नारद महा पुराण
शुकदेवजीका मिथिलागमन, राजभवनमें युवतियोंद्वारा उनकी सेवा, राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका सत्कार और शुकदेवजीके साथ उनका मोक्षविषयक संवाद
श्रीसनन्दनजीने कहा-नारदजी! एक दिन मोक्ष-धर्मका ही विचार करते हुए शुकदेवजी पिता व्यासदेवके समीप गये और उन्हें प्रणाम करके बोले-'भगवन्! आप मोक्ष-धर्ममें निपुण हैं, अत: मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मेरे मनको परम शान्ति प्राप्त हो।' मुने! पुत्रकी यह बात सुनकर महर्षि व्यासने उनसे कहा-'वत्स! नाना प्रकारके धर्मोंका भी तत्त्व समझो और मोक्षशास्त्रका अध्ययन करो।' तब शुकने पिताकी आज्ञासे सम्पूर्ण योगशास्त्र और कपिलप्रोक्त सांख्यशास्त्रका अध्ययन किया। जब व्यासजीने समझ लिया कि मेरा पुत्र ब्रह्मतेजसे सम्पन्न, शक्तिमान् तथा मोक्षशास्त्रमें कुशल हो गया है, एक तब उन्होंने कहा-'बेटा! अब तुम मिथिलानरेश जनकके समीप जाओ, राजा जनक तुम्हें मोक्षतत्त्व यह पूर्णरूपसे बतलायेंगे।' पिताके आदेशसे शुकदेवजी कि धर्मकी निष्ठा और मोक्षके परम आश्रयके सम्बन्धमें कर प्रश्न करनेके लिये मिथिलापति राजा जनकके पास जाने लगे। जाते समय व्यासजीने फिर कहा-'वत्स ! जिस मार्गमें साधारण मनुष्य चलते हों, उसीसे तुम भी यात्रा करना। मनमें विस्मय अथवा अभिमानको स्थान न देना। अपनी योगशक्तिके बिठा प्रभावसे अन्तरिक्षमार्गद्वारा कदापि यात्रा न करना। मुनि सरल भावसे ही वहाँ जाना। मार्गमें सुख-सुविधा न देखना, विशेष व्यक्तियों या स्थानोंकी खोज न करना, क्योंकि वे आसक्ति बढ़ानेवाले होते हैं। 'राजा जनक शिष्य और यजमान है ऐसा वेस समझकर उनके सामने अहंकार न प्रकट करना। उनके वशमं रहना। वे तुम्हारे संदेहका निवारण कागा राजा जनक धर्म निपुण तथा मोक्षशास्त्रमें कुशल हैं। वे मेरे शिष्य हैं, तो भी तुम्हारे लिये जो आज्ञा दें, उसका निस्संदिग्ध होकर पालन करना।'
पिताके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा शुकदेव मुनि मिथिला गये। यद्यपि समुद्रोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको वे आकाशमार्गसे ही लाँघ सकते थे, तथापि पैदल ही गये। महामुनि शुक विदेहनगरमें पहुंचे। पहले राजद्वारपर पहुंचते ही द्वारपालोंने उन्हें भीतर जानेसे रोका; किंतु इससे उनके मनमें कोई ग्लानि नहीं हुई। नारदजी! महायोगी शुक भूख-प्याससे रहित हो वहीं धूपमें जा बैठे और ध्यानमें स्थित हो गये। उन द्वारपालोंमेंसे एकको अपने व्यवहारपर बड़ा शोक हुआ। उसने देखा, शुकदेवजी दोपहरके सूर्यकी भांति यहाँ स्थित हो रहे हैं, तब हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विधिपूर्वक उनका पूजन एवं सत्कार करके राजमहलकी दूसरी कक्षामें उनका प्रवेश कराया। वहाँ चैत्ररथ वनके समान एक विशाल उपवन था, जिसका सम्बन्ध अन्तःपुरसे था। वह नवन बड़ा रमणीय था। द्वारपालने शुकदेवजीको सारा उपवन दिखाकर एक सुन्दर आसनपर बिठाया तथा राजा जनकको इसकी सूचना दी। मुनिश्रेष्ठ! राजाने जब सुना कि शुकदेवजी मेरे पास आये हैं तो उनके हार्दिक भावको समझनेके उद्देश्यसे उनकी सेवाके लिये बहुत-सी युवतियोंको नियुक्त किया। उन सबके वेश बड़े मनोहर थे। वे सब-की-सब तरुणी और देखने में मनको प्रिय लगनेवाली थीं। उन्होंने ला रंगके महीन एवं रंगीन वस्त्र धारण कर रखे थे। उनके अङ्गोम तपाये हुए शुद्ध सुवर्णके आभूषण चमक रहे थे। वे बातचीतमें बड़ी चतुर तथा समस्त कलाओंमें कुशल थीं। उनकी संख्या पचास अधिक थी। उन सबने शुकदेवजीक उये पाद्य, अर्घ्य आदि प्रस्तुत किये तथा देश और कालके अनुसार प्राप्त हुआ उत्तम अन्न भोजन कराकर उन्हें तृप्त किया। नारदजी! जब वे भोजन कर चुके तो उनमें से एक-एक युवतीने शुकदेवजीको अपने साथ लेकर उन्हें वह अन्तःपुरका वन दिखलाया। फिर मनके भावोंको समझनेवाली वे सब युवतियाँ हैसती, गाती हुई उदारचित्तवाले शुकदेव मुनिकी परिचर्या करने लगीं। शुकदेवमुनिका अन्त:करण परम शुद्ध था। वे क्रोध और इन्द्रियोंको जीत चुके थे तथा निरन्तर ध्यानमें ही स्थित रहते थे। उनके मनमें न हर्ष होता था, न क्रोध। संध्याका समय होनेपर शुकदेवजीने हाथ पर धोकर संध्योपासना की। फिर वे पवित्र आसन पर बैठे और उसी मोक्ष- धर्मके विषयमें विचार करने लगे। रातके पहले पहरमें ये ध्यान लगाये बैठे रहे। दूसरे और तीसरे पहरमें भगवान् शुकने न्यायपूर्वक निद्राको स्वीकार किया। फिर प्रात: काल ब्रह्मवेलामें ही उठकर उन्होंने शीच स्वान किया। तदनन्तर स्त्रियों से घिरे होने पर भी परम बुद्धिमान् शुक पुनः ध्यान में ही लग गये। नारदजी। इसी विधिसे उन्होंने बह शेष दिन और सम्पूर्ण राति राजकुलमें व्यतीत की।
द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मन्त्रियोसहित राजा जनक पुरोहित तथा अन्त पुरकी स्त्रियोंको आगे करके मस्तक पर आयपार लिये गुरुपुत्र शुकदेवजी के समीप गाये। उन्होंने सम्पूर्ण रत्रोंसे विपित एक महान् सिंहासन लेकर गुरुपुत्र शुकदेवजीको अर्पित किया। व्यासनन्दन शुक जब उस आसपर विराजमान हुए, तब राजाने पहले उन्हें पार्पण किया, उसके बाद अर्घ्यसहित गाय निवेदन की। महारोजस्वी द्विजोतन शुकने मन्त्रोचारपूर्वक कोरम पूजाको स्वीकार करके राजा कुशल मङ्गल पूछा। राजाका दयी पर सभी उदार थे। वे भी गुरुपुत्रसे कुशल-समाचार बताकर उनकी आज्ञा ले भूमिपर बैठे। तत्पश्चात् व्यासनन्दन शुक से कुशल-मङ्गल पूछकर विधिज्ञ राजाने प्रश्न किया-'ब्रह्मन्! किसलिये आपका यहाँ शुभागमन हुआ है?' शुकदेवजी बोले-राजन्! आपका कल्याण हो। पिताजीने मुझसे कहा है कि 'मेरे यजमान विदेहराज जनक मोक्ष-धर्मके तत्त्वको जानने में कुशल हैं। तुम उन्हींके पास जाओ। तुम्हारे हृदयमें प्रवृत्ति या निवृत्तिके विषयमें जो भी संदेह होगा, उसका वे शीघ्र ही निवारण कर देंगे। इसमेंस संशय नहीं है।' अतः मैं पिताजीकी आज्ञासे आपके समीप अपना हार्दिक संशय मिटाने के लिये यहाँ आया हूँ। आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं। मुझे यथावत् उपदेश देनेकी कृपा करें। ब्राह्मणका इस जगत्में क्या कर्तव्य है ? तथा मोक्षका स्वरूप कैसा है? उसे ज्ञान या तपस्या किस साधनसे पास करना चाहिये? राजा जनकने कहा- ब्रह्मन्! इस जगत् में जन्मसे लेकर जीवनपर्यन्त ब्राह्मणका जो कर्तव्य है, वह बतलाता हूँ, सुनो-तात! उपनयन- संस्कारके पश्चात् ब्राह्मण-बालकको वेदोंके स्वाध्यायमें लग जाना चाहिये। वह तपस्या, गुरुसेवा और ब्रह्मचर्य-पालनमें संलग्न रहे। होम तथा श्राद्ध-तर्पणद्वारा देवताओं और पितरोंके ऋणसे मुक्त हो। किसीको निन्दा न करे। सम्पूर्ण वेदोंका नियमपूर्वक अध्ययन पूरा करके गुरुको दक्षिणा दे, फिर उनकी आज्ञा लेकर द्विजबालक अपने घरको लौटे। समावर्तन-संस्कारके पश्चात् गुरुकुलसे - लौटा हुआ ब्राह्मणकुमार विवाह करके अपनी ही पत्नी में अनुराग रखते हुए गृहस्थ आश्रममें निवास करे। किसीके दोष न देखे। न्यायपूर्वक बर्ताव करे। अग्निकी स्थापना करके प्रतिदिन आदरपूर्वक अग्रिहोत्र करे। पुत्र और पौत्रोंकी उत्पत्ति हो जानेपर वानप्रस्थ-आश्रममें रहे और पहलेकी स्थापित अयिका ही विधिपूर्वक आहुतिद्वारा करे। रखना चाहिये। तदनन्तर धर्मज्ञ पुरुष वनमें न्यायपूर्वक सम्पूर्ण अग्नियोंको (भावनाद्वारा) अपने भीतर ही लीन करके वीतराग हो ब्रह्मचिन्तनपरायण संन्यास-आश्रममें निवास करे और शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंको धैर्यपूर्वक सहन करे।
शुकदेवजीने पूछा- राजन् ! यदि किसीको ब्रह्मचर्य-आश्रममें ही सनातन ज्ञान-विज्ञानकी प्रासि हो जाय और हृदयके राग-द्वेष आदि द्वन्द्व दूर हो गये हों तो भी उसके लिये क्या शेष तीन आश्रमों में निवास करना अत्यन्त आवश्यक है? इस संदेहके विषयमें मैं आपसे पूछ रहा हूँ। का आप बतानेकी कृपा करें।
राजा जनकने कहा-ब्रह्मन्! जैसे ज्ञान- विज्ञानके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सद्गुरुसे सम्बन्ध हुए बिना ज्ञानकी में उपलब्धि भी नहीं होती। गुरु इस संसार-सागरसे पार उतारनेवाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान नौकाके समान बताया गया है। लोकको धार्मिक मर्यादाका उच्छेद न हो और कर्मानुष्ठानकी और परम्पराका भी नाश न होने पावे, इसके लिये पहलेके विद्वान् चारों आश्रमोंके धोका पालन मुक्त करते थे। इस प्रकार क्रमशः अनेक प्रकारके दोंका सत्कर्माका अनुष्ठान करते हुए शुभाशुभ कर्मोको क्षणा आसक्तिका त्याग हो जानेपर यहीं मोक्ष प्राप्त हो अपने जाता है। अनेक जन्मोंसे सत्कर्म करते-करते जब कुलसे सम्पूर्ण इन्द्रियाँ पवित्र हो जाती है, तब शुद्ध अपनी अन्तःकरणवाला पुरुष प्रथम आश्रममें ही उत्तम श्रम, मोक्षरूप ज्ञान प्रास कर लेता है। उसे पाकर जब अपूर्वक ब्रह्मचर्य-आश्रम में ही तल साक्षात्कार एवं हिदिन मुक्ति सुलभ हो जाय तब परमात्माको चाहनेवाले मौत्रोंकी जीवन्मुक विद्वान के लिये शेष तीनों आश्रमोगरें है और जानेकी क्या आवश्यकता है। विद्वानको चाहिये हुतिद्वारा कि वह राजस और समस दोपोंका परित्याग कर दे और सात्विक मार्गका आश्रय लेकर बुद्धिके द्वारा आत्माका दर्शन करे। जो सम्पूर्ण भूतोंकों अपनेमें और अपनेको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित देखता है, वह संसारमें रहकर भी उसके दोषोंसे लिप्त नहीं होता और अक्षय पदको प्राप्त कर लेता है। तात! इस विषयमें राजा ययातिकी कही हुई गाथा सुनो-
जिसे मोक्ष-शास्त्रमें निपुण विद्वान् द्विज सदा धारण किये हुए हैं, अपने भीतर ही उस आत्मज्योतिका प्रकाश है, अन्यत्र नहीं। वह ज्योति सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर समान रूपसे स्थित है। समाधिमें अपने चित्तको भलीभाँति एकाग्र करनेवाला पुरुष उसको स्वयं देख सकता है। जिससे दूसरा कोई प्राणी नहीं डरता, जो स्वयं किसी दूसरे प्राणीसे भयभीत नहीं होता तथा जो इच्छा और द्वेषसे रहित हो गया है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीको बुराई नहीं करता, उस समय वह ब्रह्मरूप हो जाता है। जब मोह में डालनेवाली ईष्यो, काम और लोभका गति त्याग करके पुरुष अपने आपको तपमें लगा देता है, उस समय उसे ब्रह्मानन्दका अनुभव होता है। आप जब सुनने और देखने योग्य विषयों में तथा सम्पूर्ण स्थिर प्राणियोंके ऊपर मनुष्यका समानभाव हो जाय परंतु और सुख-दुःख आदि हुन्छ उसके चित्तपर प्रभाव न डाल सकें, तंब वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जिस समय निन्दा स्तुति, लोहा-सोना, सुख-दुःख, सर्दी-गरमी, अर्ध-अनर्थ, प्रिय अप्रिय तथा जीवन-मरणमें समान दृष्टि हो जाती है, उस समय मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। जैसे कछुआ अपने अङ्गोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासीको मनके द्वारा इन्द्रियोंपर नियन्त्रण रखना चाहिये । जिस प्रकार अन्धकारसे व्याप्त हुआ घर दीपकके प्रकाशसे स्पष्ट दीख पड़ता है, उसी तरह बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे आत्माका दर्शन हो सकता है। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शुकदेवजी! उपर्युक्त सारी बातें मुझे आपमें दिखायी देती हैं। इनके अतिरिक्त जो कुछ भी जानने योग्य विषय है, उसे आप मोठीक-ठौक जानते हैं। ब्रह्मर्षे ! मैं आपको अच्छी ना तरह जानता हूँ। आप अपने पिताजीकी कृपा है और शिक्षाके कारण विषयोंसे परे हो गये हैं। उन्हीं महामुनि गुरुदेवकी कृपासे मुझे भी यह राई | दिव्य विज्ञान प्राप्त हुआ है, जिससे मैं आपकी है। स्थितिको पहचानता हूँ। आपका विज्ञान, आपकी का गति और आपका ऐश्वयं-ये सब अधिक हैं। देता किंतु आपको इस बातका पता नहीं है। ब्रह्मन् ! है। आपको ज्ञान हो चुक है और आपकी वृद्धि भी पूर्ण स्थिर है, साथ ही आपमें लोलुपता भी नहीं है, जाय परंतु विशुद्ध निश्चय जिना किसीको भी भाव परब्रहाकी प्राशि नहीं होती। आप सुख-दुःखमें है। कोई अन्तर नहीं समझते। जापके मन में तनिक सुख भी लाभ नहीं है। आपको नाच देखनेकी
*न विभेति परो यस्मान्न बिभेति पराच्च यः ।
यश नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते स तु ॥
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम्।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्मा सम्पद्यते तदा।।
संयोज्य तपसाऽऽत्मानमीया॑मुत्सृज्य मोहिनीम्।
त्यक्त्वा कामं च लोभं च ततो ब्रह्मत्वमस्तुते ।।
यदा श्रव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाव्ययम् ।
समो भवति निईन्द्वो ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।।
यदा स्तुति च निन्दा च समत्वेन च पश्यति ।
काशनं चायसं चैव सुखदुःखें तथैव च ॥
शीतमुण तथैवार्थमनर्थ प्रियमप्रियम्।
जीवितं मरणं चैव ब्रहा सम्पद्यते तदा।।
प्रसार्येह यथाङ्गानि कुर्मः संहरते पुनः ।
तथेन्द्रियाणि मनसा संयन्तब्यानि भिक्षुणा ॥
उत्कण्ठा होती है, न गीत सुननका। आपका कहीं भी राग है ही नहीं। न तो बन्धुओंके प्रति आपकी आसक्ति है, न भयदायक पदार्थोंसे भय। महाभाग! मैं देखता हूँ-आपकी दृष्टि में अपनी निन्दा और स्तुति एक-सी है। मैं तथा दूसरे मनीषी विद्वान् भी आपको अक्षय एवं अनामय पथ (मोक्षमार्ग)-पर स्थित मानते हैं। विप्रवर! इस लोकमें ब्राह्मण होनेका जो फल है और मोक्षका जो स्वरूप है, उसीमें आपकी स्थिति है।
सनन्दनजी कहते हैं-नारद! राजा जनककी यह बात सुनकर शुद्ध अन्तःकरणवाले शुकदेवजी एक दृढ़ निश्चयपर पहुँच गये और बुद्धिके द्वारा आत्माका साक्षात्कार करके उसी में स्थित होकर कृतार्थ हो गये। उस समय उन्हें चरम आनन्द और परम शान्तिका अनुभव हुआ। इसके बाद वे हिमालय पर्वतको लक्ष्य करके चुपचाप उत्तर दिशाको ओर चल दिये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने पिता व्यासजीको देखा, जो पैल आदि शिष्योंको वैदिकसंहिता पढ़ा रहे थे। शुद्ध अन्त:करणवाले शुकदेव अपनी दिव्य प्रभासे सूर्यक समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर बड़े आदरसे पिताके चरणों में प्रणाम किया। तदनन्तर उदार- बुद्धि शुकने राजा जनकके साथ जो मोक्षसाधन- विषयक संवाद हुआ था, वह सब अपने पिताको बताया। उसे सुनकर वेदोंका विस्तार करनेवाले व्यासजीने हर्षोल्लासपूर्ण हृदयसे पुत्रको छातीसे लगा लिया और अपने पास बिठाया। तत्पश्चात् पैल आदि ब्राह्मण व्यासजीसे वेदोंका अध्ययन करके उस शैलशिखरसे पृथ्वीपर आये और यज्ञ कराने तथा वेद पढ़ानेके कार्यमें संलग्न हो गये।