बारह मासोंकी प्रतिपदाके व्रत एवं आवश्यक कृत्योंका वर्णन

श्रीनारदजी बोले- प्रभो! मैंने आपके मुखसे समस्त पुराणोंका सूत्र, जैसा कि परमेष्ठी ब्रह्माजीने महर्षि मरीचिसे कहा था, सुन लिया। महाभाग ! अब मुझसे क्रमशः तिथियोंके विषयमें निरूपण कीजिये, जिससे व्रतका ठीक-ठीक निश्चय हो जाय। जिस मासमें, जिस पुण्य तिथिको जिसने उपासना की है और उसकी पूजा आदिका जो विधान है, वह सब इस समय बताइये।

श्रीसनातनजीने कहा- नारद! सुनो, अब मैं तुमसे तिथियोंके पृथक्-पृथक्वतका वर्णन करता हूँ। तिथियों के जो स्वामी हैं. उन्होंके क्रमसे पृथक्-पृथक व्रत बताया जाता है, जो सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला है। चैत्रपाका के शुक्ल पक्षों प्रथम दिन सूर्योदयकालमें अहाजीने सम्पूर्ण जगत्को सृष्टि की थी, इसलिये वर्ष और वसन्त चतुके आदिम बलिराज्य सम्बन्धी तिथि- आमावास्याको ओ प्रतिपदा तिथि प्रास होतो उसीमें विवादोको पत करना चाहिये प्रतिपदा तिथि पूर्वविद्धा होनेपर ही व्रत आदिमें ग्रहण करने योग्य है। उस दिन महाशान्ति करनी चाहिये। वह समस्त पापोंका नाश, सब प्रकार के उत्पातोंकी शान्ति तथा कलियुगके दुष्कर्मोका निवारण करनेवाली होती है। साथ ही वह आयु देनेवाली, पुष्टिकारक तथा धन और सौभाग्यको बढ़ानेवाली है। वह परम मङ्गलमयी, शान्ति, पवित्र होनेके साथ ही इहलोक और परलोकमें भी सुख देनेवाली है। उस तिथिको पहले अग्रिरूपधारी भगवान् ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये, फिर क्रमशः सब देवताओंकी पृथक्-पृथक् पूजा करे। इस तरह पूजा और ॐकारपूर्वक नमस्कार करके कुश, जल, तिल और अक्षतके साथ न सुवर्ण और वस्त्रसहित दाक्षिणा लेकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको व्रतकी पूर्ति के लिये दान करना चाहिये। इस प्रकार पूजा-विशेषसे 'सौरि' नामक व्रत सम्पन्न होता है। ब्रह्मन्! यह मनुष्यों को आरोग्य प्रदान करनेवाला है। मुने ! उसी दिन

१. नामके आदिमें 'ॐ' और अन्तर्मे 'नम:' जोड़कर बोलना ही ॐकारपूर्वक नमस्कार बाह्मणे नमः' इत्यादि। अथवा ॐ नमः' को एक साथ भी बोल सकते हैं: यथा-'ॐ नमो बझणे' इत्यादि।

२. इसी तिथिको विष्णुधर्मोत्तरपुराणने 'आरोग्यन्नत का विधान किया गया है और ब्रह्मपुराणमें 'संवत्सरारम्भ

विद्याव्रत' भी बताया गया है तथा इसी तिथिको श्रीकृष्णने अजातशत्रु युधिष्ठिरको 'तिलकव्रत करनेका उपदेश दिया है।

तदनन्तर ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाको सूर्योदयकालमें देवमन्दिरसम्बन्धी वाटिकामें उगे हुए मनोहर कनेरवृक्षका पूजन करे। करके वृक्षमें लाल डोरा लपेटकर उसपर गन्ध, चन्दन, धूप आदि चढ़ावे, उगे हुए सप्तधान्यके अङ्कुर, नारंगी और बिजौरा नीबू आदिसे उसकी पूजा करे। फिर अक्षत और जलसे उस वृक्षको सींचकर निम्राङ्कित मन्त्रसे क्षमा-प्रार्थना करे-

करवीरवृषावास नमस्ते भानुवल्लभ।

मौलिमण्डन दुर्गादिदेवानां सततं प्रिय॥

(ना० पूर्व० ११०। १०७)

'करवीर! आप धर्मके निवास स्थान और भगवान् सूर्यके पुत्र हैं। दुर्गादि देवताओंके मस्तकको विभूषित करनेवाले तथा उनके सदैव प्रिय हैं। आपको नमस्कार है।

तत्पश्चात् 'आ कृष्णेन" इत्यादि वेदोक्त मन्त्रका उच्चारण करके इसी प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पूजन करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दे और वृक्षकी परिक्रमा करके अपने घर जाय। श्रावण शुक्ला प्रतिपदाको परम उत्तम 'रोटकव्रत' होता है, जो लक्ष्मी और बुद्धिको देनेवाला है तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षका कारण है। ब्रह्मन्! सोमवारयुक्त श्रावण शुक्ल प्रतिपदा या श्रावणके प्रथम सोमवारसे लेकर  साढ़े तीन मासतक यह व्रत किया जाता है। इसमें प्रतिदिन सोमेश्वर भगवान् शिवकी बिल्वपत्रसे पूजा की जाती है। कार्तिक शुक्ला चतुर्दशीतक इस नियमसे पूजा करके उस दिन उपवासपूर्वक रहे और व्रतपरायण पुरुष पूर्णिमाके दिन पुनः भगवान् शङ्करकी पूजा करे। फिर बाँसके पात्र में सुवर्णसहित पवित्र एवं अधिक वायन, जो देवताको प्रसन्नताको बढ़ानेवाला हो, लेकर संकल्पपूर्वक ब्राह्मणको दान करे। मुनीश्वर ! यह दान धनको वृद्धि करनेवाला है। भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाको कोई 'महत्तमव्रत । एवं कोई मौनव्रत बतलाते हैं। इसमें भगवान् शिवकी पूजा की जाती है। उस दिन मौन रहकर नैवेद्य तैयार करे। अड़तालीस फल और पूए एकत्र करके उनमेंसे सोलह तो ब्राह्मणको दे और सोलह देवताको भोग लगावे एवं शेष सोलह अपने उपयोग में लाये। सुवर्णमयी शिवकी प्रतिमाको विधानवेत्ता पुरुष कलशके ऊपर स्थापित करके उसकी पूजा करे। फिर वह सब कुछ एक धेनुके सहित आचार्यको दान कर दे। ब्रह्मन्! देवदेव महादेवके इस व्रतका चौदह वर्षोंतक पालन करके नाना प्रकारके भोग भोगनेके पश्चात् देहावसान होनेपर शिवलोक में जाता है।

ब्रहान्! आश्विन शुक्ला प्रतिपदाको 'अशोक- व्रत का पालन करके मनुष्य शोकरहित तथा धन-धान्यसे सम्मान हो जाता है। उसमें नियमपूर्वक रहकर शोक वृक्षकी पूजा करनी चाहिये।

विधि दी गयी है।

१. 'विद्याव्रत की विधि विष्णुधर्मोत्तरमें तथा गरुडपुराणमें भी उपलब्ध होती है।

२. "तिलकवत' के विषयमें विशेष जानकारी भविष्योत्तरपुराणसे हो सकती है।

३. आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्त्रमृतं मयं च।

हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।

४. निर्णयग्रन्थों के अनुसार भविष्योत्तरपुराणमें इसकी विशेष विधि दी गयी है। वहाँ 'करवीरवत' के नामसे इसका उल्लेख किया गया है।

५. व्रतराजमें इस व्रतका विस्तारपूर्वक वर्णन है।

६-७. महत्तम और मौन-इन दोनों व्रताका विशेष विधान स्कन्दपुराणमें उपलब्ध होता है।

बारहवें वर्ष व्रतके अन्तमें अशोक वृक्षकी सुवर्णमयी मूर्ति बनाकर उसे भक्तिपूर्वक गुरुको समर्पित करनेपर मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रतिपदाको 'नवरात्रव्रत' आरम्भ करे। पूर्वाह्नकालमें कलशस्थापनपूर्वक देवीकी पूजा करे। गेहूँ और जौके बीजसे अंकुर आरोपण करके प्रतिदिन अपनी शक्तिके अनुसार उपवास, अयाचित अथवा एकभुक्त करके रहे और पूजा, पाठ, जप आदि करता रहे। ब्रह्मन्! मार्कण्डेयपुराणमें देवीके जो तीन चरित्र कहे गये हैं, उनका भोग और मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाला पुरुष नौ दिनोंतक पाठ करे। नवरात्रमें भोजन, वस्त्र आदिके द्वारा कुमारीपूजन उत्तम गाना गया है। ब्रह्मन्!  इस प्रकार व्रतका आचरण करके मनुष्य इस पृथ्वीपर दुर्गाजीकी कृपासे सम्पूर्ण सिद्धियोंका आश्रय हो जाता है।

कार्तिक शुक्ला प्रतिपदाको नवरात्रों बताये अनुसार नियमों का पालन करे। विशेषतः अन्नकूट नामक कार्य गवान् विश्णुको प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। इस दिन गोवई पूजनके लिये सब तरह के पाक और सब गोरों का संग्रह करके सबको अन्नकूट करना चाहिये। इससे सब मनोरधोंकी सिद्धि होती है। सायंकालमें गौओंसहित श्रीगोवर्धन पर्वतका पूजन करके जो उसकी प्रदक्षिणा करता है, वह भोग और मोक्ष पाता है।

मार्गशीर्ष शुक्ला प्रतिपदाको परम उत्तम 'धनव्रत का पालन करना चाहिये। रातमें भगवान् विष्णुका पूजन और होम करके अग्निदेवकी सुवर्णमयी प्रतिमाको दो लाल वस्त्रोंसे आच्छादित करके ब्राहाणको दाम दे। ऐसा करके मनुष्य इस पृथ्वीपर धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। अग्निदेवके द्वारा उसके समस्त पाप दग्ध हो जाते हैं और वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

पौष शुक्ला प्रतिपदाको भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी पूजा करके एकभुक्तनत करनेवाला मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है। माघ शुक्ला प्रतिपदाके दिन अनिस्वरूप साक्षात् महे वरकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य इस पृथ्वीपर समृद्धिशाली होता है। फाल्गुन शुक्ला प्रतिपदाको धूलिधूसरित अङ्गोवाले देवदेव दिगम्बर शिवको सब ओरसे जलद्वारा स्नान करावे। भगवान् महेश्वर इस लौकिक कर्मसे भी संतुष्ट होकर अपना सायुज्य प्रदान करते हैं। फिर भक्तिपूर्वक भलीभाँति पूजित होने पर वे क्या नहीं दे सकते ! वैशाख शुक्ला प्रतिपदाको विश्वव्यापक भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजा करके व्रती पुरुष ब्राह्मणों को भोजन करावे। इसी प्रकार आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदाको जगदुरु ब्रह्मा एवं विष्णुका पूजन करके ब्राह्मण भोजन करावे। ऐसा करनेसे विष्णुसहित सर्वलोकेश्वरेश्वर ब्रह्माजी अपना सायुध्य प्रदान करते हैं और वह सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है। द्विजश्रेष्ठ । बारह महीनोंकी प्रतिपदा तिधियोंमें होनेवाले जो व्रत तुम्हे बताये गये हैं, ये भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। इन सब व्रतोंमें ब्रह्मचर्य- पालनका विधान है। भोजनके लिये सामान्यतः हविष्यान्न बताया गया है।