राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत देख मोहिनीका मूच्छित होना और पन्नी, पुत्रसहित राजा रुक्माङ्गदका भगवान्के शरीरमें प्रवेश करना

वसिष्ठजी कहते हैं- पुत्रका यह वचन सुनकर राजा रुक्माङ्गदने उस समय संध्यावलीके मुखकी ओर देखा, जो कमलके समान प्रसनतासे खिल उठा था। फिर मोहिनीकी बात सुनी, जिसमें एकादशीको भोजन करो, पुत्रको न मारो, यदि भोजन न करना हो तो पुत्रका वध करो। यही बार-बार आग्रह किया जा रहा था। नृपश्रेष्ठ! इसी समय कमलनयन भगवान् विष्णु अदृश्यरूपसे आकाशमें आकर ठहर गये। उनकी अङ्ग-कान्ति मेघके समान श्याम थी। वे स्वभावतः निर्मल-निर्दोष हैं। भगवान् श्रीहरि गरुड़की पीठ पर बैठकर वीर धर्माङ्गद, राजा रुक्माङ्गद तथा देवी संध्यावली-तीनोंके धैर्यका अवलोकन कर रहे थे। जब मोहिनीने पुनः 'एकादशीके दिन भोजन करो, भोजन करो' की बात दुहरायी, तब राजाने हर्षयुक्त हृदयसे भगवान् गरुडध्वजको प्रणाम करके पुत्र धर्माङ्गदको मारनेके लिये चमचमाती हुई तलवार हाथमें ले ली। पिताको खड्गहस्त देख धर्माङ्गदने माता, पिता तथा भगवान् को प्रणाम किया। तदनन्तर माताके उदार मुखपर दृष्टि डालकर राजकुमारने अपनी गरदन धरतीसे सटा ली। धर्माङ्गदने उसे ठीक तलवारकी धारके सामने रखा। वे पिताके भक्त तो थे ही, माताके भी महान् भक्त थे।

राजन् ! जब पुत्रने चन्द्रमाके समान मनोहर मुखको प्रसन्न रखते हुए अपनी गरदन समर्पित कर दी और सम्पूर्ण जगत्के शासक महाराज रुक्माङ्गदने हाथमें तलवार उठा ली, उस समय वृक्षों और पर्वतासहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी। समुहम भार आ गया. मानो वह तीनों लोकोको तत्क्षण डुबो देने के लिये उद्यत हो गया हो। पृथ्वीपर सैकड़ों उल्काएँ गिरने लगीं। आकाशमें बिजली चमक उठी और गड़गड़ाहटकी आवाज होने लगी। मोहिनीका रंग फीका पड़ गया। उसने सोचा, 'जगत्स्रष्टा विधाताने इस समय मुझे व्यर्थ ही जन्म दिया। मेरा यह विमोहक रूप विडम्बनामात्र बनकर रह गया; क्योंकि इससे प्रभावित होकर राजाने पापनाशिनी एकादशीके दिन अन्न नहीं खाया। अब तो स्वर्गलोकमें मैं तिनकेके समान हो जाऊँगी। राजामें सत्त्वगुण एवं धैर्य अधिक होनेसे ये मोक्षमार्गको चले जायेंगे, किंतु मैं पापिनी भयंकर नरकमें पड़ेंगी।' नृपश्रेष्ठ! इसी समय महाराज रुक्माङ्गदने तलवार ऊपर उठायो। यह देख मोहिनी मोहसे मूञ्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। राजा धैर्य और हर्षसे युक्त हो पुत्रका चन्द्रमाके समान प्रकाशमान कुण्डलमण्डित मनोहर मुखयुक्त मस्तक काटना ही चाहते थे कि उसी समय भगवान् श्रीहरिने अपने हाथसे उन्हें पकड़ लिया और कहा-'राजन् ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न , बहुत प्रसन्न हूँ, अब तुम मेरे पैकुण्ठधामको चलो। अकेले ही नहीं, अपनी प्रिया रानी संध्यावली और पुत्र धर्माङ्गदको भी साथ ले लो। तीनों लोकोंके लिये पूजनीय, निर्मल तथा उज्ज्वल कीर्तिकी स्थापना करके यमराजके मस्तकपर पाँव रखकर मेरे शरीरमें मिल जाओ।' ऐसा कहकर चक्रधारी भगवान्ने राजाको अपने हाथसे छू दिया। भगवान्के स्पर्शमात्रसे उनका (मोहिनीमें आसक्तिरूप) रजोगुण धुल गया। वे महात्मा नरेश अपनी पत्नी और पुत्रके साथ वेगपूर्वक समीप जा भगवान्के दिव्य शरीरमें समा गये। उस समय आकाशसे पुष्पसमूहकी वर्षा होने लगी। हर्षमें भरे हुए सिद्ध तथा देवताओंके लोकपाल दुन्दुभियाँ बजाने लगे, जिनकी आवाज सब ओर गूंज उठी। सूर्यपुत्र यमराजने यह अद्भुत दृश्य अपनी आँखोंसे देखा। राजा उनकी लिपिको मिटाकर अपनी स्त्री और पुत्रके साथ भगवान् के शरीरमें समा गये थे और सर्वसाधारण लोग भी राजाके सिखाये हुए मार्गपर स्थित होकर एकादशीका व्रत एवं भगवान्का कीर्तन आदि करते हुए वैकुण्ठके ही मार्गपर जाते थे। यह सब देखकर भयभीत हुए यमराज चतुर्मुख ब्रह्माजीके समीप पुनः जाकर बोले-'सुरलोकनाथ! अब मैं यमराजके पदपर नियुक्त नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरी आज्ञा जगत्से उठ गयी। तात! मेरे लिये कोई दूसरा कार्य करनेकी आज्ञा प्रदान की जाय। दण्ड देनेका कार्य अब मेरे जिम्मे न रहे।'