नारद महा पुराण
संध्यावली-मोहिनी-संवाद, रानी संध्यावलीका मोहिनीको पतिकी इच्छाके विपरीत चलनेमें दोष बताना
वसिष्ठजी कहते हैं- पिताकी बात सुनकर पुत्र धर्माङ्गदने अपनी कल्याणमयी माता संध्यावलीको शीघ्र ही बुलाया। पुत्रके कहनेसे वे उसी क्षण महाराजके समीप आर्थी। धर्माङ्गदने उनसे मोहिनी तथा पिताकी भी बातें कह सुनायीं और निवेदन किया 'माँ! दोनोंको बातोंपर विचार करके मोहिनीको सान्त्वना दो। यह एकादशीके दिन राजाको भोजन करानेपर तुली हुई है। मेरे पिता जिस प्रकार सत्यसे विचलित न हों और एकादशीको भोजन भी न करें-ऐसा कोई उपाय निकालो, ऐसा होनेपर ही दोनोंका मङ्गल होगा।' राजन् ! पुत्रकी बात सुनकर संध्यावलोदेवी ब्रह्मपुत्री मोहिनीसे उस समय मधुर वाणीमें बोली- 'वामोरू ! आग्रह न करो। एकादशी प्राप्त होनेपर अन्नमात्रमें पापका सम्पर्क हो जाता है, अत: महाराज किसी प्रकार भी उसका आस्वादन नहीं कर सकते। तुम राजाका अनुसरण कयो। ये हम लोगोंके सनातन गुरु हैं। जो नारी सदा अपने पतिकी आज्ञाका पालन करती है, उसे सावित्रीके समान अक्षम तथा निर्मल लोक प्रास होते हैं।
देवि! यदि इन्होंने पहले मन्दराचलपर कामसे पीड़ित होकर तुम्हें अपना हाथ दिया है तो उस समय इन्होंने योग्यायोग्यका विचार नहीं किया। जो देनेलायक वस्तु है, उसे तो वे दे ही रहे हैं और जर नहीं देनेयोग्य वस्तु है, उसको तुम माँगो भी माजी सन्मार्गमें स्थित है उसे यदि विपत्ति भी प्राप्त हो तो वह कल्याणमयी ही होती है। सुभगे। जिन्होंने बचपनमें भी एकादशीके दिन भोजन नहीं किया है, वे इस समय वृद्धावस्था भगवान् विष्णुके पुण्यमय दिवसको अन्न कैसे ग्रहण करेंगे? तुम इच्छानुसार कोई दूसरा अत्यन्त दुर्लभ वर माँग लो। उसे महाराज अवश्य दे देंगे। उन्हें भोजन करानेके हठसे निवृत्त हो जाओ। देवि ! मैं धर्मादकी जननी । यदि तुम मुझे विश्वसनीय भालती हो तो सातो द्वीप, नदी, वन और पर्वतसहित इस सम्पूर्ण राज्यको और मेरे जीवनको भी मांग लो विशाललोचने । यद्यपि मैं ज्येष्ठ हूँ तथापि पतिके लिये छोटी सपन्नीकी भी चरण-वन्दना करुँगी। तुम प्रसन्न हो जाओ। जो वचन से और शपथ-दोष से पतिको विवश करके उनसे न करने योग्य कार्य करा लेती है, वह पापपरायणा नारी नरकमें निवास करती है। वह भयंकर नरकसे निकलनेके बाद मारह जन्मोतक शूकरीकी योनिमें जन्म लेती है। तत्पश्चात् चाण्डाली होती है। सुन्दरि! इस प्रकार पापका परिणाम जानकर मैंने तुम्हें सखी-भावसे मना किया है। कमलानने! धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको उचित है कि वह शत्रुको भी अच्छी बुद्धि (नेक सलाह) दे, फिर तुम तो मेरी सखीके रूपमें स्थित हो। अतः तुम्हें क्यों न अच्छी सलाह दी जाय?' संध्यावलीकी बात सुक्कर मोहकारिणी मोहिनी सुवर्णके समान सुन्दर कान्तिवाली पतिकी ज्येष्ठ प्रियासे उस समय इस प्रकार बोली-'सुभ्र ! तुम मेरी माननीया हो, मैं तुम्हारी बात मानूँगी। नारदादि विद्वान् महर्षियोंने ऐसा ही कहा है। देवि! यदि राजा एकादशीके दिन भोजन न करें तो उसके बदले एक दूसरा कार्य करें, जो तुम्हारे लिये मृत्युसे अधिक कष्टदायक है। शुभे! वह कार्य मेरे लिये भी दु:खदायक है तथापि दैववश मैं वह बात कहूँगी, जो तुम्हारे प्राण लेनेवाली है तुम्हारे ही नहीं, पतिदेवके, प्रजावर्गके तथा पुत्रवधुओंके भी प्राण हर लेनेवाली वह बात है। उससे मेरे धर्मका नाश तो होगा ही, मुझे भारी कलंककी भी प्राप्ति होगी। उस बातको कर दिखाना तो दूर है, मनमें उसे करनेका विचार लाना भी सम्भव नहीं है। यदि तुम मेरे उस वचनका पालन करोगी वो इस संसारमें तुम्हारी बड़ी भारी कीर्ति फैलेगी, पतिदेवको भी यश मिलेगा, तुम्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी, तुम्हारे पुत्रकी सब लोग प्रशंसा करेंगे और मुझे चारों ओरसे धिक्कार मिलेगा।'
वसिष्ठजी कहते हैं- राजन्! मोहिनीकी बात सुनकर देवी संध्यावलीने किसी तरह धैर्य धारण किया और उस मोहिनीसे कहा-'कहो, कहो क्या बात है? तुम कैसा वचन बोलोगी, जिससे मुझे दुःख होगा। मुझे अपने पतिके सत्यकी रक्षामें कभी कोई दु:ख नहीं हो सकता। स्वामीके हितका साधन करते समय मेरे इस शरीरका अन्त हो जाय, मेरे पुत्रकी मृत्यु हो जाय अथवा सम्पूर्ण राज्यका नाश हो जाय; तथापि मुझे कोई व्यथा नहीं होगी। सुन्दरी ! जिस पत्नीके पति उसके व्यवहारसे दुःखी होते हैं, वह समृद्धिशालिनी हो तो भी उस पापिनीकी अधोगति ही कही गयी है। वह सत्तर युगोंतक 'पूय' नामक नरकमें पड़ी रहती है । तत्पश्चात् भारतवर्षमें सात जन्मोंतक छछूदर होती है। उसके बाद काकयोनिमें जन्म लेती है। फिर क्रमशः शृगाली, गोधा और गाय होकर शुद्ध होती है। अतः तुम माँगो; मैं पतिके हितके लिये तुम्हें अवश्य अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगी। वरानने! मेरा धन, शरीर, पुत्र अथवा अन्य कोई वस्तु जो चाहो माँगो, स्त्रियोंके लिये एकमात्र पतिके सिवा संसारमें दूसरा कौन देवता है?'