नारद महा पुराण
रुक्माङ्गद-धर्माङ्गद-संवाद, धर्माङ्गदका प्रजाजनोंको उपदेश और प्रजापालन तथा रुक्माङ्गदका रानी सन्धयावली से वार्तालाप
सौति कहते हैं-महाराज रुक्माङ्गदने मनुष्य- लोकके उत्तम भोग भोगते हुए नाना प्रकापसे पीताम्बरधारी भगवान् श्रीहरिकी आराधना की। विप्रगण ! युद्ध में पराक्रमसे सुशोभित होनेवाले शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली और वैवस्वाह यसको नीतबार ममलोवाका मार्ग सूना हर दिया। वैकुण्ठका मार्ग मनुष्योंसे भर दिया और उचित समय जानकर अपने पुत्र धर्माङ्गदको बुलाकर कहा–'बेटा। तुम अपने धर्मपर दृढ़तापूर्वक डटे रहकर अपने पराक्रमसे इस धन-धान्य- सम्पन्न पृथ्वीका सब ओरसे पालन करो। पुत्रके समर्थ हो जानेपर जो ठसे राज्य नहीं सौंप देता, उस राजाके धर्म तथा कीर्तिका निश्चय ही नाश हो जाता है। अपने शक्तिशाली पुत्रके द्वारा यदि पिता सुखी न हो तो उस पुत्रको तीनों लोकोंमें अवश्य पातकी जानना चाहिये। पिताका भार हल्का करनेमें समर्थ होकर भी जो पुत्र उस भारको नहीं सँभालता, वह माताके मल-मूत्रकी भौति पैदा हुआ है। पुत्र वही है, जो इस पृथ्वीपर पितासे भी अधिक ख्याति लाभ करे। यदि पुत्रके अन्यायजनित दुःखसे पिताको रातभर जागना पड़े तो वह पुत्र एक कल्यतक नरकमें पड़ा रहता है। जो पुत्र घरमें रहकर पिताकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करता है, वह देवताओंद्वारा प्रशंसित हो भगवान् का सायुज्य प्राप्त करता है। पुत्र! मैं प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये इस पृथ्वीपर सदा नाना प्रकारके कर्मोंमें आसक्त रहा। प्रजापालनमें संलग्न होकर मैंने कभी भोजन और शयनकी परवा नहीं की। कुछ लोग शिवकी उपासनामें तत्पर रहते हैं, कुछ लोग भगवान् सूर्यके भजन-ध्यानमें संलग्न हैं, कोई ब्रह्माजीके पथपर चलते हैं और दूसरे लोग पार्वतीजीकी आराधनामें स्थित हैं। कुछ लोग सायंकाल और सबेरे अग्रिहोत्र कर्ममें लगे होते हैं। 'बालक हो या युवक, बूढ़ा हो या गर्मिणी स्त्री, कुमारी कन्या, रोगी पुरुष अथवा किसी कष्टमे व्याकुल मनुष्य-दो सब उपवास नहीं कर सकते।' इस तरहकी बातें जिन्होंने कहीं, उन सबकी बातोंका मैंने सब तरहसे अण्डन किया और बहुत दिनोंतक पुराणमें कहे हुए बचनाद्वारा प्रजाके सुखके लिये उन्हें बार- भार समझाया। बिहानोंको शास्त्वदृष्टिसे समझाकर और मूखौंको दण्डपूर्वक काबूमें करके मैं एकादशीके दिन सबको निराहार रखता आया हूँ। 'वत्स! अपने हों या पराये, कभी किसीको दु:ख नहीं देना चाहिये। जो राजा प्रजाकी रक्षा करता है, उसे पुराणोंमें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है। अत: सौम्य! मैं प्रजाके लिये सदा कर्तव्यपालनमें लगा रहा। अपने शरीरको विश्राम देनेका मुझे कभी अवसर नहीं मिला। बेटा! मुझे कभी मदिरा पीने और जुआ खेलने आदिके सुखकी इच्छा नहीं होती। वत्स! इन दुर्व्यसनोंमें फंसा हुआ राजा शीघ्र नष्ट हो जाता है। पुत्र! तुम्हारे ऊपर राज्यका भार रखकर मैं (प्रजाजनोंके रक्षार्थ) शिकार खेलने जाना चाहता हूँ और इसी बहाने अनेकानेक पर्वत, वन, नदी और भाँति-भाँतिके सरोवर देखना चाहता हूँ।'
धर्माङ्गदने कहा-पिताजी! मैं आपके राज्य- सम्बन्धी भारी भारको आजसे अपने ऊपर उठाता हूँ। आपकी आज्ञापालन करनेके सिवा मेरे लिये दूसरा कोई धर्म नहीं है। जो पिताको बात नहीं मानता, यह धर्मानुष्ठान करते हुए भी नरकमें पड़ता है। इसलिये मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।
ऐसा कहकर धर्माङ्गद हाथ जोड़े खड़े रहे। उनके इस वचनको सुनकर राजा रुक्माङ्गद बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने (प्रजाके रक्षार्थ) मृगयाके लिये वनमें जानेका निश्चय किया और पुत्रकी अनुमति प्राप्त कर ली। इस बातको जानकर धर्माङ्गदने प्रसन्नचित्त हो प्रजावर्गको बुलाया और इस प्रकार कहा-'प्रजागण ! पिताने मुझे आप लोगोंके पालन और हित-साधनके लिये नियुक्त किया है। सर्वथा धर्मपालनकी इच्छा रखनेवाले मुझ-जैसे पुत्रको पिताकी आज्ञाका सदैव पालन करना चाहिये। पुत्रके लिये पिताके आदेशका पालन करनेके सिवा दूसरा कोई धर्म नहीं है। अब मैं दण्ड धारण करके राजाके पदपर स्थित हुआ हूँ। मेरे
जीते-जी यहाँ कहीं यमराजका शासन नहीं चल सकता। ऐसा समझकर आप सब लोगोंको भगवान् गरुडध्वजका स्मरण तथा भगवदर्पणबुद्धिसे कर्म करते हुए उसके द्वारा भगवान् जनार्दनका यजन करते रहना चाहिये। संसारके भोगोंसे ममता हटाकर अपनी-अपनी जातिके लिये विहित कर्मद्वारा भगवान्की पूजा करनी चाहिये। इससे आपको अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होगी। प्रजाजनो! यह मैंने पिताजीके मार्गसे एक अधिक मार्ग आपको दिखाया है। ब्रह्मार्पणभावसे कर्ममें संलग्न होकर आप सब लोग ज्ञानमें निपुण हो जायें। एकादशीके दिन भोजन नहीं करना चाहिये-यह पिताजीका बताया हुआ सनातन मार्ग तो है ही, यह ब्रह्मनिष्ठारूप विशेष मार्ग आपके लिये मैंने बताया है। तत्त्ववेत्ता पुरुषोंको इस ब्रह्मनिष्ठारूप मार्गका अवलम्बन अवश्य करना चाहिये। इससे इस संसारमें पुन: नहीं आना पड़ता।'
इस प्रकार सम्पूर्ण प्रजाको अनुनयपूर्वक बारम्बार आश्वासन देकर धर्माङ्गद उनके पालनमें लगे रहे। वे न तो दिनमें सोते थे और न रातमें ही। वे अपने शौर्यके बलसे पृथ्वीको निष्कण्टक बनाते हुए सर्वत्र भ्रमण करते थे। हाथोके मस्तकपर रखा हुआ उनका नगाड़ा प्रतिदिन बजता और कर्तव्यपालनकी घोषणा इस प्रकार करता रहता था-'लोगो! (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीको उपवास करते हुए ममतासे रहित हो जाओ और नाना प्रकारके कार्यों में देवेश्वर श्रीहरिका चिन्तन करते रहो। भगवान् पुरुषोत्तम ही यज्ञ और श्राद्धके भोक्ता हैं। सूर्यमें, सूने आकाशमें तथा सम्पूर्ण सृष्टि में वे जगदीश्वर भगवान् विष्णु व्याप्त हो रहे हैं। धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गकी भी इच्छा रखनेवाले सब मनुष्योंको उन्हींका स्मरण करना चाहिये। इसी प्रकार अपने वर्णोचित कर्तव्यकर्मका आचरण करते हुए भी उन्हीं भगवान् माधवका चिन्तन करना चाहिये। वे भगवान् पुरुषोत्तम ही भोक्ता और भोग्य हैं, सब कर्मों में उन्हींका विनियोग-उन्हींकी प्रसन्नताके लिये कर्मोंका अनुष्ठान करना उचित है।' इस प्रकार मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे डंका पीटकर श्रेष्ठ ब्राह्मण उपर्युक्त बातें दुहराया करते थे। ब्राह्मणो ! इस तरह धर्मका सम्पादन करके धर्माङ्गदके पिताने जब यह जान लिया कि मेरा पुत्र मुझसे भी अधिक कर्तव्यपरायण है तो वे अत्यन्त प्रसन्न हो द्वितीय लक्ष्मीके समान सुशोभित अपनी धर्मपत्नीसे बोले-'सन्ध्यावलि! मैं धन्य हूँ तथा श्रेष्ठ वर्णवाली देवि! तुम भी धन्य हो; क्योंकि हम दोनोंका पैदा किया हुआ पुत्र इस पृथ्वीपर चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कीर्तिसे प्रकाशित हो रहा है। सुन्दरी! यह निश्चय है कि सदाचार और पराक्रमसे सम्पन्न विनयशील एवं प्रतापी पुत्र प्राप्त होनेपर पिताके लिये घरमें ही मोक्ष है। किंतु अब मैं प्रसन्नतापूर्वक शिकार खेलने एवं जंगली पशुओंको मारनेके लिये वनमें जाऊँगा। विशाललोचने ! वहाँ स्वच्छन्द विचरते हुए मैं जन-रक्षाका कार्य करूँगा।