नारद महा पुराण
व्याकरण-शास्त्रका वर्णन सनन्दन उवाच
अथ व्याकरणं वक्ष्ये संक्षेपात्तव नारद।
सिद्धरूपप्रबन्धेन मुखं वेदस्य साम्प्रतम्॥१॥
सनन्दनजी कहते हैं-अब मैं शब्दोंके सिद्धरूपोंका उल्लेख करते हुए तुमसे संक्षेपमें व्याकरणका वर्णन करता हूँ; क्योंकि व्याकरण वेदका मुख है॥१॥
सुप्तिङन्तं पदं विप्र सुपां सप्त विभक्तयः।
स्वौजसः प्रथमा प्रोक्ता सा प्रातिपदिकात्मिका॥२॥
विप्रवर! सुबन्त' और तिङन्त पदको शब्द
कहते हैं (जिसके अन्त में 'सुप्' प्रत्यय हों, वह सुबन्त कहलाता है)। सुप्को सात विभक्तियाँ हैं। उनमें से प्रथमा (पहली) विभक्ति सु, औ, जस्- इस प्रकार बतायी गयी है ('सु' प्रथमाका एकवचन है, 'औ' द्विवचन है और 'जस्' बहुवचन है)। प्रथमा विभक्ति प्रातिपदिक (नाम) स्वरूप मानी गयी है॥२॥
सम्बोधने च लिङ्गादावुक्ते कर्मणि कर्तरि।
अर्थवत्प्रातिपदिकं धातुप्रत्ययवर्जितम्॥३॥
सम्बोधनमें प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता
१.रामः, हरिम्, पितुः, रमायाः, ज्ञानम् इत्यादि । २. तिइ विभक्ति जिसके अन्तमें हो, उसे विन्त कहते हैं। तिड्के दो विभाग हैं-परस्मैपद और आत्मनेपद। इन दोनों में तीन पुरुष होते हैं-प्रथम, मध्यम तथा उत्तम । प्रत्येक पुरुषमें तीन वचन होते हैं-एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। परस्मैपदके प्रथम पुरुषसम्बन्धी प्रत्यय इस प्रकार है-'तिम्, तस्, अन्ति।' पे क्रमशः एकवचन, स्विचन तथा बहुवचन है। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिये। आत्मनेपदके प्रथम पुरुषमें 'ते, आते, अन्ते' ये प्रत होते हैं। इस प्रकार दोनों पदोंके तीनों पुरुषसम्बन्धी प्रत्पषोंका मूलमें हो उल्लेख हुआ है। यहाँ संक्षेपसे दिग्दर्शन कराया गया है। 'ति' से लेकर 'महे' तक समस्त प्रत्ययोंका संक्षिप्त नाम 'तिह है। ये जिसके अन्तमें हों, वह 'तिङन्त' है। उसीकी 'पद' संज्ञा होती है। उदाहरण- 'भवति' (होता है), 'पपाठ' (पढ़ा), 'गमिष्यति' (जायगा), 'एधते' (बढ़ता है) इत्यादि।
है; जहाँ प्रातिपदिकके अतिरिक्त लिक, परिमाण और वचन' आदिका बोध कराना हो, वहाँ भी प्रथमा विभक्तिका ही प्रयोग होता है। उक्तं कर्ममें (जहाँ कर्म वाच्य हो, उसमें) तथा ठक्त कमि (जहाँ कर्ता वाच्य हो, उसमें) भी प्रथमा विभक्तिका ही प्रयोग होता है। धातु और प्रत्ययसे रहित सार्थक शब्दकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है॥३॥
अमौशसो द्वितीया स्यात् तत्कर्म क्रियते च यत्।
द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरान्तरेण संयुते॥४॥
अम्, औं, शस्-यह द्वितीया विभक्ति (यहाँ भी 'अम्' आदिको क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन समझना चाहिये)। जो किया जाता है, उसे कर्म कहते हैं। अनुक्त कर्ममें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग कहा गया है (कर्तृवाच्य वाक्योंमें कर्म अनुक्त होता है, वहाँ उसकी प्रधानता नहीं रहती, इसीलिये उसे अनुक्त' कहा गया है)। 'अन्तरा', 'अन्तरेण' है इन शब्दोंका जिसके साथ संयोग या अन्वय हो, हो उस शब्दमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग करना चाहिये॥४॥
टाभ्याम्भिसस्तृतीया स्यात् करणे कर्तरीरिता।
येन क्रियतेतकरणंसकर्तास्यास्करोति यः॥५॥
'टा', 'भ्याम्', 'भिस्'-यह तृतीया विभकि है (यहाँ भी पूर्ववत् एकवचन आदिका विभाग समझना चाहिये)। करण और अनुक्त" कर्ता तृतीया विभक्ति बतायी गयी है। जिसकी सहायतासे कार्य किया जाता है, उसका नाम करण है और जो कार्य करता है, उसे कर्ता कहते हैं (जिस वाक्यमें कर्मकी प्रधानता होती है, वहाँ कर्ता अनुक्क माना गया है) ॥५॥
डेभ्याम्भ्यसश्चतुर्थी स्यात्सप्प्रदानेच कारके।
यस्मै दित्सां धारयेद्वै रोचते सम्प्रदानकम्॥६॥
'डे', 'भ्याम्' 'भ्यस्'-यह चतुर्थी विभक्ति है। इसका प्रयोग सम्प्रदान कारकमें होता है। जिस व्यक्तिको कोई वस्तु देनेकी इच्छा मनमें धारण की जाय, उसकी 'सम्प्रदान ११ संज्ञा होती है तथा जिसको कोई वस्तु रुचिकर प्रतीत होती है, वह भी सम्प्रदान२ है (सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती है) ॥६॥
१. तर तटी, "तटम् । २.परिमाणका उदाहरण 'द्रोणो व्रीहिः' (एक दोन धान है) इत्यादि है। ३. एकः', 'वी', 'बहवः'। ४. हरिः सेव्यते' (श्रीहरि भक्तों द्वारा सेवित होते है), 'लक्ष्या सेवितः' (भगवान् विष्णु लक्ष्मीनारा सेवित है) इत्यादि। ५.'रामः करोति' (राम करते हैं)। ६.धातुसे रहित इसलिये कहा गया कि 'अहन्' इत्यादि पदों में प्रातिपदिक संज्ञा होकर 'न' लोप न हो जाय। प्रत्ययरहित कहनेका कारण यह है कि 'हरियु', 'करोषि' इत्यादिमें भी 'सु' की प्रातिपदिक संज्ञा न हो जाय। यदि प्रातिपदिक संज्ञा हो जाती तो औत्सर्गिक एकवचन लाकर पदसंज्ञा करनेपर उक्त उदाहरणोंमें दन्त्य 'स' के स्थानमें 'मूर्धन्य 'ष' नहीं हो पाता; क्योंकि पदादि 'स' कारके स्थानमें 'ष' कार होनेका निषेध है। प्रत्ययके निषेधसे प्रत्ययान्तका भी निवेध समझना चाहिये। इससे 'हरिषु' इत्यादि समुदायकी प्रातिपदिक संज्ञा नहीं होगी। सार्थक शब्दकी ही प्रातिपदिक संज्ञा होती है, निरर्थककी नहीं। इसलिये 'धनम्, वनम्' इत्यादिमें प्रत्येक अ की अलग-अलग 'प्रातिपदिक' संज्ञा नहीं हो सकी। ७. 'हरि भजति' (श्रीहरिको भजता है)। इत्यादि क्योंमें 'हरि' इत्यादि पद अनुक्त है; इसलिये उनमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग होता है। ८.इसका उदाहरण है 'अन्तरा त्वां मां हरिः' (तुम्हारे और मेरे भीतर भी भगवान् है)। अन्तरेण हरि न सुखम्' (भगवान्के बिना सुख नहीं है) इत्यादि। ९-१०. रामेण बाणेन हतो वाली' (श्रीरामने बाणसे वालीको मारा) इस वाक्यमें राम अनुक्त कर्ता हैं और बाण करण। अतः इन दोनोंमें तृतीया विभलिका प्रयोग हुआ है। ११. ब्राह्मणाय गां ददाति' (ब्राह्मणको गाय देता है) इस वाक्यमें ब्राह्मण सम्प्रदान है, इसलिये ठसमें चतुर्थी हुई है। १२. इसका उदाहरण है-'हरये रोचते भक्तिः' (भगवान् को भक्ति पसंद है।)
पञ्चमी स्यान्डसिभ्याम्भ्यो ह्यपादाने च कारके।
यतोऽपैति समादत्ते अपादाने च यं यतः॥७॥
'ङसि', 'भ्याम्', 'भ्यस्' यह पञ्चमी विभक्ति है। इसका प्रयोग अपादान कारकमें होता है। जहाँसे कोई जाता है, जिससे कोई किसी वस्तुको लेता है तथा जिस स्थानसे कोई वस्तु अलग की जाती या स्वत: अलग होती है, विभाग या अलगावकी उस सीमाको अपादान कारक कहते हैं॥७॥
डसोसामश्च षष्ठी स्यात्स्वामिसम्बन्धमुख्यके।
ड्योस्सुप: सप्तमी तु स्यात्सा चाधिकरणे भवेत्॥८॥
'डस्', 'ओस्', 'आम्'–यह षष्ठी विभक्ति है। जहाँ स्वामी-सेवक आदि सम्बन्धकी प्रधानता हो, वहाँ (भेदकमें) षष्ठी विभक्तिका प्रयोग होता है। 'डि', 'ओस्' 'सुप्'-यह सप्तमी विभक्ति है। इसका प्रयोग अधिकरण कारकमें होता है॥८॥
आधारे चापि विप्रेन्द्र रक्षार्थानां प्रयोगतः।
ईप्सितं चानीप्सिताद् यत्तदपादानकं स्मृतम्॥९॥
विप्रवर! आधारमें भी सप्तमी होती है। भयार्थक तथा रक्षार्थक धातुओंका प्रयोग होनेपर भयके कारणकी अपादान संज्ञा होती है। इसी प्रकार वारणार्थक धातुओंका प्रयोग होनेपर अनीप्सितसे (जो अभीष्ट नहीं है, उससे) रक्षणीय जो अभीष्ट वस्तु है, उसकी अपादान संज्ञा होती है॥९॥
पञ्चमी पर्यपाड्योगे इतरर्तेऽन्यदिङ्मुखे।
एतैर्योगे द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकैः ॥१०॥
परि, अप, आङ्, इतर, ऋते, अन्य (आरात्) तथा दिग्वाचक शब्द-इन सबके योगमें भी पञ्चमी विभक्ति होती है। 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञावाले शब्दोंके साथ योग होनेपर द्वितीया विभक्ति होती है॥१०॥
लक्षणेत्थंभूतेऽभिरभागे चानुपरिप्रति।
अन्तरेषु सहार्थे च हीने ह्यपश्च कथ्यते ॥११॥
लक्षण, इत्थम्भूताख्यान, भाग तथा वीप्सार-
१. इसके उदाहरण इस प्रकार हैं-'ग्रामादपैति' (गाँवसे दूर जाता है), 'देवदत्तः यज्ञदत्तात् पुस्तकं समादत्ते' (देवदत्त यज्ञदत्तसे पुस्तक लेता है), 'पात्रात् ओदनं गृह्णाति' (बर्तनसे भात लेता है), 'अश्वात् पतति' (घोड़ेसे गिरता है), 'पर्वतात् नदी निस्सरति' (पर्वतसे नदी निकलती है) इत्यादि।
२. गृहस्य स्वामी' (घरके स्वामी), 'राज्ञः सेवकः' (राजाका सेवक), 'दशरथस्य पुत्रः' (दशरथके पुत्र), 'सीतायाः पतिः' (सीताके पति) इत्यादि। ३. गृहे वसति' (घरमें रहता है)। ४.आधार तीन प्रकारके हैं- औपश्लोषिक, वैषयिक और अभिव्यापक। इन क्रमशः उदाहरण इस प्रकार है)। ५. कटे आस्ते' (चटाईपर बैठता है) 'मोक्षे इच्छा अस्ति' (मोक्षविषयक इच्छा है), 'सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति' (सबमें आत्मा है)। 'चौर्याद्विभेति' (चोरीसे डरता है)। ६.'पापाद् रक्षति' (पापसे बचाता है)। ७.' यवेभ्यो गां वारयति' (जौसे गायको हटाता है)। ८.'परि हरेः संसार:' (श्रीहरिसे संसार अलग है), 'अप हरेः सर्वे दोषाः' (सब दोष भगवान्से दूर हैं), 'आ मुक्तेः संसारः' (जबतक मोक्ष न हो, तभीतक संसार है), 'इतर: कृष्णात्' (कृष्णसे भित्र), 'ऋते भगवतः' (भगवान्के बिना), 'अन्यः श्रीरामात्' (श्रीरामसे भिन्न), 'आरात् वनात्' (वनसे दूर या समीप), 'पूर्वो ग्रामात्' (गाँवसे पूर्व) इत्यादि उदाहरण समझने चाहिये। ९.उदाहरण-'वृक्षं प्रति परि अनु वा विद्योतते विद्युत् (वृक्षकी ओर बिजली चमकती है)। यहाँ वृक्षके प्रकाशित होनेसे बिजलीकी चमकका ज्ञान होता है, अतः वृक्ष लक्षण है। किसीके मतमें विद्युत्का विद्योतन ही लक्षण है, इसे व्यक्त करनेवाले प्रति, परि अथवा अनु किसीके भी योगमें द्वितीया ही होगी। १०. भक्तो विष्णुं प्रति, परि, अनु वा।' (यह श्रीविष्णुका भक्त है)। यहाँ 'इत्यंभूत' का अर्थ है किसी विशेषणको प्राप्त। भक्तत्वरूप विशेषणको प्राप्त पुरुषके कथनमें प्रयुक्त प्रति आदि अव्यय कर्मप्रवचनीय होकर 'विष्णु' शब्दसे युक्त हो उसमें द्वितीया विभक्ति लाते हैं। ११.लक्ष्मीर्हरिं प्रति, परि, अनु वा। इसका अर्थ हुआ लक्ष्मी जी भगवान् श्रीहरिकी वस्तु हैं, उनपर उन्हीं का अधिकार है, वे श्रीहरिका भाग हैं। १२. मूलमें वीप्सा का प्रयोग न होनेपर भी लक्षणेत्थंभूत0(पा0 सू0 ) के आधारपर उसका
इन सबकी अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त हुए प्रति, परि, अनु-इन अव्ययोंकी 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञ होती है। 'भाग' अर्थको छोड़कर शेष जो लक्षण आदि अर्थ हैं, उनकी अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त होनेवाला 'अभि' अव्यय भी 'कर्मप्रवचनीय होता है। हीन अर्थको प्रकाशित करनेवाला 'अनु' तथा 'हीन' और 'अधिक' अर्थोंको प्रकट करनेके लिये प्रयुक्त 'उप' अव्यय भी 'कर्मप्रवचनीय' होते हैं। अन्तर अर्थात् मध्य अर्थ तथा सहार्थ यानी तृतीया विभक्तिका अर्थ व्यक्त करनेके लिये प्रयुक्त हुआ 'अनु' शब्द भी 'कर्मप्रवचनीय' है। (इन सबके योगमें द्वितीया विभक्ति होती है) ॥११॥
द्वितीया च चतुर्थी स्याच्चेष्टायां गतिकर्मणि।
अप्राणिषु विभक्ती द्वे मन्यकर्मण्यनादरे॥१२॥
गत्यर्थक' धातुओंके कर्ममें द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियाँ प्रयुक्त होती हैं, यदि गमनकी चेष्टा प्रकट होती हो। (परंतु मार्ग या उसका वाचक शब्द यदि गत्यर्थक धातुका कर्म हो तो उसमें चतुर्थी नहीं होती, केवल द्वितीया होती है। यह चतुर्थीका निषेध तभी लागू होता है, जब पथिक मार्गपर चल रहा हो। यदि वह गलत रास्तेसे जाकर अच्छा रास्ता पकड़ना चाहता हो तब चतुर्थीका प्रयोग भी हो ही सकता है') ज्ञानार्थक 'मन्' धातुका कर्म यदि कोई प्राणिभिन्न वस्तु हो और अनादर अर्थ प्रकट करना हो तो उसमें भी द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियाँ होती हैं ॥ १२ ॥
नमःस्वस्तिस्वधास्वाहालंवषड्योग ईरिता।
चतुर्थी चैव तादर्थ्य तुमाद्भाववाचिनः ॥१३॥
नमः, स्वस्ति, स्वधा, स्वाहा, अलम्, वषट्- इन सब अव्यय शब्दोंके योगमें चतुर्थी विभक्तिके प्रयोगका विधान है। तादर्थ्य में अर्थात् जिस वस्तुके लिये कोई कार्य किया जाता है, उस 'वस्तु के बोधक शब्दमें चतुर्थी विभक्ति होती है। 'तुमुन्' के अर्थमें प्रयुक्त अव्ययभिन्न भावार्थक प्रत्ययान्त शब्दमें भी चतुर्थी विभक्तिका ही प्रयोग होना चाहिये१२॥१३॥
तृतीया सहयोगे स्यात्कुत्सितेऽङ्गे विशेषणे।
काले भावे सप्तमी स्यादेतैखेंगे च षष्ठयपि॥१४॥
स्वामीश्वराधिपतिभिः साक्षिदायादसूतकैः।
निर्धारणे द्वे विभक्ती षष्ठी हेतुप्रयोगके ॥१५॥
ग्रहण किया गया है। उसका अर्थ है व्याप्ति। उदाहरण है-'वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति' (एक-एक पेड़को सींचता है), 'परि सिञ्चति, अनु सिञ्चति' का भी प्रयोग हो सकता है। १.उदाहरण-हरिमभि वर्तते। २. अनु हरि सुराः' इसका अर्थ है-दैत्य भगवान्से हीन हैं। ३. अधिक' अर्थमें जहाँ 'उप' है, वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है। 'हीन' अर्थमें जहाँ 'उप' है, उसके योगमें द्वितीया होती है। यथा-'उप हरि सुराः'-देवता भगवान्से हीन हैं। ४.उदाहरण-'हृदयमनु हरिः' भगवान् हृदयके भीतर हैं। ५.उदाहरण-नदीमन्ववसिता सेना। नद्या सह सम्बद्धेत्यर्थः (सेना नदीसे सम्बद्ध है)। ६.उदाहरण-', ग्रामाय वा गच्छति' (गाँवको जाता है)
७. यथा-'पन्थानं गच्छति' (राह चलता है)। ८. यथा-'उत्पथेन पथे गच्छति' (अच्छी राह पकड़ने के लिये बुरे रास्तेसे जाता है)। ९. यथा-'न त्वां तृणं मन्ये, तृणाय वा' (मैं तुझे तृणके बराबर भी नहीं समझता)। वार्तिककारके मतमें यहाँ 'प्राणिभिन्न' को हटाकर 'नौका, अन्न, शुक, शृगाल-इन शब्दोंको छोड़कर' इतना बढ़ा देना चाहिये। इससे 'न त्वाम् अन्नं मन्ये' इत्यादि स्थलोंमें प्राणिभिन्न होनेपर भी चतुर्थी नहीं होगी और 'न त्वां शुने मन्ये' इत्यादि स्थलोंमें 'प्राणी' होनेपर भी चतुर्थी हो जायगी। १०. क्रमश: उदाहरण इस प्रकार हैं-'हरये नमः । स्वस्ति प्रजाभ्यः । अग्नये स्वाहा। पितृभ्यः स्वधा। अलं मल्लो मल्लाय । वषट् इन्द्राय। ११. यथा-'मुळ्ये हरि भजति (मोक्षके लिये भगवान्का भजन करता है)। १२. यागाय याति-यष्टुं यातीत्यर्थः (यज्ञके लिये जाता है)।
'सह' तथा उसके पर्यायवाची शब्दोंसे योग | होनेपर तृतीया विभक्ति होती है (इसी प्रकार सदृशार्थक शब्दोंके योगमें भी तृतीया होती है)।
यदि कोई विकृत अङ्ग विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ हो तो उसमें भी तृतीया विभक्ति होती है। जहाँ एक क्रियाके होते समय दूसरी क्रिया लक्षित होती हो, वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है। 'स्वामी', 'ईश्वर', 'अधिपति', 'साक्षी', 'दायाद', 'प्रसूत' (तथा 'प्रतिभू')-इन शब्दोंके योगमें सप्तमी और षष्ठी दोनों विभक्तियाँ होती हैं। जिस समुदायमेंसे किसी एककी जाति-सम्बन्धी, गुण-सम्बन्धी, क्रिया-सम्बन्धी अथ्वा किसी विशेष नामवाले व्यक्तिसम्बन्धी विशेषताका निश्चय करना हो, उस समुदायबोधक शब्दमें सप्तमी और षष्ठी दोनों विभक्तियाँ होती हैं। हेतु' शब्दका प्रयोग करके यदि हेत्वर्थका प्रकाशन किया जाय तो पष्ठी विभक्ति होती है ||१४-१५॥
स्मृत्यर्थकर्मणि तथा करोतेः प्रतियलके।
हिंसार्थानां प्रयोगेच कृति कर्मणि कतरि॥१६॥
स्मरणार्थक क्रियाओंके कर्ममें शेषषष्ठी होती है। 'कृ' धातुके कर्ममें भी शेषषष्ठीका विधान है। यदि प्रतियत्ल (गुणाधान या संस्कार) सूचित होता हो । 'हिंसा' अर्थवाले धातुओंका प्रयोग होनेपर उनके कर्ममें शेषषष्ठी होती है। कृदन्त शब्दका योग होनेपर कर्ता और कर्ममें षष्ठी होती है ॥१६॥
न कर्तृकर्मणोः षष्ठी निष्ठादिप्रतिपादने।
एता वै द्विविधा ज्ञेया: सुबादिषु विभक्तिषु।
भूवादिषु तिडन्तेषु लकारा दश वै स्मृताः ।। १७॥
यदि निष्ठा आदिका प्रतिपादन करनेवाले प्रत्यय से युक्त शब्दका प्रयोग हो तो कर्ता और कर्ममें षष्ठी नहीं होती। ये विभक्तियाँ दो प्रकारकी जाननी चाहिये-सुप् और तिङ्। ऊपर सुबादि विभक्तियोंके विषयमें वर्णन किया गया
१. यथा-पुत्रेण सहागतः पिता (पुत्रके साथ पिता आया है)। यहाँ 'सह' के योगमें तृतीया हुई है। इसी प्रकार 'साकम्', 'सार्धम्', 'समम्'-इन शब्दोंके योगमें भी तृतीया जाननी चाहिये। २. 'सदृश', 'तुल्य', 'सम', 'निभ', 'सदृक्ष', 'नीकाश', 'संकाश', 'उपमित' आदि शब्द सदृशार्थक हैं; इनके योगमें भी तृतीया होती है, यथा-मेघेन सदृशः श्यामो हरिः (भगवान् विष्णु मेघके समान श्याम हैं)। ३. यथा-अक्ष्णा काणः (आँखका काना), कर्णेन बधिरः (कानका बहरा), पादेन खञ्जः (पैरका लँगड़ा) इत्यादि। ४. यथा-गोषु दुह्यमानासु गतः (जब गौएँ दुही जाती थीं, उस समय गया)। ५. गवां गोषु वा स्वामी। मनुष्याणां मनुष्येषु वा ईश्वर:-इत्यादि उदाहरण हैं। ६. यथा-नृणां नृषु वा ब्राह्मणः श्रेष्ठः । गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीरा। गच्छतां गच्छत्सु वा धावन् शीघ्रः। छात्राणां छात्रेषु वा। मैत्रः पटुः-ये उदाहरण हैं। ७. यथा-अत्रस्य हेतोर्वसति।
८. मातुः स्मरति, मातुः स्मरणम् आदि उदाहरण है। शेषत्वेन विवक्षित होनेपर ही षष्ठी होती है। विवक्षा न होनेपर 'मातरं स्मरति' इस प्रकार द्वितीया विभक्ति ही होगी। ९. उदाहरण-एधोदकस्योपस्करणम्- एधोदकस्योपस्कुरुते। १०. महर्षि पाणिनिने यहाँ-'जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायाम्' (२। ३। ५६) इस सूत्रद्वारा हिंसा-अर्थमें परिगणित धातुओंको ही ग्रहण किया है। उदाहरणके लिये 'चौरस्योज्जासनम्' 'चौरस्य प्रणिहननम्' निहननम्, प्रहणनं वा।' 'चौरस्योनाटनम्।' 'चौरस्य क्राथनम्।' 'चौरस्य पेषणं वा।' इत्यादि प्रयोग हैं। ११. यथा-'कृष्णस्य कृतिः' यहाँ 'कृष्ण' कर्ता है, उसमें षष्ठी ई है। 'जगतः कर्ता कृष्णः' इसमें 'जगत्' कर्म है, यहाँ कर्ममें षष्ठी हुई है। १२. आदि पदसे 'न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतनाम्' (पा० सू० २।३। ६९) इस सूत्रमें निर्दिष्ट स्थलोंको ग्रहण करना चाहिये। निष्ठाका उदाहरण यह है-'विष्णुना हता दैत्याः (विष्णु से दैत्य मारे गये)। दैत्यान् हतवान् विष्णुः(दैत्यों को विष्णुने मारा)। इसमें कृन्दन्त शब्दका योग होने से विष्णुशब्द में षष्ठीकी प्राप्ति थी, जो इस निषेधसे बाधित हो गयी।
है।क्रियावाचक 'भू' 'वा' आदि शब्द ही तिङ् विभक्तियोंके साथ संयुक्त होनेपर तिङन्त कहे गये हैं। इनमें दस लकार बताये गये हैं ॥१७॥
तिप्तसन्तीति प्रथमो मध्यः सिफ्थस्थ उत्तमः।
मिब्चस्मसः परस्मै तु पदानां चात्मनेपदम्॥१८॥
(प्रत्येक लकारमें परस्मैपद और आत्मनेपद- ये दो पद होते हैं। प्रत्येक पदमें प्रथम, मध्यम और उत्तम-ये तीन पुरुष होते हैं।) 'तिप्' 'तस्' 'अन्ति' यह प्रथम पुरुष है। 'सिप्' 'थस्' 'थ'-यह मध्यम पुरुष है तथा 'मिप्' 'वस्' 'मस्' यह उत्तम पुरुष है (प्रत्येक पुरुषमें जो तीन-तीन प्रत्यय हैं, वे क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन हैं)। ये सब परस्मैपदके प्रत्यय हैं। अब आत्मनेपद बताया जाता है॥१८॥
ते आतेऽन्ते प्रथमो मध्यः से आथे ध्वे तथोत्तमः।
ए वहे मह आदेशा ज्ञेया ह्यन्ये लिडादिषु ॥१९॥
'ते' 'आते' 'अन्ते' यह प्रथम पुरुष है। 'से' 'आथे' 'ध्वे' यह मध्यम पुरुष है। 'ए' 'वहे' 'महे' यह उत्तम पुरुष है। ये 'लट् लकारके स्थानमें होनेवाले आदेश हैं। 'लिट्' आदि लकारों के स्थानमें होनेवाले प्रत्ययरूप आदेश दूसरे हैं, उन्हें (अन्य व्याकरणसम्बन्धी ग्रन्थोंसे) जानना चाहिये॥१९॥
नाग्नि प्रयुज्यमाने तु प्रथमः पुरुषो भवेत्।
मध्यमो युष्मदि प्रोक्त उत्तमः पुरुषोऽस्मदि॥२०॥
जहाँ 'युष्मद्', 'अस्मद्' शब्दोंके अतिरिक्त अन्य कोई भी नाम (संज्ञा शब्द) उक्त कर्ता या उक्त कर्मक रूपमें प्रयुक्त होता हो, वहां प्रथम पुरुष होता है। युष्मद' शब्द उक्त कता हा उक्त कर्मके रूपमें प्रयुक्त हो तो मध्यम पुरुष होता है और 'अस्मद्' शब्दका उक्त कर्ता या उक्त कर्मक रूपमें प्रयोग हो तो उत्तम पुरुष कहा गया है॥२०॥
भूवाद्या धातवः प्रोक्ताः सनाद्यन्तास्तथा ततः।
लडीरितो वर्तमाने भूतेऽनद्यतने तथा॥२१॥
मास्मयोगे च लङ्वाच्यो लोडाशिषि च धातुतः ।
विध्यादौ स्यादाशिषि च लिडिन्तो द्विविधो मुने॥२२॥
क्रिया-बोधक 'भू' 'वा' आदि शब्दोंको धातु' कहा गया है। 'सन्' आदि प्रत्यय जिनके अन्तमें हों, उनकी भी धातु संज्ञा है। धातुओंसे वर्तमानकालमें लट्लकारका विधान है। अनद्यतन (आजसे पहलेके) भूतकालमें लङ् लकार होता है तथा 'मा' और 'स्म' इन दोनोंके योगमें लङ् (और लुङ्) लकार होता है, यह बताना चाहिये। आशीर्वाद और विधि आदि अर्थमें धातुसे लोट लकारका विधान है। विधि आदि अर्थमें तथा आशीर्वादमें लिङ् लकारका भी प्रयोग होता है, विन विधिलिङ् और आशिष् लिके धातु- रूपोमें अन्तर होता है। मुने! इसीलिये वह दो प्रकारका माना गया है ॥२१-२२॥
लिडतीते परोक्षे स्याच्वस्तने लुड् भविष्यति।
स्यादेवाद्यतने लृट् च भविष्यति तु धातुतः ॥२३॥
परोक्ष भूतकालमें लिट् लकारका प्रयोग होता है। आजके बाद होनेवाले भविष्य में 'लुट् 'का प्रयोग किया जाता है। आज होनेवाले भविष्यमें (तथा सामान्य भविष्यकालमें भी) धातुसे लूट् लकार होता है ।।२३।।
१. लट् , लिट् लुट्, लुट्, लेट्, लोट्, लङ् लिङ् लुङ् तथा लुङ्-ये दस लकार हैं। इनमेंसे पांचवें लकारका प्रयोग केवल वेदमें होता है।
२. सन्, स्यच् काम्यच्, क्यङ्, क्यष, आचारक्विप, णिच्, यङ्, यक्, आय, ईयङ् तथा णिङ्-ये बारह प्रत्यय सनादि कहलाते हैं। ३. विधि (प्रेरणा या आज्ञा), निमन्त्रण (श्राद्ध आदिमें नियुक्ति या न्योता), आमन्त्रण (इच्छानुसार आज्ञा देना) तथा अधौष्ट (सत्कारपूर्ण व्यवहार)-इनको विध्यादि कहते हैं।
भूते लुङतिपत्तौ च क्रियाया लछ प्रकीर्तितः।
सिद्धोदाहरणं विद्धि संहितादिपुरःसरम्॥२४॥
सामान्य भूतकालमें लुङ् लकारका प्रयोग करना चाहिये। हेतुहेतुमद्भाव आदि जो लिङ् के निमित्त हैं, उन्हींके होनेपर भविष्य-अर्थमें लुङ् लकारका प्रयोग होता है; किंतु यदि क्रियाकी असिद्धि सूचित होती हो तभी ऐसा होना उचित है। मुने! [अब संधिका प्रकरण आरम्भ करते हैं-] संधिके सिद्ध उदाहरण संहिता आदि ग्रन्थोंके अनुसार समझो ॥ २४ ॥
दण्डाग्रं च दधीदं च मधूदकं पितृषभः ।
होतृकारस्तथा सेयं लागलीषा मनीषया॥२५॥
गङ्गोदकं तवल्कार ऋणार्णं च मुनीश्वर।
शीतार्तश्च मुनिश्रेष्ठ सैन्द्रः सौकार इत्यपि ॥२६॥
पहले स्वर-संधिके उदाहरण दिये जाते हैं- दण्ड+अग्रम्-दण्डाग्रम् (डंडेका सिरा)। दधिः इदम् दधीदम् (यह दही)। मधु। उदकम् मधूदकम् (मधु और जल)। पितृ ऋषभ:-पितृषभः (पितृवर्गमें श्रेष्ठ)। होतृा लकार: होतृकार: (होताका लकार) ।
इसी प्रकार 'मनीषा के साथ 'लाङ्गलीषा' भी सिद्धसंधि है। मुनीश्वर! गङ्गा+उदकम् गङ्गोदकम् (गङ्गाजल), तव+लकार:=तवल्कारः (तुम्हारा लृकार), सा+इयम्-सेयम् (वह यह-स्त्री)। स+ऐन्द्र:-सैन्द्रः (वह इन्द्रका भाग)। स+औकार: सौकार; (वह औकार)। ऋण+ऋणम् ऋणार्णम् (ऋणके लिये ऋण)। शीत+ऋत: शीतार्त: (शीतसे युक्त)। कृष्ण+एकत्वम् कृष्णैकत्वम् (कृष्णकी एकता)। गङ्गा ओघ: गङ्गौघः (गङ्गाको जलराशिका प्रवाह)-ये वृद्धि संधिके उदाहरण हैं ॥ २५-२६ ॥
वध्वासनं पित्रों नायको लवणस्तथा।
त आद्या विष्णवे ह्यत्र तस्मा अर्को गुरा अधः ॥२७॥
दधि- अत्र-दध्यत्र (यहाँ दही है), वधू+ आसनम्-वध्वासनम् (बहूका आसन), पितृ अर्थ:-पित्रर्थ: (पिताका धन), लु+आकृतिः लाकृति: (देवजा तकी माताका स्वरूप)-ये यणसंधिके उदाहरण हैं । (हरे-ए-हरये-भगवान्के लिये)। नै+अक: नायक: (स्वामी)। लो+अण:- लवणः
१. ये पाँच ठदाहरण दीर्घसंधिके हैं। नियम यह है कि अ, इ, उ, ऋ और ल-ये स्वर दीर्घ हों या हस्व, यदि अपने सवर्ण स्वरको समीप एवं परवर्ती पायें तो दोनों मिल जाते हैं और उन दोनोंके स्थानपर एक ही दीर्घस्वर हो जाता है। ऋ और लु असमान प्रतीत होनेपर भी परस्पर सवर्ण माने गये हैं। अत: ऋलुके मिलनेपर एक ही 'ऋ' बनता है, जैसा कि 'होतृकार:' में दिखाया गया है।
२. लाङ्गल+ ईषा-लागलीषा। मनस् ईषा-मनीषा। ये ही इनके पदच्छेद हैं। पहलेमें लाङ्गल' शब्दके अन्तका 'अ' ईषाके ईकारमें मिलकर तद्रूप हो गया है। दूसरेमें 'मनस्' के अन्तका 'अस्' भाग ईषाके ईकारका स्वरूप बन गया है। ऐसी संधिको पररूप कहते हैं। मनीषा' का अर्थ बुद्धि और 'लाङ्गलीषा' का अर्थ हरिस-हलका ईषादण्ड है। वार्तिककारने मनीषा आदि शब्दोंको 'शकन्यू' आदि पण (समुदाय) में सम्मिलित किया है। ऐसे शब्द जो प्राचीन ग्रन्थों में प्रयुक्त हुए हैं और जिनके साधनकी कोई विशेष पद्धति नहीं है, उन्हें निपातनात् सिद्ध माना गया है। ३. ये गुणसंधिके उदाहरण हैं। नियम यह है कि 'अ' या 'आ' से परे 'इ' 'उ' अथवा 'ऋ' हों तो वह क्रमश: 'ए' 'ओ' अथवा 'अर्' रूप धारण करता है। ये आदेश दो अक्षरोंके स्थानपर अकेले होते हैं। ४. नियम यह है कि 'अ' अथवा 'आ' से परे 'ए', 'ओ' अथवा 'ऋ' हो तो दो अक्षरोंके स्थानपर क्रमशः 'ऐ', 'औ' एवं 'आर' आदेश होते हैं। 'ए' या 'ओ' की जगह 'ऐ', 'और' हों तो भी वैसा ही रूप बनता है। 'ऋ' के स्थानमें 'आर' होनेके स्थल परिगणित हैं।
५. नियम यह है कि 'इ' 'उ' '' 'लु'-ये चार अक्षर दीर्घ हों या हुस्व, इनसे परे कोई भी असवर्ण (असमान) स्वर होनेपर इन 'इ' कार आदिके स्थानपर क्रमशः य, व, र, ल् आदेश होते हैं।
(नमक)।(पौ+अक:-पावक:-अग्नि)-ये अयादि संधि कहलाते हैं। ते+आद्या:-त आद्याः (वे प्रथम हैं)। विष्णो+एह्यत्र-विष्ण एह्यत्र (भगवन् विष्णो! यहाँ पधारिये)। तस्मै+अर्घः तस्मा अर्घः (उनके लिये अर्घ्य)। गुरौ+अध:-गुरा अधः (गुरुके समीप नीचे)। इन उदाहरणोंमें यलोप और वलोप हुए हैं ॥२७॥
हरेऽव विष्णोऽवेत्येषादसो मादप्यमी अधा:।
शौरी एतौ विष्णू इमौ दुर्गे अमू नो अर्जुनः ॥२८॥
आ एवं च प्रकृत्यैते तिष्ठन्ति मुनिसत्तम।
हरे। अव हरेऽव (भगवन् ! रक्षा कीजिये)। विष्णो अव विष्णोऽव (विष्णो! रक्षा कीजिये)। यह पूर्वरूप संधि है। अदस् शब्दसम्बधी मकारसे परे यदि दीर्घ 'ई' और 'ऊ' हों तो वे ज्यों-के-त्यों रह जाते हैं। इस अवस्थाको प्रकृतिभाव कहते हैं। जैसे अमी अघाः (ये पापी हैं), शौरी एतौ (ये दोनों श्रीकृष्ण-बलराम हैं), विष्णू इमौ= (ये दोनों विष्णुरूप हैं), दुर्गेअमू- (ये दोनों दुर्गारूप हैं)। ये भी प्रकृतिभावके ही उदाहरण हैं। नो अर्जुनः (अर्जुन नहीं है), आ एवम् (ऐसा ही है)-इनमें भी सन्धि नहीं होती। मुनिश्रेष्ठ नारद! 'अमी+अघाः' से लेकर यहाँतकके सभी उदाहरण ऐसे हैं, जो अपनी प्रकृतावस्थामें ही रहते हैं ॥ २८३ ॥
षडत्र षण्मातरश्च वाक्छूरो वाग्घरिस्तथा ।। २९ ।।
अब व्यञ्जन सन्धिके उदाहरण दिये जाते हैं। षट्+अत्र-षडत्र (यहाँ छः हैं)। षट्-मातर:- षण्मातरः (छ: माताएँ)। वाक् + शूर: वाक्छूर:
१. नियम यह है कि 'ए', 'ओ', 'ऐ', 'औ'-इनसे परे कोई भी स्वर हो तो इनके स्थानमें क्रमश: 'अय्, अव्, आय, और आव्' आदेश होते हैं। २. नियम यह है कि कोई भी स्वर परे रहनेपर अवर्णपूर्वक पदान्त य, व का लोप हो जाता है। यहाँ पूर्वोक्त नियमानुसार पहले अय, अव् आदि आदेश होते हैं; फिर अभी बताये हुए नियमके अनुसार य, व का लोप हो जाता है। यहाँ 'य'-लोप या 'व'-लोप होनेपर 'त आद्या' 'विष्ण एात्र' आदिमें पुनः दीर्घ एवं गुण आदि संधि नहीं हो सकती; क्योंकि इन संधियोंकी दृष्टि में य-लोप, व-लोप असिद्ध हैं; इसलिये इनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती। सारांश यह कि इन स्थलोंमें पुनः संधिका निषेध है। ३. नियम यह है कि पदान्त एकार और ओकारके बाद यदि हस्व अकार हो तो वह पूर्ववर्ती स्वरमें मिल जाता है। ४. इस उदाहरणमें यणसन्धि प्राप्त हुई थी; किंतु अभी बताये हुए नियमके अनुसार प्रकृतिभाव होनेसे सन्धि नहीं हुई।
५.पूर्वके दो उदाहरणों में यणकी और अन्तिम उदाहरणमें पूर्वरूपकी प्राप्ति थी; परंतु सन्धिका निषेध हो गया। नियम यह है कि ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचनका प्रकृतिभाव होता है; अत: वहाँ सन्धि नहीं होती है। ६.पहलेमें पूर्वरूप और दूसरेमें वृद्धि सन्धिकी प्राप्ति थी; परंतु प्रकृतिभाव हो गया। नियम यह है कि ओकारान्त निपात और एक स्वरवाले निपात जैसे हैं, वैसे ही रह जाते हैं। ७. इसमें षट् के 'ट्' की जगह इ हुआ है। नियम यह है कि झ, भ, घ, ढ, ध, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स–इनमेंसे यदि कोई अक्षर पदान्तमें हो तो उसके स्थानमें ज, ब, ग, ड, द–इनमेंसे कोई अक्षर योग्यताके अनुसार होता है। योग्यताका अभिप्राय स्थानकी समानतासे है। जैसे 'ट' का स्थान मूर्धा है, अत: उसकी जगह मूर्धा स्थानका 'ड' अक्षर ही हुआ। 'ज', 'ब' आदिके स्थान भिन्न हैं,, इसलिये नहीं हुए। ८. इसमें 'ट्' की जगह 'ण' आदेश हुआ है। 'क' से लेकर 'म' तकके किसी भी अक्षरके बाद यदि अनुनासिक वर्ण(ङ, ञ, ण, न, म) हों तो पूर्ववर्ती अक्षर यदि प्रदान्त में हो तो उसके स्थान में अनुनासिक हो जाता है। जो अक्षर जिस वर्गका है, उसके स्थानों उसी वर्गका पाँचवाँ अक्षर अनुनासिक होता है। इसलिये उत्त्क उदाहरण में ट् की जगह उसी वर्गका पाँचवाँ अक्षर ण् हुआ। यहाँ श् के स्थान में छ् हुआ है। ऊपर लिखे हुए झ से प तक के अक्षरों के बाद यदि श् हो तो उसकी जगह छ् हो जाता है किन्तु उस श के बाद कोई स्वर अथवा ह, य, व, र- ये अक्षर होने चाहिये। यही इस सन्धिका नियम है।
(बोलने में बहादुर)। वाक् हरि:-वाग्घरि: (वाणीरूप भगवान्) ॥ २९ ॥
हरिश्शेते विभुश्चिन्त्यस्तच्छेषो यच्चरस्तथा ।
प्रश्रस्त्वथ हरिष्षष्ठः कृष्णष्टीकत इत्यपि॥३०॥
हरिस्+शेते-हरिश्शेते (श्रीहरि शयन करते हैं)। विभुस्+चिन्त्यः विभुश्चिन्त्यः (सर्वव्यापी परमेश्वर चिन्तन करने योग्य हैं)। तत्+शेष: तच्छेषः' (उसका शेष)। यत्+चर:-यच्चर:५ (जिसमें चलनेवाला)। प्रश्+न:-प्रश्न: (सवाल)। हरिस्: षष्ठः हरिष्यष्ठ:" (श्रीहरि छठे हैं) तथा कृष्ण:+ टीकते-कृष्णष्टकते (श्रीकृष्ण जाते हैं) इत्यादि॥३०॥
भवान्यष्ठश्च षट् सन्तः षट् ते तल्लेप एव च।
चक्रिश्छिन्धि भवाञ्छौरिर्भवाशौरिरिहेत्यपि ॥३१॥
भवान्+षष्ठः (आप छते हैं)। इसमें पूर्व नियमके अनुसार प्राप्त होनेपर टवर्गका वर्ग होता । इसी तरह षट् सन्तः (छ: सत्पुरुष) और षट् ते (वे छ: हैं) इत्यादिमें भी ष्टुत्व नहीं हुआ है। तत्+लेपः-तल्लेप:११ (उसका लेप)। चक्रिन्+छिन्धि-चक्रिश्छिन्धि (चक्रधारी प्रभो! मेरा बन्धन काटिये)। भवान्+ शौरिः भवाञ्छौरिः, भवाशौरिः इह (आप श्रीकृष्ण यहाँ हैं), (भवाञ्च्छौरिः,भवाञ्च्शौरि:) इस पदच्छेदमें ये चार रूप बनते हैं१३ ॥३१॥
सम्यड्डनन्तोऽङ्गच्छाया कृष्णं वन्दे मुनीश्वर।
तेजांसि मंस्यते गङ्गा हरिश्छेत्तामरश्शिवः ॥३२॥
सम्यङ्+अनन्तः-सम्यड्डनन्तः (अच्छे शेषनाग), सुगण ईशः सुगण्णीश: (अच्छे गणकोंके स्वामी)। सन् अच्युतः सन्नच्युतः," (नित्य सत्स्वरूप श्रीहरि)। अङ्ग+छाया-अङ्गच्छाया (शरीरकी परछाई) कृष्णम्। वन्दे कृष्णं वन्दे (श्रीकृष्णको प्रणाम
१.उपर्युक्त 'झ'से 'प' तकके अक्षरोंके बाद यदि 'ह' हो तो उस 'ह' के स्थानमें पूर्ववर्ती अक्षरके वर्गका चौथा वर्ण हो जाता । इस नियमके अनुसार उक्त उदाहरणमें 'क्' के बाद 'ह' होनेसे 'ह'के स्थानमें कवर्गका चौथा अक्षर 'घ' हो गया है और 'क्' की जगह पूर्वोक्त नियमानुसार 'ग्' हो गया।
२-३-४-५. शकार और चवर्गका योग होनेपर सकार और तवर्गके स्थानमें क्रमशः शकार और चवर्ग होते हैं। इस नियमके अनुसार पूर्व दो उदाहरणोंमें 'स्' की जगह 'श्' हुआ है और शेष दोमें तवर्गकी जगह चवर्ग हुआ है। शेषके शकारका छकार हुआ है। नियम 'वाक्छूर: में, बताया गया है। ६. शके बाद तवर्ग हो तो उसकी जगह चवर्ग नहीं होता; अत: 'प्रश्रः' में न ज्यों-का-त्यों रह गया है। ७-८. षकार और टवर्गसे संयोग होनेपर सकार और तवर्गके स्थानमें क्रमश: षकार और टवर्ग होते हैं। इस नियमके अनुसार दोनों उदाहरणोंमें 'स' की जगह 'ष' हुआ है।
९. क्योंकि षकार परे रहनेपर तवर्गके टवर्ग होनेका निषेध है। १०. क्योंकि पदान्त टवर्गसे परे नाम्-भित्र सकार और तवर्गके स्थानमें षकार और टवर्ग नहीं होते। ऐसा निषेध है। ११. यहाँ तकारके स्थानमें लकार आदेश हुआ। नियम यह है कि लकार परे रहनेपर तवर्गके स्थानमें 'ल' हो जाता है।
१२. इसमें 'न्' के स्थानमें 'उ', 'र' का विसर्ग एवं उसका दन्त्य 'स्' होकर फिर छकारके योगमें उसका तालव्य 'श्' हो गया तथा उसके पूर्व अनुस्वार एवं अनुनासिक हुआ। नियम यह है कि छ, ठ, थ, च, ८, त-ये अक्षर परे हों तो नान्त पदके नकारका 'र' हो, और उसके पूर्व स्वरका विकल्पसे अनुनासिक अथवा '' से परे अनुस्वारका आगम हो। १३.नियम यह है कि शकार परे रहनेपर नान्त पदके आगे 'त्' बढ़ जाता है। शेष परिवर्तन पूर्वोक्त नियमके अनुसार होते हैं।
१४. इन उदाहरणोंमें ह, ण, न् एकसे दो हो गये हैं। नियम यह है कि हस्वसे परे यदि ' '' या 'न्' हो और उसके बाद भी कोई स्वर हो तो वे एकसे दो हो जाते हैं। १५. यहाँ छ के पहले आधा च बड़ गया है। नियम यह है कि हस्वसे परे छ होने पर उसके पहले आधा च् बढ जाता है। यहाँ म् के स्थान में अनुस्वार हो गया है। कोई भी हल् अक्षर परे हो तो पदान्त में स्थित म् का अनुस्वार हो जाता है।
करता हूँ)। तेजान्+सि-तेजांसि (तेज),| मन्+स्यते-मस्यते (मानेंगे)। गंगा-गङ्गा (देव-
नदी गङ्गा)।
मुनीश्वर नारद! यहाँतक व्यञ्जन-सन्धिका वर्णन हुआ। अब विसर्ग-सन्धि प्रारम्भ करते हैं। हरि:+छेत्ता- हरिश्छेत्ता (श्रीहरि बन्धन काटनेवाले हैं)। अमर: शिव:- अमरश्शिव: (भगवान् शिव अमर हैं)॥३२॥
राम काम्यः कृपःपूज्यो हरिः पूज्योऽर्च्य एव हि।
रामो दृष्टोऽबला अत्र सुप्ता दृष्टा इमा यतः ॥ ३३॥
राम:+काम्य: राम काम्य: (श्रीराम कमनीय हैं)। कृपः+ पूज्यः=कृप पूज्य: (कृपाचार्य पूज्य हैं)। पूज्यस्+अचर्य: = पूज्योऽर्च: (पूजनीय और अर्चनीय)। रामस्+ दृष्ट: =रामो दृष्टः (राम देखे गये हैं)। अबलास्। अत्र अबला अत्र (यहाँ अबलाएँ हैं)। सुप्तास्. दृष्टाः सुप्ता दृष्टाः (सोयी देखी गयीं)। इमास्+अत:-इमायत: (ये स्त्रियाँ हैं, अत:) ॥३३॥
विष्णुर्नम्यो रविरयं गीर फलं प्रातरच्युतः ।
भक्तैर्वन्द्योऽप्यन्तरात्मा भो भो एष हरिस्तथा।
एष शाङ्गी सैष रामः संहितैवं प्रकीर्तिता ॥३४॥
विष्णुः+नम्य:-विष्णुर्नम्यः ( श्रीविष्णु प्रणामके योग्य हैं)। रवि:+अयम्-रविरयम् (ये सूर्य हैं) गी: फलम्-गीफलम् (वाणीका फल)। प्रात+अच्युत:=प्रातरच्युतः (प्रात:काल श्रीहरि)। भक्तैस् वन्द्यः-भक्तैर्वन्द्यः (भक्तजनोंके वन्दनीय हैं)। अन्तर्। आत्मा-अन्तरात्मा (जीवात्मा या अन्तर्यामी परमात्मा)। भोस्। भो: भो भो: (हे हे)-ये सब उदाहरण पूर्वोक्त नियमोंसे ही बन जाते हैं। एषस्। हरिः एष हरिः (ये श्रीहरि है)। एषस्+ शार्ङ्गी= एष शाङ्गों (ये शार्ङ्गधारी हरि हैं)। सस्- एषस्-रामः सैष
१.यहाँ अपदान्त न् का अनुस्वार हुआ है। नियम यह है कि झल् परे रहनेपर अपदान्त न् म् का अनुस्वार होता है। झल्में इतने अक्षर आते हैं-झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह। २. यहाँ अपदान्त अनुस्वारका परसवर्ण हुआ है। र, श, ष, स, ह–इनको छोड़कर कोई भी हल् अक्षर परे रहनेपर अपदान्त अनुस्वारका नित्य परसवर्ण (परवर्ती अक्षरके वर्गका पञ्चम वर्ण) होता है- यह नियम है। ३. इन दोनों उदाहरणोंमें विसर्गके स्थानमें दन्त्य 'स्' होकर श्चुत्व सन्धिके नियमसे तालव्य 'श्' हो गया। नियम यह है कि विसर्गके स्थानमें स् हो जाता है खर् परे रहनेपर। उपर्युक्त अक्षरों में 'ख' से 'स' तकके अक्षरोंको खर कहते हैं। ४. यहाँ विसर्गके स्थानमें ऐसार चिह्न हो गया है। विसर्गके बाद क, ख, या प, फ होनेपर विसर्गकी यह अवस्था होती है। ५. यहाँ 'स्' के स्थानमें 'रु' होकर 'रु' के स्थानमें 'उ' हुआ है। फिर गुणसन्धिके नियमसे ओकार होनेपर 'अW:' के अकारका पूर्वरूप हो गया है। यहाँ नया नियम यह जानना है कि पदान्त 'स्' के स्थानमें 'रु' होता है और अप्लुत अकारसे परे होनेपर उस 'रु' का 'उ' हो जाता है। ऐसा तभी होता है, जब उस 'रु' के बाद भी कोई अप्लुत अकार या 'हश्' हो। ह, य, व, र, ल, ब, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द-इन अक्षरोंके समुदायको 'हश्' कहते हैं। ६. यहाँ अभी बताये गये नियमके अनुसार 'स' को 'रु' करके फिर उसका उत्व हुआ। तत्पश्चात् गुण होकर 'रामो' बना। ७. इन सब उदाहरणोंमें 'स्' के स्थानमें पूर्ववत् 'रु' होता है; फिर 'रु' के स्थानमें 'य्' होकर पूर्व दो उदाहरणोंमें ठसका लोप हो जाता है। और अन्तिम उदाहरणमें 'य्' 'अ' में मिल जाता है। यहाँ स्मरण रखने योग्य नियम यह है-भो, भगो, अघो तथा अवर्णपूर्वक 'रु' के स्थानमें 'य' होता है अश् परे रहनेपर। और हल् परे रहनेपर उस 'यका लोप हो जाता है। सम्पूर्ण स्वरवर्ण तथा छ, प, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द-ये सभी अक्षर 'अश्' के अन्तर्गत हैं।
८. एतत् और तत् शब्दोंसे परे सु विभक्तिके स कारका लोप हो जाता है हल् परे रहने पर। इस नियमके अनुसार यहाँ स् का लोप हो गया है।
रामः (वही ये श्रीराम हैं)। इस प्रकार संहिता (सन्धि)-का प्रकरण बताया गया है॥३४॥
(अब सुबन्तका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले स्वरान्त शब्दोंका शुद्ध रूप देते हैं। उसमें भी एक श्लोकद्वारा मङ्गलाचरणके लिये श्रीरामका स्मरण करते हुए 'राम' शब्दके प्रायः सभी विभक्तियोंके एक-एक रूपका उल्लेख करते हैं-)
रामेणाभिहितं करोमि सततं रामं भजे सादरं
रामेणापहृतं समस्तदुरितं रामाय तुभ्यं नमः ।
रामान्मुक्तिरभीप्सिता मम सदा रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे रज्यतु मे मन: सुविशदं हे राम तुभ्यं नमः ॥३५॥
'मैं श्रीरामके द्वारा दिये हुए आदेशका सदा पालन करता हूँ। श्रीरामका आदरपूर्वक भजन करता हूँ। रामने (मेरा) सारा पाप- हर लिया। भगवान् श्रीराम! तुम्हें नमस्कार है। मुझे श्रीरामसे मोक्षकी प्राप्ति अभीष्ट है। मैं सदाके लिये श्रीरामका दास हूँ। मेरा निर्मल मन श्रीराममें अनुरक्त हो। हे श्रीराम! तुम्हें नमस्कार है ॥ ३५॥
सर्व इत्यादिका गोपाः सखा चैव पतिर्हरिः॥३६॥
सर्व आदि शब्द सर्वनाम माने जाते हैं। 'गोपाः 'का अर्थ है गौओंका पालन करनेवाला। सका अर्थ है मित्र। यह 'सखि' शब्दका रूप है। पतिका अर्थ है स्वामी । हरि शब्दका अर्थ है भगवान् विष्णु ॥३६॥
सुश्री नुः स्वयम्भूश्च कर्ता रा गौस्तु नौरिति।
अनड्वान्गोधुग्लिट् च द्वौ त्रयश्चत्वार एव च ॥३७॥
जो उत्तम श्रीसे सम्पन्न हो, उसे सुश्री कहते हैं। भानुका अर्थ है सूर्य और किरण। स्वयम्भूका अर्थ है स्वयं प्रकट होनेवाला। इसका
१. यहाँ 'एष रामः' की सिद्धि तो पूर्ववत् हो जाती है। किंतु 'सस्' के 'सु' का लोप करनेके लिये एक विशेष नियम है-'सस्' के 'सु' का लोप होता है अच् परे रहनेपर, यदि उसके लोप होनेके बाद ही श्लोकके पादकी पूर्ति होती हो तब। जैसे-सैष रामः समाया (वही ये श्रीराम आते हैं)। २. कहीं-कहीं इस अंशका पाठ इस प्रकार मिलता है-'रामो राजमणिः सदा विजयते।' प्रथमा विभक्तिके रूपकी दृष्टि से यही पाठ ठीक जान पड़ता है। ३. 'राम' शब्दका रूप सब विभक्तियोंमें इस प्रकार समझना चाहिये-रामः रामौ रामाः। रामम् रामौ रामान्। रामेण रामाभ्याम् रामैः। रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः । रामात्, रामाद् रामाभ्याम् रामेभ्यः। रामस्य रामयोः रामाणाम्। रामे रामयोः रामेषु । हे राम हे रामौ हे रामाः । ४. इसी प्रकरणमें आगे (श्लोक ४७-४८ में) सर्वनाम शब्द गिनाये गये हैं। ५. इनमें सर्व शब्दका रूप इस प्रकार है-सर्वः सर्वी सर्वे। सर्वम् सर्वो सर्वान्। सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वेः । सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः । सर्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः । सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् । सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वेषु । अन्य सर्वनामोंके रूप भी प्रायः ऐसे ही होते हैं । ६. इसके रूप इस प्रकार हैं-गोपाः गोपौ गोपाः। गोपाम् गोपौ गोपः । गोपा गोपाभ्याम् गोपाभिः । गोपे गोपाभ्याम् गोपाभ्यः । गोपः गोपाभ्याम् गोपाभ्यः। गोपः गोपो: गोपाम् । गोपि गोपोः गोपासु। हे गोपाः हे गोपौ हे गोपाः । ७. सखि शब्दके पूरे रूप इस प्रकार हैं-सखा सखायौ सखायः। सखायम् सखायौ सखीन्। सख्या सखिभ्याम् सखिभिः। सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः। सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः। सख्युः सख्योः सखीनाम्। सख्यौ सख्योः सखिषु। हे सखे हे सखायौ हे सखायः। ८. इसके दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार होते हैं-पतिः पती पतयः। पतिम् पती पतीन्। शेष विभक्तियोंमें सखि शब्दके समान रूप होते हैं। सम्बोधनमें हे पते हे पती हे पतयः-इस प्रकार रुप जानने चाहिये। इसके रुप इस प्रकार हैं- हरिः हरी हरयः। हरिम् हरी हरीन्। हरिणा हरिभ्याम् हरिभिः। हरये हरिभ्याम् हरिभ्यः। हरेः हरिभ्याम् हरिभ्यः। हरेः हर्योः हरीणाम्। हरौः हर्योः हरिषु। हे हरे हे हरी हे हरयः। इसके रुप इस प्रकार हैं- सुश्रीः सुश्रियौ सुश्रियः। सुश्रियम् सुश्रियौ सुश्रियः। सुश्रिया सुश्रीभ्याम् सुश्रीभिः। सुश्रिये सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः। सुश्रियः सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः। सुश्रियः सुश्रियोः सुश्रियाम्। सुश्रीयि सुश्रियोः सुश्रीषु। हे सुश्रीः हे सुश्रियौ हे सुश्रियः। इसके रुप इस प्रकार हैं- भानुः भानू भानवः। भानुम् भानू भानून्। भानुना भानुभ्याम् भानुभिः। भानवे भानुभ्यः। भानोः
प्रयोग प्रायः ब्रह्माजीके लिये होता है। काम करनेवालेको कर्ता कहते हैं। यह 'कर्तृ' शब्दका रूप है।'' शब्द धनका वाचक है। पुल्लिङ्गमें 'गो' शब्दका अर्थ बैल होता है और स्त्रीलिङ्गमें गाय। 'नौ' शब्द नौकाका वाचक है। यहाँतक स्वरान्त पुंल्लिङ्ग शब्दोंके रूप दिये गये हैं।
अब हलन्त पुंल्लिङ्ग शब्दोंके रूप दिये जा रहे हैं। गाड़ी खींचनेवाले बलको अनड्वान् कहते हैं। यह अनडुशब्दका रूप है। गाय दुहनेवालेको गोधुक् कहते हैं। मूल शब्द गोदुह् है। लिह् शब्दका अर्थ है चाटनेवाला। 'द्वि' शब्द संख्या दोका, 'त्रि' शब्द तीनका और 'चतुर्' शब्द चारका वाचक है। इनमेंसे पहला केवल द्विवचनमें और शेष दोनों केवल बहुवचनमें प्रयुक्त होते हैं ॥३७॥
राजा पन्थास्तथा दण्डी ब्रह्महा पञ्च चाष्ट च ।
अष्टौ अयं मुने सम्राट् सुराड्बिभ्रद्वपुष्मतः ॥३८॥
राजा राजन्-शब्दका रूप है । पन्थाः कहते हैं मार्गको। यह पथिन् शब्दका रूप है। जो दण्ड धारण करे, उसे दण्डी कहते हैं । ब्रह्महन् शब्द ब्राह्मणघातीके अर्थमें प्रयुक्त होता है। पञ्चन्-शब्द पाँचका और अष्टन् शब्द आठका
२ भान्वोः २ भानूनाम्। भानौ भानुषु। हे भानो हे भानू हे भानवः ।
१. स्वयम्भू शब्दके रूप इस प्रकार है-स्वयम्भूः स्वयम्भुवौ २ स्वयम्भुवः २। स्वयम्भुवम्। स्वयम्भुवा स्वयम्भूभ्याम् ३। स्वयम्भूभिः। स्वयम्भुवे स्वयम्भूभ्यः २। स्वयम्भुवः २। स्वयम्भुवोः २ । स्वयम्भुवाम् । स्वयम्भुवि स्वयम्भूषु। २. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं-कर्ता कर्तारौ २ कर्तारः । कर्तारम् कर्तृन्। क; कर्तृभ्याम् ३ कर्तृभिः । कर्ने कर्तृभ्यः २। कर्तुः २। कोंः २ कर्तृणाम्। कर्तार कर्तृषु। हे कर्तः हे कर्तारौ हे कर्तारः। ३. उसके रूप इस प्रकार हैं-रा: रायौ २ रायः २। रायम्। राया राभ्याम् ३ राभिः। राये राभ्यः २। रायः २। रायोः ४, रायाम् । रायि रासु। सम्बोधने प्रथमावत्। २. दोनों लिङ्गोंमें इसके एक-से ही रूप होते हैं, जो इस प्रकार हैं-गौः गावी २ गावः । गाम् गाः। गवा गोभ्याम् ३ गोभिः । गवे गोभ्यः २। गोः २। गवोः २ गवाम् । गवि गोषु । हे गौः हे गावौ हे गावः । ५. इसका प्रयोग स्त्रीलिङ्गमें होता है, तथापि यहाँ पुंल्लिङ्गके प्रकरणमें इसे लिखा गया है, प्रकरणके अनुसार 'सुनौ' शब्द यहाँ ग्रहण करना चाहिये। इसके रूप इस प्रकार हैं-नौः नावौ २ नाव: २। नावम्। नावा नौभ्याम् ३ नौभिः । नावे नौभ्यः २। नाव: २। नावोः २ नावाम्। नावि नौषु । ६. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं- अनड्वान् अनड्वाही २ अनड्वाहः। अनड्वाहम् अनडुहः। अनडुहा अनडुद्भ्याम् ३ अनडुद्भिः। अनडुहे अनडुयः २। अनडुहः २। अनडुहोः २ अनडुहाम्। अनडुहि अनडुत्सु। सम्बोधनके एकवचनमें हे अनड्वन्। ७. इसके रूप इस प्रकार होते हैं-गोधुक् गोधुग् गोदुहौ २ गोदुहः २। गोदुहम्। गोदुहा गोधुग्भ्याम् गोधुग्भिः । गोदुहे गोधुग्भ्यः २। गोदुहः २। गोदुहोः २ गोदुहाम्। गोदुहि गोधुक्षु । ८. इसके रूप इस प्रकार है-लिट् लिङ् लिहौ लिह: २। लिहम्। लिहा लिड्भ्याम् ३ लिड्भिः। लिहे लिड्भ्यः २लिहः लिहोः लिहाम्। लिहि त्रयाणम्। त्रिषु चत्वारः। चतुरः। चतुर्भिः। चतुभर्यः चतुर्णाम्। चतुर्षु। इसके पूरे रुप इस प्रकार हैं- राजा राजानौ राजानः। राजानम् राज्ञः। राज्ञा राभ्याम् राजभिः राज्ञे राजभ्यः राज्ञः राज्ञोः राज्ञाम्। राज्ञि राजनि राजसु। हे राजन् हे राजानौ हे राजानः शेष रुप इस प्रकार समझने चाहिये-पन्थानौ पन्थानः मूल शब्द दण्डिन् है, जिसके रुप इस प्रकार हैं-दण्डी दण्डिनौ दण्डिनः दण्डिनम् दण्डिना दण्डिभ्याम् दण्डिभिः दण्डिने दण्डिभ्यः दण्डिनः दण्डिनोः दण्डिनाम्। दण्डिनि दण्डिषु दण्डिषु। हे दण्डिन्।
इसके रुप इस प्रकार हैं- ब्रह्महा ब्रह्महणौ ब्रह्महणम् ब्रह्मघ्रः। ब्रह्मघ्रा ब्रह्महभ्याम् ब्रह्महभिः। ब्रह्मघ्रे ब्रह्मभ्यः ब्रह्मघ्रः ब्रह्मघ्रोः ब्रह्मघाम्। ब्रह्मघ्रि ब्रह्महसु।
वाचक है। ये दोनों बहुवचनान्त होते हैं। अयम्का अर्थ है यह; यह 'इदम्' शब्दका रूप है। 'सम्राट्' कहते हैं बादशाह या चक्रवर्ती राजाको। सुराज् शब्दके रूप-सुराट् सुराजौ सुराजः इत्यादि हैं। शेष रूप सम्राज् शब्दकी भाँति जानने चाहिये। इसका अर्थ है-अच्छा राजा। बिभ्रत्का अर्थ है धारण-पोषण करनेवाला। वपुष्मत् (वपुष्मान्) का अर्थ है शरीरधारी ॥ ३८॥
प्रत्यङ् पुमान् महान् धीमान् विद्वान्यट् पिपठीश्च दोः।
उशनासाविमे प्रोक्ताः पुंस्यज्झल्विरामकाः॥३९॥
प्रत्यञ्च शब्दका अर्थ है प्रतिकूल या पीछे जानेवाला 'भीतरकी ओर' भी अर्थ है । पुमान्का अर्थ है पुरुष, जो पुंस्-शब्दका रूप है । महान् कहते हैं श्रेष्ठको । धीमान्का अर्थ है बुद्धिमान्। (धीमत्-शब्दके रूप वपुष्मत् शब्दकी भाँति जानने चाहिये।) विद्वान्का अर्थ है पण्डित । षष् शब्द छ:का वाचक और बहुवचनान्त है। (इसके रूप इस प्रकार हैं-षट् षड् २। षड्भिः । षड्भ्यः २। षण्णाम् । षट्सु षट्त्सु।) जो पढ़नेकी इच्छा करे, उसे 'पिपठी:१०' कहते हैं। दो:का अर्थ है भुजा। उशनाका अर्थ है शुक्राचार्य । अदस् शब्दका अर्थ है१३ 'यह' या 'वह'। ये अजन्त (स्वरान्त) और हलन्त पुंल्लिङ्ग शब्द कहे गये ॥ ३९ ॥
राधा सर्वा गतिर्गोपी स्त्री श्रीर्धेनुर्वधूः स्वसा।
गौरुपानद्यौर्गोवत् ककुप्संवित्तु वा क्वचित्॥४०॥
अब स्त्रीलिङ्ग शब्दोंका दिग्दर्शन कराते हैं।
१. इनके रूप इस प्रकार हैं-पञ्च २। पञ्चभिः । पञ्चभ्यः २। पञ्चानाम्। पञ्चसु। अष्टौ २ अष्ट २। अष्टाभिः अष्टभिः । अष्टाभ्यः २ अष्टभ्यः २। अष्टानाम्। अष्टासु अष्टसु। २. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं-अयम् इमो इमे। इमम् इमौ इमान्। अनेन आभ्याम् ३ एभिः। अस्मै एभ्यः अस्मात् । अस्य अनयोः २ एषाम्। अस्मिन् एषु।
३. सम्राज् शब्दके रूप इस प्रकार है-सम्राट् सम्राड् सम्राजौ २ सम्राजः २। सम्राजम् । सम्राजा सम्राड्भ्याम् ३ सम्राड्भिः। सम्राजे सम्माड्भ्यः २। समाजः २। सम्राजो; २ सम्राजाम्। सम्राजि सम्राट्सु। ४, इसके रूप इस प्रकार हैं-बिभ्रत् बिभ्रतौ २ बिभ्रतः २। बिभ्रतम्। बिभ्रता बिभ्रद्भ्याम् ३ बिभ्रद्भिः । बिभ्रते बिभ्रद्रयः २। बिभ्रतः २। बिभ्रतो: २ बिभ्रताम्। बिभ्रति बिभ्रत्सु। ५. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं-वपुष्मान् वपुष्मन्तौ २ वपुष्मन्तः वपुष्मन्तम् वपुष्पतः। वपुष्मता वपुष्मद्भयाम् ३ वपुष्मद्भिः। वपुष्मते वपुष्मद्भयः२। वपुष्मतः २। वपुष्मतोः २ वपुष्मताम् । वपुष्मति वपुष्मत्सु। हे वपुष्मन् । ६. इसके रूप इस प्रकार हैं-प्रत्यङ् प्रत्यञ्चौ २ प्रत्यञ्चः । प्रत्यञ्चम् प्रतीचः । प्रतीचा प्रत्यग्भ्याम् ३ प्रत्यग्भिः। प्रतीचे प्रत्यग्भ्यः २। प्रतीच: २। प्रतीचोः २ प्रतीचाम्। प्रतीचि प्रत्यक्षु । ७. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं-पुमान् पुमांसौ २ पुमांसः। पुमांसम् पुंसः । पुंसा पुम्भ्याम् ३ पुम्भिः । पुंसे पुम्भ्यः २। पुंसः २। पुंसोः २ पुंसाम्। पुंसि पुंसु। हे पुमन् ! ८. महत्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं-महान् महान्तौ २ महान्तः। महान्तम् महतः । महता महद्भ्याम् ३ महद्भिः महते महद्भयः २। महत: २। महतोः २ महताम्। महति महत्सु।
९. विद्वस्-शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये-विद्वान् विद्वांसौर विद्वांसः। विद्वांसम् विदुषः। विदुषा विद्वद्भयाम् ३ विद्वद्भिः। विदुषे विद्वद्भयः२।विदुषः२।विदुषोः२विदुषाम्। विदुषि विद्वत्सु। हे विद्वन्।
इसके पूरे रुप इस प्रकार हैं- पिपठीः पिपठिषौ २पिपठिषः। पिपठिषम् पिपठिषः। पिपठिवा पिपठीभ्र्याम् पिपठीभिः। पिपठिषे पिपठीभर्यः २। पिपठिषः२। पिपठिषः २। पिपठिषोः२ पिपठिषाम्। पिपठिषि पिपठीष्णु पिपठीःषु।। दोष् शब्दके रुप इस प्रकार है-दोः दोषौ२ दोषः। दोषम् दोष्णः दोषः। दोष्णा दोषा दोभर्याम् दोर्भिः। दोष्णे दोषे दोभर्यः२। दोष्णः २दोषः२। दोष्णोः २दोषोः २दोष्णाम् दोषाम्। दोष्णि दोषि दोष्णु दोःसु।
उशनस्-शब्द से उशनोभ्यः रुप इस प्रकार हैं- उशना उशनसौ २उशनसः २। उशनसम्। उशनसा उशनोभ्याम् उशनोभिः। उशनसे उशनोभ्याः २। उशनसः२। उशनसमोः २ उशनसाम्। उशनसि उशनस्सु उशनः सु।
इसके रुप इस प्रकार हैं- असौ अमू अमी। अमुम् अमू अमून। अमुना अमूभ्याम् अमीभिः। अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः। अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्य। अमुष्य अमुयोः अमीवाम्। अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु।
राधाका अर्थ है भगवान् श्रीकृष्णकी आह्वादिनी शक्ति, जो उनकी भी आराध्या होनेसे 'राधा' कहलाती हैं। सर्वाका अर्थ है सबर (स्त्री)। 'गति: 'का अर्थ है-गमन, मोक्ष, प्राप्ति या ज्ञान। 'गोपी' शब्द प्रेम-भक्तिकी आचार्यरूपा गोपियोंका वाचक है। स्त्रीका अर्थ है नारी । 'श्री' शब्द लक्ष्मीका वाचक है । धेनुका अर्थ दूध देनेवाली गाय है । वधूका अर्थ है जाया अथवा पुत्रवधू। स्वसा कहते हैं बहिनको। नौ-शब्दका रूप स्त्रीलिङ्गमें भी पुंल्लिङ्गके समान होता है। नौ- शब्दका रूप पहले दिया जा चुका है। उपानह् शब्द जूतेका वाचक है। द्यौ १ स्वर्गका वाचक है। ककुभ्२ शब्द दिशाका वाचक है। संविद् शब्द बुद्धि एवं ज्ञानका वाचक है ॥ ४० ॥
रुग्विडुद्भाः स्त्रियां तपः कुलं सोमपमक्षि च।
ग्रामण्यम्बु'खलप्वेवं कर्तृ चातिरि वातिनु॥४१॥
रुक नाम है रोगका। विट्५-शब्द वैश्यका वाचक है। उद्धाः१६का अर्थ है उत्तम प्रकाश या प्रकाशित होनेवाली। ये शब्द स्त्री-लिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं।
अब नपुंसकलिङ्ग शब्दोंका परिचय देते हैं। तपस्-शब्द तपस्याका वाचक है। कुल –शब्द वंश या समुदायका वाचक है। सोमप-शब्दका अर्थ है सोमपान करनेवाला। 'अक्षिका अर्थ है
१. इसके रूप यों हैं-राधा राधे राधाः । राधाम् राधे राधाः। राधया राधाभ्याम् राधाभिः। राधायै राधाभ्याम् राधाभ्यः । राधायाः राधाभ्याम् राधाभ्यः । राधायाः राधयो: राधानाम् । राधायाम् राधयोः राधासु । हे राधे हे राधे हे राधाः ।
२. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं। चतुर्थीके एकवचनमें-सर्वस्यै। पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें-सर्वस्याः । षष्ठीके बहुवचनमें-सर्वासाम्। सप्तमीके एकवचनमें सर्वस्याम्। शेष सभी रूप 'राधा' शब्दकी ही भाँति होंगे। ३. गति शब्दके रूप. यों समझने चाहिये-गतिः गती गतयः । गतिम् गती गतीः । गत्या गतिभ्याम् ३ गतिभिः । गत्यै गतये गतिभ्यः २। गत्याः २ गतेः २ । गत्योः २ गतीनाम्। गत्याम् गतौ गतिषु । हे गते हे गती हे गतयः । ४. गोपी-शब्दके रूप इस प्रकार हैं-गोपी गोप्यौ २ गोप्यः । गोपीम् गोपीः । गोप्या गोपीभ्याम् ३ गोपीभिः । गोप्य गोपीभ्यः २ । गोप्याः २ गोप्योः २ गोपीनाम्। गोप्याम् गोपीषु । हे गोपि हे गोप्यौ हे गोप्यः । ५. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं-स्त्री स्त्रियौ २ स्त्रियः । स्त्रियम् स्त्रीम् स्त्रियः स्त्रीः । स्त्रिया स्त्रीभ्याम् ३ । स्त्रीभिः । स्त्रियै स्त्रीभ्यः २। स्त्रियाः २ । स्त्रियोः २ स्त्रीणाम् । स्त्रियाम् स्त्रीषु। हे स्त्रि हे स्त्रियौ हे स्त्रियः । ६. उसके रूप इस प्रकार हैं-श्री: श्रियौ २ श्रियः २। श्रियम् । श्रिया श्रीभ्याम् ३ श्रीभिः । श्रियै श्रिये श्रीभ्यः २। श्रियाः २। श्रियः २ । श्रियोः २ श्रीणाम् श्रियाम् । श्रियाम् श्रियि श्रीषु । हे श्रीः हे त्रियौ हे श्रियः । ७. इसके रूप गति शब्दकी तरह होंगे। यथा-धेनुः धेनू धेनवः । धेन्वै धेनवे इत्यादि। ८. इस शब्दके रूप इस प्रकार है-वधूः वध्वौ वध्वः । शेष रूप गोपी-शब्दकी तरह समझने चाहिये। वहाँ 'ई' के स्थानमें 'य' होता है, यहाँ 'ऊ' के स्थानमें 'व्' होगा। इतना ही अन्तर है। ९. इसके रूप कर्तृ-शब्दके समान होते हैं। केवल द्वितीयाके बहुवचनमें 'स्वसूः ऐसा रूप होता है- इतना ही अन्तर है। १०, उसके रूप इस प्रकार हैं-उपानत् उपानद् उपानही २ उपानहः २। उपानहम् । उपानहा उपानद्भ्याम् ३ उपानद्धिः। उपानहे उपानधः २। उपानहः २। उपानहोः २ उपानहाम्। उपानहि उपानत्सु। ११. दिव्-शब्दके रूप गो शब्दके समान समझने चाहिये। १२. इसके रूप-ककुप ककुब् ककुभौ २ ककुभः २। ककुभम् । ककुभा ककुयाम् इत्यादि है। ससमीके बहुवचनमें ककुप्सु रूप होता है। १३. इसके रूप-संवित् संविद् संविदो संविदः इत्यादि हैं। १४. इसके रूप हैं-रुक रुग् रुजौ २ रुजः २। रुजम् । रुजा साभ्याम् इत्यादि । १५. इसके रूप हैं-विद् विड् विशौ विशः इत्यादि। १६. इसके रूप है-उदा: उदासी उसासः इत्यादि। १७, नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के रूप एकसे ही होते हैं और तृतीयासे लेकर सप्तमीतकके रूप पल्लिङ्ग के समान होते हैं। तपस्-शब्दके रूप इस प्रकार समझने चाहिये-तपः तपसी तपांसि। ये तीनों रूप प्रथमा और द्वितीया विभक्ति में प्रयुक्त होते हैं। शेष रूप उशनस्के समान होंगे। १८. रूप ये हैं-कुलम् कुले कुलानि । शेष रामवत् । १९. प्रथमा-द्वितीमा विभक्तियों में इसके रूप हैं-सोमपम् सोमपे सोमपानि । शेष रामवत् । २०. इसके रूप प्रथम दो विभक्तियों में हैं-अक्षि अक्षिणी अक्षौणि। शेष पाँच विभक्तियोंके एकवचनमें क्रमशः इस प्रकार रूप हैं-अक्षणा। अक्ष्णे। अक्ष्णः । अक्ष्णः । अक्षिण अक्षणि। शेष रूप हरि-शब्दके समान जानने चाहिये।
आँख। गाँवके नेताको ग्रामणी' कहते हैं। अम्बु- शब्द जलका वाचक है। खलपूका अर्थ है खलिहान या भूमि साफ करनेवाला। कर्तृ-शब्द कर्ताका वाचक है। जो धनकी सीमाको लाँघ गया हो, उस कुलको अतिरि' कहते हैं। जो पानी नावकी शक्तिसे बाहर हो, जिसे नावसे भी पार करना असम्भव हो, उसे 'अतिर्नु' कहते हैं ॥४१॥
स्वनडुच्च विमलद्यु वाश्चत्वारीदमेव च।
एतद्ब्रह्माहश्च दण्डी असृक्किञ्चित्त्यदादि च ॥ ४२ ॥
जिस कुल या गृहमें गाड़ी खींचनेवाले अच्छे बैल हों, उसको 'स्वनडुत् ' कहते हैं। जिस दिन आकाश साफ हो, उस दिनको विमलद्यु कहते हैं। वार्-शब्द जलका वाचक है। चतुर् शब्दका रूप नपुंसकलिङ्गमें केवल प्रथमा और द्वितीयामें 'चत्वारि' होता है, शेष पुंल्लिङ्गवत्। इदम्- शब्दके रूप नपुंसकमें इस प्रकार हैं-इदम् इमे इमानि, शेष पुँल्लिङ्गवत्। एतत्-शब्दके रूप पुँल्लिगमें-एषः एतौ एते इत्यादि सर्वशब्दके समान होते हैं। नपुंसकमें केवल प्रथम दो विभक्तियोंमें ये रूप हैं--एतत् एते एतानि। ब्रह्मन्-शब्दके रूप नपुंसकमें 'ब्रह्म ब्रह्मणी ब्रह्माणि' हैं। शेष पुंल्लिङ्गवत् । अहन्१-शब्द दिनका वाचक है। दण्डिन्-शब्दके नपुंसकमें 'दण्डि दण्डिनी दण्डीनि' ये रूप हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्। असृक् १२-शब्द रक्तका वाचक है। किम्-शब्दके रूप पुंल्लिङ्गमें कः कौ के' इत्यादि सर्ववत् होते हैं। नपुंसकमें केवल प्रथम दो विभक्ति में 'किम् के कानि'-ये रूप होते हैं। चित् शब्दके रूप
१. पुल्लिङ्गमें इसके रूप ग्रामणी: ग्रामण्यौ ग्रामण्यः इत्यादि होते हैं। यदि कोई कुल (खानदान) गाँवका अगुआ हो तो यह शब्द नपुंसकलिङ्गमें प्रयुक्त होता है। उस दशामें इसके रूप इस प्रकार होंगे-ग्रामणि ग्रामणिनी ग्रामणीनि। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें 'ग्रामण्या ग्रामणिना। ग्रामण्ये ग्रामणिने। ग्रामण्यः २ ग्रामणिनः २। ग्रामण्याम् ग्रामणिनि-ये रूप हैं। शेष रूप ऍल्लिङ्गवत् होते हैं। २. इसके रूप-अम्बु अम्बुनी अम्बूनि इत्यादि हैं। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें क्रमशः अम्बुना। अम्बुने। अम्बुनः २। अम्बुनि-ये रूप होते हैं। शेष रूप भानुवत् हैं। ३. पुंल्लिङ्गमें इसके रूप 'खलपू: खलप्वौ खलप्वः' इत्यादि होते हैं। जब यह किसी साधन या औजारका वाचक होता है तो नपुंसकमें प्रयुक्त होता है। उसमें इसके रूप इस प्रकार हैं-खलपु खलपुनी खलपूनि। इसमें भी तृतीयासे सप्तमीतक एकवचनमें 'खलपुना, खलपुने, खलपुनः २, खलपुनि'-ये रूप अधिक होते हैं। शेष रूप पुंल्लिङ्गवत् हैं। ४. इसका रूप पुल्लिङ्गमें बताया गया है। नपुंसकमें 'कर्तृ कर्तृणी कर्तृणि'-ये रूप होते हैं। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें दो-दो रूप होते हैं। यथा-कर्तृणा का। कर्तृणे कर्ने। कर्तृणः २ कर्तुः २। कर्तृणि कर्तरि। शेष रूप पुंल्लिङ्गवत् हैं। ५. इसके अतिरि अतिरिणी अतिरीणि' ये रूप हैं। तृतीया विभक्तिसे इस प्रकार रूप चलते हैं-अतिरिणा, अतिराभ्याम् ३ अतिराभिः। अतिरिणे अतिराभ्य: २। अतिरिणः २। अतिरिणोः २ अतिरीणाम्। अतिरिणि अतिरासु। ६. इसके रूप इस प्रकार है-'अतिनु अतिनुनी अतिनूनि । तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें-'अतिनुना, अतिनुने, अतिनुन: २, अतिनुनि'-ये रूप होते हैं। शेष भानुवत्।७. रूप इस प्रकार हैं-स्वनडुत् स्वनडुही स्वनड्वांहि। शेष पुंल्लिङ्गवत्। ८. रूप इस प्रकार हैं-विमलद्यु विमलदिवी विमलदिवि । तृतीया आदि विभक्तियोमें 'विमलदिवा विपलाध्याम्' इत्यादिस्य होते है। इसके रूप इस प्रकार हैं-'वा: वारी वारि। वारा वार्ष्याम् दरभिः' इत्यादि। १०. पुल्लिङ्गमें इसके सब अप इस प्रकार हैं-ब्रह्मा, ब्रह्माणी, ब्रह्माणः । ब्रह्माणं ब्रह्माणौ ब्रह्मण ब्रह्मणा ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभिः। ब्रह्मणे ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभ्यः। ब्रह्मणः ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभ्यः । ब्रह्मणः ब्रह्मणोः ब्रह्मणाम्। ब्रह्मणि ब्रह्मणो ब्रह्मसु। ११. इसके रूप इस प्रकार है- 'अहः अह्री अहानि। अहा अहोभ्याम् अहोभिः' इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें अति, अहनि-ये दो रूप होते हैं। १२. इसके रूप इस प्रकार हैं-'असृक् असृजी असृञ्जि। असृजा असृग्भ्याम् असृग्भिः' इत्यादि।
'चित् चिती चिन्ति, चिता चिद्भ्याम् चिद्भिः' इत्यादि होते हैं। त्यद् आदि शब्दोंके रूप पुल्लिङ्गमें 'स्यः त्यौ ते' इत्यादि सर्ववत् होते हैं। नपुंसकमें 'त्यत् त्ये त्यानि'-ये रूप होते हैं॥ ४२ ॥
एतद् बेभिद्वाग् गवाङ् गोअग् गोङ्गोग् गोङ्।
तिर्यग्यकृच्छकृच्चैव ददद्भवत्पचत्तुदत्॥४३॥
(इदम् और) एतत्-शब्दके रूप अन्वादेशमें द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियोंमें कुछ भिन्न | होते हैं। पुंल्लिङ्गमें एनम् एनौ एनान्, एनेन एनयोः।' नपुंसकमें 'एनत् एने एनानि' ये रूप हैं। अन्वादेश न होनेपर पूर्वोक्त रूप होते हैं। बेभित्-शब्दके है रूप इस प्रकार हैं-'बेभित् बेभिद् बेभिदी बेभिदि । (यहाँ नुम् नहीं होता)। बेभिदा बेभिद्याम् बेभिद्भिः' | इत्यादि। गवाक्-शब्दके रूप गति और पूजा- शब्द अर्थके भेदसे अनेक होते हैं। गति-पक्षमें गवाक्का शब्द अर्थ है गायके पास जानेवाला और पूजा-पक्षमें इत्या उसका अर्थ है गो-पूजक। प्रथमा और द्वितीया भवन्त विभक्तियोंमें उसके उभयपक्षीय रूप इस प्रकार नपुंस हैं-एकवचनमें ये नौ रूप होते हैं-गवाक् गवाग् लिङ्गों गोअक् गोअग् गोक् गोग्गवाङ्गोअङ्गोद्विवचनमें है। तुद चार रूप होते हैं-गोची गवाशी गोअञ्ची गोची। है। स्त्री बहुवचनमें तीन रूप हैं—गवाञ्चि गोअञ्चि और होते हैं- गोशि। प्रथमा और द्वितीया विभक्तियों में ये ही रूप गोप रूप होते हैं। तृतीयासे लेकर सप्तमीके एकवचनमें सर्वत्र चार-चार रूप होते हैं-'गोचा गवाञ्चा गोअचा गोञ्चा' इत्यादि। भ्याम्, भिस् और भ्यस्में छ:- छः रूप होते हैं- गवाग्भ्याम् गोअग्भ्याम् गोग्भ्याम् गवाझ्याम् गोअङभ्याम् गोड्भ्याम् इत्यादि। सप्तमीके बहुवचनमें भी नौ रूप होते हैं-गवाक्षु गोअर्धा गोक्षु, गवाक्षु गोअङ्घ गोषु गवाक्षु गोअक्षु गोक्षु । इस प्रकार कुल एक सौ नौ रूप होते हैं। तिर्यक् -शब्द पशु-पक्षियोंका वाचक है। यकृत्- शब्द कलेजा तथा उससे सम्बन्ध रखनेवाली बीमारीका बोधक है। शकृत्-शब्द विष्ठाका वाचक है। ददत्-शब्दका रूप पुंल्लिङ्गमें बिभ्रत् शब्दकी तरह होता है। नपुंसकमें 'ददत्, ददती, ददन्ति ददति' ये रूप होते हैं। शेष पुंल्लिङ्गवत्। भवत् शब्दका अर्थ है, पूज्य । शतृ प्रत्ययान्त 'भवत्' शब्दके रूप पुंल्लिङ्गमें 'भवन् भवन्तौ भवन्तः इत्यादि होते हैं। शेष पूर्ववत् । स्त्रीलिङ्गमें भवन्ती भवन्त्यौ भवन्त्यः' इत्यादि गोपीके समान रूप हैं। नपुंसकमें पूर्ववत् हैं। पचत्-शब्दका रूप सभी लिङ्गोंमें शतृ प्रत्ययान्त भवत्' शब्दके समान होता है। तुदत्-शब्द पुंल्लिङ्गमें पचत्शब्दके ही समान है। स्त्रीलिङ्गमें डीप् प्रत्यय होनेपर उसके दो रूप होते हैं-तुदती और तुदन्ती, फिर इन दोनोंके रूप गोपी शब्दकी भाँति चलते हैं। नपुंसकमें प्रथम दो विभक्तियोंके रूप इस प्रकार हैं-तुदत् तुदती
१. त्यद्, तद, यद्, एतद् इदम्, अदस, एक, द्वि-ये त्यदादि कहलाते हैं। २. एकके विषयमें दुबारा की हुई चर्चा अन्वादेश है, जैसे-'यह आया, इसे भोजन दो' इस वाक्यमें 'इसे' अन्वादेश हुआ। ३. कुछ मनीषी विद्वान् इसमें ५२७ रूपोंकी उद्भावना करते हैं। ४. पुंल्लिङ्गमें इसके 'तिर्यङ् तिर्यश्चौ' इत्यादि प्रत्यङ्-शब्दकी तरह रूप होते हैं। द्वितीयाके बहुवचनमें 'तिरश्चः' रूप होता है। तृतीया आदिमें 'तिरश्चा तिर्यग्भ्याम्' इत्यादि रूप होते हैं। नपुंसकमें 'तिर्यक् तिरश्ची तिर्यञ्चि' रूप होते हैं। पूजा-पक्षमें 'तिर्यङ् तिर्यश्ची तिर्यञ्चि' रूप होते हैं। शेष पुल्लिङ्गवत् । ५. इसके रूप होते हैं-यकृत् यकृती यकृन्ति। यकृता यकृद्भयाम् इत्यादि। 'यकन्' आदेश होनेपर 'यकानि' रूप केवल 'शस्' विभक्तिमें होता है। तृतीया आदिके एकवचनमें 'यक्रा' आदि रूप अधिक होते हैं। ६, इसके रूप भी यकृत्-शब्दकी भौति ही होते हैं। ७. इसके तीनों लिङ्गोंमें रूप होते हैं। पुल्लिङ्गमें 'भवान् भवन्तौ भवन्तः' इत्यादि 'धीमत्' शब्दके समान रूप हैं। स्त्रीलिङ्गमें 'भवती भवत्यौ भवत्यः' इत्यादि गोपी-शब्दके समान रूप होते हैं। नपुंसकमें दो विभक्तियोंमें उसके ' भवत् भवती भवन्ति' रूप होते हैं। शेष पुल्लिङ्गवत्।
तुदन्ती तुदन्ति। शेष पुंल्लिङ्गवत् ॥४३॥
दीव्यद्धनुश्च पिपठी: पयोऽदःसुपुमांसि च।
गुणद्रव्यक्रियायोगांस्त्रिलिङ्गांश्च कति ब्रुवे॥४४॥
दीव्यत्-शब्दके रूप सभी लिङ्गोंमें पचत्के समान हैं। धनुष्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं-
धनुः धनुषी धनूंषि। धनुषा धनुर्ध्याम् इत्यादि। पिपठिष्-शब्दके रूप नपुंसकमें इस प्रकार हैं- 'पिपठी: पिपठिषी पिपठींषि' शेष पुंल्लिङ्गवत्। पयस्-शब्दके रूप तपस्-शब्दके समान होते हैं। यह दूध और जलका वाचक है। अदस्-शब्दके पुल्लिङ्ग रूप बताये जा चुके हैं। जिस कुलमें अच्छे पुरुष होते हैं, उसे सुपुम्' कहते हैं। अब हम कुछ ऐसे शब्दोंका वर्णन करते हैं, जो गुण, द्रव्य और क्रियाके सम्बन्धसे तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं॥४४॥
शुक्तः कीलालपाश्चैव शुचिश्च ग्रामणीः सुधी।
पटुः स्वयम्भूः कर्ता च माता चैव पिता च ना॥४५॥
सत्यानायुरपुंसश्च मतभ्रमरदीर्घपात्।
धनालासोम्यौ चागर्हस्तादृक् स्वर्णमयो बहु॥४६॥
शुक्त', कीलालपा, शुचि, ग्रामणी, सुधी, पटु, स्वयम्भू तथा कर्ता । मातृ-शब्द यदि परिच्छेत्तृवाचक हो तो तीनों लिङ्गों में प्रयुक्त होता है। इसके पुंल्लिङ्गरूप- माता, मातारौ, मातारः' इत्यादि; नपुंसकरूप-मातृ, मातृणी, मातृणि' इत्यादि और स्त्रीलिङ्गरूप-'मात्री, मात्र्यौ मात्र्यः हैं। जननीवाची मातृ-शब्द नित्य-स्त्रीलिङ्ग है। इसके रूप इस प्रकार हैं-'माता मातरौ मातरः । मातरम् मातरौ मातृः' इत्यादि। इसके शेष रूप स्वसृ-शब्दके समान हैं। पितृ-शब्द यदि कुलका विशेषण हो तो नपुंसकमें प्रयुक्त हो सकता है। अन्यथा वह नित्य पुँल्लिङ्ग है। इसके रूप 'पिता पितरौ पितरः । पितरम् पितरौ पितॄन्' इत्यादि हैं। शेष कर्तृशब्दके समान समझने चाहिये। नृ-शब्द नित्य पुँल्लिङ्ग है और उसके सभी रूप पितृ- शब्दके समान हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें इसके दो रूप होते हैं 'नृणाम् नृणाम् ।
स्त्रीलिङ्गमें इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं-असौ अमू अमूः। अमूम् अमू अमूः। अमुया अमूभ्याम् ३ अमूभिः । अमुष्यै अमूभ्यः २। अमुष्या: २। अमुयोः २ अमूषाम्। अमुष्याम् अमूषु ॥ नपुंसकलिङ्गमें प्रथम दो विभक्तियोंके रूप 'अदः अमू अमूनि' हैं। शेष पुंल्लिङ्गवत्। २. सुपुम् सुपुंसी सुपुमांसि। शेष विभक्तियोंमें पुंस्- शब्दकी तरह रूप होते हैं । ३. 'शुक्त' (सीप या सुतुही) शब्दके पुंल्लिङ्गरूप-शुक्तः शुक्तौ शुक्ताः । शुक्तं शुलौ शुक्तान्। शुक्तेन शुक्ताभ्यां शुक्तैः। शुक्ताय शुक्लाभ्याम् शुक्तेभ्यः। शुक्तात् शुक्ताभ्यां शुक्तेभ्यः। शुक्तस्य शुक्लयोः शुक्तानाम्। शुक्ते शुक्तयोः शुक्तेषु। हे शुक्त शुक्तौ शुक्ताः । इस प्रकार हैं। स्त्रीलिङ्गमें 'शुक्ता शुक्ले शुक्ताः' इत्यादि 'राधा'के समान रूप हैं। नपुंसकमें 'शुक्तं शुक्ते शुक्तानि' ये प्रथमा और द्वितीया विभक्तिके रूप हैं। शेष पुल्लिङ्गवत् रूप हैं। ४. 'कीलालपा' (जल पीनेवाला) के सभी रूप गोपाके समान हैं। और नपुंसकमें कुलके समान रूप होते हैं। 'शुचि' (पवित्र) शब्दके पुल्लिङ्गरूप हरिके समान हैं। स्त्रीलिङ्गरूप 'गति' के समान और नपुंसकरूप 'वारि' के समान हैं। ग्रामणी (ग्रामका नेता) के पुंल्लिङ्गरूप बताये गये हैं। स्त्रीलिङ्गरूप भी प्राय: वे ही हैं। नपुंसकके भी बताये जा चुके हैं। 'सुधी' शब्दका अर्थ है श्रेष्ठ बुद्धिवाला तथा विद्वान्। पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्गमें 'सुधीः सुधियौ, सुधियः' इत्यादि रूप होते हैं। नपुंसकमें 'सुधि, सुधिनी, सुधीनि' इत्यादि रूप हैं। 'पटु' (समर्थ) के त्तिन रूप 'भानु' के समान, स्त्रीलिन 'धेनु' के समान और नपुंसकरूप 'घटु पटुनी पटुनि' हैं; शेष भानुवत् । 'स्वयम्भू' (ब्रह्मा) के पुंल्लिङ्गरूप बताये गये हैं, स्त्रीलिङ्गमें भी वैसे ही होते हैं। नपुंसकमें 'स्वयम्भु वयम्भुनी स्वयम्भूनि' रूप होते हैं। शेष पुँस्लिङ्गवत्। कर्तृ शब्दके पुँल्लिङ्ग और नपुंसक रुप बताये गये हैं। स्त्रीलिङ्गमें गोपी शब्द के समान कत्री शब्दके रुप चलते हैं।
सत्य, अनायुष्, अपुंस्, मत, भ्रमर, दीर्घपात्, धनाढ्य, सोम्य, अगर्ह, तादृक्, स्वर्ण, बहु-ये शब्द भी तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं ।।४६ ॥
सर्व विश्वोभये चोभौ अन्यान्यतरेतराणि च॥४७॥
डतरो डतमो नेमस्त्वत्समौ त्वसिमावपि।
पूर्वः परावरौ चैव दक्षिणश्चोत्तराधरौ॥४८॥
अपरः स्वोऽन्तरस्त्यत्तद्यदेवेतत्किमसावयम्।
युष्मदस्मच्च प्रथमश्चरमोऽल्पस्तयाकः॥४९॥
नेमः कतिपयो द्वे निपाता: स्वरादयस्तथा।
उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपाश्चाव्ययाः ॥५०॥
अब सर्वनामशब्दोंको सूचित करते हैं-सर्व, विश्व, उभय, उभ, अन्य, अन्यतर, इतर, डतर, डतम, नेम, त्व, त्वत्, सम, सिम, पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अधर, अपर, स्व, अन्तर, त्यत्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, किम्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवत्। ये सर्वनाम हैं और इनके रूप प्राय: सर्व-शब्दके समान ही हैं। प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम-इन शब्दोंके प्रथमाके बहुवचनमें दो रूप होते हैं यथा- प्रथमे प्रथमाः, चरमे चरमाः इत्यादि।
स्वरादि और निपात तथा उपसर्ग, विभक्ति एवं स्वरके प्रतिरूपक शब्द अव्ययसंज्ञक होते हैं।। ४७-५०॥
तद्धिताश्चाप्यपत्यार्थे पाण्डवाः अ॒धरस्तथा।
गार्यो नाडायनात्रेयौ गाङ्गेयः पैतृष्वस्त्रीयः॥५१॥
अब तद्धित-प्रत्ययान्त शब्दोंका उल्लेख करते
१. 'सत्य' शब्द जब सामान्यतः सत्य भाषणके अर्थमें आता है, तब नपुंसक होता है और विशेषणरूपमें प्रयुक्त होनेपर विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गों में प्रयुक्त होता है। इसके पुल्लिङ्गरूप-सत्यः सत्यौ सत्याः-इत्यादि रामवत् है। स्त्रीलिङ्गरूप-राधाके समान हैं-सत्या सत्ये सत्याः। नपुंसकरूप-'सत्यम् सत्ये सत्यानि' हैं। शेष रामवत्। 'अनायुष्' शब्दका अर्थ है आयुहीन। पुंल्लिगमें-'अनायुः, अनायुषी, अनायुषः' इत्यादि। स्त्रीलिङ्गमें भी ये ही रूप हैं। नपुंसकलिगामें अनायुः अनायुषी अनायूंषि' इत्यादि। 'अपुंस्' का अर्थ है, पुरुषरहित। पुल्लिङ्गमें- अपुमान् इत्यादि, स्त्रीलिङ्गमें 'अपुंस्का' आदि तथा नपुंसकमें 'अपुम्' इत्यादि रूप होते हैं। मतका अर्थ है- 'अभिमत, राय' आदि। 'मतः', मता। मतम्' ये क्रमशः पल्लिङ्ग आदिके रूप हैं। 'भ्रमर का अर्थ है भौरा या घूमकर शब्द करनेवाला। पुल्लिङ्गमें भ्रमरः, स्त्रीलिङ्गमें भ्रमरी, नपुंसकमें भ्रमरम्, इत्यादि रूप होते हैं। जिसके पैर बड़े हों, वह 'दीर्घपात्' हैं। तीनों लिङ्गोंमें 'दीर्घपात्' यही प्रथम रूप है। धनाढ्य' का अर्थ है धनी। धनाढ्यः, धनाढ्या, धनाढयम्-ये क्रमशः तीनों लिङ्गोंके प्रथम रूप हैं। सोम्य' का अर्थ है शान्त, मृदु स्वभाववाला। रूप धनाढ्यके ही तुल्य है। 'अगर्ह' का अर्थ है निन्दारहित । रूप पूर्ववत् है। 'तादृश्' शब्दका अर्थ है, 'वैसा'। इसके 'तादृक् तादृशौ तादृशः' इत्यादि पुल्लिा और स्त्रीलिङ्गमें रूप होते हैं, नपुंसकमें तादृक् तादृशी तादृशि रूप होते हैं। स्वर्णका अर्थ है सोना । रूप धनाढयवत् है। तीनों लिङ्गोंमें 'बहु' के रूप क्रमश: बहवः । बयः । बहूनि इत्यादि हैं। २. प्रायः इसलिये कहा गया कि कुछ शब्दोंके रूपमें कहीं-कहीं अन्तर है। जैसे पूर्व पर अवर दक्षिण अपर उत्तर अधर-ये व्यवस्था और असंज्ञामें ही सर्वनाम माने जाते हैं। जहाँ संज्ञा हो अथवा व व्यवस्थाभिन्न अर्थमें इन शब्दों का प्रयोग हो वहाँ इनका रूप 'सर्व' शब्दके समान न होकर 'राम' शब्दके समान हो जाता है। यथा-दक्षिणा गायकाः, उत्तराः कुरवः । यहाँ दक्षिण-शब्द कुशल अर्थमें और उत्तर-शब्द देशको संज्ञामें प्रयुक्त हुए हैं। व्यवस्था और असंज्ञामें यद्यपि ये सर्वनामसंज्ञक होते हैं, तथापि प्रथमाके बहुवचनमें तथा पञ्चमी और सप्तमीके एकवचनमें इनकी सर्वनामसंज्ञा वैकल्पिक होती है। अत: उन स्थलोंमें दो-दो रूप होते हैं-एक सर्ववत् दूसरा रामवत् । यथा-'पूर्वे पूर्वाः, पूर्वस्मात्, पूर्वात्, पूर्वस्मिन् पूर्वे' इत्यादि। शेष सभी रुप सर्ववत् हैं। ज्ञाति और धन से भिन्न अर्थ में स्व शब्दका रुप भी पूर्वादि शब्दों के समान ही होता है। बाह्म और परिधानीय(पहनेयोग्य वस्त्र) अर्थ में प्रयुक्त अन्तर शब्दका रुप भी पूर्वादिके ही समान होता है। डतर और डतम शब्द प्रत्यय हैं। अतः तदन्त शब्द ही यहाँ सर्वदिमें गृहीत होते हैं, यथा –यतम ततर, ततम कतर कतम इत्यादि।
हैं। निम्नाङ्कित शब्द अपत्यवाचक संज्ञाके रूपमें प्रयुक्त होते हैं। पाण्डव, त्रैधर, गार्ग्य, नाडायन, आत्रेय, गाङ्गेय, पैतृष्वस्रीय ॥५१॥
देवतार्थे चेदमर्थे बैन्द्र ब्राह्मो हविर्बलिः ।
क्रियायुजोः कर्मकर्बोधौरेयः कौकुम तथा ॥५२॥
निम्राङ्कित शब्द देवतार्थक और इदमर्थक प्रत्ययसे युक्त हैं। यथा-ऐन्द्रं हविः, ब्राह्मो बलि:२। क्रियामें संयुक्त कर्म और कर्तासे तद्धित प्रत्यय होते हैं-धुरं वहति इति धौरेयः। जो धुर् अर्थात् भारको वहन करे, वह धौरेय है। यहाँ धुर् शब्द कर्म है और वहन-क्रियामें संयुक्त भी है, अत: उससे 'एय' यह तद्धित प्रत्यय हुआ। आदि स्वरकी वृद्धि हुई और 'धौरेय' शब्द सिद्ध हुआ। इसी प्रकार कुकुमेन रक्तं वस्त्रम्-इसमें कुकुम शब्द 'रंगना' क्रियाका कर्ता है और वह उसमें संयुक्त भी है। अतः उससे तद्धित अण् प्रत्यय होकर आदिपदकी वृद्धि हुई और ‘कौकुम' शब्द सिद्ध हुआ॥५२॥
भवाद्यर्थे तु कानीनः क्षत्रियो वैदिकः स्वकः।
स्वार्थे चौरस्तु तुल्यार्थे चन्द्रवन्मुखमीक्षते॥५३॥
अब 'भव' आदि अर्थों में होनेवाले तद्धित प्रत्ययोंका उदाहरण देते हैं-कन्यायो भव: कानीनः । जो अविवाहिता कन्यासे उत्पन्न हुआ हो, उसे कानीन" कहते हैं। क्षत्रस्यापत्य जातिः क्षत्रियः
क्षत्रकुलसे उत्पन्न उसी जातिका बालक 'क्षत्रियों" कहलाता है। वेदे भवः वैदिकः। इक-प्रत्यय और आदि स्वरकी वृद्धि हुई है। स्व एव स्वकः । यहाँ स्वार्थमें 'क' प्रत्यय है। चोर एव चौरः, स्वार्थमें अण् प्रत्यय हुआ है। तुल्य-अर्थमें वत् प्रत्यय होता है। यथा-चन्द्रवन्मुखमीक्षते-चन्द्रमाके समान मुख देखता है। चन्द्र-वत्-चन्द्रवत् ॥५३॥
ब्राह्मणत्वं ब्राह्मणता भावे ब्राह्मण्यमेव च।
गोमानधनी च धनवानस्त्यर्थे प्रमितौ कियान्॥५४॥
भाव-अर्थमें त्व, ता और य प्रत्यय होते हैं यथा-ब्राह्मणस्य भावः ब्राह्मणत्वम्, ब्राह्मणता, ब्राह्मण्यम्। अस्त्यर्थमें मतुप् और इन् प्रत्यय होते हैं-गौः अस्यास्ति इति गोमान्। धनमस्यास्ति इति धनी (जिसके पास गौ हो, वह 'गोमान्', जिसके पास धन हो, वह 'धनी' है)। अकारान्त, मकारान्त तथा मकारोपध शब्दसे एवं झयन्त शब्दसे परे मत्के 'म'का 'व' हो जाता है-यथा धनमस्यास्ति इति धनवान्। परिमाण-अर्थमें 'इदम्', 'किम्', 'यत्', 'तत्', 'एतत्'-इन शब्दोंसे वतुप् प्रत्यय होता है, किंतु 'इदम्' और 'किम्' शब्दोंसे परे वतुप्के वकारका 'इय्' आदेश हो जाता है। दृक्, श्र, वतु-ये परे हों तो इदम्के स्थानमें 'ई' तथा 'किम् 'के स्थानमें 'कि' हो जाते हैं। किं परिमाणं यस्य स कियान्-यहाँ परिमाण-अर्थमें वतुप्-
१. इनके क्रमशः अर्थ इस प्रकार हैं-पाण्डुपुत्र, श्रीधर-पुत्र, गर्गकी संतानपरम्परा, नडगोत्रमें उत्पन्न संतान, अत्रि-पुत्र, गङ्गापुत्र (भीष्म) तथा बुआका पुत्र । यहाँ प्रथम दोमें अण, तीसरेमें यञ्, चौथेमें आयन, पाँचवें, छठेमें एय और सातवेंमें ईय प्रत्यय हुए हैं। प्रत्येकमें आदि स्वरकी वृद्धि हुई है। तद्धित शब्दोंमें 'कृत्तद्धितसमासाश्च' (कृदन्त, तद्धितान्त और समासकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है) इस नियमसे प्रातिपदिक संज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं। २. ऐन्द्रं हविः का अर्थ है-इस हविष्यके देवता इन्द्र हैं। ब्राह्मो वलिः का अर्थ है-यह ब्रह्माके लिये वलि है। एकमें देवता-अर्थमें अण् प्रत्यय हुआ है और दूसरेमें 'तस्य इदम्' (उसका यह) इस अर्थमें अण् प्रत्यय हुआ है। दोनोंमें आदि स्वरकी वृद्धि हुई है।
३.महर्षि व्यास और कर्ण कानीन थे। कन्या-शब्दसे अण् होनेपर कन्या-शब्दके स्थानमें कनीन आदेश होता है और आदिपदकी वृद्धि होनेसे कानीन बनता है। ४. क्षत्र+इय-क्षत्रियः । 'त्र' के 'अ' का लोप होकर वह 'इय' के 'इ' में मिला है। ५. मतुप्में उप्का लोप हो जाता है, फिर धीमान्-शब्दकी तरह रूप चलते । धनिन् शब्दका रुप दण्डिन्-शब्दके समान समझना चाहिये।
प्रत्यय, इयादेश तथा 'कि'-भाव करनेसे कियान् बनता है। इसका अर्थ है-'कितना ॥५४॥
जातार्थे तुंदिलः श्रद्धालुरौन्नत्ये तु दन्तुरः।
सम्वी तपस्वी मेधावी मायाव्यस्त्यर्थ एव च॥५५॥
अब जातार्थमें होनेवाले प्रत्ययोंका उदाहरण देते हैं। तुन्दः संजातः अस्य तुन्दिलः । जिसको तोंद हो जाय, उसे 'तुन्दिल' कहते हैं। तुन्द+इल तुन्दिल। श्रद्धा संजाता अस्य इति श्रद्धालुः। श्रद्धा+आलु। (इसी प्रकार दयालु, कृपालु आदि बनते हैं।) दाँतोंकी ऊँचाई व्यक्त करनेके लिये दन्त शब्दसे उर-प्रत्यय होता है। उन्नताः दन्ता अस्य इति दन्तुरः (ऊँचे दाँतवाला)। अस्, माया, मेधा तथा स्र-इन शब्दोंसे अस्त्यर्थमें विन् प्रत्यय होता है। इनके उदाहरण क्रमसे तपस्वी, मायावी, मेधावी (बुद्धिमान्) और स्त्रग्वी हैं। स्रग्वीका अर्थ माला धारण करनेवाला है॥५५॥
वाचालश्चैव वाचाटो बहुकुत्सितभाषिणि।
ईषदपरिसमाप्तौ कल्पब्देशीय एव च ॥५६॥
खराब बातें अधिक बोलनेवालेके अर्थमें वाच् शब्दसे 'आल' और 'आट' प्रत्यय होते हैं। कुत्सितं बहु भाषते इति वाचालः, वाचाटः । ईषत् (अल्प) और असमाप्तिके अर्थमें कल्पप्, देश्य और देशीय प्रत्यय होते हैं ।।५६॥
कविकल्प: कविदेश्यः प्रकारवचने तथा।
पटुजातीयः कुत्सायां वैद्यपाशः प्रशंसने॥५७॥
वैद्यरूपो भूतपूर्वे मतो दृष्टचरो मुने।
प्राचुर्यादिष्वन्नमयो भून्मयः स्वीमयस्तथा ॥५८॥
जैसे-ईषत् उतः कविः कविकल्पः, कविदेश्य. कविदेशीयः । जहाँ प्रकार बतलाना हो, वहाँ किम् और सर्वनाम आदि शब्दोंसे 'था' प्रत्यय होता है तेन प्रकारेण तथा । तत्या-तथा। त्यदादि शब्दोंका अन्तिम तल, निवृत्त होकर वे अकारान्त हो जाते है, विभक्ति परे रहनेपर। (था, दा, त्र, तस् आदि प्रत्यय विभक्तिरूप माने गये हैं)। इस नियमके अनुसार तत्के स्थानमें त हो जानेसे 'तथा' बना। जहाँ किसी विशेष प्रकारके व्यक्तिका प्रतिपादन हो, वहाँ जातीय प्रत्यय होता है। यथा-पटुप्रकार:- पटुजातीयः। पटु-शब्दसे जातीय प्रत्यय हुआ। किसीकी हीनता प्रकाशित करनेके लिये संज्ञाशब्दसे पाश प्रत्यय होता है। जैसे-कुत्सितो वैद्य: वैद्यपाशः (खराब वैद्य) । प्रशंसा-अर्थमें रूप प्रत्यय होता है। यथा--प्रशस्तो वैद्यः वैद्यरूप: (उत्तम वैद्य)। मुनिवर नारदजी ! भूतपूर्व अर्थको व्यक्त करनेके लिये चर प्रत्यय होता है। यथा- पूर्वं दृष्टो दृष्टचरः (पहलेका देखा हुआ)।
प्राचुर्य (अधिकता) और विकारार्थ आदि व्यक्त करनेके लिये मय प्रत्यय होता है। जैसे- अन्नमयो यज्ञः। जिसमें अधिक अन्न व्यय किया जाय, वह अन्नमय यज्ञ है। यहाँ अन्न-शब्दसे मयट् प्रत्यय हुआ। इसी प्रकार मृन्मयः अश्वः (मिट्टीका घोड़ा) तथा स्त्रीमयः पुरुषः इत्यादि उदाहरण समझने चाहिये ।। ५७-५८।।
जाताथै लजितोऽत्यर्थे श्रेयाज्छेष्ठश्च नारद।
कृष्णतर: शुक्लतमः किम् आख्यानतोऽव्ययात्॥५९॥
किन्तरां चैवातितरामपि ह्युच्चैस्तरामपि ।
परिमाणे जानुदनं जानुद्वयसमित्यपि॥६०॥
जात-अर्थमें तारकादि शब्दोंसे इत प्रत्यय होता है। यथा-लज्जा संजाता अस्य इति लज्जितः . (जिसके मनमें लज्जा पैदा हो गयी हो, उसे लजित कहते हैं)। नारदजी। यदि बहुतोंमेंसे किसी एकको अधिक विशेषता बतानी हो तो तम और इष्ट प्रत्यय होते हैं और दोमेसे एककी विशेषता बतलानी हो तो तर और ईयस प्रत्यार होते हैं। ईयसुमें उकार इत्संज्ञक है। अयम् एषा अतिशयेन प्रशस्यः
*ईकार और तद्धित परे रहनेपर असंज्ञक हवर्ण और अवर्णका लोप हो जाता है, इस नियमके अनुसार लज्जा+इत इस स्थिति में अ का लोप हो जाता है।
श्रेष्ठः' (यह इन सबमें अधिक प्रशंसनीय है, अत: श्रेष्ठ है)। द्वयोः प्रशस्य श्रेयान् (दोमेंसे जो एक अधिक प्रशंसनीय है, वह श्रेयान् कहलाता है। यहाँ भी प्रशस्य+ईयस्-श्रेयस् (पूर्ववत् श्र आदेश हुआ)। इसके रूप इस प्रकार हैं-श्रेयान् श्रेयांसौ श्रेयांसः । श्रेयांसम् श्रेयांसौ श्रेयसः । श्रेयसा श्रेयोभ्याम् श्रेयोभिः इत्यादि। इसी प्रकार जो दोमेंसे एक अधिक कृष्ण है, उसे कृष्णतर और जो बहुतोंमेंसे एक अधिक शुक्ल है, उसे शुक्लतम कहते हैं। कृष्ण+तर कृष्णतर । शुक्ल+तम-शुक्लतम। किम्, क्रियावाचक शब्द (तिङन्त) और अव्ययसे परे जो तम और तर प्रत्यय हैं, उनके अन्तमें आम् लग जाता है। उदाहरणके लिये किंतराम्, अतितराम् तथा उच्चस्तराम् इत्यादि प्रयोग हैं। प्रमाण (जल आदिके माप) व्यक्त करनेके लिये द्वयस, दघ्र और मात्र प्रत्यय होते हैं। जानु प्रमाणम् अस्य इति जानुदनं जलम् (जो घुटनेतक आता हो, उस जलको जानुदघ्र कहते हैं) जानु-दघ्न-जानुदघ्र। इसी प्रकार जानुद्वयसम् और जानुमात्रम्-ये प्रयोग भी होते हैं ।। ५९-६०॥
जानुमात्रं च निद्धरिबहूनां च द्वयोः क्रमात्।
कतमः कतरः संख्येयविशेषावधारणे॥६१॥
द्वितीयश्च तृतीयश्च चतुर्थः षष्ठपञ्चमौ।
एकादशः कतिपयथः कतिथः कति नारद॥६२॥
दोमेसे एकका और बहुतोमेसे एकका निश्चय करनेके लिये किम्' 'यत्' और 'तत्' शब्दोंसे क्रमश: इतर और डतम प्रत्यय होते हैं। यथा- भवतो: कतर: श्यामः (आप दोनोंमें कौन श्याम है?) भवतां कतमः श्रीरामः? (आपलोगोंमें कौन श्रीराम हैं?)। संख्या (गणना) करनेयोग्य वस्तुविशेषका निश्चय करनेके लिये द्वि-शब्दसे द्वितीय, त्रि-शब्दसे तृतीय, चतुर्-शब्दसे चतुर्थ और षष्-शब्दसे षष्ठ रूप बनते हैं। इनका अर्थ क्रमश: इस प्रकार है-दूसरा, तीसरा, चौथा और छठा। पञ्चन्, सप्तन्, अष्टन, नवन् और दशन्- इन शब्दोंके 'न्' कारको मिटाकर 'म'कार बढ़ जाता है, जिससे पञ्चम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम रूप बनते हैं। एकादशन्से अष्टादशन्तक उक्त अर्थमें 'न्' कारका लोप होकर सभी शब्द अकारान्त हो जाते हैं, जिनके 'राम' शब्दके समान रूप होते हैं। यथा एकादशः द्वादश: इत्यादि। नारदजी! कति और कतिपय शब्दोंसे ध-प्रत्यय होता है, जिससे कतिथ: और कतिपयधः पद बनते हैं॥६१-६२ ॥
विंशश्च विंशतितमस्तथा शततमादयः।
द्वेधा द्वैधा द्विधा संख्या प्रकारेऽथ मुनीश्वर ।। ६३॥
बीसवेंके अर्थमें विंशः और विंशतितमः- ये दो रूप होते हैं। शत आदि संख्यावाचक शब्दोंसे (तथा मास, अर्धमास एवं संवत्सर शब्दोंसे) नित्य 'तम प्रत्यय होता है। यथा-शततमः (एकशततमः, मासतमः, अर्धमासतमः, संवत्सरतमः)। मुनीश्वर! क्रियाके प्रकारका बोध करानेके लिये संख्यावाचक
१. प्रशस्य- इठ-श्रेष्ठ (प्रशस्य-शब्दके स्थानमें 'न आदेश हो जाता है, फिर गुण करनेसे श्रेष्ठ-शब्द बनता है)।
२. किम्-डतर, किम् इतम। यहाँ डकार इत्संज्ञक है। डित् प्रत्यय परे रहनेपर पूर्ववर्ती शब्दके टिभागका लोप होता है। अन्तिम स्वर और उसके बादके हल अक्षर भी 'टि' कहलाते हैं। 'किम्' में 'क' छोड़कर 'इम्' भाग 'टि' है। उसका लोप हुआ। क्+अतर-क्+अतम मिलकर 'कतर' और 'कतम' शब्द बने। इसी प्रकार यतर, यतम, ततर, ततम-ये शब्द भी बनते हैं। ३. 'त्रि+तीय' इस अवस्थामें 'त्रि' के स्थानमें सम्प्रसारण-पूर्वख्य होकर 'तृतीय' रूप बनता है। ४. इससे आगेकी सभी संख्याओंमें इसी प्रकारके दो रूप होते है। साठवेक अर्थमें केवल 'षष्टितम' शब्द बनता है। उससे आगेकी संख्याओंमें भी यदि आदिमें दूसरी संख्याका प्रयोग न हो तो केवल तम प्रत्ययका विधान है। यथा-सप्ततितमः, अशीतितम नवतितमः इत्यादि। आदिमें संख्या लग जानेपर तो 'विंशः विंशतितमः' की भाँति दो-दो रूप होते ही हैं-अस एकषष्टः एकषष्टितमः इत्यादि।
शब्दसे स्वार्थमें 'धा' प्रत्यय होता है-जैसे (एकधा) द्विधा, त्रिधा इत्यादि ॥६३॥
क्रियावृत्तौ पञ्चकृत्वो द्विस्बिर्बहुश इत्यपि।
द्वितयं त्रितयं चापि संख्यायां हि द्वयं त्रयम्॥६४॥
क्रियाकी आवृत्तिका बोध करानेके लिये कृत्वस प्रत्यय होता है और 'स्' कारका विसर्ग हो जाता है। यथा-पञ्चकृत्वः (पाँच बार), द्वि:, त्रि: (दो बार, तीन बार)। बहु-शब्दसे 'धा, शस् एवं कृत्वस्' तीनों ही प्रत्यय होते हैं-यथा बहुधा, बहुशः, बहुकृत्वः । संख्याके अवयवका बोध करानेके लिये 'तय' प्रत्यय होता है। उदाहरणके लिये द्वितय, त्रितय, चतुष्टय और पञ्चतय आदि शब्द हैं। द्वि और त्रिशब्दोंसे आगे जो 'तय' प्रत्यय है, उसके स्थानमें विकल्पसे अय हो जाता है; फिर द्वि और त्रि शब्दके इकारका लोप होनेसे द्वय, त्रय शब्द बनते हैं। ६४॥
कुटीरश्च शमीरश्च शुण्डारोऽल्पार्थके मतः ।
स्त्रैण: पाँस्नस्तुण्डिभश्च वृन्दारककृषीवलौ॥६५॥
कुटी, शमी और शुण्डा शब्दसे छोटेपनका बोध करानेके लिये 'र' प्रत्यय होता है। छोटी कुटीको कुटीर कहते हैं। कुटी +र =कुटीरः। इसी प्रकार छोटी शमीको शमीर और छोटी शुण्डाको शुण्डार कहते हैं। शुण्डा शब्द हाथीकी सैंड और मद्यशाला (शराबखाने) का बोधक है। स्त्री और पुंस् शब्दोंसे नञ् प्रत्यय होता है। आदि स्वरकी वृद्धि होती है। ञकार इत्संज्ञक है। नके स्थानमें ण होता है। इस प्रकार स्वैण शब्द बनता है। जिस पुरुषों स्वीका स्वभाव हो तथा जो स्त्रीमें अधिक आसक्त हो, उसे स्त्रैण कहते हैं। पुस्+न, आदिवृद्धि-पाँस्न (पुरुषसम्बन्धी)। तुण्डि आदि शब्दोंसे अस्त्यर्थमें 'भ' प्रत्यय होता है। तुण्डि+भ-तुण्डिभः (बढ़ी हुई नाभिवाला)। शृङ्ग और वृन्द शब्दोंसे अस्त्यर्थमें 'आरक' प्रत्यय होता है। शृङ्ग+आरक- शृङ्गारक: (पर्वत)। वृन्द आरक- बृन्दारकः (देवता)। रजस् और कृषि आदि शब्दोंसे 'बल' प्रत्यय होता है, रजस्वला स्त्री, कृषीवल: (किसान)॥६५ ।।
मलिनो विकटो गोमी भौरिकिबिधमुत्कटम्।
अवटीटोऽवनाटश्च निविडं चेक्षुशाकिनम्।। ६६ ।।
निविरीसमैषुकारिभक्तं विद्याचणस्तथा।
विद्याचञ्चुर्बहुतिथं पर्वतः शृङ्गिणस्तथा ।। ६७ ।।
स्वामी विषम रूप्यं चोपत्यकाधित्यका तथा ।
चिल्लश्च चिपिटंचिक्कं वातूलं कुतुपस्तथा ॥६८ ॥
बलूलश्च हिमेलुश्च कहिकश्वोपडस्ततः।
ऊर्णायुश्च मरुत्तश्चैकाकी चर्मण्वती तथा॥६९॥
ज्योत्स्ना तमिस्राऽष्टीवच्च कक्षीवद्रुमण्वती।
आसन्दीवच्च चक्रीवत्तूष्णीकां जल्पतक्यपि ॥७०॥
मल-शब्दसे अस्त्यर्थमें इन प्रत्यय होता है। मलम् अस्यास्ति इत्रि मलिन: (मलयुक्त)। मल इन अकार-लोप-मलिन। सम्, प्र, उद् और वि- इनसे कट प्रत्यय होता है,-यथा संकटः, प्रकटः, उत्कटः, विकटः। गो-शब्दसे मिन्-प्रत्यय होता है। अस्त्यर्थम-गो-मिन्-गोमी (जिसके पास गौएँ हों, वह पुरुष) ज्योत्स्ना (चाँदनी), तमित्रा (अंधेरी रात), वृहिण, मझवाला), उर्जस्विन (ओजस्वी), जैस्वाल, गामिन्, मलिन और मलीमस (मलिन)-
१. द्वि और त्रि शब्दोंके इकारका विकल्पसे एकार भी हो जाता है। यथा- -वधा, त्रेधा। द्वि और त्रि शब्दों से 'धम्' प्रत्यय और आदिस्वरकी वृद्धि-ये दो कार्य और भी होते हैं। यथा- -द्वैधम, धम्।
२. था, धा, त्र, तस्, कृत्वस् आदि प्रत्यय जिन शब्दोंके अन्त में लगते हैं, वे तद्धितान्त अव्यय माने जाते है। ३. वि. त्रि और चतुर् शब्दोंसे कृत्वस् न होकर केवल 'सुच्' प्रत्यय होता है। इसमें केवल 'स' रहता है और 'उ'कार तथा 'च'कारको 'इत्संज्ञा' हो जाती है। प्रयोगमें सकारका विसर्ग हो जाता है। चतुर-शब्दके आगे सस'का लोप होता है और 'र' का विसर्ग हो जा है। इस प्रकार क्रमश: द्वि: त्रि: चतु:-ये रूप बनते हैं। ये तीनों अव्यय है।
ये शब्द मत्वर्थमें निपातनसिद्ध है। भौरिकिविधम्' इसकी व्युत्पत्ति यों है-भौरिकीणां विषयो देश:- भौरिकिविधम् (भौरिकि नामवाले वर्ग-विशेषके लोगोंका देश)। ऐषुकारीणाम् विषयो देश:- ऐष्कारिभक्तम् (ऐषुकारि-बाण बनानेवाले लोगोंका देश)। इन दोनों उदाहरणों में क्रमश: 'विध' एवं 'भक्त' प्रत्यय हुए हैं। भौरिक्यादि तथा ऐषुकार्यादि शब्दोंसे 'विध' एवं 'भक्त' प्रत्यय होनेका नियम है। उत्कटम्-इसकी सिद्धिका नियम पहले बताया गया है, नासिकाकी निचाई व्यक्त करनेके लिये अव' 'उपसर्गसे' 'टीट', 'नाट' और 'भ्रट' प्रत्यय होते हैं। तथा नि उपसर्गसे 'विड' और 'विरीस' प्रत्यय होते हैं। इसके सिवा 'नि'से 'इन' और 'पिट' प्रत्यय भी होते हैं। 'इन'-प्रत्यय परे होनेपर "नि के स्थानमें चिक् आदेश हो जाता है और 'पिट 'प्रत्यय परे होनेपर 'नि के स्थानमें 'चि' आदेश होता है । मूलोक्त उदाहरण इस प्रकार हैं-
अवटीटः, अवनाट: (अवभ्रटः)-नीची नाकवाला पुरुष। निविडम् (नीची नाक), निविरीसम् चिकिनम् चिपिटम्, चिक्कम्-इन सबका अर्थ नीची नाक है। जिसके आँखसे पानी आता हो, उसको 'चिल्ल' और 'पिल्ल' कहते हैं। ल प्रत्यय है और क्लित्र- शब्द प्रकृति है-जिसके स्थानमें चिल्ल और पिल्ल आदेश हुए हैं। पैदा करनेवाले खेतके अर्थमें पैदावार- वाचक शब्दसे शाकट और शाकिन प्रत्यय होते हैं। जैसे 'इक्षुशाकटम्' 'इक्षुशाकिनम्'। उसके द्वारा विख्यात है, इस अर्थमें चञ्चु और चण प्रत्यय होते हैं। जो विद्यासे विख्यात है, उसे 'विद्याचण' और 'विद्याचक्षु' कहते हैं। बहु आदि शब्दोंसे 'विथ' प्रत्यय होता है, पूरण अर्थमें। बलों पूरणम् इति=बहुतिथम्। श्रृङ्गिण-शब्द पर्वतका वाचक है. इसे निपात सिद्ध बताया जा चुका है। ऐश्चर्यवाचक स्व-शब्द से आमिन् प्रत्यय होता है- स्व+आमिन्= स्वामी(अधीश्वर या मालिक)। रुप शब्दसे आहत और प्रशंसा अर्थमें 'य' प्रत्यय होता है। यथा विषमम्, आहतं वा रूपमस्यास्तीति- रूप्य: कार्षापण: (खराब पैसा), रूप्यम् आभूषणम् (खराब आभूषण) इत्यादि।'उप' और 'अधि' से त्यक प्रत्यय होता है, क्रमश: समीप एवं ऊँचाईकी भूमिका बोधक होनेपर। पर्वतके पासकी भूमिको 'उपत्यका' (तराई) कहते हैं और पर्वतके ऊपरकी (ऊँची) भूमिको 'अधित्यका' कहते हैं। 'वात' - शब्दसे 'ऊल' प्रत्यय होता है, असहन एवं समूहके - अर्थमें। वातं न सहते वातूलः । जो हवा न सह सके, वह 'वातूल' है । वात+ऊल, अलोप-वातूलः । वातके समूह (आँधी)-को भी 'वातूल' कहते हैं। 'कुतू' शब्दसे 'डुप' प्रत्यय होता है, डकार इत्संज्ञक, २ टिलोप । ह्रस्वा कुतू: कुतुप: (चमड़ेका तैलपात्र-: कुप्पी)। बलं न सहते (बल नहीं सहता)-इस अर्थमें बल-शब्दसे 'ऊल'-प्रत्यय होता है। बल+ऊल-बलूल: । हिमं न सहते (हिमको नहीं सहता) इस अर्थमें हिमसे एलु प्रत्यय होता है। हिमएलु-हिमेलुः। अनुकम्पा-अर्थमें मनुष्यके नामवाचक शब्दसे 'इक' एवं 'अड' आदि प्रत्यय होते हैं तथा स्वरादि प्रत्यय परे रहनेपर पूर्ववर्ती शब्दके द्वितीय स्वरसे आगेके सभी अक्षर लुप्त हो ल जाते हैं। यदि द्वितीय स्वर सन्धि-अक्षर हो तो उसका भी लोप हो जाता है। इन सब नियमोंके अनुसार ये दो उदाहरण हैं-अनुकम्पितः रा कहोड:-कहिकः । अनुकम्पित: उपेन्द्रदत्त:-उपडः । का अर्थ है ऊनवाला जीव (भेड़ आदि) पर अथवानी कम्बल आदि।' ऊर्जा से युस् प्रत्यय होकर उयु' बना है। पर्व और मरुत् शब्दोसे कम प्रत्यय होता है। पर्वत पर्वत (पहाड़)। है. मस्त मान (मरुआ नामक पौधा अथवा महाराज महरुत्त)। एक शब्द से असहाय- अर्थमें आकिन् कन् और उसका लुक्, ये तीनों कार्य बारी-बारी से होते हैं। एक+आकिन्= एकाकी। एक+क=एककः।
कन् का लोप होनेपर एकः। इन सबका अर्थ-अकेला, असहाय है। चर्मण्वती एक नदीका नाम है। (इसमें चर्मन् शब्दसे मतुप, मकारका वकारादेश नलोपका अभाव और णत्व आदि कार्य निपातसिक हैं। स्त्रीलिङ्गबोधक डीप् प्रत्यय हुआ है)। ज्योत्स्ना और 'तमिस्रा' निपात-सिद्ध हैं, यह बात गोमीके प्रसङ्गमें कही गयी है। इसी प्रकार अष्ठीवत्, कक्षीवत रुमण्वत्, आसन्दीवत् तथा चक्रीवत्-ये शब्द में निपात-सिद्ध हैं। यथा-आसन्दीवान् ग्रामः, अष्ठीवा-नाम ऋषिः, चक्रीवान् नाम राजा, कक्षीवान् नाम ऋषिः, रुमण्वान् नाम पर्वतः । तूष्णी शब्दसे काम प्रत्यय होता है, अकच्के प्रकरणमें। तूष्णीकाम आस्ते (चुप बैठता है)। मित् कार्य अन्तिम स्वरके बाद होता है। तिङन्त, अव्यय और सर्वनाम 'टि' के पहले अकच होता है, चकार इत्संज्ञक है इस नियमके अनुसार 'जल्पति' इस तिङन्त पदके इकारसे पहले अकच होनेसे 'जल्पतकि' (बोलत है) रूप बनता है ।। ६६-७० ॥
कंव: कम्भश्च कंयुश्च कन्ति: कन्तुस्तथैव च ।
कन्तः कंयश्च शंवश्च शम्भः शंयुस्तथा पुनः॥७१।।
शन्तिः शन्तुः शन्तशंयौ तथास्युः शुभंयुवत्।
कम् और शम्-ये मकारान्त अव्यय हैं। कम्का अर्थ जल और सुख है, शम्का अर्थ सुख है। इन दोनोंसे सात प्रत्यय होते हैं-व, भ, युस्, ति, तु, त और यस्। युस् और यस्का सकार इत्संज्ञक है। इन सबके उदाहरण क्रमश: इस प्रकार हैं-
कंव:, कम्भः, कंयुः, कन्तिः, कन्तुः, कन्तः, केयः शवः, शंभः, शंयुः, शन्तिः, शन्तुः, शन्तः, शेयः आइम्-यह मकारान्त अव्यय अहंकारके अर्थमें प्रयुक्त होता है और शुभम् -यह मकारान्त अव्यय शुभ-अर्थमें है। इसे 'गुस्' प्रत्यय होता है, सकार इत्सक है। अहम् यु-अपुः । अहंकारवान्), शुभम्+यु=शुभंयुः (शुभपुक पुरुष)।। ७१।।
भवति बभूव भविता भविष्यति भवत्वभवद्धवेच्चापि।। ७२।।
भूयादभूदभविष्यल्लादावेतानि रुपाणि।
अत्ति जघासात्तात्स्यत्यत्त्वाददद्याविरघसदात्स्यत् ॥७३।।
(अब तिङन्तप्रकरण प्रारम्भ करके कुछ धातुके रूपोंका दिग्दर्शन कराते हैं। वैयाकरणोंने दस प्रकारके धातु-समुदाय माने हैं, उन्हें 'नवगणी या दसगणी' के नामसे जाना जाता है। उनके नाम हैं-भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, व्यादि तथा चुरादि। भ्वादिगणके सभी धातुओंके रूप प्रायः एक प्रकार एवं एक शैलीके होते हैं, दूसरे-दूसरे गणोंके धातु भी अपने-अपने ढंगमें एक ही तरहके होते हैं। यहाँ सभी गणोंके एक-एक धातुके नौ लकारोंमें एक-एक रूप दिया जाता है। शेष धातु और उनके रूपोंका ज्ञान विद्वान् गुरुसे प्राप्त करना चाहिये।) 'भू' धातुके लट् लकारमें 'भवति भवतः भवन्ति' इत्यादि रूप बनते हैं। लिट् लकारमें 'बभूव बभूवतुः बभूवुः' इत्यादि, लुट्में 'भविता भवितारौ भवितारः' इत्यादि, लट्में 'भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति' इत्यादि, लोट्में 'भवतु भवतात् भवताद्, भवताम् भवन्तु इत्यादि, लङ्लकारमें अभवत् अभवताम् अभवन्' इत्यादि। विधिलिङमें 'भवेत् भवेताम् भवेयुः' इत्यादि, आशिष लिङ्में भूयात् ' भूयास्ताम् भूयासुः' इत्यादि लुङ्में 'अभूत् अभूताम् अभूवन्' इत्यादि तथा लुङ् लकारमें 'अभविष्यत् अभविष्यताम् अभविष्यन्' इत्यादि-
ये सब रूप होते हैं। 'भू' धातुका अर्थ सत्ता है, 'भवति'का अर्थ होता है-ऐसा किया जाता है। अब अदादि गणके 'अद्' धातुका पूर्ववत् प्रत्येक लकारमें एक-एक रूप दिया जाता है, अद्' धातु भक्षण अर्थम प्रयुक्त होता है। अत्ति। जघास। अत्ता। अत्स्यति। अतु। आदत् । अद्यात्। अद्यात्। अघसत्। आत्स्यत् ।। ७२-७३ ।।
जुहाति जुहाव जुहवाञ्चकार होता होध्यति जुहोतु।
अजुहानदयावादहीपीदहोण्यहीव्यति
दिदेव दियिता हैविध्यति तीच्या नादीमहीयेहीव्या ॥७४॥
अदेचीददेविष्यत्सुनोति सुषाव सोता सोष्यति वै।
सुनोत्वसुनोत् सनुयात्सूयादसावीदसोष्यत् तुदति च॥७५॥
तुतोद तोत्ता तोत्स्यति तुदत्वतुदतुदेत्तुद्याद्धि।
अतौत्सीदतोत्स्यदिति च रुणद्धि रुरोध रोद्धा रोल्पति वै॥७६॥
रुणवरुणद्गुन्ड्याद्रुष्यादरौत्सीदरोत्स्यच्च
तनोति ततान तनिता तनिष्यति तनोत्वतनोत्तनुयाद्धि॥७७॥
तन्यादतनीच्चातानीदतनिष्यत् क्रीणाति चिक्राय क्रेता
क्रेष्यति क्रीणात्विति च। अक्रीणात् क्रीणीयात्
क्रीयादषीदकेष्यच्चोरयति चोरयामास चोरयिता
चोरयिष्यति चोरयत्वचोरयच्चोरयेच्चोर्याद-
चूचुरदचोरयिष्यदित्येवं दश वै गणाः ॥७८॥
जुहोत्यादि गणमें 'हु' धातु प्रधान है। इसका प्रयोग अग्निमें आहुति डालनेके अर्थमें या देवताको तृप्त करनेके अर्थ में होता है। इसका प्रत्येक लकारमें रूप इस प्रकार है-जुहोति । जुहाव, जुहवाञ्चकार, जुहवाम्बभूव, जुहवामास । होता । होष्यति । जुहोतु । अजुहोत्। जुहुयात् । हूयात्। अहौषीत्। अहोष्यत् । दिवादि गणमें 'दिव' धातु प्रधान है। इसके अनेक अर्थ हैं-क्रीडा, विजयको इच्छा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्ति और गति। इसके रूप पूर्ववत् विभिन्न लकारों में इस प्रकार हैं- दीव्यति । दिदेव। देचिता। देविष्यति। दीव्यतु । अदीव्यत्। दोव्येत् । दीव्यात् । अदेवीत् । अदेविष्यत् । स्वादिगणमें 'सु' धातु प्रधान है। यह मूलतः 'षुञ्' धातुके नामसे प्रसिद्ध है। इसका अर्थ है अभिषय अर्थात् नहलाना, रस निचोड़ना, नहाना एवं सोमरस निकालना। रुप इस प्रकार हैं- सुनोति। सुघाव। सोता। सोष्यति । सुनोतु । असुनोत् । सुनुयात् । सूयात्। असावीत्। असोष्यत्। ये परस्मैपदके रूप हैं; आत्मनेपदमें सुनुते, 'सुषुवे' इत्यादि रूप होते हैं। तुदादिगणमें 'तुद्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है पीड़ा देना। रूप इस प्रकार हैं-तुदति। तुतोद। तोत्ता। तोत्स्यति। तुदतु। अतुदत्। तुदेत् । तुद्यात् । अतौत्सीत्। अतोत्स्यत्। रुधादिगणमें 'रुध्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है-ऊँधना, बाड़ लगाना, घेरा डालना या रोकना । रूप इस प्रकार हैं-रुणद्धि। स्रोध । रोद्धा। रोत्स्यति । रुणद्ध। अरुणत्। रुथ्यात्। रुद्धयात्। अरौत्सीत्। अरोत्स्यत्। तनादिगणमें 'तन्' धातु प्रधान है। इसका अर्थ है विस्तार करना, फैलाना; रूप इस प्रकार हैं-तनोति । ततान । तनिता । तनिष्यति । तनोतु। अतनोत् । तनुयात् । तन्यात्। अतनीत्, अतानीत्। अतनिष्यत् । यादिमें क्री-धातु प्रधान है-जिसका अर्थ है खरीदना, एक द्रव्य देकर दूसरा द्रव्य लेना। रूप इस प्रकार हैं-क्रीणाति। चिक्राय । क्रेता। क्रेष्यति । क्रोणातु । अक्रीणात् क्रीणीयात्। क्रीयात्। अक्रैषीत् । अक्रेष्यत्। चुरादिगणमें 'चुर्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है चुराना; रूप इस प्रकार हैं-चोरयति । चोरयामास, चोरयाञ्चकार, चोरयाम्बभूव। चोरयिता। चोरयिष्यति । चोरयतु। अचोरयत्। चोरयेत् । चोर्यात् । अचूचुरत्।अचारयिष्यत् । इस प्रकार ये धातुओंके दस गुण माने हैं ॥७४-७८ ॥
प्रयोजके भावयति सनीच्छायां बभूषति ।
क्रियासमधिहारे तु पण्डितो बोभूयते मुने ॥ ७९॥
१. यह उभयपदीय धातु है। मूलमें केवल परस्मैपदीय रूप दिया गया है। इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है-रुन्धे। रुरुधे। रोद्धा। रोत्स्यते। रुन्धाम्। अरुन्ध। रुन्धीत। रोत्सोष्ट । अरुद्ध। अरोत्स्यत ।
२. यह भी उभयपदीय धातु है। इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है-तनुते। तेने। तनिता। तनिष्यते। तनुताम्। अतनुत। तन्वीत। तनिषीष्ट। अतत, अनिष्ट। अतनिष्यत।
३. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है-क्राणीत। चिक्रिये। क्रेता। क्रेष्यते। क्रीणीताम्। अक्रीणीत । कोणीत। क्रेषोष्ट। अनेष्ट। अक्रेष्यत ।
४. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है-चौरयते। चोरयाशके, चोरयामासे, चोरयाम्बधूवे। चोरयिता। चौरयिष्यते। चोरयताम्। अचोरयत। चोरयेत। चोरयिषीष्ट। अचूचुरत। अचोरयिष्यत।
प्रयोजकके व्यापारमें प्रत्येक धातुसे णिच् प्रत्यय होता है। 'च'कार और 'ण'कार इत्संज्ञक हैं। णिच् प्रत्यय परे रहनेपर स्वरान्त अङ्गकी वृद्धि होती है। भू से णिच् करनेपर धू+इ बना; फिर वृद्धि और आव् आदेश करनेपर भावि बना, उससे धातुसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर भावयति रूप बनता है। जो कर्ताको प्रेरणा दे, उसे प्रयोजक कहते हैं। जैसे-'चैत्र; पण्डितो भवति' (चैत्र पण्डित होता है), 'तं मैत्र: अध्यापनादिना प्रेरयति' (उसे मैत्र पढ़ाने आदिके द्वारा पण्डित होने में प्रेरणा देता है)। इस वाक्यमें चैत्र प्रयोज्य कर्ता है और मैत्र प्रयोजक कर्ता है। इस प्रयोजकके व्यापारमें ही णिच् प्रत्यय होता है। इसलिये उसीके अनुसार प्रथम, मध्यम आदि पुरुषको व्यवस्था एवं क्रिया होती है। प्रयोज्य कर्ता प्रयोजकके व्यापारमें कर्म बन जाता है, इसलिये उसमें द्वितीया विभक्ति होती है और प्रयोजक कामें प्रथमा विभक्ति। यथा-'मैत्रः चैत्रं पण्डितं भावयति' (मैत्र चैत्रको पण्डित बनाने में योग देता है)। इसी प्रकार अन्य धातुओंसे भी प्रेरणार्थक प्रत्यय होता है। यथा- 'छात्रः पठति, गुरुः प्रेरयति इति गुरु: छात्रं पाठयति' (छात्र पढ़ता है, गुरु उसे प्रेरित करता है; इसलिये गुरु छात्रको पढ़ाता है)।
इच्छा अर्थमें 'सन्' प्रत्यग होता है 'भविम् इच्छति बुभूषति' (होनेको इच्छा करता है)। प्रकार पठ्, गम्, आदि अन्य धातुओंसे भी इच्छा-अर्थमें पिपठिषति (पड़ने की इच्छा करता है), जिगमिषति (जाना चाहता है) इत्यादि सबल रूप होते है।मुने। क्रिया- समभिहारमें एक स्वरवाले हलादि धातुसे 'यङ्प्रत्यय' होनेपर धातुका द्वित्व होता हैं क्योंकि सन् और यङ् परे रहने पर धातु के द्वित्व होने(एक से दो हो जाने)- का नियम है। फिर धातु-प्रत्ययसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर बोभूयते रूप बनता है। यथा-'देवदत्तः पण्डितो बोभूयते' (देवदत्त बड़ा भारी पण्डित हो रहा है)। 'बार-बार' या 'अधिक' अर्थका बोध कराना ही क्रियासमभिहार कहलाता है। इस तरहके प्रयोगको यङन्त कहते हैं। पठ् और गम् आदि धातुओंसे यङ्-प्रत्यय करनेपर पापठ्यते, (बार-बार या बहुत पढ़ता है)। जङ्गम्यते (बार-बार या बहुत जाता है) इत्यादि रूप होते हैं ।। ७९ ॥
तथा यङ्लुकि विप्रेन्द्र बोभवीति च पठ्यते।
पुत्रीयतीत्यात्मनीच्छायां तथाचारेऽपि नारद।
अनुदात्तडितो धातो: क्रियाविनिमये तथा ।। ८० ॥
यङ्-प्रत्ययका लुक् (लोप होना) भी देखा जाता है। उस दशामें बोभवीति, बोभोति, पापठीति और जङ्गमीति इत्यादि रूप होते हैं। इन रूपोंको यङ्लुगन्त रूप कहते हैं। अर्थ यडन्तके ही समान | होते हैं। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति' (अपने लिये पुत्र चाहता है)। इस वाक्यसे पुत्रकी इच्छा व्यक्त होती है। ऐसे स्थलोंमें इच्छा-क्रियाके कर्मभूत शब्दसे क्यच्-प्रत्यय होता है। ककार और चकारको इत्संज्ञा होती है। उपर्युक्त उदाहरणमें पुत्र-शब्दसे क्यच्-प्रत्यय करनेपर पुत्र+य इस अवस्थामें पुत्रमें 'त्र के अकारका इ हो जाता है, फिर 'पुत्रीय' की धातुसंजा करके तिङन्तके समान रूप चलते हैं। इस प्रकार 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुत्रीयति का अर्थ है- अपने लिये पुत्र चाहता है। ऐसे प्रयोगको नामधातु कहते हैं। नारदजी! कर्मभूत उपमानवाचक शब्दसे आचार अर्थमें भी क्यच् होता है। यथा- 'पुत्रमिवाचरति पुत्रीयति छात्रम्' (गुरुजी छाबके साथ पुत्रका-सा बर्ताव करते)।
अब आत्मनेपदका प्रकरण आरम्भ करते है। जिस धातुमे अनुदात्त स्वर और ङ्कारकी इत्संज्ञा होती है, उससे आत्मनेपदके प्रत्यय होते हैं। यथा-एधते, वर्धते इत्यादि। ये अनुदात्तेत् हैं। त्रैङ् पालने-यह डित् धातु है, इसके केवल आत्मनेपदमें 'त्रायते' इत्यादि रूप होते हैं। जहाँ क्रियाका विनिमय व्यक्त होता हो, वहाँ भी आत्मनेपद होता है। यथा-व्यतिलुनीते (दूसरेके योग्य लवनरूप कार्य दूसरा करता है)।८०॥
निविशादेस्तथा विप्र विजानीयात्मनेपदम्।
परस्मैपदमाख्यातं शेषात् कर्तरि शाब्दिकैः ॥८१॥
विप्रवर! निपूर्वक 'विश्' एवं वि और परापूर्वक 'जि' इत्यादि धातुओंसे भी आत्मनेपद ही जानो यथा-निविशते, विजयते, पराजयते इत्यादि। भाव और कर्ममें प्रत्यय होनेपर भी आत्मनेपद ही होता है। आत्मनेपदके जितने निमित्त हैं, उन्हें छोड़कर शेष धातुओंसे कर्नामें परस्मैपद होता है-ऐसा वैयाकरणोंका कथन है।।८१॥
ञित्स्वरितेतश्च उभे यक्व स्याद्भावकर्मणोः।
जिन धातुओंमें 'स्वरित' और 'ञ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उनसे परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों होते हैं। यथा-' 'खनति, खनते। श्रयति श्रयते' इत्यादि।
(अव भाव-कर्म-प्रकरण आरम्भ करते हैं-) भाव और कर्ममें धातुसे यक् प्रत्यय होता है। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रिया में केवल औत्सर्गिक एकवचन होता है और सदा प्रथम पुरुषके ही एकवचनका रूप लिया जाता है। उस दशामें कर्ता तृतीयान्त होता है। भूधातुसे भाव प्रत्यय करनेपर 'भूयते' रूप होता है। वाक्यमें उसका प्रयोग इस प्रकार है-'त्वया मया अवैध भूयते।' सकर्मक धातुसे कम प्रत्यय होनेपर कर्म उत्त्क हो जाता है, अतः उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और अनुत्क कर्ता में तृतीया विभत्कि प्रयोग होता है। कर्ता के अनुसार ही क्रियामें पुरुष और वचन की व्यवस्था होती है। यथा-चैत्रः
आनन्दमनुभवति इति कर्मीणि प्रत्यये
चैत्रेणानन्दोऽनुभूयते', (चैत्रसे आनन्दका अनुभव किया जाता या आनन्द भोगा जाता है) चैत्रस्त्वामनुभवति, चैत्रेण त्वमनुभूयसे, (चैत्रसे तुम अनुभव किये जाते हो) चैत्रो मामनुभवति, चैत्रेणाहमनुभूये' (चैत्रसे मैं अनुभव किया जाता हूँ) इत्यादि उदाहरण भाव-कर्मके हैं।
सौकर्यातिशयं चैव यदा द्योतयितुं मुने॥८२॥
विवक्ष्यते न व्यापारो लक्ष्ये कर्तुस्तदापरे।
लभन्ते कर्तृतां पश्य पच्यते ह्योदनः स्वयम्॥८३॥
साध्वसिश्छिनत्त्येवं स्थाली पचति वै मुने।
धातो: सकर्मकात् कर्तृकर्मणोरपि प्रत्ययाः॥८४॥
मुने ! जब अतिशय सौकर्य प्रकाशित करनेके लिये लक्ष्यमें कतकि व्यापारकी विवक्षा नहीं रह जाती, तब्ब कर्म और करण आदि दूसरे कारक ही कर्तृभावको प्राप्त होते हैं । यथा-'चैत्रो वह्निना स्थाल्यामोदनं पचति' (चैत्र आगसे बटलोई में भात पकाता है)-इस वाक्यमें जब चैत्रके कर्तृत्वकी विवक्षा न रहे और करण आदिके कर्तृत्वकी विवक्षा हो जाय तो वे ही कर्ता हो जाते हैं और तदनुकूल क्रिया होती है। यथा-'वह्निः पचति' (आग पकाती है)। यहाँ करण ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'स्थाली पचति' (बटलोई पकाती - है)-यहाँ अधिकरण ही. कर्ताके रूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'ओदनः स्वयं पच्यते' (भात स्वयं पकता है) यहाँ कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। जब कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हो-तो काम लकार होता है; परंतु कर्मवद्भाव होनेसे यक् और आत्मनेपद आदि ही होते हैं। अत: 'पचति' न होकर 'पच्यते' रूप होता है। ऐसे प्रयोगको कर्म- कर्तृप्रकरणके अन्तर्गत मानते हैं। दूसरा उदाहरण इस प्रकार है-'असिना साभु छिनत्ति' (तलवार से अच्छी तरह काटता है)-इस वाक्यों उपर्युक्त नियमानुसार करणमें कर्तृत्वकी विवक्षा होनेपर
ऐसा वाक्य बनेगा-'साधुअसिश्छिनत्ति' (तलवार अच्छा काटती है)। मुने! सकर्मक धातु भी कर्मकर्तृमें अकर्मक हो जाता है, अत: उससे भाव तथा कर्तामें भी लकार होता है। यथा भावे-पच्यते ओदनेन। कर्तरि-पच्यते ओदनः। सम्प्रदान और अपादान कारकोंमें कर्तृत्वकी विवक्षा कभी नहीं : की जाती, क्योंकि यह अनुभवके विरुद्ध है। सामान्य स्थितिमें सकर्मक धातुसे 'कर्ता' और कर्म में प्रत्यय होते हैं ॥ ८२-८४॥
तस्माद् वाकर्मकाद्विप्र भावे कर्तरि कीर्तिताः।
फलव्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मक: ॥८५॥
धातुस्तयोर्धर्मिभेदे सकर्मक उदाहृतः।
गौणे कर्मणि दुह्यादेः प्रधाने नीहकृष्वहाम्॥८६॥ ।
बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया।
प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां ण्यन्तानां लादयो मताः ॥८७।।
विप्रवर! वही धातु यदि अकर्मक हो तो उससे 'भाव' और 'कर्ता' में प्रत्यय कहे गये हैं। सभी धातुओंके फल और व्यापार-ये दो अर्थ हैं। ये दोनों जहाँ एकमात्र कर्तामें ही मौजूद हों, उन धातुओंको अकर्मक कहते हैं। जैसे-भू धातुका अर्थ सत्ता है। सत्ताका तात्पर्य है- आत्मधारणानुकूल व्यापार। इसमें आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापार दोनों केवल कर्ता ही स्थित हैं; अत: भू-धातु अकर्मक है। जहाँ फल और व्यापार दोनों भिन्न-भिन्न धर्मोंमें स्थित हों, वहाँ धातुको सकर्मकता गया है। जैसे-'पच्' धातुका अर्थ विक्लित्यनुकूल व्यापार (चावल आदिको गलाने के अनुरूप प्रयल)। इसमें विक्लित्ति (गलना) यह फल है, जो बावलमें होता है और इसके अनुकूल जो चूल्हे में आग जलाने आदिका व्यापार है, वह कर्ता में है, अतः 'प' धातु सकर्मक हुआ है।
'दुह' आदि धातुओंके दो कर्म होते हैं। यथा- 'गां दोग्धि पयः' (गायसे दूध दुहता है)-इसमें गाय गौण कर्म है और दूध प्रधान कर्म। दुह आदि धातुओंके गौण कर्ममें ही प्रत्यय होता है। यथा-'गौर्दुह्यते पयः, बलिर्याच्यते वसुधाम्' इत्यादि। नी, इ, कृष् और वह् - इन चार धातुओंके प्रधान कर्ममें प्रत्यय होता है। यथा-'अजां ग्रामं नयति'- इस वाक्यमें अजा प्रधान कर्म और ग्राम गौण कर्म है। प्रधान कर्ममें प्रत्यय होनेपर वाक्यका स्वरूप इस प्रकार होगा-'अजा ग्रामं नीयते।' ज्ञानार्थक और भक्षणार्थक धातुओंके एवं शब्दकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनसे प्रधान या अप्रधान. किसी भी कर्ममें अपनी इच्छाके अनुसार प्रत्यय कर सकते हैं। यथा-'बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम् इति वा।' अन्य गत्यर्थक एवं अकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनके प्रयोज्य कर्ममें लकार आदि प्रत्यय माने गये हैं। यथा- 'मासमास्यते माणवकः' ॥ ८५-८७।।
फलव्यापारयोर्धातुराश्रये तु तिङः स्मृताः।
फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम्॥८८॥
धातु फल और व्यापाररूप अर्थोका बोधक होता है। जैसे-भू-धातु आत्मधारणरूम फल और तदनुकूल व्यापारका बोधक है। फल और व्यापार दोनोंका जो आश्रय है, उसमें अर्थात् कर्ता एवं कममें (तथा भावमें भी) तिङ् प्रत्यय होते हैं, फलमें व्यापारकी ही प्रधानता है, तिर्थरूप जो फल है वह उस व्यापारका विशेषण होता है। जैसे-'पचति'-इस क्रियाद्वारा चावल आदिके गलनेका प्रतिपादन होता है। यहाँ विक्लित्तिरूप फलके अनुकूल जो अग्निप्रज्वालन और फूत्कारादि व्यापार हैं, उनके आश्रयभूत कतमि प्रत्यय हुआ है। ओदम पच्यते' इत्यादिम फलानयभूत
तिङ् प्रत्यय होनेके कारण ओदनमें प्रथमा विभक्ति है।८८॥
एधितव्यमेधनीयमिति कृत्ये निदर्शनम्।
भावे कर्मणि कृत्याः स्युः कृतः कर्तरि कीर्तिताः ॥८९॥
कर्ता कारक इत्याद्या भूते भूतादि कीर्तितम्।
गप्यादि गप्ये निर्दिष्ट शेषपद्यतने पतम्॥९०॥
(अब कृदन्त-प्रकरण प्रारम्भ करते हैं-कृत्- प्रत्यय जिसके अन्तमें हो, वह कृदन्त है। ण्वुल, तृच्, अच् आदि प्रत्यय 'कृत्' कहलाते हैं। कृत्- प्रत्ययोंमेंसे जो कृत्य, क्त और खलर्थ प्रत्यय हैं, वे केवल भाव और कर्ममें ही होते हैं। तव्यत्, तव्य, अनीयर, केलिमर आदि प्रत्यय कृत्य कहलाते हैं। घञ् आदि प्रत्यय भाव, करण और अधिकरणमें होते हैं। सामान्यतः कृत्-प्रत्यय 'कर्ता' में प्रयुक्त होते हैं। यहाँ पहले कृत्य प्रत्ययोंके उदाहरण देते हैं-) एधितव्यम् और एधनीयम्-ये कृत्य प्रत्ययके उदाहरण हैं। 'कृत्य' भाव और कर्ममें तथा 'कृत्' कर्ता बताये गये हैं। त्वया मया अन्यैश्च एधितव्यम्', यहाँ भावमें तव्य और अनीयर् प्रत्यय हुए हैं। कर्ममें प्रत्ययका उदाहरण इस प्रकार समझना चाहिये। छात्रेण पुस्तकं पठनीयम् 'ग्रन्थः पठितव्यः' इत्यादि कर्ममें प्रत्यय होनेसे कर्नामें तृतीया विभक्ति और कर्ममें प्रथमा विभक्ति हुई है। कर्ता, कारक: इत्यादि ‘कृत्' प्रत्ययके उदाहरण हैं। यथा- 'रामः कर्ता' 'ब्रह्मा कारकः' यहाँ कर्तामें 'तृच्' और ‘ण्वुल्' प्रत्यय हुए हैं। 'वु के स्थानमें अक् आदेश होता है। ण, ल, च् आदिकी इत्संज्ञा होती है। 'क्त' और 'क्तवतु' ये प्रत्यय भूतकालमें होते हैं। यथा-'भूतः भूतवान्' इत्यादि, और 'गम्य' आदि शब्द भविष्यत् अर्थमें निर्दिष्ट हुए हैं। शेष शब्द वर्तमान कालमें प्रयुक्त होने योग्य माने गये हैं।। ८९-९०॥
अधिस्त्रीत्यव्ययीभावे यथाशक्ति च कीर्तितम् ।
रामाश्रितस्तत्पुरुषे धान्याचों यूपवार च॥११॥
व्याघभी राजपुरुषोऽक्षशौण्डो द्विगुरुच्यते।
पक्षगवं दशनामी त्रिफलेति तु रूढितः॥ ९२ ।।
(अब समासका प्रकरण आरम्भ करते हैं-) समास चार प्रकारके माने गये हैं-अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वन्द्व। 'तत्पुरुष' का एक विशिष्ट भेद 'कर्मधारय' और कर्मधारयका एक विशिष्ट भेद 'द्विगु' है। भूतपूर्वः इत्यादि स्थलोंमें जो समास है, उसका कोई नाम नहीं निर्देश किया जा सकता। अत: उसे कवल समासमात्र जानना चाहिये। जिसमें प्रथम पद अव्यय हो, वह समास अव्ययीभाव होता है। अथवा अव्ययीभावके अधिकारमें जो समासविधायक वचन हैं, उनके अनुसार जहाँ समास हुआ है, वह अव्ययीभाव समास है। अव्ययीभाव अव्ययसंज्ञक होता है। अतः सभी विभक्तियोंमें उसका समान रूप है। अकारान्त अव्ययीभावमें विभक्तियोंका 'अम्' आदेश हो जाता है, परंतु पञ्चमी विभक्तिको छोड़कर ऐसा होता है। तृतीया और सप्तमीमें भी अम्भाव वैकल्पिक है। यथा अपदिशम्, अपदिशे इत्यादि। अधिस्त्रि और यथाशक्ति आदि पद अव्ययीभाव समासके अन्तर्गत बताये गये हैं। द्वितीयान्तसे लेकर सप्तम्यन्त तकके पद सुबन्तके साथ समस्त होते हैं और वह समास तत्पुरुष होता है। तत्पुरुषके उदाहरण इस प्रकार हैं-रामम् आश्रित:-रामाश्रितः। धान्येन।अर्थ:-धान्यार्थ: यूपाय दारु युपदारु। व्याघ्रात्+ भी:- व्याघ्रभी: राज्ञः पुरुषः राजपुरुषः । अक्षेषु+शौण्ड:-अक्षशौण्डः इत्यादि। जिसमें यावाचक शब्द पूर्वमें हो, वह 'द्विगु' कहा गया है। पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम्।' दशानां
ग्रामाणां समाहार: दशग्रामी (यहाँ स्त्रीलिङ्गसूचक 'डी' प्रत्यय हुआ है)। 'प्रयाणां फलाना समाहारः त्रिफला' (इसमें स्वीत्वसूचक 'या' प्रत्यय हुआ है) । त्रिफला शब्द आँवले, हरे और बड़ेके लिये रूप (प्रसिद्ध) है ।।९१-९२॥
नीलोत्पलं महाषष्ठी तुल्यार्थे कर्मधारयः।
अब्राह्मणो नजि प्रोक्तः कुम्भकारादिकः कृतः॥१३॥
समानाधिकरण तत्पुरुषकी 'कर्मधारय' संज्ञा होती है। उसके दोनों पद प्रायः विशेष्य-विशेषण होते हैं। विशेषणवाचक शब्दका प्रयोग प्रायः पहले होता है। नीलं च तत् उत्पलं च-नीलोत्पलम्, महती चासौ षष्ठी च-महाषष्ठी।' जहाँ 'न' शब्द किसी सुबन्तके साथ समस्त होता है, वह 'नञ् तत्पुरुष' कहलाता है। 'न ब्राह्मण: अब्राहमणः इत्यादि। कुम्भकार आदि पोंमें 'उपपद तत्पुरुष' समास है॥१३॥
अन्यार्थे तु बहुव्रीहौ ग्रामः प्राप्तोदको द्विज।
पञ्चगू रूपवद्भार्यो मध्याह्नः समुतादिकः ॥१४॥
विप्रवर! जहाँ अन्य अर्थकी प्रधानता हो, उस समासकी बहुव्रीहिमें गणना होती है। प्राप्तम् उदकं यं स प्राप्तोदको ग्रामः' (जहाँ जल पहुँचा हो, वह ग्राम 'प्रातोदक' है)। इसी तरह-'पञ्च गावो यस्य स पञ्चगुः । रूपवती भायां यस्य स रूपवद्भार्यः।' मध्याह्न:-पद तत्पुरुष समास है। 'सुतेन सह आगतः ससुतः' आदि पद बहुव्रीहि समासके अन्तर्गत हैं॥९४।।
समुच्चये गुरुं चेशं भजस्वान्वाचये त्वट।
भिक्षामानय गां चापि वाक्यमेवानयोभवेत्॥१५॥
चार्थमें द्वन्द्व समास होता है। 'च' के चार अर्थ हैं-समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार। परस्पर निरपेक्ष अनेक पदोंका एकमें अन्वय होना 'समुच्चय' कहलाता है। समुच्चयमें 'ईशं गुरुं च भजस्व' यह वाक्य । इसमें ईश और गुरु दोनों स्वतन्त्ररूपसे 'भज' इस क्रियापदसे अन्वित होते हैं। ईश-पदका लिया के साथ अन्वय हो जानेपर पुनः क्रियापदको आवृत्ति करके गुरुपदका भी उसमें अन्वय होता है। यही उन दोनोंकी निरपेक्षता है। समास साकाङ्क्ष पदोंमें होता है। अतः समुच्चय-वाक्यमें द्वन्द्व समास नहीं होता है। जहाँ एक प्रधान और दूसरा अप्रधानरूपसे अन्वित हो, वहाँ अन्वाचय होता है-जैसे 'भिक्षामट गाञ्चानय' इस वाक्यमें भिक्षाके लिये गमन प्रधान है और गौका लाना अप्रधान या आनुषङ्गिक कार्य है। अतः एकार्थी भावरूप सामर्थ्य न होनेसे अन्वाचयमें भी दुन्द्ध समास नहीं होता। समुच्चय और अन्वाचयमें वाक्यमात्रका ही प्रयोग होता है।९५॥
इतरेतरयोगे तु रामकृष्णो समाहतौ।
रामकृष्णं द्विज द्वौ द्वौ ब्रह्म चैकमुपास्यते॥९६॥
उद्भूत अवयव-भेद-समूहरूप परस्पर अपेक्षा रखनेवाले सम्मिलित पदोंका एकधर्मावच्छिन्नमें अन्बय होना इतरेतरयोग कहलाता है। अतः इसमें सामध्यं होनेके कारण समास होता है, यथा- 'रामकृष्णौ भज' इस वाक्यमें 'रामश्च-कृष्णश्च रामकृष्णौ' इस प्रकार समास है। इतरेतरयोग द्वन्द्वमें समस्यमान पदार्थगत संख्याका समुदायमें आरोप होता है। इसलिये वहाँ द्विवचनान्त या बहुवचनान्तका प्रयोग देखा जाता है। समूहको समाहार कहते हैं। वहाँ अवयवगत भेद तिरोहित होता है । यथा-'रामश्च कृष्णाश्चेत्यनयोः समाहार: रामकृष्णम्।' समाहार द्वन्द्वमें अवयवगत संख्या समुदायमें आरोपित नहीं होती। इसलिये एकत्व- बुद्धिसे एकवचनान्तका प्रयोग किया जाता है। समाहारमें नपुंसकलिङ्ग होता है। विप्रवर । इतरेतरयोगमें राम और कृष्ण दोनों दो हैं और समाहारमें उनकी एकता है, इसलिये कि ब्रहारूपसे उन्हें एक मानकर उनकी उपासना की जाती है।। ९६।।
इति श्रीनारदीवपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाखयाने द्वितीयपादे व्याकरणनिरूपणं नाम द्विपिशाशतामोध्यायः ॥१२॥