नारद महा पुराण
श्रद्धा- भक्ति, वर्णोश्रमोचित आचार तथा सत्सङ्गकी महिमा, मृकण्डु मुनिकी तपस्यासे संतुष्ट होकर भगवान् का मुनिको दर्शन तथा वरदान देना
श्रीसनकजी कहते हैं- नारद! श्रद्धापूर्वक आचरणमें लाये हुए सब धर्म मनोवाञ्छित फल देनेवाले होते हैं। श्रद्धासे ही भगवान् श्रीहरि संतुष्ट होते1 हैं। भक्तियोगका साधन भक्तिपूर्वक ही करना चाहिये तथा सत्कर्मोंका अनुष्ठान भी श्रद्धा-भक्तिसे ही करना चाहिये। विप्रवर नारद! श्रद्धाहीन कर्म कभी सिद्ध नहीं होते। जैसे सूर्यका प्रकाश समस्त जीवोंकी चेष्टामें कारण होता है, उसी प्रकार भक्ति सम्पूर्ण सिद्धियोंका परम कारण है। जैसे जल सम्पूर्ण लोकोंका जीवन माना गया है, उसी प्रकार भक्ति सब प्रकारकी सिद्धियोंका जीवन है। जैसे सब जीव-जन्तु पृथ्वीका आश्रय लेकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार भक्तिका सहारा लेकर सब कार्योंका साधन करना चाहिये। श्रद्धालु पुरुषको धर्मका लाभ होता है, श्रद्धालु ही धन पाता है, श्रद्धासे ही कामनाओंकी सिद्धि होती है तथा श्रद्धालु पुरुष ही मोक्ष पाता है2 मुनिश्रेष्ठ! दान, तपस्या अथवा बहुत दक्षिणावाले यज्ञ भी यदि भक्ति से रहित हैं तो उनके द्वारा भगवान् विष्णु संतुष्टु नहीं होते हैं। मेरु पर्वत के बराबर सुवर्णकी करोड़ो सहस्र राशियोंका दान भी यदि बिना श्रद्धा-भक्तिके किया जाय तो वह निष्फल होता है। बिना भक्ति जो तपस्या की जाती है, वह केवल शरीरको सुखाना मात्र है; बिना भक्ति जो हविष्यका हवन किया जाता है, वह राखमें डाली हुई आहुतिके समान व्यर्थ है, श्रद्धा-भक्तिके साथ मनुष्य जो कुछ थोड़ा-सा भी सत्कर्म करता है, वह उसे अनन्त कालतक अक्षय सुख देनेवाला होता है। ब्रह्मन! वेदोत्क अश्वमेध यज्ञका एक सहस्त्र बार अनुष्ठान क्योंन किया जाय, यदि वह श्रद्धा-भक्तिसे रहित है तो सब-का-सब निष्फल होता है। भगवान् की उत्तम भक्ति मनुष्योंके लिये कामधेनुके समान मानी गयी है; उसके रहते हुए भी अज्ञानी मनुष्य संसाररुपी विषका पान करते हैं, यह कितने आश्चर्यकी बात है! ब्रह्मपुत्र नारदजी! इस असार संसार में ये तीन बातें ही सार हैं- ’भगवद्धत्त्कोंका सङ्ग भगवान् विष्णुकी भक्ति और सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंको सहन करनेका स्वभाव3। ब्रह्मन्! जिनके मनमें दूसरोंके दोष देखनेकी प्रवृत्ति है, उनके किये हुए भजन-दान आदि सभी कर्मोंको निष्फल जानो। भगवान् विष्णु उनसे बहुत दूर हैं। जो दूसरोंकी सम्पत्ति देखकर मन-ही-मन संतप्त होते हैं, जिनका चित्त पाखण्डपूर्ण आचारोंमें ही लगता है, वे व्यर्थ कर्म करनेवाले है। भगवान् श्रीहरि उनसे बहुत दूर हैं। जो बड़े-बड़े धर्मोंके विषयमें प्रश्न करते हैं, किन्तु उन धर्मोंको झूठा बताते हैं और धर्म-कर्मके विषयमें जिनका मन श्रद्धा-भक्तिसे रहित है, ऐसे लोगोंसे भगवान् ’
श्रद्धापूर्वाः सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदाः।
श्रद्धया साध्यते सर्व श्रद्धया तुष्यते हरिः।।
श्रद्धावाँल्लभते धर्मं श्रद्धावानर्थमानप्नुयात्।
श्रद्धाया साध्यते कामः श्रद्धावान् मोक्षमाप्नुयात्।।
हरिभक्तिः परा नृणां कामधेनूपमा स्मृता।
तस्यां सत्यां पिबन्त्यज्ञाः संसारगरलं ह्राहो।।
असारभूते संसारे सारमेतजात्मज।
भगवद्धत्कसङ्गश्च हरिभक्तिस्तितिक्षुता।।
विष्णु बहुत दूर है। धर्मका प्रतिपादन वेदमें किया गया है और वेद साक्षात् परम पुरुष नारायणका स्वरुप है। अतः वेदोंमे जो अश्रद्धा रखनेवाले हैं, उनसे भगवान् बहुत दूर हैं1। जिसके दिन धर्मानुष्ठानके बिना ही आते और चले जाते हैं, वह लुहारकी धौंकनीके समान साँस लेता हुआ भी जीवित नहीं है। ब्रह्मनन्दन! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चार पुरुषार्थ सनातन हैं। श्रद्धालु पुरुषोंको ही इनकी सिद्धि होती है; श्रद्धाहीनको नही2। जो मानव अपने वर्णश्रमोचित आचारका उल्लङ्घन किये बिना ही भगवान् विष्णुकी भक्तिमें तत्पर है, वह उस वैकुण्ठधाममें जाता है, जिसका दर्शन बड़े-बड़े ज्ञानी भक्तोंको सुलभ होता है। मुनीश्वर! जो अपने आश्रमके अनुकूल वेदोत्क धर्मोंका पालन करते हुए भगवान् विष्णुके भजन-ध्यानमें लगा रहता हैस वह परम पदको प्राप्त होता है। आचारसे धर्म प्रकट होता है और धर्मके स्वामी भगवान् विष्णु हैं। अतः जो अपने आश्रमके आचारमें संलग्न है, उसके द्वारा भगवान् श्रीहरि सर्वदा पूजित होते हैं3। जो छहों अङ्गोंसहित वेदों और उपनिषदोंका ज्ञाता होकर भी अपने वर्णाश्रमोचित आचारसे गिरा हुआ है, उसीको पतित समझना चाहिये; क्योंकि वह धर्म-कर्मसे भ्रष्ट हो चुका है। भगवान् की भक्ति में तत्पर तथा भगवान् विष्णु के ध्यानमें लीन होकर भी जो अपने वर्णाश्रमोचित आचारसे भ्रष्ट हो, उसे पतित कहा जाता है। द्विजश्रेष्ठ। वेद, भगवान् विष्णुकी भक्ति अथवा शिवभक्ति भी आचार-भ्रष्ट मूढ़ पुरुषको पवित्र नहीं करती है। ब्रह्मन्! पुण्यक्षेत्रोंमें जाना, पवित्र तीर्थोंका सेवन करना अथवा भाँति-भाँति के यज्ञोंका अनुष्ठान भी आचार-भ्रष्ट पुरुषकी रक्षा नहीं करता। आचारसे स्वर्ग प्राप्त होता है, आचार से सुख मिलता है और आचारसे ही मोक्ष सुलभ होता है; आचार से क्या नहीं मिलता?
साधुश्रेष्ठ! सम्पूर्ण आचारोंका, समस्त योगोंका तथा स्वयं हरिभक्तिका भी मूल कारण भक्ति ही मानी गयी है। सबको मनोवाञ्छित फल प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु भक्तिसे ही पूजित होते हैं। अतः भक्ति सम्पूर्ण लोकोंकी माता कही जाती है। जैसे सब जीव माताका ही आश्रय लेकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार समस्त धार्मिक पुरुष भक्तिका आश्रय लेकर जीते हैं। नारदजी! अपने वर्ण और आश्रमके आचारका पालन करनेमें लगे हुए पुरुषको यदि भगवान् विष्णुकी भक्ति प्राप्त हो जाय तो तीनों लोकोंमें उसके समान दूसरा कोई नहीं है। भक्तिसे कर्मोंकी सिद्धि होती है, उन कर्मो से भगवान् विष्णुकी भक्ति प्राप्त हो जाय तो तीनों लोकोंमें उसके समान दूसरा कोई नहीं है। भक्तिसे कर्मोंकी सिद्धि होती है, उन कर्मोंसे भगवान् विष्णु संतुष्ट होते हैं, उनके संतुष्ट होनेपर ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञानसे मोक्ष मिलता है। भक्ति तो भगवद्धत्कोंका सङ्ग मनुष्योंको पूर्वजन्मोंके संचित पुण्यसे ही मिलता है। जो वर्णोश्रमोचित कर्तव्यके पालनमें तत्पर, भगवद्धत्किके सच्चे अभिलाषी तथा काम, क्रोध आदि दोषोंसे मुक्त हैं वे ही सम्पूर्ण लोकोंको शिक्षा देनेवाले संत हैं4। ब्रह्मन्! जो पुण्यात्मा अथवा जितेन्द्रिय नहीं हैं, उन्हें परम उत्तम सत्यङ्गकी प्राप्ति नहीं होती। यदि सत्सङ्ग मिल जाय तो उसमें पूर्वजन्मोंके संचित पुण्यको ही कारण जानना चाहिये। जिसके पूर्वजन्मोंमें किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते है, उसी को
वेदप्रणिहितो धर्मो वेदो नारायणः परः।
तत्राश्रद्धापरा ये तु तेषां दूरतरो हरिः।।
धर्मोर्थकाममोक्षाख्याः पुरुषार्थाः सनातनाः।
श्रद्धावतां हि सिध्यन्ति नान्यथा ब्रह्मनन्दन।।
आचारप्रभवो धर्मों धर्मस्य प्रभुच्युतः।
आश्रमाचारयुक्तेन पूजितः सर्वदा हरिः।।
वर्णाश्रमाचाररता भगवद्धत्किलालसाः।
कामादिदोषनिर्मुत्त्कास्ते सन्तो लोकशिक्षकाः।।
सत्सङ्ग सुलभ होता है; अन्यथा उसकी प्राप्ति असम्भव है। सूर्य अपनी किरणों के समूह से दिन में बाहर के अन्धकारका नाश करते हैं, किंतु संत-महात्मा अपने उत्तम वचनरुपी किरणोंके समुदायसे सदा भीतर के अज्ञानान्धकारका नाश करते रहते हैं। संसार में भगवद्धत्त्कि के लिये लालायित रहनेवाले पुरुष दुर्लभ है; उनका सङ्ग जिसे प्राप्त होता है, उसे सनातन शान्ति सुलभ होती है।
नारदजी ने पूछा- भगवद्धत्त्क पुरुषों का क्या लक्षण है? वे कैसा कर्म करते हैं तथा उन्हें कैसे लोक की प्राप्ति होती हैं? यह सब आप यथार्थरुप से बताइये। सनकजी! आप सुदर्शनचक्रधारी देवाधिदेव लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के भक्त हैं। अतः आप ही ये सब बातें बताने में समर्थ हैं। आप से बढ़कर दूसरा कोई नहीं है।
सनकजी ने कहा- ब्रह्मन्! योगनिद्रासे मुक्त होने पर जगदीश्वर भगवान् विष्णु ने बुद्धिमान् महात्मा मार्कण्डेयजी को जिस परम गोपनीय रहस्यका उपदेश किया था, वही तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो। वे जो परम ज्योतिः स्वरुप देवाधिदेव सनातन भगवान् विष्णु हैं, वे ही जगत्-रुपमें प्रकट होते हैं। इस जगत् के स्त्रष्टा भी वे ही हैं। भगवान् शिव तथा ब्रह्मा जी भी उन्ही के स्वरुप हैं। वे प्रलयकाल में भयंकर रुद्ररुप से प्रकट होते हैं और समस्त ब्रह्माण्डको अपना ग्रास बनाते हैं। स्थावर-जङ्गमरुप सम्पूर्ण जगत् नष्ट होकर जब एकार्णव के जल में विलीन हो जाता है, उस समय भगवान् विष्णु ही वटवृक्ष के पत्र पर शिशुरुप से शयन करते हैं। उनका एक-एक रोम असंख्य ब्रह्मा आदि से विभूषित होता है। महाप्रलय के समय जब भगवान् वटपत्र पर सो रहे थे, उस समय उसी स्थान पर भगवान् नारायण के परम भक्त महाभाग मार्कण्डेय जी भगवान् की विविध लीलाओं का दर्शन करते हुए खड़े थे।
ऋषियोंने पूछा- मुने! हमने पहले से सुन रखा है कि उस महाभयंकर प्रलयकाल में स्थावर-जङ्गम समस्त प्राणी नष्ट हो गये थे और एकमात्र भगवान् श्रीहरि ही विराजमान थे। जब समस्त चराचर जगत् नष्ट होकर एकार्णव में विलीन हो चुका था, तब सबको अपना ग्रास बनाने वाले श्रीहरि ने मार्कण्डेय मुनि को किस लिये बचा रखा था? सूतजी! इस विषय को लेकर हमारे मन में बड़ा कौतूहल हो रहा है। अतः इसका निवारण कीजिये। भगवान् विष्णु की सुयश-सुधाका पान करने में किसे आलस्य हो सकता है!
सूतजी बोले- ब्राह्मणो! पूर्वकाल में मृकण्डु नाम से विख्यात एक महाभाग मुनि हो गये हैं। उन महातपस्वी महर्षि ने शालग्राम नामक महान् तीर्थं में बड़ी भारी तपस्या की। ब्रह्मन्! उन्होंने दस हजार युगोंतक सनातन ब्रह्म का गुणगान करते हुए उपवास किया। वे बड़े क्षमाशील, सत्यप्रतिज्ञ तथा जितेन्द्रिय थे। समस्त प्राणियों को अपने समान देखते थे। उनके मन में विषय-भोगों के लिये तनिक भी कामना नहीं थी। वे सम्पूर्ण जीवों के हितैषी तथा मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले थे। उन्होंने उत्त्क तीर्थ में बड़ी भारी तपस्या की। उनकी तपस्या से शङ्कित हो इन्द्र आदि सब देवता उस समय अनामय परमेश्वर भगवान् नारायण की शरण में गये। क्षीरसागर के उत्तर तटपर जाकर देवताओं ने देवदेवेश्वर जगद् गुरु पद्मनाभका इस प्रकार स्तवन किया।
देवता बोले- हे अविनाशी नारायण! हे अनन्त! हे शरणागतपालक! हम सब देवता मृकण्डु मुनिकी तपस्या से भयभीत हो आपकी शरण में आये हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये। देवाधिदेवेश्वर! आपकी जय हो। शङ्ख और गदा धारण करने वाले देवता! आपकी जय हो। यह सम्पूर्ण जगत् आपका स्वरुप है। आपको नमस्कार है। आप ही ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति के आदि कारण हैं। आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। लोकपाल! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करने वाले! आपको नमस्कार है। लोकसाक्षिन्! आपको नमस्कार है। ध्यानगम्य! आपको नमस्कार है। ध्यान के हेतुभूत! ध्यानस्वरुप तथा ध्यान के साक्षी परमेश्वर! आपको नमस्कार है। पृथिवी आदि पाँच भूत आपके ही स्वरुप है; आपको नमस्कार है। आप चैतन्यरुप है; आपको नमस्कार है। आप सबसे ज्येष्ठ हैं, आपको नमस्कार है। आप शुद्धस्वरुप हैं, निर्गुण हैं तथा गुणरुप हैं; आपको नमस्कार है। निराकार-साकार तथा अनेक रुप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। गौओं तथा ब्राह्मणों के हितैषी!आपको नमस्कार है। जगत् का हित-साधन करने वाले सच्चिदानन्दस्वरुप गोविन्द! आपको बार-बार नमस्कार है। इस प्रकार देवताओं द्वारा की हुई स्तुति को सुनकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपति ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनके नेत्र खिले हुए कमलदल के समान शोभा पा रहे थे। उनका करोड़ो सूर्यों के समान प्रभाव था। सब प्रकार के दिव्य आभूषणों से वे युक्त थे। भगवान् के वक्षः स्थल पर श्रीवत्सचिन्ह सुशोभित हो रहा था। वे पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनकी आकृति बड़ी सौम्य थी। बायें कंधेपर सुनहले रंग का यज्ञोपवीत चमक रहा था। बड़े-बड़े महर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे तथा श्रेष्ठ पार्षद उन्हें सब ओर से घेर कर खड़े थे। उनका दर्शन करके वे सम्पूर्ण देवता उनके तेज के समक्ष फीके पड़ गये और बड़ी प्रसन्नता के साथ पृथिवीपर लेटकर अपने आठो अङ्गोंसे उन्हें प्रणाम किया। तब प्रसन्न हुए भगवान् विष्णु प्रणाम करने वाले इन्द्रादि देवताओं को आनन्दित करते हुए गम्भीर वाणी में बोले।
श्रीभगवान् ने कहा- देवताओ! मैं जानता हूँ, मृकण्डु मुनिकी तपस्या से तुम्हारे मन में बड़ा खेद हो रहा है, परंतु वे महर्षि साधुपुरुषों में अग्रगण्य हैं। अतः तुम्हें कष्ट नहीं देंगे। श्रेष्ठ देवताओं! जो साधुपुरुष हैं, वे सम्पत्ति में हों या विपत्ति में, किसी प्रकार भी दूसरे को कष्ट नहीं देते। वे स्वप्र में भी ऐसा नहीं करते। सज्जनो! जो मानव सम्पूर्ण जगत् का हित करनेवाला, दूसरों के दोष न देखने वाला तथा ईषर्यारहित है, वह इहलोक और परलोक में साधुपुरुषों द्वारा ‘निःशङ्क’ कहा जाता है। सशङ्क पुरुष सुख पाता है। अतः तुमलोग निश्चिन्त होकर अपने-अपने घर जाओ। मृकण्डु मुनि तुम्हें कोई कष्ट नहीं देंगे। इसके सिवा तुम्हारी रक्षा करने वाला मैं तो हूँ ही। अतः सुखपूर्वक विचरो।इस प्रकार अलसी के फूल की भाँति श्यामकान्ति वाले भगवान् विष्णु देवताओंको वर देकर उनके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। देवताओं का मन प्रसन्न हो गया। वे जैसे आये थे, उसी प्रकार स्वर्ग को लौट गये। भगवान् श्रीहरि ने प्रसन्न होकर मृकण्डु को भी प्रत्यक्ष दर्शन दिया। जो स्वयं प्रकाश, निरञ्जन एवं निराकार परब्रह्म हैं, वही अलसी के फूल के समान श्यामसुन्दर विग्रह धारण करके प्रकट हो गये. दिव्य आयुधों से सुशोभित उन पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु को देखकर मृकण्डु मुनि आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने ध्यान से आँखें खोलकर देखा, भगवान् विष्णु सम्मुख विराजमान है। उनके मुख से प्रसन्नता टपक रही है, वे शान्त भाव से स्थित हैं। जगत् का धारण-पोषण उन्हीं के द्वारा होता है। यह सम्मूर्ण विश्व उन्हीं का तेज है। भगवान् का दर्शन करके मुनिका शरीर पुलकित हो उठा। उनके नेत्रों से आनन्द के आँसू झरने लगे। उन्होंने पृथ्वी पर दण्ड की भाँति गिरकर उन देवाधिदेव सनातन परमात्माको प्रणाम किया। फिर हर्षजनक आँसुओं से भगवान् के दोनों चरण पखारते हुए वे सिरपर अञ्जलि बाँधे उनकी स्तुति करने लगे।
मृकण्डुजी बोले- परमात्मस्वरुप परमेश्वरको नमस्कार है। जो पर से भी अति परे हैं, जिनका पार पाना असम्भव है, जो दूसरों पर अनुग्रह करने वाले तथा दूसरों को संसार-सागर के उस पार पहुँचा देनेवाले हैं, उन भगवान् श्रीहरि को नमस्कार है। जो नाम और जाति आदि की कल्पनाओं से रहित हैं, जिनका स्वरुप शब्दादि विषयोंके दोष से दूर है, जिनके अनेक स्वरुप हैं तथा जो तमोगुण से सर्वथा शून्य हैं, उन स्तुति करन योग्य परमेश्वर का मैं भजन करता हूँ। जो वेदान्तवेद्य और पुराणपुरुष हैं, ब्रह्मा आदि से लेकर सम्पूर्ण जगत् जिनका स्वरुप है, जिनकी कहीं भी उपमा नहीं है तथा जो भक्तजनोंपर अनुग्रह करने वाले हैं, उन स्तवन करने योग्य आदिपरमेश्वर की मैं आराधना करता हूँ। जिनके समस्त दोष दूर हो गये हैं, जो एकमात्र ध्यान में स्थित रहते हैं, जिनकी कामना निवृत्त और मोह दूर हो गये हैं, ऐसे महात्मा पुरुष जिनका दर्शन करते हैं, संसार-बन्धन को नष्ट करने वाले उन परम पवित्र परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ। जो स्मरण मात्र से समस्त पीड़ाओं का नाश कर देते हैं, शरण में आये हुए भक्तजनों का पालन करते हैं, जो समस्त संसार सेव्य हैं तथा सम्पूर्ण जगत् जिनके भीतर निवास करता हैं, उन करुणासागर परमेश्वर विष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ।महर्षि मृकण्डु के इस प्रकार स्तुति करने पर शङ्ख, चक्र, और गदा धारण करने वाले भगवान् विष्णु को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपनी चार विशाल भुजाओं से खींचकर मुनिको ह्रदय से लगा लिया और अत्यन्त प्रेमपूर्वक कहा-‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले मुने!तुम सर्वथा निष्पाप हो, तुम्हारी तपस्या और स्तुति से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो। सुव्रत! तुम्हारे मन को जो अभीष्ट हो, वही वर माँग लो।’
मृकण्डु ने कहा- देवदेव! जगन्नाथ! मैं कृतार्थ हो गया, इसमें तनिक भी संशय नहीं है; क्योंकि जो पुण्यात्मा नहीं हैं, उनके लिये आपका दर्शन सर्वथा दुर्लभ है। ब्रह्मा आदि देवता तथा तीक्ष्ण व्रत का पालन करनेवाले योगीजन भी जिनका दर्शन नहीं कर पाते, धर्मनिष्ठ, यज्ञोंकी दीक्षा लेनेवाले यजमान, वीतराग साधक तथा ईषर्यारहित साधुओं को भी जिनका दर्शन दुर्लभ है, उन्हीं परम तेजोमय आप श्रीहरि का मैं दर्श कर रहा हूँ, इससे बढ़कर दूसरा क्या वर माँगूँ?जगद्गुरु जनार्दन। मैं इतने से ही कृतार्थ हूँ। अच्युत। महापात की मनुष्य भी आपके नामों का स्मरण करने मात्र से आपके परम पद को प्राप्त कर लेते हैं; फिर जो आपका दर्शन कर लेता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है?
श्रीभगवान् बोले- ब्रह्मन्! तुमने ठीक कहा है। विद्वान्!मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, मेरा दर्शन कदापि व्यर्थ नहीं होगा। अतः तुम्हारी तपस्या से संतुष्ट होकर मैं तुम्हारे यहाँ(अंशरुप से) समस्त गुणों से युक्त, रुपवान् तथा दीर्घजीवी पुत्र के रुप में उत्पन्न होऊँगा। मुनिश्रेष्ठ! जिसके कुल में मेरा जन्म होता है, उसका समस्त कुल मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। मेरे प्रसन्न होने पर तीनों लोकों में कौन-सा कार्य असाध्य है। ऐसा कहकर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु मृकण्डु मुनिके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर वे मुनि तपस्यासे निवृत्त हो गये।