उत्तङ्कके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति और भगवान् की आज्ञा से उनका नारायणाश्रममें जाकर मुक्त होना

नारदजीने पूछा-महाभाग! वह कौन-सा स्तोत्र था और उसके द्वारा भगवान् विष्णु किस प्रकार संतुष्ट हुए? पुण्यात्मा पुरुष उत्तङ्कजीने भगवान्से कैसा वर प्राप्त किया?

श्रीसनकजीने कहा- भगवान् विष्णुके ध्यान में तत्पर रहनेवाले विप्रवर उत्तङ्कने उस समय भगवान्के चरणोदकका माहात्म्य देखकर उनकी भक्तिभावसे स्तुति को।

उत्तङ्कजी बोले-जो सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान और उसके एकमात्र बन्धु हैं, उन आदिदेव भगवान् नारायणको मैं नमस्कार करता हूँ। जो स्मरण करनेमात्रसे भक्तजनोको सारी पीड़ा नष्ट कर देते हैं, अपने हाथोंमें चक्र, कमल, शाङ्गधनुष और खड्ग धारण करनेवाले उन महाविष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जिनकी नाभिसे प्रकट हुए कमलसे उत्पन्न होकर ब्रह्माजी इन सम्पूर्ण लोकोंक समुदायको सृष्टि करते हैं और जिनके क्रोधसे प्रकट हुए भगवान् रुद इस जगत् का संहार किया करते हैं, उन आदिदेव भगवान् को में प्रणाम करता हूँ। जो लपमोजीके पति हैं, जिनके कमलालके समान

विशाल नेत्र हैं, जिनकी शक्ति अद्भुत है, जो सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र कारण तथा वेदान्तवेद्य पुराणपुरुष हैं, उन तेजोराशि भगवान् विष्णुको मैं शरण लेता हूँ। जो सबके आत्मा, अविनाशी और सर्वव्यापी हैं, जिनका नाम अच्युत है, जो ज्ञानस्वरूप तथा ज्ञानियोंको शरण देनेवाले हैं, एकमात्र ज्ञानसे ही जिनके तत्त्वका बोध होता है, जिनका कोई आदि नहीं है, यह व्यष्टि और समष्टि जगत् जिनका ही स्वरूप है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जिनके बल और पराक्रमका अन्त नहीं है, जो गुण और जातिसे हीन तथा गुणस्वरूप हैं, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, नित्य तथा शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले हैं, वे दयासागर परमात्मा मुझे वर प्रदान करें। जो स्थूल और सूक्ष्म आदि विशेष भेदों से युक्त जगत्की यथायोग्य रचना करके अपने बनाये हुए उस जगत् में स्वयं ही अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हुए हैं, वह परमेश्वर आप ही हैं। हे अनन्त शक्ति-सम्पन्न परमातान् । वह सब जगत् आप ही हैं, क्योंकि आपरा मिन दूसरी फोई वस्तु नही है। भगवन् ! आपका जो शुद्ध स्वरूप है वह इन्द्रियातीत,

मायाशून्य, गुण और जाति निरञ्जन, निर्मल और अप्रमेय है। ज्ञानी संत-महात्मा उस परमार्थस्वरूपका दर्शन करते हैं। जैसे एक ही सुवर्णसे अनेक आभूषण बनते हैं और उपाधिके भेदसे उनके नाम और रूपमें भेद हो जाता है, उसी प्रकार सबके आत्मस्वरूप एक ही सर्वेश्वर उपाधि-भेदसे मानो भिन्न-भिन्न रूपोंमें दृष्टिगोचर होते हैं। जिनकी मायासे मोहित चित्तवाले अज्ञानी पुरुष आत्मारूपसे प्रसिद्ध होते हुए भी उनका दर्शन नहीं कर पाते और मायासे रहित होनेपर वे ही उन सर्वात्मा परमेश्वरको अपने ही आत्माके रूपमें देखने लगते हैं, जो सर्वत्र व्यापक, ज्योतिः-स्वरूप तथा उपमारहित हैं, उन विष्णुभगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। यह सारा जगत् जिनसे प्रकट हुआ है, जिनके ही आधारपर स्थित है और जिनसे ही इसे चेतनता प्राप्त हुई है और जिनका ही यह स्वरूप है, उनको नमस्कार है। जो प्रमाणको पहुँचसे परे हैं, जिनका दूसरा कोई आधार नहीं है, जो स्वयं ही आधार और आधेयरूप हैं, उन परमानन्दमय चैतन्यस्वरूप भगवान् वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। सबकी हृदयगुहामें जिनका निवास है, जो देवस्वरूप तथा योगियोंद्वारा सेवित हैं और प्रणवमें उसके अर्थ एवं अधिदेवतारूपमें जिनकी स्थिति है, उन योगमार्गके आदिकारण परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो नादस्वरूप, नादके सत्स्वरूप अविनाशी तथा सच्चिदानन्दमय हैं, उन तीक्ष्ण चक्र करनेवाले भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जो जरा आदिसे रहित, इस जगत्के साक्षी, मन-वाणीके अगोचर, निरञ्जन तथा अनन्त नामसे बीज, प्रणवरूप, धारण प्रसिद्ध हैं, उन विष्णुरूप भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। इन्द्रिय, मन, बुद्धि, सत्व, तेज, बल, भृति, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ-इन सबको भगवान् वासुदेवका स्वरूप कहा गया है। विद्या और अविद्या भी उन्हींके रूप हैं। वे ही परात्पर परमात्मा कहे गये हैं। जिनका आदि और अन्त नहीं है तथा जो सबका धारण-पोषण करनेवाले हैं, उन शान्तस्वरूप भगवान् अच्युतकी जो महात्मा शरण लेते हैं, उन्हें सनातन मोक्ष प्राप्त होता है। जो श्रेष्ठ, वरण करनेयोग्य, वरदाता, पुराण, पुरुष, सनातन, सर्वगत तथा सर्वस्वरूप हैं, उन भगवान्को मैं पुनः प्रणाम करता हूँ, पुनः प्रणाम करता हूँ, पुनः प्रणाम करता हूँ, पुनः प्रणाम करता हूँ। जिनका चरणोदक संसाररूपी रोगको दूर करनेवाला वैद्य है, जिनके चरणोंकी धूल निर्मलता (अन्तःशुद्धि)-का साधन है तथा जिनका नाम समस्त पापोंका निवारण करनेवाला है, उन अप्रमेय पुरुष श्रीहरिकी मैं आराधना करता हूँ। जो सद्प, असद्प, सदसद्रूप और उन सबसे विलक्षण हैं तथा जो श्रेष्ठ एवं श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठतर हैं, उन अविनाशी भगवान् विष्णुका मैं भजन करता हूँ। जो निरञ्जन, न| निराकार, सर्वत्र परिपूर्ण परमव्योममें विराजमान, विद्या और अविद्यासे परे तथा अन्तर्यामीरूपसे निवास करनेवाले हैं, जो स्वयंप्रकाश,अनिर्देश्य (जाति, गुण और क्रिया आदिसे को सन्त), महान्से भी परम महान्, सूक्ष्मसे भी तो अपन्त सूक्ष्म, अजन्मा, सब प्रकारकी उपाधियोंसे के रहित, नित्य, परमानन्द और सनातन परब्रह्म हैं, उन जगनिवास भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। क्रियानिष्ठ भक्त जिनका भजन करते हैं, योगीजन समाधिमें जिनका दर्शन करते हैं तथा जो पूज्यसे भी परम पूज्य एवं शान्त हैं, उन से भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। विद्वान् पुरुष भी जिन्हें देख नहीं पाते, जो इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित और सबसे श्रेष्ठ हैं,उन नित्य अविनाशी विभुको मैं प्रणाम करता हूँ।

अन्त:करणके संयोगसे जिन्हें जीव कहा जाता है और अविद्याके कार्यसे रहित होनेपर जो परमात्मा कहलाते हैं, यह सम्पूर्ण जगत् जिनका स्वरूप है, जो सबके कारण, समस्त कर्मेकि फलदाता, श्रेष्ठ, वरण करनेयोग्य तथा अजन्मा हैं, उन परात्पर भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। जो सर्वज्ञ, सर्वगत, सर्वान्तर्यामी, ज्ञानस्वरूप, ज्ञानके आश्रय तथा ज्ञानमें स्थित हैं, उन सर्वव्यापी श्रीहरिका मैं भजन करता हूँ। जो वेदोंके निधि हैं, वेदान्तके विज्ञानद्वारा जिनके परमार्थस्वरूपका भलीभाँति निश्चय होता है, सूर्य और चन्द्रमाके तुल्य जिनके प्रकाशमान नेत्र हैं, जो ऐश्वर्यशाली इन्द्ररूप हैं, आकाशमें विचरनेवाले पक्षी एवं ग्रह-नक्षत्र आदि जिनके स्वरूप हैं तथा जो खगपति (गरुड़)- स्वरूप हैं, उन भगवान् मुरारिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सबके ईश्वर, सबमें व्यापक, महान् वेदस्वरूप, वेद-वेत्ताओं में श्रेष्ठ, वाणी और मनकी पहुँचसे परे, अनन्त शक्तिसम्पन्न तथा एकमात्र ज्ञानके ही द्वारा जाननेयोग्य हैं, उन परम पुरुष श्रीहरिका मैं भजन करता हूँ। जिनकी सत्ता सर्वत्र परिपूर्ण है, जो इन्द्र, अग्नि, यम, निति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, सूर्य तथा पुरन्दर आदिके द्वारा स्वयं ही सब लोकोंकी रक्षा करते हैं, उन अप्रमेय परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके सहस्रों मस्तक, सहस्रों पैर, सहसों भुजाएँ और सहस्त्रों नेत्र हैं, जो सम्पूर्ण यज्ञोंसे सेवित तथा सबको संतोष प्रदान करनेवाले हैं, उन उग्रशक्तिसम्पन्न आदिपुरुष श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो कालस्वरूप, काल-विभागके हेतु, तीनों गुणोंसे अतीत, गुणज्ञ, गुणप्रिय, कामना पूर्ण करनेवाले, सङ्गरहित, अतीन्द्रिय, विश्वपालक, तृष्णाहीन, निरोह, श्रेष्ठ, मनके द्वारा भी अगम्य, मनोमय और अन्नमय स्वरूप, सबमें व्याप्त, विज्ञानसे सम्पन्न तथा शक्तिशाली हैं, जो वाणीके विषयनहीं हो सकते तथा जो सबके प्राणस्वरूप हैं, उन भगवान्का मैं भजन करता हूँ। जिनके रूपको, जिनके बल और प्रभावको, जिनके विविध कर्मोको तथा जिनके प्रमाणको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते, उन आत्मस्वरूप श्रीहरिको स्तुति मैं कैसे कर सकता हूँ? मैं संसार समुद्रमें गिरा हुआ एक दीन मनुष्य हूँ, मोहसे व्याकुल हूँ, सैकड़ों कामनाओंने मुझे बाँध रखा है। मैं अकीर्तिभागी, चुगला, कृतघ्न, सदा अपवित्र, पापपरायण तथा अत्यन्त क्रोधी है। दयासागर मुझ भयभीतकी रक्षा कीजिये। मैं बार बार आपकी शरण लेता हूँ*। महर्षि उत्तड़के झरा इस प्रकार प्रसन्न किये

*नतोऽस्मि नारायणमादिदेवं जगनिवासं जगदेकबन्धुम्। चक्राब्जशाङ्गासिधरं महान्तं स्मृतातिनिघ्नं शरणं प्रपद्ये ॥

यनाभिजाजप्रभवो विधाता सृजत्य, लोकसमुच्चयं च।

यत्क्रोधजो हन्ति जगच्च रुद्रस्तमादिदेवं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्॥

पद्यापति पद्मदलायताक्षं विचित्रवीर्य निखिलैकहेतुम् ।

वेदान्तवेद्यं पुरुष पुराणं तेजोनिधि विष्णुमहं प्रपत्रः ॥

आत्माक्षरः सर्वगतोऽच्युताख्यो ज्ञानात्मको ज्ञानविदां शरण्यः । ज्ञानैकवेद्यो भगवाननादिः प्रसीदतां व्यष्टिसमष्टिरूयः॥

अनन्तवीर्यो गुणजातिहीनो गुणात्मको ज्ञानविदां वरिष्ठः ।

नित्यः प्रपत्रार्तिहरः परात्मा दयाम्बुधिर्म बरदस्तु भूयात् ॥

यः स्थूलसूक्ष्मादिविशेषभेदैर्जगद्यथावत्स्वकृतं प्रविष्टः ।

त्वमेव तत्सर्वमनन्तसारः त्वत्तः परं नास्ति यतः परात्पन्॥

अगोचरं यत्तव शुखरूपं मायाविहीनं गुणजातिहीनम् ।

निरञ्जनं निर्मलमप्रमेयं पश्यन्ति सन्तः परमार्थसंज्ञम् ॥

एकेन हेनैव विभूषणानि यातानि भेदत्त्वमुपाधिभेदात् ।

तथैव सर्वेश्वर एक एव प्रदृश्यते भित्र इवाखिलात्मा।

यन्मायया मोहितचेतसस्तं पश्यन्ति नात्मानमपि प्रसिद्धम् ।

त एव मायारहितास्तदेव पश्यन्ति सर्वात्मकमात्मरूपम्।

विभुं ज्योतिरनौपम्य विष्णुसंज नमाम्यहम्।

समस्तमेतदुद्भूतं यती यत्र प्रतिष्ठितम् ॥

जानेपर परम दयालु तथा तेजोनिधि भगवान् लक्ष्मीपतिने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति अलसीके फूलकी भांति श्याम थी। दोनों नेत्र खिले हुए कमलकी शोभा धारण करते थे। मस्तकपर किरीट, दोनों कानोंमें कुण्डल, गलेमें हार और भुजाओंमें केयूरकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उन्होंने वक्षःस्थलपर सीतत्सचिह्न और कौस्तुभमणि धारण कर रखी थी। सुवर्णमय यज्ञोपवीत उनके बायें कंधेपर सुशोभित हो रहा था। नाकमें पहनी हुई मुक्तामणिकी प्रभासे उनके श्रीअङ्गोंकी श्याम कान्ति और बढ़ गयी थी। वे श्रीनारायणदेव पीताम्बर धारण करके वनमालासे विभूषित हो रहे थे। तुलसीके कोमल दलोंसे उनके चरणारविन्दोंकी अर्चना की गयी थी। उनके श्रीविग्रहका महान् प्रकाश सब ओर छा रहा था। कटिप्रदेशमें किंकिणी और

यतबैतन्यमाया यपूर्ण तस्य वै नमः । अप्रमेयमनाधारमाधाराधेयरूपकम्।।

परमानन्दचिमात्र वासुदेव नतोऽस्म्यहम्।

ह्रदगुहानिलयं देवं योगिभिः परिसेवितम्।।

योगानामादिभूतं तं नमामि प्रणवस्थितम्।

नादात्मक नादबीज प्रणवात्मकमव्ययम्॥

सद्भावं सच्चिदानन्दं तं वन्दे तिग्मचक्रिणम्।

अजरं साक्षिणं त्वस्य ह्यवाङ्मनसगोचरम्॥

निरञ्जनमनन्ताख्यं विष्णुरूपं नतोऽस्म्यहम्।

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ॥

वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रजमेव च।

विधाविद्यात्मकं प्राहुः परात्परतरं तथा।।

अनादिनिधनं शान्तं सर्वधातारमच्युतम्।

ये प्रपन्ना महात्मानस्तेषां मुक्तिर्हि शाश्वती।।

वरं वरेण्यं वरदं पुराण सनातनं सर्वगतं समस्तम्।

नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयो नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयः॥

यत्पादलोय भवरोगवैद्यो यत्पादपांशुर्विमलत्वसिद्ध्यै ।

यत्राम दुष्कर्मनिवारणाय तमप्रमेयं पुरुषं भजामि॥

सद्रूपं तमसद्रूपं सदसद्रूपमव्ययम् ।

तत्तद्विलक्षणं श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतरं भजे।।

निरञ्जनं निराकारं पूर्णमाकाशमध्यगम् ।

परं च विद्याविद्याभ्यां हृदम्बुजनिवासिनम्॥

स्वप्रकाशमनिर्देश्यं महतां च महत्तरम् ।

अणोरणीयांसमज सर्वोपाधिविवर्जितम्॥

यनित्यं परमानन्दं परं ब्रह्म सनातनम्।

विष्णुसंज्ञं जगद्धाम तमस्मि शरणं गतः।।

यं भजन्ति क्रियानिष्ठा यं पश्यन्ति च योगिनः ।

पूच्यात्पूज्यतरं शान्तं गतोऽस्मि शरणं प्रभुम् ।।

य न पश्यन्ति विद्वांसो य एतद् व्याप्य तिष्ठति ।

सर्वस्मादधिक नित्यं नतोऽस्मि विभुमव्ययम्।।

अन्त:करणसंयोगाजीव इत्युच्यते यः।

अविद्याकार्यरहितः परमात्मेति गीयते।।

सर्वात्मकं सर्वहेतुं सर्वकर्मफलप्रदम्।

वरं वरेण्णमजनं प्रणतोऽस्मि परात्परम्।।

सर्वज्ञ सर्वगं शान्तं सर्वान्तर्यामिण हरिम् ।

जानात्मकं ज्ञाननिधिं ज्ञानसंस्थं विभुं भजे ॥

नमाम्यहं वेदनिधिं मुरारि वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थम्। सूर्येन्दुवत्प्रोज्वलनेत्रमिन्द्रं खगस्वरुपं च पतिस्वरुपम्।।

सर्वेश्चरं सर्वगतं महान्तं वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थम्।

तं वाङ्मनोचिन्त्यमनशक्तिं ज्ञानैकवेद्यं पुरुषं भजामि।।

इन्द्राग्रिकालासुरपाशिवायुसोमेशमात्त्रण्डपुरन्दराद्यैः।

यः पाति लोकान्परिपूर्णभावस्तमप्रेयं शरणं प्रपद्ये।।

सहस्त्रशीर्षं च सहस्त्रपादं सस्त्रबाहुं च सहस्ननेत्रम्।

समस्तयज्ञैः परिजुष्टमाद्यं नतोस्मि तुष्टिप्रदमुग्रवीर्यम्।।

कालात्मकं कालविभागहेतुं गुणत्रयातीतमहं गुणज्ञम्।

गुणप्रियं कामदमस्तसङ्गमतीन्द्रियं विश्चभुजं वितृष्णम्।।

निरीहमग्य्रं मनसाप्यगम्यं मनोमयं चात्रमयं निरुढम्।

विज्ञानभेदं प्रतिपत्रकल्पं न वाड्मयं प्राणमयं भजामि।।

न यस्य रुपं न बलप्रभावौ न यस्य कर्माणि न यत्प्रमाणम्। जानन्ति देवाः कमलोद्धवाद्याः स्तोष्याम्यहं तं कथमात्मरुपम्।।

संसारसिन्धौ पतितं कदर्यं मोहाकुलं कामशतेन बद्धम्।

अकीर्तिभाजं पिशुनं कृतघ्रं सदाशुचिं पापरतं प्रमन्युम्।।

दयाम्बुधे पाहि भयाकुलं मां पुनः पुनस्त्वां शरणं प्रपद्ये।।

चरणोंमें नूपुर आदि आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनकी फहराती हुई ध्वजामें गरुड़का चिह्न सुशोभित था। इस रूपमें भगवान्का दर्शन करके विप्रवर उत्तङ्कने पृथ्वीपर दण्डकी भांति पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और आनन्दके आँसुओंसे श्रीहरिके दोनों चरणोंको नहला दिया। फिर वे एकाग्रचित्त होकर बोले-'मुरारे! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' तब परम दयालु भगवान् महाविष्णुने मुनिश्रेष्ठ उत्तङ्कको उठाकर छातीसे लगा लिया और कहा-'वत्स! कोई वर माँगो। साधुशिरोमणे! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, अतः तुम्हारे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है।' भगवान् चक्रपाणिके इस कथनको सुनकर महर्षि उत्तङ्कने पुनः प्रणाम किया और उन देवाधिदेव जनार्दनसे इस प्रकार कहा-'भगवन्! मुझे मोहमें क्यों डालते हैं ? देव! मुझे दूसरे वरोंसे क्या प्रयोजन है? मेरी तो जन्म-जन्मान्तरों में भी आपके चरणोंमें ही अविचल भक्ति बनी रहे।' तब जगदीश्वर भगवान् विष्णुने 'एवमस्तु' (ऐसा ही होगा) यह कहकर शङ्खके सिरेसे उत्तङ्कजीके शरीरका स्पर्श कराया और उन्हें वह दिव्य ज्ञान दे दिया जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। तदनन्तर पुनः स्तुति करते हुए विप्रवर उत्तङ्कसे देवदेव जनार्दनने उनके सिरपर हाथ रखकर मुसकराते हुए कहा।

श्रीभगवान् बोले-जो मनुष्य तुम्हारे द्वारा किये हुए स्तोत्रका सदा पाठ करेगा, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करके अन्तमें मोक्षका भागी होगा।

नारदजी! ब्राह्मणसे ऐसा कहकर भगवान् लक्ष्मीपति वहीं अन्तर्धान हो गये। फिर उत्तङ्कजी भी वहाँके बदरिकाश्रमको चले गये। अत: सदा देवाधिदेव भगवान् विष्णुकी भक्ति करनी चाहिये। हरिभक्ति श्रेष्ठ कही गयी है। वह सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देने वाली है। मुने! नरनारायण के आश्रम में जाकर उत्तङ्कजी क्रियायोग में तत्पर हो प्रतिदिन भक्तिभाव से भगवान् माधवकी आराधना करने लगे। वे ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न थे। उनका द्वैतभ्रम नाश हो चुका था। अतः उन्होंने भगवान् विष्णुके दुर्लभ परम पदको प्राप्त कर लिया। भक्तों का सम्मान बढ़ाने वाले जगदीश्वर भगवान् नारायण पूजन, नमस्कार अथवा स्मरण कर लेने पर भी

*अस्सीपुष्पसंकाश फुल्लपङ्कजलोचनम्।

किरीटिनं कुण्डलिन हारकेयूरभूषितम्॥

वित्तकौस्तुभधरं हेमयज्ञोपवीतिनम्। नासाविन्यस्तमुक्ताभवर्धमानतनुच्छविम्

पीताम्बरधर देवं पनमालाविभूषितम्।

तुलसीकोमलदलैरचिताघ्रि महाद्युतिम्॥

किङ्किणीनपुरा शोभित गरुडध्वजम्।

दवा ननाम विप्रेन्द्रो दण्डवतिक्षतिमण्डले॥

(ना० पूर्व० ३८१४०-१)

जीवको मोक्ष प्रचान करते हैं। अतः इहलोक और परलोकमें सुख चाहनेवाला मनुष्य अनन्त, अपराजित श्रीनारायणदेवका भक्तिपूर्वक पूजन