नारद महा पुराण
इन्द्र और सुधर्मका संवाद, विभिन्न मन्वन्तरों के इन्द्र और देवताओंका वर्णन तथा भगवत्-भजनका माहात्म्य
श्रीसनकजी कहते हैं-मुने। इसके बाद में भगवान् विष्णुकी विभूतिस्वरूप मनु और इन्द्र आदिका वर्णन करूँगा। इस वैष्णवी विभूतिका श्रवण अथवा कीर्तन करनेवाले पुरुषोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है।
एक समय वैवस्वत मन्वन्तरके भीतर ही गुरु बृहस्पति और देवताओंसहित इन्द्र सुधर्मक निवास-स्थानपर गये। देवर्षे ! बृहस्पतिजीके साथ देवराजको आया देख सुधर्मने आदरपूर्वक उनकी यथायोग्य पूजा की। सुधर्मसे पूजित हो इन्द्रने विनयपूर्वक कहा।
इन्द्र बोले-विद्वन्। यदि आप बीते हुए ब्रहाकल्पका वृत्तान्त जानते हैं तो बताइये। मैं यही पूछनेके लिये गुरुजीके साथ आया हूँ। देवराज इनके ऐसा कहनेपर सुधर्म हस पड़ा और उसने विनयपूर्वक पूर्वकल्पकी सब बातोंका विधिवत् वर्णन किया।
सुधर्मने कहा-इन्द्र! एक सहस्र चतुर्युगीका ब्रह्माजीका एक दिन होता है और उनके एक दिनमें चौदह मनु, चौदह इन्द्र तथा पृथक् पृथक् अनेक प्रकारके देवता हुआ करते हैं। वासव! सभी इन्द्र और मनु आदि तेज, लक्ष्मी, प्रभाव और बलमें समान ही होते हैं। मैं उन सबके नाम बतलाता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। सबसे पहले स्वायम्भुव मनु हुए। तदनन्तर क्रमश: स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, सातवें वैवस्वत मनु, आठवें सूर्यसावर्णि और नवें दक्षसावर्णि हैं। दसवें मनुका नाम ब्रह्मसावर्णि और ग्यारहवेंका धर्मसावर्णि है। तदनन्तर बारहवें रुद्रसावर्णि तथा तेरहवें रोचमान हुए। चौदहवें मनुका नाम भौत्य बताया गया है। ये चौदह मनु हैं।
देवराज! अब मैं देवताओं और इन्द्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। स्वयम्भू मन्वन्तरमें देवतालोग यामके नामसे विख्यात थे। उनके परम बुद्धिमान् इन्द्रकी शचीपति नाम से प्रसिद्धि थी। स्वारोचिष मन्वन्तरमें पारावत और तृषित नाम के देवता थे। उनके स्वामी इन्द्रका नाम विपश्चित था। वे सब प्रकारकी सम्पदाओंसे समृद्ध थे। तीसरे उत्तम नामक मन्वतरमें सुधामा, सत्य, शिव तथा प्रतर्दन नामवाले देवता थे। उनके इन्द्र सुशान्ति नाम से प्रसिद्ध थे। चौथे तामस मन्वन्तरमें सुपार, हरि, सत्य और सुधी-ये देवता हुए*। शक्र! उन देवताओं के इन्द्रका नाम उस समय शिबि था। पाँचवें(रैवत) मन्वन्तर में अमिताभ आदि देवता
*विष्णुपुराणमें भी तामस मन्वन्तरके ये ही देवता बताये गये हैं। वहाँका मूल पाठ इस प्रकार है-
तामसस्यान्तरे देवाः सुपारा: हरयस्तथा।
सत्याच सुधियश्चैव सप्तविंशतिका गुणाः ।।
शिबिरिन्द्रस्तथा चासीत् ।
(३।१।१६-१७)
थे और पाँचवे देवराजका नाम विभु कहा गया है। छठे (चाक्षुष) मन्वन्तरमें आर्य आदि देवता बताये गये हैं। उन सबके इन्द्रका नाम मनोजव था। इस सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें आदित्य, वसु तथा रुद्र आदि देवता हैं और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न आप ही इन्द्र हैं। आपका विशेष नाम पुरन्दर बताया गया है। आठवें सूर्यसावर्णि मन्वन्तरमें अप्रमेय तथा सुतप आदि होनेवाले देवता बताये जाते हैं। भगवान् विष्णुकी आराधनाके प्रभावसे राजा बलि उनके इन्द्र होंगे। नवें दक्षसावणि मन्वन्तरमें पार आदि देवता होंगे और उनके इन्द्रका नाम अद्भुत बताया जाता है। दसवें ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तरमें सुवासन आदि देवता कहे गये हैं। उनके इन्द्रका नाम शान्ति होगा। ग्यारहवें धर्मसावर्णि मन्वन्तरमें विहङ्गम आदि देवता होंगे और उनके इन्द्र वृष नामसे प्रसिद्ध होंगे। बारहवें रुद्रसावर्णि मन्वन्तरमें हरित आदि देवता तथा ऋतुधामा नामवाल इन्द्र होंगे। तेरहवें रोचमान या रौच्य नामक मन्वन्तरमें सुत्रामा आदि देवता होंगे। उनके महापराक्रमी इन्द्रका नाम दिवस्पति कहा जाता है। चौदहवें भौत्य मन्वन्तरमें चाक्षुष आदि देवता होंगे और उनके इन्द्रकी शुचि नामसे प्रसिद्धि होगी। देवराज ! इस प्रकार मैंने भूत और भविष्य मनु, इन्द्र तथा देवताओंका यथार्थ वर्णन किया है। ये सब ब्रह्माजीके एक दिनमें अपने अधिकारका उपभोग करते हैं। सम्पूर्ण लोकों तथा सभी स्वगौमें एक ही तरहको सृष्टि कही गयी है। उस सृष्टिके विधाता बहुत हैं। उनको संख्या यहाँ कौन जानता है? देवराज। मेरे ब्रहालोकमें रहते समय बहुत से ब्रह्मा आये और चले गये। आज में उनकी संख्या बताने में असमर्थ हूँ।इस स्वर्गलोकरें आकर भी मेरा कितना समय बीता है, उसको सुनो-'अबतक चार मनु बीर गये, किंतु मेरी समृमिका विस्तार महतो गया। प्रभो! अभी मुझे सौ करोड़ युगोतक ही रहना है। तत्पश्चात् में कर्मभूमिको जाऊँगा।'
महात्मा सुधर्मक ऐसा कहनेपर देवराय मन-ही-मन बड़े प्रसन हुए और निरन्तर भगवान् विष्णुकी आराधनामें लग गये। यद्यपि देवतालोग स्वर्गका सुख भोगते हैं तथापि ये सब एम भारतवर्ष में जन्म पानेके लिये लालायित करे हैं। जो भगवान् नारायणकी पूजा करते हैं, महात्माओंकी पूजा सया ब्रह्मा आदि देनत संग्रह परिग्रहका त्याग करके निरन्तर भगवान् नारायणके चिन्तनमें लगे रहते हैं, उन्हें पर संसारका बन्धन कैसे पास हो सकता है? यदि कोई उन महापुरुषों के साल का लोध रखते हैं तो भी मोक्षके भागी हो जाते हैं। जो मानन प्रतिदिन सब प्रकारको आमलियौका त्याग करके गरुत्वाहन भगवान् नारायणको अर्चना करते हैं, वे सम्पूर्ण पापराशियोंसे सर्वथा सुरु होकर हर्षपूर्ण हृदयसे भगवान् विष्णुके कल्याणमय पदको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य आसक्तिरहित तथा पर-अवर (उत्तम मध्यम, शुभ अशुभ)-के ज्ञाता हैं और निरन्तर देवगुरु भगवान् नारायणका चिन्तन करते रहते हैं, उस ध्यानसे उनके अन्त:करणकी सारी पापराशि नष्ट हो जाती है और वे फिर कभी माताके स्तनोंका दूध नहीं पीते। जो मानव भगवान्की कथा श्रवण करके अपने समस्त दोष-दुर्गुण दूर कर चुके हैं और जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी
मार्कण्डेयमपुराणमें तामस मन्वन्तरके देवता सत्य, सुधी, हरि तथा सुरूप बताये गये हैं और इन्द्रका नाम 'शिखी' कहा गया है।
आराधनामें अनुरक्त है, वे अपने शरीरके मन अथवा सम्भाषणसे भी संसारको पवित्र करते हैं, अतः सदा श्रीहरिकी ही पूजा करनी चाहिये। ब्रह्मन्! जैसे नीची भूमिमें इधर-उधरका सारा जल (सिमट-सिमटकर) एकत्र हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ भगवत्पूजापरायण शुद्धचित्त महापुरुष रहते हैं, वहीं सम्पूर्ण कल्याणका वास होता है*। भगवान् विष्णु ही सबसे श्रेष्ठ बन्धु है। वे ही सर्वोत्तम गति हैं। अत: उन्हींकी निरन्तर पूजा करनी चाहिये, क्योंकि वे ही सबकी चेतनाके कारण हैं। मुनिश्रेष्ठ ! तुम स्वर्ग और मोक्षफलके दाता सदानन्दस्वरूप निरामय भगवान् श्रीहरिकी पूजा करो। इससे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी।