राजा रुक्माङ्गदद्वारा मोहिनीके आक्षेपोंका खण्डन, एकादशीव्रतकी वैदिकता, मोहिनीद्वारा गौतम आदि ब्राह्मणोंके समक्ष अपने पक्षकी स्थापना

राजा बोले- वरानने! गिरि श्रेष्ठ मन्दराचलपर एकादशीको भोजन करनेके विषयमें तुमने जो महर्षि गौतमकी कही हुई बात बतायी है, वह कथन पुराणसम्मत नहीं है। पुराणमें तो विद्वानोंका किया हुआ यह निर्णय स्पष्टरूपसे बताया गया है कि एकादशी तिथिको भोजन न करे। फिर मैं एकादशीको भोजन कैसे करूँगा? एकादशीके दिन क्षीणकाय पुरुषोंके लिये मुनीश्वरोंने फल, मुल, दूध और जलको अनुकूल एवं भोज्य बताया है। एकादशीको किसीके लिये अत्रका भोजन किन्हीं महापुरुषोंने नहीं कहा है। जो लोग ज्वर आदि रोगोंके शिकार हैं उनके लिये तो उपवास और उत्तम बताया गया है। धार्मिक पुरुषोंके लिये एकादशीके दिन उपवास शुभ एवं सद्गति देनेवाला कहा गया है। अत: तुम भोजन करनेके लिये आप्रह न करो, इससे मेरा व्रत भङ्ग हो जायगा। इसके सिवा, तुम्हें जो भी रुचिकर प्रतीत हो, वह कार्य में अवश्य करूंगा।

मोहिनीने कहा- राजन्। आप एकादशीको भोजन करें, इसके सिवा दूसरी कोई बात मुझे अच्छी नहीं लगती। एकादशीके दिन यह उपवासका विधान वेदों में नहीं देखा जाता है। भूपते। मोहिनीकी यह बात सुनकर वेदवेत्ताओंमें श्री राजा रुकमाङ्गद मनमें तो कुपित हुए. परंतु

बाहरसे हँसते हुए-से बोले-'मोहिनी! मेरी बात सुनो! वेद अनेक रूपोंमें स्थित है। यज्ञ आदि कर्मकाण्ड वेद है, स्मृति वेद है और ये दोनों प्रकारके वेद पुराणोंमें प्रतिष्ठित हैं। अतः वरानने। मैं वेदार्थसे अधिक पुराणार्थको मान्यता देता हूँ। जो शास्त्रको बहुत कम जानता है, उससे वेद डरता है कि 'यह कहीं मुझपर ही प्रहार न कर बैठे।' सब विषयोका निर्णय इतिहास और पुराणोंने पहलेसे ही कर रखा है। वेदोंमें जो नहीं देखा गया, वह सब स्मृतिमें दृष्टिगोचर होता है। वेदों और स्मृतियों में भी जो बात नहीं देखी गयी है, उसका वर्णन पुराणोंने किया है। प्रिये! हत्या आदि पापोंका प्रायश्चित्त तथा रोगीके औषधका वर्णन भी पुराणों में मिलता है। उन प्रायश्चित्तोंके बिना पापकी शुद्धि नहीं हो सकती। सुभ्र! वेदों, वेदवे, उपाङ्गों, पुराणों तथा स्मृतियों द्वारा जो कुछ कहा जाता है, वह सब वेदमें ही बताया गया है-ऐसा मानना चाहिये। वरानने। पुराण बार-बार यह दुहराते हैं कि एकादशी प्राप्त होनेपर भोजन नहीं करना चाहिये, नहीं करना चाहिये।' पिताको कौन नहीं प्रणाम करेगा, कौन माताकी पूजा नहीं करेगा, कौन सरिताओंमें श्रेष्ठ गजाके समीप नहीं जायगा और कौन है जो एकादशीको भोजन करेगा? कौन वेदकी निन्दा करेगा, कौन ब्राह्मणको नीचे गिरायेगा, कौन पर-स्त्री-गमन करेगा और कौन एकादशीको अन्न खायेगा?

मोहिनीने कहा-पूर्णिके। तुम शीघ्र जाकर वेद-विद्याके पारङ्गत ब्राह्मणोंको यहाँ बुला लाओ, जिनके वाक्यसे प्रेरित होकर ये राजा एकादशीको भोजन करें।

उसकी बात सुनकर घूर्णिका गयी और वेद-विद्यासे सुशोभित गौतम आदि ब्राह्मणोंको बुलाकर मोहिनीके पास ले आयी। उन वेद-वेदाङ्गके पारङ्गत ब्राह्मणोंको आया देख राजासहित मोहिनीने प्रणाम किया। वह अपना काम बनानेके प्रयत्नमें लग गयी थी। महीपाल! प्रज्वलित अनिके समान तेजस्वी वे सब ब्राह्मण सोनेके सिंहासनोंपर बैठे। तदनन्तर उनमेंसे वयोवृद्ध ब्राह्मण गौतमने कहा- 'देवि! सब प्रकारके संदेहका निवारण करनेवाले तथा अनेक शास्त्रोंमें कुशल हम सब ब्राह्मण यहाँ आ गये हैं। जिसके लिये हमें बुलाया गया है वह कारण बताइये।' उनकी बात सुनकर मोहिनी बोली।

मोहिनीने कहा- ब्राह्मणो! हमारा यह संदेह तो जड़तापूर्ण है; साथ | ही छोटा भी है। इसपर अपनी बुद्धिके अनुसार आप लोग प्रकाश डालें। ये राजा कहते हैं-मैं एकादशीके दिन भोजन नहीं करूंगा, किंतु यह सम्पूर्ण चराचर जगत् अन्नके ही आधारपर टिका है। मरे हुए पितर भी अन्नद्वारा श्राद्ध करनेपर स्वर्गलोकमें तृप्ति एवं प्रसन्नताका अनुभव करते हैं। द्विजवरो | स्वर्गक देवता बेरके बराबर पुरोडाशको भी आहुति पानेकी इच्छा रखते हैं, अतः अन्न सर्वोत्तम अमृत है, भूखी हुई चींटी भी मुखसे चावल लेकर बड़े कष्टसे अपने बिलके भीतर जाती है। भला, अन्न किसको अच्छा नहीं लगता। ये महाराज एकादशी प्राप्त होनेपर खाना-पीना बिलकुल छोड़ देते हैं; किंतु व्रतका सेवन विधवाओं और यतियोंके लिये ही उचित होता है। राजाका धर्म है प्रजाकी रक्षा करना। वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-चारों पुरुषार्थोंका फल देनेवाला है। स्त्रियोंके लिये पतिसेवा, पुत्रोंके लिये माता-पिताकी सेवा, शूद्रोंके लिये द्विजोंकी सेवा तथा राजाओंके लिये सम्पूर्ण जगत्की रक्षा स्वधर्म है। जो अपने धर्मानुकूल कर्मका परित्याग करके अज्ञान अथवा प्रमादवश परधर्मके लिये कष्ट उठाता है, वह निश्चय ही पतित है। इन राजाका शरीर तो अत्यन्त क्षीण हो गया है। फिर ये एकादशीके दिन संयम-नियमका पालन कैसे करेंगे? अन्नसे ही प्राणकी पुष्टि होती है और प्राणसे शरीरमें विशेषरूपसे चेष्टाकी शक्ति आती है। चेष्टासे शत्रुका नाश होता है। जो चेष्टा या पुरुषार्थसे रहित है, उसका पराभव होता है। ऐसा जानकर मैं राजाको बराबर समझाती हूँ, परंतु ये समझ नहीं पाते।