नारद महा पुराण
मन्त्रशोधन, दीक्षाविधि, पञ्चदेवपूजा तथा जपपूर्वक इष्टदेव और आत्मचिन्तन विधान
सनत्कुमारजी कहते हैं-गुरुको चाहिये कि वह शिष्यको परीक्षा लेकर मन्त्रका शोधन करे। पूर्वसे पश्चिम और दक्षिणसे उत्तर (रंगमें डुबोये हुए) पाँच-पाँच सूत गिरावे (तात्पर्य यह है कि पाँच खड़ी रेखाएं खोंचकर उनके ऊपर पाँच पड़ी रेखाएं खींचे)। इस प्रकार चार-चार कोठोंके चार समुदाय बनेंगे। उनमेंसे पहले चौकेके प्रथम कोटमें एक, दूसरेके प्रथममें दो, तीसरेके प्रथममें तीन और चौथेके प्रथममें चार लिखे। (इसी क्रमसे आगेकी संख्याएँ भी लिख ले। प्रथम कोलमें अ' लिखकर उसके आग्रेय कोणमें उससे पाँचवा अक्षर लिखे। इस प्रकार सभी कोरोम क्रमशः अक्षरोंको लिखकर बुद्धिमान् पुरुष मन्चका संशोधन करे। साधकके नामका आदि अक्षर जिस कोष्ठमें हो, वहाँसे लेकर जहाँ मन्त्रका आदि अक्षर हो उस कोष्ठतक प्रदक्षिणक्रमसे गिनना चाहिये। यदि उसी चौकमें मन्त्रका आदि अक्षर हो, जिसमें नामका आदि-अक्षर है तो वह 'सिद्ध चौक' कहा जायगा। उससे प्रदक्षिणक्रमसे गिननेपर यदि द्वितीय चौकमें मन्त्रका आदि अक्षर हो तो वह 'साध्य' कहा गया है। इसी प्रकार तीसरा चौक 'मुसिद्ध' और चौथा चौक 'अरि' नामसे प्रसिद्ध है। यदि साधक के नामासम्बन्धी और मन्नसम्बन्धी आदि अक्षर प्रथम जलवे पहले ही कोरने पड़े हो तो या मल सिसिद्ध माना गया है। यदि महत्व प्रथम चीन के द्वितीय कोष्ठमें पड़ा हो तो वह सिद्धसाध्य कहा गया है। प्रथमके तृतीय कोष्ठमें हो तो सिद्धसुसिद्ध होगा और चौथे हो तो 'सिद्धारि' कहलायेगा। नामाक्षरयुक्त चौकसे दूसरे चौकमें यदि मन्त्रका अक्षर हो, तो पहले जहाँ नामका अक्षर था वहाँकै उस कोष्ठसे आरम्भ करके क्रमशः पूर्ववत् गणना करे। द्वितीय चौकके प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ कोष्ठमें मन्त्राक्षर होनेपर उसकी क्रमशः 'साध्यसिद्ध', 'साध्यसाध्य', 'साध्यसुसिध्य' तथा 'साध्य-अरि' संज्ञा होगी। तीसरे चौकमें मन्त्रका अक्षर हो तो मनीषी पुरुषोंको पूर्वोक्त रीतिसे गणना करनी चाहिये। तृतीय चौकके प्रथम आदि कोष्ठोंके अनुसार क्रमश: उस मन्त्रकी 'सुसिद्धसिद्ध', 'सुसिद्ध-साध्य', 'सुसिद्धसुसिद्ध' तथा सुसिद्ध-अरिं' संज्ञा होगी। यदि चौथे चौकमें मन्त्राक्षर हो तो भी विद्वान् पुरुष इसी प्रकार गणना करे। चतुर्थ चौकके प्रथम आदि कोष्ठोंके अनुसार उस यन्त्रको अरिसिद्ध', 'अरिसाध्य', 'अरिसुसिद्ध' तथा 'अर-अरि' यह संज्ञा होगी। सिद्धसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त विधिसे उतनी ही संख्यामें जप करनेपर सिद्ध हो जायगा। परंतु सिद्धसाध्य मन्त्र दूनी संख्या में जप करनेसे सिद्ध होगा। सिद्धसुसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त संख्यासे आधा जप करने पर ही सिद्ध हो जायगा। परंतु सिद्धार मन्त्र कुटुम्बीजनोंका नाश करता है।साध्यसिद्ध मन्त्र दूनी संख्यामें जप करनेसे सिद्ध होता है। साध्यसाध्य मन्त्र बहुत विलम्बसे सिद्ध होता है। साध्यसुसिद्ध भी द्विगुण जपसे सिद्ध होता है; किंतु साध्यारि मन्त्र बन्धु-बान्धवोंका हनन करता है। सुसिद्धसिद्ध आधे ही जपसे सिद्ध हो जाता है। सुसिद्धसाध्य द्विगुण जपसे सिद्ध होता है। सुसिद्धसिद्ध मन्त्र प्राप्त होते ही सिद्ध हो जाता है और सुसिद्धार मन्त्र सारे कुटुम्बका नाश करता है। अरिसिद्ध पुत्रनाशक है तथा अरिसाध्य कन्याका नाश करनेवाला होता है। अरिसुसिद्ध स्त्रीका नाश करता है और अरि-अरि मन्त्र साधकका. हो नाश करनेवाला माना गया है। मुने! यहाँ मन्त्रशोधनके और भी बहुत-से प्रकार हैं, किंतु यह अकथह नामक चक्र सबमें प्रधान है; इसलिये यही तुम्हें बताया गया है*।
इस प्रकार मन्त्रका भलीभाँति शोधन करके शुद्ध समय और पवित्र स्थानमें गुरु शिष्यको दीक्षा दे। अब दीक्षाका विधान बताया जाता है। प्रात:काल नित्यकर्म करके पहले गुरुचरणोंकी पादुकाको प्रणाम करे। तत्पश्चात् आदरपूर्वक वस्त्र आदिके द्वारा भक्तिभावसे सद्गुरुकी पूजा
* मूलमें बतायी हुई रीतिसे कोष्ठक बनाकर उनमें अक्षरोंको लिखनेपर प्रथम कोष्ठको 'अ क पह' अक्षर आते हैं। इन्हींके नामपर इस चक्रको 'अकयह-चक्र' कहते हैं। इसका रेखाचित्र नीचे दिया जाता है-
अकथह-चक्र
करके उनसे अभीष्ट मन्त्रके लिये प्रार्थना करे। तदनन्तर गुरु संतुष्टचित्त हो स्वस्तिवाचनपूर्वक मण्डल आदि विधान करके शिष्यके साथ पवित्र हो यज्ञमण्डपमें प्रवेश करें। फिर सामान्य अर्घ्य जलसे द्वारका अभिषेक करके अस्त्र-मन्त्रोंसे दिव्य विनोंका निवारण करे; इसके बाद आकाशमें स्थित विनोंका जलसे पूजन करके निराकरण करे। भूमिसम्बन्धी विनोंको तीन बार ताली बजाकर हटावे, तत्पश्चात् कार्य प्रारम्भ करे। भिन्न-भिन्न रंगोंद्वारा शास्त्रोक्तविधिसे सर्वतोभद्र- मण्डलकी रचना करके उसमें बह्रिमण्डल और उसकी कलाओंका पूजन करे। तत्पश्चात् अस्त्र- मन्त्रका उच्चारण करके धोये हुए यथाशक्तिनिर्मित कलशकी वहाँ विधिपूर्वक स्थापना करके सूर्यको कलाका यजन करे। विलोममातृकाके मूलका उच्चारण करते हुए शुद्ध जलसे कलशको भरे और उसके भीतर सोमकी कलाओंका विधिपूर्वक पूजन करे। धूम्रा, अर्चि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुश्री. सुरूपा, कपिला तथा हव्य-कव्यवाहा-ये अनिकी दस कलाएँ कही गयी हैं। अब सूर्यको बारह कलाएँ बतायी जाती हैं-तपिनी, तापिनी, धुम्रा, मरीचि ज्वालिनी, रुचि, सुषम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी तथा क्षमा। चन्द्रमाको कलाओंके नाम इस प्रकार जानने चाहिये-अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति ज्योत्स्रा, श्री, प्रीति, अङ्गदा, पूर्णा और पूर्णामृता- ये सोलह चन्द्रमाकी कलाएँ कही गयी हैं।
कलशको दो वस्त्रोंसे लपेट करके उसके भीतर सौषधि डाले। फिर नौ रन जोड़कर पशपल्लव डाले। कटहल, आम, बह पीपल और बकुल-इन पाँच वृक्षों के पल्लचोको यहाँ पशपल्लव माना गया है। मोती, माणिक्य वैदूर्य, गोमेद, बा, बिड्सम (भंगा), पचराय, मरकर तथा नीलमणि-नोरलोको क्रमशः कलशमे छोड़कर उसमें इष्ट देवताका आवाहन करे और मन्त्रवेत्ता आचार्य विधिपूर्वक देवपूजाका कार्य सम्पन्न करके वस्त्राभूषणोंसे विभूषित शिष्यको वेदीपर बिठावे और प्रोक्षणीके जलसे उसका अभिषेक करे। फिर उसके शरीरमें विधिपूर्वक भूतशुद्धि आदि करके न्यासोंके द्वारा शरीरशुद्धि करे और मस्तकमें पल्लव मन्त्रोंका न्यास करके एक सौ आठ मूलमन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे प्रिय शिष्यका अभिषेक करे। उस समय मन-ही-मन मूलमन्त्रका जप करते रहना चाहिये। अवशिष्ट जलसे आचमन करके शिष्य दूसरा वस्त्र धारण करे और गुरुको विधिपूर्वक प्रणाम करके पवित्र हो उनके सामने बैठे। तदनन्तर गुरु शिष्यके मस्तकपर हाथ देकर जिस मन्त्रकी दीक्षा देनी हो, उसका विधिपूर्वक एक सौ आठ बार जप करे। 'समः अस्तु' (शिष्य मेरे समान हो) इस भावसे शिष्यको अक्षर दान करे। तब शिष्य गुरुकी पूजा करे। इसके बाद गुरु शिष्यके मस्तकपर चन्दनयुक्त हाथ रखकर एकाग्रचित्त हो, उसके कानमें आठ बार मन्त्र को। इस प्रकार मन्त्रका उपदेश पाकर शिष्य भी गुरुके चरणों में गिर जाय। उस समय गुरु इस प्रकार कहे, 'बेटा! उठो। तुम बन्धनमुक्त हो गये। विधिपूर्वक सदाचारी बनो। तुम्हें सदा कीर्ति, श्री, कान्ति, पुत्र, आयु, बल और आरोग्य प्रास हो।' तब शिष्य उठकर गन्ध आदिके द्वारा गुरुकी पूजा करे और उनके लिये दक्षिणा दे। इस प्रकार गुरुान पाकर शिष्य उसी समयसे गुरुसेवा में लग जाय। बीच में अपने इष्टदेवका पूजन करे और उन्हें पुण्यामल देकर अनि, निति और वागीशका कमश पूजन करे। जब माया भगवान विष्णका पूजा करे तो उनके चारों ओर क्रमश गणेश, सूर्य, देखो तथा शिव की पूजा करे और जब मस्या भगवान् शङ्करकी पना को सात दिशाओम अमरा सूर्य, गणेश देवी तथा विष्णुका पूजन करे। जब मध्यमें देवीकी पूजा करे तो उनके चारों ओर शिव, गणेश, सूर्य और विष्णुकी पूजा करे। जब मध्यमें गणेशकी पूजा करे तो उनके चारों ओर क्रमश: शिव, देवी, सूर्य और विष्णुकी पूजा करे और जब मध्यभागमें सूर्यकी पूजा करे तो पूर्वादि दिशाओं में क्रमश: गणेश, विष्णु, देवी और शिवकी पूजा करे। इस प्रकार प्रतिदिन आदरपूर्वक पञ्चदेवोंका पूजन करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर लघुशंका आदि आवश्यक कार्य कर ले और यदि लघुशंका आदि न लगी हो तो शय्यापर बैठे-बैठे ही अपने गुरुदेवको नमस्कार करे- तदनन्तर पादुकामन्त्रका दस बार जप और समर्पण करके गुरुदेवको पुनः प्रणाम और उनका स्तवन करे।
फिर मूलाधारसे ब्रह्मरन्ध्रतक मूलविद्याका चिन्तन करे। मूलाधारसे निम्रभागमें गोलाकार वायुमण्डल है, उसमें वायुका बीज 'या' कार स्थित है। उस बीजसे वायु प्रवाहित हो रही है। उससे ऊपर अग्निका त्रिकोणमण्डल है। उसमें जो अनिका बीज 'र' कार है, उससे आग प्रकट हो रही है। उक्त वायु तथा अग्निके साथ मूलाधारमें स्थित शरीरवाली कुलकुण्डलिनीका ध्यान करे, जो सोये हुए सर्पके समान आकारवालो है। वह स्वयं भूलिङ्गको आवेष्टित करके सो रही है। देखने में वह कमलकी नालके समान जान पड़ती है। वह अत्यन्त पतली है और उसके अङ्गोंसे करोड़ों विद्युतोंकी-सी प्रभा छिटक रही है। इस प्रकार कुलकुण्डलिनीका ध्यान करके भावनात्मक कृर्च (कूँची)-के द्वारा उसे जगाकर उठाये और सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे क्रमशः छ चक्रोंका भेदन करनेवाली उस कुण्डलिनीको गुरुको बतायी हुई विधिके अनुसार विद्वान् पुरुष ब्रहारन्ध्रतक जाय और वहाँक अमृतमें निमग्न करके आत्माका चिन्तन करे। मानो आत्मा उसके प्रभापुञ्जसे व्याप्त है। वह निर्मल, चिन्मय तथा देह आदिसे परे है। फिर उस कुण्डलिनीको अपने स्थानपर पहुँचाकर हृदयमें इष्टदेवका चिन्तन करे और मानसिक उपचारोंसे उनका पूजन करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे प्रार्थना करे-
त्रैलोक्यचैतन्यमयादिदेव
श्रीनाथ विष्णो भवदाजयैव।
प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थ
संसारयात्रामनुवर्तयिष्ये II
'आदिदेव! लक्ष्मीकान्त ! विष्णो! त्रिलोकीका चैतन्य आपका स्वरूप है। आपकी आज्ञासे ही प्रात:काल उठकर आपका प्रिय कार्य करनेके लिये मैं संसारयात्राका अनुसरण करूँगा।' ब्रह्मन्! यदि इष्टदेव कोई दूसरा देवता हो तो पूर्वोक्त मन्त्रमें 'विष्णो' आदिके स्थानमें ऊहाद्वारा उसके वाचक शब्द या नामका प्रयोग कर लेना चाहिये। तत्पश्चात् सम्पूर्ण सिद्धिके लिये अजपा जप निवेदन करे। दिन-रातमें जीव 'इक्कीस हजार छ: सौ बार सदा अजपा नामक गायत्रीका जप करता है। इस अजपा मन्त्रके ऋषि हंस हैं, अव्यक्त गायत्री छन्द कहा गया है। परमहंस देवता हैं। आदि (हं) बीज और अन्त (सः) शक्ति है, तत्पश्चात् षडङ्गन्यास करे। सूर्य, सोम, निरञ्जन, निराभास, धर्म और ज्ञान-ये छः अज हैं। क्रमशः इनके पूर्वमें 'हंस' और अन्तमें 'आत्मने' पद जोड़कर श्रेष्ठ साधक इनका छ: अजोंमें न्यास करे*। हकार सूर्यक समान तेजस्वी होकर शरीरसे बाहर निकलता है और सकार वैसे ही तेजस्वी रूपसे प्रवेश करता है। इस प्रकार हकार और सकारका ध्यान करके बुद्धिमान पुरुष वह्रि और अर्कमण्डलमें
*हंसः सूर्यात्मने ह्रदयाय नमः।
हंस सोमात्मने शिरसे स्वाहा। हंसो निरञ्जनात्मने शिखायै वषट्। हंसो निराभासात्मने कवचाय हुम्।
हंसो धर्मात्मने नेत्राभ्यां वौषट्। हंसो ज्ञानात्मने अस्त्राय फट्।
विभागपूर्वक जप अर्पण करे।
मूलाधारचक्रमें चार दलका कमल है, जो बन्धूकपुष्पके समान लाल है। उसके चारों दलोंमें क्रमश: 'व श ष स'-ये अक्षर अङ्कित हैं। उसमें अपनी शक्तिके साथ गणेशजी विराजमान हैं। वे अपने चारों हाथों में क्रमशः पाश, अंकुश, सुधापात्र तथा मोदक लेकर उल्लसित हैं। ऐसे वाक्पति गणेशजीको छ: सौ जप अर्पण करे। स्वाधिष्ठान-चक्रमें छ: दलोंका कमल है। वह चक्र मूंगेके समान रंगका है। उसके छ: दलोंमें क्रमश: 'ब भ म य र ल' ये अक्षर अङ्कित हैं। उसमें कमलजन्मा ब्रह्माजी हंसारूढ़ होकर विराजमान हैं। उनके वामाङ्ग-भागमें उनकी ब्राह्मीशक्ति सुशोभित हैं। वे विद्याके अधिपति हैं। उवा और अक्षमाला उनके हाथोंकी शोभा बढ़ाती हैं। ऐसे ब्रह्माजीको छ: हजार जप निवेदन करे। मणिपूर चक्रमें दशदल कमल विद्यमान है। उसके प्रत्येक दलपर क्रमश: 'ड ढ ण त थ द ध न प फ' ये अक्षर अङ्कित हैं। उसकी प्रभा विद्युद्विलसित मेधके समान है। उसमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्य धारण करनेवाले भगवान् विष्णु लक्ष्मीसहित विराजमान हैं। उन्हें छः हजार जप उम्र्पण करे। अनाहत चक्रमें द्वादशदल कमल विद्यमान है। इसके प्रत्येक दलपर क्रमश: 'क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ' ये अक्षर अङ्कित हैं। उसका वर्ण शुक्ल है। उसमें शूल, अभय, बर और अमृतकलश धारण करनेवाले वृषभारूद भगवान् रुद्र विराज रहे हैं। उनके वामाङ्ग-भागमें उनकी शक्ति पार्वतीदेवी विद्यमान हैं। वे विद्याके अधिपति हैं। विद्वान् पुरुष उन रुद्रदेवको छ: हजार जप निवेदन करे। विशुद्ध चक्र षोडशदल कमलसे युक्त है। उसके प्रत्येक दलपर क्रमशः स्वरवर्ण (अ आ इ ई उ ऊ ऋऋ ल ल ए ऐ ओ औ अं अः) अङ्कित हैं। वह चक्र शुक्ल वर्णका है। उसमें महाज्योतिसे प्रकाशित होनेवाले इन्द्रियाधिपति ईश्वर विराजमान हैं, जो प्राणशक्तिसे युक्त हैं। उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। आज्ञाचक्रामें दो दलोंवाला कमल है, उसके दलोंमें क्रमश: 'ह' और 'क्ष' अङ्कित हैं; उसमें पराशक्तिसे युक्त जगद्गुरु सदाशिव विराजमान हैं, उन्हें एक सहरू जप अर्पण करे। सहस्रार- चक्रमें सहस्र दलोंसे युक्त महाकमल विद्यमान है, उसमें नाद-बिन्दुसहित समस्त मातृकावर्ण विराजमान हैं। उसमें स्थित वर और अभययुक्त हाथोंवाले परम आदिगुरुको एक सहस्र जप निवेदन करे। फिर चुल्लूमें जल लेकर इस प्रकार कहे- 'स्वभावतः होते रहनेवाले इक्कीस हजार छ: सौ अजपा जपका पूर्वोक्तरूपसे विभागपूर्वक संकल्प करनेके कारण मोक्षदाता भगवान् विष्णु मुझपर प्रस्त्र हों।' इस अजपा गायत्रीके संकल्पमात्रसे मनुष्य बड़े बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। मैं ब्रह्म ही हूँ, संसारी जीव नहीं हूँ। नित्यमुक्त हूँ, शोक मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। म सच्चिदानन्द- स्वरूप हूँ।' इस प्रकार, अपने आपके विषयमें चिन्तन करे। तदनन्तर दैहिक कृत्य और देवार्चन करे। उसका विधान और सदाचारका लक्षण मैं बताऊँगा। (पूर्व० ६५ अध्याय)