बारह महीनोंकी पूर्णिमा तथा अमावास्यासे सम्बन्ध रखनेवाले व्रतों तथा सत्कर्माकी विधि और महिमा

सनातनजी कहते हैं- नारद ! सुनो, अब मैं तुमसे पूर्णिमाके व्रतोंका वर्णन करता हूँ, जिनका पालन करके स्त्री और पुरुष सुख और संतति वास्यासे सम्बन्ध रखनेवाले व्रतों तथा प्राप्त करते हैं। विप्रवर! चैत्रकी पूर्णिमा मन्वादि तिथि कही गयी है। उसमें चन्द्रमाकी प्रसन्नताके लिये कच्चे अन्नसहित जलसे भरा हुआ घट दान करना चाहिये। वैशाखकी पूर्णिमाको ब्राह्मणको जो-जो द्रष्य दिया जाता है, वह सब दाताको निश्चितरूपसे प्राप्त होता है। उस दिन 'धर्मराजव्रत' कहा गया है। वैशाखकी पूर्णिमाको श्रेष्ठ ब्राह्मणके लिये जलसे भरा हुआ घट और पकवान दान करना चाहिये। वह गोदानका फल देनेवाला होता है और उससे धर्मराज संतुष्ट होते हैं। जो स्वच्छ जलसे भरे हुए कलशोंका श्रेष्ठ ब्राह्मणको सुवर्णके साथ दान करता है, वह कभी शोकमें नहीं पड़ता। ज्येष्ठकी पूर्णिमाको 'वट सावित्री'का व्रत होता है। उस दिन स्त्री उपवास करके अमृतके समान मधुर जलसे वटवृक्षको सींचे और सूतसे उस वृक्षको एक सौ आठ बार प्रदक्षिणापूर्वक लपेटे। तदनन्तर परम पतिव्रता सावित्रीदेवीसे इस प्रकार प्रार्थना करे-

जगत्पूज्ये जगन्मातः सावित्रि पतिदैवते।

पत्या महावियोग मे बटस्थे कुरु ते नमः ।।

(ना० पूर्व- १२४॥ ११)

'जगन्माता सावित्री। तुम सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय तथा पतिको ही इष्टदेव माननेवाली पवित्रता हो। वटवृक्षपर निवास करनेवाली देवि! तुम ऐसी कृपा करो, जिससे मेरा अपने पतिके साथ नित्यसंयोग बना रहे। कभी वियोग न हो। तुम्हें मेरा सादर नमस्कार है।'

जो नारी इस प्रकार प्रार्थना करके दूसरे दिन सुवासिनी स्त्रियोंको भोजन करानेके पश्चात् स्वयं भोजन करती है, वह सदा सौभाग्यवती बनी रहती है। आषाढ़की पूर्णिमाको 'गोपद्मवत'का विधान है। उस दिन स्नान करके भगवान् श्रीहरिके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करे- भगवान् के चार भुजाएँ हैं। उनका शरीर विशाल है। उनकी अङ्गकान्ति जाम्बूनद सुवर्णके समान - श्याम है। शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, लक्ष्मी तथा गरुड़ उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं तथा देवता, मुनि, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर उनकी सेवामें लगे हैं। इस प्रकार श्रीहरिका चिन्तन करके गन्ध आदि उपचारोंद्वारा पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे उनकी पूजा करे। तत्पश्चात् वस्त्र और आभूषण आदिके द्वारा आचार्यको संतुष्ट करे और रोहयुक्त हृदयसे आचार्य तथा अन्यान्य ब्राह्मणोंको यथाशक्ति मीठे पकवान भोजन करावे। विप्रवर! इस प्रकार व्रत करके मनुष्य कमलापतिके प्रसादसे इहलोक और परलोकके भोगोंको प्राप्त कर लेता है।

श्रावण मासकी पूर्णिमाको 'वेदोंका उपाकर्म' बताया गया है। उस दिन यजुर्वेदी द्विजोंको देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। अपनी शाखामें बतायी हुई विधिके अनुसार ऋषियोंका पूजन भी करना चाहिये। ऋग्वेदियोंको चतुर्दशीके दिन तथा सामवेदियोंको भाद्रपद मासके हस्त नक्षत्र में विधिपूर्वक 'रक्षा विधान' करना चाहिये। लाल कपड़ेके एक भागमें सरसों तथा अक्षत रखकर उसे लाल रंगके डोरेसे बाँध दे, इस प्रकार बनी हुई पोटली ही रक्षा है, उसे जलसे साँचकर कौसके पात्र में रखे। उसीमें गन्ध आदि उपचारों द्वारा श्रीविष्णु आदि देवताओंकी पूजा करके उनकी प्रार्थना करे। फिर ब्राह्मणको नमस्कार करके उसीके साथसे प्रसन्नतापूर्वक अपनी कलाईमें उस रक्षापोटलिकाको बंधा ले। तदनन्तर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे वेदोंका स्वाध्याय करे तथा सप्तर्षियोंका विसर्जन करके अपने हाथसे बनाकर कुंकुम आदिसे रंगे हुए नूतन यज्ञोपवीतको धारण करे। यथाशक्ति श्रेष्ठ ब्राह्मोको भोजन कराकर स्वयं एक समय भोजन करे। विप्रवर! इस व्रतके कर लेनेपर वर्षभर वैदिक कर्म यदि भूल गया हो, विधिसे हीन हुआ हो या नहीं किया गया हो तो वह सब भलीभाँति सम्पादित हो जाता है। भाद्रपद मासकी पूर्णिमाको 'उमामाहेश्वरखत' किया जाता है। उसके लिये एक दिन पहले एक समय भोजन करके रहे और शिव पार्वतीका यत्नपूर्वक पूजन करके हाथ जोड़ प्रार्थना करे-'प्रभो! मैं कल व्रत करूँगा।' इस प्रकार भगवान्से निवेदन करके उस उत्तम व्रतको ग्रहण करे। रातमें देवताके समीप शयन करके रातके पिछले पहरमें उठे। फिर संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म करके भस्म तथा रुद्राक्षकी माला धारण करे। तत्पश्चात् उत्तम गन्ध, बिल्वपत्र, धूप, दीप और नैवेद्य आदि विभिन्न उपचारोंद्वारा विधिपूर्वक भगवान् शङ्करकी पूजा करे। उसके बाद सबेरेसे लेकर प्रदोषकालतक विद्वान् पुरुष उपवास करे। चन्द्रोदय होनेपर पुन: पूजा करके वहीं देवताके समीप रातमें जागरण करे।

इस प्रकार प्रतिवर्ष आलस्य छोड़कर पंद्रह वर्षातक इस व्रतका निर्वाह करे। उसके बाद विधिपूर्वक व्रतका उद्यापन करना चाहिये। उस समय भगवती उमा और भगवान् शङ्करकी सुवर्णमयी दो प्रतिमाएँ बनवावे। यथाशक्ति सोने, चाँदी, ताँबे अथवा गिट्टीके पंद्रह उत्तम कलश स्थापित करे। वहाँ एक कलशके ऊपर वस्त्रसहित दोनों प्रतिमाओंकी स्थापना करनी चाहिये। उन प्रतिमाओंको पञ्चामृतसे स्नान कराकर फिर शुद्ध जलसे नहलाना चाहिये। तदनन्तर षोडशोपचारसे उनकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद पंद्रह ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा तथा एक-एक कलश दे। भगवान् शङ्करकी मूर्तिसे युक्त कलश आचार्यको अर्पण करे। इस प्रकार 'उमामाहेश्वरव्रत का पालन करके मनुष्य इस पृथ्वीपर विख्यात होता है। वह समस्त सम्पत्तियोंकी निधि बन जाता है। उसी दिन 'शक्रव्रत'का भी विधान किया गया है। उसमें प्रातःकाल स्नान करके विधिपूर्वक गन्ध आदि उपचारों तथा नैवेद्य-राशियोंसे देवराज इन्द्रकी पूजा करे। फिर निमन्त्रित ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराकर वहाँ आये हुए दूसरे लोगोंको तथा दोनों और अनाथोंको भी उसी प्रकार भोजन करावे। विप्रवर! धन-धान्यकी सिद्धि चाहनेवाले राजाको अथवा दूसरे धनी लोगोंको प्रतिवर्ष यह 'शक्रव्रत' करना चाहिये। आश्विन मासकी पूर्णिमाको 'कोजागरव्रत' कहा गया है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके उपवास करे और जितेन्द्रिय भावसे रहे। ताँबे अथवा मिट्टीके कलशपर वस्त्रसे ढकी हुई सुवर्णमयी लक्ष्मीप्रतिमाको स्थापित करके भिन्न- भिन्न उपचारोंसे उनकी पूजा करे। तदनन्तर सायंकालमें चन्द्रोदय होनेपर सोने, चाँदी अथवा मिट्टीके घृतपूर्ण एक सौ दीपक जलावे। इसके बाद घी और शक्कर मिलायी हुई बहुत-सी खीर तैयार करे और बहुत से पात्रोंमें उसे ढालकर चन्द्रमाकी चाँदनीमें रखे। जब एक पहर बीत जाय तो लक्ष्मीजीको वह सब अर्पण करे। तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको वह खीर भोजन करावे और उनके साथ ही माङ्गलिक गीत तथा मङ्गलमय कार्यों द्वारा जागरण करे। तदनन्तर अरुणोदय-कालमें खान करके लक्ष्मीजीकी वह स्वर्णमयी मूर्ति आचार्यको अर्पित करे। उस रातमें देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलोंमें वर और अभय लिये निशीथ कालमें संसारमें विचरती हैं और मन-ही-मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतलपर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजामें लगे हुए उस मनुष्यको मैं आज धन दूंगी।' प्रतिवर्ष किया जानेवाला यह व्रत लक्ष्मीजीको संतुष्ट करनेवाला है। इससे प्रसन्न हुई लक्ष्मी इस लोकमें समृद्धि देती हैं और शरीरका अन्त होनेपर परलोकमें सद्गति प्रदान करती हैं। कार्तिककी पूर्णिमाको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति और सम्पूर्ण शत्रुओंपर विजय पानेके लिये कार्तिकेयजीका दर्शन करे। उसी तिथिको प्रदोषकालमें दीपदानके द्वारा सम्पूर्ण जीवोंके लिये सुखदायक 'त्रिपुरोत्सव' करना चाहिये। उस दिन दीपका दर्शन करके कीट पतंग, मच्छर, वृक्ष तथा जल और स्थलमें विचरनेवाले दूसरे जीव भी पुनर्जन्म नहीं ग्रहण करते; उन्हें अवश्य मोक्ष होता है। ब्रह्मन् ! उस दिन चन्द्रोदयके समय छहों कृत्तिकाओंकी, खड्गधारी कार्तिकेयकी तथा वरुण और अग्निको गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, प्रचुर नैवेद्य, उत्तम अत्र, फल तथा शाक आदिके द्वारा एवं होम और ब्राह्मणभोजनके द्वारा पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार देवताओंकी पूजा करके घरसे बाहर दीप-दान करना चाहिये। दीपकोंके पास हो एक सुन्दर चौकोर गड्डा खोदे। उसकी लंबाई-चौड़ाई और गहराई चौदह अंगुलको रखे। फिर उसे चन्दन और जलसे सौंचे। तदनन्तर उस गड्ढेको गायके दूधसे भरकर उसमें सर्वाङ्गसुन्दर सुवर्णमय मत्स्य डाले। उस मत्स्यके नेत्र मोतीके बने होने चाहिये। फिर 'महामत्स्याय नमः' इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए गन्ध आदिसे उसकी पूजा करके ब्राह्मणको उसका दान कर दे। द्विजश्रेष्ठ ! यह मैंने तुमसे क्षीरसागर-दानकी विधि बतायी है। इस दानके प्रभावसे मनुष्य भगवान् विष्णुके समीप आनन्द भोगता है। नारद। इस पूर्णिमाको 'वृषोसर्गप्रत' तथा 'नक्तवत' करके मनुष्य रुद्रलोक प्राप्त कर लेता है।

मार्गशीर्ष मासकी पूर्णिमाके दिन शान्त स्वभाववाले ब्राह्मणको सुवर्णसहित एक आढक' नमक दान करे। इससे सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि होती है। मनुष्य पूर्णिमाको पुष्यका योग होनेपर सम्पूर्ण सौभाग्यकी वृद्धिके लिये पीली सरसोंके उबटनसे अपने शरीरको मलकर सौषधियुक्त जलसे स्नान करे। स्नानके पश्चात् दो नूतन वस्त्र धारण करे। फिर माङ्गलिक द्रव्यका दर्शन और स्पर्श कर विष्णु, इन्द्र, चन्द्रमा, पुष्य और बृहस्पतिको नमस्कार करके गन्ध आदि उपचारोंद्वारा उनकी पूजा करे। तदनन्तर होम करके ब्राह्मणोंको खीरके भोजनसे तृप्त करे विप्रवर! लक्ष्मीजीकी प्रीति बढ़ानेवाले और दरिद्रताका नाश करनेवाले इस व्रतको करके मनुष्य इहलोक और परलोकमें आनन्द भोगता है। माघकी पूर्णिमाके दिन तिल, सूती कपड़े, कम्बल, रत्न, कंचुक, पगड़ी, जूते आदिका अपने वैभवके अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें सुखी होता है। जो उस दिन भगवान् शङ्करकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाकर भगवान् विष्णुके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फाल्गुनकी पूर्णिमाको सब प्रकारके काष्ठों और उपलों (कंडों) का संग्रह करना चाहिये। वहाँ रक्षोन-मन्त्रोंद्वारा अग्रिमें विधिपूर्वक होम करके होलिकापर, काठ आदि फेंककर उसमें आग लगा दे। इस प्रकार दाह करके होलिकाकी परिक्रमा करते हुए उत्सव मनावे ।

यह होलिका प्रहादको भय देनेवाली राक्षसी है।इसीलिये गीत-मजलपूर्वक काष्ठ आदिके द्वारा लोग उसका दाह करते हैं। विप्रेन्द्र मतान्तरमें यह 'कामदेवका दाह' है।

पक्षान्त-तिथियाँ दो होती हैं-पूर्णिमा तथा अमावास्या। दोनोंके देवता पृथक्-पृथक् हैं। अतः अमावास्याका व्रत पृथक् बतलाया जाता है। नारद! इसे सुनो। यह पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। चैत्र और वैशाखकी अमावास्याको पितरोंकी पूजा, पार्वणविधिसे धन-वैभवके अनुसार श्राद्ध, ब्राह्मणभोजन, विशेषतः गौ आदिका दान-ये सब कार्य सभी महीनोंकी अमावास्याको अत्यन्त पुण्यदायक बताये गये हैं। नारद! ज्येष्ठकी अमावास्याको ब्रह्मसावित्रीका व्रत बताया गया है। इसमें भी ज्येष्ठकी पूर्णिमाके समान ही सब विधि कही गयी है। आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद मासमें पितृश्राद्ध, दान, होम और देवपूजा आदि कार्य अक्षय होते हैं। भाद्रपदको अमावास्याको अपराह्नमें तिलके खेतमें पैदा हुए कुशोंको ब्रह्माजीके मन्त्रसे आमन्त्रित करके 'हुं फट्'* का उच्चारण करते हुए उखाड़ ले और उन्हें सदा सब कार्यों में नियुक्त करे और दूसरे कुशोंको एक ही समय काममें लाना चाहिये। आश्विनकी अमावास्याको विशेषरूपसे गङ्गाजीके जलमें या गयाजीमें पितरोंका श्राद्ध-तर्पण करना चाहिये; वह मोक्ष देनेवाला है। कार्तिककी अमावास्याको देवमन्दिर, घर, नदी, बगीचा, पोखरा, चैल्य वृक्ष, गोशाला तथा बाजारमें दीपदान और श्रीलक्ष्मीजीका पूजन करना चाहिये।

*निमन्त्रणसम्बन्धी ब्रह्माजीका मन्त्र इस प्रकार है-

विरहिना सहोत्पत्रा परमेडिनिसर्गज। गुद सर्वाणि पापानि दर्थ स्वस्तिको भव। 'दर्भ! तुम ब्रह्माजी के साथ उत्पन्न हुए हो, साक्षात् परमेश्री ब्रह्माके स्वरूप हो और तुम स्वभावतः प्रकट हुए । हमारे सब शुष हर लो और हमारे लिये कल्याणकारी बनो।'

उस दिन गौओकि सींग आदि अङ्गों में रंग लगाकर उन्हें घास और अन्न देकर तथा नमस्कार और प्रदक्षिणा करके उनकी पूजा की जाती है। मार्गशीर्षकी अमावास्याको भी श्राद्ध और ब्राह्मणभोजनके द्वारा तथा ब्रह्मचर्य आदि नियमों और जप, होम तथा पूजनादिके द्वारा पितरोंकी पूजा की जाती है। विप्रवर! पौष और माघमें भी पितृश्राद्धका फल अधिक कहा गया है। फाल्गुनकी अमावास्यामें श्रवण, व्यतीपात और सूर्यका योग होनेपर केवल श्राद्ध और ब्राह्मणभोजन गयासे अधिक फल देनेवाला होता है। सोमवती अमावास्याको किया हुआ दान आदि सम्पूर्ण फलोंको देनेवाला है। उसमें किये हुए श्राद्धका अधिक फल है। मुने! इस प्रकार मैंने तुम्हें संक्षेपसे तिथिकृत्य बताया है। सभी तिथियों में कुछ विशेष विधि है, जो अन्य पुराणों में वर्णित है।