श्रीराम-लक्ष्मणका संक्षिप्त चरित्र तथा लक्ष्मणाचलका माहात्म्य

मोहिनी बोली- पुरोहितजी! गोकर्णतीर्थका पापनाशक माहात्म्य मैंने सुना; अब लक्ष्मणतीर्थका माहात्म्य बतानेकी कृपा करें।

पुरोहित वसुने कहा- प्राचीन कालकी बात है, ब्रह्मा आदि देवताओंके प्रार्थना करनेपर साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु ही राजा दशरथसे चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए। वे ही राम-लक्ष्मण आदि नामोंसे प्रसिद्ध हुए। देवि! तत्पश्चात् कुछ कालके अनन्तर मुनीश्वर विश्वामित्र अयोध्यामें आये। उन्होंने अपने यज्ञकी रक्षाके

होकर निवास करते है, वे थोड़ेही समय में सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। सती मोहिनी। उस तीर्थ में किये हुए दान, होम, जप, बाड, देवपूजन तथा ब्राह्मण-समादर आदि कर्म अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा कोटिगुने होकर फल देते हैं।

लिये श्रीराम और लक्ष्मणको राजासे माँगा। तब राजा दशरथने मुनिके शापसे डरकर अपने प्राणोंसे भी प्रिय पुत्र श्रीराम और लक्ष्मणको उन्हें सौंप दिया। तब वे दोनों भाई मुनीश्वर विश्वामित्रके यज्ञ में जाकर उसकी रक्षा करने लगे। श्रीरामने ताड़कासहित सुबाहुको मारकर मारीचको मानवास्त्रसे दूर फेंक दिया; फिर मुनिने उनका बड़ा सत्कार किया। तदनन्तर विश्वामित्रजी उन्हें राजा विदेहके नगरमें ले गये। वहाँ महाराज जनकने विश्वामित्रजीका भलीभाँति सत्कार करके उनसे पूछा-'महर्षे ! ये दोनों बालक किस क्षत्रिय-कुल-नरेशके पुत्र हैं?' तब मुनिवर विश्वामित्रने राजा जनकको यह बताया कि 'ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं।' यह सुनकर विदेहराज जनक बड़े प्रसन्न हुए। फिर महर्षि विश्वामित्र जनकसे बोले-'इन्हें वह धनुष दिखाओ जो महादेवजीकी धरोहर है और सीताके स्वयंवरके लिये तोड़नेकी शर्तके साथ रखा गया है।' विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर राजा जनकने तत्काल तीन सौ सेवकों द्वारा उस धनुषको मँगवाकर आदरपूर्वक उन्हें दिखाया। श्रीरामने महादेवजीके उस धनुषको उसी क्षण बायें हाथसे उठा लिया और उसपर प्रत्यश्शा चढ़ाकर खींचते हुए सहसा उसे तोड़ डाला। इससे मिथिला नरेशको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मणकी पूजा करके उन्हें वैदिक विधिके अनुसार अपनी दोनों कन्याएँ दे दी। मुनिवर विश्वामित्रसे यह जानकर कि राजा दशरथके दो पुत्र और हैं, जनकने उन पुत्रोंके साथ महाराजको बुलवाया और अपने भाईकी दो पुत्रियोंका उन दोनों भाइयोंके साथ ब्याह कर दिया। तदनन्तर मिथिलानरेशके द्वारा भलीभाँति सम्मानित हो मुनिकी आज्ञा ले अपने चारों विवाहित पुत्रों के साथ महाराज दशरथ अयोध्यापुरीके लिये प्रस्थित हुए। मार्गमें श्रीरामचन्द्रजीने भृगुपति परशुरामजीके गर्वको शान्त किया और पिता तथा भाइयों के साथ वे बहुत वर्षांतक आनन्दपूर्वक रहे।

तदनन्तर राजा दशरथ यह देखकर कि मेरे पुत्र श्रीराम जाननेयोग्य सभी तत्त्वोंको जान चुके हैं, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक युवराजपदपर अभिषिक्त करनेके लिये उद्यत हुए। यह जानकर- राजाकी सबसे अधिक प्रियतमा छोटी रानी कैकेयीने कलपूर्वक रामके राज्याभिषेकको रोका और अपने पुष भरतके लिये उस अभिषेकको पसंद किया

शुभे ! तब माता कैकेयीकी प्रसन्नताके लिये पिताकी आज्ञा ले,श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्री सीता और भाई लक्ष्मणके साथ चित्रकूट पर्वतफा चले गये और वहीं मुनिवेष धारण करके उन्होंने कुछ कालतक निवास किया।

इधर भरतजी पिताके मरनेका समाचार सुनकर अपने नानाके घरसे अयोध्या आये। यहाँ उन्हें मालूम हुआ कि पिताजी 'हा राम! हा राम!!'- की रट लगाते हुए परलोकवासी हुए हैं। तब भरतजीने कैकेयीको धिक्कार देकर श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये वनको प्रस्थान किया; किंतु वहाँसे श्रीरामने भरतको अपनी चरण-पादुका देकर अयोध्या लौटा दिया। श्रीराम क्रमश: अत्रि, सुतीक्ष्ण तथा अगस्त्यके आश्रमोंपर गये। इन सब स्थानोंमें बारह वर्ष बिताकर श्रीरघुनाथजी भाई और पत्नीके साथ पशवटीमें गये और वहाँ रहने लगे। जनस्थानमें शूर्पणखा नामकी राक्षसी रहती थी। श्रीरामकी प्रेरणासे लक्ष्मणने उसकी नाक काटकर उसे विकृत बना दिया। तब उस राक्षसीसे प्रेरित होकर युद्धके लिये आये हुए चौदह हजार राक्षसोंसहित खर, दूषण और त्रिशिराको श्रीरामचन्द्रजीने नष्ट कर दिया। यह समाचार सुनकर राक्षसोंका राजा रावण वहाँ आया। उसने मारीचको सुवर्णमय मृगके रूपमें दिखाकर उसके पीछे दोनों भाइयोंको आश्रमसे दूर हटा दिया और सीताको हर लिया। उस समय जटायुने उसका मार्ग रोका, परंतु रावण उसे मारकर सीताको लंकामें ले गया। दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब लौटकर आश्रमपर आये तो सौताका हरण हो चुका था। अब वे सब ओर उनकी खोज करने लगे। मार्गमें जटायुको गिरा देख उसके मरनेपर दोनों भाइयोंने उसका दाह-संस्कार किया। फिर कबन्धको मारकर शबरीपर  कृपा की। वहाँसे ऋष्यमूक पर्वतपर आये। तत्पश्चात् हनुमानजीके कहनेसे अपने मित्र वानरराज सुग्रीवके शत्रु बालिका वध करके श्रीरामने सुप्रीवको राजा बनाया। फिर सुप्रीषकी आजासे सीताकी खोजके लिये सब मोर वानर गये। हनुमान् आदि वानर सीताको बूंढ़ते हुए दक्षिण समुद्रके तटपर गये। वहाँ सम्पातिके कहनेसे उन्हें यह निश्चय हो गया कि सीताजी लंकामें हैं।

तदनन्तर अकेले हनुमान्जी समुद्रके दूसरे तटपर बसी हुई लंकापुरीमें गये और वहाँ रामप्रिया सती सौताको उन्होंने देखा तथा श्रीरामचन्द्रजीकी अंगूठी उन्हें देकर अपने प्रति उनके मनमें विश्वास उत्पन्न किया, फिर उन दोनों भाइयोंका कुशल-समाचार सुनाकर उनसे चूड़ामणि प्राप्त की। तदनन्तर अशोकवाटिकाको उजाड़कर सेनासहित अक्षकुमारको मारा और मेघनादके बन्धनमें आकर रावणसे वार्तालाप किया। तत्पश्चात् सम्पूर्ण लंकापुरीको जलाकर पुन: मिथिलेश-नन्दिनी सीताका दर्शन किया और उनकी आज्ञा ले समुद्र लाँधकर श्रीरामचन्द्रजीसे उनका समाचार निवेदन किया।

सीता राक्षसराज रावणके निवासस्थान में रहती है-यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी भी वानर नाके साप समुत्रके वटपर पहुंचे। फिर समुद्रकी ही अनुमति लेकर उन्होंने महासागरपर पर्वतीय शिलाखण्डोंसे पुल बाँधा और उसके द्वारा दूसरे तटपर पहुंचकर सेनाकी छावनी साली। तदनन्तर अपने छोटे भाई विभीषणके समझानेपर भी रावणको यह बात नहीं रुची कि सीता अपने पतिको वापस दे दी जाय। रावणने विभीषणको लातसे मारा और विभीषण श्रीरामचन्द्रजीकी शरणमें गये। तब श्रीरामचन्द्रजीने लंकाको चारों ओरसे घेर लिया। तदनन्तर रावणने क्रमशः अपने मन्त्रियों, अमात्यों, पुत्रों और सेवकोंको युद्धके लिये भेजा; किंतु वे सब श्रीराम-लक्ष्मण तथा कपीश्वरोंद्वारा नष्ट कर दिये गये। लक्ष्मणने इन्द्रविजयी मेघनादको तीखे बाणोंसे मार डाला। इधर श्रीरामने भी कुम्भकर्ण तथा रावणको मौतके घाट उतार दिया। इसके बाद श्रीरामने अपनी प्रियतमा सीताकी अग्निपरीक्षा ली और विभीषणको राक्षसोंका आधिपत्य, लंका तथा एक कल्पकी आयु देकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके सुधीव और विभीषणके साथ पुष्पक-विमानताय अयोध्याको प्रस्थान किया। भरतजी नन्दिप्राममें रहते थे। उन्हें साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या में गये। फिर चारों भाइयोंने अपनी सब माताओंको प्रणाम किया। तदनन्तर पुरोहित वसिष्ठकी आज्ञा लेकर भाइयोंने श्रीरामका राजाके पदपर अभिषेक किया। भगवान् श्रीराम भी प्रजाका औरस पुत्रकी भाँति पालन करने लगे। धर्मक ज्ञाता श्रीरामने लोकनिन्दासे डरकर सीतादेवीको त्याग दिया। गर्भवती सौता वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर जाकर सुखसे रहने लगीं। वहाँ उन्होंने दो पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे कुश और लव। महर्षि वाल्मीकिने उन दोनोंके जातकर्म आदि संस्कार शास्त्रोक्त विधिसे किये। उन उदारबुद्धि महर्षिने रामायण महाकाव्यको रचना करके उन दोनों बालकोंको पड़ाया। वे दोनों बालक मुनियोंके यज्ञोंमें रामायणगान करते थे। इसके कारण उनकी सर्वत्र ख्याति फैल गयी। एक समय श्रीरामचन्द्रजीका अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ होनेपर वे दोनों भाई कुश और लव उस यज्ञमें गये। वहाँ उन दोनोंके मुँहसे अपने चरित्रका गान सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञसभामें सीताके साथ महर्षि वाल्मीकिको बुलवाया। जगदम्बा सीताने वहाँ आकर अपने दोनों पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको सौंप दिये और स्वयं उन्होंने पृथ्वीके विवरमें प्रवेश किया। यह एक अद्भुत घटना हुई। तबसे श्रीरामचन्द्रजी केवल ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इस पृथ्वीपर यज्ञानुष्ठानमें ही लगे रहे। तदनन्तर एक समय काल और दुर्वासा मुनि श्रीरामचन्द्रजीके पास आये। भद्रे! कालको ब्रह्माजीने भेजा था और वे श्रीरामसे वैकुण्ठ-धाममें पधारनेके लिये प्रार्थना करने आये थे। उन्होंने एकान्तमें आकर श्रीरामसे कहा- समय कोई भी यहाँ न आवे। यदि कोई आये तो आप उसका वध कर डालें।' श्रीरामने ऐसा करनेकी प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात् रधुनाथजीने लक्ष्मणको बुलाकर कहा-'तुम यहाँ द्वारपर खड़े रहो। किसीको भीतर न आने देना। यदि कोई भीतर प्रवेश करेगा तो वह मेरा वध्य होगा। तब लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाके पालेनमें लग गये। इतनेहीमें महर्षि दुर्वासा राजद्वारपर लक्ष्मणके समीप आये। उन्हें आया देख लक्ष्मणने प्रणाम करके कहा-'भगवन् । दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये। इस समय श्रीरघुनाथजी मन्त्रणामें लगे हैं।' उन्होंने लक्ष्मणकी बात सुनकर उनसे क्रोधपूर्वक कहा-'मुझे भीतर जाने दो नहीं तो मैं अभी तुम्हें भस्म कर दूंगा।' दुर्वासाका वचन सुनकर लक्ष्मणजी मनरा गये। वे मुनिसे भयभीत हो अपने बड़े भाईको उनके आगमनकी सूचना देनेके लिये स्वयं भीतर चले गये। लक्ष्मणको आया देख कालदेव उठे। उनकी मन्त्रणा पूरी हो चुकी थी। वे श्रीरामसे बोले- 'आप अपनी प्रतिज्ञाका पालन कीजिये।' ऐसा कहकर श्रीरामसे विदा ले वे चले गये। तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम राजभवनसे निकले और दुर्वासा मुनिको संतुष्ट करके उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें भोजन कराया। भोजन कराकर उन्हें प्रणाम किया और विदा करके लक्ष्मणसे कहा-'भैया लक्ष्मण! धर्मक कारण बड़ा भारी संकट आ गया, क्योंकि तुम मेरे वध्य हो गये। दैव बड़ा प्रबल है। वीर ! मैंने तुझे त्याग दिया (यही तुम्हारे लिये वध है)।अब तुम जहाँ चाहो, चले जाओ।' तब सत्य-धर्ममें स्थित रहनेवाले श्रीरामको प्रणाम करके लक्ष्मणजी दक्षिण दिशामें जाकर एक पर्वतके ऊपर तपस्या करने लगे। तदनन्तर भगवान् श्रीराम भी ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे साकेतपुरी और कौसल्या-प्रान्तके समस्त प्राणियों के साथ शान्तभावसे अपने परमधामको चले गये। उस समय सरयूके गोप्रतारघाटमें श्रीरामका चिन्तन करके जिन लोगोंने गोता लगाया, वें दिव्य शरीर धारण करके योगिदुर्लभ श्रीराम-धाममें चले गये। लक्ष्मणजी कुछ कालतक तपमें लगे रहे; फिर तपस्या एवं योगबलसे युक्त हो श्रीरामका अनुगमन करते हुए अविनाशी धाममें प्रवेश कर गये। सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने उस पर्वतको प्रतिदिन अपने सान्निध्यका वर दिया और उसपर अपना अधिकार रखा; अत: वह लक्ष्मणजीका

उत्तम क्षेत्र है। जो मनुष्य लक्ष्मणपर्वतपर भक्तिभावसे लक्ष्मणजीका दर्शन करते हैं, वे कृतार्थ होकर श्रीहरिके धाममें जाते हैं। उस तीर्थमें सुवर्ण, गौ, भूमि तथा अश्वके दानकी प्रशंसा की जाती है। वहाँ किया हुआ दान, होम, जप और पुण्यकर्म सब अक्षय होता है।