पुण्डरीकपुरका माहात्म्य, जैमिनिद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति

मोहिनी बोली- गुरुदेव! आपने जो गौतम- आश्रम तथा महर्षि गौतमका पवित्र उपाख्यान कहा है, उसे मैंने सुना। अब मैं पुण्डरौकपुरका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।

पुरोहित वसुने कहा- महादेवजी भक्तोंके वशमें रहते हैं और उन्हें तत्काल वर देते हैं। वे भक्तोंके सम्मुख प्रकट होते और उनको इच्छाके अनुसार कार्य करते हैं। एक समयको बात है, व्यासजीके शिष्य मुनीश्वर जैमिनि अनिवेश्य आदि शिष्योंके साथ तोधों में भ्रमण करते हुए पुण्डरीकपुरमें गये जो साक्षात् देवराज इन्द्रको अमरावतीपुरीके समान सुशोभित था। उस नगरकी शोभा देखकर महर्षि जैमिनि बड़े प्रसन्न हुए। वहाँ सरोवरमें मुनिने स्नान करनेके पश्चात् संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म तथा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण किया। फिर पार्थिव लिङ्गका

निर्माण करके पाद्य, अर्घ्य आदि विविध उपचारोंसे विधिपूर्वक उसका पूजन किया। पूजनके समय उनका चित्त पूर्णतः शान्त था; मनमें कोई व्यग्रता नहीं थी। गन्ध, सुगन्धित पुष्प, धूप, दीप तथा भाँति-भाँतिके नैवेद्योंसे भलीभाँति पूजन करके ज्यों ही महर्षि जैमिनि स्थिर होकर बैठे त्यों ही प्रसन्न होकर भगवान् शिव उनके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो गये।

तदनन्तर जैमिनि साक्षात् भगवान् उमापतिको प्रकट हुआ देख उनके आगे दण्डकी भांति पृथ्वीपर पड़ गये। फिर सहसा उठकर हाथ जोड़ शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले तथा आधे अङ्गमें हरि और आधेमें हररूपसे प्रकट हुए भगवान् शिवसे बोले।

जैमिनिने कहा- देवदेव जगत्पते! मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ; क्योंकि आप ब्रह्मा आदिके भी ध्यान करनेयोग्य साक्षात् महेश्वर मेरी दृष्टिके सम्मुख प्रकट हैं।

तब प्रसन्न होकर भगवान् शिवने उनके मस्तकपर अपना हाथ रखा और कहा-'बेटा! बोलो, तुम क्या चाहते हो?' भगवान् शिवका यह वचन सुनकर जैमिनिने उत्तर दिया-'भगवन्! मैं माता पार्वती, विघ्नराज गणेश तथा कुमार कार्तिकेयजीके साथ आपका दर्शन करना चाहता हूँ।' तब पार्वतीदेवी तथा अपने दोनों पुत्रोंके साथ भगवान् शङ्करने उन्हें दर्शन दिया। तत्पश्चात् प्रसन्नचित्त हो भगवान् शिवने फिर पूछा-'बेटा! कहो, अब क्या चाहते हो?' जैमिनिने जगद्गुरु शङ्करकी यह दयालुता देखकर मुसकराते हुए कहा-'मैं आपके ताण्डवनृत्यको झाँकी देखना चाहता हूँ।' तब उनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये भगवान् अम्बिकापतिने भाँति-भौतिकी क्रीडामें कुशल समस्त प्रमथगणोंका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वे नन्दी-भूजी आदि सब लोग कौतूहलमें भरकर वहाँ आये और गणेश, कार्तिकेय तथा पार्वतीसहित भगवान् शिवको नमस्कार करके देवदेव महादेवजीके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए चुपचाप हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तदनन्तर भगवान् रुद्र अद्भुत रूप बनाकर ताण्डवनृत्य करनेको उद्यत हुए। उस समय वे विचित्र वेश-भूषासे विभूषित हो अद्भुत शोभा पा रहे थे। उन्होंने चञ्चल नागरूपी बेलसे अपनी कमर कस ली थी। मुखपर कुछ-कुछ मुसकराहट खेल रही थी। ललाटमें आधे चन्द्रमाकी रेखा सुशोभित थी। सिरके बाल ऊपरकी ओर खड़े थे। उन्होंने अपने सुन्दर नेत्रकी तथा शरीरमें रमायी हुई विभूतिकी उज्ज्वल प्रभासे चन्द्रमा और उसकी चाँदनीको मात कर दिया था। नृत्यके समय उनके जटा-जूटसे झरती हुई गङ्गाके जलसे भगवान् का सारा अङ्ग भीग रहा था। ताण्डवकालमें बार-बार अपने चरणारविन्दोंके आघातसे वे समूची पृथ्वीको कम्पित किये देते थे। उत्तम वाद्य बज रहे थे और हर्षातिरेकसे भगवान् के अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। देवताओं तथा दैत्योंके अधिपतिगण अपने मुकुटकी मणियोंके प्रकाशसे भगवान् शिवके चरणकमलोंको शोभा बढ़ाते थे। गणेश, कार्तिकेय तथा गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके नेत्र भगवानके मुखपर लगे थे। भक्तोंके हृदयमें हर्षकी बाढ़-सी आ गयी थी और बड़े उत्साहसे जय-जयकार कर रहे थे। इस प्रकार भगवान् शिव अपने ताण्डवनृत्यसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए शोभा पा रहे थे।

तदनन्तर महेश्वरका ताण्डवनृत्य देखकर महर्षि जैमिनि आनन्दके समुद्र में डूब गये और एकाग्रचित्त हो वेदपादस्तानसे उनकी स्तुति करने लगे

* इस स्तुतिमें प्रत्येक श्लोकके अन्त में वैदिक मन्त्रका एक पाद रखा  गया है, इसलिये इसे वेदपादशिवस्तुति कहते हैं।

'काम्पिल्य देशमें निवास करनेवाली देवि। ब्रह्मा, विष्णु और शिव तुम्हारे चरणारविन्दोमें मस्तक झुकाते हैं। जगदम्ब। तुम्हें नमस्कार है। विघ्रराज! ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र और विष्णु आदि आपकी वन्दना करते हैं। गणपते। आप ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजीके अधिपति है, आपको नमस्कार है। उमादेवी अपने कोमल करारविन्दोंसे जिनके ललाटमें तिलक लगाती हैं, जो कानों में कुण्डल तथा गलेमें कमलपुष्पोंकी माला धारण करते हैं उन कुमार कार्तिकेयको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदिके लिये भी जिनका दर्शन करना अत्यन्त कठिन है उन भगवान् शिवकी स्तुति कौन कर सकता है? तथापि प्रभो! आपके दर्शनसे मेरे द्वारा स्वतः स्तुति होने लगी है, ठीक उसी तरह जैसे मेघोंकी घटासे स्वत: वर्षा होने लगती है। अम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिवको नमस्कार है। संहारकारी शर्व एवं कल्याणकारी शम्भुको नमस्कार है। ताण्डवनृत्य करनेवाले सभापति रुद्रदेवको नमस्कार है। जिनके पैरों की धमकसे सम्पूर्ण लोक विदीर्ण होने लगते हैं, मस्तकके आघातसे ब्रह्माण्डकी दीवार फट जाती है और भुजाओंके आघातसे समस्त दिगन्त विभ्रान्त हो उठता है उन भगवान् भूतनाथको नमस्कार है । ताण्डवके समय जिनके युगलचरणों में नूपुरकी छम-छम ध्वनि होती रहती है, जिनके कटिभागमें चर्ममय वस्त्र सुशोभित होता है और जो नागराजको मेखला धारण करते हैं उन भगवान् पशुपतिको नमस्कार है। जो कालके भी काल हैं, सोमस्वरूप, भोगशक्तिसम्पत्र तथा हाथमें शूल धारण करनेवाले हैं उन जगत्पति शिवको नमस्कार है। भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत् के पालक, समस्त देवताओंके नेता तथा पर्वतों और क्षेत्रोंके अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। लोककल्याणकारी आप भगवान् शङ्करको नमस्कार है। मालस्वरूप शिवको नमस्कार है। आत्माके अधिपति। आपको नमस्कार है।समस्त कामनामाकी वर्षा करनेवाले। आपको नमस्कार है। माप आठ भङ्गोंसे युक्त और अत्यन्त मनोरम स्वरूपवाले क्लेशमें पड़े हुए भक्तोंको अभीष्ट वस्तु प्रदान करनेवाले हैं; आप (दक्ष) यज्ञके नाशक और परम संतुष्ट हैं; आप पाँचों भूतोंके स्वामी, कालके नियन्ता, आत्माके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण दिशाओंके पालक है; आपको बारम्बार नमस्कार है। जो सम्पूर्ण विश्वके कर्ता, जगत्का भरण-पोषण करनेवाले तथा संसारका संहार करनेवाले हैं; अग्नि जिनका नेत्र और विश्व जिनका स्वरूप है; उन भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। ईशान! तत्पुरुष । वामदेव! सद्योजात! आपको नमस्कार है। भस्म ही जिनका आभूषण है, जो भक्तोंका भय भङ्ग करनेवाले हैं, जो भव (जगत्की उत्पत्तिके कारण), भर्ग (तेजस्वरूप), रुद्र (दु:ख-निवारण करनेवाले) तथा मीढ्वान् (भक्तोंकी आशालताको सींचनेवाले) हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके कपोल, ललाट, भौहें तथा शरीर सभी परम सुन्दर हैं; जो सोमस्वरूप हैं; उन भगवान् शिवको नमस्कार है। भगवन् ! सांसारिक क्लेशके कारण होनेवाले महान् भयका सदाके लिये आप उच्छेद करनेवाले हैं। भक्तोंपर कृपाकी वर्षा करनेवाले। आपको नमस्कार है। जो आनन्दके समुद्र तथा ताण्डवलास्यके द्वारा परम सुन्दर प्रतीत होते हैं उन सम्पूर्ण जगत्के स्वामी तथा देवसभाके अधीश्वर अद्भुत देवता महादेवको मैं नमस्कार करता हूँ। यक्षराज कुबेर जिन्हें अपना इष्टदेव मानते हैं उन अविनाशी परम प्रभु महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो एक बार भी प्रणाम करनेवाले भक्तको संसाररूपी महासागरसे तार देते हैं उन चराचर जगतके स्वामी भगवान् ईशानको में प्रणाम करता हूँ। जो जगत् के धारण- पोषण करनेवाले और ईघर है। समस्त सम्पत्रियोंक दाता है; देवताओंके नेता, विजेता तथा स्वयं कभी पराजित न होनेवाले हैं उन भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो मुझे और इन तीनों लोकोंको रचकर सबका धारण-पोषण करते हैं उन कालके भी नियन्ता आप भगवान् गङ्गाधरकी मैं वन्दना करता हूँ। जिनसे यजुर्वेदके साथ ऋग्वेद और सामवेद भी प्रकट हुए हैं उन सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वस्वरूप, विद्वान् एवं ईश्वर शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे देखते रहते हैं तथा जिनके भयसे भूत, वर्तमान और भविष्य जगत्के जीव पापकर्मीका त्याग करते हैं, उन सर्वोत्तम द्रष्टा आप भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो देवताओंके नियन्ता और समस्त पापोंको हर लेनेवाले हर हैं उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न शान्त संन्यासी अपने हृदयकमलमें जिन कल्याणमय परमात्माकी उपासना करते हैं, उन ईशान देवको मैं प्रणाम करता हूँ।

'ईश! मैं अज्ञानी, अत्यन्त क्षीण, अशिक्षित, असहाय, अनाथ, दीन, विपत्तिग्रस्त तथा दरिद्र हूँ; आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं दुर्मुख, दुष्कर्मी, दुष्ट तथा दुर्दशाग्रस्त हैं; मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जिसको सिद्धिके लिये वरण करूँ। शम्भो ! राग, देष तथा मदकी लपटोंसे प्रज्वलित संसाररूपी अनिके द्वारा हम दग्ध हो रहे हैं; दयालो! आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके अनेक नाम हैं और बहुतोंने आपका स्तवन किया है। हर ! मैं परायी स्त्री, पराये घर, पराये वस्त्र, पराये अन्न तथा पराये आश्रयमें आसक्त हूँ: आप मेरी रक्षा करे  मुझे विश्वका भरण-पोषण करनेवाली धन-सम्पत्तिके साथ उत्तम विद्या दीजिये। देवेश! अनिष्ट तो मुझे सहस्रों मिलते हैं, किंतु इष्ट वस्तुका सदा वियोग ही बना रहता है; आप मेरे मानसिक रोगका नारा कीजिये। भगवन् । आप महान् हैं। देवेश आप ही हमारे रक्षक है,दूसरा कोई मेरी रक्षा करनेवाला नहीं है। आप ब्रह्माजीके भी अधिपति है, अत: मुझे स्वीकार करके मेरी रक्षा कीजिये। उमापते । आप ही मेरे माता-पिता, पितामह, आयु, बुद्धि, लक्ष्मी, भ्राता तथा सखा हैं। देवेश! आप ही सब कर्मके कर्ता हैं, अत: मैंने जो भी दुष्कर्म किया है, वह सब आप क्षमा करें। प्रभुतामें आपकी समता करनेवाला कोई नहीं है और लघुतामें मैं भी अपना सानी नहीं रखता। अत: देव! महादेव! मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं। आपके मुखपर सुन्दर मुसकान सुशोभित है। गोरे अङ्गोंमें लगी हुई विभूति उनकी गौरताको और बढ़ा देती है। आपका श्रीविग्रह बालसूर्यके समान तेजस्वी तथा सौम्य है। आपका मुख सदा प्रसन्न रहता है तथा आप शान्तस्वरूप हैं। मैं मन और वाणीके द्वारा आपके गुणोंका गान करता हूँ। ताण्डवनृत्य करते और मेरी ओर देखते हुए आप भगवान् उमाकान्तको हम सैकड़ों वर्षोंतक निहारते रहें, यही हमारा अभीष्ट वर है। महाभाग! भगवन्! हम आपके प्रसादसे नीरोग, विद्वान् और बहुश्रुत होकर सैकड़ों वर्षातक जीवित रहें। ईशान। स्त्री तथा भाई-बन्धुओंके साथ आपके ताण्डवरूपी अमृतका यथेष्ट पान करते हुए सैकड़ों वर्षोंतक आनन्दका अनुभव करते रहें। देवदेव महादेव । हम इच्छानुसार आपके चरणारविन्दोंके मधुर मकरन्दका पान करते हुए सौ वर्षातक आमोदमें मग्न रहें। 'महादेव। हम प्रत्येक जन्ममें कोट, नाग, पिशाच अथवा जो कोई भी क्यों न हों, सैकड़ों वर्षांतक आपके दास बने रहे। ईश। देव महादेव । हम सभामें अपने कानाद्वारा आपके नृत्य, चाच तथा कण्ठकी मधुर ध्वनिका सैकड़ों वर्षातक श्रवण करते रहें। जो स्मरणमात्रसे संसर-बन्धनका नाश करनेवाले है,आपके उन दिव्य नामोंका हम सैकड़ों वर्षातक कीर्तन करते रहे। जो नित्य तरुण, सम्पूर्ण विश्वके अधिपति तथा त्रिकालदर्शी विद्वान् है उन भगवान् शिवका मैं कब दर्शन करूंगा। जिसमें बहुत-से पाप भरे हुए हैं, जिसने कभी लेशमात्र भी पुण्यका उपार्जन नहीं किया है तथा जिसकी बुद्धि अत्यन्त खोटी है ऐसे मुझ अधमको भगवान् महेश्वर क्या कभी अपना सेवक जानकर स्वीकार करेंगे? गायको। तुम गाओ; यदि राग आदि प्राप्त करना चाहते हो तो कुबेरके सखा भगवान् शिवकी महिमाका गान करो। सखी जिह्वे ! तेरा कल्याण हो। तू विद्यादाता उमापतिकी उच्च स्वरसे स्तुति बोला कर। अजन्मा जीव! तू शान्तभावसे चेत जा, क्या तुझे यह ज्ञात नहीं है कि इन भगवान् शिवकी तृप्तिसे ही यह सम्पूर्ण जगत् तृप्त होता है। इसलिये इनके नामामृतका पान कर। ऐ मेरे चित्त! जिनकी गन्ध मनोहर और स्पर्श सुखद है, जो सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं तथा चन्द्रमा जिनका आभूषण है उन भगवान् शङ्करका गाढ़ आलिङ्गन कर। त्रिपुरासुरका अन्त करनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है। तीनों लोकोंके स्वामी दिगम्बर शिवको नमस्कार है। भवकी उत्पत्तिके कारण भगवान् शिवको नमस्कार है। प्रभो। आपकी असंख्य प्रजाएँ हैं तथा आपका स्वरूप अत्यन्त विचित्र है। आपसे हो जगत् की उत्पत्ति हुई है। जिनका सुवर्णमय पादपीठ देवराज इन्द्रके महाकिरीटमें जड़े हुए नाना प्रकारके रत्नोंसे आवृत होता है, भस्म ही जिनका अङ्गराग है तथा जिनसे भिन्न पर अथवा अपर किसी भी वस्तुकी सत्ता नहीं है, उन परमेश्वर शिवको नमस्कार है। जिन आपमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता और विलीन हो जाता है, जो छोटे-से-छोटे और बड़े से बड़े हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है। जो अव्यक्त, अचिन्त्य, एक, दिगम्बर आयशस्वरूप, अजन्मा, पुराणपुरुष तथा यज्ञयूपमय है उन भगवान् हरको मैं प्रणाम करता हूँ। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण तथा ऊपर-नीचे सब ओर वे ही तो है। जो चन्द्रमाका मुकुट धारण करते है तथा जो परमानन्दस्वरूप एवं शोक-दु:खासे रहित हैं; सबके हृदयकमलमें परमात्मरूपसे जिनका निवास है। जिनसे सम्पूर्ण दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ प्रकट हुई हैं; उन शिवस्वरूप भगवान् महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। चन्द्रमौले! राग आदि कपट- दोषके कारण प्रकट हुई भवरूपी महारोगसे मैं बड़ी घबराहटमें हूँ। अपनी कृपादृष्टि से मुझे देखकरआप मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि वैद्योंमें आप सबसे बड़े वैद्य हैं।

'मेरे मनमें दुःखका महासागर उमड़ आया है, मैं लेशमात्र सुखसे भी वञ्चित हूँ, पुण्यका तो मैंने कभी स्पर्श भी नहीं किया है और मेरे पातक असंख्य हैं; मैं मृत्युके हाथमें आ गया हूँ और बहुत डरा हुआ हूँ; भगवान् भव! आप आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सब ओरसे मेरी रक्षा कीजिये। महेश ! मैं असार-संसाररूपी महासागरमें डूबकर जोर-जोरसे क्रन्दन कर रहा हूँ; मेरा राग बहुत बढ़ गया है; मैं सर्वथा असमर्थ हो गया हूँ; आप अपनी कृपादृष्टिसे मेरी रक्षा कीजिये। जिनके मुखपर मनोहर मुसकानकी छटा छा रही है, चन्द्रमाकी कला जिनके मस्तकका आभूषण बनी हुई है तथा जो अन्धकारसे परे हैं, उन सूर्यके समान तेजस्वी भगवान् शिवका माता पार्वतीके साथ कब दर्शन करूँगा? अनादिकालसे मुक्तिको इच्छा रखनेवाले जीवो! तुम सब लोग यहाँ आओ और अपने हृदयकमलमें भगवान् शिवका चिन्तन करो, क्योंकि जिन्होंने वेदान्त-शास्त्र (उपनिषद्)-के विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्माको पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है, वे ज्ञानीजन मोक्षके लिये सदा उन्हींका ध्यान करते हैं। जो उत्तम पुत्रकी इच्छा रखनेवाले है, मनुष्य भी इन निरव तरुण भगवान् शिवकी आराधना करें। इन्हींसे सृष्टिके आरम्भमें जगद्विधाता स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रकट हुए थे। बहुत कहनेसे क्या लाभ? इन भगवान् शिवकी शरणमें जानेसे समस्त कामनाएँ सिद्ध होती है। पूर्वकालमें इन्हींकी शरण लेकर महर्षि अगस्त्य दिन-रातमें वृद्धावस्थासे युवा हो गये थे। ऐ मेरे नेत्ररूपी भ्रमरो। तुम और सब कुछ छोड़कर सदा इन भगवान् शिवका ही आश्रय लो। ये आमोदवान् (सुगन्ध और आनन्दसे परिपूर्ण) और मृदु (कमलसे भी कोमल) हैं। परम स्वादिष्ट एवं मधुर हैं; ये तुम्हारा कल्याण करेंगे। ओ मनुष्य! तुम भगवान् शिवकी शरण लेकर ऐसे हो जाओगे कि तुम्हारी किसीसे भी तुलना नहीं हो सकेगी। तुम समस्त मनुष्यों और देवताओंको भी अपने गुणोंसे परास्त कर दोगे। वाणी तुम्हें नमस्कार है; तुम हृदयगुफामें शयन करनेवाले इन नित्य-तरुण भगवान् महेश्वरकी स्तुति करो। मन! तू जिस- जिस अभीष्ट वस्तुका चिन्तन करेगा, वह सब तुझे अवश्य प्राप्त होगी। विषयोंमें कभी दुःखसे छुटकारा नहीं मिल सकता। हम हृदयकी शुद्धिके लिये भगवान् रुद्रकी आराधना करेंगे। दयालु भगवन् ! हमने पूर्वकालमें अज्ञानवश जो आपके विरुद्ध अपराध या दुष्कर्मका अनुष्ठान किया है, वह सब क्षमा करके जैसे पिता अपने पुत्रोंको आश्रय देता है उसी प्रकार आप हमें भी अपनाइये। 'संसार नामक क्रोधमें भरे हुए सर्पने राग, द्वेष, उन्माद और लोभ आदिरूप तीखे दाँतोंसे मुझे डंस लिया है। इस अवस्थामें मुझे देखकर सबको रक्षा करनेवाले दयालु देवता पिनाकधारी भगवान् शिव मेरी रक्षा करें। रुद्रदेव | जो लोग समाधिके अन्त में उपर्युक्त वचन कहकर आपको नमस्कार करते हैं, वे जन्म-मृत्युरूपी सर्पसे डसे हुए लोग संत होकर आपको प्राप्त होते हैं। नीलग्रीव । मैं जीवात्मारूपसे ब्रह्माजीके साथ आपकी वन्दना करता हुआ आपको ही शरण आवा हूँ। अनाषनाथ वसुस्वरूप! महेश्वर! हम सांसारिक चिन्ताके भीषण ज्वरसे पीडित है; बड़े-बड़े रोगोंसे ग्रस्त हो गये हैं; समस्त पावकोंकि निवासस्थान बने हुए हैं। कालकी दृष्टि हमसे दूर नहीं है। ऐसी दशामें आप अपने औषधरूप हाथसे हमारा स्पर्श करें। शूरवीर! आपका करस्पर्श सम प्रकारको सिद्धियोंका हेतु है। आप कालके भी काल हैं। संसारकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् भवको नमस्कार है। भस्मभूषित वक्षवाले हरको नमस्कार है। संसारके पराभव और भयमें साथ देनेवाले पिनाकधारी रुद्रको नमस्कार है। विश्वके पालक कल्याणस्वरूप शिवको नमस्कार है। जीवके सनातन सखा उन महेश्वरको नमस्कार हैं, जिनके सखारूप जीवको न तो कोई मार सकता है और न कोई परास्त ही कर सकता है। देवताओंके पति, इन्द्रके भी स्वामी भगवान् शिवको नमस्कार है। प्रजापतियोंके और भूमिपतियोंके भी अधिपति भगवान् शिवको नमस्कार है तथा अम्बिकापति उमापतिको नमस्कार है, नमस्कार है।

'जो प्रणतजनोंकी पौड़ाका नाश करनेवाले, त्रिकालदर्शी, विद्वानोंमें भी सबसे श्रेष्ठ विद्वान् और उत्तम यशवाले हैं उन भगवान् गणेशको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। देवतालोग युद्धमें जिन स्कन्दस्वामीका आवाहन करके विजय पाते हैं उन सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् सुब्रह्मण्यकी मैं वन्दना करता हूँ। सुब्रह्मण्य स्कन्दस्वामी सच्चिदानन्दमय हैं। कल्याणमयी जगदम्बिकाको नमस्कार है। कल्याणमय विग्रहवाली शिवप्रियाको नमस्कार है। जिनके शरीरको कान्ति सुवर्णक समान है, जो अपने चरणोंमें मणिमय नुपुर धारण करती हैं, जिनका मुख सदा प्रसन्न रहता है। जो अपने हाथों में कमल धारण किये रहती हैं। जिनके नेत्र विशाल हैं, जो भाषाशास्त्रको विदुषी तथा उत्तम वचन बोलनेवाली हैं, उन गौरीदेवीको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं मेनाकी पुत्री उन उमादेवीको नमस्कार करता हूँ। जो अनमेव है- जिनके सौन्दर्य आदि दिव्य गुणोंका माप नहीं है तथा जो परम कान्तिमती है एवं जो सदा भगवान् शङ्करके पार्श्वभागमें रहती हैं और समस्त भुवनोंको देखा करती हैं, उन पार्वतीदेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। दीनजनोंकी रक्षा जिनके लिये मनोरञ्जनका कार्य है; जो मान और आनन्द देती हैं तथा जो विद्याओं और मधुर एवं मङ्गलमयी वाणीकी नायिका और सिद्धिकी स्वामिनी हैं, उन पार्वतीजीको मैं प्रणाम करता हूँ। भवानी! आप सांसारिक तापके महान् भयका निवारण करनेवाली हैं। अन्न, वस्त्र और आभूषण आदि एकमात्र आपके ही उपभोग हैं। शिवे! आप मुझे वह श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान कीजिये जो कहीं भी कुण्ठित न होनेवाली हो तथा जिसके द्वारा हम समस्त पापोंको लाँघ जायें। शिवे! आपकी उपमा कैसे और कहाँ दी जाय? सम्पूर्ण जगत्को सृष्टि आपके लिये खिलवाड़ है। कल्याणमय भगवान् शिव आपके पति हैं। साक्षात् भगवान् विष्णु आपके सेवक हैं। लक्ष्मी, शची और सौभाग्यवती सरस्वती आपकी दासियाँ है तथा माप स्वयं ही वसु (रम, धन, सुवर्ण आदि) देनेवाली है।'

पुरोहित बसु कहते है- महामुनि जैमिनिने उपर्युक्त स्तुतिके द्वारा इस प्रकार भगवान् शङ्करका स्तवन करके प्रेमानुपूर्ण नयनोंसे देखते हुए सभापति भगवान् शिवको प्रणाम किया। उन्होंने बारम्बार भगवान् शिवके ताण्डव नृत्यरूप मङ्गलमय अमृतका पान करके सम्पूर्ण कामनाएँ पा ली और अन्तमें शिवगणोंका आधिपत्य प्रास कर लिया। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रके एक श्लोक, आधे श्लोक, एक पाद अथवा आधे पादको भी धारण करता है, वह शिवलोकमें जाता है। शुभे! जहाँ भगवान् शिवने ताण्डवनृत्य किया था, वह स्थल पवित्रसे भी परम पवित्र तीर्थ बन गया। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो श्रेष्ठ मानव वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, वह अपने पूर्वजोंको स्वर्गलोक पहुँचा देता है। जो उस तीर्थमें ब्राह्मणको गौ, सुवर्ण, भूमि, शय्या, वस्त्र, छाता, अन्न और पान (पीनेयोग्य वस्तु) देता है, उसका वह समस्त दान अक्षय होता है।