नारद महा पुराण
चतुर्थ पाद: नारद-सनातन-संवाद, ब्रह्माजीका मरीरिको ब्रह्मपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठश्रवण एवं दानका फल बताना
देवर्षि नारद विनीतभावसे सनातनजीको प्रणाम करके बोले-ब्रह्मन् ! आप पुराणवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और ज्ञान-विज्ञानमें तत्पर हैं, अतः मुझे पुराणोंके विभागका पूर्णरूपसे परिचय कराइये, जिसके श्रवण करनेपर सब कुछ सुन लिया जाता है, जिसका ज्ञान होनेपर सब कुछ ज्ञात हो जाता है और जिसे कर लेनेपर सब कुछ किया हुआ हो जाता है। पुराणोंके स्वाध्यायसे वर्णों और आश्रमोंके आचार-धर्मका साक्षात्कार हो जाता है। प्रभो! पुराण कितने हैं? उनकी संख्या कितनी है? और उनके श्लोकोंका मान क्या है? उन पुराणोंमें कौन-कौनसे आख्यान वर्णित हैं ? यह सब मुझे बताइये। चारों वर्षों से सम्बन्ध रखनेवाली नाना प्रकारके व्रत आदिकी कथाए भी कहिये। सृष्टिक्रमसे विभिन्न वंशोंमें उत्पन्न हुए सत्पुरुषोंकी जीवनकथाको भी भलीभाँति प्रकाशित कीजिये; क्योंकि भगवन् ! आपसे अधिक दूसरा कोई पौराणिक उपाख्यानोंका जानकार नहीं है। इसलिये सब संदेहोंका निराकरण करनेवाले पुराणोंका आप मुझसे वर्णन कीजिये।
सूतजी बोले-ब्राह्मणो । तदनन्तर नारदजीका वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ सनातनजी एक क्षण भगवान् नारायणका ध्यान करके बोले।
सनातनजीने कहा- मुनिश्रेष्ठ! तुम्हें बार-बार साधुवाद है। पुराणोंका उपाख्यान जाननेके लिये जो तुम्हें निष्ठायुक्त बुद्धि प्राल हुई है, वह सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेवाली है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने पुत्रस्नेहसे परिपूर्ण चित्त होकर मरीचि आदि ऋषियोंसे इस विषयमें जो कुछ कहा था, संग्रह उसीका तुमसे वर्णन करता हूँ। एक समय अचर ब्रह्माजीके पुत्र मरीचिने, जो स्वाध्याय और शास्त्रज्ञानसे सम्पप तथा वेद वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् हैं, अपने पिता लोकसता ब्रह्माजीके पास जाकर उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। दूसरोंको भान देनेवाले मुनीश्वर । प्रणामके पथात् उन्होंने भी निर्मल पौराणिक उपाख्यानके विषयों, जैसा कि तुम पूलते हो, यही पत्र किया था।
मरीचिने कहा- भगवन्! देवदेवेश्वर। आप सम्पूर्ण लोको की उत्पत्ति और लयके कारण हैं। सर्वज्ञ, सबका कल्याण करनेवाले तथा सबके साक्षी हैं, आपको नमस्कार है। पिताजी। मुझे पुराणोके बीज, लक्षण, प्रमाण, वक्ता और श्रोता बताइये। मैं वह सब सुननेको उत्सुक हूँ।
ब्रह्माजीने कहा-वत्स! सुनो, में पुराणोंका साह बतला रहा हूँ, जिसके जान लेनेपर घर और अचरसहित सम्पूर्ण वाङ्मयका आन हो आता है और मानद। सब कल्पोंमें एक हो पुराण या, जिसका विस्तार सौ करोड़ श्लोकोंमें था। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थोंका बीज माना गया है। सब शास्त्रोंकी प्रवृत्ति पुराणसे ही हुई है, अतः समयानुसार लोकमें पुराणोंका ग्रहण न होता देख परम बुद्धिमान् भगवान् विष्णु प्रत्येक युगमें व्यासरूपसे प्रकट होते हैं। वे प्रत्येक द्वापरमें चार लाख श्लोकोंके पुराणका संग्रह करके उसके अठारह विभाग कर देते हैं और भूलोकमें उन्हींका प्रचार करते हैं। आज भी देवलोकमें सौ करोड़ श्लोकोंका विस्तृत पुराण विद्यमान है। उसीके सारभागका चार लाख श्लोकोंद्वारा वर्णन किया जाता है। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, वायुपुराण, भागवतपुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्रिपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिङ्गपुराण, वाराहपुराण, स्कन्दपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुडपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण-ये अठारह पुराण हैं। अब सूत्ररूपसे एक-एकका कथानक तथा उसके वक्ता और श्रोताके नाम संक्षेपसे बतलाता हूँ। एकाग्रचित्त होकर सुनो। वेदवेत्ता महात्मा व्यासजीने सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये पहले ब्रह्मपुराणका संकलन किया। वह सब पुराणों में प्रथम और धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष देनेवाला है। उसमें नाना प्रकारके आख्यान और इतिहास हैं। उसकी श्लोक-संख्या दस हजार बतायी जातो है। मुनीश्वर! उसमें देवताओं, असुरों और दक्ष आदि प्रजापतियोंकी उत्पत्ति कही गयो है। तदनन्तर उसमें लोकेश्वर भगवान् सूर्यके पुण्यमय वंशका वर्णन किया गया है, जो महापातकोंका नाश करनेवाला है। उसी वंशमें परमानन्दस्वरूप तथा चतुर्वृहावतारी भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके अवतारकी कथा कही गयी है। तदनन्तर उस पुराणमें चन्द्रवंशका वर्णन आया है और जगदीश्वर श्रीकृष्णके पापनाशक चरित्रका भी वर्णन किया गया है। सम्पूर्ण द्वीपों, समस्त वर्षों तथा पाताल और स्वर्गलोकका वर्णन भी उस पुराणमें देखा जाता है। नरकोंका वर्णन, सूर्यदेवकी स्तुति और कथा एवं पार्वतीजीके जन्म तथा विवाहका प्रतिपादन किया गया है। तदनन्तर दक्ष प्रजापतिकी कथा और एकाप्रकक्षेत्रका वर्णन है। नारद! इस प्रकार इस ब्रह्मपुराणके पूर्व भागका निरूपण किया गया है। इसके उत्तर भागमें तीर्थयात्रा-विधिपूर्वक पुरुषोत्तम का क्षेत्रका विस्तारके साथ वर्णन किया गया है। इसीमें श्रीकृष्णचरित्रका विस्तारपूर्वक उल्लेख हुआ है। यमलोकका वर्णन तथा पितरोंके श्राद्धकी या विधि है। इस उत्तर भागमें ही वर्णों और आश्रमकि अण, धर्मोंका विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है। गण, वैष्णव-धर्मका प्रतिपादन, युगोंका निरूपण तथा गण, प्रलयका भी वर्णन आया है। योगोंका निरूपण, गण, सांख्यसिद्धान्तोंका प्रतिपादन, ब्रह्मवादका दिग्दर्शन राण तथा पुराणकी प्रशंसा आदि विषय आये हैं। इस तथा प्रकार दो भागोंसे युक्त ब्रह्मपुराणका वर्णन किया लाता गया है, जो सब पापोंका नाशक और सब प्रकारके हात्मा सुख देनेवाला है। इसमें सूत और शौनकका संवाद पहले है। यह पुराण भोग और मोक्ष देनेवाला है। जो माणोंमें इस पुराणको लिखकर वैशाखकी पूर्णिमाको अन्न, नवाला वस्त्र और आभूषणोंद्वारा पौराणिक ब्राह्मणको पूरा तहास करके उसे सुवर्ण और जलधेनुसहित इस लिखे जाती हुए पुराणका भक्तिपूर्वक दान करता है, वह दक्ष चन्द्रमा, सूर्य और तारोंको स्थिति-कालतक बदनन्तर ब्रह्मलोक में वास करता है। ब्रह्मन् । जो ब्रह्मपुराणको वंशका इस अनुक्रमणिका (विषय-सूची) का पाठ अथवा का नाश श्रवण करता है, वह भी समस्त पुराणके पाठ और रूप तथा श्रवणका फल पा लेता है। जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके हविष्यान भोजन करते हुए नियमपूर्वक पुराणमें समूने ब्रह्मपुराणका श्रवण करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। वत्स! इस विषयमें अधिक कहने से क्या लाभ इस पुराण के कीर्तन से मनुष्य जो-जो चाहता है, वह सब पा लेता है।