विविध प्रायश्चित्तका वर्णन, इष्टापूर्तका फल और सूतक, श्राद्ध तथा तर्पण का विवेचन

धर्मराज कहते हैं- नृपश्रेष्ठ! अब मैं चारों वर्गों के लिये वेदों और स्मृतियोंमें बताये हुए धर्मका क्रमशः वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो भोजन करते समय क्रोधमें या अज्ञानवश किसी अपवित्र वस्तुको या चाण ल एवं पतितको छू लेता है, उसके लिये प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। वह क्रमानुसार अर्थात् अपवित्र वस्तुके स्पर्श करनेपर तीन रात और चाण्डाल या पतितका स्पर्श कर लेनेपर छ: राततक पञ्चगव्यसे तीनों समय सान करे तो शुद्ध होता है। यदि कदाचित्  भोजन करते समय ब्राह्मणके गुदासे मलस्राव हो जाय अथवा जूठे मुँह या अपवित्र रहनेपर ऐसी बात हो जाय तो उसकी शुद्धिका उपाय बतलाता हूँ। पहले वह ब्राह्मण शौच जाकर जलसे पवित्र होवे (अर्थात् शौच जाकर जलसे हाथ-पैरकी शुद्धि करके कुल्ला और स्नान करे)। तदनन्तर दिन-रात उपवास करके पञ्चगव्य पीनेसे शुद्ध होता है। यदि भोजन करते समय पेशाब हो जाय अथवा पेशाब करनेपर बिना शुद्ध हुए ही भोजन कर ले तो दिन-रात उपवास करे और अग्निमें

*यो देवः सर्वदविष्णुशागलपी निरामः।

सर्वधर्मफलं पूर्णं संतुष्टः प्रददति च।।

यस्य स्मरणमात्रेण देवदेवस्य चक्रिणः।

सफलानि भवन्त्येव सर्वकार्माणि भूपते।।

परमात्मा जगन्नाथाः सर्वकर्मफलपदः।

सत्कर्मकर्तूभिर्नित्यं स्मृतः सर्वार्तिनाशनः।।

तमुहिश्य कृतं पच्च तदानन्त्याय कल्पते।।

धर्माणि विष्णुच फलानि विष्णुः कर्माणि विष्णुन फलानि भोक्ता।

कार्य च विष्णुः करणानि विष्णुरस्मान्न किंचिद् व्यतिरित्कमस्ति।।

घीकी आहुति दे। यदि भोजनके समय ब्राह्मण किसी भी निमित्तसे अपवित्र हो जाय तो उस समय ग्रासको जमीनपर रखकर स्नान करनेके पश्चात् शुद्ध होता है। यदि उस ग्रासको खा ले तो उपवास करनेपर शुद्ध होता है और यदि अपवित्र अवस्थामें वह सारा अन्न भोजन करके उठे तो तीन राततक वह अशुद्ध रहता है (अर्थात् तीन रात्रितक उपवास करनेसे शुद्ध होता है)। यदि भोजन करते-करते वमन हो जाय तो अस्वस्थ मनुष्य तीन सौ गायत्री मन्त्रका जप करे और स्वस्थ मनुष्य तीन हजार गायत्री जपे, यही उसके लिये उत्तम प्रायश्चित्त है। यदि द्विज मल-मूत्र करनेपर चाण्डाल या डोमसे छू जाय तो वह त्रिरात्र व्रत करे और यदि भोजन करके जूते मुंह छू जाय तो छ: राततक व्रत करे। यदि रजस्वला और सूतिका स्त्रीको चाण्डाल छू ले तो तीन राततक व्रत करनेपर उसकी शुद्धि होती है-यह शातातप मुनिका वचन1 है। यदि रजस्वला स्त्री कुत्तों, चाण्डालों अथवा कौओंसे छू जाय तो वह अशुद्ध अवस्थातक निराहार रहे; फिर समवपर (चौथे दिन) स्नान करनेसे वह शुद्ध होती है। यदि दो रजस्वलाएँ आपसमें एक दूसरीका स्पर्श कर लेती हैं तो ब्रह्मकूर्च2 पीनेसे उनकी शुद्धि होती है और ऊपरसे भी ब्रह्मकूर्चद्वारा उन्हें स्नान कराना चाहिये। जो जूठेसे छू जानेपर तुरंत स्रान नहीं कर लेता, उसके लिये भी यही प्रायश्चित्त है। ऋतुकालमें मैथुन करनेवाले पुरुषको गर्भाधान होनेकी आशङ्कासे स्नान करनेका विधान है। बिना ऋतुके स्त्रीसङ्गम करनेपर मल-मूत्रकी ही भाँति शुद्धि मानी गयी है। अर्थात् हाथ, मुँह आदि धोकर कुल्ला करना चाहिये। मैथुनकर्ममें लगे हुए पति-पत्नी दोनों ही अशुद्ध होते हैं, परंतु शय्या से उठनेपर स्त्री तो शुद्ध हो जाती है, किंतु पुरुष स्नानके पूर्वतक अशुद्ध ही बना रहता है। जो लोग पतित न होनेपर भी अपने बन्धुजनोंका त्याग करते हैं, (राजाको उचित है कि) उन्हें उत्तम साहस3 का दण्ड दे। यदि पिता पतित हो जाय तो उसके साथ इच्छानुसार बर्ताव करे।

1. इस प्रसङ्गके प्रायः अधिक श्लोक यम-स्मृतिसे और कुछ श्लोक वृद्धशातातप-स्मृतिसे भी मिलते हैं।

2. पश्चगव्य और कुशोदक मिलानेसे ब्रह्मकूर्च बनता है। उसकी विधि इस प्रकार है-पलाश या कमलके पत्तेमें अथवा ताँबे या सुवर्णके पात्रमें पञ्चगव्य संग्रह करना चाहिये। गायत्री मन्त्रसे गोमूत्रका, 'गन्धद्वारा०' इस मन्त्रसे गोबरका, 'आप्यायस्व०' इस मन्त्रसे दूधका, 'दधिक्राव्णो०' इस मन्त्रसे दहीका, 'तेजोऽसि शुक्र०' इस मन्त्रसे पीका और 'देवस्य त्वा०' इस मन्त्रसे कुशोदकका संग्रह करे। चतुर्दशीको उपवास करके अमावास्याको उपर्युक्त वस्तुओंका संग्रह करे। गोमूत्र एक पल होना चाहिये। गोबर आधे अंगूठेके बराबर हो। दूधका मान सात पल और दहीका तीन पल है। घी और कुशोदक एक-एक पल बताये गये हैं। इस प्रकार इन सबको एकत्र करके परस्पर मिला दे। तत्पश्चात् सात-सात पत्तोंके तीन कुश लेकर जिनके अग्रभाग कटे न हों, उनसे ठस पञ्चगव्यकी अग्रिमें आहुति दे।आहुतिसे बचे हुए पञ्चगव्यको प्रणवसे आलोडन और प्रणवसे ही मन्थन करके प्रणवसे ही हाथमें ले तथा फिर प्रणवका ही उच्चारण करके उसे पी जाय। इस प्रकार तैयार किये हुए पञ्चगव्यको ब्रह्मकूर्च कहते है। स्त्री-शूद्रोंको ब्राह्मणके द्वारा

पञ्चगव्य बनवाकर प्रणव उच्चारणके बिना ही पीना चाहिये। सर्वसाधारणके लिये ब्रह्मकूर्च-पानका मन्त्र यह है-

यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम्।

ब्रह्मकूर्ची दहेत्सर्व प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम् ।।

(वृद्धशातातप० १२)

अर्थात् 'देहधारियोंके शरीरमें चमड़े और हड्डीतकमें जो पाप विद्यमान है, वह सब ब्रह्मकूर्च इस प्रकार जला दे, जैसे प्रज्वलित आग ईंधनको जला डालती है।'

 मनुष्य बलके अभिमानसे जो क्रूरतापूर्ण कर्म करता है, उसे 'साहस' कहते हैं। उसके तीन भेद है-प्रथम, मध्यम और उत्तम।फल, मूल, जल आदि और खेतकी साम्रगी को नष्ट करना ‘प्रथम साहस’ माना गया है। वस्न,

अर्थात् अपनी रुचिके अनुसार उसका त्याग और ग्रहण दोनों कर सकते हैं; किंतु माताका त्याग कभी न करे। जो रस्सी आदि साधनोंद्वारा फाँसी लगाकर आत्मघात करता है, वह यदि मर जाय तो उसके शरीरमें पवित्र वस्तुका लेप करा दे और यदि जीवित बच जाय तो राजा उससे दो सौ मुद्रा दण्ड ले। उसके पुत्र और मित्रोंपर एक-एक मुद्रा दण्ड लगावे और वे लोग शास्त्रीय विधिके अनुसार प्रायश्चित्त करें। जो मनुष्य मरनेके लिये जलमें प्रवेश करके अथवा फाँसी लगाकर मरनेसे बच जाते हैं, जो संन्यास ग्रहण करके और उपवास व्रत प्रारम्भ करके उसे त्याग देते हैं, जो विष पीकर अथवा ऊँचे स्थानसे गिरकर मरनेकी चेष्टा करनेपर भी जीवित बच जाते हैं तथा जो शस्त्रका अपने ऊपर आघात करके भी मृत्युसे वञ्चित रह जाते हैं, वे सब सम्पूर्ण लोकसे बहिष्कृत हैं। इनके साथ भोजन या निवास नहीं करना चाहिये। ये सब-के-सब एक चान्द्रायण अथवा दो तप्तकृच्छ्वत करनेसे शुद्ध होते हैं। कुत्ते, सियार और वानर आदि जन्तुओंके काटनेपर तथा मनुष्यद्वारा दाँतसे काटे जानेपर भी मनुष्य दिन, रात अथवा संध्या कोई भी समय क्यों न हो, तुरंत स्नान कर लेनेपर शुद्ध हो जाता है। जो ब्राह्मण अज्ञानसे-अनजानमें किसी प्रकार चाण्डालका अन्न खा लेता है, वह

गोमूत्र और यावकका आहार करके पंद्रह दिनमें शुद्ध होता है। गौ अथवा ब्राह्मणका घर जलाकर,फाँसी आदि लगाकर मरे हुए मनुष्यका स्पर्श करके तथा उसके बन्धनोंको काटकर ब्राह्मण अपनी शुद्धिके लिये एक कृच्छ्रव्रतका आचरण करे। माता, गुरुपत्नी, पुत्री, बहिन और पुत्रवधूसे समागम करनेवाला तो प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर जाय। उसके लिये दूसरा कोई शुद्धिका उपाय नहीं है। रानी, संन्यासिनी, धाय, अपनेसे श्रेष्ठ वर्णकी स्त्री तथा समान गोत्रवाली स्त्रीके साथ समागम करनेपर मनुष्य दो कृच्छ्रव्रतका अनुष्ठान करे। पिताके गोत्र अथवा माताके गोत्रमें उत्पन्न होने वाली अन्यान्य स्त्रियों तथा सभी परस्त्रियोंसे अनुचित सम्बन्ध रखनेवाला पुरुष उस पापसे हटकर अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रशान्तपनव्रत करे। द्विजगण खूब तपाये हुए कुशोदकको केवल एक बार पाँच राततक पीकर वेश्यागमनके पापका निवारण करते हैं। गुरुतल्पगामीके  लिये जो व्रत है, वही कुछ लोग गोघातकके लिये भी बताते हैं और कुछ विद्वान् अवकीर्णी (धर्मभ्रष्ट) के लिये भी उसी व्रतका विधान है करते हैं। जो डंडेसे गौके ऊपर प्रहार करके उसे मार गिराता है, उसके लिये गोवधका जो सामान्य में प्रायश्चित्त है, उससे दूना व्रत करनेका विधान है। तभी वह व्रत उसके पापको शुद्ध कर सकता है।

पशु, अन्न,पान और घरकी सामग्री आदिकी लूट-खसोट करना 'मध्यम साहस' कहा गया है। जहर देकर या हथियारसे किसीको मारना, परायी स्त्रियोंसे बलात्कार करना तथा अन्यान्य प्राणनाशक कार्य करना 'उत्तम साहस' के अन्तर्गत है। प्रथम साहस' का दण्ड है कम-से-कम सौ पण, 'मध्यम साहस' का दण्ड कम-से-कम पाँच सौ पण हैं। 'उत्तम साहस' में कम-से-कम एक हजार पण दण्ड लगाया जाता है। इसके सिवा, अपराधीका वध या अङ्ग-भङ्ग अथवा सर्वस्व-हरण या नगरसे निर्वासन आदि भी 'उत्तम साहस' के दण्ड बताये गये हैं; जैसा कि नारद-स्मृतिमें कहा गया है-

तस्य दण्डः क्रियापेक्षः प्रथमस्य शतावरः।

मध्यमस्य तु शास्त्रज्ञैर्दृष्टः पञ्चशतावरः॥

उत्तमे साहसे दण्डः सहस्रावर इष्यते।

वधः सर्वस्वहरणं पुरान्निर्वासनाङ्कने॥

तदनच्छेद इत्युक्तो दण्ड उत्तमसाहसे॥

गौको होकने के लिये अँगूठेके बराबर मोटी, बाँहके बराबर बड़ी पल्लवपुछ और गीली पवली डालका डंडा उचित बताया गया है। यदि गौओंके मारनेपर उनका गर्भ भी हो और वह मर जाय यो उनके लिये पृथक्-पृथक् एक-एक कृच्छ्वत करे। यदि कोई काठ, वेला, पत्थर अथवा किसी प्रकारके शस्त्रद्वारा गौओंको मार डाले तो भिन्न-भिन्न शस्त्रके लिये शास्त्रमें इस प्रकार प्रायश्चित्त बताया गया है। काष्ठसे मारनेपर शान्तपनव्रतका विधान है। ढेलेसे मारनेपर प्राजापत्यव्रत करना चाहिये। पत्थरसे आघात करनेपर तप्तकृच्छ्वत और किसी शस्त्रसे मारनेपर अतिकृच्छ्वत करना चाहिये। यदि कोई गौओं और ब्राह्मणों के लिये (अच्छी नीयतसे) ओषधि, तेल एवं भोजन दे और उसके देनेके बाद उसकी मृत्यु हो जाय तो उस दशामें कोई प्रायश्चित्त नहीं है। तेल और दवा पीनेपर अथवा दवा खानेपर या शरीरमें फंसे हुए लोहे या काँटे आदिको निकालनेका प्रयत्न करनेपर मृत्यु हो जाय तो भी कोई प्रायश्चित्त नहीं है। चिकित्सा या दवा करनेके लिये बछड़ोंका कण्ठ बाँधनेसे अथवा शामको उनकी रक्षाके लिये उन्हें घरमें रोकने या बाँधनसे भी कोई दोष नहीं होता।

(उपर्युक्त पापोंका प्रायश्चित्त करते समय मनुष्यको इस विधिसे मुण्डन कराना चाहिये)- एक पाद (चौथाई) प्रायश्चित्त करनेपर कुछ रोममात्र कटा देने चाहिये। दो पादके प्रायश्चित्तमें केवल दाढ़ी-मूंछ मुड़ा ले, तीन पादका प्रायश्चित्त करते समय शिखाके सिवा और सब बाल बनवा दे और पूरा प्रायश्चित्त करनेपर सब कुछ मुड़ा देना चाहिये। यदि स्त्रियोंको प्रायश्चित्त करना पड़े तो उनके सब केश समेटकर दो अंगुल कटा देना चाहिये। इसी प्रकार स्त्रियोंके सिर मुड़ानेका विधान है। स्वीके लिये सारे बाल कटाने और

वीरासनसे बैठने का नियम नहीं है। उनके लिये गोशालामें निवास करनेकी विधि नहीं है। यदि गौ कहीं जाती हो तो उसके पीछे नहीं जाना चाहिये। राजा, राजकुमार अथवा बहुत-से शास्त्रोका ज्ञाता ब्राह्मण हो तो उन सबके लिये केश मुड़ाये बिना ही प्रायश्चित्त बताना चाहिये। उन्हें केशोंकी रक्षाके लिये दूने व्रतका पालन करनेकी आज्ञा दे। दूना व्रत करनेपर उसके लिये दक्षिणा भी दनी ही होनी चाहिये। यदि ऐसा न करे तो हत्या करनेवालेका पाप नष्ट नहीं होता और दाता नरकमें पड़त है। जो लोग वेद और स्मृतिके विरुद्ध व्रत-प्रायश्चित्त बताते हैं, वे धर्मपालनमें विघ्न डालनेवाले हैं। राजा उन्हें दण्डद्वारा पीड़ित करे, परंतु किसी कामना या स्वार्थसे मोहित होकर राजा उन्हें कदापि दण्ड न दे; नहीं तो उनका पाप सौगुना होकर उस राजापर ही पड़ता है। तदनन्तर प्रायश्चित्त पूरा कर लेनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे। बीस गाय और एक बैल उन्हें दक्षिणामें दे। यदि गौओंके अङ्गोंमें घाव होकर उसमें कीड़े पड़ जायें अथवा मक्खी आदि लगने लगें और इन कारणोंसे उन गौओंकी मृत्यु हो जाय तो उन गायोंको रखनेवाला पुरुष आधे कृच्छ्व्रतका अनुष्ठान करे और अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे। इस प्रकार प्रायशित्त करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर कम-से-कम एक माशा सुवर्ण दान करे तो शुद्धि होती है।

जलके भीतरकी, बाँबीकी, चूहोंके बिलकी, ऊसर भूमिकी, रास्तेकी, श्मशान- भूमिकी तथा  शौचसे बची हुई-ये सात प्रकारकी मृत्तिका काममें नहीं लानी चाहिये। ब्राहाणको प्रयत्नपूर्वक इष्टापूर्त. कर्म करने चाहिये। इष्ट (यज्ञ-याग आदि) से वह स्वर्ण पाता है और पूर्त कर्मसे वह मोक्षसुखका का भागी होता है। धनकी अपेक्षा रखनेवाले यज्ञ, दान आदि कर्म हार कहलाते हैं और जलाशय

बनवाना आदि कार्य पूर्व कहा जाता है। विशेषतः बगीचा, किसी देवताके लिये बने हुए तालाब, बावड़ी, कुऔं, पोखरा और देवमन्दिर-ये यदि गिरते या नष्ट होते हों तो जो इनका उद्धार करता है, वह पूर्त कर्मका फल भोगता है; क्योंकि ये सब पूर्त कर्म हैं। सफेद गायका मूत्र, काली गौका गोबर, तबिके रंगवाली गायका दूध, सफेद गायका दही और कपिला गायका घी-इन सब वस्तुओंको लेकर एकत्र करे तो वह पञ्चगव्य बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला होता है। कुशोद्वारा लाये हुए तीर्थ-जल और नदी-जलके साथ उक्त सभी द्रव्योंको पृथक्-पृथक् प्रणवमन्यसे लाकर प्रणवद्वारा ही उन्हें उठावे, प्रणव-जप करते हुए ही उनका आलोडन करे और प्रणवके उच्चारणपूर्वक ही पीये। पलाश वृक्षके बिचले पत्ते में अथवा ताँबेके शुभ पात्रमें अथवा कमलके पत्ते या मिट्टीके बर्तन में कुशोदकसहित उस पञ्चगव्यको पीना चाहिये।

एक सूतकमें दूसरा सूतक उपस्थित हो जाय तो दूसरेमें दोष नहीं लगता। पहले सूतकके साथ ही उसकी शुद्धि हो जाती है। एक जननाशौचके साथ दूसरा जननाशौच और एक मरणाशौचके साथ दूसरा मरणाशौच भी शुद्ध हो जाता है। एक मासके भीतर गर्भस्राव हो तो तीन दिनका अशौच बताये। दो माससे ऊपर होनेपर जितने महीनेमें गर्भस्राव हो, उतनी ही रात्रियों में उसके अशौचकी निवृत्ति होती है। साध्वी रजस्वला स्त्री रज बंद हो जानेपर स्रानमात्रसे शुद्ध होती है। विवाहसे सातवें पदपर अर्थात् सप्तपदीकी क्रिया पूरी होनेपर अपने पितृ-सम्बन्धी गोत्रसे च्युत हो जाती है यानी उसके पतिका गोत्र हो जाता है;अतः तसके लिये श्राद्ध और तर्पण पतिके गोत्रसे ही करने चाहिये। पिण्डदानमें पति और पत्नी दोनोंका उद्देश्य होता है। अतः प्रत्येक पिण्डमें दो

नामसे संकल्प होना चाहिये। तात्पर्य यह है कि पिता या पितामह आदिको सपनीक विशेषण लगाकर पिण्डदान करना चाहिये। इस प्रकार छ: व्यक्तियोंके लिये तीन पिण्ड देने योग्य हैं। ऐसा दाता मोहमें नहीं पड़ता। माता अपने पतिके साथ विश्वेदेवपूर्वक श्राद्धका उपभोग करती है। इसी प्रकार पितामही और प्रपितामही भी अपने-अपने पतिके ही साथ श्राद्ध-भोग करती हैं। प्रत्येक वर्षमें माता-पिताका एकोद्दिष्ट श्राद्धद्वारा सत्कार करे। उस वार्षिक श्राद्धमें विश्वेदेवका पूजन नहीं किया जाता । अत: उनके बिना ही वह श्राद्धभोजन करावे। उसमें एक ही पिण्ड दे। नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धिश्राद्ध तथा पार्वण-विद्वान् पुरुषोंको ये पाँच प्रकारके श्राद्ध जानने चाहिये। ग्रहण,संक्रान्ति पूर्णमा या अमावास्या पर्व, उत्सवकाल तथा महालयके अवसरपर मनुष्य तीन पिण्ड दे और मृत्युतिथिको एक ही पिण्ड दे। जिस कन्याका विवाह नहीं हुआ है, वह पिण्ड, गोत्र और सूतकके विषयमें पिताके गोत्रसे पृथक् नहीं है। पाणिग्रहण और मन्त्रोंद्वारा वह अपने पिताके गोत्रसे पृथक् होती है। जिस कन्याका विवाह जिस वर्णक साथ होता है, उसके समान उसे सूतक भी लगता है। उसके लिये पिण्ड और तर्पण भी उसी वर्णके अनुसार होने चाहिये। विवाह हो जानेपर चौथी रातमें वह पिण्ड, गोत्र और सूतकके विषयमें अपने पतिके साथ एक हो जाती है। मृत व्यक्तिके प्रति हितबुद्धि रखनेवाले बन्धुजनोंको शवदाहके प्रथम, द्वितीय, तृतीय अथवा चतुर्थ दिन अस्थि-संचय करना चाहिये अथवा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोका अस्थि-संचय क्रमश: चौथे, पाँचवें, सातवें और नवें दिन भी कर्तव्य बताया गया है। जिस मृत व्यक्तिके लिये ग्यारहवें दिन वृपोत्सर्ग किया जाता है, वह प्रेतलोकसे मुक्त और स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। नाभिके बराबर अलमें खड़ा होकर मन-ही-मन यह चिन्तन करे कि मेरे पितर आयें और यह जलाजलि ग्रहण करें। दोनों हाथोंको संयुक्त करके जलसे पूर्ण करे और गोशृङ्गमात्र जल उठाकर उसे पुन: जलमें डाल दे। जल में दक्षिण की ओर मुंह करके खड़ा हो आकाशमें जल गिराना चाहिये; क्योंकि पितरोंका स्थान आकाश और दिशा दक्षिण है। देवता आप (जल) कहे गये हैं और पितरोंका नाम भी आप है; अत: पितरोंक हितकी इच्छा रखनेवाला पुरुष उनके लिये जल में ही जल दे। जो दिनमें सूर्यकी किरणोंसे तपता है, रातमें नक्षत्रोंके तेज तथा वायुका स्पर्श पाता है और दोनों संध्याओंके समय भी उक्त दोनों वस्तुओंका सम्पर्क लाभ करता है, वह जल सदा पवित्र माना गया है। जो अपने स्वाभाविक रूपमें हो, जिसमें किसी अपवित्र वस्तुका मेल न हुआ हो, वह जल सदा पवित्र है। ऐसा जल किसी पात्रमें हो या पृथ्वीपर, सदा शुद्ध माना गया है। देवताओं और पितरोंके लिये जलमें ही जलाञ्जलि दे और जो बिना संस्कारके ही मरे हैं, उनके लिये विद्वान् पुरुष भूमिपर जलाञ्जलि दे। श्राद्ध और होमके समय एक हाथसे पिण्ड एवं आहुति दे; किंतु तर्पणमें दोनों हाथोंसे जल देना चाहिये। यह शास्त्रोंद्वारा निश्चित धर्म है।