नारद महा पुराण
अदितिको भगवद्दर्शन और वरप्राप्ति, वामनजी का अवतार, बलि-वामन-संवाद भगवान् का तीन पैर से समस्त ब्रह्माण्डको लेकर बलिको रसातल भेजना
नारदजी ने पूछा- भाईजी! आपने यह बड़ी अद्भुत बात बतायी है। मैं जानना चाहता हूँ कि उस अग्रिने अदिति को छोड़कर उन दैत्यों को ही क्षणभर में कैसे जला दिया। आप अदिति के महान् सत्वका वर्णन कीजिये, जो विशेष आश्चर्यका कारण है; क्योंकि मुनीश्वर साधु पुरुष सदा दूसरों को उपदेश देने में तत्पर रहते हैं।
सनकजी ने कहा- नारदजी! जिनका मन भगवान् के भजन में लगा हुआ है, ऐसे संतों की महिमा सुनिये। भगवान् के चिन्तन में लगे हुए साधु पुरुषों को बाधा देने में कौन समर्थ हो सकता है? जहाँ भगवान् का भक्त रहता है, वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवता, सिद्ध, मुनीश्वर और साधु-संत नित्य निवास करते हैं। महाभाग! शान्तचित्तवाले हरिनामपरायण भक्तों के भी ह्रदय में भगवान् विष्णु सदा विराजते हैं, फिर जो निरन्तर उन्हीं के ध्यान में लगे हुए हैं, उनके विषय में तो कहना ही क्या है? भगवान् शिवकी पूजा में लगा हुआ अथवा भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर हुआ भक्त पुरुष जहाँ रहता है, वहीं लक्ष्मी तथा सम्पूर्ण देवता निवास करते हैं। जहाँ भगवान् विष्णु उपासना में संलग्र भक्त पुरुष वास करता है, वहाँ अग्रि बाधा नही पहुँचा सकती। राजा, चोर अथवा रोग-व्याधि भी कष्ट नहीं दे सकते हैं। प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ग्रह, बालग्रह, डाकिनी तथा राक्षस-ये भगवान् विष्णु की आराधना करने वाले पुरुषको पीड़ा नहीं दे सकते। जितेन्द्रिय, सबका हितकारी तथा धर्म-कर्मका पालन करनेवाला पुरुष जहाँ रहता है, वहीं सम्पूर्ण तीर्थ और देवता वास करते हैं। जहाँ एक या आधे पल भी योगी महात्मा पुरुष ठहरते हैं, वहीं सब श्रेय हैं, वहीं तीर्थ है, वही तपोवन है। जिनके नामकीर्तन से, स्तोत्रपाठ से अथवा पूजन से भी सब उपद्रव नष्ट हो जाते हैं, फिर उनके ध्यान से उपद्रवों का नाश हो, इसके लिये कहना ही क्या है? ब्रह्मन्! इस प्रकार दैत्यों द्वारा प्रकट की हुई उस अग्रि से दैत्यों सहित सारा वन दुग्ध हो गया, किंतु देवमाता अदिति नहीं जलीं; क्योंकि वे भगवान् विष्णुके चक्र से सुरक्षित थीं। तदनन्तर कमलदल के समान विकसित नेत्र और प्रसन्न मुखवाले शङ्क, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णु अदितिके समीप प्रकट हुए। उनके मुखपर मन्द-मन्द मुसकान की छटा छा रही थी और चमकीले दाँतो की प्रभा से सम्पूर्ण दिखाएँ उद्धासित हो रही थीं। उन्होंने अपने पवित्र हाथ से कश्यपजी की प्यारी पन्नी अदिति का स्पर्श करते हुए कहा।
श्रीभगवान् बोले- देवमाता! तुमने तपस्याद्वारा मेरी आराधना की है, इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुमने बहुत समय तक कष्ट उठाया है। अब तुम्हारा कल्याण होगा, इसमें संदेह नहीं है। तुम्हारे मन में जैसी रुचि हो, वह वर माँगो, मैं अवश्य दूँगा। भद्रे! भय न करो। महाभागे! तुम्हारा कल्याण अवश्य होगा।
देवाधिदेव भगवान् विष्णु के ऐसा कहने पर देवमाता अदितिने उनके चरणों मे प्रणाम किया और सम्पूर्ण जगत् को सुख देने वाले उन परमेश्वरकी स्तुति की।
अदिति बोलीं- देवदेवेश्वर! सर्वव्यापी जनार्दन! आपको नमस्कार है। आप ही सत्व आदि गुणों के भेद से जगत् के पालन आदि व्यवहार चलाने कारण हैं। आप रुपरिहत होते हुए भी अनेक रुप धारण करते हैं। आप परमात्माको नमस्कार है। सबसे एकरुपता(अभिन्नता) ही
आपका स्वरूप है। आप निर्गुण एवं गुणस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण जगत् के स्वामी और परम ज्ञानरूप हैं। श्रेष्ठ भक्तजनों के प्रति वात्सल्यभाव सदा आपकी शोभा बढ़ाता रहता है। आप मङ्गलमय परमात्माको नमस्कार है। मुनीश्वरगण जिनके अवतार-स्वरूपोंकी सदा पूजा करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान्को मैं अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये प्रणाम करती हूँ। जिन्हें श्रुतियाँ नहीं जानतीं, उनके ज्ञाता विद्वान् पुरुष भी नहीं जानते, जो इस जगत्के कारण हैं तथा मायाको साथ रखते हुए भी माया से सर्वथा पृथक् हैं, उन भगवान्को नमस्कार करती हूँ। जिनकी अद्भुत कृपादृष्टि मायाको दूर भगा देनेवाली है, जो जगत्के कारण तथा जगत्स्वरूपहैं, उन विश्ववन्दित भगवान्की मैं वन्दना करती हूँ।
जिनके चरणारविन्दोंकी धूलके सेवनसे सुशोभित मस्तकवाले भक्तजन परम सिद्धिको प्राप्त हो चुकेउन भगवान् कमलाकान्तको मैं नमस्कार करती हूँ। ब्रह्मा आदि देवता भी जिनकी महिमाको पूर्णरूपसे नहीं जानते तथा जो भक्तोंके अत्यन्त निकट रहते हैं, उन भक्तसङ्गी भगवान्को मैं प्रणाम करती हूँ। वे करुणासागर भगवान् जगत्के सङ्गका त्याग करके शान्तभावसे रहनेवाले भक्तजनोंको अपना सङ्ग प्रदान करते हैं, उन सङ्गरहित श्रीहरिको मैं प्रणाम करती हूँ। जो यज्ञोंके स्वामी, यज्ञोंके भोक्ता, यज्ञकर्मोंमें स्थित रहनेवाले यज्ञकर्मके बोधक तथा यज्ञोंके फलदाता।हैं, उन भगवान्को मैं नमस्कार करती हूँ।पापात्मा अजामिल भी जिनके नामोच्चारण केपश्चात् परम धामको प्राप्त हो गया, उन लोकसाक्षी भगवान् को मैं प्रणाम करती हूँ। जो विष्णुरुपी शिव और शिवरुपी विष्णु होकर इस जगत् के संचालक हैं, उन जगद्गुरु भगवान् नारायण को मैं नमस्कार करती हूँ। ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी जिनकी मायाके पाशमें बंधे होनेके कारण जिनके परमात्मभावको नहीं समझ पाते, उन भगवान् सर्वेश्वरको मैं प्रणाम करती हूँ। जो सबके हृदयकमलमें स्थित होकर भी अज्ञानी पुरुषोंको दूरस्थ से प्रतीत होते हैं तथा जिनकी सत्ता प्रमाणोंसे परे है, उन ज्ञानसाक्षी परमेश्वरको मैं नमस्कार करती हूँ। जिनके मुखसे ब्राह्मण प्रकट हुआ है, दोनों भुजाओंसे क्षत्रियकी उत्पत्ति हुई है, ऊरुओंसे वैश्य उत्पन्न हुआ है और दोनों चरणोंसे शूद्रका जन्म हुआ है। जिनके मनसे चन्द्रमा प्रकटहुआ है, नेत्रसे सूर्यका प्रादुर्भाव हुआ है; मुखसे अग्नि और इन्द्रकी तथा कानोंसे वायुकी उत्पत्ति हुई है; ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद जिनके स्वरूप हैं, जो संगीतविषयक सातों स्वरोंके भी आत्मा हैं, व्याकरण आदि छ: अङ्ग भी जिनके स्वरूप है, उन्हीं आप परमेश्वरको मेरा बारम्बार नमस्कार है। भगवन्! आप ही इन्द्र, वायु और चन्द्रमा हैं। आप ही ईशान (शिव) और आप ही यम हैं। अग्नि और निति भी आप ही है। आप ही वरुण एवं सूर्य हैं। देवता, स्थावर वृक्ष आदि, पिशाच, राक्षस, सिद्ध, गन्धर्व, पर्वत, नदी, भूमि और समुद्र भी आपके स्वरूप हैं। आप ही जगदीश्वर हैं, जिनसे परात्पर तत्त्वं दूसरा कोई नहीं है। देव! सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है, इसलिये सदा आपको नमस्कार है। नाथनाथ! सर्वज्ञ! आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिकारण हैं। वेद आपका ही स्वरूप है। जनार्दन! दैत्योंद्वारा सताये हुए मेरे पुत्रोंकी रक्षा कीजिये। इस प्रकार स्तुति करके देवमाता अदिति ने भगवान् को बारम्बार प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा। उस समय आनन्दके आँसुओंसे उनका वक्षःस्थल भीग रहा था। (वे बोलीं-) 'देवेश!आप सबके आदिकारण हैं। मैं आपकी कृपाकी पात्र हूँ। मेरे देवलोकवासी पुत्रों को अकण्टक राज्यलक्ष्मी दीजिये। अन्तमिन्। विश्वकप सर्वज्ञ। परमेश्वर | लक्ष्मीपते। आपसे क्या छिपा हुआ है? प्रभो। आप मुझसे पूछकर मुझे क्यों मोह में डाल रहे हैं? तथा आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये मेरे मनमें जो अभिलाषा है, वह आपको बताऊँगी। देवेश्वर! मैं दैत्योंसे पीड़ित हो रही हूँ। मेरे पुत्र इस समय मेरी रक्षा न कर सकनेके कारण व्यर्थ हो गये हैं। मैं दैत्योंका भी वध करना नहीं चाहती, क्योंकि वे भी मेरे पुत्र ही हैं। सुरेश्वर! उन दैत्योंको मारे बिना ही मेरे पुत्रोंको सम्पत्ति दे दीजिये।' नारद ! अदिति के ऐसा कहनेपर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु पुन: बहुत प्रसन्न हुए और देवमाताको आनन्दित करते हुए आदरपूर्वक बोले।
श्रीभगवान्ने कहा- देवि! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। मैं स्वयं ही तुम्हारा पुत्र बनूंगा; क्योंकि सौतके पुत्रोंपर इतना वात्सल्य तुम्हारे सिवा अन्यत्र दुर्लभ है। तुमने जो स्तुति की है, उसको जो मनुष्य पढ़ेंगे, उन्हें श्रेष्ठ सम्पत्ति हैप्राप्त होगी और उनके पुत्र कभी होन दशामें नहीं पड़ेंगे। जो अपने तथा दूसरेके पुत्रपर समानभाव रखता है, उसे कभी पुत्रका शोक नहीं होता-यह सनातन धर्म है*।
अदिति बोली- देव! आप सबके आदिकारण और परम पुरुष हैं। मैं आपको अपने गर्थमें से धारण करनेमें असमर्थ हूँ। आपके एक-एक रोममें असंख्य ब्रह्माण्ड हैं। आप सबके ईक्षर तथा कारण हैं। प्रभो। सम्पूर्ण देवता और बुतियाँ भी जिनके प्रभावको नहीं जानती, उन्हों देवाधिदेवक भगवान्को मैं गर्भमे कैसे धारण करूंगी? आप सा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, अजन्मा तथा परात्पर परमेश्वर हैं। देव। आप पुरुषोत्तमको मैं कैसे गर्भ धारण करूंगी? महापातकी मनुष्य भी जिनके नाम-स्मरणमात्रसे मुक्त हो जाता है, वे परमात्मा ग्राम्बजनोंकबीच जन्म कैसे धारण कर सकते हैं? प्रभो। जैसे आपके मत्स्य और शूकर अवतार हो गये है, वैसा ही यह भी होगा। विश्वेश! आपकी लीलाको कौन जानता है? देव। मैं आपके चरणारविन्दोंमें प्रणत होकर आपके ही नाम-स्मरणमें लगी हुई सदा आपका ही चिन्तन करती हूँ। आपकी जैसी रुचि हो, वैसा करें।
श्रीसनकजीने कहा-अदितिका वचन सुनका देवताओंके भी देवता भगवान् जनार्दनने देवमाताको अभयदान दिया और इस प्रकार कहा।
श्रीभगवान् बोले- महाभागे! तुमने सत्य रहा है। इसमें संशय नहीं है। शुभे। तथापि मैं तुम्हें एक गोपनीयसे भी गोपनीय रहस्य बतलाता हूँ, सुनो। जो राग-द्वेषसे शून्य, दूसरोंमें कभी दोष नहीं देखनेवाले और दम्भसे दूर रहनेवाले मेरे शरणागत भक्त हैं, वे सदा मुझे धारण कर सकते हैं। जो दूसरोंको पीड़ा नहीं देते, भगवान् शिवके भजनमें लगे रहते और मेरी कथा सुनने में अनुराग रखते हैं, वे सदा मुझे अपने हृदयमें धारण करते हैं। देवि! जिन्होंने पति भक्तिका आश्रय लिया है, पति ही जिनका प्राण है और जो आपसमें कभी डाह नहीं रखती, ऐसी पतिव्रता स्त्रियाँ भी सदा मुझे अपने भीतर धारण कर सकती हैं। जो माता-पिताका सेवक, गुरुभक्त, अतिथियोंका प्रेमी और ब्राह्मणोंका हितकारी है, वह सदा मुझे धारण करता है। जो सदा पुण्यतीर्थीका सेवन करते, सत्सङ्ग में लगे रहते और स्वभावसे ही सम्पूर्ण जगत्पर कृपा रखते हैं, वे मुझे सदा अपने हृदयमें धारण करते हैं। जो परोपकारमें तत्पर, पराये धनके लोभसे विमुख और परायी स्त्रियों के
*स्वात्मजे वान्यपुत्रे वा यः समत्वेन वर्तते।
न तस्य पुत्रशोकः स्यादेष धर्मः सनातनः।।
प्रति नपुंसक होते हैं, वे भी सदा मुझे अपने भीतर धारण करते हैं। जो तुलसीकी उपासनामें लगे हैं, सदा भगक्नामके जपमें तत्पर हैं और गौओंकी रक्षामें संलग्न रहते हैं, वे सदा मुझे हृदयमें धारण करते हैं। जो दान नहीं लेते, पराये अन्नका सेवन नहीं करते और स्वयं दूसरोंको अन्न और जलका दान देते हैं, वे भी सदा मुझे धारण करते हैं। देवि! तुम तो सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर पतिप्राणा साध्वी स्त्री हो, अत: मैं तुम्हारा पुत्र होकर तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा। देवमाता अदितिसे ऐसा कहकर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुने अपने कण्ठकी माला उतारकर उन्हें दे दी और अभयदान देकर वे वहाँ से अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर दक्षकुमारी देवमाता अदिति प्रसन्नचित्तसे भगवान् कमलाकान्तको पुनः प्रणाम करके अपने स्थानपर लौट आयीं। फिर समय आनेपर विश्ववन्दित महाभागा अदिति ने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक सर्वलोकनमस्कृत पुत्र को जन्म दिया। वह बालक चन्द्रमण्डलके मध्य विराजमान और परम शान्त था। उसने एक हाथमें शङ्ख और दूसरेमें चक्र ले रखा था। तीसरे हाथमें अमृतका कलश और चौथेमें दधिमिश्रित अन्न था। यह भगवान्का सुप्रसिद्ध वामन अवतार था। भगवान् वामनकी कान्ति सहस्रों सूर्यों के समान उज्ज्वल थी। उनके नेत्र खिले हुए कमलके समान शोभा पा रहे थे। वे पीताम्बरधारी श्रीहरि सब प्रकारके दिव्य आभूषणोंसे विभूषित सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र नायक, स्तोत्रोंद्वारा स्तवन करने योग्य तथा ऋषि-मुनियोंके ध्येय भगवान् विष्णुको प्रकट हुए जानकर महर्षि कश्यप हर्षसे विह्वल हो गये। उन्होंने भगवान्को प्रणाम करके हाथ जोड़कर इस प्रकार स्तुति करना आरम्भ किया।
कश्यपजी बोले- सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टिके कारणभूत ! आप परमात्माको नमस्कार है, नमस्कार है। समस्त जगत्का पालन करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। देवताओंके स्वामी! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। दैत्योंका नाश करनेवाले देव! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। भक्तजनोंके प्रियतम! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। साधु पुरुष आपको अपनी चेष्टाओंसे प्रसन्न करते हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। दुष्टोंका नाश करनेवाले भगवान्को नमस्कार है, नमस्कार है। उन जगदीश्वरको नमस्कार है, नमस्कार है। कारणवश वामनस्वरूप धारण करनेवाले अमित पराक्रमी भगवान् नारायणको नमस्कार है, नमस्कार है। धनुष, चक्र, खड्ग और गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमको नमस्कार है। क्षीरसागरमें निवास करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। साधु पुरुषोंकि हृदयकमलमें विराजमान
*परोपकारनिरताः परद्रव्यपराङ्मुखाः।
नपुंसकाः परस्त्रीषु ते वहन्ति च मां सदा।।
परमात्माको नमस्कार है। जिनकी अनन्त प्रभाकी सूर्य आदिसे तुलना नहीं की जा सकती, जो पुण्यकथाम मावे और स्थित रहते हैं, उनमें भगवान्को नमस्कार है, नमस्कार है। सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप यौका फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप यज्ञ के सम्पूर्ण अङ्गों में विराजित होते हैं, आपको न कार है। साधु पुरुषोंके प्रियतम। आपको नमस्कार है। जगत् केकारणोंके भी कारण आपको नमस्कार है। प्राकृत शब्द, रूप आदिसे रहित आप परमेश्वर को नमस्कार है। दिव्य सुख प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंके हृदयमें वास करनेवाले आपको नमस्कार है। मत्स्यरूप धारण करके अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। कच्छपरूपसे मन्दराचल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। यज्ञवराह-नामधारी आपको नमस्कार है। हिरण्याक्षको विदीर्ण करनेवाले आपको नमस्कार है। वामन-रूपधारी आपको नमस्कार है। क्षत्रिय कुलका संहार करनेवाले परशुरामरूपधारी आपको नमस्कार है। रावणका संहार करनेवाले श्रीराम-रूपधारी आपको नमस्कार है। नन्दसुत बलराम जिनके ज्येष्ठ भ्राता हैं, उन श्रीकृष्णावतारधारी आपको नमस्कार है। कमलाकान्त ! आपको नमस्कार है। आप सबको सुख देनेवाले तथा स्मरणमात्र करनेपर सबकी पीड़ाओंका नाश करनेवाले हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। यज्ञेश! यज्ञस्थापक! यज्ञविध-विनाशक! यज्ञरूप! और यजमानरूप परमेश्वर! आप ही यज्ञके सम्पूर्ण अङ्ग हैं। मैं आपका यजन करता हूँ। कश्यपजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले देवेसर वामन हँसकर कश्यपजीका हर्ष बढ़ाते हुए बोले।
श्रीभगवान्ने कहा-तात। तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। देवपूजित महर्षे? थोड़े ही दिनोंमें तुम्हारा सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करूंगा। मैं पहले भी दो जन्मोंमें तुम्हारा पुत्र हुआ हूँ तथा अब इस जन्ममें भी तुम्हारा पुत्र होकर तुम्हें उत्तम सुखकी प्राप्ति कराऊँगा। इधर दैत्यराज बलिने भी अपने गुरु शुक्राचार्य तथा अन्य मुनीश्वरोंके साथ दीर्घकालतक चलनेवाला बहुत बड़ा यज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञमें ब्रह्मवादी महर्षियोंने हविष्य ग्रहण करनेके लिये लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका आवाहन किया। जिसका ऐश्वर्य बहुत बढ़ा-चढ़ा था, उस दैत्यराज बलिके महायज्ञमें माता-पिताकी आज्ञा ले ब्रह्मचारी वामनजी भी गये। वे अपनी मन्द मुसकानसे सब लोगोंका मन मोहे लेते थे। भक्तवत्सल वामनके रूपमें भगवान् विष्णु मानो बलिके हविष्यका प्रत्यक्ष भोग लगानेके लिये आये थे। दुराचारी हो या सदाचारी, मूर्ख हो या पण्डित, जो भक्तिभावसे युक्त है, उसके अन्तःकरणमें भगवान् विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। वामनजीको आते देख ज्ञानदृष्टिवाले महर्षिगण उन्हें साक्षात् भगवान् नारायण जानकर सभासदोसहित उनकी अगवानी में गये। यह जानकर दैत्यगुरु शुक्राचार्य एकान्तमें बलिको कुछ सलाह देने लगे।
शुक्राचार्य बोले- दैत्यराज ! सौम्य ! तुम्हारी राजलक्ष्मीका अपहरण करनेके लिये भगवान् विष्णु वामनरूपसे अदितिके पुत्र हुए हैं। वे तुम्हारे यज्ञमें आ रहे हैं। असुरेश्वर ! तुम उन्हें कुछ न देना। तुम तो स्वयं विद्वान् हो। इस समय मे जो मत है, उसे सुनो। अपनी बुद्धि ही सुख देनेवाली होती है। गुरुकी बुद्धि विशेषरूपसे सुखद होती है। दूसरेकी बुद्धि विनाशका कारण होती है और स्त्रीकी बुद्धि तो प्रलय करनेवाली होती है।
बलिने कहा- गुरुदेव। आपको इस प्रकार धर्ममार्गका विरोधी वचन नहीं कहना चाहिये।यदि साक्षात् भगवान् विष्णु मुझसे दान ग्रहण करते है तो इससे बढ़कर और क्या होगा?विद्वान् पुरुष भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये यज्ञ करते हैं, यदि साक्षात् विष्णु ही आकर हमारे हविष्यका भोग लगाते हैं तो संसारमें मुझसे बढ़कर भाग्यशाली कौन होगा? पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु जीवको उत्तम भक्तिभावसे स्मरण कर लेनेसे ही पवित्र कर देते हैं। जिस किसी भी वस्तुसे उनकी पूजा की जाय, वे परम गति दे देते हैं। दूषित चित्तवाले पुरुषोंके स्मरण करनेपर भी भगवान् विष्णु उनके पापको वैसे ही हर लेते हैं, जैसे अग्निको बिना इच्छा किये भी दिया जाय तो भी वह जला ही देती है। जिसकी जिह्रा के अग्रभागपर 'हरि' यह दो अक्षर वास करता है, वह पुनरावृत्तिरहित श्रीविष्णुधामको प्रास होताहै*। जो राग आदि दोषोंसे दूर रहकर सदा भगवान् गोविन्दका ध्यान करता है, वह वैकुण्ठधाममे जाता हैं- रहकर सदा भगवान् गोविन्दका ध्यान करता है, वह वैकुण्ठधाम में जाताहै-यह मनीषी पुरुषों का कथन है। महाभाग गुरुदेव। अग्रि अथवा ब्राह्मण के मुख में भगवान् विष्णु के प्रति भक्ति-भाव रखते हुए जो हविष्यकी आहुति दी जाती है, उससे वे भगवान् प्रसन्न होते हैं। मैं तो केवल भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये ही उत्तम यज्ञका अनुष्ठान करता हूँ। यदि स्वयं भगवान् यहाँ आ रहे हैं, तब तो मैं कृतार्थ हो गया-इसमें संशय नहीं हैं। दैत्यराज बलि जब ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय वामनरुपधारी भगवान् विष्णु ने यज्ञशाल में प्रवेश किया। वह स्थान होमयुक्त प्रज्वलित अग्रि के कारण बड़ा मनोरम जान पड़ता था। करोड़ो सूर्यों के समान प्रकाशमान तथा सुडौल अङ्गों के कारण परम सुन्दर वामनजीको देखकर राजा बलि सहर्ष खड़े हो गये और हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया। बैठनेके लिये आसन देकर उन्होंने वामनरूपधारी भगवान्के चरण पखारे और उस चरणोदकको कुटुम्बसहित मस्तकपर धारण करके बड़े आनन्दका अनुभव किया। जगदाधार भगवान् विष्णुको विधिपूर्वक अर्घ्यदेते-देते बलिके शरीरमें रोमाश हो आया, नेत्रों से आनन्दके आँसू झरने लगे और वे इस प्रकार बोले।
बलिने कहा-आज मेरा जन्म सफल हुआ। आज मेरा यज्ञ सफल हुआ और मेरा यह जीवन भी सफल हो गया। मैं कृतार्थ हो गया-इसमें संदेह नहीं है। भगवन्! आज मेरे यहाँ अत्यन्त दुर्लभ अमोघ अमृतकी वर्षा हो गयी। आपके शुभागमनमात्रसे अनायास महान् उत्सव छा गया। इसमें संदेह नहीं कि ये सब ऋषि कृतार्थ हो गये।
*हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः।
अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ।।
जिह्राग्रे वसते यस्य हरिहित्यक्षरद्वयम्।
स विष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥
प्रभो! इन्होंने पहले यो तपस्या की थी, वह आज सफल हो गयी। मैं क्वार्थ हूँ, कृतार्थ है, कृतार्थ हूँ-इसमें संशय नहीं है। अतः भगवन् । आपको नमस्कार है, नमस्कार है और बारम्बार नमस्कार है। आपकी आज्ञासे आपके आदेशका पालन करुँ-ऐसा विचार मेरे मन हो रहा है। अत: प्रभो। आप पूर्ण उत्साहके साथ मुझे अपनी सेवाके लिये आज्ञा दें। यज्ञ में दीक्षित यजमान बलिके ऐसा कहने पर भगवान् वामन हँसकर बोले-'राजन्! मुझे तपस्याके निमित्त रहनेके लिये तीन पग भूमि दे दो। भूमिदानका माहात्म्य महान् है। वैसा दान न हुआ है, न होगा। भूमि न करनेवाला मनुष्य निश्चय ही परम मोक्ष पाता है। जिसने अग्रिकी स्थापना की हो, उस श्रोत्रिय ब्राह्मणके लिये थोड़ी-सी भी भूमि दान करके मनुष्य पुनरावृत्तिरहित ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता है। भूमिदाता सबकुछ देनेवाला कहा गया है। भूमिदान करनेवाला मोक्षका भागी होता है। भूमिदानको अतिदान समझना चाहिये। वह सब पापोंका नाश करने वाला है। कोई महापातकसे युक्त अथवा समस्त पापों कों से दूषित हो तो भी दस हाथ भूमिका दान करके सब पापों से छूट जाता है। जो सत्पात्रको भूमिदान करता है, वह सम्पूर्ण दानोंका फल पाता है। तीनों लोकोंमें भूमिदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। दैत्यराज! जो जीविकारहित ब्राह्मणको भूमिदान करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन में सौ वर्षों में भी नहीं कर सकता। जो ईख, गेहूँ, धान और सुपारीके वृक्ष आदिसे युक्त भूमिका दान करता है, वह निश्चय ही श्रीविष्णुके समान है। जीविकाहीन, दद्धि एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको थोड़ी-सी भी भूमि देकर मनुष्य भगवान् विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है। भूमिदान बहुत बड़ादान है। उसे अतिदान कहा गया है। वह सम्पूर्ण पापों का नाशक तथा मोक्षरूप फल देनेवाला है। इसलिये दैत्यराज! तुम सब धाँक सासुलान लगे रहकर मुझे तीन पग पृथ्वी दे दो। वहाँ रहकर मैं तपस्या करूंगा।'
भगवान् के ऐसा कहनेपर विरोचनकुमार मलि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने ब्रह्मचारी वामनजीको भूमिदान करनेके लिये जलसे भरा कलश हाथ में लिया। सर्वव्यापी भगवान् विष्णु यह जान गये कि शुक्राचार्य इस कलशमें घुसकर जलकी धाराको रोक रहे हैं। अतः उन्होंने अपने हाथमें लिये हुए कुशके अग्रभागको उस कलशके मुख, घुसेड़ दिया जिसने शुक्राचार्यके एक नेत्रको नष्ट कर दिया। इसके बाद उन्होंने शस्त्रके समान उस कुशके अग्रभागको आँखसे अलग किया। इतनेमें राजा बलिने भगवान् महाविष्णुको तीन पग पृथ्वीका दान कर दिया। तदनन्तर विश्वात्मा भगवान् उस समय बढ़ने लगे। उनका मस्तक ब्रह्मलोकतक पहुँच गया। अत्यन्त तेजस्वी विश्वरूप श्रीहरिने अपने दो पैरसे सारी भूमि नाप ली। उस समय उनका दूसरा पैर ब्रह्माण्डकटाह (शिखर)- को छू गया और अँगूठेके अग्रभागके आघातसे फूटकर वह ब्रह्माण्ड दो भागोंमें बँट गया। उस छिद्रके द्वारा ब्रह्माण्डसे बाहरका जल अनेक धाराओंमें बहकर आने लगा। भगवान् विष्णुके चरणोंको धोकर निकला हुआ वह निर्मल गङ्गाजल सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाला था। ब्रह्माण्डके बाहर जिसका उद्मस्थान है, वह श्रेष्ठ एवं पावन गङ्गाजल धारारूपमें प्रवाहित हुआ और ब्रह्मा आदि देवताओंको उसने पवित्र किया। फिर सप्तर्षियोंसे सेवित हो वह मेरुपर्वतके शिखरपर गिरा। वामनजीका यह अद्भुत कर्म देखकर ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि तथा मनुष्य हर्षसे विह्वल हो उनकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले- आप परमात्मस्वरूप परमेश्वर को नमस्कार है। आप परात्पर होते हुए भी अपरा प्रकृतिसे उत्पम जगत्का रूप धारण करते हैं। आपको नमस्कार है। आप ब्रह्मरूप हैं, आपकी मन-बुद्धि अपने ब्रह्मरूप ही रमण करती है। आप कहीं भी कुण्ठित न होनेवाले अद्भुत कर्म से सुशोभित होते हैं। आपको नमस्कार है। परेश। परमानन्द । परमात्मन्! परात्पर विश्वमूर्त । प्रमाणातीत! आप सर्वात्माको नमस्कार है। आपके सब ओर नेत्र हैं, सब ओर भुजाएँ हैं, सब ओर मस्तक है और सब ओर गति है, आपको नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर भगवान् महाविष्णुने स्वर्गवासी देवताओं को अभयदान दिया और वे देवाधिदेव सनातन श्रीहरि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने एक पग भूमिकी पूर्तिके लिये विरोचनपुत्र दैत्यराज बलिको बाँध लिया, फिर उसे अपनी शरणमें आया जान रसातलका राज्य दे दिया और स्वयं भक्तके वशीभूत होकर बलिके द्वारपाल होकर रहने लगे।
नारदजीने पूछा-मुने! रसातल तो सर्पों के भयसे परिपूर्ण भयंकर स्थान है। वहाँ भगवान् महाविष्णुने विरोचनपुत्र बलिके लिये भोजनआदिकी क्या व्यवस्था की।
श्रीसनकजीने कहा-नारदजी! अग्रिमें बिना मन्त्रके जो आहुति साली जाती है और अपात्रको जो दान दिया जाता है, वह सब कर्वाक लिये भयंकर होता है और वही राजा बलिके भोग का साधन बनता है। अपवित्र मनुष्यके द्वारा जो हविष्यका होम, दान और सत्कर्म किया जाता है, वह सब रसातलमें बलिके उपभोगके योग्य होता है और कर्ताको अधःपातरूप फल देनेवाला है। इस प्रकार भगवान् विष्णुने बलिदैत्यको रसातल-लोक और अभयदान देकर सम्पूर्ण देवताओंको स्वर्गका राज्य दे दिया। उस समय देवता उनका पूजन, महर्षिगण स्तवन और गन्धर्वलोग गुणगान कर रहे थे। वे विराट महाविष्णु पुनः वामनरूप हो गये। ब्रह्मवादी मुनियोंने भगवान्का यह महान् कर्म देखकर परस्पर मुसकराते हुए उन पुरुषोत्तमको प्रणाम किया। सम्पूर्ण भूतस्वरूप भगवान् विष्णु वामनरूप धारण करके सब लोगोंको मोहित करते हुए तपस्याके लिये वनमें चले गये। भगवान् विष्णुके चरणोंसे निकली हुई गङ्गादेवीका ऐसा प्रभाव हैकि जिनके स्मरणमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो इस गङ्गा-माहात्म्यको देवालय अथवा प्रके तटपर पढ़ता या सुनता है, वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता है।