मोहिनी-वसु-संवाद-गङ्गजीके माहात्म्यका वर्णन

वसिष्ठजी कहते हैं-नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहनेवाले पुरोहित वसु यजमानपत्नी मोहिनीसे मधुर वाणीमें बोले।

पुरोहित वसुने कहा- मोहिनी! सुनो, मैं तुम्हें तीर्थोके पृथक्-पृथक् लक्षण बतलाता हूँ। जिसके जान लेनेमात्रसे पापियोंकी उत्तम गति होती है। पृथ्वीपर सब तीर्थों में श्रेष्ठ गङ्गा हैं। गङ्गाके समान पापनाशक तीर्थ दूसरा कोई नहीं है।

अपने पुरोहित वसुका यह वचन सुनकर मोहिनीके मनमें गङ्गा-सानके प्रति आदर बढ़ गया। वह पुरोहितजीको प्रणाम करके बोली।

मोहिनीने कहा- भगवन् ! सम्पूर्ण पुराणोंकी सम्मतिके अनुसार इस समय गङ्गाजीका उत्तम माहात्म्य बताइये। पहले गङ्गाजीके अनुपम तथा पापनाशक माहात्म्यको सुनकर फिर आपके साथ पापनाशिनी गङ्गाजीमें स्नान करनेके लिये चलूँगी। वसु सब पुराणोंके ज्ञाता थे। उन्होंने मोहिनीका वचन सुनकर गङ्गाजीके पापनाशक माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन किया।

पुरोहित वसु बोले- देवि। वे देश, ने जनपद, वे पर्वत और चे आश्रम भी धन्य हैं, जिनके

समीप सदा पुण्यसलिला भगवती भागीरथी बहती रहती हैं। जीव गङ्गाजीका सेवन करके जिस गतिको पाता है, उसे तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागके द्वारा भी नहीं पा सकता। जो मनुष्य पहली अवस्थामें पापकर्म करके अन्तिम अवस्थामें गङ्गाजीका सेवन करते हैं, वे भी परम गतिको प्राप्त होते हैं। इस संसारमें दुःखसे व्याकुल जो जीव उत्तम गतिकी खोजमें लगे हैं, उन सबके लिये गङ्गाके समान दूसरी कोई गति नहीं है। गङ्गाजी बड़े-बड़े भयंकर पातकोंके कारण अपवित्र नरकमें गिरनेवाले नराधम पापियोंको जबरन तार देती हैं। गङ्गा देवी अंधों, जड़ों तथा द्रव्यहीनोंको भी पवित्र बनाती हैं। मोहिनी! (विशेषरूपसे) पक्षोंके आदि अर्थात् कृष्णपक्षमें षष्ठीसे लेकर पुण्यमयी अमावास्यातक दस दिन गङ्गाजी इस पृथ्वीपर निवास करती हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर दस दिनतक वे स्वयं ही पातालमें निवास करती हैं। फिर शुक्लपक्षकी एकादशीसे कृष्ण-पक्षकी पञ्चमीतक जो दस दिन होते हैं, उनमें गङ्गाजी सदा स्वर्गमें रहती हैं। [इसलिये इन्हें 'त्रिपथगा' कहते हैं] सत्ययुगमें सब तीर्थ उत्तम

*ते देशास्ते जनपदास्ते शैलास्तेऽपि चाश्रमाः।

येषां भागीरथी पुण्या समीपे वर्तत सदा ॥

(ना० उत्तर०३८।८)

हैं। त्रेतामें पुष्कर तीर्थ सर्वोत्तम है, द्वापरमें कुरुक्षेत्रकी विशेष महिमा है और कलियुगमें गङ्गा ही सबसे बढ़कर है। कलियुगमें सब तीर्थ स्वभावतः अपनी-अपनी शक्तिको गङ्गाजीमें छोड़ते हैं, परंतु गङ्गादेवी अपनी शक्तिको कहीं नहीं छोड़ती। गङ्गाजीके जलकोंसे परिपुष्ट हुई वायुके स्पर्शसे भी पापाचारी मनुष्य भी परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो सर्वत्र व्यापक हैं, जिनका स्वरूप चिन्मय है, वे जनार्दन भगवान् विष्णु ही द्रवरूपसे गङ्गाजीके जल हैं, इसमें संशय नहीं है। महापातकी भी गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे पवित्र हो जाते हैं, इस विषयमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। गङ्गाजीका जल अपने क्षेत्रमें हो या निकालकर लाया गया हो, ठंडा हो या गरम हो, वह सेवन करनेपर आमरण किये हुए पापोंको हर लेता है। बासी जल और बासी दल त्याग देने योग्य माना गया है, परंतु गङ्गाजल और तुलसीदल बासी होनेपर भी त्याज्य नहीं है। मेरुके सुवर्णकी, सब प्रकारके रनोंकी, वहाँक प्रस्तर और जलके एक-एक, कणकी गणना हो सकती है, परंतु गङ्गाजलके गुणोंका परिमाण बतानेको शक्ति किसीमें भी नहीं है । जो मनुष्य तीर्थयात्राको पूरी विधि न कर सके वह भी केवल गङ्गाजलके माहात्म्यसे यहाँ उत्तम फलका भागी होता है। गङ्गाजीके जलसे एक बार भक्तिपूर्वक कुल्ला कर लेनेपर मनुष्य स्वर्गमें जाता और वहाँ कामधेनुके धनोंसे प्रकट हुए दिव्य रसोंका आस्वादन करता है। जो शालग्राम शिलापर गङ्गाजल डालता है, वह पापरूपी तीव्र अन्धकारको मिटाकर उदयकालीन सूर्यकी भाँति पुण्यसे प्रकाशित होता है। जो पुरुष मन, वाणी और शरीरद्वारा किये हुए अनेक प्रकारके पापोंसे ग्रस्त हो, वह भी गङ्गाजीका दर्शन करके पवित्र हो जाता है। इसमें संशय नहीं है। जो सदा गङ्गाजीके जलसे सींचकर पवित्र की हुई भिक्षा भोजन करता है, वह केंचुलका त्याग करनेवाले सर्पकी भाँति पापसे शून्य हो जाता है। हिमालय और विन्ध्यके समान पापराशियाँ भी गङ्गाजीके जलसे उसी प्रकार नष्ट हो जाती हैं, जिस प्रकार भगवान् विष्णुको भक्तिसे सब प्रकारकी आपत्तियाँ। गङ्गाजीमें भक्तिपूर्वक सानके लिये प्रवेश करनेपर मनुष्योंके ब्रह्महत्या आदि पाप “हाय-हाय' करके भाग जाते हैं। जो प्रतिदिन गङ्गाजीके तटपर रहता और सदा गङ्गाजीका जल पीता है, वह पुरुष पूर्वसंचित पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो गङ्गाजीका आश्रय लेकर नित्य निर्भय रहता है, वही देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों के लिये

*कृते तु सर्वतीर्थनि त्रेतायां पुष्करं परम्।

द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा विशिष्यते।।

कलौ तु सर्वतीर्थीनि स्वं स्वं वीर्य स्वभावतः।

गङ्गयां प्रतिमुञ्चन्ति सा तु देवी न कुत्रचित्।।

गङ्गम्भः कणदिग्धस्य वायोः संस्पर्शनादपि।

पापशीला अपि नराः परां गतिमवाप्नुयुः।।

योसौ सर्वगतो विष्णुश्विस्वरुपी जनार्दनः।

स एव द्रवरुपेण गङ्गाम्भो नात्र संशयः।।

ब्रह्महा गुरुहा गोघ्नः स्तेयी च गुरुतल्पगः।

गङ्गम्भसा च पूयन्ते नात्र कार्या विचारण।।

क्षेत्रस्थमुद्धतं वपि शीतमुष्णमथपि वा।

गाङ्गेयं तु हरेत्तोयं पापमामरणान्तिकम्।।

वज्यं पर्युषितं तोयं वजर्य पर्युषितं दलम्।

न वज्यं जाह्रवीतोयं न वज्यं तुलसीदलम्।।

मेरोः सुवर्णस्य च सर्वरत्रैः संख्योपलानामुदकस्य वापि।

गङ्गाजलानां न तु शक्तिरस्ति वत्त्कुं गुणख्यापरिमाणमत्र।।

पूजनीय है। प्रभासतीर्थ में सूर्यग्रहणके समय सहस्र गोदान करनेसे मनुष्य जो फल पाता है, वह गङ्गाजीके तटपर एक दिन रहनेसे ही मिल जाता है। जो अन्य सारे उपायोंको छोड़कर मोक्षकी कामना लिये दृढनिश्चयके साथ गङ्गाजीके वटपर सुखपूर्वक रहता है, वह अवश्य ही मोक्षका भागी होता है, विशेषतः काशीपुरीमें गङ्गाजी तत्काल मोक्ष देनेवाली हैं। यदि जीवनभर प्रतिमासकी चतुर्दशी और अष्टमी तिथिको सदा गङ्गाजीके तटपर निवास किया जाय तो वह उत्तम सिद्धि देनेवाला है। मनुष्य सदा कृष्छु और चान्द्रायण करके सुखपूर्वक जिस फलका अनुभव करता है, वही उसे गङ्गाजीके तट पर निवास करनेमात्रसे मिल जाता है। ब्रह्मपुत्री ! इस लोकमें गङ्गाजीकी सेवा में तत्पर रहनेवाले मनुष्यको आधे दिनके सेवनसे जो फल प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भी नहीं मिल सकता। सम्पूर्ण यज्ञ, तप, दान, योग तथा स्वाध्याय-कर्मले जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही भक्तिभावसे गङ्गाजीके तटपर निवास करनेमात्रसे मिल जाता है। सत्य भाषण, नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन तथा अग्निहोत्रके सेवनसे मनुष्योंको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह गङ्गातटपर निवास करनेसे ही मिल जाता है। गङ्गाजीके भक्तको संतोष, उत्तम ऐश्वर्य, तत्त्वज्ञान, सुखस्वरूपता तथा विनय एवं सदाचार-सम्पत्ति प्राप्त होती है। मनुष्य केवल गङ्गाजीको ही पाकर कृतकृत्य हो जाता है। जो भक्तिभावसे गङ्गाजीके जलका स्पर्श करता और गङ्गाजल पीता है, वह मनुष्य अनायास ही मोक्षका उपाय प्राप्त कर लेता है। जिनके सम्पूर्ण कृत्य सदा गङ्गाजलसे ही सम्पन्न होते हैं, वे मनुष्य शरीर त्यागकर भगवान् शिवके समीप आनन्दका अनुभव करते हैं। जैसे इन्द्र आदि देवता अपने मुखसे चन्द्रमाकी किरणोंमें स्थित अमृतका पान करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य गङ्गाजीका जल पीते हैं। विधिपूर्वक कन्यादान और भक्तिपूर्वक भूमिदान, अन्नदान, गोदान, स्वर्णदान, रथदान, अश्वदान और गजदान आदि करनेसे जो पुण्य बताया गया है, उससे सौ गुना अधिक पुण्य चुल्लूभर गङ्गाजल पीनेसे होता है। सहस्रों चान्द्रायणव्रतका जो फल कहा गया है, उससे अधिक फल गङ्गाजल पीनेसे

१.   मनोवाकायस्तः पापैबहुविधैरपि।

   वीक्ष्य गमां भवेत् पूतः पुरुषो नात्र संशयः ॥

गङ्गातोयाभिषिक्तां तु भिक्षामनाति यः सदा। ।

सर्पवकसक मुक्त्वा पापहीनो भवेत् स वै ॥

हिमवदिष्यसदृशा राशयः पापकर्मणाम्।

गङ्गाम्भसा विनश्यन्ति विष्णुभक्त्या यघापदः ||

प्रदेशमात्रे गङ्गायां स्नानार्थ भक्तितो नृणाम्।

ब्रह्महत्यादिपापानि हाहेत्युक्त्वा प्रयान्त्यलम् ॥

गङ्गातीरे बसेन्नित्यं गङ्गातोयं पिबेत् सदा।

यः पुमान् स विमुच्येत पातकैः पूर्वसंचितैः ॥

 यो वै गङ्गां समाश्रित्य नित्यं तिष्ठति निर्भयः ।

देवैर्मत्यैश्च पूजनीयो महर्षिभिः ।।

(ना० उत्तर० ३८।३२-३७)

संतोषः परमैश्वर्य तत्वज्ञानं सुखात्मता।। विनयाचारसम्पतिर्गङ्गभक्तस्य जायते

(ना० उत्तर० ३८॥ ४९-५०)

२.भक्त्या तज्जलसंस्पर्शी तज्जलं पिबते' च यः॥

अनायासेन हि नरो मोक्षोपायं स विन्दति।

(ना० उत्तर० ३८1५१-५२)

१.   सर्वाणि या गङ्गायास्तोयैः कृत्यानि सर्वदा।

  देहे त्याचा नरास्ते तु मोदन्ते शिवसंनिधौ ॥

(ना० उत्तर०३८।५३)

मिलता है। चुल्लूभर गङ्गाजल पीनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो इच्छानुसार गङ्गाजीका पानी पीता है, उसकी मुक्ति हाथमें ही है। सरस्वती नदीका जल तीन महीने में, यमुनाजीका जल सात महीने में, नर्मदाजीका जल दस महीने में तथा गङ्गाजीका जल एक वर्षमें पचता है। अर्थात् शरीरमें उसका प्रभाव विद्यमान रहता है। जो देहधारी मनुष्य कहीं अज्ञात स्थानमें मर गये और उनके लिये शास्त्रीय विधिसे तर्पण नहीं किया गया, ऐसे लोगोंको गङ्गाजीके जलसे उनकी हड्डियोंका संयोग होनेपर परलोकमें उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जो शरीरकी शुद्धि करनेवाले चान्द्रायणव्रतका एक सहस्रबार अनुष्ठान कर चुका है और जो केवल इच्छानुसार गङ्गा- जल पीता है, वहीं पहलेबालेसे बढ़कर है। जो गङ्गाजीका दर्शन और स्तुति करता है, जो भक्तिपूर्वक गङ्गामें नहाता और गङ्गाका ही जल पीता है, वह स्वर्ग, निर्मल ज्ञान, योग तथा मोक्ष सब कुछ पा लेता है।