नारद महा पुराण
वायुपुराणका परिचय तथा उसके दान एवं श्रवण आदिका फल
ब्रह्माजी कहते हैं-ब्रह्मन् ! सुनो, अब मैं वायुपुराणका लक्षण बतलाता है, जिसके श्रवण करनेपर परमात्मा भगवान् शिवका धाम प्राप्त होता है। यह पुराण चौबीस हजार श्लोकोंका बतलाया गया है। जिसमें वायुदेवने श्वेतकल्पके प्रसङ्ग से धौका उपदेश किया है, उसे वायुपुराण कहा गया है। वह पूर्व और उत्तर दो भागोंसे युक्त है। ब्रह्मान् ! जिसमें सर्ग आदिका लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, जहाँ भिन्न-भिम मन्वन्तरों में
तथा केशिध्वजके द्वारा खाण्डिक्य जनकको ब्रह्मज्ञानका उपदेश इत्यादि विषयोंको छठा अंश कहा गया है।
इसके बाद विष्णुपुराणका उत्तर भाग प्रारम्भ होता है, जिसमें शौनक आदिके द्वारा आदरपूर्वक पूछे जानेपर सूतजीने सनातन 'विष्णुधर्मोत्तर' नामसे प्रसिद्ध नाना प्रकारके धौकी कथाएँ कही हैं। अनेकानेक पुण्य-व्रत, यम-नियम, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, वेदान्त, ज्यौतिष, वंशवर्णनके प्रकरण, स्तोत्र, मन्त्र तथा सब लोगोंका उपकार करनेवाली नाना प्रकारकी विद्याएँ सुनायी हैं। यह विष्णुपुराण है, जिसमें सब शास्त्रोंके सिद्धान्तका संग्रह हुआ है। इसमें वेदव्यासजीने वाराहकल्पका वृत्तान्त कहा है। जो मनुष्य भक्ति और आदरके साथ विष्णुपुराणको पढ़ते और सुनते हैं, वे दोनों यहाँ में मनोवाञ्छित भोग भोगकर विष्णुलोकमें चले जाते हैं। जो इस पुराणको लिखवाकर या स्वयं का लिखकर आषाढ़की पूर्णिमाको घृतमयी धेनुके में साथ पुराणार्थवेत्ता विष्णुभक्त ब्राह्मणको दान के करता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा का वैकुण्ठधाममें जाता है। ब्रह्मन् ! जो विष्णुपुराणकी इस नुक्रमणिकाको कहता अथवा सुनता है, वह समूचे पुराणके पठन एवं श्रवणका फल पाता है।
राजाओंके वंशका वर्णन है और जहाँ गयासुरके वधकी कथा विस्तारके साथ कही गयी है, जिसमें सब मासोंका माहात्म्य बताकर माघमासका अधिक का फल कहा गया है, जहाँ दानधर्म तथा राजधर्म के अधिक विस्तारसे कहे गये हैं, जिसमें पृथ्वी, पाताल, दिशा और आकाशमें विचरनेवाले जीवोंके और व्रत आदिके सम्बन्धमें निर्णय किया गया है, वह वायुपुराणक पूर्वभाग कहा गया है।
मुनीश्वर ! उसके उत्तरभागमें नर्मदाके तीर्थोंका वर्णन है और विस्तारके साथ शिवसंहिता कही गयी है। जो भगवान् सम्पूर्ण देवताओंके लिये दुर्जेय और सनातन हैं, वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन निवास करते हैं, व यह नर्मदाका जल ब्रह्मा है, यही विष्णु है और वही सर्वोत्कृष्ट साक्षात् शिव है। यह नर्मदाजल ही निराकार ब्रह्म तथा कैवल्य मोक्ष है। निश्चय ही भगवान् शिवने समस्त लोकोंका हित करनेके लिये अपने शरीरसे इस नर्मदा नदीके रूपमें किसी दिव्य शक्तिको ही धरतीपर उतारा है। जो नर्मदाके उत्तर तटपर निवास करते हैं, वे भगवान् रुदके अनुचर होते हैं और जिनका दक्षिण तटपर निवास है, वे भगवान् विष्णुके लोकमें जाते हैं। ॐकारेश्वरसे लेकर पक्षिम समुद्रतक नर्मदा नदीमें दूसरी नदियोंके पैंतीस पापनाशक संगम है, उनमेसे ग्यारह तो उत्तर तटपर हैं और तेईस दक्षिण तटपर। पैंतीसवाँ तो स्वयं नर्मदा और समुद्रका संगम कहा गया है। नर्मदाके दोनों तटोंपर इन संगमोंके साथ चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ हैं। मुनीश्वर ! इनके सिवा अन्य साधारण तीर्थ तो रेवाके दोनों तटोंपर पग-पगपर विद्यमान हैं, जिनकी संख्या साठ करोड़ साठ हजार है। यह परमात्मा शिवकी संहिता परम पुण्यमयी है, जिसमें वायुदेवताने नर्मदाके चरित्रका वर्णन किया है। जो इस पुराणको लिखकर गुड़मयी धेनुके साथ श्रावणकी पूर्णिमाको भक्तिपूर्वक कुटुम्बी ब्राह्मणके हाथमें दान देता है, वह चौदह इन्द्रोंके राज्यकालतक रुद्रलोकमें निवास करता है। जो मनुष्य नियमपूर्वक हविध्य भोजन करते हुए इस वायुपुराणको सुनाता अथवा सुनता है, वह साक्षात् रुद्र है, इसमें संशय ने नहीं है। जो इस अनुक्रमणिकाको सुनता और ने सुनाता है, वह भी समस्त पुराणके श्रवणका फल दीपा लेता है।