रानी संध्यावलीका राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत करना, राजाका मोहिनीसे अनुनय-विनय, मोहिनीका दुराग्रह तथा धर्माङ्गदका राजाको अपने वधके लिये प्रेरित करना

वसिष्ठजी कहते हैं- धूपते! तदनन्धर देवी संध्यावलीने पतिके दोनों चरण पकाकर धर्माबदके विनाशसे सम्बन्ध रखनेवाली बात कही-'महाराज! आपकी ही भौति मैंने भी इसे बहुत समझाया है। किंतु इस मोहरूपा मोहिनीको इस समय दूसरी कोई बात अच्छी ही नहीं लगती। इसका एक ही आग्रह है, एकादशीके दिन राजा भोजन करें अथवा अपने पुत्रका वध कर डालें। नाथ! धर्म छोड़नेकी अपेक्षा तो पुत्रका वध ही श्रेष्ठ है। राजन्! गर्भ धारण करने में माताको ही अधिक क्लेश सहना पड़ता है और बालकपर उसीका रोह भी अधिक होता है। खेद और स्नेह जैसा माताका होता है, वैसा पिताका नहीं हो सकता। राजेन्द्र ! इस भूतलपर पिताको बीज-वपन करनेवाला कहा गया है, माता उसको धारण करनेवाली है; अत: उसके पालन-पोषणमें अधिक क्लेश उसीको उठाना पड़ता है। पुत्रपर पितासे सौगुना स्नेह माताका होता है। उसके स्नेहकी अधिकतापर हो दृष्टि रखकर गौरवमें माताको पितासे बड़ी माना गया है, किंतु नृपश्रेष्ठ ! आज मैं माता होकर भी सत्यके पालनसे परलोकको जीतनेको इच्छा रखकर पुत्र-स्नेहको तिलाञ्जलि दे चुकी हूँ। भूपाल! स्नेहको दूर करके पुत्रका वध कीजिये। राजन् ! वे आपत्तियाँ भी धन्य हैं, जो सत्यका पालन करानेवाली हैं। सत्यका संरक्षण करानेवाली होनेसे वे मनुष्योंके लिये मोक्षदायिनी हैं। अतः पृथ्वीपते। संतप्त होनेसे कोई लाभ नहीं, आप सत्यकी रक्षा कीजिये। राजन् ! सत्यके पालन भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त होता है। देवताओं ने आपकी परीक्षाके लिये इस मोहिनीको कसौटोके रूपमें उत्पन्न किया है। अत: भूपाल ! आप इन होकर प्रिय पुत्रका वध कीजिये। अपने सत्य- पालनके उद्देश्यसे मोहिनीके वचनकी पूर्ति कीजिये।'

वसिष्ठजी कहते हैं- राजन्! पत्नीकी यह बात सुनकर महाराज रुक्माङ्गदने मोहिनीके समीप रानी संध्यावलीसे इस प्रकार कहा-'प्रिये! पुत्रकी हत्या बहुत बड़ी हत्या है। वह ब्रह्महत्यासे भी बढ़कर है। कहाँ-से-कहाँ मैं मन्दराचलपर गया और न जाने कहाँसे यह मोहिनी मुझे वहाँ मिली। देवि! यह स्त्री नहीं, धर्माङ्गदका नाश करनेके लिये साक्षात् कालप्रिया काली है। धर्माङ्गद धर्मज्ञ, विनयशील तथा प्रजाको प्रसन्न रखनेवाला है, अभीतक उसे कोई संतान भी नहीं हुई है। ऐसे पुत्रको मारकर मेरी क्या गति होगी? देवि! कुपुत्रको भी मारनेसे पिताके मनमें दुःख होता है, फिर जो धर्मशील तथा गुरुजनोंका सेवक है, उसके मरनेसे कितना दु:ख होगा। वरवणिनि ! इस समय तुम्हारे पुत्रके प्रतापसे ही मैंने सातों द्वीपोंके राज्यका उपयोग किया है। अपना यह पुत्र धर्माङ्गद इस पृथ्वीपर सबसे श्रेष्ठ है। मनोहराङ्गी! वह मेरे समूचे कुलका सम्मान बढ़ानेवाला है। सुन्दरि! मोहिनी मोहमें डूबकर केवल मुझे दुःख दे रही है, तुम पुनः शुभ वचनोंद्वारा उसे समझाओ।'

अपनी प्रिय पत्नी संध्यावलीसे ऐसा कहकर राजा उस समय मोहिनीसे इस प्रकार बोले- 'शुभे। मैं एकादशीको भोजन नहीं करूँगा और पुत्रकी हत्या भी नहीं कर सकूँगा। अपनेको और संध्यावली देवीको आरेसे चीर सकता हूँ अथवा तुम्हारे कहनेसे कोई और भी भयंकर कर्म कर सकता हूँ। सुध। पुत्रके सम्बन्धों यह दुष्टतापूर्ण आग्रह छोड़ दो। बताओ, पुत्र धर्माङ्गदको मार देनेसे तुम्हें क्या फल मिलेगा? मुझे एकादशीको भोजन करा देनेसे तुम्हारा क्या लाभ होगा? वरानने ! मैं तुम्हारा दास हूँ, सेवक हूँ और सर्वथा तुम्हारे अधीन हूँ। सौभाग्यशालिनि। मैं तुम्हारी शरणमें आया हूँ। सुन्दरि! कोई दूसरा वर माँग लो। देवि! मुझपर कृपा करो। पुत्रकी भिक्षा दे दो। गुणवान् पुत्र दुर्लभ है और एकादशीका व्रत भी दुर्लभ है । इस पृथ्वीपर गङ्गाजीका जल दुर्लभ है, भगवान् विष्णुका पूजन दुर्लभ है तथा स्मृतियोंका संग्रह भी दुर्लभ है एवं भगवान् विष्णुका स्मरण एवं चिन्तन भी अत्यन्त दुर्लभ है। साधु पुरुषोंका सङ्ग दुर्लभ है तथा भगवान् की भक्ति भी दुर्लभ ही बतायी गयी है। बरवर्णिनि! मृत्युकालमें भगवान् विष्णुका स्मरण भी दुर्लभ ही है, ऐसा समझकर मेरा धर्मरक्षाविषयक वचन स्वीकार करो। मैंने सब विषय भोग लिये, निष्कण्टक राज्य भी कर लिया; किंतु मेरे पुत्रने तो अभी संसारके विषयोंका सुख देखा ही नहीं, अत: उसकी हत्या कदापि नहीं करूँगा। मोहिनो। अपने ही हाथसे अपने पुत्रका वध! ओह ! इससे बढ़कर पाप और क्या होगा?'

मोहिनीने कहा-राजन् ! मैंने तो पहले ही कह दिया है, एकादशीको भोजन करो और इच्छानुसार बहुत वर्षातक पृथ्वीका शासन करते रहो। मैं पुत्रका वध नहीं कराऊँगो। एकादशीको तुम्हारे भोजन कर लेनेमारसे ही मेरा प्रयोजन सिद्ध हो जायगा। पृथ्वीपते। तुम्हारे पुरको मृत्युसे मेरा कोई मतलब नहीं है। राजन् ! यदि पुत्र प्रिय है तो एकादशीके दिन भोजन कसे। महोपाल। इस धमविरोधी बिल्लापले का नाम? मेरी बात सानो और अनपूर्वक सत्यको रक्षा करो।

राजन् ! मोहिनी जब ऐसी बात कर रही थी, उसी समय धर्माङ्गद वहाँ आ गये और मोहिनीकी ओर देखकर उसे प्रणाम करके सामने खड़े हो विनीतभावसे बोले-'भामिनि! तुम यही लो (मेरे वधरूपी वरको ही ग्रहण करो); इसके विषयमें तनिक भी शङ्का न करो।' ऐसा कहकर उन्होंने राजाके आगे एक चमकती हुई तलवार रख दी और अपने-आपको भी समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् सत्य-धर्ममें स्थित हो पितासे कहा-'पिताजी! अब आपको मुझे मारनेमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। महाराज! आपने मेरी माता मोहिनीके समक्ष जो प्रतिज्ञा की है, उसे सत्य कर दिखाइये। आपके हितके लिये मेरा मरना मुझे अक्षय गति देनेवाला है और अपने वचनके पालनसे आपको भी तेजस्वी लोक प्रास होंगे। अतः पुत्रके मारे जानेका जो महान् दुःख है, उसको त्यागकर अपने धर्मका पालन कीजिये। इस मत्यशरीरका त्याग करनेपर मेरे भावी जीवनका आरम्भं अमर देहमें होगा। वह मेरा दिव्य शरीर सब प्रकारके रोगोंसे रहित होगा। प्रभो ! जो पुत्र पिता अथवा माताके हितके लिये मारे जाते हैं तथा राजन् ! जो गाय, 'ब्राहाण, स्त्री, भूमि, राजा, देवता, बालक तथा आतंजनोंके लिये प्राण त्याग करते हैं, वे अत्यन्त प्रकाशमय लोकोंमें जाते हैं। अतः शोक-संतापसे कोई लाभ नहीं, आप श्रेष्ठ तलवारसे मेरा वध कीजिये राजेन्द्र ! सत्यका पालन कीजिये और एकादशीको भोजन न कीजिये। मैंने अपने शरीरके बधके लिये जो बात कही है, उसे सत्य कीजिये। महाराज! आपने मोहिनीको दाहिना हाथ देकर जो बचन दिया है, उसका पालन न करनेसे असत्यका डोमलगमा। उस भयंकर असत्य भाषाके वापस अपरेकी बधाइये।