त्रिस्कन्ध ज्यौतिषका संहिताप्रकरण(विविध उपयोगी विषयोंका वर्णन)

सनन्दनजी बोले-नारदजी! चैत्रादि मासोंमें क्रमशः मेषादि राशियोंमें सूर्यकी संक्रान्ति होती है*। चैत्र शुक्ल प्रतिपदाके आरम्भमें जो वार (दिन) हो, वही ग्रह उस (चान्द्र) वर्षका राजा होता है। सूर्यके मेषराशि-प्रवेशके समय जो वार हो, वह सेनापति (या मन्त्री) होता है। कर्क राशिकी संक्रान्तिके समय जो वार हो, वह सस्य (धान्य)-का अधिपति होता है। उक्त वर्ष आदिका अधिपति यदि सूर्य हो तो वह मध्यम (शुभ और अशुभ दोनों) फल देता है। चन्द्रमा हो तो उत्तम फल देता है। मङ्गल अधिपति हो तो अनिष्ट (अशुभ) फल देनेवाला होता है। बुध, गुरु और शुक्र—ये तीनों अति उत्तम (शुभ) फलको प्रासि करानेवाले होते हैं। शनि अधिपति हो तो अशुभ फल होता है। इन ग्रहों के बलाबल देखकर तदनुसार इनके न्यून या पूर्ण फल समझने चाहिये॥१-३॥ सूर्यमण्डलमें दीख पड़े, तो उस देशका नाश होता है। शुक्ल, लाल, पीला अथवा काला सूर्यमण्डल दीखने में आवे, तो क्रमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों को पीड़ा होती है। मुनिवर ! यदि दो, तीन या चार प्रकारके रंग सूर्यमण्डलमें दीख पड़ें, तो राजाओंका नाश होता है। यदि सूर्यकी ऊर्ध्वगामिनी किरण लाल रंगकी दीख पड़े, तो सेनापतिका नाश होता है। यदि उसका पीला वर्ण हो तो राजकुमारका, श्वेत वर्ण हो तो राजपुरोहितका तथा उसके अनेक वर्ण हों तो प्रजाजनोंका नाश होता है। इसी तरह धूम्र वर्ण हो तो राजाका और पिशङ्ग (कपिल) वर्ण हो तो मेघका नाश होता है। यदि सूर्यकी उक्त किरणें नीचेकी ओर हों, तो संसारका नाश होता है ॥४-७॥

सूर्य शिशिर-ऋतु (माध-फाल्गुन)-में ताँबेके ने समान (लाल) दीख पड़े, तो संसारके लिये शुभ (कल्याणकारी) होता है। ऐसे ही वसन्त (चैत्र-वैशाख) में कुंकुमवर्ण, ग्रीष्ममें पाण्डु (श्वेत-पीत-, मिश्रित)-वर्ण, वर्षामें अनेक वर्ण, शरद् ऋतुमें के कमलवर्ण तथा हेमन्त रक्तवर्णका सूर्यविम्ब दिखायी हाँ दे तो उसे शुभप्रद समझना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ नारद! यदि शीतकालमें (अगहनसे फाल्गुनतक) सूर्यका बिम्ब पीला, वर्षामें (श्रावणसे कार्तिकतक) श्वेत (उजला) तथा ग्रीष्ममें (पैसे आषातक)

*जैसे मेषमें सूर्यके रहते जो अमावास्या होती है, वहाँ चैत्रकी समाप्ति समझी जाती है एवं वृषादिके सूर्यमें वैशाखादि मास समझना चाहिये।

लाल रंगका दीख पड़े तो क्रमसे रोग, अवर्षण तथा भय उपस्थित करनेवाला होता है। यदि कदाचित् सूर्यका आधा विम्ब इन्द्रधनुषके सदृश दीख पड़े तो राजाओंमें परस्पर विरोध बढ़ता है। खरगोशके रक्तके सदृश सूर्यका वर्ण हो तो शीघ्र ही राजाओंमें महायुद्ध प्रारम्भ होता है। यदि सूर्यका वर्ण मोरकी पाँखके समान हो तो वहाँ बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं होती है। यदि सूर्य कभी चन्द्रमाके समान दिखायी दे तो वहाँके राजाको जीतकर दूसरा राजा राज्य करता है। यदि सूर्य श्याम रंगका दीख पड़े तो कौड़ोंका भय होता है। भस्म समान दीख पड़े तो समूचे राज्यपर भय उपस्थित होता है और यदि सूर्यमण्डलमें छिद्र दिखायी दे तो वहाँके सबसे बड़े सम्राट्की मृत्यु होती है। कलशके समान आकारवाला सूर्य देशमें भूखमरीका भय उपस्थित करता है। तोरण- सदृश आकारवाला सूर्य ग्राम तथा नगरोंका नाशक होता है। छत्राकार सूर्य उदित हो तो देशका नाश और सूर्य-बिम्ब खण्डित दीख पड़े तो राजाका नाश होता है।। ८-१४।।

यदि सूर्योदय या सूर्यास्तके समय बिजलौकी गड़गड़ाहट और वज्रपात एवं उल्कापात हो तो राजाका नाश या राजाओंमें परस्पर युद्ध होता है। यदि पंद्रह या साढ़े सात दिनतक दिनमें सूर्यपर तथा रातमें चन्द्रमापर. परिवेष (मण्डतर हो: अथवा उदय और अस्त-समयमें वह अत्यन्त रक्तवर्णका दिखायी दे तो राजाका परिवर्तन होता है॥१५-१६ ॥ उदय या अस्तके समय यदि सूर्य शस्त्रके समान आकारवाले या गदहे, ऊँट आदिके सदृश अशुभ आकारवाले मेघसे खण्डित-सा प्रतीत हो तो राजाओंमें युद्ध होता है।॥१७॥

 (चन्द्रशङ्गोत्रति-फल-)मीन तथा मेष राशिमें यदि (द्वितीया तिथिको उदयकालमें) चन्द्रमाका पक्षिण मतमत (ऊपर उठा) हो तो वह शुभपर होता है। मिथुन और मकरमें यदि उत्तर "ज उन्नत हो तो उसे श्रेष्ठ समझना चाहिये। कुथ और खूप में यदि दोनों शृङ्ग सम हों तो शुभ है। कर्क और धनु में यदि शृङ्ग शरसदृश हो तो शुभ है। वृक्षिक और सिंहमें भी धनुष-सदृश हो तो शुभ है तथा तुला और कन्यामें यदि चन्द्रमाका शृङ्ग शूलके सदृश दीख पड़े तो शुभ पाल समझना चाहिये। इससे विपरीत स्थितिमें चन्द्रमाका उदय हो तो उस मासमें पृथ्वीपर दुभिक्ष, राजाओंमें परस्पर विरोध तथा युद्ध आदि अशुभ फल प्रकट होते हैं॥१८-१९॥

पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, मूल और ज्येष्ठा-इन नक्षत्रोंमें चन्द्रमा यदि दक्षिण दिशामें हो तो जलचर, वनचर और सर्पका नाश तथा अनिका भय होता है। विशाखा और अनुराधामें यदि दक्षिणभागमें हो तो पापफल देनेवाला होता है। मया और विशाखामें यदि चन्द्रमा मध्यभागमें होकर चले तो भी सौम्य (शुभ) प्रद होता है। रेवतीसे मृगशिरापर्यन्त ६ नक्षत्र 'अनागत', आसेि अनुराधापर्यन्त बारह नक्षत्र 'मध्ययोगी' और वासव (ज्येष्ठा) से नौ नक्षत्र 'गतयोगी' है। इनमें भी चन्द्रमा उत्तर भागमें रहनेपर शुभप्रद होता है ।।२०-२२॥

भरणी, ज्या आश्लेषा, आदर्श, शतभिषा और स्वाती ये भोग ( ४०० कला), धुव (तीनों उत्तराहिणी), पुनर्वस् और विशाखा-ये सार्थ भीग (१२०० कला) तथा अन्य सम पूर्ण) साधारणतया चन्द्रमाकी दक्षिण श्रृङ्गोत्रति अशुभ और ऊपर

१. दिशाका ज्ञान तात्कालिक शरके ज्ञानसे होता है। इसकी विधि पृष्ठ २३६ में देखिये।

२. राशि-मण्डलमें सब नक्षत्रोंका भोग ८०० कलाके बराबर है। परंतु प्रत्येक नक्षत्रविभागमें योगताराका स्थान जहाँ पड़ता है, वहाँ उसका भोग-स्थान कहलाता है। वह छ: नक्षत्रों में मध्यभागम घड़ता है और छ: ऋचत्राम आगे बढ़ जाता है। जिसका वास्तविक मान क्रमसे २९५ कला १५ विकला और ११८५ कला ५२ विकला है, जो स्वल्यान्तरले

शृङ्गोन्नति शुभप्रद है। तिथिके अनुसार चन्द्रमामें शुक्ल न होकर यदि शुक्लतामें हानि (कमौ) हो तो प्रजाके कार्यों में हानि और शुक्लतामें वृद्धि (अधिकता) हो तो प्रजाजनकी वृद्धि होती है*। समतामें समता समझनी चाहिये। यदि चन्द्रमाका विम्ब मध्यम मानसे विशाल (बड़ा) देखनेमें आवे तो सुभिक्षकारक (सस्ती लानेवाला) और छोटा दीख पड़े तो दुर्भिक्षकारक (महँगी या अकाल लानेवाला) होता है। चन्द्रमाका शृङ्ग अधोमुख हो तो शस्त्रका भय लाता है। दण्डाकार हो तो कलह (राजा-प्रजामें युद्ध) होता है। चन्द्रमाका शृङ्ग अथवा विम्ब मङ्गलादि ग्रहों (मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि)-से आहत (भेदित) दीख पड़े तो क्रमशः क्षेम, अन्नादि, वर्षा, राजा और प्रजाका नाश होता है ॥ २३-२६३॥

(भौम-चार-फल-) जिस नक्षत्र में मङ्गलका उदय हो, उससे सातवें, आठवें या नवें नक्षत्र में वक्र हो तो वह 'उष्ण' नामक वक्र होता है। उसमें प्रजाको पीड़ा और अग्निका भय प्राप्त होता है। यदि उदयके नक्षत्रसे दसवें, ग्यारहवें तथा बारहवें नक्षत्रमें मङ्गल वक्र हो तो वह 'अश्वमुख' नामक वक्र होता है। उसमें अन्न और वर्षाका नाश होता है। यदि तेरहवें या चौदहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो 'व्यालमुख' वक्र कहलाता है। उसमें भी अन्न और वर्षाका नाश होता है। पंद्रहवें सोलहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो 'रुधिरमुख' वर्क कहलाता है। उसमें मङ्गल दुर्भिक्ष, क्षुधा तथा रोगको बढ़ाता है। सत्रहवें या अट्ठारहवें नक्षत्रमें 3 वक्र हो तो वह 'मुसल' नामक वक्र होता है। उससे धन धान्यका नाश तथा दुर्भिक्षका भय होता है। यदि मङ्गल पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें उदित होकर उत्तराषाढ़में वक्र हो तथा रोहिणीमें अस्त हो तो तीनों लोकोंके लिये नाशकारी होता है। यदि मङ्गल श्रवणमें उदित होकर पुष्यमें वक्रगति हो तो धनकी हानि करनेवाला होता है ॥२७-३३॥

मङ्गल जिस दिशामें उदित होता है, उस दिशाके राजाके लिये भयकारक होता है। यदि मघा-नक्षत्रके मध्य होकर चलता हुआ मङ्गल उसीमें वक्र हो जाय तो अवर्षण (वर्षाका अभाव) और शस्त्रका भय लाता है तथा राजाके लिये विनाशकारी होता है। यदि मङ्गल मघा, विशाखा या रोहिणीके योगताराका भेदन करके चले तो दुर्भिक्ष, मरण तथा रोग लानेवाला होता है। उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, मूल, श्रवण और मृगशिरा-इन नक्षत्रोंके बीचमें तथा रोहिणीके दक्षिण होकर मङ्गल चले तो अनावृष्टिकारक होता है। मङ्गल सब नक्षत्रोंके उत्तर होकर चले तो शुभप्रद है और दक्षिण होकर चले तो अशुभ फल देनेवाला तथा प्रजामें कलह उत्पन्न करनेवाला होता है ॥ ३४-३७६॥

(बुध-चार-फल-) यदि कदाचित् आँधी, मेघ आदि उत्पात न होनेपर (शुद्ध आकाशमें) में भी बुधका उदय देखने में न आवे तो अनावृष्टि, में अग्निभय, अनर्थ और राजाओंमें युद्धकी सम्भावना समझनी चाहिये। धनिष्ठा, श्रवण, उत्तराषाढ़, मृगशिरा के और रोहिणीमें चलता हुआ बुध यदि उन नक्षत्रों के बायोगताराओंका भेदन करे तो वह लोकमें बाधा में और अनावृष्टि आदिके द्वारा भयकारी होता है। यदि आद्रो, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा और मघा इन नक्षत्रोंमें बुध दृश्य हो तो दुमिक्ष, कलह, रोग तथा अनावृष्टि आदिका भय उपस्थित करनेवाला

४०० और १२०० मान लिये गये हैं। क्रमशः इन्हें ही 'अनागत' और 'गतयोगी' कहा गया है। शेष नक्षत्रकि भोगस्थान अन्तिमांशमें ही पड़ते हैं; अतः इनके मान ८०० कला है। ये ही मध्ययोगी हैं।

“प्रतिपदाके अन्त में (शुक्ल-द्वितीयारम्भमें) चन्द्रमा दृश्य हो तो समता, उससे पश्चात् दृश्य हो तो हानि और पूर्व दृश्य हो तो वृद्धि समझी जाती है।

होता है। हस्तसेछ: (हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुरोधा तथा कोष्ठा) नक्षत्रोंमें बुधके रहनेसे लोकमें कल्याण, सुभिक्ष तथा आरोग्य होता है। उत्तर भाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, कृत्तिका और भरणीमें विचरनेवाला बुध वैध, घोड़े और व्यापारियोंका नाश करनेवाला होता है। पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ और पूर्व भाद्रपदमें विचरता हुआ बुध यदि इन नक्षत्रोंके योगताराओंका भेदन करे तो क्षुधा, शस्त्र, अग्नि और चोरोंसे प्राणियोंको भय प्राप्त होता है ॥३८-४३३॥

भरणी, कृत्तिका, रोहिणी और स्वाती-इन नक्षत्रों में बुधको गति 'प्राकृतिकी' कही गयी है। दो आर्दा, मृगशिरा, आश्लेषा और मघा-इन नक्षत्रोंमें हैं बुधको गति 'मित्रा' मानी गयी है। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य और पुनर्वसु-इनमें बुधकी होते 'संक्षिसा' गति कही गयी। पूर्व भाद्रपद, उत्तर उद भाद्रपद, रेवती और अश्विनी-इनमें बुधको 'तीक्ष्णा'गति होती है। उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़ और मूल में उनकी योगान्तिका गति मानी गयी है। श्रवण, चित्रा, धनिष्ठा और शतभिषामें घोरा गति और विशाखा अनुराधा तथा हस्त-इन नक्षत्रोंमें बुधकी पाप संज्ञक गति होती है। इन प्राकृत आदि सात प्रकारकी गतियोंमें उदित होनेपर जितने दिनतक बुध दृश्य रहता है, उतने ही दिन उनमें अस्त होनेपर अदृश्य रहता है। उन दिनोंकी संख्या क्रमसे और है। बुध जब प्राकृत गतिमें रहता है, तब संसार मे कल्याण आरोग्य और सुभिक्ष(अन्न-वस्त्र आदिकी वृद्धि) करता है। मिश्र और संक्षिप्त गतिमें मध्यम फल देता है तथा अन्य गतियोंमें अनावृष्टि (दुर्भिक्ष)- कारक होता है। वैशाख, श्रावण, पौष और आषाढ़में उदित होनेपर बुध पापरूप फल देता है और अन्य मासोंमें उदित होनेपर वह शुभ फल देता है। आश्विन और कार्तिकमें बुधका उदय हो तो शस्त्र, दुर्भिक्ष और अग्निका भय प्राप्त होता है। यदि उदित हुए बुधको कान्ति चाँदी अथवा स्फटिकके समान स्वच्छ हो तो वह श्रेष्ठ फल देनेवाला होता है ।। ४४-५२ ॥

(बृहस्पति-चार-फल-) कृत्तिका आदि दो-दो नक्षत्रोंके आश्रयसे कार्तिक आदि मास होते हैं; परंतु अन्तिम (आश्विन), पञ्चम (फाल्गुन) और एकादश (भाद्रपद)-ये तीन नक्षत्रोंसे पूर्ण होते हैं। इसी प्रकार बृहस्पतिका जिन नक्षत्रों में उदय होता है, उन नक्षत्रोंसे (मासके अनुसार ही) संवत्सरोंके चाम होते हैं। उन संवत्सरोंमें कार्तिक और मार्गशीर्ष नामक संवत्सर प्राणियोंके नाम होते है। उन संवत्सरोंमें कार्तिक और मार्गशीर्ष नामक संवत्सर प्राणियोंके लिये अशुभ फलदायक होते है। पौष और माघ नामक संवत्सर शुभ फल देनेवाला होते है। फाल्गुन और चैत्र नामक संवत्सर मध्यम(शुभ-अशुभ दोनों) फल देते हैं। वैशाख शुभप्रद और ज्येष्ठ मध्यम फल देनेवाला होता है। आषाढ़ मध्यम और श्रावण श्रेष्ठ होता है तथा भाद्रपद भी कभी श्रेष्ठ होता है और कभी नहीं होता परंतु आश्विन संवत्सर तो प्रजाजनोंके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ होता है।मुनिश्रेष्ठ इस प्रकार संवत्सरोंका फल समझना चाहिये।।

'कृत्तिका आदि नक्षत्रों में पूर्णिमा होनेसे मासों के कार्तिक आदि नाम होते हैं। नीचे चक्रमैं देखिये-

बृहस्पति जब नक्षत्रोंके उत्तर होकर चलता है, तब संसारमें कल्याण, आरोग्य तथा सुभिक्ष करनेवाला होता है। जब नक्षत्रोंके दक्षिण होकर चलता है, तब विपरीत परिणाम (अशुभ, रोगवृद्धि तथा दुर्भिक्ष) उपस्थित करता है तथा जब मध्य होकर चलता है, उस समय मध्यम फल प्रस्तुत करता है। गुरुका विम्ब यदि पीतवर्ण, अग्निसदृश, श्याम, हरित और लाल दिखायी दे तो प्रजाजनोंमें क्रमशः व्याधि, अग्नि, चोर, शस्त्र और अस्त्र का भय उपस्थित होता है। यदि गुरुका वर्ण धूएँके समान हो तो वह अनावृष्टिकारक होता है। यदि गुरु दिनमें (प्रात:-सायं छोड़कर) दृश्य हो तो राजाका नाश, रोगभय अथवा राष्ट्रका विनाश होता है। कृत्तिका तथा रोहिणी ये संवत्सरके शरीर हैं। पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ ये दोनों नाभि हैं, आर्द्रा हृदय और मघा संवत्सरका पुष्प है यदि शरीर पापग्रहसे पीड़ित हो तो दुर्भिक्ष, अगि और वायुका भय उपस्थित होता है। नाभि पापग्रहसे युक्त हो तो क्षुधा और तृषा से पीड़ा होती है। पुष्प पापग्रहसे आक्रान्त हो तो मूल और फलोंका नाश होता है। यदि ह्रदय-नक्षत्र पापग्रहसे पीडित हो तो अन्नादिका नाश होता है। शरीर आदि शुभग्रह से संयुक्त हों तो सुभिक्ष और कल्याणादि शुभ फल प्राप्त होते है। यदि मघा आदि नक्षत्रोंमें बृहस्पति हो तो वह क्रमशः शस्य-वृद्धि प्रजामें आरोग्य, युद्ध अनावृष्टि, द्विजातियोंको पीड़ा गौओंको सुख, राजाओंको सुख, स्त्री-समाजको सुख, वायुका अवरोध, अनावृष्टि, सर्पभय, सुवृष्टि, स्वास्थ्य, उत्सववृद्धि, महार्ष, सम्पत्तिकी वृद्धि, देशका नाश, अतिवृष्टि, निर्वैरता, रोग-वृद्धि, भयकी हानि, रोगभय, अन्नको वृद्धि, वर्षा, रोगकी वृद्धि, धान्यकी वृद्धि और अनावृष्टिरूप फल देता है॥६२-६४ ॥

(शुक्र-चार-फल-)शुक्रके तीन मार्ग हैं- सौम्य (उत्तरा), मध्य और याम्य (दक्षिण)। इनमें से प्रत्येकमें तीन-तीन वीथियाँ हैं और एक- एक वीथीमें बारी बारीसे तीन-तीन नक्षत्र आते हैं। इन नक्षत्रोंको अश्विनीसे आरम्भ करके जानना चाहिये। इस प्रकार उत्तरसे दक्षिणतक शुक्रके मार्गमें क्रमश: नाग, इभ, ऐरावत, वृष, उष्ट्र, खर, मृग, अज तथा. दहन-ये नौ वीथियाँ न हैं।६५-६६ । उत्तरमार्गकी तीन वीथियोंमें विचरण करनेवाला शुक्र धान्य, धन, वृष्टि और शस्य (अन्नकी फस्ल)-इन सब वस्तुओंको पुष्ट एवं हो परिपूर्ण करता है। मध्यमार्गकी जो तीन वीथियाँ हैं, उनमें शुक्रके जानेसे सब अशुभ ही फल प्राप्त होते हैं। मघासे पाँच नक्षत्रोंमे जब शुक्र जाता है तो पूर्व दिशामें उठा हुआ मेघ सुवृष्टिकारक तथा शुभप्रद होता है। स्वातीसे तीन नक्षत्रतक जब शुक्र रहता है तब पश्चिम दिशा(देश)-में मेघ सुवृष्टिकारक और शुभदायक होता है। शेष सब नक्षत्रोंमें उसका फल विपरीत (अनावृष्टि और दुर्भिक्ष करनेवाला) होता है। शुक्र जब बुधके

१. जो हाथमें धारण किये हुए ही चलाया जाता है, वह शस्त्र है; जैसे तलवार आदि; तथा जो हाथसे फेंककर चलाया जाता है, वह अस्त्र कहलाता है, जैसे बाण इरबंदूककी गोली आदि।

२. शुक्रके ३ मार्ग और ९ वीथियाँ इस प्रकार हैं-

साथ रहता है तो सुवृष्टिकारक होता है। कृष्णपक्षकी अष्टमी, चतुर्दशी और अमावास्या में यदि शुक्रका उदय या अस्त हो तो पृथ्वी जलसे परिपूर्ण होती है। गुरु और शुक्र परस्पर सप्तम राशिमें हों तथा एक पूर्व वीथीमें और दूसरा पश्चिम वीथीमें विद्यमान हो तो वे दोनों देशमें अनावृष्टि तथा दुर्भिक्ष लानेवाले और राजाओंमें परस्पर युद्ध करानेवाले होते हैं। मङ्गल, बुध, गुरु और शनि यदि शुक्रसे आगे होते हैं तो युद्ध, अतिवायु, दुर्भिक्ष और अनावृष्टि करनेवाले होते हैं ।। ६७-७२ ॥ पूर्वाषाढ़, अनुराधा, उत्तराफाल्गुनी, आश्लेषा, ज्येष्ठा-इन नक्षत्रोंमें शुक्र हो तो वह सुभिक्षकारक होता है। मूलमें हो तो शस्त्रभय और अनावृष्टि देनेवाला होता है। उत्तर भाद्रपद और रेवतीमें शुक्रके रहनेपर भय प्राप्त होता है।। ७३ ।।.

(शनि-चार-फल-) श्रवण, स्वाती, हस्त, आर्द्रा, भरणी और पूर्वाफाल्गुनी-इन नक्षत्रों में विचरनेवाला शनि मनुष्योंके लिये सुभिक्ष, आरोग्य तथा खेतीकी उपज बढ़ानेवाला होता है ॥ ७४ ।। जन्मनक्षत्रसे प्रारम्भ करके मनुष्याकृति शनि- चक्रके मुखमें एक, गुदामें दो, सिरमें तीन, नेत्रों में दो, हृदयमें पाँच, बायें हाथमें चार, बायें पैरमें तीन, दक्षिण यादमें तीन तथा दक्षिण हाथमें चार- इस तरह नक्षत्रोंकी स्थापना करे। शनिका वर्तमान नक्षत्र जिस अङ्गमें पड़े, उन से फल निम्नलिखितरूपसे जानना चाहिये। शनि नक्षत्र मुखमें - हो तो रोग, गुदामें हो तो लाभ, सिरमें होतो हानि, नेत्रमें हो तो लाभ, उदय होतो सुख, बायेंधातो बन्धन बाये पैमोमो परिश्रम दाहिने पैरमें हो तो श्रेष्ठ यात्रा और दाहिने हाथमें हो तो धन-लाभ होता है। इस प्रकार क्रमशः फल कहे गये हैं।। बहुधा वक्रगामी होनेपर शनि इन फलोंकी प्राप्ति कराता ही है। यदि वह सम मार्गपर हो तो फल भी मध्यम होता है और यदि वह शीघ्रगति हो तो उत्तम फल प्राप्त होते हैं ।।७८॥

(राहु-चार-फल-) भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे राहुका मस्तक काट दिया तो भी अमृत पी लेने के कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई; अतः उसे ग्रहके पदपर प्रतिष्ठित कर लिया गया ॥७९॥ वह ब्रह्माजीके वरमे सम्पूर्ण पर्वो (पूर्णिमा और अमावास्या)- के समय चन्द्रमा और सूर्यको पीड़ा देता है। किंतु 'शर' तथा 'अवनति' अधिक होनेके कारण वह उन दो से दूर ही रहता है ।।८०॥ एक सूर्यग्रहणके बाद दूसरे सूर्यग्रहणका तथा एक चन्द्रग्रहणके बाद दूसरे चन्द्रग्रहणका विचार छ; मासपर पुन: कर लेना चाहिये। प्रति छः मासपर क्रमशः ब्रह्मादि सात देवता पर्वेश (ग्रहणके अधिपति) होते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- ब्रह्मा, चन्द्रमा, इन्द्र, कुवेर, वरुण, अग्नि तथा यम। ब्राह्मपर्व में ग्रहण होनेपर पशु, धान्य और द्विजोंकी वृद्धि होती हैं ।।८१-८२॥ चन्द्रपर्वमें ग्रहण हो तो भी ऐसा ही फल होता है, विशेषता इतनी ही है कि लोगोंको कफसे पोड़ा होती है। इन्द्रपर्वम ग्रहण होनेपर राजाऑमें विरोध, जगत दुःख तथा खेती बारीका नाश होता है। वारुणपर्वमें ग्रहण होजेपर राजाओंका अकल्याण और प्रजाजनोंका कल्याण होता है।८३-८४॥ अग्रिपर्वमें ग्रहण हो तो वृष्टि, धान्यवृद्धि तथा कल्याणकी प्राप्ति होती है और यमपर्वमें ग्रहण होनेपर बर्माका अभाव, सेतोकी हानि तथा दुर्भिक्षरूप - फल प्रास होते हैं ।। ८५॥ बेलादीन राममर्गे अर्थात् बलासे पहले ग्रहण हो तो खेतीकी हानि तथा व राजाऑको दारण भय प्रास होता है और 'अतिवेल' वाला बेला वितालार पत्ण हो तो पूतोंको हानि होती, जमात भय होता है और खेती

*गणिद्यते प्रहणका जो समय प्राप्त होता तो उससे पहले ग्रहण होना वेलाहीन है और उसे बिताकर जो ग्रहण होता है, वह अतिवेल कहलाता है।

चौपट हो जाती है जब एक ही मासमें चन्द्रमा-सूर्य-दोनोंका ग्रहण होते राजाओं में विरोध होता है तथा धन और वृष्टिका विनाश होता है । ८७ ॥ ग्रहण लगे हुए चन्द्रमा और सूर्यका उदय अथवा अस्त हो तो वे राजाओं और धान्योंका विनाश करनेवाले होते हैं। यदि चन्द्रमा और सूर्यका सर्वग्रास ग्रहण हो तो वे भूखमरी, रोग तथा अनिका भय उपस्थित करनेवाले होते हैं।८८॥

उत्तरायणमें ग्रहण हो तो ब्राह्मणों और क्षत्रियों की हानि होती है तथा दक्षिणायनमें ग्रहण होनेपर अन्य वर्णक लोगोंको हानि पहुँचती है। सूर्य या चन्द्रमाके विम्बके उत्तर, पूर्व आदि भागमें यदि राहुका दर्शन हो (स्पर्श देखने में आवे) तो वह क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंको हानि पहुँचाता है ॥८९॥ इसी तरह ग्रहणके समय ग्रासके और मोक्षके भी दस-दस भेद होते हैं। जिनकी सूक्ष्म गतिको देवता भी नहीं जान सकते, फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ॥९०॥ गणितद्वारा ग्रहोंको लाकर उनके 'चार' (गतिमान, स्पर्श और मोक्ष कालकी स्थिति)-पर विचार करना चाहिये। जिससे उन ग्रहोंद्वारा ग्रहणकालके शुभ और अशुभ लक्षण (फल)-को हम देख और जान सकें ॥९१ ॥ अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उस समयका ज्ञान प्रास करनेके लिये है अनुसंधान करे। धूम-केतु आदि तारोंका उद और अस्त मनुष्योंके लिये उत्पातरूप होता है॥९२ वे उत्पात दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष भेदसे तीन प्रकारके हैं। वे शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके फल देनेवाले हैं। आकाशमें यज्ञकी ध्वजा, अस्त्र-फ शस्त्र, भवन और बड़े हाथीके सदृश तथा खंभा, त्रिशूल और अंकुश-इन वस्तुओंके समान जो हैं केतु दिखायी देते हैं, उन्हें 'आन्तरिक्ष' उत्पात है। कहते हैं। साधारण ताराके समान उदित होकर सा किसी नक्षत्रके साथ केतु हो तो 'दिव्य' उत्पात शुक् कहा गया है। भूलोकसे सम्बन्ध रखनेवाले (भूकम्प आदि) उत्पातोंको 'भौम' उत्पात कहते हैं ॥९३-९४॥ केतुतारा एक होकर भी प्राणियोंको अशुभ फल देनेके लिये भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है। जितने दिनोंतक आकाशमें विविधरूपधारी केतु देखनेमें आता है, उतने ही मास या सौर वर्षांतक वह अपना शुभाशुभ फल देता है। जो दिव्य केतु हैं, वे सदा प्राणियोंको विविध फल देनेवाले होते हैं । ९५-९६॥ ह्रस्व, चिकना और प्रसन्न (स्वच्छ) श्वेत रङ्गका केतु सुवृष्टि देता है। शीघ्र अस्त होनेवाला विशाल केतु अवृष्टि देता है ॥९७॥ इन्द्रधनुषके समान कान्तिवाला धूमकेतु तारा अनिष्ट फल देता है। दो, तीन या चार रूपोंमें प्रकट त्रिशूलके समान आकारवाला केतु राष्ट्रका विनाशक होता है ।।९८॥ पूर्व तथा पश्चिम दिशामें सूर्य-सम्बन्धी केतु मणि, हार एवं सुवर्णके समान देदीप्यमान दिखायी दे तो उन दिशाओंके राजाओंकी हानि होती है।९९॥ पलाश, विम्बफल, रक्त और तोतेकी चोंच आदिके समान वर्णका केतु अग्निकोणमें उदित हो तो शुभ फल देनेवाला होता है ॥१००॥ भूमिसम्बन्धी केतुओंकी कान्ति जल एवं तेलके समान होती है। वे भूखमरीका भय देनेवाले हैं। चन्द्रजनित केतुओंका वर्ण श्वेत होता है। वे सुभिक्ष और कल्याण प्रदान करनेवाले होते हैं ॥१०१॥ ब्रह्मदण्डसे उत्पन्न तथा तीन रंग और तीन अवस्थाओंसे युक्त धूमकेतु नामक पितामहजनित (आन्तरिक्ष) केतु प्रजाओंका विनाश न करनेवाला माना गया है॥१०२॥ यदि ईशानकोणमें श्वेतवर्णके शुक्रजनित केतु उदित हों तो वे अनिष्ट फल देनेवाले होते हैं। शिखारहित एवं कनकनामसे प्रसिद्ध शनैश्चरसम्बन्धी केतु भी अनिष्ट फलदायक हैं॥१०३ ॥ गुरुसम्बन्धी केतुओंकी विकच संज्ञा है। वे दक्षिण दिशामें प्रकट होनेपर भी अभीष्ट साधक माने गये हैं। उसी दिशामें सूक्ष्म तथा शुक्लवर्णवाले बधसम्बन्धी केतु हों तो वे चोर न तथा रोगका भय प्रदान करनेवाले हैं॥१०४।।

कंकुमनामसे प्रसिद्ध माल-सम्बन्धी केतु लाल रंगके होते हैं। उनकी आकृति सूर्यके समान होती है। वे भी उक्त दिशामें उदित होनेपर अनिष्टदायक होते हैं। अग्निके समान कान्तिवाले अग्निसम्बन्धी केतु विश्वरूप नामसे प्रसिद्ध हैं। वे अग्रिकोणमें उदित होनेपर सुखद होते हैं॥१०५ ॥ श्याम वर्णवाले सूर्यसम्बन्धी केतु अरुण कहलाते हैं। वे पाप अर्थात् दुःख देनेवाले होते हैं। रीछके समान रंगवाले शुक्रसम्बन्धी केतु शुभदायक होते हैं॥१०६ ॥ कृत्तिका तारामें उदित हुआ धूमकेतु निश्चय ही प्रजाजनोंका नाश करता है। राजमहल, वृक्ष और पर्वतपर प्रकट हुआ केतु राजाओंका नाश करनेवाला होता है ॥१०७॥ कुमुद पुष्पके समान वर्णवाला कौमुद नामक केतु सुभिक्ष लानेवाला होता है। संध्याकालमें मस्तकसहित उदित हुआ गोलाकार केतु अनिष्ट फल देनेवाला होता है। १०८॥

 (कालमान-) ब्राह्म, दैव, मानव, पित्र्य, सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र तथा बार्हस्पत्य-ये नौ मान होते हैं॥१०९॥ इस लोकमें इन नौ मानोंमेंसे पाँचके ही द्वारा व्यवहार होता है। किंतु उन नवों मानोंका व्यवहारके अनुसार पृथक्-पृथक् कार्य बताया जायगा ।। ११० ॥ सौर मानसे ग्रहोंको सब प्रकारकी गति (भगणादि) जाननी चाहिये। वर्षाका समय तथा स्त्रीके प्रसवका समय सावन मानसे ही ग्रहण किया जाता है।।१११॥ वर्षोंकेतरका | घटीमान आदि नाक्षत्र मानसे ही लिया जाता है। यज्ञोपवीत, मुण्डन, तिथि एवं वर्षेशका निर्णय तथा पर्व, उपवास आदिका निश्चय चान्द्र मानसे है किया जाता है। बार्हस्पत्य मानसे प्रभवादि संवत्सरका स्वरूप ग्रहण किया जाता है। ११२-११३ ॥ उन मानोंक अनुसार बारह महीनों का उनकल अपना अपना विभिन्न वर्ष होता है। बृहस्पतिकी अपनी ग मध्यम गतिसे प्रभव आदिनामवाले साल संवत्सर

होते हैं ॥११४॥ प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अङ्गिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित, सर्वधारी, विरोधी, विकृत, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी, शर्वरी, प्लव, शुभकृत, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवङ्ग, कीलक, सौम्य, समान, विरोधकृत, परिभावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, अनल, पिङ्गल, कालयुक्त, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोदारी, रक्ताक्ष, क्रोधन तथा क्षय-ये साठ संवत्सर जानने चाहिये। ये सभी अपने नामके अनुरूप फल देनेवाले हैं। पाँच वर्षों का युग होता है। इस तरह साठ संवत्सरों में बारह युग होते हैं ॥११५-१२१ ॥ उन युगोंके स्वामी क्रमश: इस प्रकार जानने चाहिये- विष्णु, बृहस्पति, इन्द्र, लोहित, त्वष्टा, अहिर्बुभ्य, पितर, विश्वेदेव, चन्द्रमा, इन्द्रागि, अश्विनीकुमार तथा भगा। इसी प्रकार युगके भीतर जो पाँच वर्ष होते हैं, उनके स्वामी क्रमशः अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्मा

और शिव हैं ।।१२२-१२३॥

संवत्सरके राजा, मन्त्री तथा धान्येशरूप ग्रहोंके बलाबलका विचार करके तथा उनकी तात्कालिक स्थितिको भी भलीभांति जानकर संवत्सरका फल समझना चाहिये ।। १२४॥ मकरादि छः राशियों में छ: मासतक सूर्य के भोगसे सौम्यायन (उत्तरायण) । होता है। वह देवताओंका दिन और कादि छः राशियोंमें छ: मासतक सूर्यके भोगसे दक्षिणायन होता है, वह देवताओंकी रात्रि है।।१२५ ।। गृहप्रवेश, विवाह, प्रतिष्ठा तथा यज्ञोपवीत आदि शुभकर्म माघ आदि उत्तरायणके मासॉमें करने चाहिये॥१२६॥ दक्षिणायना का कार्य गति (त्याज्य) माना गया। यताश्यकता हो तो उस समय याभ होता है*। माघसे

*मार्गशीर्षमपीच्छन्ति विवाहे केपि कोविदाः।

कुछ विद्वान् अगहनमें भी विवाह होना ठीक मानते है इस मान्यताके अनुसार अगहन में दक्षिणायन होनेपर भई विवाह हो सकता है।

दो मासोंकी शिशिरादि छ: ऋतुएं हाता हैं ॥१२७॥ मकरसे दो-दो राशियोंमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमशः शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म-ये तीन ऋतुएँ उत्तरायणमें होती हैं और कर्कसे दो- दो राशियोंमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमशः वर्षा, शरद् और हेमन्त-ये तीन ऋतुएँ दक्षिणायनमें होती हैं॥१२८॥ शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे अमावास्यातक 'चान्द्र मास' होता है। सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तितक 'सौर मास' होता है। तीस दिनोंका एक 'सावन मास' होता है और चन्द्रमाद्वारा सब नक्षत्रोंके उपभोगमें जितने दिन लगते हैं, उतने अर्थात् २७ दिनोंका एक 'नाक्षत्र मास' होता है ॥ १२९॥ मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभः, नभस्य, इष, उर्ज, सहाः, सहस्य, तप और तपस्य-ये चैत्रादि बारह मासोंकी संज्ञाएँ हैं। जिस मासकी पौर्णमासी जिस नक्षत्रसे युक्त हो, उस नक्षत्रके नामसे ही उस मासका नामकरण होता है। (जैसे जिस मासकी पूर्णिमा चित्रा नक्षत्रसे युक्त होती है, उस मासका नाम 'चैत्र' होता है और वह पौर्णमासी भी उसी नामसे विख्यात होती है, जैसे चैत्री, वैशाखी आदि।) प्रत्येक मासके दो पक्ष क्रमशः देवपक्ष और पितृपक्ष हैं, अन्य विद्वान् उन्हें शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष कहते हैं ॥ १३०-१३२ ॥ वे दोनों पक्ष शुभाशुभ कार्योंमें सदा उपयुक्त माने जाते हैं। ब्रह्मा, अग्नि, विरञ्ज्ञि, विष्णु, गौरी, गणेश, यम, सर्प, चन्द्रमा, कार्तिकेय, सूर्य, इन्द्र, महेन्द्र, वासव, नाग, दुर्गा, दण्डधर, शिव, विष्णु, हरि, रवि, काम, शंकर, कलाधर, यम, चन्द्रमा (विष्णु, काम और शिव)-ये सब शुक्ल प्रतिपदासे लेकर क्रमश: उनतीस तिथियोंके स्वामी होते हैं। अमावास्या नामक तिथिके स्वामी पितर माने गये हैं।

(तिथियोंकी नन्दादि पाँच संज्ञा-) प्रतिपदा आदि तिथियोंकी क्रमशः नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा-ये पाँच संज्ञाएँ मानी गयी हैं। पंद्रह तिथियों में इनकी तीन आवृत्ति करके इनका पृथक् पृथक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। शुक्लपक्षमें प्रथम आवृत्तिकी (१, २, ३, ४, ५-ये) तिथियाँ अधम द्वितीय आवृत्तिकी (६, ७, ८, ९, १०-ये) तिथियों मध्यम और तृतीय आवृत्तिकी (११, १२, १३, १४, १५-ये) तिथियाँ शुभ होती हैं। इसी प्रकार कृष्णपक्षकी प्रथम आवृत्तिकी नन्दादि तिथियाँ इष्ट (शुभ), द्वितीय आवृत्तिको मध्यम और तृतीय आवृत्तिकी अनिष्टप्रद (अधम) होती हैं। दोनों पक्षोंकी ८, १२, ६, ४, ९, १४-ये तिथियाँ पक्षरन्ध्र कही गयी हैं। इन्हें अत्यन्त रूक्ष कहा गया है। इनमें क्रमश: आरम्भकी ४, १४, ९, ९, २५ और ५ घड़ियाँ सब शुभ कार्यों में त्याग देने योग्य हैं। अमावास्या और नवमीको छोड़कर अन्य सब विषम तिथियाँ (३, ५, ७, ११, १३) सब कार्यों में प्रशस्त हैं। शुक्लपक्षको प्रतिपदा मध्यम है (कृष्ण पक्षकी प्रतिपदा शुभ है)।

षष्ठीमें तैल, अष्टमीमें मांस* चतुर्दशीमें क्षौर एवं पूर्णिमा और अमावास्यामें स्त्रीका सेवन त्याग दे। अमावास्या, षष्ठी, प्रतिपदा, द्वादशी, सभी पर्व और नवमी-इन तिथियों में कभी दातौन नहीं करना चाहिये। व्यतीपात, संक्रान्ति, एकादशी, पर्व, रवि और मङ्गलवार तथा षष्ठी तिथि और हैं। वैधृति योगमें अभ्यञ्जन (उबटन) का निषेध है। जोय दशमी तिथिमें आँवलेसे स्नान करता नव, है, उसको पुत्रकी हानि उठानी पड़ती है। वि, त्रयोदशीको आँवलेसे स्नान करनेपर धनका नाश पण होता है और द्वितीयाको उससे स्नान करनेवालोंके कर धन और पुत्र दोनोंका नाश होता है। इसमें संशय ल्या नहीं है। अमावास्या, नवमी और सप्तमी-इन तीन तिथियों में आँवलेसे स्नान करनेवालोंके तपदा कुलका विनाश होता है ।। १३३-१४४॥

जो पूर्णिमा दिनमें पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हो

*मांस तो सबके लिये सदा ही त्याज्य है, किंतु जो मांसाहारी है उन्हें भी अष्टमीको तो मांस त्याग ही देना चाहिये।

(अर्थात् जिसमें रात्रिके समय चन्द्रमा कलाहीन हो) वह पूर्णिमा 'अनुमती' कहलाती है और जो रात्रिमें पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हो वह 'राका' कहलाती है। इसी प्रकार अमावास्या भी दो प्रकारकी होती है। जिसमें चन्द्रमाकी किंचित् कलाका अंश शेष रहता है, वह 'सिनीवाली' कही गयी है तथा जिसमें चन्द्रमाको सम्पूर्ण कला लुप्त हो जाती है, वह अमावास्या 'कुहू' कहलाती है ॥१४५-१४६ ॥

(युगादि तिथियाँ-) कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी सत्ययुगको आदि तिथि है (इसी दिन सत्ययुगका प्रारम्भ हुआ था), वैशाख शुक्लपक्षकी पुण्यमयी तृतीया त्रेतायुगकी आदि तिथि है। माघको अमावास्या द्वापरयुगकी आदि तिथि और भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी कलियुगको आदि तिथि है। (ये सब तिथियाँ अति पुण्य देनेवाली कही गयी हैं) ॥ १४७-१४८ ॥

( मन्वादि तिश्चियाँ-) कार्तिक शुक्ला द्वादशी, आश्विनशुक्ला नवमी, चैत्रशुक्ला तृतीया, भाद्रपदशुक्ला तृतीया, पौषशुक्ला एकादशी, आषाढशुक्ला दशमी, माघशुक्ला ससमी, भाद्रपदकृष्णा अष्टमी, श्रावणको अमावास्या, फाल्गुनको पूर्णिमा, आषाढको पूर्णिमा, कार्तिकको पूर्णिमा, ज्येष्ठको पौर्णमासी और चैत्रको पूर्णिमा-ये चौदह मन्वादि तिधियाँ हैं। ये सब तिथियों मनुष्योंके लिये पितृकर्म (पार्वण-श्राड)- में अत्यन्त पुण्य देनेवाली हैं ॥ १४९-१५१३ ॥

(गजच्छाया-योग-) भादोंके कृष्णपक्षकी (शुक्लादि क्रमसे भाद्रकृष्ण और कृष्णादि क्रमसे आश्विन कृष्ण पक्षकी) त्रयोदशीमें यदि सूर्य हस्त- नक्षत्र में और चन्द्रमा मघामें हो तो 'गजच्छाया' नामक योग होता है; जो पितरोंके पार्वणादि श्राद्ध कर्ममें अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाला है।। १५२३ ॥

किसी एक दिनमें तीन तिथियोंका स्पर्श हो तो क्षयतिथि तथा एक ही तिथिका तीन दिनमें- स्पर्श हो तो अधिक तिथि (अधितिथि) होती है। ये दोनों ही निन्दित हैं। जिस दिन सूर्योदयसे सूर्यास्तपर्यन्त जो तिथि रहती है, उस दिन वह अखण्ड तिथि' कहलाती है। यदि सूर्यास्तसे पूर्व ही समाप्त होती है तो वह 'खण्ड तिथि' कही जाती है ।। १५३ १५४६॥

(क्षणतिथिकथन-) प्रत्येक तिधिमें तिथि- मानका पंद्रहवाँ भाग 'क्षणतिथि' कहलाता है। (अर्थात् प्रत्येक तिथिमें उसी तिथिसे आरम्भ करके पंद्रह तिथियोंके अन्तभोंग होते हैं।) तथा उन क्षणतिथियोंका भी आधा क्षण तिथ्यर्ध (क्षण करण) होता है ।। १५५६॥

(वारप्रकरण-) रवि स्थिर, सोम चर, मङ्गल

१. अमावास्था प्रायः दो दिन हुआ करती है। उनमें प्रथम दिनकी 'सिनीवाली' और दूसरे दिनकी 'कुहू' होती है। चतुर्दशीषुका अमावास्याका क्षय न हो तो वह सिनीवाली होती है।

२. अमावास्यान्त' मासकी दृष्टिसे यहाँ भादोंका कृष्णपक्ष कहा गया है। जहाँ पूर्णिमान्त मास माना जाता है, वहाँक लिये इस भादोंका अर्थ आश्विन समझना चाहिये।

३. जैसे प्रतिपदाका भोगमान (आरम्भसे अन्ततक) ६० घड़ी है तो उस तिथिमें आरम्भसे ४ बड़ी प्रतिपदा है, उसके बादकी ४ घड़ी द्वितीया है और उसके बादको ४ घड़ी तृतीया है। इसी प्रकार आगे भी चतुर्थी आदि सब तिथि प्राप्त होती है। इसी तरह द्वितीयामें भी द्वितीया आदि सब तिधियोंका भोग समझना चाहिये तथा क्षणतिथिमें भी २-३ घड़ी क्षणकरणका मान समझना चाहिये। इसका प्रयोजन यह है कि जिस तिथिमें जो कार्य शुभ या अशुभ कहा गया है, वह क्षणतिथिमें भी शुभ या अशुभ समझना चाहिये। जैसे चतुर्दशीमें क्षौर कराना अशुभ कहा गया है तो तृतीया आदि अन्य तिथियों में भी जब चतुर्दशी क्षणतिधिके रूपमें प्राप्त हो तो उसमें क्षौर कराना अशुभ होता है तथा चतुर्दशीमें भी आवश्यक हो तो अन्य तिथिके भोगसमयमें क्षौर कराने में दोष नहीं समझा जायगा। विशेष आवश्यक शुभ कार्य ही तिथि और क्षणतिथिका विचार करना चाहिये।

क्रूर, बुध अखिल (सम्पूर्ण), गुरु लघु, शुक्र मृदु और शनि तीक्ष्ण धर्मवाला है।

(वारों में तेल लगानेका फल-)जो मनुष्य रविवारको तेल लगाता है, वह रोगी होता है। सोमवारको तेल लगानेसे कान्ति बढ़ती है। मङ्गलको व्याधि होती है। बुधको तैलाभ्यङ्गसे सौभाग्यकी वृद्धि होती है। गुरुवारको सौभाग्यकी हानि होती है, शुक्रवारको भी हानि होती है तथा शनिवारको तेल लगानेसे धन-सम्पत्तिकी वृद्धि होती है ॥१५६-१५८॥

(रवि आदि वारोंका आरम्भकाल-) जिस समय लङ्कामें (भूमध्यरेखापर) सूर्योदय होता है, उसी समयसे सर्वत्र रवि आदि वारोंका आरम्भ होता है। उस समयसे देशान्तर (लोदयकालसे अपने उदय कालका अन्तर) और चरार्ध घटीतुल्य आगे या पीछे अन्य देशमें सूर्योदय हुआ करता है ॥१५९॥ जो ग्रह बलवान् होता है, उसके वारमें जो कोई भी कार्य किया जाता है, वह सिद्ध हुआ करता है। किंतु जो ग्रह बलहीन (जातक-अध्यायमें कहे हुए बलसे रहित) होता है, उसके वारमें बहुत यज करनेपर भी कार्य सिद्ध नहीं होता है ।।१६०।। सोम, बुध, बृहस्पति और शुक्र सम्पूर्ण शुभ कार्यों में शुभप्रद होते हैं, अन्य चार (शनि, रवि और माल) क्रूर कर्ममें इष्टसिद्धिदायक होते हैं ॥११॥

सूर्यका वर्ण लाल है, चन्द्रमा गौर वर्णक है, मङ्गल अधिक लाल हैं, बुधको कान्ति दूर्वादलके समान श्याम है, गुरुका वर्ण सुवर्णके सदृश पीत है, शुक्र श्वेत और शनि कृष्ण वर्णके हैं। इसलिये उन ग्रहोंके चारों में इनके गुण और वर्णक अनुरूप कार्य ही सिद्ध एवं हितकर होते हैं।

(निन्द्य मुहूर्त-) रविवारसे आरम्भ करके- रविमें ७,५, ४, सोममें ६, ४, ७, मङ्गलमें ५, ३, २, बुध, ४, २, ५, गुरुवारमें ३,१,८; शुक्रवारमें २, ७, ३ और शनिमें १,६,८-ये प्रहराध क्रमशः कुलिक, उपकुलिक और वारवेला कहे गये हैं। इनका मान आये पहरका समझना चाहिये ।। १६.२-१६५ ॥

(प्रत्येक चार क्षणवार कथन-) जिस बार क्षणवार, जानना हो उस चारमें प्रथम क्षणवार उसी वारपतिका होता है। उससे छठे वारेशका द्वितीय, उससे भी छठेका तृतीय, इस प्रकार छठे छलेक क्रमसे दिन-रात २४ क्षणवार (कालहोय या होय) होते हैं। एक एक क्षणवारका मान हाई बाई पटी (था १ पटा),'॥१९६-१९७॥

(क्षणवारका प्रयोजन-) जिस वारमें जो

१. इससे सिद्ध होता है कि अपने-अपने सूर्योदयकालसे देशान्तर और चरार्धकाल आगे या पीछे वारप्रवेश हुआ करता है।

२. दिन-रातमें होरा जाननेका चक्र-

कर्म शुभ या अशुभ कहा गया है, वह उसके क्षणवारमें भी उसी प्रकार शुभ-अशुभ समझना चाहिये॥१६७३॥

(नक्षत्राधिपति-कथन-)१ दन (अश्विनी- कुमार), २ यम, ३ अग्नि, ४ ब्रह्मा, ५ चन्द्र, ६ शिव, ७ अदिति, ८ गुरु, ९ सर्प, १० पितर, ११ भग, १२ अर्यमा, १३ सूर्य, १४ विश्वकर्मा, १५ वायु, १६ इन्द्र और अग्नि, १७ मित्र, १८ इन्द्र, १९ राक्षस (निति), २० जल, २१ विश्वेदेव, २२ ब्रह्मा, २३ विष्णु, २४ वसु, २५ वरुण, २६ अजैकपाद, २७ अहिर्बुध्न्य और २८ पूषा-ये क़मशः (अभिजिससहित) अश्विनी आदि २८ नक्षत्रोंके स्वामी कहे गये हैं॥१६८१७० ।।

(नक्षत्रोंके मुख-) पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, नौ पूर्व भाद्रपद, मधा, आश्लेषा, कृत्तिका, विशाखा, हैं भरणी, मूल-ये नौ नक्षत्र अधोमुख (नीचे मुखवाले) हैं। इनमें बिलप्रवेश (कुआँ, भूविवर या पाताल आदिमें जाना), गणित, भूतसाधन, लेखन, शिल्प (चित्र आदि) कला, कुआँ खोदना तथा गाड़े हुए धनको निकालना आदि सब कार्य सिद्ध होते हैं ॥ १७१-१७२ ।।

अनुराधा, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, रेवती, अश्विनी और स्वाती-ये नौ नक्षत्र तिर्यक् (सामन) मुखवाले हैं। इनमें हल जोतना, यात्रा करना, गाड़ी बनाना, पत्र लिखकर भेजना, हाथी, ऊँट आदिकी सवारी करना, गदहे, बैल आदिसे चलनेवाले रथ बनाना, नौकापर चलना तथा भैंस, घोड़े आदि-सम्बन्धी कार्य करने चाहिये ।। १७३-१७४।।

रोहिणी, वण, आर्द्रा, पुष्य, शतभिषा, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ तथा उत्तर भाद्रपद-ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुख (ऊपर मुखवाले) कहे गये हैं। इनमें राज्याभिषेक, मङ्गल (विवाहादि) कार्य, गजारोहण, ध्वजारोपण, मन्दिर निर्माण, तोरण (फाटक) बनाना, अगोद लगाना और चहरदोवारी बनबाना आदि काय सिद्ध होते हैं। ।।३७०- १७६ ।।

क्षणवार (होरेश) जाननेका प्रकार यह है कि जिस दिन होरेश (क्षणवार)-का विचार करना हो. उस दिनका प्रथम घंटा उसी दिनका क्षणवार होता है। इससे आगे उससे छठे-छठे दिनका क्षणवार समझे। जैसे रविवार वारप्रवेश-कालसे पहला घंटा रविका, दूसरा घंटा रविसे ळले शुक्रका, तीसरा घंटा शुक्रसे छठे बुधका इत्यादि क्रमसे ऊपर चक्रमें देखिये।

 (नक्षत्रोंकी ध्रुवादि संज्ञा-)रोहिणी, उत्तरा-फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ और उत्तर भाद्रपद-ये ध्रुवनामक नक्षत्र हैं। हस्त, अश्विनी और पुष्य-ये क्षिप्रसंज्ञक हैं। विशाखा और कृत्तिका-ये दोनों साधारणसंज्ञक हैं। धनिष्ठा, पुनर्वसु, शतभिषा, स्वाती और श्रवण-ये चरसंज्ञक हैं। मृगशिरा, अनुराधा, चित्रा तथा रेवती-ये मृदुनामक नक्षत्र हैं। पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्व भाद्रपद और भरणी-ये उग्रसंज्ञक नक्षत्र हैं। मूल, आर्दा, आश्लेषा और ज्येष्ठा-ये तीक्ष्णनामक नक्षत्र हैं। ये सब अपने नामके अनुसार ही फल देते हैं (इसलिये इन नक्षत्रोंमें इनके नामके अनुरूप ही कार्य करने चाहिये) ॥ १७७-१७८३॥

(कर्णवेध-मुहूर्त-) चित्रा, पुनर्वसु, अवण, हस्त, रेवती, अश्विनी, अनुराधा, धनिष्ठा, मृगशिरा और पुष्य-इन नक्षत्रोंमें कर्णवेध हितकर होता है।

(हाथी और घोड़ेसम्बन्धी कार्य-) अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा और स्वाती- इनमें तथा स्थिरसंज्ञक नक्षत्रों में हाथीसम्बन्धी सब कृत्य करने चाहिये; तथा इन्हीं नक्षत्रोंमें घोड़ेके भी सब कृत्य शुभ होते हैं; किंतु रविवारको इन कृत्योंका त्याग कर देना चाहिये ॥ १७९-१८१ ॥

(अन्य पशुकृत्य-) चित्रा, शतभिषा, रोहिणी तथा तीनों उत्तरा-इन नक्षत्रोंमें पशुओंको कहाँसे लाना या ले जाना शुभ है। परंतु अमावास्या, अष्टमी और चतुर्दशीको कदापि पशुओंका कोई कृत्य नहीं करना चाहिये ॥ १८२॥

(प्रथम हलप्रवाह-हल जोतना-) मूड धूव क्षिप और चरसंज्ञक नक्षत्र, विशाखा मघा और मूल-इन नक्षत्रोंमें बैलोहारा प्रथम बार हल जोतना शुभ होता है। सूर्य जिस नक्षत्र हो उससे पिछले नक्षत्र में बैलों द्वारा प्रथम बार हल जोतना शुभ होता है। सूर्य जिस नक्षत्रमें हो, उससे पिछले नक्षत्रसे तीन नक्षत्र हलके आदि(मूल)-में रहते हैं। इनमें प्रथम बार हल जोतने- जुतानेसे बैलका नाश होता है। उसके आगे तीन नक्षत्र हलके अग्रभागमें रहते हैं। इनमें हल जोतनेसे वृद्धि होती है। उससे आगे के पाँच नक्षत्र उत्तर पाश्वमें रहते हैं, इनमें लक्ष्मीप्राप्ति होती है। तीन शूलोंमें नौ नक्षत्र रहते हैं। इनमें इल जोतनेसे कृषककी मृत्यु होती है। उससे आगे पाँच नक्षत्रों में सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। फिर उससे आगेके तीन नक्षत्रों में प्रथम बार हल जोतनेसे श्रेष्ठ फल प्राप्त होते हैं ॥१८३-१८५॥

(बीज-वपन-) मृदु, ध्रुव और क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र, मघा, स्वाती, धनिष्ठा और मूल-इनमें धान्यके बीज बोना श्रेष्ठ होता है। इस बीज- वपनमें राहु जिस नक्षत्रमें हो, उससे तीन नक्षत्र लाङ्गल-चक्रके अग्रभागमें रहते हैं। इन तीनोंमें बीज-वपनसे धान्यका नाश होता है। उससे आगेके तीन नक्षत्र गलेमें रहते हैं, उनमें बीज-वपनसे जलकी अल्पता होती है। उससे आगेके बारह नक्षत्र ठदरमें रहते हैं, उनमें बीज बोनेसे धान्यकी वृद्धि होती है। उससे आगेके चार नक्षत्र लाङ्गलमें रहते हैं, इनमें निस्तण्डुलत्व होता है (अर्थात् धानमें दाने नहीं लगते, केवल भूसीमात्र रह जाती है)। उससे आगेके पाँच नक्षत्र नाभिमें रहते हैं, इनमें प्रथम बीज-वपनसे अग्निभय प्राप्त होता है। इस चक्रका विचार बीज-वपनमें अवश्य करना चाहिये। १८६-१८८॥

(रोगविमुक्तका स्रान-) स्थिरसंज्ञक, पुनर्वसु, आश्लेषा, रेवती, मघा और स्वाती-इन नक्षत्रों में तथा सोम और शुक्रके दिन रोगमुक्त पुरुषको पहले-पहल स्रान नहीं करना चाहिये ।। १८९ ॥

(नृत्यारम्भ-) उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, अनुराधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, पुष्य, - हस्त और रेवती-इन नक्षत्रोंमें नृत्यारम्भ (नाट्य-विद्याका प्रारम्भ) उत्तम कहा गया है। १९०॥

रेवतीसे छ: नक्षत्र पूर्वार्धयोगी, आसे बारह नक्षत्र मध्ययोगी और धनिष्ठासे नौ नक्षत्र परार्धयोगी न हैं। इनमेंसे पूर्वयोगीमें यदि वर और कन्या-दोनोंके नक्षत्र पढ़ते हों तो स्त्रीका स्वामीमें अधिक प्रेम होता है। मध्ययोगीमें हों तो दोनोंमें परस्पर समान प्रेम होता है और पार्धयोगीमें दोनोंक नक्षत्र हों तो स्त्रीमें पतिका अधिक प्रेम होता है।। १९१॥

(बृहत्, सम और अधम नक्षत्र-) शतभिषा, आर्द्रा, आश्लेषा, स्वाती, भरणी और ज्येष्ठा-ये छ: नक्षत्र जघन्य (अधम) कहे गये हैं। ध्रुवसंज्ञक, पुनर्वसु और विशाखा-ये नक्षत्र बृहत् (श्रेष्ठ) कहलाते हैं तथा अन्य नक्षत्र समसंज्ञक हैं। इनका विंशोपक मान क्रमश: ३०, ९० और ६० घड़ी कहा गया है ॥१९२-१९३ ॥ यदि द्वितीया तिथिको बृहत्संज्ञक नक्षत्र में चन्द्रोदय हो तो अन्नका भाव सस्ता होता है। समसंज्ञक नक्षत्रमें चन्द्रदर्शन हो तो अन्नादिके भाव में समता होती है और जघन्यसंज्ञक नक्षत्र में चन्द्रोदय हो तो उस महीने में अन्नका भाव महँगा हो जाता है ॥१९३॥

(यात्रा करनेवालेको जय तथा पराजय देनेवाले

नक्षत्र-) अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरा, पुष्य, मूल, चित्रा, श्रवण, तीनों उत्तरा, पूर्वाफाल्गुनी, मघा, विशाखा, धनिष्ठा' - इतने नक्षत्र कुलसंज्ञक हैं। रोहिणी, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, स्वाती, रेवती, हस्त, अनुराधा, पूर्व भाद्रपद, भरणी आश्लेषा-ये नक्षत्र अकुलसंज्ञक हैं। शेष नक्षत्र कुलाकुलसंज्ञक हैं। इनमें कुलसंज्ञक नक्षत्रोंमें विजयकी इच्छासे यात्रा करनेवाले राजाकी पराजय होती है। अकुलसंज्ञक नक्षत्रोंमें यात्रा करनेसे वह निश्चय ही शत्रुपर विजय प्राप्त करता है और कुलाकुलसंज्ञक नक्षत्रों में युद्धार्थ यात्रा करनेपर शत्रुओंके साथ सन्धि होती है। अथवा यदि युद्ध हुआ तो भी दोनोंमें समानता सिद्ध होती है (किसी एक पक्षकी हार या जीत नहीं होती) ॥ १९४-१९७॥

 (त्रिपुष्कर, द्विपुष्कर योग-) रवि, शनि या मङ्गलवारमें भद्रा, (२, ७, १२) तिधि तथा विषम चरणवाले नक्षत्र (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तय फाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ और पूर्व भाद्रपद) हों तो (इन तीनोंके संयोगसे) 'त्रिपुष्कर' नामक योग होता है। तथा उन्हीं रवि, शनि और मङ्गलवार एवं भद्रा तिथियों में दो चरणवाले नक्षत्र (मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा) हों तो 'द्विपुष्कर योग होता है। त्रिपुष्करयोग त्रिगुणित (तीन गुने) और द्विपुष्करयोग द्विगुणित (दुगुने) लाभ और हानिको देनेवाले हैं। अतः इनमें किसी वस्तुकी हानि हो तो उस दोषकी शान्तिके लिये तीन गोदान या तीन गौओंका मूल्य तथा द्विपुष्कर दोषकी शान्तिके लिये दो गोदान या दो गौओंका मूल्य ब्राह्मणोंको देना चाहिये। इससे उक्त (तिथि, वार और) नक्षत्र-सम्बन्धी दोषका निवारण हो जाता है ॥१९८-१९९॥

(पुष्य नक्षत्रकी प्रशंसा-) पापग्रहसे विद्ध या युक्त होनेपर भी पुष्य नक्षत्र बलवान् होता है और विवाह छोड़कर वह सब शुभ कर्मोमें अभीष्ट फल देनेवाला है ॥२००॥

(नक्षत्रोंमें योग-ताराओंकी संख्या-) अश्विनी आदि (अभिजित्सहित) अट्ठाईस नक्षत्रों में क्रमश: ३,३,६,५,३,१.४, ३, ५, ५,२,२,५,१, १, ४,४,३,११,२,२,३,३,४,१००, २,२ और ३२ योगताराएँ होती हैं। अपने-अपने आकाशीय विभागमें जो अनेक ताराओंका पुञ्ज होता है, उसमें जो अत्यन्त उद्दीस (चमकीली) ताराएँ दीख पड़ती हैं, वे ही योगताराएँ कहलाती हैं । २०१-२०३॥

(नक्षत्रोंसे वृक्षोंकी उत्पत्ति-) जितने भी

१. वास्तवमें किसी भी नक्षत्रका ५६ घटीरो कग और ६६ घटीसे अधिक काल-मान नहीं होता। यहाँ जो 'बृहन्' संज्ञक नक्षत्रोंका ९० पटरी (४५ मुहूर्त), समसंज्ञक नक्षत्रोंका ६० घटी (३० मुहूर्त) और जघन्यसंज्ञक नक्षत्रोंका २० घटी (१५ मुहूर्त) समय बताया गया है, वह क्रमश: सस्ती, समता और महँगीका सूचक है।

२-३. अन्य संहितामें धनिष्ठा नक्षत्र अकुलगणमें, ज्येष्ठा कुलगणमें और मूल कुलाकुलगणमें लिया गया है।

वृष अर्थात् श्रेष्ठ वृक्ष हैं उनकी उत्पत्ति अश्विनीसे हुई है। भरणीसे यमक (जुड़े हुए दो) वृक्ष, कृत्तिकासे उदुम्बर (गूलर), रोहिणीसे जामुन, मृगशिरासे खैर, आसे काली पाकर, पुनर्वसुसे बाँस, पुष्यसे पीपल, आश्लेषासे नागकेसर, मघासे बरगद, पूर्वाफाल्गुनीसे पलाश, उत्तराफाल्गुनीसे रुद्राक्षका वृक्ष, हस्तसे अरिष्ट (रीठीका वृक्ष), चित्रासे श्रीवृक्ष (बेल), स्वातीसे अर्जुन वृक्ष, विशाखासे विकङ्कत (जिसकी लकड़ीसे कलछियाँ बनती हैं), अनुराधासे बकुल (मौलश्री), ज्येष्ठासे विष्टिवृक्ष, मूलसे सर्ज (शालका वृक्ष), पूर्वाषाढ़से वञ्जुल (अशोक), उत्तराषाढ़से कटहल, श्रवणसे आक, धनिष्ठासे शमीवृक्ष, शतभिषासे कदम्ब, पूर्व भाद्रपदसे आम्रवृक्ष, उत्तर भाद्रपदसे पिचुमन्द (नीमका पेड़) तथा रेवतीसे महुआकी उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार ये नक्षत्रसम्बन्धी वृक्ष कहे गये हैं ॥ २०४-२१०॥

जब जिस नक्षत्र में शनैश्चर विद्यमान हो, उस समय उस नक्षत्र सम्बन्धी वृक्षका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये ॥ २११३ ॥

(योगोंके स्वामी-) यम, विश्वेदेव, चन्द्र, ब्रह्मा, गुरु, चन्द्र, इन्द्र, जल, सर्प, अग्नि, सूर्य, भूमि, रुद्र, ब्रह्मा, वरुण, गणेश, रुद्र, कुबेर, विश्वकर्मा, मित्र, षडानन, सावित्री, कमला, गौरी, अश्विनीकुमार, पितर और अदिति-ये क्रमशः विष्कुम्भ आदि सत्ताईस योगोंके स्वामी हैं ॥ २१२॥

(निन्द्य योग-) वैधृति और व्यतीपात-ये दोनों महापात हैं, इन दोनोंको शुभ कार्योंमें सदा त्याग देना चाहिये। परिघ योगका पूर्वार्ध और वज्रयोगके आरम्भकी तीन घड़ियाँ, गण्ड और अतिगण्डकी छ: घडी, व्याघात योगकी ९ घड़ी और शूल योगकी ५ घड़ी सब शुभ कार्योंमें निन्दित हैं।

(खार्जुरचक्र-) इन नौ निन्ध योगों (वैधृति, व्यतीपात, परिम, विष्कुम्भ, वज, गण्ड, अतिगण्ड, व्याघात और शूल)-में क्रमशः पुनर्वसु, मृगशिरा, मघा, आश्लेषा, अश्विनी, मूल, अनुराधा, पुष्य और चित्रा-ये नौ मूर्धा (मस्तक)-के नक्षत्र माने गये हैं। एक ऊर्ध्वरेखा लिखे, फिर उसके उपर तेरह तिरछी रेखाएँ अङ्कित करे। यह 'खाजूंरचक्र कहलाता है। इस चक्रमें ऊपर कहे हुए निन्ध यो!में उनके मूर्धगत नक्षत्रको रेखाके मस्तकके ऊपर लिखकर क्रमश: २८ नक्षत्रोंको लिखे। इसमें यदि सूर्य और चन्द्रमा एक रेखामें विभिन्न भागमें पड़ें तो उन दोनोंका परस्परका दृष्टिपात 'एकार्गल' दोष कहलाता है, जो शुभकार्यमें त्याज्य है, परंतु यदि सूर्य और चन्द्रमामें कोई एक अभिजित्में हो तो वेध-दोष नहीं होता है ॥ २१३२१७॥

(प्रत्येक योगमें अन्तर्भोग-) १२ पलरहित २ घड़ीके मानसे एक-एक योगमें सत्ताईस योग बीतते हैं ॥ २१८३॥

(करणके स्वामी और शुभाशुभ-विभाग-) इन्द्र, ब्रह्मा, मित्र, विश्वकर्मा, भूमि, हरितप्रिया (लक्ष्मी), कीनाश (यम), कलि, रुद्र, सर्प तथा मरुत्-ये ग्यारह देवता, क्रमश: बव आदि (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्र-इन) ग्यारह करणों के स्वामी हैं। इनमें बवसे लेकर छ: करण शुभ होते हैं। किंतु 'विष्टि' नामक करण क्रमसे आया हो या विपरीतक्रमसे, किसी भी दशामें वह मङ्गलकार्यमें शुभ नहीं है ॥२१९-२२०॥

(विष्टिके अङ्गों में घटी और फल-) विष्टिके मुखमें पाँच घटी, गलेमें एक, हृदयमें ग्यारह, नाभिमें चार, कटिमें छ: और पुच्छमें तीन घड़ियाँ होती हैं। मुखकी घड़ियोंमें कार्य आराम करनेसे को कार्यकी हानि होती है। गलेकी घड़ी में मृत्यु, महदयकी घडीमें निर्धनता, कटिकी घड़ीमें उन्मत्तता, नाभिकी घड़ी में पतन तथा पुच्छकी पड़ीमें कार्य करनेसे निश्चय ही विजय (सिद्धि) प्राप्त होती है। भद्राक बाद जो चार स्थिर करण है, वे मध्यम हैं, विशेषतः नाग और चतुष्पद ॥ २२१-२२३ ॥

(मुहूर्त-कचन-) दिनमें क्रमश: रुद्र, सर्प, मित्र, पितर, वसु. वसु, जल, विश्वेदेव, विधि (अभिजित्), ब्रह्मा, इन्द्र, इन्द्राग्रि, राक्षस, वरुण, अर्यमा और भग-ये पंद्रह मुहूर्त जानने चाहिये। रात्रिमें शिव, अजपाद, अहिर्बुध्य, पूषा, अश्विनीकुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, अदिति, बृहस्पति, विष्णु, सूर्य, विश्वकर्मा और वायु-ये क्रमशः पंद्रह मुहूर्त व्यतीत होते हैं। दिनमानका पंद्रहवाँ भाग दिनके मुहूर्तका मान है और रात्रिमानका पंद्रहवाँ भाग रात्रिके मुहूर्तका मान समझना चाहिये; इनसे दिन तथा रात्रिमें क्षण- नक्षत्रका विचार करे ॥ २२४-२२६३ ॥

(वारों में निन्द्य मुहूर्त-) रविवारको अर्यमा, सोमवारको ब्राह्म तथा राक्षस, मङ्गलवारको पितर और अग्नि, बुधवारको अभिजित्, गुरुवारको राक्षस और जल, शुक्रवारको ब्राह्म और पितर तथा शनिवारको शिव और सर्प मुहूर्त निन्द्य माने गये हैं; इसलिये इन्हें शुभ कार्योंमें त्याग देना चाहिये॥२२७-२२८॥

(मुहूर्तका विशेष प्रयोजन-) जिस जिस ७ नक्षत्रमें यात्रा आदि जो-जो कर्म शुभ या अशुभ कहे गये हैं; वे कार्य उस-उस नक्षत्रके स्वामीके मुहूर्तमें भी शुभ या अशुभ होते हैं। ऐसा समझकर उस मुहूर्तमें सदा वैसे कार्य करने या त्याग देने चाहिये॥ २२९ ।।

(भूकम्पादि संज्ञाओंसे युक्त नक्षत्र-) सूर्य यो जिस नक्षत्र में हो, उससे सातवें नक्षत्रको भूकम्पक पाँचवेंकी विद्युत, आठवेकी शूल, दसवेंकी अशनि, अठारहवेंकी केतु, पंद्रहवेंकी दण्ड, उन्नीसवेकी अ उल्का, चौदहवेंकी निर्घातपात, इक्कीसवेको मोह, बाईसवेकी निर्यात, तेईसवेंकी कम्प, चौबीसवेकी कुलिश तथा पचीसवेंकी परिवेष संज्ञा समझनी चाहिये; इन संज्ञाओंसे युक्त चन्द्र-नक्षत्रोंमें शुभ कर्म नहीं करने चाहिये ॥ २३०-२३२॥

सूर्यके नक्षत्रसे आश्लेषा, मघा, चित्रा, अनुराधा, रेवती तथा श्रवणतककी जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनीसे चन्द्र-नक्षत्रतककी संख्या हो तो उसपर दुष्टयोगका सम्पात अर्थात् रुद्रके प्रचण्ड अस्त्रका प्रहार होता है। अत: उसका नाम 'चण्डीशचण्डायुध' योग है। उसमें शुभ कर्म नहीं करना चाहिये ॥ २३३-२३४३ ॥

(क्रकचयोग-) प्रतिपदादि तिथिकी तथा रवि आदि वारकी संख्या मिलानेसे यदि १३ हो तो वह क्रकचयोग होता है जो शुभ कार्यमें अत्यन्त निन्दित माना गया है ॥ २३५॥

(संवर्तयोग-) रविवारको सप्तमी और बुधवारको प्रतिपदा हो तो 'संवर्तयोग' जानना चाहिये। यह शुभ कार्यको नष्ट करनेवाला है ॥ २३६॥

(आनन्दादि योग-)१ आनन्द, २ कालदण्ड, ३ धूम्र, ४ धाता, ५ सुधाकर (सौम्य), ६ ध्वाक्ष, ७ केतु ८ श्रीवत्स, ९ वज्र, १० मुद्गर, ११ छत्र, १२ मित्र, १३ मानस, १४ पद्म, १५ लुम्ब, १६ उत्पात, १७ मृत्यु, १८ काण, १९ सिद्धि, २० शुभ, २१ अमृत, २२ मुसल, २३ अन्तक (गद), २४ कुञ्जर (मातङ्ग), २५ राक्षस, २६ चर, २७ सुस्थिर और २८ वर्धमान-ये क्रमशः पठित २८ योग अपने अपने नामके समान ही फल देनेवाले कहे गये हैं।

(इन योगोंको जाननेकी रीति-) रविवारको अश्विनी नक्षत्रसे, सोमवारको मृगशिरासे, मङ्गलवारको आश्लेषासे, बुधवारको हस्तसे, गुरुवारको अनुराधासे, शुक्रवारको उत्तराषाढ़से और शनिवारको

१.उदाहरण-जिस समय ब्रह्माका मुहूर्त हो, उस समय उसीका क्षण-नक्षत्र होता है। जैसेदिनमै नयाँ मुहूर्त मायाका है और दिनमान ३० घडीका है तो १६ पढ़ीके बाद १८ पड़ीतक ब्रह्माजीके ही नक्षत्र (रोहिणी)-को क्षण- नक्षत्र समझना चाहिये। इसलिये दिनमें नवम मुहूर्त 'बाहा' या रोहिण' कहलाता है, जो श्राद्धम श्रेष्ठ माना गया है।

शतभिषासे आरम्भ करके उस दिनके नक्षत्रतक गणना करनेपर जो संख्या हो, उसी संख्यावाला योग उस दिन होगा ॥२३७-२४१॥

(सिद्धियोग-) रविवारको हस्त, सोमवारको मृगशिरा, मङ्गलवारको अश्विनी, बुधवारको अनुराधा, बृहस्पतिवारको पुष्य, शुक्रवारको रेवती और शनिवारको रोहिणी हो तो सिद्धियोग होता है ॥ २४२३॥

रवि और मङ्गलवारको नन्दा (१। ६ । ११), शुक्र और सोमवारको भद्रा (२।७।१२), बुधवारको जया (३। ८। १३), गुरुवारको रिक्ता (४।९। १४) और शनिवारको पूर्णा (५।१०।१५) हो तो मृत्युयोग होता है। अत: इसमें शुभ कर्म न करे ॥ २४३॥

(सिद्धयोग-) शुक्रवारको नन्दा, बुधवारको भद्रा, मङ्गलवारको जया, शनिवारको रिक्ता और गुरुवारको पूर्णा तिथि हो तो 'सिद्धयोग' कहा गया है।। २४४॥

(दग्धयोग-) सोमवारको एकादशी, गुरुवारको षष्ठी, बुधवारको तृतीया, शुक्रवारको अष्टमी, र शनिवारको नवमी तथा मङ्गलवारको पञ्चमी तिथि हो तो 'दग्धयोंग' कहा गया है ॥ २४५-२४६ ॥ श

(ग्रहोंके जन्मनक्षत्र-) रविवारको भरणी, सोमवारको चित्रा, मङ्गलवारको उत्तराषाढ़, बुधवारको धनिष्ठा, गुरुवारको उत्तराफाल्गुनी, शुक्रवारको ज्येष्ठा और शनिवारको रेवती-ये क्रमश: सूर्यादि ग्रहोंके जन्मनक्षत्र होनेके कारण शुभ कार्यके विनाशक होते हैं ॥२४७॥ यदि रवि आदिवारोंमें विशाखा आदि चार-चार नक्षत्र हो अर्थात् रविचारको विशाखासे,

सोमको पूर्वाषाढ़से, मङ्गलको धनिष्ठासे, बुधको रेवतीसे, गुरुवारको रोहिणीसे, शुक्रको पुष्यसे और शनिको उत्तराफाल्गुनीसे चार-चार नक्षत्र हों तो क्रमशः उत्पात, मृत्यु, काण तथा सिद्ध नामक योग कहे गये हैं ।। २४८॥

(परिहार-)ये जो ऊपर तिथि और वारके संयोगसे तथा वार और नक्षत्रके संयोगसे अनिष्टकारक योग बताये गये हैं, वे सब हूणों के देश-भारतके पश्चिमोत्तर-भागमें, बंगालमें और नैपाल देशमें ही त्याज्य हैं। अन्य देशोंमें ये अत्यन्त शुभप्रद हैं ।। २४९॥

(सूर्यसंक्रान्तिकथन-) रवि आदि वारों में सूर्यकी संक्रान्ति होनेपर क्रमशः घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, मिश्रा तथा राक्षसी ये संक्रान्तिके नाम होते हैं। उक्त घोरा आदि संक्रान्तियाँ क्रमशः शूद्र, चोर, वैश्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, गौ आदि पशु तथा चारों वर्गों से अतिरिक्त मनुष्योंको सुख देनेवाली होती हैं। यदि सूर्यकी संक्रान्ति पूर्वाह्नमें हो तो वह क्षत्रियोंको हानि पहुँचाती है। मध्याह्नमें हो तो ब्राह्मणोंको, अपराह्नमें हो तो वैश्योंको, सूर्यास्त-समयमें हो तो शूद्रोंको, रात्रिके प्रथम प्रहरमें हो तो पिशाचोंको, द्वितीय प्रहरमें हो तो निशाचरोंको, तृतीय प्रहरमें हो तो नाट्यकारोंको, चतुर्थ प्रहरमें हो तो गोपालकोंको और सूर्योदय-समयमें हो तो लिङ्गधारियों (वेशधारी बहुरूपियों, पाखण्डियों अथवा आश्रम या सम्प्रदायके चिह्न धारण करनेवालों)-को हानि पहुँचाती है ॥ २५०-२५३॥

यदि सूर्यकी मेष-संक्रान्ति दिनमें हो तो संसारमें अनर्थ और कलह पैदा करनेवाली है। रात्रिमें

१. संक्षिप्त उदाहरण-जैसे रविवारको अश्विनी हो तो आनन्द, भरणी हो तो कालदण्ड इत्यादि। सौपवारको मगशिरा हो तो आनन्द, आर्दा हो तो कालदण्ण। ऐसे ही मालादि चारों में कथित आश्लेषादि गिनकर योगीका निश्चय करना चाहिये।

२. अन्य संहिताओंमें इसका नाम मृत्युयोग आया है, इसलिये पैसा लिखा गया है। मूलमें कोई संज्ञा न देकर इन्हें अशुभ बताया है और इनमें शुभ कर्मको त्याज्य कहा है।

मेष-संक्रान्ति हो तो अनुपम सुख और मुभिक्ष होता है तथा दोनों संध्याओंके समय हो तो वह वृष्टिका नाश करनेवाली है ।। २५४॥

(करण-संकान्तिवश सूर्यके भोजनादि-)बव आदि ग्यारह करणों में संक्रान्ति होनेपर क्रमशः १ सिंह, २ बाघ, ३ सूअर, ४ गदहा, ५ हाथी, ६ भैंसा, ७ षोड़ा, ८ कुत्ता, ९ बकरा, १० बैल और ११ मुर्गा-ये सूर्यके वाहन होते हैं तथा १ भुशुण्डी, २ गदा, ३ तलवार, लाठी, ५ धनुष, ६ बरछी, ७ कुन्त (भाला), ८ पाश, ९ अंकुश, १० अस्त्र (जो फेंका जाता है) और ११ बाण-इन्हें क्रमशः सूर्यदेव अपने हार्थोमें धारण करते हैं। १ अन्न, २ खीर, ३ भिक्षान्न, ४ पकवान, ५ दूध, ६ दही, ७ मिठाई, ८ गुड़, ९ मधु, १० घृत और ११ चीनी-ये बव आदिकी संक्रान्तिमें क्रमश: भगवान् सूर्यके हविष्य (भोजन) होते हैं ॥ २५५-२५७३॥

(सूर्यकी स्थिति-) बव, वणिज, विष्टि, बालव और गर–इन करणोंमें सूर्य बैठे हुए, कौलव, शकुनि और किंस्तुघ्र-इन करणोंमें खड़े हुए तथा चतुष्पद, तैतिल और नाग-इ चीन करणोंमें सोते हुए, संक्रान्ति करते (एक राशिसे दूसरी राशिमें जाते) हों तो इन तीनों अवस्थाओंकी संक्रान्तिमें प्रजाको क्रमशः धर्म, आयु और वर्षाक विषयमें समान, श्रेष्ठ और अनिष्ट फल प्राप्त होते हैं तथा ऊपर कहे हुए अस्त्र, वाहन और भोजन तथा उससे आजीविका या व्यवहार करनेवाले मनुष्यादि प्राणियोंका अनिष्ट होता है एवं जिस प्रकार सोये, बैठे, खड़े हुए संक्रान्ति होती है, उसी प्रकार सोये, बैठे और खड़े हुए प्राणियोंका अनिष्ट होता है ॥२५८-२६०॥

नक्षत्रोंकी अन्धाक्षादि संज्ञाएँ-रोहिणी नक्षत्रसे आरम्भ करके चार-चार नक्षत्रोंको क्रमश: अन्ध, मन्दनेत्र, मध्यनेत्र और सुलोचन माने और पुनः आगे इसी क्रमसे सूर्यके नक्षत्रतक गिनकर नक्षत्रोंकी अन्ध आदि चार संज्ञाएँ समझे*।

(संक्रान्तिकी विशेष संज्ञा-) स्थिर राशियों (वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ)-में सूर्यकी संक्रान्तिका नाम 'विष्णुपदी', द्विस्वभाव राशियों (मिथुन, कन्या, धनु और मीन) में 'षडशीतिमुखा', तुला और मेषमें 'विषुव' (विषुवत्), मकरमें 'सौम्यायन' और कर्क में 'याम्यायन' संज्ञा होती है ॥ २६१-२६३॥

(पुण्यकाल-) याम्यायन और स्थिर राशियोंकी (विष्णुपद) संक्रान्तिमें संक्रान्तिकालसे पूर्व १६ घड़ी, द्विस्वभाव राशियोंकी षडशीतिमुखा और सौम्यायन-संक्रान्तिमें संक्रान्तिकालके पश्चात् १६ घड़ी तथा विषुवत् (मेष, तुला) संक्रान्तिमें मध्य (संक्रान्ति-कालसे ८ पूर्व और ८ पश्चात्)- की १६ घड़ीका समय पुण्यदायक होता है ।। २६४॥

सूर्योदयसे पूर्वकी तीन घड़ी प्रात: संध्या तथा से सूर्यास्तके बादकी तीन घड़ी सायं-संध्या कहलाती की है। यदि सायं-संध्या में याम्यायन या सौम्यायन के कोई संक्रान्ति हो तो, पूर्व दिनमें और प्रात: संध्यामें संक्रान्ति हो तो पर दिनमें सूर्योदयके बाद पुण्यकाल होता है।।२६५॥

जब सूर्यकी संक्रान्ति होती है, उस समय प्रत्येक मनुष्यके लिये जैसा शुभ या अशुभ चन्द्रमा है, होता है, उसीके अनुसार इस महीने में मनुष्योंको चन्द्रमाका शुभ या अशुभ फल प्राप्त होता है ।।२६६॥

*नीचे चक्रमें स्पष्ट देखिये-

अन्धाक्ष

मन्दाक्ष

मध्याक्ष

सुलोचन

रोहिणी

मृगशिरा

आर्द्रा

पुनर्वसु

पुष्य

आश्लेषा

मघा

पूर्वाफाल्गुनी

उत्तरफाल्गुनी

हस्त

चित्रा

स्वाती

विशाखा

अनुराधा

ज्येष्ठा

मूल

पूर्वाषाढ़

उत्तराषाढ़

अभिजित्

श्रवण

धनिष्ठा

शतभिषा

पूर्व भाद्रपद

उत्तर भाद्रपद

रेवती

अश्विनी

भरणी

कृत्तिका

किसी संक्रान्तिके बाद सूर्य जितने अंश भोगकर उस संक्रान्तिके आगे अयनसंक्रान्ति करे, उतने समयतक संक्रान्ति या ग्रहणका जो नक्षत्र हो, वह तथा उसके आगे-पीछेवाले दोनों नक्षत्र उपनयन और विवाहादि शुभ कार्योंमें अशुभ होते हैं। संक्रान्ति या ग्रहणजनित अनिष्ट फलों (दोषों)- की शान्ति के लिये तिलोंकी ढेरीपर तीन त्रिशूलवाला त्रिकोण-चक्र लिखे और उसपर यथाशक्ति सुवर्ण रखकर ब्राह्मणोंको दान दे॥२६७-२६९॥

(ग्रह-गोचर-) ताराके बलसे चन्द्रमा बली होता है और चन्द्रमाके बली होनेपर सूर्य बली हो जाता है तथा संक्रमणकारी सूर्यक बली होनेसे अन्य सब ग्रह भी बली समझे जाते हैं। ॥२७॥

मुनीश्वर! अपनी जन्मराशियोंसे ३, ११, १०, ६ स्थानमें सूर्य शुभ होता है; परंतु यदि क्रमशः जन्मराशिसे ही ९, ५, ४ तथा १२ वें स्थानमें स्थित शनिके अतिरिक्त अन्य ग्रहोंसे वह विद्ध न हो तभी शुभ होता है । इसी प्रकार चन्द्रमा जन्मराशिसे ७, ६, ११, १, १० तथा ३ में शुभ होते हैं; यदि क्रमशः २, १२, ८, ५, ४ और ९ वेंमें स्थित बुधसे भिन्न ग्रहोंसे विद्ध न हों। मङ्गल जन्मराशिसे ३, ११, ६ में शुभ हैं; यदि क्रमशः १२, ५ तथा ९ वें स्थानमें स्थित अन्य ग्रहसे विद्ध न हों। शनि | रा भी अपनी जन्मराशिसे इन्हीं ३, ११, ६ स्थानोंमें शुभ हैं; यदि क्रमशः १२, ५, ९ स्थानोंमें स्थित सूर्यके सिवा अन्य ग्रहोंसे विद्ध न हों। बुष अपनी जन्मराशिसे २, ४, ६, ८, १० और ११ स्थानों में शुभ हों; यदि क्रमशः ५, ३, ९, १,८ और १२ स्थानों में स्थित चन्द्रमाके सिवा अन्य किसी ग्रहसे विद्ध न हों। मुनीश्वर। गुरु जन्मराशिसे २, ११, ९, ५ और ७ इन स्थानोंमें शुभ होते हैं। यदि क्रमशः १२, ८, १०, ४ और ३ स्थानों में स्थित अन्य किसी ग्रहसे विद्ध न हों। इसी प्रकार शुक्र भी जन्मराशिसे १, २, ३, ४, ५,८, ९, १२ तथा ११ स्थानोंमें शुभ होते हैं; यदि क्रमशः ८,७, १, १०, ९, ५, ११, ६, ३ स्थानोंमें स्थित अन्य नहसे विद्ध न हों ॥२७१-२७६ ॥

जो ग्रह गोचरमें वेधयुक्त हो जाता है, वह शुभ या अशुभ फलको नहीं देता; इसलिये वेधका विचार करके ही शुभ या अशुभ फल समझना चाहिये ।। २७७॥ वामवेध होने (वेध-स्थानमें ग्रह और शुभ स्थानमें अन्य ग्रहके होने)-से दुष्ट (अशुभ) ग्रह भी शुभकारक हो जाता है। यदि दुष्ट ग्रह भी शुभग्रहसे दृष्ट हो तो शुभकारक हो। जाता है तथा शुभप्रद ग्रह भी पापग्रहसे दृष्ट हो। तो अनिष्ट फल देता है। शुभ और पाप दोनों ग्रह यदि अपने शत्रुसे देखे जाते हों अथवा नीच र राशिमें या अपने शत्रुकी राशिमें हों तो निष्फल में हो जाते हैं। इसी प्रकार जो ग्रह अस्त हो वह भी न| अपने शुभ या अशुभ फलको नहीं देता है। ग्रह

१. भाव यह है कि तारा और ग्रहके बलको देखकर किसी कार्यको आरम्भ करनेका आदेश है। यदि अपनी तारा बलवती हो तो निर्बल चन्द्रमा भी बली माना जाता है तथा रविशुद्धि-विचारसे यदि अपने चन्द्रमा बली हों तो निर्बल सूर्य भी बली हो जाते हैं एवं सूर्यकै बली होनेपर अन्य ग्रह अनिष्ट भी हो तो इष्टसाधक हो जाते हैं। इसलिये इन्हीं तीनों (तारा, चन्द्रमा तथा रवि) के बल देखे जाते हैं।

२. सब ग्रहोंके जितने शुभ स्थान कहे गये हैं, क्रमशः उतने ही उनके वेध-स्थान भी कहे गये हैं। जैसे सूर्य तीसरेमें शुभ होता है; किंतु यदि नवेंमें कोई ग्रह हो तो विद्ध हो जाता है। इसी प्रकार अन्य शुभ-स्थान और वेध-स्थान समझने चाहिये।

३. भाव यह है कि ऊपर जो ग्रहोंके शुभ और वेध-स्थान कहे गये हैं, उनमें मनुष्योंको अपनी-अपनी जन्मराशिसे शुभ स्थानोंमें ग्रहोंके जानेसे शुभ फल और वेध-स्थानमें जानेसे अशुभ फल प्राप्त होते हैं। विशेषता यह है कि शुभ स्थानमें जानेपर भी यदि उन ग्रहोंके वेध-स्थानों में कोई अन्य ग्रह हो तो वे शुभ नहीं होते हैं, तथा शुभ और वेध-स्थानोंसे भिन्न स्थानमें रहनेपर ग्रह मध्यम फल देनेवाले होते हैं। इसी बातको संक्षेपमें आगे कहते हैं।

यदि दुष्ट-स्थानमें हो तो यनपूर्वक उसकी शान्ति कर लेनी चाहिये। हानि और लाभ ग्रहोंकि ही अधीन हैं, इसलिये ग्रहोंकी विशेष यनपूर्वक पूजा करनी चाहिये ॥२७८-२८०॥

सूर्य आदि नवग्रहोंकी तुष्टिके लिये क्रमश: मणि (पद्मराग-लाल), मुक्ता (मोती), विद्रुम (मूंगा), मरकत (पन्ना), पुष्पराग (पोखराज), वन (हीरा), नीलम, गोमेद-रत्न एवं वैदूर्य (लहसुनिया) धारण करना चाहिये॥२८१-२८२ ॥

(चन्द्र-शुद्धिमें विशेषता-) शुक्लपक्षके प्रथम दिन प्रतिपदामें जिस व्यक्तिके चन्द्रमा शुभ होते हैं, उसके लिये शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष दोनों ही शुभद होते हैं। अन्यथा (यदि शुक्ल प्रतिपदामें चन्द्रमा अशुभ हो तो) दोनों पक्ष अशुभ ही होते हैं। (पहले जो जन्मराशिसे २, ९, ५ वें चन्द्रमाको अशुभ कहा गया है, वह केवल कृष्णपक्षमें ही होता है।) शुक्ल पक्षमें २, ९ तथा ५ वें स्थानमें स्थित चन्द्रमा भी शुभप्रद ही होता है, यदि वह ६, ८, १२वें स्थानों में स्थित अन्य ग्रहोंसे विद्ध न हो ॥ २८३-२८४ ॥

(तारा-विचार-) अपने-अपने जन्मनक्षत्रसे र नौ नक्षत्रोंतक गिने तो क्रमश: १ जन्म, २ सम्पत्, ३ विपत्, ४ क्षेम, ५ प्रत्यरि, ६ साधक, ७ वध, ८ मित्र तथा ९ परम मित्र-इस प्रकार ९ ताराएँ होती हैं। फिर इसी प्रकार आगे गिननेपर १० से १८ तक तथा १९ से २७ तक क्रमश: वे ही ९ ल ताराएँ होंगी। इनमें १, ३, ५ और ७वीं तारा अपने नामके अनुसार अनिष्ट फल देनेवाली होती हैं। इन चारों ताराओंमें इनके दोषकी शान्तिके लिये ब्राह्मणोंको क्रमशः शाक, गुड़, लवण और तिलसहित सुवर्णका दान देना चाहिये। कृष्णपक्षमें तारा बलवती होती है और शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बलवान् होता है ॥ २८५-२८७॥

(चन्द्रमाकी अवस्था-) प्रत्येक राशिम चन्द्रमाकी बारह-बारह अवस्थाएँ होती हैं, जो यात्रा तथा विवाह आदि शुभ कार्यों में अपने नामके सदृश ही फल देती हैं।

(अवस्थाका ज्ञान-) अभीष्ट दिनमें गत नक्षत्र-संख्याको ६० से गुणा करके उसमें वर्तमान नक्षत्रकी भुक्त (भयात) घड़ीको जोड़ दे, योगफलको चारसे गुणा करके गुणनफलमें ४५ का भाग दे। जो लब्धि आवे, उसमें पुन: १२ से भाग देनेपर १ आदि शेषके अनुसार मेषादि राशियों में क्रमशः प्रवास, नष्ट, मृत, जय, हास्य, रति, मुदा, सुप्ति, भुक्ति, ज्वर, कम्प और सुस्थिति-ये बारह गत अवस्थाएँ सूचित होती हैं । ये अपने-अपने नामके समान फल देनेवाली होती हैं । २८८-२८९॥

(मेषादि लगोंमें कर्तव्य-) पट्ट-बन्धन (राजसिंहासन, राजमुकुट आदि धारण), यात्रा, उग्र कर्म, संधि, विग्रह, आभूषणधारण, धातु, खानसम्बन्धी कार्य और युद्धकर्म-ये सब मेष लग्नमें आरम्भ करनेसे सिद्ध होते हैं ॥ २९० ॥ वृष लग्नमें विवाह मङ्गलकर्म, गृहारम्भ आदि स्थिर- कर्म, जलाशय, गृहप्रवेश, कृषि, वाणिज्य तथा पशुपालन आदि कार्य सिद्ध होते हैं॥२९१॥ मिथुन लग्नमें कला, विज्ञान, शिल्प, आभूषण, युद्ध संश्रव (कीर्ति साधक कर्म), राज-कार्य, विवाह, राज्याभिषेक आदि कार्य करने चाहिये ।। २९२ ॥ कर्क लग्नमें वापी, कूप, तड़ाग, जल रोकनेके लिये बाँध, जल निकालनेके लिये नाली बनाना,

*जैसे रोहिणी नक्षत्रकी १२ घटी बीत जानेपर चन्द्रमाकी क्या अवस्था होगी? यह जानना है तो गत नक्षत्र-संख्या ३ को ६० से गुणा करके गुणनफल १८० में रोहिणीकी गत (भुक्त) घटी १२ जोड़नेसे १९२ हुआ। इसे चारसे गुणा करके गुणनफल ७६८ में ४५ का भाग देनेपर लब्धि १७ हुई। इसमें पुनः १२से भाग देनेपर शेष ५ रहा। अतः उस समय पाँच अवस्थाएँ गत होकर छठी अवस्था वर्तमान है। वृष राशिमें नष्ट आदिके क्रमसे गणना होती है; अत: उक्त गणनासे छठी अवस्था 'मुदा' सूचित होती है।

पौष्टिक कर्म, चित्रकारी वषा लेखन भादि कार्य करने चाहिये ।। २९३ ॥ सिंह लझमें ईखा था धान्यसम्बन्धी सब कार्य, वाणिज्य (क्रय-विक्रय), हाट, कृषिकर्म तथा सेवा आदि कर्म, स्थिर कार्य, साहस, युख तथा आभूषण बनाना आदि कार्य सम्पन्न होते हैं । २९४॥ कन्या लग्नमें विद्यारम्भ, शिल्पकर्म, ओषधिनिर्माण एवं सेवन, आभूषण- निर्माण और उसका धारण, समस्त चर और स्थिर कार्य, पौष्टिक कर्म तथा विवाहादि समस्त शुभ कार्य करने चाहिये ॥ २९५ ॥ तुला लग्नमें कृषिकर्म, व्यापार, यात्रा, पशुपालन, विवाह- उपनयनादि संस्कार तथा तौलसम्बन्धी जितने कार्य हैं, वे संब सिद्ध होते हैं ॥ २९६ ॥ वृश्चिक लग्नमें गृहारम्भादि समस्त स्थिर कार्य, राजसेवा, राज्याभिषेक, गोपनीय और स्थिर कर्मोंका आरम्भ करना चाहिये ।। २९७ ॥ धनु लग्नमें उपनयन, विवाह, यात्रा, अश्वकृत्य, गजकृत्य, शिल्पकला तथा चर, स्थिर और मिश्रित कार्योको करना चाहिये ।। २९८॥ मकर लग्नमें धनुष बनाना, उसमें प्रत्यञ्चा बाँधना, बाण छोड़ना, अस्त्र बनाना और चलाना, कृषि, गोपालन, अञ्चकृत्य, गजकृत्य तथा पशुओं का क्रय- विक्रय और दास आदिकी नियुक्ति-ये सब कार्य करने चाहिये ॥ २९९ ।। कुम्भ लग्नमें कृषि, वाणिज्य, पशुपालन, जलाशय, शिल्पकर्म, कला आदि, जलपात्र (कलश आदि) तथा अस्त्र- शस्त्रका निर्माण आदि कार्य करना चाहिये। ३००॥ मौन लग्नमें उपनयन, विवाह, राज्याभिषेक, जलाशयकी प्रतिष्ठा, गृहप्रवेश, भूषण, जलपात्रनिर्माण तथा अशसम्बन्धी कृत्य शुभ होते हैं ॥३०१॥

इस प्रकार मेषादि लोंके शुद्ध (शुभ स्वामीसे युक्त या दृष्ट) रहनेसे शुभ कार्य सिद्ध होते हैं। पापग्रहसे युक्त या दृष्ट लग्न हो तो उसमें केवल क्रूर कर्म ही सिद्ध होते हैं, शुभ कर्म नहीं॥३०२॥ वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, मीन, तुला और धनु-ये शुभग्रहकी, राशि होने के कारण शुभ हैं तथा अन्य (मेष, सिंह, वृक्षिक, मकर और कुम्भ-थे) पापराशियों हैं ॥३०३॥ लप्रपर जैसे (शुभ या अशुभ) प्रहोंका योग या दृष्टि हो उसके अनुसार ही लग्न अपना फल देता है। यदि लग्नमें ग्रहके योग या दृष्टिका अभाव हो तो लग्न अपने स्वभावके अनुफूल फल देता है।३०४ ॥ किसी लग्रके आरम्भमें कार्यका आरम्भ होनेपर उसका पूर्ण फल मिलता है। लगके मध्यमें मध्यम और अन्त में अल्प फल प्राप्त होता है। यह बात सब लग्नों में समझनी चाहिये॥ ३०५ ॥ कार्यकर्ताक लिये सर्वत्र पहले लग्नबल, उसके बाद चन्द्रबल देखना चाहिये। चन्द्रमा यदि बली हो और सप्तम भावमें स्थित हो तो सब ग्रह बलवान् समझे जाते हैं॥३०६ ॥ चन्द्रमाका बल आधार और अन्य ग्रहोंके बल आधेय हैं। आधारके बलपर ही आधेय स्थिर रहता है।३०७॥ यदि चन्द्रमा शुभदायक हो तो सब ग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। यदि चन्द्रमा अशुभ हो तो अन्य सब ग्रह भी अशुभ फल देवेचाले हो जाते हैं। लेकिन धन-स्थानके स्वामीको छ फर ही यह नियम लागू होता है; क्योंकि यदि धनेश शुभ हो तो वह चन्द्रमाके अशुभ होनेपर भी अपने शुभ फलको ही देता है ॥३०८ ॥

लग्रके जितने अंश उदित हो गये (क्षितिजसे ऊपर आ गये) हों, उनमें जो ग्रह हो वह लग्रके फलको देता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि लग्नके जितने भावांश हों, उनके भीतर रहनेवाला ग्रह लग्रभावका फल देता है तथा उससे आगे-पीछे हो तो लग्रराशिमें रहता हुआ भी आगे- पीछेके भावका फल देता है। लग्नके कथित अंशसे जो ग्रह आगे बढ़ जाता है, वह द्वितीय भावका फल देता है। इस प्रकार सब भावों में ग्रहों की स्थिति और फलकी कल्पना करनी चाहिये। सब गुणोंसे युक्त लग तो थोड़े दिनों में नहीं मिल सकता, अतः स्वल्प दोष और अधिक गुणोंसे युक्त लगको ही सब कार्यों में सर्वदा ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि अधिक बोपोंसे पुल कालको ब्रह्माजी भी शुद्ध नहीं कर सकये; इसलिये थोड़े दोषसे युक्त होनेपर भी अधिक गुणवाला लग्र-काल हितकर होता है।३०९-२११॥

(स्त्रियोंके प्रथम रजोदर्शन-) अमावास्या, रिक्ता (४, ९, १४), ८, ६, १२ और प्रतिपदा- इन तिथियोंमें परिष योगके पूर्वार्धमें, व्यवीपात और वैधृतिमें, संध्याके समय, सूर्य और चन्द्रके ग्रहणकालमें तथा विष्टि (भद्रा)-में स्त्रीका प्रथम मासिकधर्म अशुभ होता है। रवि आदि बारों में प्रथम रजोदर्शन हो तो वह स्त्री क्रमशः रोगयुक्ता, पतिकी प्रिया, दुःखयुक्ता, पुत्रवती, भोगवती, पतिव्रता एवं क्लेशयुक्त होती है ।। ३१२-३१४॥ भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, आश्लेषा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ और पूर्व भाद्रपद-ये नक्षत्र तथा चैत्र, कार्तिक, आषाद और पौष-ये मास प्रथम मासिकधर्ममें अनिष्टकारक कहे गये हैं। भद्रा, सूर्यको संक्रान्ति, निद्रा-अवस्था— रात्रिकाल, सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण-ये सब प्रथम मासिकधर्ममें शुभ नहीं हैं। अशुभ योग, निन्द्य नक्षत्र तथा निन्दित दिन में प्रथम मासिकधर्म हो तो वह स्त्री कुष्टा स्वभाववाली होती है ॥ ३१५-३१६ ॥ इसलिए सब दोषोंकी शान्तिके लिये विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह तिल, घृत और दुर्वासे गायत्री मन्त्रद्वारा १०८ बार आहुति करे तथा सुवर्णदान, गोदान एवं तिलदान करे ॥ ३१७ ॥

(गर्भाधान-संस्कार-) मासिकधर्मके आरम्भ- से चार रात्रियाँ गर्भाधान में त्याज्य हैं। सम रात्रियों में जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम नवमांशमें हो, लग्नपर पुरुषग्रह (वि, मङ्गल तथा बृहस्पति) की दृष्टि हो तो पुत्रार्थी पुरुष सम (२, ४, ६, ८, १०, १२) तिथियों में, रेवती, मूल, आश्लेषा और मघा-इन नक्षत्रोंको छोड़कर अन्य नक्षत्रों में उपवीती और अना (सवस्त्र) होकर स्वीका सङ्ग करे॥३१८।।

(पुंसवन और सीमन्तोत्रयन-) प्रथप गर्भ स्थिर हो जानेपर तृतीय या द्वितीय मासमें पुंसवन कर्म करे। उसी प्रकार ४,६ या८ वें मासमें उस मासके स्वामी जब बली हो तथा स्त्री-पुरुष दोनोंको चन्द्रमा और ताराका बल प्राप्त हो तो सीमन्त-कर्म करना चाहिये। रिक्ता तिथि और पर्वको छोड़कर अन्य तिथियोंमें ही उसको करनेकी विधि है। मङ्गल, बृहस्पति तथा रविवारमें, तीक्ष्ण और मित्रसंज्ञक नक्षत्रोंको छोड़कर अन्य नक्षत्रों में जब चन्द्रमा विषमराशि और विषमराशिके नवमांशमें हो, लग्रसे अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो, स्त्री-पुरुषके जन्म-लग्नसे अष्टम राशिलग्न न हो तथा लग्नमें शुभग्रहका योग और दृष्टि हो, पापग्रहकी दृष्टि न हो एवं शुभग्रह लग्नसे ५, १, ४, ५, ६, १० में और पापग्रह ६, ११ तथा ३ में हों एवं चन्द्रमा १२, ८ तथा लग्नसे अन्य स्थानों में हो तो उक्त दोनों कर्म (पुंसवन और सौमन्तोन्नयन) करने चाहिये। ३२०-३२४ ॥ यदि एक भी बलवन् पापग्रह लग्नसे १२, ५ और ८ भाव हो तो वह सीमन्तिनी स्त्री अथवा उसके गर्भका नाश कर देता है ।। ३२५ ॥

(जातकर्म और नामकर्म-) जन्मके समयमें ही जातकर्म कर लेना चाहिये। किसी प्रतिबन्धकवश उस समय न कर सके तो सूतक चीतनेपर भी उक्त लग्नमें पितरोंका पूजन (नान्दीमुख कर्म) करके बालकका जातकर्म संस्कार अवश्य करना चाहिये एवं सूतक बीतनेपर अपने अपने कुलको रीतिके अनुसार बालकका नामकरण संस्कार भी करना चाहिये। भलीभाँति सोच-विचारकर देवता आदिका वाचक, मङ्गलदायक एवं उत्तम नाम रखना चाहिये। यदि देश कालादि-जन्य किसी प्रतिबन्धसे समयपर कर्म न हो सके तो समयके बाद जब गुरु और शुक्रका उदय हो, तब उत्तरायणमें चर, स्थिर, मृदु और क्षिप्र संज्ञक नक्षत्र शुधपा के बार (सोम, बुध, गुरु और शुक्र) में पिता और बालकके चन्द्रबल और ताराबल प्राप्त होनेपर शुभ लप और शुभ नवांशमें, लासे अहम पावमें कोई ग्रह न हो तब बालकका जातकर्म और नामकर्म-संस्कार करने चाहिये ॥ ३२६-३२९३ ॥

(अन्न-प्राशन-) बालकोंका जन्मसे वें या ८ वें मासमें और बालिकाओंका जन्मले ५ या ७वें मासमें अन्नप्राशनकर्म शुभ होता है। परंतु रिक्ता (४, ९, १४), तिथिश्चय, नन्दा (१,६, ११), १२, ८-इन तिथिर्योको छोड़कर (अन्य तिथियोंमें) शुभ दिनमें चर, स्थिर, मृदु और क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र में लग्नसे अष्टम और दशम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) होनेपर शुभ नवांशयुक्त शुभ राशिलग्नमें, लग्नपर शुभग्रहका योग या दृष्टि होनेपर जब पापग्रह लग्नसे ३, ६, ११ भावमें और शुभग्रह १, ४, ७, १०, ५, ९ भावमें हो तथा चन्द्रमा १२, ६, ८ स्थानसे भिन्न स्थान में हो तो पूर्वाह्न समयमें बालकोंका अन्नप्राशनकर्म शुभ होता है ।। ३३०-३३४ ॥

(चूडाकरण-) बालकोंके जन्मसमयसे तीसरे या पाँचवें वर्षमें अथवा अपने कुलके आचार- व्यवहारके अनुसार अन्य वर्षमासमें भी उत्तरायणमें, जब गुरु और शुक्र उदित हों (अस्त न हों), पर्व तथा रिक्तासे अन्य तिथियोंमें, शुक्र, गुरु, सोमवारमें, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, मृगशिरा, ज्येष्ठा, रेवतो, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा-इन नक्षत्रों में अपने-अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार चूडाकरणकर्म करना चाहिये। राजाओंके पट्टबन्धन, बालकोंके चूडाकरण, अन्नप्राशन और उपनयनमें जना नक्षत्र प्रशस्त (उत्तम) होता है। अन्य कोण जन्मा नक्षच अशुभ कहा गया है। लग्रसे अष्टम स्थान शुद्ध हो, शुभ राशि ला हो, उसमें शुभग्रहका नवमांश हो तथा जन्मराशि या जगलासे आम राशिला न हो, चन्द्रमा लग्नसे ६, ८, १२ स्थानोंसे भिन्न स्थानों में हो, शुभग्रह २, ५, ९, १, ४, ७, १० भाव में हों तथा पापग्रह ३, ६, ११ भावमें हों तो चूडाकरण कर्म प्रशस्त होता है ॥३३५-३३९॥

(सामान्य क्षौर-कर्म-) तेल लगाकर तथा प्रातः और सायं संध्याके समयमें क्षौर नहीं कराना चाहिये। इसी प्रकार मङ्गलवारको तथा रात्रिमें भी क्षौरका निषेध है। दिनमें भी भोजनके बाद और नहीं कराना चाहिये। युद्धयात्रामें भी क्षौर कराना वर्जित है। शय्यापर बैठकर या चन्दनादि लगाकर क्षौर नहीं कराना चाहिये। जिस दिन कहींकी यात्रा करनी हो, उस दिन भी क्षौर न करावे तथा क्षौर करानेके बाद उससे नवें दिन भी क्षौर न करावे। राजाओंके लिये क्षौर कराने के बाद उससे ५ वें-५ वें दिन क्षौर करानेका विधान है। चूद्धकरणमें जो नक्षत्र-वार आदि कहे गये हैं, उन्हीं नक्षत्रों और वार आदिमें अथवा कभी भी क्षौर में विहित नक्षत्र और वारके उदय (मुहूर्त एवं क्षण)-में और कराना शुभ होता है ॥ ३४०-३४१३ ॥

(क्षौरकर्ममें विशेष- ) राजा अथवा ब्राह्मणों की से यज्ञमें, माता-पिताके मरणमें, जेलसे छूटनेपर तथा विवाहके अवसरपर निषिद्ध नक्षत्र, वार एवं तिथि आदिमें भी क्षौर कराना शुभप्रद कहा गया है। समस्त मङ्गल कार्यों में, मङ्गलार्थ इष्ट देवताके समीप क्षुरोंको अर्पण करना चाहिये ॥३४२-३४३ ॥

(उपनयन-) जिस दिन उपनयनका मुहूर्त स्थिर हो, उससे पूर्व वें, ७ वें, ५ वें या तीसरे दिन उपनयनके लिये विहित नक्षत्र (या उस नक्षबके मुहूर्त)-में शुभ तार और शुग तनमें अपने घरोंको चैदोवा, पताका और तोरण आदिसे अच्छी तरह अलंकृत करके, ब्राह्मणोंद्वारा आशीर्वचन, पुण्याहवाचन आदि पुण्य कार्य

*चूडाकरण या उपनयमें क्षुरसे ही कार्य होता है, इसलिये उसके रक्षार्थ लोग अपने-अपने कुलदेवताके पास क्षुरको समर्पण करते हैं।

कराकर, सौभाग्यवती स्त्रियोंकि साथ, माङ्गलिक बाजा बजवाते और मालगान करते-करते हुए परसे पूर्वोत्तर-दिशा (ईशानकोण)-में जाकर पवित्र स्थानसे चिकनी मिट्टी खोदकर ले ले और पुन: उसी प्रकार गीत-वाधके साथ घर लौट आवे। वहाँ मिट्टी या मौसके बर्तन में उस मिट्टीको रखकर उसमें अनेक वस्तुओंसे युक्त और माँति-भांतिके पुष्पोंसे सुशोभित पवित्र जल डाले। (इसी प्रकार और भी अपने कुलके अनुरूप आचारका पालन करे) ॥३४४-३४७॥ गर्भाधान अथवा जन्मसे आठवें वर्षमें ब्राह्मण-बालकोंका, ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रिय बालकोंका और बारहवें वर्ष में वैश्य- बालकोंका मौझीचन्धन (यज्ञोपवीत-संस्कार) होना चाहिये ॥ ३४८ ॥ जन्मसे पाँचवें वर्षमें यज्ञोपवीत- संस्कार करनेपर बालक वेद-शास्त्र-विशारद तथा श्रीसम्पन्न होता है। इसलिये उसमें ब्राह्मण-बालकका उपनयन-संस्कार करना चाहिये ॥ ३४९ ॥ शुक्र और बृहस्पति निर्बल हों तब भी वे बालकके लिये शुभदायक होते हैं। अतः शास्त्रोक्त वर्ष में उपनयनसंस्कार अवश्य करना चाहिये। शास्त्रने जिस वर्षमै उपनयनको आज्ञा नहीं दी उसमें वह संस्कार नहीं करना चाहिये ॥ ३५० ॥ गुरु, शुक्र तथा अपने वेदकी शाखाके स्वामी-ये दृश्य हों-अस्त न हुए हों तो उत्तरायणमें उपनयनसंस्कार करना उचित है। बृहस्पति, शुक्र, मङ्गल और बुध-ये क्रमश: ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेदके अधिपति हैं ॥ ३५१॥ शरद, ग्रीष्म और वसन्त ये व्युत्क्रमसे द्विजातियोंके उपनयनका मुख्य काल हैं अर्थात् शरद् ऋतु वैश्योंके, ग्रीष्म क्षत्रियों के और वसन्त ब्राह्मणोंके उपनयनका मुख्य काल है। माप आदि पाँच महीनों में उन सबके लिये उपनयनका साधारण काल है॥३५२॥ माघ मासमें जिसका उपनयन हो वह अपने कुलोचित आचार तथा धर्मका ज्ञाता होता है। फाल्गुनमें यज्ञोपवीत धारण करनेवाला पुरुष विधिज्ञ तथा धनवान् का होता है। चैत्रमें उपनवन होनेपर ब्रह्मचारी वेद वेदाङ्गोंका पारगामी बिद्वान् होता है ॥ ५३॥ वैशाला मासमें जिसका उपनयन हो, वह धनवान् तथा वेद, शास्त्र एवं विविध विद्याओं में निपुण होता है और ज्येष्ठमें यज्ञोपवीत लेनेवाला द्विज विचित्रोम श्रेष्ठ और बलवान् होता है ।। ३५४॥

शुक्लपक्षमें द्वितीया, पश्चमी, त्रयोदशी, दशमी और सप्तमी तिथियाँ यज्ञोपवीतसंस्कारके लिये ग्राह्य हैं। एकादशी, षष्ठी और द्वादशी-ये तिथियाँ अधिक श्रेष्ठ हैं। शेष तिथियोंको मध्यम माना गया है। कृष्णपक्षमें द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी ग्राह्य हैं। अन्य तिथियाँ अत्यन्त निन्दित हैं ॥३५५-३५६ ॥ हस्त, चित्रा, स्वाती, रेवती, पुष्य, आर्दा, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अश्विनी, अनुराधा तथा रोहिणी-ये नक्षत्र उपनयन-संस्कारके लिये उत्तम हैं ।। ३५७ ॥ जन्मनक्षत्रसे दसवाँ 'कर्म' संज्ञक है, सोलहवाँ 'संघात' नक्षत्र है, अठारहवाँ 'समुदय' नक्षत्र है, तेईसवाँ 'विनाश' कारक है और पचीसवाँ 'मानस' है। इनमें शुभ कर्म नहीं आराम करने चाहिये। गुरु, बुध शुक्र-इन तीनोंके वार उपनयनमें प्रशस्त हैं। सोमवार और रविवार ये मध्यम माने गये हैं। शेष दो वार मङ्गल और शनैशर निन्दित हैं। दिनके तीन भाग करके उसके आदि भागमें देव-सम्बन्धी कर्म (यज्ञ-पूजनादि) करने चाहिये। ३५८-३६० ॥ द्वितीय भागमें मनुष्य- सम्बन्धी कार्य (अतिथि सत्कार आदि) करनेका विधान है और तृतीय भागमें पैतृक कर्म (बाद तर्पणादि) का अनुष्ठान करना चाहिये। गुरु, शुज और अपनी वैदिक शाखाके अधिपति अपनी नीच राशिम या उसके किसी अंशमें हों अथवा अपने शत्रुकी राशिमें या उसके किसी अंश स्थित हो तो उस समय यज्ञोपवीत लेनेवाला द्विज कला और शीलसे रहित होता है। इसी प्रकार अपनी शाखाके अधिपति, गुरु एवं शुक्र यदि अपने अधिशत्रु-गृहमें या उसके किसी अशमें स्थित हो तो बाहाचर्यक्रत (योपवीत) ग्रहण करनेवाला द्विज महापातकी होता है। गुरु, शुक्र एवं अपनी शाखाके अधिपति ग्रह यदि अपनी उच्च राशि या उसके किसी अंशमें हो, अपनी राशि या उसके किसी अंशमें हों अथवा केन्द्र (१,४,७,१०) या त्रिकोण (५,१)-में स्थित हो तो उस समय यज्ञोपवीत लेनेवाला ब्रह्मचारी अत्यन्त धनवान् तथा वेद-वेदाङ्गोंका पारङ्गत विद्वान् होता है।३६१-३६४॥ यदि गुरु, शुक्र अथवा शाखाधिपति परमोच्च स्थानमें हों और मृत्यु (आठवाँ) स्थान शुद्ध हो तो उस समय ब्रह्मचर्यत्रत ग्रहण करनेवाला द्विज वेद-शास्त्रमें 'निष्णात' होता है॥३६५ ॥ गुरु, शुक्र अथवा शाखाधिपति यदि अपने अधिमित्रगृहमें या उसके उच्च गृहमें अथवा उसके अंशमें स्थित हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाला ब्रह्मचारी विद्या तथा धनसे सम्पन्न होता है॥३६६ ॥ शाखाधिपतिका दिन हो, बालकको शाखाधिपतिका बल प्राप्त हो तथा शाखाधिपतिका ही लग्न हो-ये तीन बातें उपनयन संस्कारमें दुर्लभ हैं ॥३६७॥ उसके चतुर्थाशमें| चन्द्रमा हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाला बालक विद्यामें निपुण होता है। किंतु यदि वह पापग्रहके अंशमें अधवा अपने अंशमें हो तो यज्ञोपवीती द्विज सदा दरिद्र और दुःखी रहता है ॥३६८॥ जब श्रवणादि नक्षत्र में विद्यमान चन्द्रमा कर्कके अंश-विशेषमें स्थित हो तो ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करनेवाला द्विज वेद, शास्त्र तथा धन-धान्य-समृद्धिसे सम्पन्न होता है॥३६९ ॥ शुभ लग्र हो, शुभग्रहका अंश चल रहा हो, मृत्युस्थान शुद्ध हो तथा लग और मृत्यु-स्थान शुभग्रहोंसे संयुक्त हो अथवा उनपर शुभग्रहोंकी दृष्टि हो, अभीष्ट स्थानमें स्थित बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा आदि पाँच बलवान् ग्रहोंसे लग्रस्थान संयुक्त या दृष्ट हो अथवा स्थान आदिके बलसे पूर्ण चार ही शुभग्रहयुक्त ग्रहोद्वारा लगस्थान देखा जाता हो और वह इक्कीस महादोषोंसे रहित हो तो यज्ञोपवीत लेना शुभ है। शुभाहोंसे संयुक्त या दृष्ट सभी राशियाँ शुभ हैं ।। ३७०-३७२॥ वे शुभ राशियाँ शुभ ग्रहके नवांशमें हो तो व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत)-में ग्राह्य हैं, किंतु कर्कराशिका अंश शुभ प्रहसे युक्त तथा दृष्ट हो तो भी कभी ग्रहण करने योग्य नहीं है॥३७३ ॥ इसलिये वृष और मिथुनके अंश तथा तुला और कन्याके अंश शुभ हैं। इस प्रकार लागत नवांश होनेपर व्रतबन्ध उत्तम बताया गया है ॥ ३७४।। तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थानमें पापग्रह हों, छठा, आठवाँ और बारहवां स्थान शुभग्रहसे खाली हो और चन्द्रमा छठे, आठवें, लग्न तथा बारहवें स्थानमें न हों तो उपनयन शुभ होता है ।। ३७५ ॥ चन्द्रमा अपने उच्च स्थानमें होकर भी यदि व्रती पुरुषके व्रतबन्ध-मुहूर्त सम्बन्धी लग्नमें स्थित हो तो वह उस बालकको निधन और क्षयका रोगी बना देता है ॥ ३७६ ॥ यदि सूर्य केन्द्रस्थानमें प्रकाशित हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाले बालकोंके पिताका नाश हो जाता है। पाँच दोषोंसे रहित लग्न उपनयनमें शुभदायक होता है ।। ३७७ ॥ वसन्त ऋतुके सिवा और कभी सुष्णपक्षमें, गलग्रहमें, अनध्यायके दिन, भद्रामें तथा अष्ठीको बालकका उपनयन-संस्कार नहीं होना चाहिये ॥ ३७८ ॥ त्रयोदशीसे लेकर चार, ससमीसे लेकर तीन दिन और चतुर्धा ये आठ गलग्रह अशुभ कहे गये हैं ॥३७९ ॥

(क्षरिका-बन्धनकर्म- ) अब मैं क्षत्रियोंके लिये क्षुरिका-बन्धन कर्मका वर्णन करूँगा, जो विवाह के पहले सम्पन्न होता है। विवाहके लिये कहे हुए मासोंमें, शुक्लपक्षमें, जबकि बृहस्पति, शुक्र और मङ्गल अस्त न हों, चन्द्रमा और ताराका बल प्राप्त हो, उस समय मौझीबन्धनके लिये बतायी हुई तिथियाँ, मङ्गलवारको छोड़कर शेष सभी दिनों में यह कर्म किया जाता है। कर्ताका लग्रगत नवांश यदि अष्टमोदयसे रहित न हो, आम शुद्ध हो, चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवें में न होकर लझमें स्थित हों; शुभग्रह दूसरे, पांचवें, नर्वे, ला, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानों में हों; पापग्रह तीसरे, ग्यारहवें और छठे स्थान में हो तो देवताओं और पितरों की पूजा करके क्षुरिका- बन्धनकर्म करना चाहिये ॥ ३८०-३८३ ॥ पहले देवताओंके समीप क्षुरिका (कटार)-की भलीभांति पूजा करे। तत्पश्चात् शुभ लक्षणोंसे युक्त उस क्षुरिकाको उत्तम लग्नमें अपनी कटिमें बाँधे ॥ ३८४ ॥ क्षुरिकाकी लम्बाईके आधे (मध्यभाग) पर जो विस्तारमान हो उससे क्षुरिकाके विभाग करे। छेदखण्ड (विभाग) क्रमसे ध्वज आदि आय कहलाते हैं। उनकी आठ संज्ञाएँ हैं-ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वा, वृष, गर्दभ, गज और ध्वाक्ष। ध्वज नामक आयमें शत्रुका नाश होता है। ३८५ ॥ धूम्र आयमें घात, सिंह नामक आयमें जय, श्वा (कुत्ता) नामक आयमें रोग, वृष आयमें धनलाभ, गर्दभ आयमें अत्यन्त दुःखकी प्राप्ति, गज आयमें अत्यन्त प्रसन्नता और ध्वाङ्क्ष नामक आयमें धनका नाश होता है। खड्ग और छुरीके मापको अपने अङ्गुलसे गिने ॥ ३८६-३८७ ।। मापके अङ्गुलोंमेंसे यारहसे अधिक हो तो ग्यारह घटा दे। फिर शेष अङ्गलोंके क्रमशः फल इस प्रकार हैं ॥ ३८८ ॥ पुत्र-लाभ, शत्रुवध, स्त्रीलाभ, शुभगमन, अर्थहानि, अर्थवृद्धि, प्रीति, सिद्धि, जय और स्तुति ॥ ३८९॥

छुरी या तलवारमें यदि ध्वज अथवा वृष आय-विभागके पूर्वभाग में नष्ट (भङ्ग) हो, तथा सिंह और गज-आयके मध्यभागमें तथा कुक्कुर और काक-आयके अन्तिम भागमें एवं धूम्र और गर्दभ आयके अन्तिम भागमें नष्ट हो जाय तो शुभ नहीं होता है। (अत: ऐसी छुरी या तलवारका परित्याग कर देना चाहिये, यह बात अर्थतः सिद्ध होती है) ॥ ३९०३ ॥

(समावर्तन-) उत्तरायणमें जब गुरु और शुक्र दोनों उदित हों, चित्रा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, पुनर्वसु पुष्य, रेवती, श्रवण, अनुराधा, रोहिणी-ये नक्षत्र हों तथा रवि, सोम, बुध, गुरु और शुक्रवारमेंसे कोई वार हो तो इन्हीं रवि आदि पाँच ग्रहोंकी राशि, लन और नवमांशमें, प्रतिपदा, पर्व, रिक्ता, अमावास्या, तथा सप्तमीसे तीन तिथि-इन सब तिथियोंको छोड़कर अन्य तिथियों में गुरुकुलसे अध्ययन समाप्त करके घरको लौटनेवाले जितेन्द्रिय द्विजकुमारका समावर्तन-संस्कार (मुण्डन-हवन आदि) करना चाहिये ॥ ३९१-३९३३ ॥

(विवाहकश्चन-) विप्रवर! सब आश्रमोंमें यह गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है। उसमें भी जब सुशीला धर्मपत्नी प्राप्त हो तभी सुख होता है। स्त्रीको सुशीलताकी प्राप्ति तभी होती है, जब विवाहकालिक लग्न शुभ हो। इसलिये मैं साक्षात् ब्रह्माजीद्वारा कथित लग्न-शुद्धिको विचार करके कहता हूँ॥ ३९४ ३९५३ ॥

प्रथमत: कन्यादान करनेवालोंको चाहिये कि वे किसी शुभ दिनको अपनी अञ्जलिमें पान, फूल, फल और द्रव्य आदि लेकर ज्योतिषशास्त्रके ज्ञाता समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, प्रसन्नचित्त तथा सुखपूर्वक बैठे हुए, विद्वान् ब्राह्मणके समीप जाय और उन्हें देवताके समान मानकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपनी कन्याके विवाह-लगाके विषयमें पूछे ।। ३९६-३९७ ॥

(ज्योतिषीको चाहिये कि उस समय लग्न और ग्रह स्पष्ट करके देखे-) यदि प्रचलनमें पापग्रह हो या लग्रसे सप्तम भाव में मङ्गल हो तो जिसके लिये प्रश्र किया गया है, उस कन्या और वरको ८ वर्षके भीतर ही धातक अरिष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिये। यदि लग्नमें चन्द्रमा और उससे साम भाव मङ्गल हो तो ८ वर्षके भीतर ही उस कन्याके पतिको घातक कर प्राप्त होगा-ऐसा समझे। यदि लग्रसे पश्चम भावमें

*छुरी या तलवारकी मुद्रीकी ओर पूर्व और अग्रकी ओर अन्त समझना चाहिये।

पापग्रह हो और वह नीचराशिमें पापग्रहसे देखा जाता हो तो वह कन्या कुलटा स्वभाववाली अथवा मृतवत्सा होती है, इसमें संशय नहीं है।३९८-४०० ॥ यदि प्रपलासे ३,५,७,११ और १०वें भावमें चन्द्रमा हो तथा उसपर गुरुकी दृष्टि हो तो समझना चाहिये कि उस कन्याको शीघ्र ही पतिकी प्रासि होगी॥ ४०१ ॥ यदि प्रश्रलपमें तुला, वृष या कर्क राशि हो तथा वह शुक्र और चन्द्रमासे युक्त हो तो विवाहके विषयमें प्रश्र करनेपर वरके लिये कन्या (पत्नी) लाभ होता है अथवा सम राशि लग्न हो, उसमें समराशिका ही द्रेष्काण हो और सम राशिका नवमांश तथा उसपर चन्द्रमा और शुक्रकी दृष्टि हो तो वरको पत्नीकी प्राप्ति होती है॥४०२-४०३ ॥

इसी प्रकार यदि प्रश्रलग्नमें पुरुषराशि और पुरुषराशिका नवमांश हो तथा उसपर पुरुषग्रह (रवि, मङ्गल और गुरु)-की दृष्टि हो तो जिनके लिये प्रश्न किया गया है, उन कन्याओंको पतिकी प्राप्ति होती है॥४०४॥

यदि प्रश्नसमयमें कृष्णपक्ष हो और चन्द्रमा सम राशिमें होकर लग्रसे छठे या आठवें भावमें पापग्रहसे देखा जाता हो तो (निकट भविष्य में) विवाह सम्बन्ध नहीं हो पाता है॥४०५ ।। यदि प्रथकालमें शुभ निमित्त और शुभ शकुन देखने- सुनने में आवें तो वर, कन्याके लिये शुभ होता है तथा यदि निमित्त एवं शकुन आदि अशुभ हों तो अशुभ फल होता है ॥४०६॥

(कन्या वरण-) पञ्चाङ्ग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) से शुद्ध दिनमें यदि वर और कन्याके चन्द्रबल तथा ताराबल प्रास हों तो विवाहके लिये विहित नक्षत्र या उसके मुहूर्तमें वरको चाहिये कि अपने कुलके श्रेष्ठ जनों के साथ गीत, वाद्यकी वनि और ब्राह्मणोंके आशीर्वचन (शान्ति मन्वपात) आदिसे युक्त होकर विविध आभूषण, शुभ वस्त्र फूल, फल, पान, रक्षत, चन्दन और सुगन्यादि लेकर कन्याके घरमें जाय और विनीत भाक्से कन्याका वरण करे। (कन्याका वरण वरके बड़े भाई अथवा गुरुजनको करना चाहिये।) उसके बाद कन्याका पिता प्रसन्नचित्त होकर अभीष्ट वरको कन्यादान करे।। ४०७-४०९॥

कन्याके पिताको चाहिये कि अपनी कन्यासे श्रेष्ठ, कुल, शील, वयस्, रूप, धन और विद्यासे युक्त वरको वरके वयस्से छोटी रूपवती अपनी कन्या दे। कन्यादानसे पूर्व सब गुणोंकी आत्रयभूता, तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दरी, दिव्य गन्ध, माला और वस्वसे सुशोभित, सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा सब आभूषणोंसे मण्डित, अमूल्य मणिमालाओंसे दसों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई, सहस्तों दिव्य सहेलियोंसे सुसेविता सर्वगुणसम्पन्ना शची (इन्द्राणी)-देवीकी पूजा करके उनसे प्रार्थना करे-'हे देवि! हे इन्द्राणि! हे देवेन्द्रप्रियभामिनि! आपको मेरा नमस्कार है। देवि! इस विवाहमें आप सौभाग्य, आरोग्य और पुत्र प्रदान करें। इस प्रकार प्रार्थना करके पूजाके बाद विधानपूर्वक ऊपर कहे हुए गुणयुक्त वरके लिये अपनी कुमारी कन्याका दान करे ॥ ४१०-४१४ ॥

(कन्या-वरकी वर्षशुद्धि-) कन्याके जन्मसमयसे सम वर्षों में और वरके जन्मसमयसे विषम वर्षों में होनेवाला विवाह उन दोनोंके प्रेम और प्रसन्नताको बढ़ानेवाला होता है। इससे विपरीत (कन्याके विषम और वरके सम वर्ष में) विवाह वर-कन्या दोनोंके लिये घातक होता है।।४१५॥

(विवाहविहित मास-) माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्यष्ट-ये चार मास विवाहमें श्रेष्ठ तथा कार्तिक और मार्गशीर्ष ये दो मास मध्यम हैं। अन्य मास निन्दित हैं ॥४१६॥

सूर्य जब आद्रा नक्षत्रमें प्रवेश करे तबसे दस नक्षत्रतक (अर्थात् आद्रसे स्वातीतकके नक्षत्रों में जबतक सूर्य रहें, तबतक) विवाह, देवताको प्रतिष्ठा और उपनयन नहीं करने चाहिये। बृहस्पति और शुक्र जब अस्त हो, बाल अथवा वृद्ध हों तथा केवल बृहस्पति सिंहाशि या उसके नवमांशमें हो, उस समय भी ऊपर कहे हुए शुभ कार्य नहीं करने चाहिये॥४१७-७१८॥

(गुरु तथा शुक्रके बाल्य और वृद्धत्व-) शुक्र जब पश्चिममें उदय होता है तो दस दिन और पूर्वमें उदय होता है तो तीन दिन तक बालक रहता है तथा जब पश्चिममें अस्त होनेको रहता है तो अस्तसे पाँच दिन पहले और पूर्वमें अस्त होनेसे पंद्रह दिन पहले वृद्ध हो जाता है। गुरु उदयके बाद पंद्रह दिन बालक और अस्तसे पहले पंद्रह दिन वृद्ध रहता है। ४१९ ॥

जबतक भगवान् हृषीकेश शयनावस्था में हों तबतक तथा भगवान्के उत्सव (उत्थान या जन्मदिन)-में भी अन्य मङ्गलकार्य नहीं करने चाहिये । ४२०॥ पहले गर्भके पुत्र और कन्याके जन्ममास, जन्मनक्षत्र और जन्म-तिथि-वारमें भी विवाह नहीं करना चाहिये। आद्य गर्भकी कन्या और आद्य गर्भके वरका परस्पर विवाह नहीं कराना चाहिये तथा वर-कन्यामें कोई एक ही ज्येष्ठ (आद्य गर्भका) हो तो ज्येष्ठ मासमें विवाह श्रेष्ठ है। यदि दोनों ज्येष्ठ हों तो ज्येष्ठ मासमें विवाह अनिष्टकारक कहा गया है॥४२१-४२२॥

(विवाहमें वर्च्य-) भूकम्यादि उत्यात तथा सर्वग्रास सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण हो तो उसके र बाद सात दिनतकका समय शुभ नहीं है। यदि खण्डग्रहण हो तो उसके बाद तीन दिन अशुभ होते हैं। तीन दिनका स्पर्श करनेवाली (वृद्धि) तिथि, क्षयतिथि तथा ग्रस्तास्त (ग्रहण लगे चन्द्र, सूर्यका अस्त) हो तो पूर्वक तीन दिन अच्छे नहीं माने जाते हैं। यदि ग्रहण लगे हुए सूर्य, चन्द्रका उदय हो तो बादके तीन दिन अशुभ होते है। संध्यासमयमें ग्रहण हो तो पहले और बाद के भी तीन-तीन दिन अनिष्टकारक है तथा मध्य रात्रिमें ग्रहण हो तो सात दिन (तीन पहलेके और तीन बादके और एक ग्रहणयाला दिन) अशुभ होते हैं॥४२३-४२४॥ मासके अन्तिम दिन, रिक्ता, अष्टमी, व्यतीपात और वैधृतियोग सम्पूर्ण तथा परिघ योगका पूर्वार्धयि विवाहमें वर्जित हैं॥४२५॥

(विहित नक्षत्र-) रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अनुराधा, स्वाती, मृगशिरा, हस्त, मघा और मूल-ये ग्यारह नक्षत्र वेधरहित हों तो इन्हींमें स्त्रीका विवाह शुभ कहा गया है ।। ४२६ ॥ विवाहमें वरको सूर्यका और कन्याको बृहस्पत्तिका बल अवश्य प्राप्त होना चाहिये। यदि ये दोनों अनिष्टकारक हों तो यत्नपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये॥ ४२७ ॥ गोचर, वेष और अष्टकवर्ग-सम्बन्धी बल उत्तरोत्तर अधिक है। इसलिये गोचरवल स्थूल (साधारण) माना जाता है। अर्थात् ग्रहोंका अहकवर्ग-बल ग्रहण करना चाहिये। प्रथम तो वर-कन्याके चन्द्रबल और तारावल देखने चाहिये। उसके बाद पञ्चाङ्ग (तिथि, वार, आदि) के बल देखे। तिथिमें एक बार में दो, नक्षत्रमें तीन, योगमें चार और करण पाँच गुने बल होते हैं। इन सबकी अपेक्षा मुहूर्त बली होता है। मुहूर्तसे भी लग्न, लग्रसे भी होरा (राश्यर्ध), होरासे द्रेष्काण, द्रेष्काणसे नवमांश, नवमांशसे भी द्वादशांश तथा उससे भी त्रिशांश बली होता है। इसलिये इन सबके बल देखने चाहिये ॥ ४२८-४३१ ।।

विवाहमें शुभग्रहसे युक्त या दृष्ट होनेपर सब राशि प्रशस्त हैं। चन्द्रमा, सूर्य, बुध, बृहस्पति तथा शुक्र आदि पाँच ग्रह जिस राशिके इष्ट हों, वह लग्र

१.आषाढ़ शुक्ला ११ से कार्तिक शुक्ला ११ तक भगवान् वपीकशके शयनका काल है।

२.अर्थात् गोचरबल एक, वेधबल दो और अष्टकवर्ग-बल तीनके बराबर है।

३ जातक अध्याय में देखिथे। अभिप्राय यह है कि नक्षत्रविहित (गुणयुक्त) न मिले तो उसका मुहूर्त लेना चाहिये। यदि लाराशि निर्बल हो तो उसके नवांश आदिका बल देखकर निर्बल लनको भी प्रशस्त समझना चाहिये।

शुभप्रद होता है। यदि चार ग्रह भी क्ली हो तो भी उन्हें शुभप्रद ही समझना चाहिये। ४३२-४२३॥

मुने! जामित्र (लप्रसे सप्तम स्थान) शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो तथा लग्न इक्कीस दोघोंसे रहित हो तो उसे विवाहमें ग्रहण करना चाहिये। अब मैं उन इक्कीस दोषोंके नाम, स्वरूप और फलका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ, सुनो- ॥ ४३४॥

(विवाहके इक्कीस दोष-) पञ्चाङ्ग-शुद्धिका न होना, यह प्रथम दोष कहा गया है। उदयास्तकी शुद्धिका न होना २, उस दिन सूर्यको संक्रान्तिका होना ३, पापग्रहका षड्वर्गमें रहना ४, लग्नसे छठे भावमें शुक्रकी स्थिति ५, अष्टममें मङ्गलका रहना ६, गण्डान्त होना ७, कर्तरीयोग ८, बारहवें, छठे और आठवें चन्द्रमाका होना तथा चन्द्रमाके साथ किसी अन्य ग्रहका होना ९, वर-कन्याकी जन्मराशिसे अष्टम राशि लग्न हो या दैनिक चन्द्रराशि हो १०, विषघटी ११, दुर्मुहूर्त १२, वार-दोष १३, खार्जूर १४, नक्षत्रैकचरण १५, ग्रहण और उत्पातके नक्षत्र १६, पापग्नहसे विद्ध नक्षत्र १७, पापसे युक्त नक्षत्र १८, पापग्रहका नवमांश १९, महापात २० और वैधृति २१ –विवाहमें ये २१ दोष कहे गये हैं ।। ४३५-४३८॥

मुने! तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण- इन पाँचोंका मेल 'पञ्चाङ्ग' कहलाता है। उसकी शुद्धि' पचाङ्ग'शुद्धि कहलाती है। जिस दिन पश्चाङ्गके दोष हो, उस दिन विवाहला बनाना निरर्थक है। इस प्रकारका लन यदि पाँच इष्ट ग्रहोंसे युक्त हो तो भी उसको विमखित दूधके समान त्याग देना चाहिये । ४३९-४४०॥ लग या उसके नवांश अपने-अपने स्वामीसे युक्त या दृष्ट न हों व अथवा परस्पर (लोशसे नवमांश और नवमांशपतिसे ॐ लग्रेश) युक्त या दुष्ट न हो अथवा अपने स्वामीके शुभग्रह मित्रसे युक्त या दृष्ट न हो तो वरके लिये घातक होते है*।इसी प्रकार लाश सतम और उसके नवमांशमें भी दोनों यदि अपने-अपने स्वामीसे अथवा परस्पर युक्त या घटनाही हों या अपने-अपने स्वामीके शुभ मित्रसे युक्त या दुष्ट न हों तो उस दशामें विवाह होनेपर वह पथके लिये पातक है॥४१-४४२३॥

सूर्यकी संक्रान्तिके समय पूर्व और, पश्चात् सोलह-सोलह घड़ी विवाह आदि शुभ कार्यो त्याज्य है। लनका षड्वर्ग (राशि, होरा, देष्काण, नवमांश, द्वादशांश तथा त्रिंशांश) शुभ हो तो विवाह, देवप्रतिष्ठा आदि कार्यों में श्रेष्ठ माना गया है।।। ४४२-४४४॥

लग्रसे छठे स्थानमें शुक्र हो तो वह भृगुषष्ठ' नामक दोष कहलाता है। उच्चस्थ और शुभ ग्रहसे युक्त होनेपर भी उस लग्रको सदा त्याग देना चाहिये। लग्नसे अष्टम स्थानमें मङ्गल हो तो यह 'भौम महादोष' कहलाता है। यदि मङ्गल उच्चमें हो और तीन शुभ ग्रह लग्नमें हों तो इस लग्नका त्याग नहीं करना चाहिये (अर्थात् ऐसी स्थिति, अष्टम मङ्गलका दोष नष्ट हो जाता है)। ४४५-४४६॥

(गण्डान्त-दोष-) पूर्णा (५, १०, १५) तिथियेकि अन्त और नन्दा (१,६,११) तिथियोंकी आदिकी सन्धिमें दो घड़ी 'तिथिगण्डान्त-दोष' कहलाता है। यह जन्म, यात्रा, उपनयन और विवाहादि शुभ कार्यो घातक कहा गया है। ४४७॥ कर्क लग्रके अन्त और सिंह लग्रके आदिकी सन्धिर्म, वृश्चिक और धनुकी सन्धिमें तथा मीन और मेष लग्नकी सन्धि आधा घड़ी 'लग्रगण्डान्त' कहलाता है। यह भी घातक होता है॥४८॥ आश्लेषाके अन्तका चतुर्थ चरण और मघाका प्रथम चरण तथा ज्याष्टा के अन्तकी १६ घड़ी और मूलका प्रथम चरण एवं रेवती नक्षत्रके अन्तकी

*यहाँ घातक शब्द अशुभ-सूचक समझना चाहिये अर्थात् ऐसे लग्रमें वरको अशुभ फल प्राप्त होता है।

ग्यारह पड़ी और अश्विनीका प्रथम चरण-इस प्रकार इन दो-दो नक्षत्रोंकी सन्धिका काल 'नक्षत्रगण्डान्स' कहलाता है। ये तीनों प्रकारके गण्डान्त महाक्रूर होते हैं ।।४४९३ ॥

(कसरीदोष-)लग्रसे बारहवें मानी और द्वितीयमें वक्री दोनों पापग्रह हों तो लपमें आगे- पीछे दोनों ओरसे जानेके कारण यह 'कर्तरीदोष' कहलाता है। इसमें विवाह होनेसे यह कर्तरीदोष वर-वधू दोनोंके गलेपर छुरी चलानेवाला (ठनका अनिष्ट करनेवाला) होता है। ऐसे कर्तरीदोषसे युक्त लनका परित्याग कर देना चाहिये। ।।४५०-४५१ ॥

(लग्न-दोष-) यदि लग्नसे छठे, आठवें तथा बारहवेंमें चन्द्रमा हो तो यह 'लग्रदोष' कहलाता है। ऐसा लग्न शुभग्रहों तथा अन्य सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त होनेपर भी दोषयुक्त होता है। वह लग्र बृहस्पति और शुक्रसे युक्त हो तथा चन्द्रमा उच्च, नीच, मित्र या शत्रुराशिमें (कहीं भी) हो, तो भी यलपूर्वक त्याग देने योग्य है, क्योंकि यह सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वर-वधूके लिये 'घातक' कहा गया है ॥ ४५२-४५३३ ॥

(सग्रहदोष-) चन्द्रमा यदि किसी ग्रहसे युक्त हो तो 'सग्रह' नामक दोष होता है। इस दोषमें भी विवाह नहीं करना चाहिये। चन्द्रमा यदि सूर्यसे युक्त हो तो दरिद्रता, मगलसे युक्त हो तो घात अथवा रोग, एघसे युक्त हो तो अनपत्यता (संतान-हानि), गुरुसे युक्त हो तो दौर्भाग्य, शुक्रसे.युक्त हो तो पति-पत्नी में शत्रुता, शनिसे युक्त हो तो प्रव्रज्या (घरका त्याग), राहुसे युक्त हो तो सर्वस्वहानि और केतुसे युक्त हो तो कष्ट और दरिद्रता होती है ।। ४५४-४५७ ।।

(पापग्रहकी निन्दा और शुभग्रहों की प्रशंसा-) मुने! इस प्रकार सग्रहदोषमें चन्द्रमा यदि पापग्रहसे युक्त हो तो वर-वधू दोनों के लिये घातक होता है। यदि वह शुभग्रहोंसे युक्त हो तो उस स्थिति में यदि उच्च या मित्रकी राशिमें चन्द्रमा हो तो लग्र दोषयुक्त रहनेपर भी वर-वधूके लिये कल्याणकारी न होता है। परंतु चन्द्रमा स्वोच्चम या स्वराशिमें अथवा मित्रकी राशिमें रहनेपर भी यदि पापग्रहसे युक्त हो तो वर-वधू दोनोंके लिये पातक होता है ॥ ४५८-४५९॥

(अष्टमराशि लग्रदोष-) वर या वधूके जन्मलग्रसे अथवा उनकी जन्मराशिसे अष्टमराशि विवाह-लग्नमें पड़े तो यह दोष भी वर और वधूके लिये घातक होता है। वह राशि या वह लग्न शुभग्रहसे युक्त हो तो भी उस लग्रको, उस नवमांशसे युक्त लग्नको अथवा उसके स्वामीको यन्त्रपूर्वक त्याग देना चाहिये। ।।४६०-४६१।।

(द्वादश राशिदोष) वर-वधूके जन्म-लग्न या मै जन्मराशिसे द्वादश राशि यदि विवाह-लग्नमें पड़े तो वर-वधुके धनकी हानि होती है। इसलिये उस लग्नको, उसके नवमांशको और उसके स्वामीको भी त्याग देना चाहिये ॥ ४६२३ ।।

(जन्मलग्न और जन्मराशिकी प्रशंसा-) जन्म- राशि और जन्मलग्रका उदय विवाहमें शुभ होता है तथा दोनोंके उपचय (३, ६, १०, ११) ने स्थान यदि विवाह-लग्रमें हो तो अत्यन्त शुभप्रद न होते हैं ।। ४६३३॥

(विषघटी धुवाङ्क-) अश्विनीका ध्रुवाङ्क ५०, भरणीका २४, कृत्तिकाका ३०, रोहिणीका ५४, मृगशिराका १३, आर्द्राका २१, पुनर्वसुका ३०, पुथ्यका २०, आश्लेषाका ३२, मघाका ३०, पूर्वाफाल्गुनीका २०, उत्तराफाल्गुनीका १८, हस्तका से २१, चित्राका २०, स्वातीका १४, विशाखाका १४, अनुराधाका १०, ज्येष्ठाका १४, मूलका ५६, घूर्वाषाढका २४, उत्तराषाढ़का २०, श्रवणका १०, धनिष्ठाका १०, शतभिषाका १८, पूर्व भाद्रपदका १६, उत्तर भाद्रपदका २४ और रेवतीका धुवाङ्क ३० है। इन अश्विनी आदि नक्षत्रोंके अपने-अपने ध्रुवाङ्क तुल्य घड़ीके बाद ४ घड़ीतक विषयटी होती है। विवाह आदि शुभ कामि विषधतिकाओंका त्याग करना चाहिये।

रवि आदि चारो जो सहरी मिनिस कहा गया है, वह यदि अन्य लाख गुणारी युक्त हो तो भी विवाह आदि शुभ कायाम वर्णनीय ही है।।रवि आदि दिनों में जो-जओ जार-दोष कहे गये, वे अन्य सम्म गुणोसे युक्त हो तो भी शुभ कार्य वर्जनीय है॥४७०॥

नक्षत्रके जिस चरणमें पूर्वोक्त एकार्गल दोष हो, उस चरण (नांश)-से युक्त ओ लय हो उसमें यदि गुरु, शुक्रका योग हो तो भी विषयुक्त दूधके समान उसको त्याग देना चाहिये ।।४७१॥

ग्रहण तथा उत्पातसे दूषित नाक्षत्रको तीन ऋतु (छ: मास)-तक शुभ कार्यमें छोड़ देना चाहिये। जब चन्द्रमा उस नक्षत्रको भोगकर छोड़ दे तो वह नक्षत्र जली हुई लकड़ी के समान निष्फल हो जाता है अर्थात् दोष-कारक नहीं रह जाता। शुभ कार्यों में ग्रह से विद्ध और पापग्रहसे युक्त सम्पूर्ण नक्षत्रको मदिरामिश्रित पञ्चगव्यके समान त्याग देना चाहिये, परंतु यदि नक्षत्र शुभग्रहसे विद्ध हो तो ठसका विद्ध चरणमात्र त्याज्य है, सम्पूर्ण नक्षत्र नहीं, किंतु पापग्रहसे विद्ध नक्षत्र शुभकार्यमें सम्पूर्ण रूपसे त्याग देने योग्य है ।। ४७२-०७४ ।।

 (विहित नवमांग-) वृष, तुला, मिथुन, कन्या और पनुका उत्तरार्ष तथा इन राशियोंकि नवमांश विवाहलपमें शुभप्रद है। किसी भी लपमें अन्तिम नवमांश यदि वर्गोत्तम हो सभी उसे शुभप्राय समझना चाहिये। अन्यषा विवाह-लनका अन्तिम नवांश (२६ अंश ४० कलाके बाद) अशुभ होता है। यहाँ अन्य नवमांश नहीं ग्रहण करने चाहिये क्योंकि वे "कुनवांश' कहलाते हैं। लग्नमें कुनर्वाश हो तो अन्य सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वह त्याग्य है। जिस दिन महापात (सूर्य-चन्द्रमाका क्रान्ति-साम्य) हो, वह दिन भी शुभ कार्यमें छोड़ देने योग्य है; क्योंकि वह अन्य सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वर-वधूके लिये घातक होता है। इन दोषोंसे भिन्न विद्युत्, नीहार (कुहरा) और वृष्टि आदि दोष, जिनका अभी वर्णन नहीं किया गया है, "स्वल्पदोष' कहलाते हैं । ४७५-४७८ ॥

(लघुदोष-) विद्युत, नीहार, वृष्टि, प्रतिसूर्य (दो सूर्य-सा दीखना), परिवेष (घेरा), इन्द्रधनुष, घनगर्जन, लत्ता, उपग्रहो, पात, मासदग्ध तिथि, दग्ध, अन्ध, बधिर तथा पङ्गु-इन राशियोंके लग्न', एवं छोटे-छोटे और भी अनेक दोष हैं; अब उनकी व्यवस्थाका प्रतिपादन किया जाता है।। ४७९-४८०।।

१. विशेष-यदि नक्षत्रका मान ६० घड़ी हो तव इतने ध्रुवाव और उसके पंद्रहवें भाग चार घटीतक "विवक्रटी' का अवस्थान मध्यममानके अनुसार कहा गया है। इससे यह स्वयं सिद्ध होता है कि यदि नक्षत्रका पान ६० पड़ीसे अधिक या अल्प होगा तो विषपटीका मान और ध्रुवाङ्क भी उसी अनुपातसे अधिक या कम हो जायगा तथा स्पष्ट भभोगमानका पंद्रहवाँ भाग ही विधवटीका स्पष्ट मान होगा। मान लीजिये कि पुनर्वसुका भभोगमान ५६ घड़ी है तो त्रैराशिकसे अनुपात निकालिये। यदि ६० बढ़ीमें ३० धूवाङ्क तो इए पभोग ५६ घड़ी में क्या होगा? इस प्रकार ५६ से ३० को गुणा करके ६० के द्वारा भाग देनेसे लब्धि २८ पुनर्वसुका स्पष्ट धुवाङ्क हुआ तथा पभोग ५६ का पंद्रहवाँ भाग ३ घड़ी ४४ पल स्पष्ट 'विषघटी' हुई। इसलिये २८ घड़ी के बाद ३ घड़ी ४ पलतक विषघटी रहेगी।

२. किसी भी राशिमें अपना ही नवमांश हो तो वह वर्गोत्तम कहलाता है। जैसे मेषमें मेषका नवमांश तथा वृषमें वृक्षका नवांश इत्यादि।

३. सूर्य जिस नक्षत्रमें वर्तमान हो, उसमें ५, ७, ८, १०, १४, १५, १८, १९, २१, २२, २३, २४, २५-इन संख्याओंके किसी भी नक्षत्र में चन्द्रमा हो तो 'उपग्रहदोष' कहलाता है।

४. सूर्य यदि धनु या मीनमें हो तो द्वितीया, वृध या कुम्भमें हो तो चतुर्थी, कर्क या मेषमें हो हो षष्ठी, कन्या या मिधुनमें हो तो आष्टमी, सिंह या वृष में हो तो दशमी तथा तुला या मकरमें हो तो द्वादशी 'दग्ध तिधि' कहलाती है।

५. कुम्भ, मीन, वृष, मिथुन, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु और कर्क-ये क्रमशः चैत्र आदि मासोंमें 'दग्ध, राशियाँ हैं।

विद्युत् (बिजली), नीहार (कुहरा या पाला), वृद्धि (वर्षा)-ये यदि असमयमें हों तभी देव समझे जाते हैं। यदि समयपर हों (जैसे जाड़ेके दिनमें पाला पड़े, वर्षा ऋतु में वर्षा हो तथा सबन मेघमें बिजली चमके, तो सब शुभ ही समझे जाते हैं। ४८१ ॥ यदि बृहस्पति, शुक्र अथवा बुध इनमेंसे एक भी केन्द्रमें हों तो इन सब दोषोंको ना कर देते हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ४८२ ।।

(पञ्चशलाका-वेध-) पाँच रेखाएँ पड़ी और पाँच रेखाएँ खड़ी खींचकर दो-दो रेखाएँ कोणों में खींचने (बनाने)-से पञ्चशलाका-चक्र' बनता है। इस चक्रके ईशान कोणवाली दूसरी रेखामें कृत्तिकाको लिखकर आगे प्रदक्षिण-क्रमसे रोहिणी आदि अभिजित्सहित सम्पूर्ण नक्षत्रोंका उल्लेख करे। जिस रेखामें ग्रह हो, उसी रेखाकी दूसरी ओरबाला नक्षत्र विद्ध' समझा जाता है ॥ ४८३।।

( लत्तादोष-) सूर्य आदि ग्रह क्रमश: अपने आश्रित नक्षत्रसे आगे और पीछे १२, २२, २, ७, ६, ५, ८ तथा ९ वें दैनिक नक्षत्रको लातोंसे दूषित करते हैं, इसलिये इसका नाम 'लत्तादोष' है।

(पातदोष-) सूर्य जिस नक्षत्रमें हों उससे आश्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा और श्रवणतककी जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनीसे दिन-नक्षत्रसक गिननेसे संख्या हो से वह नक्षत्र पातदोषसे दूषित समझा जाता है॥४८४-४८५॥

(परिहार-) सौराष्ट्र (काठियावाड़) और शाल्वदेशमें लत्तादोष वर्जित है

वर्जित है। कलिङ्ग (जगन्नाथपुरीसे कृष्णा नदीतकके भूभाग), वन (बङ्गाल), वाहिक (बलख) और कुरु (कुरुक्षेत्र) देशमें पातदोष त्याज्य हैं; अन्य देशों में ये दोष त्याज्य नहीं हैं ।। ४८६-४८७॥ मासदाध तिथि तथा दग्ध लग्न-ये मध्यदेश (प्रयागसे पश्चिम, कुरुक्षेत्रसे पूर्व, विन्ध्य और हिमालयके मध्य) में वर्जित हैं। अन्य देशों में ये दूषित नहीं हैं। ४८८ ॥ पङ्ग, अन्ध, काग, लग्न तथा मासोंमें जो शून्य राशियाँ कही गयी है, वे गौड़ (बङ्गालसे भुवनेश्वरतक और मालव (मालवा) देशमें त्याज्य हैं। अन्य देशों में निन्दित नहीं हैं। ।।४८९।।

(विशेष-) अधिक दोषोंसे दुष्ट कालको तो ब्रह्माजी भी शुभ नहीं बना सकते हैं; इसलिये जिसमें थोड़ा दोष और अधिक गुण हों, ऐसा काल ग्रहण करना चाहिये ।।४९०॥

(वेदी और मण्डप ) इस प्रकार वर-वधूके लिये शुभप्रद उत्तम समय में श्रेष्ठ लपका निरीक्षण (खोज) करना चाहिये। तदनन्तर एक हाथ ऊँची,

तुला और वृश्चिक-थे दोनों केवल दिन में तथा धनु और मकर-ये दोनों केवल रात्रि में 'बधिर' होते हैं। एवं मेष, वृष और सिंह-ये तीनों दिन में तथा मिथुन, कर्क, कन्या-ये तीनों रात्रि में 'अन्ध' होते हैं।

दिनमें कुम्भ और रात्रि में मीन 'पङ्गु' होते हैं।

२.पशलाकाचक्र-

२. जैसे-श्रवणमें कोई ग्रह हो तो मया नक्षत्र विद्ध समझा जायगा।

३. सूर्य, पूर्ण चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शहर, राहु।

४. इनमें सूर्य अपनेसे आगे और पूर्व चन्द्र पौडे, फिर मङ्गल आगे और बुध पीछेके नक्षत्रों को दूषित करते हैं। ऐसा ही क्रम आगे भी समझना चाहिये।

चार हाथ लंबी और चार हाथ चौड़ी उत्तर दिशामें | नत (कुछ नीची) वेदी बनाकर सुन्दर चिकने चार खम्भोंका एक मण्डप तैयार करे, जिसमें चारों ओर सोपान (सीढ़ियाँ) बनायी गयी हों। मण्डप भी पूर्व-उत्तरमें निम्न हो। वहाँ चारों तरफ कदलीस्तम्भ गड़े हों। वह मण्डप शुक आदि पक्षियों के चित्रोंसे सुशोभित हो तथा वेदी नाना प्रकारके माङ्गलिक चित्रयुक्त कलशोंसे विचित्र शोभा धारण कर रही हो। भौति-भौतिके वन्दनवार तथा अनेक प्रकारके फूलोंके शृङ्गारसे वह स्थान सजाया गया हो। ऐसे मण्डपके बीच बनी हुई वेदीपर, जहाँ ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचनपूर्वक आशीर्वाद देते हों, जो पुण्यशीला स्त्रियों तथा दिव्य समारोहोंसे अत्यन्त मनोरम जान पड़ती हो तथा नृत्य, वाद्य और माङ्गलिक गीतोंकी ध्वनिसे जो हृदयको आनन्द प्रदान कर रही हो, वर और वधूको विवाहके लिये बिठावे ॥ ४९१-४९५ ॥

( वर-वधूकी कुण्डलीका मिलान-) आठ प्रकारके भकूट, नक्षत्र, राशि, राशिस्वामी, योनि तथा वर्ण आदि सब गुण यदि ऋजु (अनुकूल या शुभ) हो तो ये पुत्र-पौत्रादिका सुख प्रदान करनेवाले होते हैं ॥ ४९६ ॥

वर और कन्या दोनोंकी राशि और नक्षत्र भिन्न हों तो उन दोनोंका विवाह उत्तम होता है। दोनोंकी राशि भिन्न और नक्षत्र एक हो तो उनका विवाह मध्याम होता है और यदि दोनोंका एक ही नक्षत्र, एक हो राशि हो तो उन दोनोंका विवाह प्राणसंकट उपस्थित करनेवाला होता है ॥ ४९७६॥

( स्थीदूर दोष-) कन्याके नक्षत्रसे प्रथम नवक (नौ नक्षत्रों)-के भीतर वरका नक्षत्र हो तो यह ' स्त्रीदूर' नामक दोष कहलाता है। जो अत्यन्त निन्दित है। द्वितीय नवक (१० से १८ तक) के भीतर हो तो मध्यम कहा गया है। यदि तृतीय नवक (१५ से २७ तक के भीतर हो तो उन दोनोंका विवाह श्रेष्ठ कहा गया ॥१८॥

(गणविचार-)पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्व भाइपद, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, भरणी और आा-ये नक्षत्र मनुष्यगण हैं। श्रवण, पुनर्वसु, हस्त, स्वाती, रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुष्य और मृगशिरा-ये देवगण हैं तथा मघा, चित्रा, विशाखा, कृत्तिका, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल और आश्लेषा-ये नक्षत्र राक्षसगण हैं ॥ ४९९-५०१॥ यदि वर और कन्याके नक्षत्र किसी एक ही गणमें हों तो दोनोंमें परस्पर सब प्रकारसे प्रेम बढ़ता है। यदि एकका मनुष्यगण और दूसरेका देवगण हो तो दोनोंमें मध्यम प्रेम होता है तथा यदि एकका राक्षसगण और दूसरेका देवगण या मनुष्यगण हो तो वर-वधू मृत्युतुल्य क्लेश प्रास होता है ॥५०२॥

(राशिकूट-) वर और कन्याकी राशियोंको परस्पर गिननेसे यदि वे छठी और आठवीं संख्यामें पड़ती हों तो दोनोंके लिये घातक हैं। यदि पाँचीं और नवीं संख्यामें हों तो संतानकी हानि होती है। यदि दूसरी और बारहवीं संख्यामें हों तो वर-वधू दोनों निर्धन होते हैं। इनसे भिन्न संख्यामें हों तो दोनोंमें परस्पर प्रेम होता है।५०३ ॥

(परिहार-)द्विद्वादश (२, १२) और नवपश्चम (९, ५) दोषमें यदि दोनोंकी राशियोंका एक ही स्वामी हो अथवा दोनोंके राशिस्वामियोंमें मित्रता हो तो विवाह शुभ कहा गया है। परंतु षडाष्टक (६,८) में दोनों के स्वामी एक होनेपर भी विवाह शुभदायक नहीं होता है॥५०४ ॥

(योनिकूट-) १ अथ, २ गज, ३ मेष, ४ सर्प, ५ सर्प,धान, ७ मार्जार, ८ मेष, ९ मार्जार, १० मूषक, ११ मूषक, १२ गौ, १३ महिष, १४ व्यान, १५ महिष, १६ व्यान, १७ मृग, १८ मृग, १९धान, २० वानर, २१ नकुल, २२ नकुल, २३ वानर, २४ सिंह, २५ अश्व, २६ सिंह, २७ गौ तथा २८ गज-ये क्रमशः अश्विनीसे

लेकर रेवतीतक (अभिजित्सहित) अट्ठाईस नक्षत्रोंकी योनियाँ है ।।५०५-५०६ ॥ इनमें श्वान और मृगमें, नकुल और सर्पमें, मेष और वानरमें, सिंह और गजमें, गौ और व्याघ्रमें, मूषक और माजार में तथा महिष और अश्वमें परस्पर भारी शत्रुता होती है।।५०७॥

(वर्णकूट-) मीन, वृश्चिक और कर्कराशि ब्राह्मण वर्ण हैं, इनके बादवाले क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण है। (एक वर्णके वर और वधूमें तो विवाह स्वयंसिद्ध है ही) पुरुष-राशिके वर्णसे स्त्री-राशिका वर्ण हीन हो तो भी विवाह शुभ माना गया है। इससे विपरीत (अर्थात् पुरुषराशिके वर्णसे स्त्रीराशिका वर्ण श्रेष्ठ) हो तो अशुभ समझना चाहिये ।। ५०८॥

(नाडीविचार-) चार चरणवाले नक्षत्र (अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाद, श्रवण, शतभिषा, उत्तर, भाद्रपद, रेवती-इन)-में उत्पन्न कन्याके लिये अश्विनीसे आरम्भ करके रेवतीतक तीन पर्यापर, क्रम-उत्क्रम' से गिनकर, नाही समझे। तीन चरणवाले (कृत्तिका, पुनर्वस, उत्तराफालानी, विशाखा, उत्तराषाढ़ और पूर्व भाद्रपद) नायि उत्पन्न कन्याके लिये कृत्तिकासे लेकर, भरणीतक क्रम-ठत्क्रम से चार, पर्वोपर, गिनकर, नाड़ीका ज्ञान प्राप्त करे तथा दो चरणोवाले (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) नाक्षत्रोंमें उत्पन्न कन्याकी नाही जाननेके लिये मृगशिरासे लेकर रोहिणीतक पाँच पर्वोपर क्रम-उत्क्रम से गिने। यदि वर, और, वधू दोनोंके नक्षत्र एक पर्वपर पड़ें तो वे उनके लिये घातक हैं और भिन्न पर्वोपर, पढ़ें तो ठनों शुभ समझना चाहिये ।। ५,०१॥

राशियों के वर्णको स्पष्ट समझने लिये यह कोष्ठ देखें-

मीन

मेष

वृष

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुम्भ

ब्राह्मण

क्षत्रिय

वैश्य

शुद्र

त्रिनाडी-

1

अश्विनी

आर्द्रा

पुनर्वसु

उत्तराफाल्गुनी

हस्त

ज्येष्ठा

मूल

शतभिषा

पूर्व भाद्रपद

2

भरणी

मृगाशिरा

पुष्य

पूर्वाफाल्गुनी

चित्रा

अनुराधा

पूर्वाषाढ़

धनिष्ठा

उत्तर भाद्रपद

3

कृत्तिका

रोहिणी

आश्लेषा

मधा

स्वाती

विशाखा

उत्तराषाढ़

श्रवण

रेवती

वर और कन्याकी कुण्डली मिलाने के लिये जो वश्य, वोनि, राशिकूट, योनिकूट, वर्णकूट तथा नाडी आदिका वर्णन किया गया है, उन सबको सुगमतापूर्वक जानने तथा उनके गुणोंको समझने के लिये निम्राङ्कित चक्रोंपर दृष्टिपात कीजिये-

जन्मकालिक ग्रहोंकी स्थिति तमा जन्म-नक्षत्र-सम्बन्धी आठ प्रकारके यहारा -वधूकी कुण्डलीका मित्तान किया जाता है। यदि जन्म-ला था जन्म-पशि (चन्द्रमा) से १,४,७,८ मा १२ स्थानमें माल या अन्य पापग्रह करको कुष्ठलीमें हो तो पत्नीके लिये और कन्याकी कुण्डलीमें हो तो परके लिये अनिष्टकारी होते हैं। यदि दोनों की कुण्डलियोंमें उक्त स्थानों में पापग्रहकी संख्या सपान हो तो उक्त दोष नहीं माना जाता है। उदाहरण के लिये-

यहाँ वरकी कुण्डलीमें ४ये और ज्वें स्थानमें शनि और मङ्गल दो पापग्रह हैं तथा कन्याकी कुण्डली में भी ७ वे स्थानमें शान, मङ्गल है, जिससे दोनोंक परस्पर माङ्गलिक दोष नष्ट होनेके कारण इन दोनॉका वैवाहिक सम्बन्ध श्रेष्ठ सिद्ध होता है। यहाँ भकूटके गुण इस प्रकार है-

इस तरह नक्षत्रमेलापको भी गणोंका योग २२॥ है। अठारहसे अधिक होनेके कारण इन दोनोंका विवाह- सम्बन्ध श्रेष्ठ सिद्ध होता है।

इसी प्रकार अन्य कुण्डति से भी ग्रह और नक्षत्रका मेल देखकर विवाहका निर्णय करना चाहिये।

(विवाहोंके भेद-) ऊपर बताये हुए शुभ समयमें (१) प्राजापत्य, (२) ब्राझ, (३) दैव और (४) आर्ष-ये चार प्रकारके विवाह करने चाहिये। ये ही चारों विवाह उपर्युक्त फल देनेवाले होते हैं। इससे अतिरिक्त जो गान्धर्व, आसुर, पैशाच तथा राक्षस विवाह हैं, वे तो सब समय समान ही फल देनेवाले होते हैं॥५१०-५११॥

(अभिजित् और गोधूलि लन-) सूर्योदय- कालमें जो लन रहता है, उससे चतुर्थ लगका नाम अभिजित् है और सातवाँ गोधूलि-लग्न कहलाता है। ये दोनों विवाहमें पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाले होते हैं ॥५१२॥ पूर्व तथा कलिङ्ग देशवासिर्योक लिये गोधूलि-लग्र प्रधान है और अभिजित्-लग्न तो सब देशोंके लिये मुख्य कहा गया है, क्योंकि वह सब दोषोंका नाश करनेवाला है।।५१३॥

(अभिजित्-प्रशंसा-)सूर्यके मध्य आकाशमें जानेपर अभिजित् मुहूर्त होता है, वह समस्त दोषोंको नष्ट कर देता है, ठीक उसी तरह, जैसे त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया था ॥५१४॥ पुत्रका विवाह करनेके बाद छ: मासोंके भीतर पुत्रीका विवाह नहीं करना चाहिये। एक पुत्र या पुत्रीका विवाह करनेके बाद दूसरे पुत्रका उपनयन भी नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार एक मङ्गल कार्य करनेके बाद छ: मासोंके भीतर दूसरा मङ्गल कार्य नहीं करना चाहिये। एक गर्भसे उत्पन्न दो कन्याओंका विवाह यदि छ: मासके भीतर हो तो निश्चय ही तीन वर्षके भीतर उनमें से एक विधवा होती है।।५१५-५१६ ॥ अपने पुत्रके साथ जिसकी पुत्रीका विवाह हो, फिर उसके पुत्रके साथ अपनी पुत्रीका विवाह करना 'प्रत्युद्धाह' कहलाता है। ऐसा कभी नहीं करना चाहिये तथा किसी एक ही वरको अपनी दो कन्याएँ नहीं 'देनी चाहिये। दो सहोदर वरोंको दो सहोदरा कन्याएँ नहीं देनी चाहिये। दो सहोदरोंका एक ही दिन (एक साथ) विवाहे या मुण्डन नहीं करना चाहिये।॥५१७३॥

(गण्यन्त दोष-) पूर्वकथित गण्डन्तमें यदि दिनमें बालकका जन्म हो तो वह पिताका, रात्रिमें जन्म हो तो माताका और संध्या (सार्य या प्रातः) कालमें जन्म हो तो वह अपने शरीरके लिये घातक होता है। गण्डका यह परिणाम अन्यथा नहीं होता है। मूलमें उत्पन्न होनेवाली संतान पुत्र हो या कन्या, श्वशुरके लिये घातक होती है, किंतु मूलके चतुर्थ चरणमें जन्म लेनेवाला बालक श्वशुरका नाश नहीं करता है तथा आश्लेषाके प्रथम चरण में जन्म लेनेवाला बालक भी पिताका या श्वशुरका विनाश करनेवाला नहीं होता है। ज्येष्ठाके अन्तिम चरणमें उत्पन्न बालक ही श्वशुरके लिये घातक होता है, कन्या नहीं। किसी प्रकार पूर्वाषाढ़ या मूलमें उत्पन्न कन्या भी माता या पिताका नाश करनेवाली नहीं होती है। वेष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने पति के बड़े भाईक लिये और विशाखामें जन्म लेनेवाली कन्या अपने देवरके लिये घातक होती है ॥ ५१८-५२१ ॥

(वधू-प्रवेश-) विवाहके दिनसे ६, ८, १० और वें दिनमें वधू-प्रवेश (पतिगृह में प्रथम प्रवेश) हो तो वह सम्पत्तिको वृद्धि करनेवाला होता है। द्वितीय वर्ष, जन्म राशि, जन्म और जन्म-दिनको छोड़कर अन्य समयमें सम्मुख शुक्र रहनेपर भी वैवाहिक यात्रा (वधू-प्रवेश) शुभ होती है।।५२२-५२३॥

(देव-प्रतिष्ठा-) उत्तरायणमें, बृहस्पति और शुक्र उदित हों तो चैत्रको छोड़कर माघ आदि पाँच मासोंके शुक्लपक्षमें और कृष्णपक्षमें भी आरम्भसे आठ दिनतक सब देवताओंकी स्थापना शुभदायक होती है। जिस देवताकी जो तिथि है, उसमें उस देवताकी और २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १२. १३ तथा पूर्णिमा-इन तिथियों में सब देवताओंकी स्थापना शुभ होती है। तीनों उत्तरा, पुनर्वसु, मृगशिर रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, पुष्य, अश्विनी, रोहिणी, शतभिषा, अषण, अनुपमा और पनि-ननक्षत्रों में तथा मङ्गलबारको छोड़कर अन्य चारोंमें देव- प्रतिष्ठा परनी चाहिये। स्थापना करनेवाले (क्जमान)- के लिये सूर्य, तारा और चन्द्रमा बलवान् हों, उस दिनके पूर्वाझमें, शुभ समय, शुभ लग्र और शुभ नवमांशमें तथा यजमानकी जन्मशिसे अष्टम राशिको छोड़कर अन्य लोंमें देवताओंकी प्रतिष्ठा शुभदायक होती है॥५२४-५२९ ॥

मेष आदि सब राशियाँ शुभ ग्रहसे युक्त या दृष्ट हों तो देवस्थापनके लिये श्रेष्ठ समझी जाती हैं। प्रत्येक कार्यमें पञ्चाङ्ग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण) शुभ होने चाहिये और लग्नसे आष्टम स्थान भी शुभ (ग्रहवर्जित) होना आवश्यक है॥५३०॥ (१) लग्रमें चन्द्रमा, सूर्य, मङ्गल, राहु, केतु और शनि कर्ताक लिये घातक होते हैं। अन्य (बुध, गुरु और शुक्र), लग्रमें धन, धान्य और सब सुखोंको देनेवाले होते हैं। (२) द्वितीय भावमें पापग्रह अनिष्ट फल देनेवाले और शुभग्रह धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं। (३) तृतीय भाव, शुभ और पाप सब ग्रह पुत्र-पौत्रादि सुखको बड़ानेवाले होते हैं। (6) चतुर्य भावनें शुभग्राह शुभफल और पापग्रह पाप-फलको देते हैं। (५) पञ्चम भावमें पापग्रह कष्टदायक और शुभग्रह पुत्रादि सुख देनेवाले होते हैं। (६) षष्ठ भावमें शुभग्रह शत्रुको बढ़ानेवाले और पापग्रह शत्रुके लिये घातक होते हैं। (७) सप्तम भावमें पापग्रह रोगकारक और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। (८) अष्टम भाव, शुभग्रह और पापग्रह सभी कर्ता (यजमान) के लिये घातक होते हैं। (९) नवम भाव, पापग्रह हों तो वे धर्मको नष्ट करनेवाले हैं और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। (१०) दशम भावमें पापग्रह दुःखदायक और शुभग्रह सुयशकी वृद्धि करनेवाले होते. हैं। (११) एकादश स्थानमें पाप और शुभ सब प्रह सब प्रकारसे लाभकारक होते हैं। (१२)

लग्रसे द्वादश स्थानमें पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय (खर्च)-को बढ़ानेवाले होते है।५३१-५३७ ।।

(प्रतिष्ठामें अन्य विशेष बास-) प्रतिष्ठा करानेकाले पुरोहित (या आचार्य)-को अर्थज्ञान न हो तो यजमानका अनिष्ट होता है। मन्त्रोंका अशुभ उच्चारण हो तो ऋत्विजों (यज्ञ करानेवालों)- का और कर्म विधिहीन हो तो कर्ताकी स्वीका अनिष्ट होता है। इसलिये नारद! देव-प्रतिष्ठाके समान दूसरा शत्रु भी नहीं है। यदि लग्र में अधिक गुण हों और घोड़े-से दोष हों तो उसमें देवताओंकी प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिये। इससे कर्ता (यजमान)- का अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती है। मुने! अब मैं संक्षेपसे ग्राम, मन्दिर तथा गृह आदि के निर्मामकी बात बताता हूँ। ॥५३७-५३९ ॥

(गृहनिर्माणके विषयमें ज्ञातव्य बातें-) गृह आदि बनाना हो तो पहले गन्ध, वर्ण, रस तथा आकृतिके द्वारा क्षेत्र (भूमि)-की परीक्षा कर लेनी चाहिये। यदि उस स्थानकी मिट्टीमें मधु (शहद)-के समान गन्ध हो तो ब्राह्मणोंके, पुष्पसदृश गन्ध हो तो क्षत्रियोंके, आम्ल (खटाई)-के समान गन्ध हो तो वैश्योंके और मांसकी-सी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्रोंके बसनेयोग्य जानना चाहिये। वहाँकी मिट्टीका रंग श्वेत हो तो ब्राह्मणोंके, लाल हो तो क्षत्रियोंके, पौत (पीला) हो तो वैश्योंके और कृष्ण (काला) हो तो वह शूद्रोंके निवासके योग्य है। यदि वहाँके मिट्टीका स्वाद मधुर हो तो ब्राह्मणोंके, कडुवा (मिर्च के समान) हो तो क्षत्रियोंके, तिक्त हो तो वैश्योंके और कषाय (कसैला) स्वाद हो तो उस स्थानको शूद्रोंके निवास करनेयोग्य समझना चाहिये ।।५४०-५४१॥ ईशान, पूर्व और उत्तर दिशामें प्लव (नीची) भूमि सबके लिये अत्यन्त वृद्धि देनेवाली होती है। अन्य दिशाओंमें प्लव (नीची) भूमि सबके लिये हानि करनेवाली होती है ॥५४२॥

(गृहभूमि-परीक्षा-)जिस स्थानमें घर बनाना हो यहाँ अन (कोहिनीसे कनिष्ठा अंगुलितक) के बराबर लम्बाई, चौड़ाई और गहई करके कुण्ड बनाये। फिर उसे उसी खोदी हुई मिट्टीसे भरे। यदि भरनेसे मिट्टी शेष बच जाय तो उस स्थानमें वास करनेसे सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। यदि मिट्टी कम हो जाय तो कहाँ रहनेसे सम्पत्तिको हानि होती है। यदि सारी मिट्टीसे वह कुण्ड भर जाय तो मध्यम फल समझना चाहिये ॥५४३॥ अथवा उसी प्रकार अरनिके मापका कुण्ड बनाकर सार्यकाल उसको जलसे पूरित कर दे और प्रात:काल देखे; यदि कुण्डमें जल अवशिष्ट हो तो उस स्थानमें वृद्धि होगी। यदि कीचड़ (गीली मिट्टी) ही बची हो तो मध्यम फल है और यदि कुण्डकी भूमिमें दरार पड़ गयी हो तो उस स्थानमें वास करनेसे हानि होगी ॥ ५४४ ॥

मुने! इस प्रकार निवास करनेयोग्य स्थानकी भलीभांति परीक्षा करके उक्त लक्षणयुक्त भूमिमें | दिक्साधन (दिशाओंका ज्ञान) करनेके लिये समतल भूमिमें वृत्त (गोल रेखा) बनावे। वृत्तके मध्य || भागमें द्वादशांगुल शंकु (बारह विभाग या पर्वसे युक्त एक सीधी लकड़ी)-की स्थापना करे और दिक्साधनविधिसे दिशाओंका ज्ञान करे। फिर कर्ताक नामके अनुसार षड्वर्ग शुद्ध क्षेत्रफल (वास्तुभूमिकी लम्बाई-चौड़ाईका गुणनफल) ठीक करके अभीष्ट लम्बाई-चौडाईके बराबर (दिशासाधित रेखानुसार) चतुर्भुज बनावे। उस चतुर्भुज रेखामार्गपर सुन्दर प्राकार (चहारदीवारी) बनावे। लम्बाई और चौड़ाईमें पूर्व आदि चारों दिशाओंमें आठ-आठ द्वारके भाग होते हैं। प्रदक्षिणक्रमसे उनके निम्नाङ्कित फल हैं। (जैसे पूर्वभागमें उत्तरसे दक्षिणतक)१- हानि, २-निर्धनता, ३- धनलाभ, ४- राजसम्मान, ५- बहुत धन, ६- अति चोरी, ७-अति क्रोध तथा ८-भय-ये क्रमशः आठ द्वारोंके फल हैं। दक्षिण दिशामें क्रमश:१- मरण, २- बन्धन,३ भय, ४-धनलाभ, ५-धनवृद्धि, ६-निर्भयता, ७- व्याधिभय निर्बलता-ये (पूर्वसे पश्चिमतकके) आठ द्वारोंक फल है। पक्षिम दिशामें क्रमशः १-पुत्रहानि, २-शत्रुकि-लापीप्रालि, ४-बनलाभ, ५-सौभाग्य, ६-अवि दौर्भाग्य, ७-दुःख तथा ८-शोक-ये दक्षिणसे उत्तरतकके आठ द्वारोंके फल है। इसी प्रकार उत्तर दिशामें (पश्चिमसे पूर्वतक) १-स्त्री-हानि, २-निर्बलता, ३- हानि, ४-धान्यलाभ, ५-धनागम,६-सम्पत्ति- वृद्धि, ७-भय तथा ८-रोग-ये क्रमश: आठ द्वारों के फल है ॥ ५४५-५५२॥

इसी तरह पूर्व आदि दिशाओंके गृहादिमें भी द्वार और उसके फल समझने चाहिये। द्वारका जितना विस्तार (चौड़ाई) हो, उससे दुगुनी ऊँची किवाड़ें बनाकर उन्हें घरमें (चहारदीवारीके) दक्षिण या पश्चिम भागमें लगावे ॥५५३॥ चहारदीवारीके भीतर जितनी भूमि हो, उसके इक्यासी पद (समान खण्ड) बनावे। उनके बीचके नौ खण्डोंमें ब्रह्माका स्थान समझे। यह गृहनिर्माणमें अत्यन्त निन्दित है। चहारदीवारीसे मिले हुए जो चारों ओरके ३२ भाग हैं, वे पिशाचांश कहलाते हैं। उनमें घर बनाना दुःख, शोक और भय देनेवाला होता है। शेष अंशों (पदों) में घर बनाये जायें तो पुत्र, पौत्र और धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं ॥ ५५४-५५५॥

वास्तुभूमिको दिशा विदिशाओंकी रेखा वास्तुको शिरा कहलाती है। एवं ब्रह्मभाग, पिशाचभाग तथा शिराका जहाँ-जहाँ योग हो, वहाँ-वहाँ वास्तुकी मर्मसन्धि समझनी चाहिये। वह मर्मसन्धि गृहारम्भ तथा गृह प्रवेशमें अनिष्टकारक समझो जाती है।। ५५६-५५७॥

(गृहारम्भमें प्रशस्त मास-) मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रावण और कार्तिक- ये मास गृहारम्भमें पुत्र, आरोग्य और धन देनेवाले होते हैं ॥५५८॥

(दिशाओंमें वर्ग और वर्गेश-) पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमशः अकारादि आठ वर्ग होते हैं। इन दिशावर्गोंकि क्रमशः गरुड, मार्जार, सिंह, श्वान, सर्प, मूषक, गज और शशक (खरगोश)- ये योनियाँ होती हैं। इन योनि-वर्गों में अपने पाँचवें वर्गवाले परस्पर शत्रु होते हैं ॥५५१-५६०॥

(जिस प्राममें या जिस दिशामें घर बनाना हो, वह साध्य तथा घर बनानेवाला साधक, कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है। इसको ध्यान में रखना चाहिये।) साध्य (ग्राम)-की वर्ग-संख्याको लिखकर, उसके पीछे (बायें भागमें) साधककी वर्ग-संख्या लिखें। उसमें आठका भाग देकर जो शेष बचे, वह साधकका धन होता है। इसके विपरीत विधिसे (अर्थात् साधककी वर्ग संख्याके बायें भागम साध्यकी वर्ग-संख्या रखकर जो संख्या बने, उसमें आठसे भाग देकर शेष) साधकका ऋण होता है। इस प्रकार ऋणकी संख्या अल्प और धन-संख्या अधिक हो तो शुभ माने (अर्थात् उस ग्राम या उस दिशामें बनाया हुआ पर रहने योग्य है, ऐसा समझे) ॥५६१(क-ख)॥

इसी प्रकार साधकके नक्षत्र साध्यके नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो उसको चारसे गुणा करके गुणनफलमें सातसे भाग दे तो शेष साधकका धन होता है ॥ ५६२॥

(वास्तुभूमि तथा घरके थन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार और अंशके ज्ञानका साधन-) वास्तुभूमि या घरकी चौड़ाईको लम्बाईसे गुणा करनेपर गुणनफल 'पद' कहलाता है। उस (पद)- को (६ स्थानोंमें रखकर) क्रमशः ८. ३, ९,८,

१.दिशा और वर्ग जाननेकाका, यथा-

उदाहरण-अवर्ग ( अ इ उ ल ए ऐ ओ औ)-की पूर्व दिशा और गरुडयोनि है। वहाँसे क्रमशः दिशा गिननेपर पाँची दिशा (पश्चिम)-में तवर्ग और सर्प इस अवर्ग एवं गरुष्का शत्रु है। इस प्रकार परस्पर सम्मुख दिशामें शत्रुता होती है। इसी तरह कवर्ग (क ख ग घ ङ)-की दिशा अग्निकोण और योनि मार्जार (बिलाव) है। चवर्ग (च छ जनज)-की दक्षिण दिशा और सिंह योनि है। टवर्ग (ट ठ ड ढ ण)-की नैऋत्य दिशा और चान योनि है। तवर्ग (त थदधन) को पश्चिम दिशा और सर्प योनि है। पवर्ग (प फ ब भ म) की वायुकोण दिशा और मृक्क (चूहा) योनि है। यवर्ग (य र ल व)-को उत्तर दिशा और गज (हाथी) योनि है। शवर्ग (श ष स ह)-को ईशान दिशा और शशक (खरगोश) योनि है। इसका प्रयोजन यह है कि अपने-अपने नामके आदि अक्षरसे अपना वर्ग समझकर दिशा और योनिका ज्ञान करे। शत्रु-दिशा में अपने रहनेके लिये पर न बनावे। अर्थात् उस दिशाके घरमें स्वयं वास न करे तथा शत्रुवर्गवाले गांवमें जाकर वास न करे इत्यादि । इसके सिवा, विशेष प्रयोजन मूलमें कहे गये हैं।

२. उदाहरण-विचार करना है कि 'जयनारायण' नामक व्यक्तिको गोरखपुर बसने या व्यापार करने में किस प्रकारका लाभ होगा? तो साध्य (गोरखपुर)-की वर्ग-संख्या २ के बायें भागमै साधक (जयनारायण)-को वर्ग- संख्या ३ रखनेसे ३२ हुआ। इसमें ८ से भाग देनेपर शून्य अर्थात् ८ बचा, यह साधक (जयनारायण)-का. धन हुआ तथा इससे विपरीत वर्ग-संख्या २३को रखकर इसमें ८ का भाग देनेसे शेष ७ बचा। यह साधक (जयनारायण)-का ऋण हुआ। यहाँ ऋण ७ से धन अधिक है; अत: जयनारायणके लिये गोरखपुर निवास करनेयोग्य है-यह सिद्ध हुआ। तात्पर्य यह कि जयनारायणको गोरखपुरमें ८ लाभ और ७ खर्च होता रहेगा।

९, ६ से गुणा करे और गुणनफलमें क्रमशः १२, ८,८२५,७,९से भाग दे। फिर जो शेष बचें, वे क्रमशः धन, ऋण, आय, नक्षत्र, बार तथा अंश होते है। धन अधिक हो तो वह पर शुभ होता है। यदि ऋण अधिक हो तो अशुभ होता है तथा विषम (१, ३, ५, ७) आष शुभ और सम (२, ४, ५,८) आप अशुभ होता है। घरका जो नक्षत्र हो, वहाँसे अपने नामके नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो, उसमें ९ से भाग दे। फिर यदि शेष (तारा) ३ बचे तो धनका नाश होता है। ५ बचे तो यशकी हानि होती है और ७ बचे तो गृहकर्ताका ही मरण होता है। घरकी राशि और अपनी राशि गिननेपर परस्पर २, १२ हो तो धनहानि होती है। ९, ५ हो तो पुत्रकी हानि होती है और ६, ८ हो तो अनिष्ट होता है; अन्य संख्या हो तो शुभ समझना चाहिये। सूर्य और मङ्गलके वार तथा अंश हो तो उस घरमें अग्निभय होता है। अन्य वार-अंश हो तो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी सिद्धि होती है ॥५६३-५६७।।

(वास्तुपुरुषकी स्थिति-) भादों आदि तीन-तीन मासों में क्रमश: पूर्व आदि दिशाओंको ओर मस्तक करके बायीं करवटसे सोये हुए महासर्पस्वरूप 'चर' नामक वास्तुपुरुष प्रदक्षिणक्रमसे विचरण करते रहते हैं। जिस समय जिस दिशामें वास्तुपुरुषका मस्तक हो, उस समय उसी दिशामें घरका दरवाजा बनाना चाहिये। मुखसे विपरीत दिशा धाका दरवाजा बनानेसे रोग, शोक और भय होते हैं। किंतु यदि घरमें चारों दिशाओंमें द्वार हो तो यह दोष नहीं होता है ।।५६८-५७०।।

गृहारम्भकालमें नींवके भीतर हाथभरके गङ्गे में स्थापित करनेके लिये, सोना, पवित्र स्थानकी रेणु (धूलि), धान्य और सेवारसहित ईट घरके भीतर संग्रह करके रखे। घरकी जितनी लंबाई हो, ठसके मध्यभागमें वास्तुपुरुषकी नाभि रहती है। उसके तीन अङ्गुल नीचे (वास्तुपुरुषके पुच्छभागकी ओर) कुक्षि रहती है। उसमें शंकुका न्यास करनेसे पुत्र आदिकी वृद्धि होती है ॥ ५७१-५७२॥

(शांकुप्रमाण-) खदिर (खैर), अर्जुन, शाल (शा), युगपत्र (कचनार) रक्तचन्दन, पलाश, रक्तशाल, विशाल आदि वृक्षोंसे किसीकी लकड़ोसे शंकु बनता है। ब्राह्मणादि वर्गकि लिये क्रमशः २४, २३, २० और १६ अंगुलके शंकु होने चाहिये। उस शंकुके बराचर-बराबर तीन भाग करके ऊपरवाले भाग चतुष्कोण, मध्यवाले भागमें अष्टकोण और नीचेवाले (तृतीय) भागमें बिना कोणका (गोलाकार) उसका स्वरूप होना उचित है। इस प्रकार उत्तम लक्षणों से युक्त कोमल और छेदरहित शंकु शुभ दिनमें बनावे। उसको घड्वर्गद्वारा शुद्ध सूत्रसे सूत्रित' भूमि (गृहक्षेत्र) में मृदु, ध्रुव क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में, हास्या और रिक्काको छोड़कर अन्य

१.अदाहरण-भाल लीजिणे, परकी लगाई ५५ ताश और चीक्षा ५ तातोपनको परम्पर गुणा करमेलन मक्ष यहा। इसको ८ मै गुणा करनेपर गुणनफल २००० मा। इसमें १२ का भाग देनेपर शेष अर्थात् १५ पन हुआ। फिर पदको । से गुषा किया तो १९५५ तुभा। इसमें से भाग देकर रोष ५ भाण हुआ। पुनः पद ५७० को ९ गुणा किया तो २१ हुआ। इसमें ८ से भाग देने पर रोष ७ आप भा। इसी तरह पदको ८ से गुणा करनेपर ३००० हुआ। इसय २७ से भाग दिया तो दोष । नक्षत्र भा। फिर पदको १ से गुणा किया तो ३५७५ हुआ। नाम ७ से भाग देखेपर शेषनार हुआ। पुन: पद १७५ को से गुणा किया तो २२५० हुआ। इसमें से भाग देनेपर शेष अर्थात्

९ अंश हुभा। यहाँ सम वस्तुएँ शुभ है, केवल पार । रवि हुआ। इसलिये इस प्रकार के परमें सब कुछ रहते हुए भी अग्निका भय रहेगा ऐसा समझना चाहिये। इसलिये ऐसा पद देखकर लेना चाहिये, जिसमें सर्वथा शुभ हो।

२.पूर्वोक्त आय और पश्यादिसे शोधित गृहके चारों ओरकी लंबाई-चौड़ाई के प्रमाण-तुल्य सूत्रसे घिरी हुई भूमिको ही यहाँ सूत्रित कहा है।

तिथियों में, रविवार, मङ्गलबार तथा पर लप्रको छोड़कर अन्य चारों और अन्य (स्थिर या द्विस्वभाव) लग्रों में, जब पापग्रह लग्नमें न हो, अहम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो; शुभ राशि लान हो और उसमें शुभ नवमांश हो, उस लपमें शुभप्रहका संयोग या दृष्टि हो; ऐसे समय (सुलम)-मैं ब्राह्मणोद्वारा पुण्याहवाचन कराते हुए माङ्गलिक वाद्य और सौभाग्यवती स्त्रियोंके मङ्गलगीत आदिके साथ मुहूर्त बतानेवाले दैवज्ञ (ज्योतिषके विद्वान् ब्राह्मण) के पूजन (सत्कार)-पूर्वक कुक्षिस्थानमें शंकुकी स्थापना करे। लग्नसे केन्द्र और त्रिकोणमें शुभ ग्रह तथा ३, ६, ११ में पापग्रह और चन्द्रमा हो तो यह शंकुस्थापन श्रेष्ठ है ॥ ५७३-५७९।।

घरके छ: भेद होते हैं-१-एकशाला, २-दिशाला, ३-त्रिशाला, ४-चतुश्शाला, ५-समशाला स्था ६- दशज्ञाला। इन छहों शालाओं में से प्रत्येकके १६ भेद होते हैं। उन सब भेदों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं-१ ध्रुव, २-धान्य, ३-जय, ४-नन्द, ५-स्वर, ६ कान्त, ४-मनोरम, ८ सुमुख, १ दुर्मुख, १० कर, ११ शत्रुद, १२ स्वर्णद, १३ क्षय, १४ आकन्द १५ विपुल और १६ वॉ विजय नामक गृह होता है। चार अक्षरोंके प्रस्तारके भेदसे क्रमश: इन ग्रहोकी गणना करनी चाहिये।।५८०-५८२६॥

(प्रस्तारभेद-) प्रथम ४ गुरु (S) चिह्न लिखकर उनमें प्रथम गुरुके नीचे लघु (|) चिह्न लिखे। फिर आगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकारके गुरु मा लमु चिह्न लिखना चाहिये। फिर उसके नीचे (तीसरी पङ्क्तिमें) प्रथम गुरु बिहके नीचे लमु चिह लिखकर आगे (दाहिने भागमें) जैसे रूपर गुरु या लघु हो वैसा ही चिह्न लिखे तथा पौडे (बायें भागसे) गुरु चिहसे पूरा करे। जैसे प्रकार पुनः-पुनः तबतक लिखता जाय जबतक कि पंक्ति (प्रस्तार)-में सब चिह्न लघु न हो जाय। इस प्रकार चार दिशा होनेके कारण : अक्षरोसे १६ भेद होते हैं। प्रत्येक भेदमें चारों चिहोको प्रदक्षिणक्रमसे पूर्व आदि दिशा समझकर जहाँ-जहाँ लघु चिह पड़े, वहाँ-वहाँ घरका दार और अलिन्द (करके आगेका भाग-चबूतरा) बनाना चाहिये। इस प्रा - पूर्वादि दिशाओंमें अलिन्दके भेदोंसे १६ प्रकारके घर होते है ॥५८३-५८।

वास्तुभूमिकी पूर्णदिशामें स्नानगृह, अप्रियोणमें पाकगृह (रसोईघर), दक्षिणमें रायनगृह, ल्यकोणमें सास्वागार, पशिपमें भोजनगृह, वायुकोणमें धन-धान्यादि रखनेका घर, उत्तरमें देवताओंका गृह और ईशानकोणमें जलका गृह (स्थान) बनाना चाहिये तथा आग्नेषकोणसे आरम्प करके उक्त दो-दो घरोंके बीच क्रमश: मन्थन (दूध-दहीसे घृत निकालने)-का, घृत रखनेका, पैखानेका, विद्याभ्यासका, स्त्रीसहवासका, औषधका और शृङ्गारकी सामग्री रखनेका घर बनाना शुभ कहा गया है। अत: इन सब घरोंमें उन-उन सब वस्तुओंको रखना चाहिये ॥ ५८५-५८८३॥

(आयोंके नाम और दिशा-)पूर्वादि आठ दिशाओंमें क्रमसे ध्वज, धूम, सिंह, श्वान, वृक्ष, खर (गदहा), गज और स्वाक्ष (काक)-ये आठ आय होते हैं ॥५८९॥

(घरके समीप निन्द्य वृक्ष-) पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा तथा काँटेवाले और दुग्धवाले सब वृक्ष, पीपल, कपित्थ (कैथ), अगस्त्य वृक्ष, सिन्धुवार (निर्गुण्डी) और इमली-ये सब वृक्ष घरके समीप निन्दित कहे गये हैं। विशेषतः घरके दक्षिण और पश्चिम-भागमें ये सब वृक्ष हों तो धन आदिका नाश करनेवाले होते हैं ॥५९०-५९९३।।

(गृह-प्रमाण-) परके स्तम्भ (खम्भे) घरके पैर होते हैं। इसलिये वे समसंख्या (४,६,८प आदि)-में होनेपर ही उत्तम कहे गये हैं। विषम संख्यामें नहीं। घरको न तो अधिक ऊँचा ही करना चाहिये, न अधिक नीचा हो। इसलिये अपनी इच्छा (निर्वाह)-के अनुसार भित्ति (दीवार) की ऊँचाई करनी चाहिये। घरके ऊपर जो घर (दूसरा मंजिल) बनाया जाता है, उसमें भी इस प्रकारका विचार करना चाहिये। घरोंकी ऊँचाईके प्रमाण आठ प्रकारके कहे गये हैं, जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं-१-पाश्चाल, २-वैदेह, ३-कौरव, ४-कुजन्यक', ५-मागध, ६-शूरसेन, ७ गान्धार और ८ आवन्तिक

। जहाँ घरकी ऊँचाई उसकी चौड़ाईसे सवागुनी अधिक होती है, वह भूतलसे ऊपरतकका पाश्चालमान कहलाता है, फिर उसी ऊँचाईको उत्तरोत्तर सवागुनी बढ़ानेसे वैदेह आदि सब मान होते हैं। इनमें पाञ्चालमान तो सर्वसाधारण जनोंके लिये शुभ है। ब्राह्मणों के लिये आवन्तिकमान, क्षत्रियोंके लिये गान्धारमान तथा वैश्योंके लिये कौजन्यमान है। इस प्रकार ब्राह्मणादि वर्गों के लिये यथोत्तर गृहमान समझना चाहिये तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिलके मकान में भी पानीका बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिये ॥५९२-५९८॥

(घरमें प्रशस्त आय-) ध्वज अथवा गज आयमें ऊँट और हाधीके रहने के लिये घर बनवाये तथा अन्य सब पशुओंके घर भी उसी (ध्वज और गज) आयमें बनाने चाहिये। द्वार, शय्या, आसन, छाता स्वजा-इन सबोंके निर्माणके लिये सिंह, वृष अथवा ध्वज आय होने चाहिये॥५९९३ ॥

अब मैं नूतनगृहमें प्रवेशके लिये वास्तुपूजाकी विधि बताता हूँ-घरके मध्यभागमें तन्दुल (चावल)- पर पूर्वसे पश्चिमकी ओर एक-एक हाथ लम्बी दस रेखाएँ खींचे। फिर उत्तरसे दक्षिणकी ओर भी उतनी ही लम्बी-चौड़ी दस रेखाएँ बनाये। इस प्रकार उसमें बराबर-बराबर ८१ पद (कोष्ठ) होते हैं। उनमें आगे बताये जानेवाले ४५ देवताओंका गधोक्त स्थानमें नामोल्लेख करे। बत्तीस देवता बाहर (प्रान्तके कोष्ठोंमें) और तेरह देवता भीतर

१. मूलमें 'कुजन्यकम्' पाठ है; परंतु कुजन्य कोई प्रसिद्ध देश नहीं है। इसलिये प्रतीत होता है कि यहाँ 'कान्यकुम्बकम्' के स्थानमें 'कुब्जकन्यकम्' था। फिर लेखकादिके दोषसे कुजन्यकम्' हो गया है।

२. पूर्व या उत्तर प्लवभूमिमें घर बनाना प्रशस्त कहा गया है। यदि नीचेके रास्ते में पूर्व दिशामें जलनाव हो तो ऊपरके मंजिल में भी पूर्व दिशामें ही जलम्नाव होना चाहिये।

पूजनीय होते है। उन ४५ देवताओंके स्थान और नामका क्रमश: वर्णन करता हूँ। किनारेके बचीस कोहोंमें ईशान कोणसे आरम्भ करके क्रमश: बत्तीस देवता पूज्य है। उनके नाम इस प्रकार है-कृपीट योनि (अग्नि) १, पर्जन्य २, जयन्त, ३, इन्द्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, आकाश ८, वायु ९, पूषा १०, अनृत (वितष) ११, गृहक्षात १२, यम १३, गन्धर्व १४, भृङ्गराज १५, मृग १६, पितर १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्प-दन्त २०, वरुण २१, असुर २२, शेष २३, राजयक्ष्मा २४, रोग २५, अहि २६, मुख्य २७, भल्लाटक २८, सोम २९, सर्प ३०, अदिति ३१ और दिति ३२,- ये चारों किनारोंके देवता हैं। ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायुकोणके देवोंके समीप क्रमश: आप ३३, सावित्र ३४, जब ३५, तथा रुद्र ३६ के पद हैं। ब्रह्माके चारों ओर पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमशः अर्थमा ३७, सविता ३८, विवस्वान् ३९, विबुधाधिप ४०, मित्र ४१, राजयक्ष्मा ४२, पृथ्वीधर आफ्वत्स है और मध्यके नव पदान (४५) मसाजीको स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार सब पदोंमें ये पैतालीस देवता पूजनीय होते हैं। जैसे ईशान-कोणमें आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्रि और दिदि-ये पाँच देव एकपद होते, उसी प्रकार अन्य कोणोंके पाँच-पाँच देवता भी एक-पदके भागी है। अन्य जो बाह्य-पक्तिके (जयन्त, इन्द्र आदि) बीस देवता है, वे सब विपद दो-दो पदोंके भागी) हैं तथा ब्राह्मसे पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशामें जो अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर-ये चार देवता हैं, वे त्रिपद (तीन-तीन पदोंके भागी) हैं, अत: वास्तु-विधिके ज्ञाता विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ब्रह्माजीसहित इन एकपद द्विपद तथा त्रिपद देवताओंका वास्तुमन्त्रों- द्वारा दूर्वा, दही, अक्षत, फूल, चन्दन, धूप, दीप और नैवेद्यादिसे विधिवत् पूजन करे। अथवा ब्राह्ममन्त्रसे आवाहनादि षोडश (या पञ्च) उपचारों द्वारा उन्हें दो श्वेत वस्त्र समर्पित करे ।।६००-६१३।।

अन्य संहितामें 12 वाँ बृहत्क्षतः 24 वाँ पापयक्ष्मा कहा गया है।

एकाशीतिपद वास्तुचक्र-

नैवेद्य चीन प्रकारके (पश्य, भोज्य, लेझ) अन्न माङ्गलिक गीत और वायके साथ अर्पण करे। अन्चमें ताम्बूल (पान-सोपारी) अर्पण करके वास्तुपुरुषकी इस प्रकार प्रार्थना करे॥१४॥

वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो।

मदगृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा॥

'भूमिशय्यापर शयन करनेवाले वास्तुपुरुष! आपको मेरा नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे घरको धन-धान्य आदिसे सम्पन्न कीजिये।'

इस प्रकार प्रार्थना करके देवताके समक्ष पूजा करानेवाले (पुरोहित)-को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें भी दक्षिणा दे। जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ या गृहप्रवेशके समय इस विधिसे वास्तुपूजा करता है, वह आरोग्य, पुत्र, धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है। जो मनुष्य वास्तुपूजा न करके नये घरमें प्रवेश करता है, वह नाना प्रकारके रोग, क्लेश और संकट प्राप्त करता है । ६१५-६१८ ॥

जिसमें किंवाड़ें न लगी हों, जिसे ऊपरसे छत आदिके द्वारा छाया न गया हो तथा जिसके लिये (पूर्वोक्त रूपसे वास्तुपूजन करके) देव ओंको बलि (नैवेद्य) और ब्राह्मण आदिको जन दिया गया हो, ऐसे नूतन गृहमें कभी प्रवेश न करे; क्योंकि वह विपत्तियोंकी खान (स्थान) होता है ।। ८१९॥

(यात्रा-प्रकरण-) अब मैं जिस प्रकारसे यात्रा करनेपर वह राजा तथा अन्य जनोंके लिये अभीष्ट फलकी सिद्धि करानेवाली होती है, उस विधिका वर्णन करता हूँ। जिनके जन्म-समयका ठीक-ठीक ज्ञान है, उन राजाओं तथा अन्य जनोंको उस विधिसे यात्रा करनेपर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जिन मनुष्योंका जन्मसमय अज्ञात है, उनको तो घुणाक्षर* न्यायसे ही कभी फलकी प्राप्ति हो जाती है, तथापि उनको भी प्रश्नलग्नसे तथा निमित्त और शकुन आदिद्वारा शुभाशुभ देखकर यात्रा करनेसे अभीष्ट फलका लाभ होता है ॥६२०-६२१॥

(यात्रामें निषिद्धि तिथियाँ-) षष्ठी, आष्टमी, द्वादशी, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और शुक्लपक्षकी प्रतिपदा-इन तिथियोंमें यात्रा करनेसे दरिद्रता तथा अनिष्टकी प्राप्ति होती है।। ६२२॥

(विहित नक्षत्र-) अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, रेवतो, अश्विनी, श्रवण, पुष्य और धनिष्ठा-इन नक्षत्रोंमें यदि अपने जन्म- नक्षत्रसे सातवीं, पाँचवीं और तीसरी तारा न हो तो यात्रा अभीष्ट फलको देनेवाली होती है ।। ६२३ ॥

(दिशाशूल-) शनि और सोमवारके दिन पूर्व दिशाकी ओर न जाय, गुरुवारको दक्षिण न जाय, शुक्र और रविवारको पश्चिम न जाय तथा बुध और मङ्गलको उत्तर दिशाकी यात्रा न करे ।। ६२४॥ ज्येष्ठा, पूर्वभाद्रपद, रोहिणी और उत्तराफाल्गुनी-ये नात्र क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा शूल होते हैं।

( सर्वदिवगमन नक्षत्र-) अनुराधा, हस्त, पुष्य और अश्विनी-ये चार नक्षत्र सब दिशाओंको यात्राम प्रशस्त है॥६२५॥

(दिग्द्वार-नक्षत्र-) कृत्तिकासे आरम्भ करके सात-सात नक्षत्रसमूह पूर्वादि दिशाओमें रहते हैं। तथा अपिकापासे वायुकोणतक परिचय रहता है। अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिये,

*जैसे घुण (कोटविशेष) काठको खोदता रहता है तो उससे कहीं अकारादि अक्षरका स्थाय अकस्मात् बन जाता है, उसी प्रकार जो अपने जन्मसमयसे अपरिचित हैं, वे लग्न आदिको न जानकर भी यात्रा करते-करते की संयोगवश शुभ फलके भागी हो जाते हैं।

जिससे परिषदण्डका लान न हो ॥६२६ ॥

पूर्वके नक्षत्रोंमें अग्रिकोणकी यात्रा करे। इसी प्रकार दक्षिणके नक्षत्रों में अग्रिकोण तथा पश्चिम और उत्तरके नक्षत्रों वायुकोणकी यात्रा कर सकते हैं।

(दिशाओंकी राशियाँ-) पूर्व आदि चार दिशाओंमें मेष आदि १२ राशियों पुन: पुन: (तीन आवृत्तिसे) आती हैं॥६२७ ॥

(लालाटिकयोग-) जिस दिशामें यात्रा करनी हो, उस दिशाका स्वामी ललाटगत (सामने) हो तो यात्रा करनेवाला लौटकर नहीं आता है। पूर्व दिशामें यात्रा करनेवालेको लग्रमें यदि सूर्य हो तो वह ललाटगत माना जाता है। यदि शुक्र लग्नसे ग्यारहवें या बारहवें स्थानमें हों तो अग्निकोणमें यात्रा करनेसे, मङ्गल दशम भावमें हो तो दक्षिणयात्रा करनेसे, राहु नवें और आठवें भावमें हो तो नैर्ऋत्य कोणकी यात्रासे, शनि ससम भावमें हो तो पश्चिम-यात्रासे, चन्द्रमा पांचवें और छठे भावमें हो तो वायुकोणकी यात्रासे, बुष चतुर्ष भाषमें हो तो उत्तरकी यात्रासे, गुरु वीसरे और दूसरे भावमें हो तो ईशानकोणकी यात्रा करनेसे ललाटगत होते हैं। जो मनुष्य जीवनकी इच्छा रखता हो, वह इस ललाटपोगको त्यागकर यात्रा करे ।। ६२८-६३२ ।।

लग्नमें वक्रगति ग्रह या उसके षड्वर्ग (राशि- होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाओंकी पराजय होती है ।। ६३३ ॥

जब जिस अयन' में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उस समय उस दिशाकी यात्रा शुभ फल देनेवाली होती है। यदि दोनों भिन्न अयनमें हों तो जिस अयनमें सूर्य हों उधर दिनमें तथा जिस अयनमें चन्द्रमा हों उधर रात्रि में यात्रा शुभ होती है। अन्यथा यात्रा करनेसे यात्रीकी पराजय होती है।।६३४॥

१. पूर्व नक्षत्र में पक्षिम या दक्षिण जानेसे परिपदण्डका लङ्न होगा। चक्र देखिये-

2. दिशाश्बोधक चक्र-

३.मकरसे ६ राशि उत्तरायण है। इनमें सूर्य-चन्द्रमा हों तो उत्तरकी यात्रा शुभ होती है, क्योंकि दोनों सम्मुख होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि यदि सूर्य और चन्द्रमा दाहिने भागमें पड़े तो भी यात्रा शुभ हो सकती है। इसलिये उस समय पश्चिम यात्रा भी शुभ ही समझनी चाहिये एवं कर्कसे छ: राशि दक्षिणायन समझें।

 (शुणदोष-)शुक्र अस्त हों तो यात्रा में हानि होती है। यदि यह सम्मुख हो तो यात्रा करनेसे पराजय होती है। सम्मुख शुक्रके दोषको कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है। किंतु वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज और गौतम-हन पाँच गोत्रवालाको सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। यदि एक ग्रामके भीतर ही यात्रा करनी हो या विवाहमें जाना हो या दुर्पिक्ष होनेपर अथवा राजाओंमें युद्ध होनेपर तथा राजा या ब्राह्म)का कोप होनेपर कहीं जाना पड़े तो इन अवस्थाओंमें सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। शुक्र यदि नीच राशिमें या शत्रुराशिमें अथवा वक्रगति या पराजित* हो तो यात्रा करनेवालोंकी पराजय होती है। यदि शुक्र अपनी उच्चराशि (मीन)-में हो तो यात्रामें विजय होती है ॥६३५-६३८)

अपने जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या लग्नमें तथा शत्रुको राशिसे छठौ राशिमें या लग्नमें अथवा इन सबोंके स्वामी जिस राशिमें हों, उस लग्न या राशिमें यात्रा करनेवालेकी मृत्यु होती है। परंतु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपतिमें परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टमराशिजन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है ॥६३९-६४०।। द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रहसे युक्त या दृष्ट हो तो यात्रामें पराजय होती है तथा स्थिर शि पापग्रहसे युक्त न हो तो वह यात्रालगमें अशुभ है। यदि स्थिर राशिलग्नमें शुभग्रहका योग या दृष्टि हो तो शुभ फल होता है ॥ ६४१ ॥

धनिष्ठा नक्षत्रके उत्तरार्धसे आरम्भ करके (रेवतीपर्यन्त) पाँच नक्षत्रों में गृहार्थं तृण-काष्ठोंका संग्रह, दक्षिणकी यात्रा, शय्या (तकिया, पलङ्ग आदि) का बनाना, घरको उवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये॥६४२॥

यदि यात्रालग्रमें जन्मलग्र, जन्मराशि या इन को दोनोंके स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशिम ३, ६, ११, १० वीं राशि हो तो शत्रुओका नाश होता है।।६४३॥

यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ) तथा दिग्द्वार (यात्राकी दिशा)-की राशि लग्नमें हो अथवा किसी भी लग्रमें शुभग्रहकै वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंका नाश होता है॥६४४॥

शत्रुके जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या उन दोनोंके स्वामी जिस राशिमें हों वह राशि यात्रालग्नमें हो तो शत्रुका नाश होता है । ।।६४५॥ मीन लग्नमें या लग्नगत मीनके नवमांशमें यात्रा करनेसे मार्ग (रास्ता) टेढ़ा हो जाता है। (अर्थात् बहुत घूमना पड़ता है।) तथा कुम्भलग्र और लग्रगत कुम्भका नवमांश भी यात्रामें अत्यन्त निन्दित है ।। ६४६॥ जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर राशिका नवमांश लग्नमें हो तो नौकाद्वारा नदी-नद आदि मार्गसे यात्रा शुभ होती है ॥६४६ ६॥

(लग्रभावोंकी संज्ञा-)१- मूर्ति (तन), २-कोष (धन), ३-धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४- वाहन (सवारी, माता), ५-मन्त्र (विद्या, संतान), ६-शत्रु (रोग, मामा),७-मार्ग (यात्रा, पति-पत्नी), ८-आयु (मृत्यु), ९-मन (अन्तःकरण, भाग्य), १०-व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११- प्राप्ति (लाभ), १२- अप्राप्ति (व्यय)-ये क्रमसे लग्न आदि १२ स्थानोंकी संज्ञाएँ हैं ॥ ६४७-६४८ ॥

पापग्रह (शनि, रवि, मङ्गल, राहु तथा केतु- ये) तीसरे और ग्यारहवेंको छोड़कर अन्य

* अब मङ्गलादि ग्रहोंमें किन्हीं दो ग्रहोंकी एक राझिमें अशकला बराबर हो तो दोनों में युद्ध समझा जाता है। उन दोनोंमें जो उतर रहता है, वह विजयी तथा दक्षिण रहनेवाला पराजित होता है।

भावों में जानेसे भावफलको नष्ट कर देते तीसरे और ग्यारहवें भावमें बानेसे वे इन दोनों भावोंको पुष्ट करते हैं। सूर्य और माल ये दोनों दशम भाषको भी नष्ट नहीं करते, अपितु दशम भावये जानेसे उस भावफल (व्यापार, पिता, राज्य तथा कर्म)- को पुष्ट ही करते हैं और शुभग्रह (चन्द्र, बुध, गुरु तथा शक्र) जिस भाव, जाते हैं, उस भावफलको पुष्ट ही करते हैं; केवल षष्ठ (६) भावमें जानेसे उस भावफल (शत्रु और रोग)-को नष्ट करते हैं। ६४९ ॥ शुभ ग्रहोंमें शुक्र सप्तम भावको और चन्द्रमा लग्न एवं अष्टम (१, ८) को पुष्ट नहीं करते हैं। (अपितु नष्ट ही करते हैं।)

(अभिजित् प्रशंसा-) अभिजित् मुहूर्त (दिनका मध्यकाल-१२ बजेसे १ घड़ी आगे और १ घड़ी पीछे) अभीष्ट फल सिद्ध करनेवाला योग है। यह दक्षिण दिशाकी यात्रा छोड़कर अन्य दिशाओंकी यात्रामें शुभ फल देता है। इस (अभिजित् मुहूर्त) में पञ्चाङ्ग (तिथि वारादि) शुभ न हो तो भी यात्रामें वह उत्तम फल देनेवाला होता है ।।६५-६५९ ॥

(यात्रा योग) लग्न और गृहोंकी स्थितिसे नाना प्रकारके यात्रा-योग होते हैं। अब उन योगेका वर्णन करता हूँ, क्योंकि राजाओं (क्षत्रियों)- का योगबलमे ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। ब्रह्मयों को नक्षत्रबलसे तथा अन्य मनुष्योंको मुहर्नेबलसे इसिद्धि होती है। तत्चरोको शकुनबलसे अपने अभीष्टकी प्रामि होती है।। ६५२६॥ शुक्र, बुध और बृहस्पति इन तीनमें से कोई भी यदि केन्द्र या निकोणमें हो तो 'योग' कहलाता है। यदि उनमसे दो पह केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो 'अधियोग' कहलाता है तथा यदि तीनों लासे केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (९, ५)-में हाता योगाधियोग कहलाता है ॥६५॥ योगमें यात्रा करनेवालोंका कल्याण होता है। अषियोगमें यात्रा करनेसे विजय प्राप्त होती है और योगाधियोगमें यात्रा करनेवालेको कल्याण, विजय तथा सम्पत्तिका भी लाभ होता है ॥६५४३॥ लग्नसे दसवें स्थानमें चन्द्रमा, पाल स्थानमें शनि और लपमें सूर्य हों तो इस समयमें यात्रा करनेवाले राजाको विजय तथा शत्रुको सम्पत्ति भी प्राप्त होती है ॥६५५३ ॥ शुक्र, रषि, बुध, शनि और मङ्गल-ये पाँचों ग्रह क्रमसे, लग्न चतुर्थ, सर तृतीय और षष्ठ भावमें हों तो यात्रा करनेवाले राजाके सम्मुख आये हुए शत्रुगण आगमें पड़ी हुई लाहकी भौति नष्ट हो जाते हैं॥६५६३॥ बृहस्पति लग्नमें और अन्य ग्रह यदि दूसरे और ग्यारहवें भावमें हों तो इस योगमें यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंकी सेना यमराजके घर पहुँच जाती है ॥६५७५॥ यदि लग्नमें शुक्र, ग्यारहवेंमें रवि और चतुर्थ भावमें चन्द्रमा हो तो इस योगमें यात्रा करनेवाला राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे हाथियोंके झुडको सिंह ॥६५८॥

अपने उच्च (मीन) में स्थित शुक्र लगमें हो अथवा अपने उच्च (वष) का चन्द्रमा लाभ (११) भावमें स्थित हो तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने शत्रुको सेनाको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे भगवान् श्रीकृष्णने पूतनाको नष्ट किया था ॥६५९३) यदि यात्राके समय शुभग्रह केन्द्र में या त्रिकोणमें हों तथा पापग्रह तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुको लक्ष्मी 'अभिसारिकाकी भांति उसके समीप आ जाती है॥६६०४॥ गुरु, रवि और चन्द्रमा-ये क्रमशः लन, ६ और ८ में हो तो यात्रा करनेवाले राजाके सामने दुर्जनोंकी मैत्रीके समान शत्रुओंकी सेना नहीं ठहरती है।।६६१३॥ यदि लासे ३, ६, ११ में पापग्रह हों और शुभ-ग्रह बलवान् होकर

जैसे पापग्रह लग्र(तनुभाव)में रहता है तो शरीर में कष्ट-पीड़ा देता है तथा धन-भावमें धनका नाश करता है। किंतु जब तीसरे में रहता है तो पराक्रमको और ग्यारहवें रहता है तो लाभको पुष्ट करता है।

अपने उच्चादि स्थानों (स्थित) हाँ तो शत्रुकी भूमि यात्रा करनेवाले राजाके हाथमें आ जाती है॥२३॥ अपने उच्च (कर्क)-में स्थित बृहस्पत्ति यदि लग्नमें हों और चन्द्रमा ११ पावमें स्थित हो तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने शत्रुको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया था॥६६३३ ॥ शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ) राशिमें स्थित शुक यदि लग्नमें हों और गुरु ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाला पुरुष तारकासुरको कार्तिकयकी भाँति अपने शत्रुको नष्ट कर देता है ॥ ६६४३ ॥ गुरु लग्रमें और शुक्र किसी केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो यात्री नरेश अपने शत्रुओंको वैसे ही भस्म कर देता है, जैसे वनको दावानल ॥६६५३ ॥ यदि बुध लग्नमें और अन्य शुभग्रह किसी केन्द्र में हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल हो तो उसमें यात्रा करनेवाला राजा अपने शत्रुओंको वैसे ही सोख लेता है, जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म ऋतु में क्षुद्र नदियोंको सोख लेती है।६६६३ ।। सम्पूर्ण शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा सूर्य या चन्द्रमा ग्यारहवें भावमें स्थित हों तो यात्रा करनेवाला नरेश अन्धकारको सूर्यकी भाति अपने शत्रुको नष्ट कर देता है ।।६६७॥

शुभग्रह यदि अपनी राशिमें स्थित होकर केन्द्र (१,४,७,१०), त्रिकोण (५, ९) तथा आय (११) भावमें हो तो यात्रा करनेवाला राजा रूईको अनिके समान अपने शत्रुओंको जलाकर भस्म कर देता है । ६६८३ चन्द्रमा दसवें भावमें और बृहस्पति केन्द्र में हो तो उसमें यात्रा करनेवाला राजा अपने सम्पूर्ण शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे प्रणवसहित पशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमः शिवाय) पाप-समूहका नाश कर देता है॥६६९३ ॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोतम नवमांशगत लग्नमें स्थित हो तो उसमें भी यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे पापोंको श्रीभगवान् का स्मरण ॥६७०॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांश होती यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार, सपरिवार, नष्ट करता है, जैसे इन्द्र पर्वको ॥६॥ बृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्रकी राशिम होकर केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो ऐसे समय यात्रा करनेवाला भूपाल सौको गरुड़के समान अपने शत्रुओंको अवश्य नष्ट कर देता है ॥ ६७२। यदि एक शुभग्रह वर्गोत्तम नवर्माशमें स्थित होकर केन्द्र में हो तो यात्रा करनेवाला नरेश पाल समूहोंको गङ्गाजीके समान अपने शत्रुओंको क्षणभरमें नष्ट कर देता है।। ६७३ २॥ जो राजा शत्रुओंको जीतनेके लिये उपर्युक्त राजयोगों में यात्रा करता है, उसका कोपानल शत्रुओंकी स्त्रियोंके अश्रुजलसे शान्त होता है॥ ६७४४॥ आश्विन मासक शुक्ल पक्षको दशमी तिथि विजया' कहलाती है। उसमें जो यात्रा करता है, उसे अपने शत्रुओपर विजय प्राप्त होती है अथवा शत्रुओं सन्धि (मेल) हो जाती है। किसी भी दशामें उसकी पराजय नहीं होती है॥ ६७५।।

(मनोजय-प्रशंसा-) यात्रा आदि सभी कार्यों में निमित और शकुन आदि (लय एवं ग्रहयोग)-की अपेक्षा भी मनोजय (मनको करने तथा प्रसन्न रखना) प्रबल है। इसलिये मनस्वी पुरुषोंके लिये यत्रपूर्वक फलसिद्धिमें मनोजय हो प्रधान कारण होता है ।। ६७६।।

(यात्रामें प्रतिबन्ध-) यदि घरमै उत्यान, उपनयन, विवाह, प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो जीवनकी इच्छा रखनेवालोंको बिना उत्सायको समान किये यात्रा नहीं करनी चाहिये ।

(यात्रामें अपशकुन-) यात्राके समय यदि परस्पर दो भैंसो या चूहोंमें लड़ाई हो, स्त्री से कलह हो या स्त्रीका मासिक धर्म हुआ हो वस्त्र आदि शरीरसे खिसकर गिर पड़े, किसीपर क्रोध हो जाय या मुख से दुर्वचन कहा गया हो

 तो उस दशामें राजाको यात्रा नहीं करनी चाहिये ॥ ६७८३॥

(दिशा, वार तथा नक्षत्र बोहब'-) यदि राजा घृतमिश्रित अन्न खाकर पूर्व दिशाकी यात्रा करे, तिलचूर्ण मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण दिशाको जाय और घृतमिश्रित खीर खाकर उत्तर दिशाकी यात्रा करे तो निक्षय ही वह शत्रुओपर विजय पाता है। रविवारको सज्जिका (मिसिरी और मसाला मिला हुआ दही), सोमवारको खीर, मङ्गलबारको काँजी, बुधवारको दूध, गुरुवारको दही, शुक्रवारको दूध तथा शनिवारको तिल और भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओंको जीत लेता है। अश्विनीमें कुल्माष (उड़दका एक भेद), भरणीमें तिल, कृत्तिकामें उड़द, रोहिणीमें गायका दही, मृगशिरामें गायका घी, आर्द्रामें गायका दूध, आश्लेषामें खीर, मघामें नीलकण्ठका दर्शन, हस्तमें षाष्टिक्य र (साठी धान्य)-के चावलका भात, चित्रामें प्रियंगु (कॅगनी), स्वातीमें अपूप (मालपूआ), अनुराधामें हैं फल (आम, केला आदि), उत्तराषाढ़में शाल्य (अगहनी धानका चावल), अभिजित्में हविष्य, प्रवणमें कृशरान (खिनड़ी), भनिष्ठामें मूंग, औ शतभिषामें जौका आटा, उत्तर भाद्रपदमें खिचड़ी हैं तथा रेवती में दही-भात खाकर राजा यदि हाधी, बड़ घोड़े, रथ या नरयान (पालकी) पर बैठकर अ यात्रा करे तो वह शत्रुओंपर विजय पाता है और ग्राह उसका अभीष्ट सिद्ध होता है ।। ६७९-६८४॥

( यात्राविधि-) प्रचलित अग्निमें तिलोंसे वाया हवन करके जिस दिशामें जाना हो, उस दिशाके स्वामीको उन्हीं के समान हवाले वस्त्र, गन्ध तथा पुष्य आदि उपचार अर्पण करके उन दिक्पालोके और मन्त्रद्वारा विधिपूर्वक उनका पूजन करे। फिर अपने इष्टदेव और ब्राह्मणोंको प्रणाम करके ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद लेकर राजाको यात्रा करनी चाहिये ॥६८५३॥

(दिक्पालोंके स्वरूपका ध्यान-) (१ पूर्व दिशाके स्वामी) देवराज इन्द्र शचीदेवीके साथ ऐरावतपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पा रहे हैं। उनके हाथमें वन है। उनकी कान्ति सुवर्ण-सदृश है तथा वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। (२ अग्निकोणके अधीश्वर) अग्रिदेवके सात हाथ, सात जिलाएँ और छः मुख हैं। वे भेड़पर सवार हैं, उनकी कान्ति लाल है, वे स्वाहादेवीके प्रियतम हैं तथा सुक् -खुवा और नाना प्रकारके आयुध धारण करते हैं। (३ दक्षिण दिशाके स्वामी) यमराजका दण्ड ही अस्त्र है। उनकी आँखें लाल हैं और वे भैंसेपर आरूद हैं। उनके शरीरका रङ्ग कुछ लाली लिये हुए साँवला है। वे ऊपरकी ओर मुँह किये हुए हैं तथा शुभस्वरूप है। (४ नैऋत्यकोणके अधिपति) निऋतिका वर्ण नील है। वे अपने हाथों में ढाल और तलवार लिये रहते हैं। मनुष्य ही उनका वाहन है। उनकी आँखें भयंकर ए केश कारकी ओर उठे हुए हैं। वे सामर्थ्यशाली हैं और उनकी गर्दन बहुत बड़ी है। (५ पश्चिम दिशाके स्वामी) वरुणकी अङ्गकान्ति पीली है। वे नागपाश धारण करते हैं। ग्राह उनका वाहन है। वे कालिकादेवीके प्राणनाथ हैं और रत्रमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। (६ वायव्य कोणके अधिपति) वायुदेव काले रङ्गके मृगपर आरूढ़ हैं। अज्ञानीके पति हैं, वे समस्त प्राणियोंक प्राणस्वरूप हैं। उनकी दो पूजाएँ हैं और वे हाथमें दण्ड धारण करते हैं। इस प्रकार उनका ध्यान और पूजन करे। (७ उत्तर दिशाके

१. दोहद-जिसे जिस वस्तुको विशेष चाह होती है, जिसको प्राप्तिसे मन प्रसन्न हो जाता है, वह उसका 'दोहद' कहलाता है। पूर्व दिशाकी अभिधात्रीदेवी चाहती है कि लोग घृतमिश्रित अन्न खायें। रविवारका अधिपति चाहता है कि लोग रसाला (सिखरन-मिसिरी और मसाला मिला हुआ दही) खायें इत्यादि। इसी प्रकार अन्य वारादिमें भी जानना चाहिये। दोहद-भक्षण करनेसे उस बार आदिका दोष नष्ट हो जाता है

स्वामी) कुबेर घोड़ेपर सवार है। उनकी दो भुजाएँ हैं। वे हाथमें कलश धारण करते हैं। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके सदृश है। वे चित्रलेखादेवीके प्राणवल्लभ तथा यक्षों और गन्धर्वक राजा हैं। (८ ईशानकोणके स्वामी) गौरीपति भगवान् शङ्कर हाथमें पिनाक लिये वृषभपर आरूढ़ हैं। वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है। माथेपर चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित होता है और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (इस प्रकार इन सब दिक्पालोंका ध्यान और पूजन करना चाहिये) ॥६८६-६९३॥

(प्रस्थानविधि-) यदि किसी आवश्यक कार्यवश निश्चित यात्रा-लग्नमें राजा स्वयं न जा सके तो छत्र, ध्वजा, शस्त्र, अस्त्र या वाहनमें से किसी एक वस्तुको यात्रा के निर्धारित समयमें घरसे निकालकर जिस दिशामें जाना हो, उसी दिशाको ओर दूर रखा दे। अपने स्थानसे निर्गमस्थान ( प्रस्थान रखने की जगह) २०० दाण्ड (चार हाथको लागी) से दूर होना उचित है। अथवा चालीस या कम से कम बारह दण्डकी दूरी होनी आवश्यक है। राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसी एक स्थान में सात दिन न ठहरे। अन्य (राज-मन्त्री तथा साधारण) जन भी प्रस्थान करके एक स्थानमें छः या पाँच दिन न ठहरे। यदि इससे अधिक ठहरना पड़े तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्त और उत्तम लग्न विचारकर मात्रा करे ॥६९४-६९६ ॥ असमसमें (पोषसे चैपर्यन्त) बिजली चमके, मेषकी गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा विविध (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) उत्पात होने लग जाय तो राजाको सात सततक अन्य स्थानोंको यात्रा नहीं करनी चाहिये ।।६९०॥

(शकुन-) यात्राकालमें रला नामक पक्षी, चूहा, सियारिन, कोभा तथा कबूतर-इनके शब्द वामभागमें सुनायी दें तो शुभ होता है। हुंदर, पिंगला ( उल्ल। पल्ली और गदहा ये यात्राके समय वामभागमें हों तो श्रेष्ठ है। कोयल, तोता और भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भागमें आ जायें तो श्रेष्ठ हैं। काले रंगको छोड़कर अन्य सब रंगोंके चौपाये यदि वाम भागमें दीख पड़ें तो श्रेष्ठ हैं तथा यात्रासमयमें कृकलास (गिरगिट) का दर्शन शुभ नहीं है ॥६९८-७००॥

यात्राकालमें सूअर, खरगोश, गोधा (गोह) और सर्पोको चर्चा शुभ होती है, किंतु किसी भूली हुई वस्तुको खोजनेके लिये जाना हो तो इनकी चर्चा अच्छी नहीं होती है। वानर और भालुओंको चर्चाका विपरीत फल होता है ।। ७०१ ॥

यात्रामें मोर, बकरा, नेवला, नीलकण्ठ और कबूतर दीख जाये तो इनके दर्शनमात्रसे शुभ होता है। परंतु लौटकर अपने नगरमें आने या घरमें प्रवेश करनेके समय ये दर्शन दें तो सब अशुभ ही समझना चाहिये। यात्राकालमें रोदन शब्दरहित कोई शव (मुर्दा) सामने दीख पड़े तो यात्राके उद्देश्यकी सिद्धि होती है। परंतु लौटकर घर आने तथा नवीन गृहमें प्रवेश करनेके समय यदि रोदन शब्दके साथ मुर्दा दीख पड़े तो वह घातक होता है ।।७०२-७०३ ॥

(अपशकुन-) यात्रा के समय पतित, नपुंसक, जटाधारी, पागल, औषध आदि खाकर वमन (उलटी) करनेवाला, शरीरमें तेल लगानेवाला वसा, हट्टी, चर्म, अङ्गार (ज्वालारहित अधि), रोगी, गुड़, कपास (रूई), नमक, प्रश्न (पूछने या टोकनेका शब्द), तृण, गिरगिड, बक्या स्त्री, कुबड़ा, गेरा वस्त्रधारी, खुले केशवाला भूखा तथा नंगा-ये सब सामने उपस्थित हो जायें तो अभीष्ट सिद्धि नहीं होती है ।।७०४- ७०५।

(शुभ शकुन-) प्रज्वलित अश्वि सुन्दर घोड़ा, राजसिंहासन, सुन्दरी स्त्री चन्दन आदिको सुगमन, अक्षत, चामर डोली पालका राजा शाह पदार्थ फल, विकली मिट्टी, अन्न, शहद, घृत, दही, गोबर, चूना, धुला हुआ वस्त्र, शाजा, खेत बैल, ध्वजा, सौभाग्यवती स्त्री, भरा हुआ कलश, रख (हीरा, मोती आदि), भृङ्गार (गडुआ), गौ, ब्राहाण, नगाड़ा, मृदङ्ग, दुन्दुभि, घण्टा तथा वीणा (बाँसुरी) आदि वाद्योंक शब्द, वेदमन्त्र एवं मङ्गल गीत आदिके शब्द- ये सब यात्राके समय यदि देखने या सुनने में आवें तो यात्रा करनेवाले लोगोंके सब कार्य सिद्ध करते हैं॥७०६-७०९॥

(अपशकुन-परिहार-) यात्राके समय प्रथम बार अपशकुन हो तो खड़ा होकर इष्टदेवका स्मरण करके फिर चले। दूसरा अपशकुन हो तो ब्राह्मणों की पूजा (वस्त्र, द्रव्य आदिसे उनका सत्कार) करके चले। यदि तीसरी बार अपशकुन हो जाय तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिये ॥७१०॥

(छींकके फल-) यात्राके समय सभी दिशाओंकी छौंक निन्दित है। गौकी छौंक घातक होती है, किंतु बालक, वृद्ध, रोगी या कफवाले मनुष्यको छौंक निष्फल होती है॥७११ ॥ परस्त्रियोंका स्पर्श करनेवाला तथा ब्राह्मण और देवताके धनका अपहरण करनेवाला तथा अपने छोड़े हुए हाथी और घोड़ेको बाँध लेनेवाला, शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य मार डाले; परंतु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्योंपर कदापि हाथ न उठावे ।। ७१२।।

(गृह प्रवेश-) नये घरमें प्रथम बार प्रवेश करना हो तो उत्तरायणके शुभ मुहूर्तमें करे। पहले दिन विधिपूर्वक वास्तु-पूजा और बलि (नैवेद्य) अर्पण करके गृह प्रवेश करना चाहिये ॥७१३ ॥

(गृह प्रवेशमें विहित मास-) माप, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ-इन चार मासों में गृहप्रवेश श्रेष्ठ होता है। तथा अगहन और कार्तिक इन दो मागमें मध्यम होता है।

(विहित नक्षत्र-) मृगशिरा, पुष्य, रेवती, शलभिषा, चित्रा, अनुराधा और स्थिर संज्ञक (होना बत्तरा और रोहिणी नक्षत्रों में बृहस्पति और शुक्र दोनों उदित हों तब रवि और मालको छोड़कर अन्य वारों में रिक्ता (४,९,१४) तथा अमावास्या छोड़कर अन्य तिथियों में दिन या रात्रिके समय गृहप्रवेश शुभप्रद होता है। चन्द्रबल और ताराबलसहित उपद्रवरहित दिनके पूर्वाह भागमें स्थिर राशिके नवर्माशयुक्त स्थिर लग्नमें जब लग्नसे अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो, शुभग्रह त्रिकोण या केन्द्र में हों, पापग्रह ३, ६, ११ भावोंमें हों और चन्द्रमा लन, १२, ८, ६ इनसे भिन्न स्थानोंमें हों, तब गृह-प्रवेश करनेवाले यजमानकी जन्मराशि, जन्मलग्न या इन दोनोंसे उपचय (३, ६, १०, ११ वी) राशिके गृह-प्रवेश लग्नमें विद्यमान होनेपर सब प्रकारके सुख और सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। अन्यथा इससे विपरीत समयमें गृह-प्रवेश किया जाय तो शोक और निर्धनता प्राप्त होती है ॥ ७१४-७१९ ॥

(प्रवेश-विधि-) जिस नूतन गृहमें प्रवेश करना हो, उसको चित्र आदिसे सजाकर तथा पुष्प-तोरण आदिसे अलंकृत करके वेद ध्वनि, शान्तिपाठ, सौभाग्यवती स्त्रियोंके माङ्गलिक गीत तथा वाद्य आदिके शब्दोंके साथ सूर्यको वाम भागमें रखकर जलसे भरे हुए कलशको आगे करके उसमें प्रवेश करना चाहिये ।।७२०।।

(वृष्टि-विचार-) वर्षा-प्रवेश (आर्द्रा नक्षत्र में सूर्यके प्रवेश)-के समय यदि, शुक्लपक्ष हो, चन्द्रमा जलचर राशिमें या लग्रसे केन्द्र (१,४, ७, १०) में स्थित होकर शुभग्रहसे देखे जाते हों तो अधिक वृष्टि होती है। यदि उस समय चन्द्रमाप सापग्रहकी दृष्टि हो तो दीर्घकालमें अल्पवृष्धि समझनी चाहिये। (इससे सिद्ध होता है कि यदि, चन्द्रमापर पाप और शुभ दोनों ग्रहोंकी दृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है। जिस प्रकार चन्द्रमासे फल कहा गया है, उसी प्रकार उस समय शुक्ररो भी समझना चाहिये। (अर्थात् सूर्यक आदा-प्रवेशके समय चन्द्रमा और शुक्र दोनोंकी स्थिति देखकर तारतम्यसे फल समझना चाहिये)॥७२१ ७२२॥

वर्षाकालमें आइसे स्वातीतक सूर्यके रहनेपर चन्द्रमा यदि शुक्रसे सप्तम स्थानमें अथवा शनिसे पञ्चम, नवम तथा सप्तम स्थानमें हो, उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि पड़े तो उस समय अवश्य वर्षा होती है॥२३॥

यदि युध और शुक्र समीपवर्ती (एक राशिमें स्थित) हों तो तत्काल वर्षा होती है। किंतु उन दोनों (बुध और शुक्र)-के बीचमें सूर्य हों तो वृष्टिका अभाव होता है ॥७२४ ॥

यदि मघा आदि पाँच नक्षत्रों में शुक्र पूर्व दिशामें उदित हों और स्वातीसे तीन नक्षत्रों (स्वाती, विशाखा, अनुराधा)-में शुक्र पशिम दिशामें उदित हों तो निश्चय ही वर्षा होती है। इससे विपरीत हो तो वर्षा नहीं समझनी चाहिये॥७२५ ॥

यदि सूर्यके समीप (एक राशिके भीतर होकर) कोई ग्रह आगे या पीछे पड़ते हों तो वे वर्षा अवश्य करते हैं; किंतु उनकी गति वक्र न हुई हो तभी ऐसा होता है ॥७२६ ॥ दक्षिण गोल (तुलासे मीनतक)-में शुक्र यदि सूर्यसे वाम भागमें पड़े तो वृष्टिकारक होता है। उदय या अस्तके समय यदि आ सूर्यका प्रवेश हो तो भी वर्षा होती है।।७२७ ।।

यदि सूर्यका आर्द्रा- प्रवेश सन्ध्याके समय हो तो शस्य (धान)-की वृद्धि होती है। यदि रात्रिमें हो तो मनुष्योंको सब प्रकारको सम्पत्ति प्रास होती है। यदि प्रवेशकालमें चन्द्रमा, गुरु, बुध एवं शुक्रसे आर्द्रा भेदित हो तो क्रमश: अल्पवृष्टि, धान्य-हानि, अनावृष्टि और धान्य वृद्धि होती है, इसमें संशय नहीं है। यदि ये चारों चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र प्रवेश लासे केन्में पड़ते हो तो ईति (खेतीके टिड्डी आदि सब उपद्रव)-का नाश होता है।। ७२८-७२९ ॥ यदि सूर्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्रमें प्रवेशके समय मेघाँसे आच्छा झें तो आसे मूलतक प्रतिदिन वर्षा होती है।। ७३०॥

यदि रेवतीमें सूर्यक प्रवेश करते समय वर्धा हो जाय तो उससे दस नक्षत्र (रेवतीसे आश्लेषा)- तक वर्थ नहीं होती है। सिंह-प्रवेशमें लग्न यदि मङ्गलसे मित्र (भेदित) हो, कर्क-प्रदेशमें अभित्र हो एवं कन्या-प्रवेशमें भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि होती है ।।७३१॥ उत्तर भाद्रपद यूर्वधान्य, रेवती परधान्य तथा भरमी सर्व धान्य नश्व है। अविनोहो सर्वधयाँका नाशक नक्षत्र कहा गया है। वकाल (चातुर्मास्य)-में पझिम उदित हुए रुक यदि गुरुसे समय गरिने निर्बल हो ले अदाले सर नमतक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती है। इन्दमहल में परिवेष (पेरा) हो और उत्तर दिशामें बिजली दोख पड़े मेडाई हद मनाची पहें है दुम मेव वाद अदरके अपने होकर दान अपने नानासे घरतीर खोदे लोह नद -२ और कांसी आदि)-में मल जमने लगे अथक बहुत-से बालक मिलकर सड़कोंपा पुल बाँधे तो ये वकि सूचक चिह है।

चींटीकी पड़कि कि भित हो जाय, आकाश बहुतेरे जुगनू दीख पड़े तथा सपों का वृक्षपर चढ़ना और प्रसत्र होना देखा जाय तो ये सब दुष्ट-उदय या अस्त-समय यदि सूर्य का चन्द्रमाका रंग बदला हुआ जान पड़े या उनको कान्ति मधुके समान दीख पड़े तथा बड़े जोरको हवा चलने लगे तो अतिवृष्टि होली है ।। ७३२-७३८।।

(पृथ्वीके आधार कृर्म अङ्क-विभाग-) कूर्मदेवता पूर्व की ओर मुख करके स्थित है. उनके व अनाम इस भारत भूमिकेविभाग करके प्रत्येक खण्डमें प्रदक्षिणक्रमसे विभिन्न मण्डलों (देशों)-को समझे। अन्तर्वेदी (मध्यभाग)- में पाचालदेश स्थित है, वही कूर्मभगवान्का नाभिमण्डल है। मगध और लाट देश पूर्व दिशामें विद्यमान हैं, वे ही उनका मुखमण्डल हैं। स्त्री, कलिङ्ग और किरात देश भुजा हैं। अवन्ती, द्रविड और भिल्लदेश उनका दाहिना पार्श्व हैं। गौड, कोंकण, शाल्व, आन्ध्र और पौण्ड्र देश- ये सब देश दोनों अगले पैर हैं। सिन्ध, काशी, महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्र देश पुच्छ-भाग हैं। पुलिन्द, चीन, यवन और गुर्जर-ये सब देश दोनों पिछले पैर हैं। कुरु, काश्मीर, मद्र तथा मत्स्य-देश बाम पार्श्व हैं। खस (नेपाल) अङ्ग, वन, वाहीक और काम्बोज-ये दोनों हाथ हैं ॥ ७३९-७४४ ॥

इन नवौं अङ्गोंमें क्रमशः कृत्तिका आदि तीन-तीन नक्षत्रोंका न्यास करे। जिस अङ्गके नक्षत्र में पापग्रह रहते हैं, उस अङ्गके देशोंमें तबतक अशुभ फल होता है और जिस अङ्गके नक्षत्रोंमें है शुभग्रह रहते हैं, उस अङ्गके देशों में शुभ फल है होते हैं ।। ७४५॥

( मूर्ति-प्रतिमा विकार-) देवताओंकी प्रतिमा यदि नीचे गिर पड़े, जले, बार-बार रोये, दु: गावे, पसीनेसे तर हो जाय, हँसे, अग्नि, धुआँ, तेल, शोणित, दूध या जलका वमन करे, अधोमुख प जाय, एक स्थानमें दूसरे स्थानमें चली जाय तथा इसी तरहकी अनेक अद्भुत बातें दीख पड़ें शा नो यह प्रतिमा विकार कहलाता है। यह विकार अशुभ फलका सूचक होता है

(विविध विकार-) यदि आकाशमें परि गन्धर्वनगर (ग्रामके समान आकार), दिनों ताराओंका दर्शन, उल्कापचन, कारण और शोणितकी वर्षा, गन्धाका दर्शन, दिग्दाह, दिशामोंमें धूम छा जाना, दिन या रात्रिमें भूकम्प होना, बिना आगके स्सुल्लिङ्ग (अङ्गार) दीखना, बिना लकड़ीके आगका जलना, रात्रि में इन्द्रधनुष या परिवेष (घेरा) दीखना, पर्वत या वृक्षादिके ऊपर उजला कौआ दिखायी देना तथा आगकी, चिनगारियोंका प्रकट होना आदि बातें दिखायी देने लगें, गौ, हाथी और घोड़ों के दो या तीन मस्तकवाला बच्चा पैदा हो, प्रात:काल एक साथ ही चारों दिशाओंमें अरुणोदय-सा प्रतीत हो, गाँवमें गीदड़ोंका दिनमें बास हो, धूम-केतुओंका दर्शन होने लगे तथा रात्रिमें कौओंका और दिनमें कबूतरोंका क्रन्दन हो तो ये भयंकर उत्पात हैं। वृक्षोंमें बिना समयके फूल या फल दीख पड़ें तो उस वृक्षको काट देना चाहिये और उसकी शान्ति कर लेनी चाहिये। इस प्रकारके और भी जो बड़े बड़े उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं, वे स्थान (देश या ग्राम) का नाश करनेवाले होते हैं। कितने ही उत्पात हातक होते हैं। कितने ही शत्रुओंसे भय उपस्थित करते हैं। कितने ही उत्पातोंसे भय, यश, मृत्यु, हामि, कीर्ति, सुख दुःख और ऐश्वर्यकी भी प्राप्ति होती है। यदि वल्मीक (दीमककी मिट्टीके ढेर)-पर शहद दीख पड़े जो धनकी हानि होती है। द्विजश्रेष्ठ। इस तरह के सभी उत्पातोंमें यत्रपूर्वक कल्पोक्त विधिसे शान्ति अवश्य कर लेनी चाहिये। नारदजी। इसप्रकार संक्षेपसे गने ज्योतिषशास्त्रका वर्णन किया है। अब वेदके छहों अङ्गोंमें श्रेष्ठ छन्दःशास्त्रका परिचय देता हूँ। ७४६-७५८ ॥ (पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५६)