नारद महा पुराण
राजा रुक्माङ्गदका मोहिनीसे कार्तिकमासकी महिमा तथा चातुर्मास्यके निय,व्रत एवं उद्यापन बताना
वसिष्ठजी कहते है- राजेन्द्र! इस प्रकार पिताकी आज्ञासे एकादशी-व्रतका पालन करते हुए धर्माङ्गद इस पृथ्वीका राज्य करने लगे। उस समय उनके राज्यमें कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो धर्म-पालनमें तत्पर न हो। महीपते। कोई भी व्यक्ति दु:खी, संतानहीन अथवा कोढ़ी नहीं था। नरेश्वर ! उस राज्यमें सब लोग हृष्ट-पुष्ट थे। पृथ्वी निधि देनेवाली थी, गौएँ बछड़ोंको दूध पिलाकर तृप्त रखती और एक घड़ा दूध देती थीं। वृक्षोंके पत्ते-पत्तेमें मधु भरा था। एक-एक वृक्षपर एक-एक दोन मधु सुलभ था। सर्वथा प्रसन्न रहनेवाली पृथ्वीपर सब प्रकारके धान्योंकी उपज होती थी। त्रेताके अन्तका द्वापरयुग सत्ययुगसे
होड़ लगाता था। वर्षाकाल बीत चला, शरद्- ऋतुका आकाश और गृहस्थोंका घर धूल-पङ्कसे रहित स्वच्छ हो गया। राजा रुक्माङ्गद मोहिनीके प्रेमसे अत्यन्त मुग्ध होनेपर भी एकादशी-व्रतको अवहेलना नहीं करते थे। दशमी, एकादशी और द्वादशी-इन तीन दिनोंतक राजा रतिक्रीडा त्याग देते थे। इस प्रकार क्रीडा करते हुए उन्हें लगभग एक वर्ष पूरा हो गया। कालज्ञोंमें श्रेष्ठ नरेश! उस समय परम मङ्गलमय श्रेष्ठ कार्तिकमास आ पहुँचा था, जो भगवान् विष्णुको निद्राको दूर करनेवाला परम पुण्यदायक मास है। राजन्! उसमें वैष्णव मनुष्योंद्वारा किया हुआ सारा पुण्य अक्षय होता है और विष्णुलोक प्रदान करता है। कार्तिकके समान कोई मास नहीं है, सत्ययुगके समान कोई युग नहीं है, दयाके तुल्य कोई धर्म नहीं है और नेत्रके समान कोई ज्योति नहीं है। वेदके समान दूसरा शास्व नहीं है, गङ्गाके समान दूसरा तीर्थ नहीं है। भूमिदानके समान अन्य दान नहीं है और पत्नी-सुख के समान कोई (लौकिक) सुख नहीं है। खेतीके समान कोई धन नहीं है, गाय रखनेके समान कोई लाभ नहीं है, उपवासके समान कोई तप नही और (मन और) इन्द्रियाँकि संयमके समान कोई कल्याणमय साधन नहीं है। रसनातृप्तिके समान कोई (सांसारिक) तति नहीं है, ब्राह्मणके समान कोई वर्ण नहीं है, धर्मके समान कोई मित्र नहीं है और सत्यक समान कोई यश नहीं है। आरोग्यके समान कोई ऐश्वर्य नहीं है, भगवान् विष्णुसे बढ़कर कोई देवता नहीं है तथा लोकमें कार्तिकव्रतके समान दूसरा कोई पावन व्रत नहीं है। ऐसा ज्ञानी पुरुषोंका कथन है। कार्तिक सबसे श्रेष्ठ मास है और वह भगवान् विष्णुको सदा ही प्रिय है।
राजन्! कार्तिक मासको आया देख अत्यन्त मुग्ध हुए महाराज रुक्माङ्गदने मोहिनीसे यह बात कही-'देवि! मैंने तुम्हारे साथ बहुत वर्षांतक रमण किया। शुभानने ! इस समय मैं कुछ कहना चाहता हूँ। उसे सुनो। देवि! तुम्हारे प्रति आसक्त होनेके कारण मेरे बहुत-से कार्तिक मास व्यर्थ बीत गये। कार्तिकमें मैं केवल एकादशीको छोड़कर और किसी दिन व्रतका पालन न कर सका। अत: इस बार मैं व्रतके पालनपूर्वक कार्तिक मांसमें भगवान्की उपासना करना चाहता हूँ। कार्तिकमें सदा किये जानेवाले भोज्योंका परित्याग कर देनेपर साधकको अवश्य ही भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त होता है। पुष्करतीर्थमें कार्तिक पूर्णिमाको व्रत और स्नान करके मनुष्य आजन्म किये हुए पापसे मुक्त हो जाता है। जिसका कार्तिक मास व्रत, उपवास तथा नियमपूर्वक व्यतीत होता है, वह विमानका अधिकारी देवता होकर परम गतिको प्राप्त होता है। अत: मोहिनी ! तुम मेरे ऊपर मोह छोड़कर आज्ञा दो, जिससे इस समय मैं कार्तिकका व्रत आरम्भ करूं।'
मोहिनी बोली- नृपशिरोमणे! कार्तिक मासका माहात्म्य विस्तारपूर्वक बताइये। मैं कार्तिक माहात्म्य सुनकर जैसी मेरी इच्छा होगी, वैसा करूंगी।
रुक्माङ्गदने कहा-वरानने ! मैं इस कार्तिक मासकी महिमा बताता हूँ। सुन्दरी! कार्तिक मासमें जो कृच्छ् अथवा प्राजापत्यव्रत करता है अथवा एक दिनका अन्तर देकर उपवास करता है अथवा तीन रातका उपवास स्वीकार करता है अथवा दस दिन, पंद्रह दिन या एक मासतक निराहार रहता है, वह मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य कार्तिकमें एकभुक्त (केवल दिनमें एक समय भोजन) या नक्तव्रत (केवल रातमें एक बार भोजन) अथवा अयाचित्तव्रत (बिना माँगे स्वतः प्राप्त हुए अन्नका दिन या रातमें केवल एक बार भोजन) करते हुए भगवान् की आराधना करते हैं, उन्हें सातों द्वीपोंसहित यह पृथ्वी प्राप्त होती है। विशेषत: पुष्करतीर्थ, द्वारकापुरी तथा सूकरक्षेत्रमें यह कार्तिक मास व्रत, दान और भगवत्पूजन आदि करनेसे भक्ति देनेवाला बताया गया है। कार्तिकमें एकादशीका दिन तथा भीष्मपञ्चक अधिक पुण्यमय माना गया है। मनुष्य कितने ही पापोंसे भरा हुआ क्यों न हो, यदि वह रात्रि जागरणपूर्वक प्रबोधिनी एकादशीका व्रत करे तो फिर कभी माताके गर्भमें नहीं आता। वरारोहे ! उस दिन जो वाराहमण्डलका दर्शन करता है, वह बिना सांख्ययोगके परमपदको प्राप्त होता है। शुभे! कार्तिकमें शूकरमण्डल या कोकवाराहका में दर्शन करके मनुष्य फिर किसीका पुत्र नहीं होता। उसके दर्शनसे मनुष्योंका आध्यात्मिक आदि तीनों प्रकारके पापोंसे छुटकारा हो जाता है। ब्रह्मकुमारी! उक्त मण्डल, श्रीधर तथा कुब्जकका दर्शन करके भी मनुष्य पापमुक्त होते हैं। कार्तिकमें तैल छोड़ दे। कार्तिकमें मधु त्याग दे। कार्तिकमें स्त्रीसेवनका भी त्याग कर दे। देवि। इन सबके त्यागद्वारा तत्काल ही वर्षभरके पापसे छुटकारा मिल जाता है। जो थोड़ा भी व्रत करनेवाला है, उसके लिये कार्तिक मास सब पापोंका नाशक होता है। कार्तिको ली हुई दीक्षा मनुष्योंके जन्मरूपी बन्धनका नाश करनेवाली है। आत। दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। जीतीर्थय कार्तिक- पूर्णिमाका व्रत करता है या कार्तिक शुक्लपक्रकी एकादशीको व्रत करके मनुष्य यदि सुन्दर कलाका दान करता है तो वह भगवान् विष्णुके धामों जाता है। सालभरतक चलनेवाले व्रतोंकी समाति कार्तिकमें होती है। अतः मोहिनी! मैं कार्तिक मासमें समस्त पापैकि नाश तथा तुम्हारी प्रीतिकी वृद्धिके लिये व्रत-सेवन करेगा।
मोहिनीने कहा- पृथ्वीपते ! अब चातुर्मास्यकी विधि और उद्यापनका वर्णन कीजिये, जिससे सब व्रतोंकी पूर्णता होती है। उद्यापनसे व्रतकी न्यूनता दूर होती है और वह पुण्यफलका साधक होता है।
राजा बोले- प्रिये! चातुर्मास्यमें नक्तव्रत करनेवाला पुरुष ब्राह्मणको षड्रस भोजन करावे। अयाचित-व्रतमें सुवर्णसहित वृषभ दान करे। जो प्रतिदिन आँवलेके फलसे स्नान करता है, वह मनुष्य दही और खीर दान करे। सुभ्र! यदि फल न खानेका नियम ले तो उस अवस्थामें फलदान करे। तेलका त्याग करनेपर घीदान करे और भीका त्याग करनेपर दूधका दान करे। यदि धान्यके त्यागका नियम लिया हो तो उस अवस्थामें अगहनीके चावल या दूसरे किसी धान्यका दान करे। भूमिशयनका नियम लेनेपर गद्दा, रजाई और तकियासहित शय्यादान करे। पत्तेमें भोजनका नियम लेनेवाला मनुष्य घृतसहित पात्रदान करे। मौनव्रती पुरुष घण्टा, तिल और सुवर्णका दान करे। व्रतकी पूर्तिके लिये ब्राह्मण पति-पत्नीको भोजन करावे। दोनोंके लिये उपभोगसामग्री तथा दक्षिणासहित शय्यादान करे। प्रातःस्नानका नियम लेनेपर अञ्चदान करे और स्नेहरहित (बिना तेलकें) भोजनका नियम लेनेपर घी और सत्तू दान करे। नख और केशन कटाने-धारण करनेका नियम लेतपर दर्पण दान करे। पादत्राण (जूता, खड़ाऊँ आदि) के त्यागका नियम लेनेपर जूता दान करे। नमकका त्याग करनेपर गोवान करे। प्रिये। जो इस अभीष्ट व्रतमें प्रतिदिन देवमन्दिरमें दीप-दान करता है, वह सुवर्ण अथवा तामेका धृतयुक्त दीपक दान करे तथा व्रतकी पूर्तिके लिये वैष्णवको वस्त्र एवं छत्र दान करे। जो एक दिनका अन्तर देकर उपवास करता है, वह रेशमी वस्त्र दान करे। त्रिरात्र व्रतमें सुवर्ण तथा वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत शय्यादान करे। पात्र आदि उपवारोंमें छत्रसहित शिबिका (पालकी) दान करे। साथ ही हाँकनेवाले पुरुषके साथ मोटा-ताजा गाड़ी खींचनेवाला बैल दान करे। एकभुक्त (आठ पहरमें केवल एक बार भोजन करनेके) व्रतका नियम लेनेपर बकरी और भेद दान करे। फलाहारका नियम ग्रहण करनेपर सुवर्णका दान करे। शाकाहारके नियमों फल, घी और सुवर्ण दान करे। सम्पूर्ण रसों तथा अबतक जिनकी चर्चा नहीं की गयी, ऐसी वस्तुओंका त्याग करनेपर अपनी शक्तिके अनुसार सोने चाँदीका पात्र दान करे। जिसके लिये ओ दान कर्तव्य बताया गया है, उनका पालन न हो सके तो भगवान् विष्णुके स्मरणपूर्वक बाहाणकी
आज्ञाका पालन करे। सुन्दरी। देवता, तीर्थ और यज्ञभी बाझोंके वचनका पालन करते है फिर कल्याणकी इच्छा रखनेवाला कौन विद्वान् मनुष्य उनकी आज्ञाका उल्लवन करेगा। प्रिये! भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीको जिस प्रकार यह धर्म-रहस्यसे युक्त उपदेश दिया था, वही मैंने तुमसे प्रकाशित किया है। यह दूसरे अनधिकारियोंके सामने प्रकट करने योग्य नहीं है। यह दान और व्रत भगवान् विष्णुको प्रसन्नताका हेतु और मनोवाञ्छित फल देनेवाला है।