रमसे अपने देशीय तीनों चरखण्डोंको घटावे तो क्रमशः तीनों अपने देशके मेष आदि तीन राशियोंक उदयमान होते हैं। पुनः उन्हीं तीनों लोदयमानोंको उत्क्रमसे रखकर-इन तीनोंमें अपने देशके तीनों चर रण्डोंको उत्क्रमसे जोड़नेपर कर्क आदि ३ राशिक्षक स्वदेशोदयमान होते हैं एवं मेषादि कन्यापर्यन्त ६ राशियोंके उदयमान सिद्ध होते हैं। पुनः ये ही उत्क्रपसे तुलादि ६ राशियोंके मान होते हैं ॥ १४२५४४६॥

गतभोग्यासव: कार्याः सायनात् स्वेटभास्करात्।।१४५।।

अहोरात्र ७ पल अधिक हुआ। इसी प्रकार सब ग्रहों के अहोरात्रमान समझे।

१. राशियोंके लङ्कोदयमान-साधनका उदाहरण-एक राशि (१८०० कला)-को ज्या १७१९ उसकी धुञ्या ३३५१ तथा परमाल्पाज्या ३१३९ कला है तो एक राशिज्या १७१९ को परमाल्पाज्या ३१३९ से गुणा करके गुणनफल ५३९५९४१ में एक राशिकी युज्या ३३५१ से भाग देकर लब्धि एक राशि उदयज्या १६१० हुई। इसका चाप मेषका उदयासु स्वल्पान्तरसे १६७० हुआ। इसी प्रकार आगे अपनी-अपनी ज्या और धुज्यासे साधन करके राशियोंके उदयासु लिखे गये हैं। यथा-

ये उदयमान अनुसंख्यामें हैं। इनमें ६ के भाग देनेसे पलात्मक होते हैं। यथा-मेषोदयासु-१६७०, अतः मेषोदयपल - २७८ स्वल्पान्तरसे । एवं अन्य मान निम्राङ्कित चित्रमें देखिये।

२. उदाहरण-पलमान ६ हैं, वहाँ चरखण्ड-क्रमसे पलात्मक ६९। ४८ । २० हुए। इनको क्रम-उत्क्रमसे पलात्मक लट्ठोदयमें घटाने और जोड़नेसे ६ पलभादेशीय (स्वदेशोदय)-मान हुए। चक्रमें देखिये-

स्वोदयासुहता भुक्तभोग्या भक्ता: खवह्निभिः ।

अभीष्टघटिकासुभ्यो भोग्यासून्प्रविशोधयेत्।।१४६ ।।

तद्वदेवैष्यलग्नासूनेवं यातांस्तथोत्क्रमात्।

शेषं चेत् त्रिंशताभ्यस्तमशुद्धेन विभाजितम्॥१४७॥

भागयुक्तं च हीनं च व्ययनांशं तनुः कुजे।

लग्न-साधन-इष्टकालिक सायनांश सूर्यक भुक्तांश और भोग्यांशद्वारा 'भुक्तासु' और 'भोग्यासु' का साधन करना चाहिये। (यथा-भुक्तांशको सायन सूर्यके स्वदेशोदयमानसे गुणा करके ३० का भाग देनेपर लब्धि 'भुक्तासु' और भोग्यांशको स्वदेशोदयमानसे गुणा करके उसमें ३० के द्वारा भाग देनेपर लब्धि भोग्यासु' होते हैं। इष्ट घटीके 'असु' बनाकर उसमें भोग्यासु' को घटावे, घटाकर जो शेष बचे, उसमें अग्रिम राशियोंमेंसे जितनेके स्वदेशोदयमान घटें, उतने घटावे । (अथवा) इसी प्रकार 'इष्टासु' में 'भुक्तासु' घंटाकर शेषमें, गत राशियोंके उत्क्रमसे उनके जितने स्वदेशोदयमान घटें, घटावे। जिस राशितकका मान घट जाय, वहाँतक 'शुद्ध' और जिसका मान नहीं घटे, वह अशुद्ध' संज्ञक होती है। बचे हुए 'इष्टासु'को ३० से गुणा करके 'अशुद्ध' राशिके उदयमानसे भाग देकर लब्ध अंशादिको (भोग्य-क्रम-विधि हो तो) शुद्ध राशिसंख्यामें जोड़ने और (भुक्त-उत्क्रम-विधि हो तो) अशुद्ध राशिकी संख्या घटानेसे 'सायन लग्न' होता है। उसमें अयनांश घटानेसे फलकथनोपयुक्त उदयलग्र होता है ॥१४५१४७३ ।।

प्राक् पश्चान्त्रतनाडीभिस्तद्वल्लङ्कोदयासुभिः ॥१४८ ॥

भानौ क्षयधने कृत्वा मध्यलग्रं तदा भवेत्।

भोग्यासूनूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च ॥१४९॥

सपिण्ड्यान्तरलग्नासूनेवं स्यात्कालसाधनम्।

(मध्य-दशम लग्न-साधन-) इसी प्रकार पूर्व 'नतकालासु' से लङ्कोदयद्वारा अंशादि साधन करके उसको सूर्यमें घटानेसे तथा पश्चिम 'नतकालासु' और लङ्कोदयद्वारा (त्रैराशिकसे) अंशादि साधन करके सूर्यमें जोड़नेसे मध्य (दशम अरोशमध्य) लग्न होता है ॥ १४८३ ॥

(लग्न और स्पष्ट-सूर्यको जानकर इष्टकाल-

साधन-) लग्र और सूर्य इन दोनों में जो ऊन = (पीछे) हो, उसके 'भोग्यांश' द्वारा ‘भोग्यासु' और जो अधिक (आगे) हो उसके भुक्तांशद्वारा

१. जैसे-यदि कल्पित अयनांश १८। १० और सूर्य १।५।५२। ४० है तो उनका योग सायन सूर्य १॥ २२४। २।४० हुआ। इष्ट काल घड़ी-पल १०।२० है। अतः सूर्यके वृषराशि-भोग्यांश ५।५७।२० और इष्ट कालासु ३७२० हुए। सूर्यके भोग्यांश ५ ।५७।२० को वृषराशिके स्वोदयासु संख्या १५०७ से गुणा करनेपर ३७२० । ८५८९९।३०१४० को ६० से सवर्णन करनेपर ८९७५।१।२० हुआ। इसमें ३० का भाग देनेसे लब्धि २९९ । १० । ३ भोग्यासु हुई। इसको इष्टकालासु ३७२० में घटानेसे ३४२० । ४९ । ५७ हुआ। इसमें वृषके परवर्ती मिथुनके स्वोदयासु १८१५ को घटानेसे शेष १६०५ । ४९ । ५७ हुआ। इसमें कर्कका स्वोदयासु-२०५५ नहीं घटता है; इसलिये कर्कराशि अशुद्ध और मिथुन शुद्ध संज्ञक हुआ। शेष असु १६०५ । ४९।५७ को ३० से गुणा करनेपर ४८१७४ । ५८ । ३० हुआ। इसमें अशुद्ध कर्कके स्वोदयमान २०५५ का भाग देनेसे लब्ध अंशादि २३ । २६ । ३२ में शुलपशि (मिथुन) संख्या ३ जोड़नेसे ३ । २३ । २६ । ३२ हुआ। इसमें अयनांश १८।१० को घटानेसे २।५।१६ । ३२ लग्न हुआ।

लग्न बनाने में विशेषता यह है कि यदि सूर्योदयसे इष्टकालद्वारा लग्न बनाना हो तो सायन सूर्यके भोग्यांशद्वारा तथा इष्टकालको ६० घड़ीमें घटाकर शेषकालद्वारा बनाना हो तो सूर्यके भुक्तांशद्वारा ही उपयुक्त विधिसे लग्र बनाना चाहिये।

२ उदाहरण-यदि पूर्व 'नतकालासु' ३७५० और 'सायनसूर्य' ६ । ५। ४। १० है तो भुक-प्रकारसे और 'लकोदय' द्वारा दशम लग्रका साधन इस प्रकार होगा-सूर्यके 'भुक्तांश' ५।४।१० को तुलाराशिके 'लङ्कोदय' १६७० से गुणा करनेपर गुणनफल ८४६५ हुआ। इसमें ३० का भाग देनेसे भागफल २८२ सूर्यके भुक्तासु हुए। इनको 'नतकालासु' ३७५० में घटानेसे शेष ३४६८ रहा। उसमें सूर्यसे पीछेकी कन्याराशिके लङ्कोदयासु १७९५ को घटानेपर शेष १६७३ रहा। इसमें सिंहका लड्रोदयासु १७९५ नहीं घटता है, अतः यह सिंह अशुद्ध संज्ञक हुआ। अब शेष असु १६७३ को ३० से गुणा करके गुणनफल में अशुद्ध उदयासु का भाग देनेसे लब्ध अंशादि हुए। इनको अशुद्ध राशि-संख्या में घटानेपर शेष सायन दशम लग्न हुआ।

'भुक्तासु' साधनकर दोनोको जोड़े तथा उसमें उन दोनों (लग्न और सूर्य)-के' बीचमें जो राशियाँ हों, उनके उदयासुओंको जोड़े तो 'इष्टकालासु' होते हैं२ ॥ १४९३॥

बिराहर्कभुजांशाशेदिन्द्राल्पाः स्याद्गहो विधोः ।। १५० ।।

तेंऽशाः शिवताः शैलाता व्यग्वकांशः शरोऽङ्गलैः ।

अकै विधुर्विधुं भूभा छादयत्यथ छन्नकम् ॥ १५१ ।।

छायच्छादकमानार्थं शरोनं ग्राह्यवर्जितम्।

तत खच्छन्नं च पाक्यार्ध शराढ्यं दशाहतम्॥१५२॥

छत्रप्रमस्मान्मूलं तु स्वाङ्गोनं गलौवपुर्हतम्।

स्थित्यर्द्ध घटिकादिस्याव्यगुवाशसमितेः ॥१५३॥

इष्टः पलैस्तदूनावं व्यगावूनेऽकंषडगृहात्।

तदन्यथाधिके तस्मित्रे स्पष्टे मुखात्यगे॥१५४॥

(ग्रहण-साधन-) पर्वान्त कालमें स्पष्ट सूर्य, चन्द्र और राहुका साधन करे। सूर्यमें राहुको -घटाकर जो शेष बचे, उसके भुजांश यदि १४ से अल्प हो तो चन्द्रग्रहण की सम्भावना समझे ॥१५०॥ । उन भुजार्थीको ११ से गुणा कर ७ से भाग देनेपर

१. यहाँ आगे रहनेवाला अधिक और पीछे रहनेवाला ऊन समझा जाता है। एवं दोनोंके अन्तर ६ राशिसे अल्पवाला ग्रहण करना चाहिये। यदि सूर्य अधिक रहे तो रात्रि शेष इष्टकाल समझना चाहिये।

२. उदाहरणार्थ प्रश्न-यदि सायनसूर्य १ ॥ २४॥ ४५। और सायन लग्न ३।५।२०।३० है तो इष्टकाल क्या होगा?

उत्तर-यहाँ लग्न अधिक है, इसलिये लग्नके भुक्तांश ५। २० । ३० को कर्कराशिके 'स्वदेशोदयासु' २०५५ से गुणा करनेपर गुणनफल १०९७७ हुए। उसमें ३० का भाग देनेपर ३६५ । ५४-३६६ लाके 'भुक्तासु' हुए। तथा सूर्यक भोग्यांश ५ । १५1० को वृषराशिके 'स्वदेशोदयासु' १५०७ से गुणा कर गुणनफल ७९११ में ३० से भाग देनेपर लब्ध सूर्यके भोग्यासु २६४ हुए। लग्नके भुक्तासु' ३६६ और सूर्यके 'भोग्यासु' २६४ के योग ६३० में मध्यकी राशि मिथुनके 'स्वदेशोदयासु' १८१५ जोड़नेसे २४४५ 'इष्टकालासु' हुए। इनमें ६ का भाग देनेपर लब्धि पल ४०७।३० हुए। इनमें ६० का भाग देनेपर लब्ध घट्यादि ६।४७ । ३० सूर्योदयसे इष्टकाल हुआ।

३. चन्द्रग्रहणमें पूर्णिमा और सूर्यग्रहणमें अमावास्या पर्व कहलाता है।

४. सूर्य और चन्द्रग्रहणका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-ग्रह जिस मार्ग में घूमता हुआ पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करता है, वह (मार्ग) उस ग्रहको कक्षा कहलाता है। पृथ्वीसे सूर्यको कक्षा दूर और चन्द्रकी कक्षा समीप है। इसलिये सूर्य और पृथ्वीके बीचमें ही चन्द्रमा घूमता रहता है। जिस दिशामें सूर्य रहता है, उससे विरुद्ध या सामनेकी दिशामें पृथ्वीको छाया रहती है। जिस प्रकार सूर्य घूमता है, उसी प्रकार उक्त छाया भी घूमती है और उसकी लंबाई चन्द्रकक्षासे आगेतक बढ़ी हुई होती है। पृथ्वी गोल होनेके कारण चन्द्रकक्षामें पृथ्वीकी छाया भी गोलाकार ही होती है। वह सूर्यसे सर्वदा ६ राशिपर ही घूमती रहती है। चन्द्रमा अपनी कक्षा में घूमता हुआ जब सूर्यके साथ एक दक्षिणोत्तर रेखामें स्थित होता ह

लब्धि-अङ्क अङ्गुलादि 'शर' होता है ॥ १५०३ ॥

सूर्यको चन्द्रमा और चन्द्रमाको भूभा (पृथिवीकी छाया) छादित करती है। इसलिये सूर्यग्रहणमें सूर्य छाद्य और चन्द्रमा छादक तथा चन्द्रग्रहणमें चन्द्रमा छाद्य, भूभा छादक (ग्रहणकी) है- ऐसा समझना चाहिये। अब छन्न (ग्रास) मान कहते हैं-छाद्य और छेदकके विम्बमानका योग करके उसके आधेमें 'शर' घटानेसे 'छन्न' (ग्रास) मान होता है। यदि ग्रासमान ग्राह्य (छाद्य)-से अधिक हो तो उसमें छाद्यको घटाकर जो शेष बचे, उतना खच्छन्न (खग्रास) समझना चाहिये।

मानैक्यार्ध (छाद्य-छादकके विम्ब-योगार्ध)

ऊपरी भागमें सूर्यको किरणे पड़ती हैं (नीचेके भागमें जिसे हम देखते हैं, नहीं)। यही कारण है कि अमावास्याके दिन हमें चन्द्रमाका दर्शन नहीं होता है। रात्रिमें सूर्यके साथ ही चन्द्रमा भी पृथ्वीके नीचे चला जाता है। जिस अमावास्याको पृथ्वी और सूर्यके मध्यमें चन्द्रमा आ जाता है, उस दिन उससे आच्छादित होकर सूर्यका विम्ब अदृश्य हो जाता है; ठीक उसी तरह, जैसे मेघोंके खण्डसे आवत होनेपर वह अदृश्य होता है। इस प्रकार चन्द्रविम्बसे जब सूर्यका सम्पूर्ण या न्यूनाधिक भाव अदृश्य होता है तो क्रमशः उसे 'सर्वग्रास' या 'खण्ड सूर्यग्रहण' कहते हैं। खण्ड सूर्यग्रहणका दृश्य सूर्यग्रहण पर्वमान चन्द्रमा अमावास्यामें चन्द्रमाकी छाया पृथ्वीकी और होती है, उस छाया में जो भूभाग पड़ता है, उसके लिये सम्पूर्ण सूर्य-विम्ब अदृश्य हो जाता है, अतः वहाँ सर्वग्रास सूर्यग्रहण होता है; अन्यत्र खण्ड-ग्रास। चित्र देखिये। पुराणोंमें जो सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणमें राहु कारण बतलाया गया है, वह इस अभिप्रायसे है-अमृत-मन्थनके समय जब राहुका सिर काटकर अलग कर दिया गया, उस समय अमृत पीनेके कारण उसका मरण नहीं हुआ। वह एकसे दो हो गया। ब्रह्माजीने उन दोनोंमेंसे एक (राहु को चन्द्रमाको छाया में और दूसरे (केतु)- को पृथ्वीको छायामें रहनेके लिये स्था.. पुदया। अतः ग्रहण-समयमें राहु और केतु सूर्य और चन्द्रमाके समीप ही रहता है। अतः छायारूप राहु-केतुके द्वारा ही ग्रहणका वर्णन किया गया है।

१. मान लीजिये-पूर्णिमान्तकाल घट्यादि ४० । ४८ और उस समयका स्पष्ट सूर्य राश्यादि ८। । । १२ । ६. चन्द्रमा २१ 01 १२1१ तथा राहु ७।२८। २३ । १८ है तो स्पष्ट सूर्य ८1०।१२।६ में राहु ७॥ २८॥ २३ ॥ १८ को घटानेसे ०।१।४८॥ ४८ व्यगु हुआ; यह ३ राशिसे कम है, अतः इसका भुजांश इतना ही अर्थात् १६४८॥ ४८ हुआ। यह १४ अंशसे कम है, इसलिये ग्रहणकी सम्भावना निश्चित हुई। व्यगुके भुजांश को से गुणा करके गुणनफल का भाग देनेपर भागफल शर हुआ। यह व्यगुके उत्तर गोलेमें होने के कारण उत्तर दिशाका हुआ।

यहाँ श्रीसनन्दन मुनिने चन्द्रादिके मध्यम विम्ब प्रसिद्ध होने से स्पष्ट विम्बका साधन-प्रकार नहीं कहा है। अतः

में शर जोड़कर १० से गुणा करे। फिर ग्रासमानसे गुणा करके गुणनफलका जो मूल हो उसमें अपना षष्ठांश घटाकर शेषमें चन्द्र-विम्बसे भाग देनेपर लब्धि प्राप्त घटी आदिको स्थित्य समझे। इस स्थित्यर्धको दो स्थानोंमें रखे। व्यगु (व्यग्वर्क राहु घटाया हुआ सूर्य) यदि ६ या १२ राशिसे ऊन हो तो द्विगुणित व्यगु भुजांशतुल्य पलको प्रथम स्थानगत स्थित्यर्धमें घटावे और द्वितीय स्थानवालेमें जोड़े। यदि व्यगु ६ या १२ से अधिक हो तो विपरीत क्रमसे (प्रथम स्थानमें जोड़ने और द्वितीय स्थानमें घटानेसे) स्पर्श और मोक्षकालिक स्पष्ट स्थित्यर्ध होते हैं ॥१५११५४।।

ग्रासे नखाहते छाद्यमानाप्ते स्युर्विशोपकाः ।

पूर्णान्तं मध्यमत्र स्याद्दर्शान्तेऽङ्गं त्रिभोनकम्॥१५५ ॥

पृथक्तत्क्रान्त्यक्षभागसंस्कृतौ स्युर्नतांशकाः ।

तद् द्विद्वयंशकृतिर्द्विनी द्वयूनार्धायुता हरः॥ १५६ ॥

त्रिभोनाङ्गार्कविश्लेषांशाशोनघ्नाः पुरन्दराः ।

हराप्ता लम्बनं स्वर्ण वित्रिभेऽर्काधिकोनके॥१५७॥

विश्वनलम्बनकलाढ्योनस्तु तिथिवव्यगुः ।

शरोऽतो लम्बनं षड्ज़ तल्लवाढ्योनवित्रिभात्॥१५८॥

नताशास्तद्दशांशोनना धृत्यस्तद्विवर्जितैः ।

साष्टेन्देलिनैः षड्भिस्तु भक्ता नतिर्नतांशदिक्॥१५९॥

तयोनाढ्यो हि भिन्नैकदिक् शरःस्फुटतां व्रजेत् ।

ततश्छन्नस्थितिदले साध्ये स्थित्यर्धषड्ढतिः ।। १६०॥

अंशास्तैर्वित्रिभं द्विष्ट रहितं सहितं क्रमात्।

विधाय ताभ्यां संसाध्ये लम्बने पूर्ववत्तयोः ।। १६१॥

पूर्वोक्त संस्कृते ताभ्यां स्थित्यन्ढे भवतः स्फुटे।

ताभ्यां हीनयुतो मध्यदर्शः कालौ मुखान्तगौ ।।१६२॥

(ग्रहणका विंशोपक (बिस्वा) फल-)

अङ्गुलादि ग्रासमानको २० से गुणा करके गुणनफलमें अङ्गुल सक छाद्यमानसे भाग दें, जो लब्धि आवे,वह विशीषक फल होता है।

'सूर्यकी गतिको २ से गुणा करके गुणनफलमें ११ से भाग देनेपर जो लब्धि आवे, उतना ही सूर्यका अङ्गुलादि विम्बमान होता है तथा चन्द्रमाको गतिकलामें ७४ से भाग देनेपर जो लब्धि हो, उतने अङ्गुलादि चन्द्रविम्बका मान होता है। चन्द्रमाको गतिमें ७१६ घटाकर शेषमें २२ से भाग देनेपर लब्धिको ३२ में जोई; फिर उसमें सूर्यगतिके सप्तमांशको घटानेसे भूभा (पृथ्वीको छाया) होती है।" यथा-स्पष्ट सूर्यगति ६१ ॥ ११ और चन्द्रगति ८२४ । ५ है तो उक्त रीतिसे सूर्यगतिक द्विगुणित १२२ । २२ में ११ से भाग देनेपर भागफल १९१७ सूर्यविम्ब हुआ। तथा चन्द्रगति ८२४ । ५ में ७४ से भाग देनेषर भागफल ११।८ चन्द्रविम्ब हुआ। चन्द्रगति ८२४।५ में ७१६ घटाकर शेष १०८।५ में २२ से भाग देनेपर लब्धि ४१५५ में ३२ जोड़नेसे ३६१५५ हुआ। इसमें सूर्यगति ६१।११ का सप्तमांश ८।४४ घटानेसे शेष २८ । ११ भूभाका विम्ब हुआ। अब छाद्य (चन्द्र) और छादक (भूभा)-के विम्बके योग १११८२८।११-३९॥ १९ के आधे १९ । ३९ में पूर्वसाधित शर २। ५० को घटानेसे शेष १६ । ४९ ग्रासमान हुआ; यह छाद्य (चन्द्र) विम्बसे अधिक है, अत: इसमें चन्द्रविम्ब ११८ को घटानेसे शेष ५।४१ खग्रास हुआ।

१. स्पर्शकालसे मोक्षकालका जो अन्तर है, उसे स्थिति कहते। अत: उसका आधा मध्यम स्थित्यर्थ कहलाता है। स्पर्शकालसे मध्यकालतक स्पर्शस्थित्यर्ध और मध्यकालसे मोक्षकालतक मोक्षस्थित्यधं कहलाता है।

२. जैसे-छाद्य (चन्द्र) और छादक (भूभा)-के विम्बयोग ३९॥ १९ के आधे १९ । ३२ में शर २।५० को जोड़नेपर २२ । २९ हुआ; इसको १० से गुणा करनेसे गुणनफल २२४। ५० को ग्रासमान १६ । ४९ से गुणा करनेपर ३७८०१५६/५० हुआ। इसके मूल ६१ ॥ २९ में अपने ही षष्ठांश १०।१५ को घटानेपर शेष ५१ ॥ १४ में चन्द्रमाके विम्ब ११३८ का भाग दिया तो लब्धि घट्यादि पल ४। ३६ स्थित्यर्ध हुआ। व्यगुभुजांश १ । ४८।४८ को २ से गुणा करनेपर गुणनफल ३।३७ । ३६ पल अर्थात् स्

 (सूर्यग्रहणमें विशेष लम्बन-घटी-साधन-) पर्वान्तकालमें ग्रहणका मध्य होता है। सूर्यग्रहणमें दर्शान्त कालिक लग्न बनाकर उसमें तीन राशि घटानेसे 'वित्रिभ' या 'त्रिभोन' लग्न कहलाता है। उसको पृथक् रखकर उसकी क्रान्ति और अक्षांशके संस्कार (एक दिशामें योग, भिन्न दिशामें अन्तर) करनेसे 'नतांश' होता है। उसका २२ वाँ भाग करके वर्ग करना चाहिये। यदि २ से कम हो तो उसीमें, यदि २ से अधिक हो जाय तो २ घटाकर शेषके आधेको उसी (वर्ग)-में जोड़कर पुनः १२ में जोड़नेसे 'हार' होता है। 'त्रिभोन' लग्र और सूर्यके अन्तरांशके दशमांशको १४ में घटाकर शेषको उसी दशमांशसे गुणा करे। उसमें पूर्वसाधित हारसें भाग देनेपर लब्धितुल्य घट्यादि लम्बन होता है। यह (लम्बन) यदि वित्रिभ सूर्यसे अधिक हो तो धन, अल्प हो तो ऋण होता है। अर्थात् साधित दर्शान्तकालमें इस लम्बनको जोड़ने-घटानेसे पृष्ठस्थानीय दर्शान्तकाल होता है ।। १५५-१५७ ।।

घट्यादि लम्बनको १३ से गुणा करने पर गुणनफल कलादि होता है। उसको व्यग्वर्क में जोड़ या घटाकर 'शर' बनावे तो (पृष्ठीय -दर्शान्तकालिक) शर (स्पष्ट) होता है। तथा घट्यादि लम्बनको ६ से गुणा करके गुणनफलको अंशादि मानकर वित्रिभमें जोड़ या घटाकर नतांश-साधन करे। नाशके दशमांशको १८ में घटाकर शेषको उसी दशांशसे गुणा करे; गुणनफलको ६ अंश १८ कलामें घटाकर जो शेष बचे, उससे गुणनफलमें ही भाग / देनेसे लब्धि अङ्गुलादि नांशकी दिशाकी ही नति होती है। इस नति और पूर्व साधित शर दोनोंके संस्कार (भिन्न दिशा हो तो अन्तर, एक दिशा हो तो योग)-से स्पष्ट शर होता है। सूर्यग्रहणमें उसी शरसे और स्थित्यर्ध बनावे। स्थित्यर्धको ६ से गुणा करके अंशादि गुणनफलको वित्रिभमें घटावे और दूसरे स्थानमें जोड़े। इन दोनों परसे पूर्वविधिसे पृथक् लम्बनसाधन करके क्रमशः पूर्वविधिसे साधित स्पर्श और मोक्षकालमें संस्कार करनेसे स्पष्ट पृष्ठस्थानीय स्पर्श और मोक्षकाल होते हैं।॥१५८-१६२।।

अर्का घार विश्व ईशा नवपञ्चदशांशकाः।

कालाशा तनयुक्ते रची ह्यस्तोदयी विधोः ।।१६३ ।।

दृष्टा ह्यादौ खेटविष्वं दृगौच्यं लप्चमेक्ष्य च ।

है। यदि विंशोपक २० से कम हो तो कथित फल बलके अनुसार अल्प और २० से अधिक हो तो कथित फल अधिक होता है।

१. उदाहरण-जहाँ दक्षिण अक्षांश २५ । २६ । ४२, स्पष्ट दर्शान्त ले घड़ी-पल १३ | ४, दर्शान्तकालिक स्पष्ट सूर्य ८1५।२६ । २५, स्पष्ट चन्द्रमा ८1५।२६।२०, राहु २।११।४१ ॥१८, स्पष्ट सूर्यगति ६१ । १५ और स्पष्ट चन्द्रगति ७२६ । ३० है तो उक्त घटी-पलको इष्ट मानकर लग्र बनानेसे ११ । २ । ४६ १७ लग्न हुआ। इसमें ३ राशि घटानेपर त्रिभोन लग्र (वित्रिभ) ८।२।४६ । १७ हुआ। पूर्वोक्त रीतिके अनुसार साधन करनेपर इसकी क्रान्ति २३ । ३८।१० हुई; यह वित्रिभके दक्षिण गोलमें होनेके कारण दक्षिण दिशाकी हुई। अतः इसको दक्षिण दिशाके अक्षांश २५ । २६ । ४२ में जोड़नेपर ४९ ॥ ४ ॥५२ नतांश हुए। उक्त नताशके २२ वें भाग २। १३ । ५१ का वर्ग करनेपर ४।५८ हुआ, यह २ से अधिक है, इसलिये इसमें २ को घटानेपर शेष २१ ५८ हुआ। इसके आधे १।२९ को उसी वर्ग ४।५८ में जोड़नेसे ६१ २७ हुआ। इसे १२ में जोड़नेपर १८ । २७ 'हार' हुआ। तथा वित्रिभ लग्र ८।२। ४६ । १७ और सूर्य ८1५।२६ । २५ के अन्तरांश २।४०१८ का दशमांश ०।१६ हुआ। इसको १४ में घटानेपर शेष १३ । ४४ रहा। इसको उसी दशमांश ०।१६ से गुणा करनेपर गुणनफल-३।३९ हुआ। इसमें हार १८ । २७ का भाग देनेपर भागफल । ११ हुआ; यह (ग्यारह पल) लम्बन हुआ। सूर्यसे वित्रिभ अल्प होनेके कारण दर्शान्त घटी १३ । ४ में इस लम्बन २१ पलको घटानेसे पृष्ठस्थानीय घट्यादि दर्शान्तकाल १२ । ५३ हुआ। अब पठ्यादि । ११ लम्बनको १२ से गुणा किया तो गुणनफल । २३ कलादि हुआ। उक्त लम्बनके ऋण होनेके कारण सूर्य ८1५। २६ । २५ में राहु २।११ | ४१ । १८ का अन्तर करनेसे व्यग्वर्क ५१ २३ । ४५ / ७ हुआ।

तल्लम्बपातबिम्बान्तर्दृगौच्याप्तरविघ्नभा ॥१६४॥

(ग्रहोंके उदयास्तकालांश-) १२, १७, १३, ११, ९, १५ ये क्रमसे चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र और शनिके कालांश हैं। अपने-अपने कालांशतुल्य सूर्यसे पीछे ग्रह होते हैं तो अस्त और कालांशतुल्य सूर्यसे आगे होते हैं तो उदय होता है। (अर्थात् ग्रह अपने-अपने कालांशके भीतर सूर्यसे पीछे या आगे जबतक रहते हैं, तबतक सूर्य सानिध्यवश अस्त (अदृश्य) रहते हैं)॥१६३॥

(ग्रहों के प्रतिविम्बद्वारा छायासाधन-) सम भूमिमें रखे हुए दर्पण आदिमें ग्रहों के प्रतिविम्बको

इसमें २ । २३ कलादिको घटानेपर ५ ॥ २३ ॥ ४२ ॥ ४४ पृष्ठस्थानीय व्यावर्क हुआ। इसको ६ राशिमें घटानेपर शेष ०। ६।१७। १६ यही भुजांश हुआ। इसको पूर्वोक्त शर-साधन-विधिके अनुसार ११ से गुणा करके ७ का भाग देनेपर लब्ध अङ्गुलादि ९१५२ शर हुआ। यह व्यगुके उत्तर गोलमें (६ राशिसे कम) होनेके कारण उत्तर दिशाका हुआ।

फिर लम्बन 01११ को ६ से गुणा करनेपर गुणनफल अंशादि १ । ६ को (ऋणलम्बन होनेके कारण) वित्रिभ लग्न ८।२।४६।१७ में घटानेपर ८।१।४० । १७ हुआ। इससे क्रान्ति-साधन-विधिके अनुसार दक्षिण दिशाकी क्रान्ति २३ । ३४ । ३५ । हुई। इसको दक्षिण दिशाके अक्षांश २५ । २६ । ४२ में जोड़नेसे ४९ ॥ १ ॥१७ दक्षिण दिशाका पृष्ठस्थानीय (स्पष्ट) नतांश हुआ। इस नतांशमें १० का भाग देनेपर लब्ध कलादि ४।५४ को १८ घटानेसे शेष १३।६ रहा। इसको उक्त दशमांश ४।५४ से ही गुणा करनेपर ६४ । ११ कलादि हुआ; इसके अंश १ । ४ । ११ को ६ अंश १८ कलामें घटानेपर ५ । १३ । ४९ हुआ। इससे उपर्युक्त गुणनफल ६४ । ११ में भाग देनेपर लब्धि १२॥ १८ अङ्लादि नति हुई। दक्षिण नतांश होनेके कारण इसकी दिशा दक्षिण हुई और पूर्वसाधित अङ्गलादि शर ९ । ५२ यह उत्तर दिशाका है; अतः भिन्न दिशा होने के कारण दोनोंका अन्तर २ । २६ अङ्गुलादि स्पष्ट शर हुआ। इस स्पष्ट शरके द्वारा चन्द्रग्रहणकी भाँति ग्रासमान आदि साधन करनेके लिये सूर्यस्पष्ट गति ६१ । १५ को २ से गुणा कर गुणनफरतमें ११ का भाग देनेपर सूर्यविम्ब ११३८ हुआ और चन्द्रस्पष्ट गति ७२६ । ३० में ७४ का भाग देनेपर चन्द्रविम्ब ९।४९ हुआ। इन दोनोंका योगका आधा किया तो १०।२८ हुआ, उसमें स्पष्ट शर २ । २६ को घटानेपर शेष अङ्गुलादि ८।२ यह ग्रासमान हुआ। अब स्थिति-घटी-साधन करने के लिये सूर्य और चन्द्र के विम्बयोगार्थ १०।२८ में स्पष्ट शर २।२६ को जोड़नेपर योगफल १२ । ५४ हुआ। इसको १० से गुणा करनेपा गुणनफल १२९॥ ० को ग्रासमान ८।२ से गुणा किया तो

देखकर दृष्टिस्थानसे भूमिपर्यन्त लम्ब पातकर ष्टिकी ऊँचाईका मान समझे। लम्बमूल और प्रतिबिम्बके अन्तर-प्रमाणको दृष्टिकी ऊँचाईसे भाग देकर लब्धिको १२ से गुणा करनेपर उस समय उस ग्रहकी छायाका प्रमाण होता है ॥१६४॥

अस्ते सावयवा ज्ञेया गतैष्यास्तिथयो बुधैः।

शरेन्द्वाप्तोत्तराशा सा संस्कृतार्कापमैर्विधोः॥१६५॥

षोडशघ्नतिथिहीना स्वघ्नतिथ्याक्षभाहृता।

व्यस्तेषु क्रान्तिभागैश्च द्विघ्नतिथ्या हृता स्फुटम्॥१६६ ॥

संस्कारदिकं वलनमङ्गुलाद्यं प्रजायते।

स्वेष्वंशोना: सितंतिथ्यो वलनाशोत्रतं विधोः॥१६७॥

शृङ्गमन्यन्नतं वाच्यं वलनाङ्गुललेखनात्।

(चन्द्रभृङ्गोन्नति-ज्ञान-) सूर्यास्त-समयमें सावयव गत और एष्य तिथिका साधन करे। उस सावयव तिथिको १६ से गुणा करके उसमें तिथिके वर्गको घटाकर शेषको स्वदेशोय पलभासे गुणा करे। गुणनफलमें १५ से भाग देकर लब्धि (फल) की दिशा उत्तर समझे। उसमें सूर्यकी क्रान्तिका यथोक्त संस्कार (एक दिशामें योग, भिन्न दिशामें 'अन्तर) करे। तथा चन्द्रमाके शर और क्रान्तिका विपरीत संस्कार करके जो फल हो उसमें द्विगुणित तिथिसे भाग देनेपर जितनी लब्धि हो, उतना अङ्गुल संस्कार-दिशाका वलन होता है। चन्द्रमासे जिस दिशामें सूर्य रहता है, वही संस्कारकी दिशा समझी जाती है। तिथिमें अपना पञ्चमांश घटानेसे शुक्ल (चन्द्रके श्वेत भाग)-का अमुलादि मान होता है। वलनकी जो दिशा होती है, उस दिशाका चन्द्रशृङ्ग उन्नत और अन्य दिशामें नत होता है। तदनुसार परिलेख करना चाहिये ॥ १६५-१६७॥

पञ्चवंगाङ्गवशिखाः कर्णशेषहताः पृथक्॥१६८॥

प्रकृत्याङ्गिसिद्धाग्निभक्ताः लब्धोनसंयुताः।

त्रिज्याधिकोने श्रवणे वपूंषि त्रिहताः कुजात्॥१६९॥

ऋञ्चोरनवोर्विवरं गत्यन्तरविभाजितम्।

वक्रोंगतियोगाप्तं गम्येऽतीते दिनादिकम्॥१७०॥

स्वनत्या संस्कृतौ स्वेषू दिक्साम्येऽन्येऽन्तरं युतिः ।

याम्योदक्खेटविवरं मानक्यार्धाल्पकं यदा॥१७१ ॥

तदा भेदो लम्बनाद्यं स्फुटार्थ सूर्यपर्ववत्।

(ग्रहयुति-ज्ञानार्थ मङ्गलादि पाँच ग्रहोंके विम्बसाधन-) मङ्गलादिके ५, ६, ७, ९, ५ इन मध्यमविम्बमानोंको क्रमसे मङ्गलादि ग्रहोंके कर्णशेष विज्या और अपने-अपने शीघ्र कर्णके अन्तर)-से गुणा करके गुणनफलको २ स्थानोंमें रखे। एक स्थानमें क्रमसे मङ्गलादि ग्रहके २१,

१. उदाहरण-यदि समभूमिसे लम्बमान (दृष्टिकी ऊँचाई) ७२ अङ्गुल और द्रष्टा तथा प्रतिविम्बका अन्तर भूमिमान ९६ अङ्गुल है, तो उक्त रीतिके अनुसार भूमिमान ९६ को दृष्टिकी ऊँचाई ७२ से भाग देकर १२ से गुणा ७२ -१६ अबुल छायाप्रमाण हुआ।

इस प्रकार रात्रिमें मङ्गलादि ग्रहोंकी छायाका प्रमाण समझा जाता है, जो ग्रहयुति आदिमें उपयुक्त होती है।

२. उदाहरण-शुक्लपक्षको द्वितीयामें सायंकालिक चन्द्रमाकी शृङ्गोत्रति जाननेके लिये मान लीजिये उस समयकी सावयव (घड़ीसहित) तिथि २।३०, सूर्यकी उत्तरक्रान्ति १०, चन्द्रमाका उत्तर शर ५ और चन्द्रमाकी उत्तर क्रान्ति ६ हो तो कथित रोतिसे सावयव तिथि २।३० को १६ से गुणा कर गुणनफल ४० में सावयव तिथिके वर्ग ६।१५ को घटानेसे शेष ३३।४५ रहा; इसको पलभा ६ से गुणा कर गुणनफल २०२।३० में १५ से भाग देनेपर लब्धि १३१३० यह उत्तर दिशाका फल हुआ। इसमें सूर्यको उत्तरक्रान्ति १० (एक दिशा होनेके कारण) जोड़नेसे २३।३० हुआ। तथा (एक दिशा होनेके कारण) चन्द्रमाके उत्तर शर ५ और उत्तरक्रान्ति ६ इन दोनोंके योग ११ को उत्तर दिशाके फल १३० ३.० में विपरीत संस्कार करने (पराने) से शोम २ । ३० रहा। इसमें विपत तिचि २ । ३०४२-4 से भाग देोषर, शाम अङ्गुलादि । २० स्पष्ट पला हुआ; यह चन्द्रमासे सूर्यकी दक्षिण दिशा होने के कारण दक्षिण दिशाका हुआ। एवं सावयव तिथि २ । ३० में अपना पश्चमांश ० ॥ ३० घटानेसे २।० अङ्गुलादि शुक्लमान हुआ। इस प्रकार उस दिन दक्षिण दिशाका चन्द्रशृङ्ग उत्रत हुआ।

१२, ६, २४ और ३ का भाग देकर लब्धिको द्वितीय स्थानमें स्थित गुणनफलमें, यदि कर्ण त्रिज्यासे अधिक हो तो घटावे, यदि त्रिज्यासे अल्प हो तो जोड़े, फिर उसमें ३ से भाग देनेपर क्रमश: मङ्गलादि ग्रहोंके विम्ब-प्रमाण होते हैं।

(ग्रहोंकी युतिके गत-गम्य दिन-साधन- )

जिन दो ग्रहोंके युतिकालका ज्ञान करना हो, वे दोनों मार्गी हों, अथवा दोनों वक्री हों तो दोनों ग्रहोंकी अन्तर-कलामें दोनोंकी गत्यन्तर-कलासे भाग देना चाहिये। यदि एक वक्र और एक मार्गी हो तो दोनोंकी गति-योगकलासे भाग देना चाहिये। फिर जो लब्धि आवे, वह ग्रहयुतिके गत या गम्य दिनादि है।'

(ग्रहोंकी युतिमें भेद-ज्ञान-) जिन दो ग्रहोंकी युति होती हो, उन दोनोंके अपनी-अपनी श नतिसे संस्कृत शर (भूपृष्ठस्थानाभिप्रायिक शर) च एक दिशाके हों तो अन्तर, यदि भित्र दिशाके हों त तो योग करनेसे दोनों ग्रहोंका अन्तर (दक्षिणोत्तरान्तर) क होता है। यह अन्तर यदि दोनोंके विम्बमान- योगार्धसे अल्प हो तो उनके योगमें भेद (एकसे अं दूसरा आच्छादित) होता है। इसलिये इनमें दर्दा नीचेवालेको छादक और ऊपरवालेको छाद्य मानकर सूर्यग्रहणके समान ही लम्बन, ग्रासमान आदि साधन करना चाहिये ॥ १६८१७१३ ॥

एकायनगतौ स्याता सूर्याचन्द्रमसौ यदा।

तद्युते मण्डले क्रान्त्योस्तुल्यत्वे वैधृताभिधः ॥१७२॥

विपरीतायनगतौ चन्द्राको क्रान्तिलिप्तिकाः।

समास्तदा व्यतीपातो भगणार्द्ध तयोर्युतौ ॥१७३॥

भास्करेन्द्वोर्भचक्रान्तश्चक्रार्धावधि संस्थयोः।

दृक्तुल्यसाधितांशादियुक्तयोः स्वावपक्रमौ॥१७४॥

अथौजपदगस्येन्दोः क्रान्तिर्विक्षपेसंस्कृता।

यदि स्यादधिका भानोः क्रान्ते: पातो गतस्तदा।। १७५ ।।

न्यूना चेत्स्यात्तदा भावी वामं युग्मपदस्य च।

पदान्यत्वं विधोः क्रान्तिर्विक्षेपाच्चेद् विशुद्धयति ।। १७६ ।।

क्रान्त्योर्ये त्रिज्ययाभ्यस्ते परमापक्रमोद्धृते।

तच्चापातरमर्द्ध वा योज्य भाविनि शीतगौ॥१७७ ।।

शोध्यं च दाद्गते पाते तत्सूर्यमतिताडितम्।

चन्द्रभुक्त्या हतं भानौ लिप्सादि शशिवत्फलम्॥१७८॥

तद्वच्छशाङ्कपातस्य फलं देयं विपर्ययात्।

कर्मतदसकृत्तावत्क्रान्ती यावत्समे तयोः ॥ १७९ ॥

(पाताधिकार-पातकी संज्ञा-) जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों एक ही अयन (याम्यायन- दक्षिणायन अथवा सौम्यायन-उत्तरायण)-में हों तथा उन दोनोंके राश्यादि योग १२ राशि हो तो

१. यहाँ त्रिज्याका प्रमाण ११ ग्रहण करना चाहिये।

२. जैसे-यदि मङ्गलका शीघ्रकर्ण १३ है तो त्रिज्या ११ और कई १३ के अन्तर २ से मङ्गलके मध्यम विम्बमान ५ को गुणा करनेपर १० हुआ; इसमें २१ का भाग देकर भागफल ० । चलो (त्रिज्यासे कर्णके अधिक होने के कारण) गुणनफल १० में घटानेपर शेष ९ । ३१ में ३ का भाग दिया तो फल अङ्गुलादि ३।१० मङ्गलका स्पष्ट विम्बमान हुआ। इसी प्रकार अन्य ग्रहोंका भी जान लेना चाहिये।

३. जैसे मङ्गत और शुक्रका युनिरामय जानना है तो कल्पना बीजिये कि उस दिन स्पष्ट मङ्गल ७।१५। १०। २५, मङ्गलको स्पष्ट गति ४० १ १२, स्पष्ट शुक्र ७।१०। ३० । २५ तथा शुक्रकी स्पष्ट गति ७० । १२ है तो यहाँ शीघ्र (अधिक) गतिवाला शुक्र मङ्गलसे अल्प (पीछे) है, अत: दोनोंकी युति भावी है-ऐसा निश्चित हुआ। ये दोनों मार्गी हों तो उक्त रीतिसे मङ्गल ७।१५। २० । २५ में शुक्र ७११०१३० । २५ को घटाकर शेष ०।४।५ कलामें शुक्रगति ७० । १२ और मङ्गलगति ४० । १२ के अन्तर ३० गत्यन्तर-कलासे भाग देनेपर लब्धि २।९।४० गभ्य दिनादि हुई अर्थात् इतने समयके बाद योग होनेवाला है।

४. जब दो ग्रहोंके क्रान्तिवृत्तमें एक ही समान (पूर्वापर अन्तरका अभाव) होता है, तब उन दोनोंको युति (योग) समझी जाती है। ग्रहोंके इस प्रकार परस्पर योगसे, शुभाशुभ फल संहितास्कन्धमें कहा गया है। इसीलिये ग्रहयुति- समयका ज्ञान आवश्यक है।

उस स्थितिमें दोनोंके क्रान्तिसाम्य होनेपर वैधृति नामका पात कहलाता है। तथा जब दोनों भिन्न (पृथक्-पृथक्) अयनमें हों और दोनोंका योग ६ राशि हो तो उस स्थितिमें दोनोंके क्रान्तिसाम्य होनेपर व्यतीपात नामक पात होता है।

जब सूर्य-चन्द्रका अन्तर चक्र (०) या ६ राशि हो, उस समयमें तात्कालिक अयनांशादिसे युक्त सूर्य और चन्द्रमाकी अपनी-अपनी क्रान्तिका साधन करे। यदि शर-संस्कृत चन्द्रमाको क्रान्ति (स्पष्टा क्रान्ति) तात्कालिक सूर्यकी क्रान्तिसे अधिक हो तथा चन्द्रमा यदि विषम पदमें हो तो पातकालको गत (बीता हुआ) समझना चाहिये। यदि विषमपदस्थ चन्द्रमाकी शर-संस्कृत क्रान्तिसे अल्प हो तो पातकालको भावी (होनेवाला) समझना चाहिये। यदि चन्द्रमा समपदमें हो तो इससे विपरीत (सूर्यको क्रान्तिसे चन्द्रमाकी स्पष्ट क्रान्ति अधिक हो तो भावी, अल्प हो तो गत) पातकाल समझे। यदि स्पष्ट क्रान्ति बनाने में चन्द्रमाके शरमें क्रान्ति घटायी जाय तो इस स्थितिमें चन्द्रमा के विम्ब और स्थानमें पदकी भिन्नता होती है।

 (स्फुट-क्रान्ति-साम्य-ज्ञान-प्रकार-) सूर्य और चन्द्रमा दोनोंकी 'क्रान्तिज्या' को त्रिज्यासे गुणा करके उसमें परम क्रान्तिज्यासे भाग देकर जो लब्धियाँ हों, उन दोनोंके चाप बनाये। उन दोनों चापोंका जो अन्तर हो उसको सम्पूर्ण या अर्ध (कुछ न्यून) करके गम्य पात हो तो चन्द्रमामें जोड़े; गतपात हो तो घटावे। पुनः उपर्युक्त चापके अन्तर या उसके खण्डको सूर्यकी गतिसे गुणा करके गुणनफलमें चन्द्रगतिसे भाग देकर जो लब्धि (कलादि) हो, उसको चन्द्रमाके समान ही सूर्यमें संस्कार करे (गम्यपात हो तो जोड़े, गतपात हो तो घटावे) । इसी प्रकार (सूर्य फलवत्-उक्त चापान्तरको चन्द्रपातकी गतिसे गुणा करके उसमें चन्द्रगतिसे भाग देकर) लब्धिरूप चन्द्रपातके कलादि फलको चन्द्रपात (राहु)-में विपरीत संस्कार करे (गत- पातमें जोड़े, गम्य पातमें घटावे) तो पातकालासन्न समयके सूर्य, चन्द्रमा और चन्द्रपात होते हैं। फिर इन तीनों पवि, चन्द्र और चन्द्रपात) के द्वारा उपर्युक्त क्रियाको तबतक बार-बार करता रहे जबतक दोनोंकी क्रान्ति सम न हो जाय* ॥१७२-१७९ ॥

यदि सायन सूर्य ५ । २६ ॥ ४०॥ ० सायन चन्द्र ०।२।५।०, पात (राहु) 01५/२५/०, सूर्यगति ६०।१५, चन्द्रगति ७८३ । १५ और राहु-गति ३।११ है तो चन्द्र ०।२।५।० और पात ०।५। २५ । ० के योग 01७।३० सपातचन्द्रकी भुजकला ४५० की ज्या ४९ हुई। इसको चन्द्रमाके परम शर २७० से गुणा कर गुणनफल १२१२३० में त्रिज्या ३४३८से भाग देनेपर लब्धि चन्द्रमाकी शरकला ३६ हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। केवल चन्द्रमा ०।२। ५।० की भुजज्या १२५ कलाको परमक्रान्तिच्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल १७४६२५ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ५० चन्द्रमाकी क्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। अत: चन्द्रमाके शर ३६ क्रान्ति ५० का योग करनेसे ८६ चन्द्रमाकी स्पष्ट क्रान्ति हुई।

तथा राश्यादि सूर्य ५। २६ । ४० । ० को ६ राशिमें घटानेमें भुज ०।३।२०१० की कला २०० की ज्या इतनी ही हुई। इसको परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल २७९४०० में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ८१ सूर्यकी क्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही होनेके कारण यही सूर्यकी क्रान्ति हुई। सूर्यको क्रान्तिसे विषम (प्रथम) पदस्थित चन्द्रमाको क्रान्ति अधिक है, इसलिये यहाँ गतपात निश्चित हुआ तथा सूर्य और चन्द्रमाके भिन्न अयन (चन्द्रमाके उत्तरायण और सूर्यके दक्षिणायन)-में होने एवं दोनोंके राश्यादियोग ६ राशि होनेके कारण इस क्रान्तिसाम्यका नाम व्यतीपात हुआ।

अब, चन्द्र-क्रान्तिज्या ८६ को त्रिज्या ३४३८ से गुणा कर गुणनफल २९५६६८ में परमक्रान्तिज्या १३९७ का भाग देनेपर लब्धि २११ चन्द्रमाकी भुजज्या हुई, इसका चाप भी स्वल्पान्तरसेम एना ही हुआ। एवं सूर्यकी क्रान्तिज्या ८१ को त्रिच्या ३४३८ से गुणा कर गुणनफल २०४७८ में परमक्रान्तिग्या १३९७ का भाग देनेपर लब्धि सूर्यकी भुजज्या १९२ हुई, इसका चाप भी इतना ही हुआ।

क्रान्त्योः समत्वे पातोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ।

हीनेऽर्द्धरात्रिकाधातो भावी तात्कालिकेऽधिके॥१८०॥

स्थिरीकृतार्द्धरात्रेन्द्वोर्द्वयोर्विवरलिप्तिकाः ।

पष्टिभ्यश्चन्द्रभुक्त्याप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ।। १८१।।

इस प्रकार क्रान्ति-साम्य होनेपर पात समझना चाहिये। यदि उपर्युक्त क्रियाद्वारा प्राप्त अंशादिसे युक्त या हीन किया हुआ चन्द्रमा अर्धरात्रिकालिक साधित चन्द्रमासे अल्प (पीछे) हो तो पातकालको 'गत' समझे और यदि अधिक (आगे) हो तो पातकालको भावी समझे।

(अर्धरात्रिसे गत, गम्य पातकालका ज्ञान-) उपर्युक्त क्रियाद्वारा स्थिरीकृत (पातकालिक) चन्द्रमा और अर्धरात्रिकालिक चन्द्रमा जो हों-इन दोनोंकी अन्तरकलाको ६० से गुणा करके गुणनफलमें चन्द्रको गति-कलासे भाग देनेपर जो लब्धि हो, उतनी घटी अर्धरात्रिसे पीछे या आगे (गत पातमें पीछे, गम्य पातमें आगे) तक पातकालकी घड़ी समझी जाती है * ॥ १८०-१८१ ।।

रवीन्द्वोर्मानयोगार्द्ध षष्ट्या संगुण्य भाजयेत्।

तयोर्भुक्त्यन्तरेणाप्तं स्थित्यर्थं नाडिकादि तत्॥१८२ ॥

पातकालः स्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यर्द्धवर्जितः।

तस्य सम्भबकालः स्यात्तत्संयुक्तोऽन्त्यसंजितः ।। १८३॥

आद्यन्तकालयोर्मध्यः कालो जेयोऽतिदारुणः ।

प्रज्वलज्ज्वलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ॥ १८४।।

इत्येतद्गणिते किश्चित्प्रोक्तं संक्षेपतो द्विज ।

जातक। वच्मि समयाद्राशिसंज्ञापुरःसरम् ॥ १८५।।

(पातके स्थितिकाल, आरम्भ तथा अन्तकालका साधन-) सूर्य तथा चन्द्रमाके विम्बयोगार्धको ६० से गुणा करके गुणनफलमें सूर्य-चन्द्रकी गत्यन्तरकलासे भाग देकर जो लब्धि हो वह पातकी स्थित्यर्थ घड़ी होती है। इसको पातक स्पष्ट मध्यकालमें घटानेसे पातका आरम्भकाल

सूर्य और चन्द्रमाके चापोंका अन्तर करनेसे (२११-१९२-) १९ कला हुई। इसके आधे (स्वल्पान्तरसे) १० को मध्यरात्रिकालिक चन्द्रमा ०। २।५। ० में घटानेसे पातासमकालिक चन्द्रमा ०1१। ५५। ० हुआ। तथा उसी अन्तरार्धकला १० को सूर्यको गति ६० । १५ से गुणा कर गुणनफल ६०२ । ३० में चन्द्रगति ७८३ । १५ का भाग देनेषर लब्धिफल १ कलाको मध्यरात्रिकालिक सूर्य ५ । २६ । ४० में घटानेसे ५ ॥ २६ ॥ ३९ हुआ। एवं उसी अन्तरार्धकला १० को राहुकी गति ३ । ११ से गुणा कर गुणनफल ३१ १५० में चन्द्रगति ७८३ । १५ का भाग देनेपर लब्धि ० हुई। इसका विपरीत संस्कार करनेपर भी मध्यरात्रिकालिक राहुके तुल्य ही तत्कालीन राहु ०। ५ । २५ हुआ।

अब, पातासनकालिक चन्द्र । १। ५५ । ०, सूर्य ५। २६ ।। १।० और राहु ०।५। २५ 1 ० रहे। इनके द्वारा पुनः क्रान्ति-साधन किया जाता है। चन्द्रमा ०। ।। ५५। ० की भुजज्या ११५ को परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल १६०६५५ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ४६ चन्द्रक्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। तथा चन्द्र । १।५५ । ० और राहु ।। ५। २५ । । का योग करनेसे सपातचन्द्र ।। २० को भुजज्या ४४० को चन्द्रके परमशर २७० से गुणा कर गुणनफल ११८८०० में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि (स्वल्पान्तरसे) ३५ चन्द्रशरञ्या हुई; इसका चाप बनानेसे इतना ही चन्द्रशर हुआ। चन्द्रशर ३५ को चन्द्रक्रान्ति ४६ में जोड़नेसे ८१ कला हुई, इसका अंश बनानेसे १। २१ चन्द्रमाको स्पष्टक्रान्ति हुई। एवं तत्कालीन सूर्य ५। २६ । ३९ की भुजज्या २०१ को घरमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल २८०७९७ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ८१ सूर्यको क्रान्तिग्या हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। इसको अंशात्मक बनानेसे १।२२ सूर्यको क्रान्ति हुई। अतः यहाँ सूर्य और चन्द्रमाको क्रान्तियोंमें समता हुई।

*क्रान्तिसाम्य (पात) काल-साधन-मध्यकालिक चन्द्रमा और स्थिरीकृत क्रान्तिसाम्य-(पात) कालिक चन्द्रमा की अन्तकला को से गुणा कर गुणनफल में चन्द्रगति का भाग देनेपर(स्वल्पान्तरसे) लब्धि घड़ी हुई। इसको(गतपात होने कारण) मध्यरात्रि घड़ी में घटाने शेष पातका मध्यकाल हुआ।

होता है और जोड़नेसे अन्तकाल होता है। पातके आरम्भकालसे अन्तकालतक जो मध्यका काल है, वह प्रज्वलित अग्निके समान अत्यन्त दारुण (भयानक) होता है। जो सब कार्यमें निषिद्ध है। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने गणितस्कन्धमें संक्षेपसे कुछ (उपयोगी) विषयोंका प्रतिपादन किया है। अब (अगले अध्यायमें) राशियोंके संज्ञादि कथनपूर्वक जातकका वर्णन करूँगा॥१८२-१८५ ॥

॥ इति श्रीबहनारदौयपुराणे पूर्वभागे बहदुपाख्याने द्वितीयपादे ज्यौतिषगणितवर्णनं नाम

चतुः पञ्चाशत्तमोध्यायः।।५४।।