नारद महा पुराण
प्रयाग माहात्म्यके प्रसङ्गमें तीर्थयात्राकी सामान्य विधिका वर्णन
वसिष्ठजी कहते हैं-भूपाल ! भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले इस पुरुषोत्तम माहात्म्यको सुनकर ब्रहापुत्री मोहिनीने अपने पुरोहित विप्रवर वसुसे पुनः प्रश किया।
मोहिनी बोली- विप्रवर ! मैंने पुरुषोत्तमतीर्थका अद्भुत माहात्म्य सुना। सुचता अब प्रयागका भी माहात्म्य कहिये।
पुरोहित वसुने कहा-भद्रे ! सुनो, में
तीर्थयात्राकी विधि बतलाता है, जिसका आश्रय लेनेपर मनुष्य यात्राका शास्त्रोक्त फल पा सकता है। तीर्थयात्रा पुण्यकर्म है। इसका महत्त्व यज्ञोसे भी बढ़कर है। बहुत दक्षिणावाले अशिष्टोधादि यज्ञों का अनुष्ठान करके भी मनुष्य उस फलको नहीं पाता, जो तीर्थयात्रासे सुलभ होता है। जो अनजानमें भी कभी यहाँ तीर्थयात्रा कर लेता है, वह यह सम्पूर्ण कामना ऑसे सम्पनी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। उसे सदा धन-धान्यसे भरा हुआ स्थान प्राप्त होता है। वह भोगसम्पन्न और सदा ऐश्वर्य-ज्ञानसे परिपूर्ण होता है। उसने नरकसे अपने पितरों और पितामहोंका उद्धार कर दिया। जिसके हाथ, पैर और मन अपने वशमें है तथा जो विद्या, तपस्या और कीर्तिसे सम्पन्न है, वही तीर्थके पूर्ण फलका भागी होता है। जो प्रतिग्रहसे दूर रहता है और जो कुछ मिल जाय, उसीसे संतुष्ट होता है तथा जिसमें अहंकारका सर्वथा अभाव है, वह तीर्थक फलका भागी होता है। जो संकल्परहित प्रवृत्तिशून्य, स्वल्पाहारी, जितेन्द्रिय तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंसे युक्त है, वह तीर्थक फलका भागी होता है। धीर पुरुष श्रद्धा और एकाग्रतापूर्वक यदि तीर्थों में भ्रमण करता है तो वह पापी होनेपर भी उस पापसे शुद्ध हो जाता है। फिर जो शुद्ध कर्म करनेवाला है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? अश्रद्धालु, पापपीडित, नास्तिक, संशयातमा और केवल युक्तिवादी-ये पाँच प्रकारके मनुष्य तीर्थ-फलके भागी नहीं होते। पापी मनुष्योंके तीर्थमें जानेसे उनके पापको शान्ति होती है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, ऐसे मनुष्योंके लिये तीर्थ यथोक्त फलको देनेवाला है। जो काम, क्रोध और लोभको जीतकर तीर्थमें प्रवेश करता है, उसे उस तीर्थयात्रासे कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रहती। जो यथोक्त विधिसे तीर्थयात्रा करते हैं, सम्पूर्ण द्वन्द्वोंको सहन करनेवाले वे धीर पुरुष स्वर्गगामी होते हैं। गङ्गा आदि तीर्थीम मछलियाँ निवास करती हैं, पक्षीगण देवालयमें वास करते हैं। किंतु उनके चित्त भक्तिभावसे रहित होने के कारण तीर्थसेवन तथा श्रेष्ठ देवमन्दिरमें रहनेसे कोई फल नहीं पाते। अतः इदयकमलमें भावका संग्रह करके एकाप्रचित हो तीर्थोंका सेवन करना चाहिये।
मुनीश्वरोंने तीन प्रकारकी तीर्थयात्रा बतायी है-कृत, प्रयुक्त तथा अनुमोदित । ब्रह्मचारी बालक संयमपूर्वक गुरुकी आज्ञामें संलग्न रहकर उक्त तीनों प्रकारको तीर्थयात्राको विधिपूर्वक सम्पन्न कर लेता है। (अर्थात् ब्रह्मचर्यपालन, इन्द्रियसंयम तथा गुरु-सेवनसे उसको गुरुकुलमें ही तीर्थयात्राका पूरा फल मिल जाता है।) जो कोई भी पुरुष तीर्थयात्राको जाय, वह पहले घरमें ही रहकर पूर्ण संयमका अभ्यास करे और पवित्र एवं सावधान होकर भक्तिभावसे विनम्र हो गणेशजीको पूजा करे। तत्पश्चात् देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों तथा साधुपुरुषोंका भी अपने वैभव और शक्तिके अनुसार प्रयत्नपूर्वक सत्कार करे । बुद्धिमान् ब्राह्मण तीर्थयात्रासे लौटनेपर भी पुन: पूर्ववत् देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंका पूजन करे। ऐसा करनेपर उसे तीर्थसे जिस फलकी प्राप्ति बतायी गयी है, वह सब यहाँ प्राप्त होता है। प्रयागमें, तीर्थयात्रा में तथा माता-पिताकी मृत्यु होनेपर अपने केशोंका मुण्डन करा देना चाहिये। ऐसा कोई कारण न होनेपर व्यर्थ ही सिर न मुड़ावे। जो गया जानेको उद्यत हो, वह विधिपूर्वक श्राद्ध करके तीर्थयात्रीका वेश बना ले और अपने समूचे गाँवकी परिक्रमा करे। उसके बाद प्रतिदिन किसीसे प्रतिग्रहन लेकर पैदल यात्रा करे। गया जानेवाले पुरुषको पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो ऐश्ववक अभिमानसे अथवा लोभ या मोहसे किसी सवारी* द्वारा मात्रा करता है, उसकी वह तीर्थयात्रा
*मूलमें यान' शब्द आया है, अपने यहाँ ' यान' उस सवारीके लिये प्रयुक हुआ करता है जो किसी- न-किसी जीवद्वारा खींची या दोयी जाती है। जैसे नरयान, अञ्चमान, वृषभयान आदि। मूलमें आगे इन्हींका नाम लेकर दोष कहा गया है। अतः वर्तमान रेलगाड़ी या मोटरके लिये निवेध नहीं मानना चाहिये। फिर भी जो सर्वथा पैदल यात्रा कर सके, उसीकी यात्रा सर्वोत्तम कही जायगी।
निष्फल है। इसलिये सवारीका त्याग करे। गोयान (बैलगाड़ी आदि)-पर तीर्थमें जानेसे गोवधका पाप कहा गया है। अश्वयान (घोड़े या एक्के- ताँगे आदि)-पर जानेसे वह यात्रा निष्फल होती है। तथा नरयान (पालकी, रिक्शा आदि)-पर जानेसे तीर्थका आधा फल मिलता है; किंतु पैदल चलनेसे चौगुने फलकी प्राप्ति होती है। वर्षा और धूप आदिमें छाता लगाकर डंडा हाथमें लेकर चले और कंकड़ तथा काँटोंमें शरीरको कष्टसे बचानेकी इच्छासे मनुष्य सदा जूता पहनकर चले। जो दूसरेके धनसे तीर्थयात्रा करता है, उसे पुण्यका सोलहवाँ अंश प्राप्त होता है तथा जो दूसरे कार्यके प्रसंगसे तीर्थमें जाता है, उसे उसका आधा फल मिलता है। तीर्थमें ब्राह्मणकी कदापि परीक्षा न करे। वहाँ याचकरूपसे आये हुए ब्राह्मणको भी भोजन कराना चाहिये, ऐसा मनुका कथन है। तीर्थ में किया हुआ श्राद्ध पितरों के लिये तृप्तिकारक बताया गया है। समयमें या असमयमें मनुष्य जब भी तीर्थ में पहुँचे तभी उसे तीर्थबाड और पितृतर्पण अवश्य करना चाहिये।
पृथ्वीपर जो तीर्थ है, वे साधारण भूमिकी अपेक्षा अधिक पुण्यमय क्यों हैं? इसका कारण सुनो-जैसे शरीरके कुछ अवयव प्रधान माने गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वी, जल और तेजके प्रभावसे तथा मुनियों के संगठनसे तीर्थोको अधिक पवित्र कहा गया है। देवि! जो गङ्गाजीके समीप जाकर मुण्डन नहीं कराता, उसका समस्त शुभ कर्म नहीं किये हुएके समान हो जाता है। सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीके समीप जानेपर कल्पभरके पापोंका संग्रह मनुष्यके केशोंका आश्रय लेकर स्थित होता है। अतः उन केशोंका त्याग कर देना चाहिये। मनुष्यके जितने नख और रोएँ गङ्गाजीके जलमें गिरते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। सती मोहिनी! जिसके पिता जीवित हैं, वह विधिज्ञ पुरुष तीर्थमें जानेपर क्षौर तो करावे, परंतु मूंछ न मुड़ावे।