सभी मासोंकी पञ्चमी तिथियोंमें करने योग्य व्रत-पूजन आदिका वर्णन

सनातनजी कहते हैं- ब्रह्मन् ! सुनो, अब मैं तुम्हें पञ्चमोके व्रत कहता हूँ, जिनका भक्तिपूर्वक पालन करनेपर मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। चैत्रके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको 'मत्स्यजयन्तो' कहते हैं। इसमें भक्तोंको मत्स्यावतार- 'चान्द्र-व्रत' तथा 'हयग्रीवव्रत' भी होता है। अतः उनकी पृथक्-पृथक् सिद्धि चाहनेवाले पुरुषोंको शास्त्रोक्तं विधिसे उन-उन व्रतोंका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य वैशाखकी पञ्चमीको सम्पूर्ण नागगणों से युक्त शेषनागकी पूजा करता है, वह मनोवाञ्छित फल पाता है। इसी प्रकार विद्वान् पुरुष ज्येष्ठकी पञ्चमी तिथिको पितरोंका पूजन करे। उस दिन ब्राह्मण-भोजन करानेसे सम्पूर्ण कामनाओं और अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। मुने! आषाढ़ शुक्ल पञ्चमीको सर्वव्यापी वायुकी परीक्षा की जाती है। गाँवसे बाहर निकलकर धरतीपर खड़ा रहे और वहाँ एक बाँस खड़ा करे। बाँसके डंडेके अग्रभागमें पञ्चाङ्गी पताका लगा ले। तदनन्तर बाँसके मूल भागमें सब दिशाओंकी और लोकपालोंकी स्थापना एवं पूजा करके वायुकी परीक्षा करे। प्रधम आदि यामों (प्रहरों)-में जिस-जिस दिशाको ओरसे कायु चलती है, उसी-उसी दिक्पाल या लोकपालकी भलीभांति पूजा करे। इस प्रकार चार प्रहरतक वहाँ निराहार रहकर, सायंकाल अपने घर आवे और थोड़ा भोजन करके एकाग्रचित्त हो लोकपालोंको नमस्कार करके पवित्र भूमिपर सो जाय। उस दिन रातके चौथे प्रहरमें जो स्वप्र होता है, वह  निभय ही सत्य होता है-यह भगवान् शिवका कथन है। यदि अशुभ स्वप्र हो तो भगवान् शिवकी पूजामें तत्पर हो उपवासपूर्वक आत पहर विताये। फिर आठ ब्राह्मणों को भोजन कराकर मनुष्य शुभ फलका भागी होता है। यह 'शुभाशुभ-निदर्शनवत' कहा गया है, जो मनुष्योंकि इहलोक और परलोकमें भी सौभाग्यजनक होता है। श्रावण मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थीको जब थोड़ा दिन शेष रहे तो कच्चा अन्न (जितना दान देना हो) पृथक्-पृथक् पात्रोंमें रखकर विद्वान् पुरुष उन पात्रों में जल भर दे। तदनन्तर वह सब जल निकाल दे। फिर दूसरे दिन सबेरै सूर्योदय होनेपर विधिवत् स्रान करके देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका भलीभाँति पूजन करे। उनके आगे नैवेद्य स्थापित करे और वह पहले दिनका धोया हुआ कच्चा अन्न प्रसन्नतापूर्वक याचकोंको देवे। तत्पश्चात् प्रदोषकालमें शिवमन्दिरमें जाकर लिङ्गस्वरूप भगवान् शिवका गन्ध, पुष्प आदि सामग्रियों के द्वारा सम्यक् पूजन करे। फिर सहस्र या सौ बार पश्चाक्षरी विद्या ('नमः शिवाय' मन्त्र)-का जप करे। तदनन्तर उनका स्तवन करे। फिर सदा अन्नकी सिद्धिके लिये भगवान् शिवसे प्रार्थना करे। इसके बाद अपने घर आकर ब्राह्मण आदिको पकवान देकर स्वयं भी मौनभावसे भोजन करे। विप्रवर! यह 'अन्नव्रत' है, मनुष्योंद्वारा विधिपूर्वक इसका पालन होनेपर यह सम्पूर्ण अन्नसम्पत्तियोंका उत्पादक और परलोकमें सद्रति देनेवाला होता है।

श्रावण मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमोके दिन आस्तिक मनुष्योंको चाहिये कि वे अपने दरवाजे के दोनों ओर गोबरसे सोंकी आकृति बनायें और गन्ध, पुष्प आदिसे उनकी पूजा करें। तत्पश्चात् इन्द्राणीदेवीकी पूजा करें। सोने, चाँदी, दही अक्षत, कुश, जल, गलापुष्प, धूपदीप और नैवेद्य आदिसे उन सबकी पूजा करके परिक्रमा करे और उस अबको प्रणाम करके भक्तिभावसे प्रार्थनापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको समर्पित करे। नारद ! इस प्रकार भक्तिभावसे द्रव्य दान करनेवाले  पुरुषपर स्वर्ण आदि समृद्धियोंके दाता धनाध्यक्ष कुबेर प्रसन्न होते हैं। फिर भक्तिभावसे ब्राह्मणों को भोजन करानेके पश्चात् स्वयं भी स्त्री-पुत्र और सगे-सम्बन्धियों के साथ भोजन करे। भाद्रपद मासके कृष्ण पक्षकी पञ्चमीको दूधसे नागोंको तृप्त करे। जो ऐसा करता है उसकी सात पीढ़ियोंतकके लोग साँपसे निर्भय हो जाते हैं।

भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको श्रेष्ठ अषियोंकी पूजा करनी चाहिये। प्रात:काल नदी आदिके तटपर जाकर सदा आलस्यरहित हो स्नान करे। फिर घर आकर यत्नपूर्वक मिट्टीकी वेदी बनावे। उसे गोबरसे लीपकर पुष्पोंसे सुशोभित करे। इसके बाद कुशा बिछाकर उसके ऊपर गन्ध, नाना प्रकारके पुष्प, धूप और सुन्दर दीप आदिके द्वारा सात ऋषियोंका पूजन करे। कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ-ये सात ऋषि माने गये हैं। इनके लिये विधिवत् अर्घ्य तैयार करके अर्घ्यदान दे। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उनके लिये बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए श्यामाक (साँवाके चावल) आदिसे नैवेद्य तैयार करे। वह नैवेद्य उन्हें अर्पण करके उन ऋधियों का विसर्जन करने के पश्चात् स्वयं भी वही प्रसादस्वरूप अत्र भोजन करे। इस व्रतका पालन करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल भोगता और समर्षियोंके प्रसादसे श्रेष्ठ विमानपर बैठकर दिव्यलोकमें जाता है।

आश्विन शुक्ला पञ्चमीको ' उपाङ्गललितावत' होता है। नारद! यथाशक्ति ललिताजीकी स्वर्णमयी मूर्ति बनाकर पोडशोपचारसे उनकी विधिवत् पूजा करे। व्रतकी पूर्तिके लियेर ब्राह्मणको पकवान, फल, घी और दक्षिणा दान करे। तत्पश्चात् निम्रातिरूपसे प्रार्थना एवं विसर्जन करे-

सवाहना शक्तियुता वरदा पृजिता मया।

मातर्मापनगृहाथ गम्यतां निजमन्दिरम्।।

मैंने वाहन और शक्तियोंसे युक्त वरदायिनी  ललितादेवीका पूजन किया है। माँ! तुम मुझपर अनुग्रह करके अपने मन्दिरको पधारो।'

द्विजश्रेष्ठ! कार्तिक शुक्ला पञ्चमीको सब पापोंका नाश करनेके लिये श्रद्धापूर्वक परम उत्तम 'जया- व्रत' करना चाहिये। ब्रह्मन्! एकाग्नचित्त हो विधिपूर्वक षोडशोपचारसे जयादेवीकी पूजा करके पवित्र तथा वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो एक ब्राह्मणको भोजन करावे और दक्षिणा देकर उसे विदा करे। तत्पश्चात् स्वयं मौन होकर भोजन करे। जो भक्तिपूर्वक जयाके दिन स्नान करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं। विप्रवर! अश्वमेध यज्ञके अन्तमें स्नान करनेसे जो फल बताया गया है, वही जयाके दिन भी स्नान करनेसे प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष शुक्ला पशमीको विधिपूर्वक नागोंकी पूजा करके मनुष्य उनसे अभय पाकर बन्धु- बान्धवोंके साथ प्रसन्न रहता है। पौष मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको भगवान् मधुसूदनकी पूजा करके मनुष्य मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। (इसी प्रकार माघ और फाल्गुनके लिये समझना चाहिये) नारद! प्रत्येक मासके शुक्ल और कृष्णपक्षमें भी पज्ञमीको पितरों और नागोंकी पूजा सर्वथा उत्तम मानी गयी है।