मार्गशीर्ष-पूर्णिमा से आरम्भ होने वाले लक्ष्मीनारायण-व्रत की उद्यापनसहित विधि और महिमा

भीसनकजी कहते-मुनिश्रेष्ठ। अब मैं दूसरे उत्तम व्रतका वर्णन करता हूँ, सुनिये। वह सब पापौंको दूर करनेवाला, पुण्यजनक तथा सम्पूर्ण दुःखौंका नाशक है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा स्त्री-इन सबकी समस्त मनोवाच्छित कामनाओंको सफल करनेवाला तथा सम्पूर्ण व्रतोंका फल देनेवाला है। उस व्रतसे बुरे-बुरे स्वप्नोंका नाश हो जाता है। वह धर्मानुकूल व्रत दुष्ट ग्रहोंकी बाधाका निवारण करनेवाला है, उसका नाम है पूर्णिमाव्रत। वह परम उत्तम तथा सम्पूर्ण जगत्में विख्यात है। उसके पालनसे पापोंकी करोड़ों राशियाँ नष्ट हो जाती हैं।

मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिको संयम-नियमपूर्वक पवित्र हो शास्त्रीय आचारके अनुसार दन्तधावनपूर्वक स्नान करे; फिर श्वेत वस्त्र धारण करके शुद्ध हो मौनपूर्वक घर आवे। वहाँ हाथ-पैर धोकर आचमन करके भगवान् नारायणका स्मरण करे और संध्या-वन्दन, देवपूजा आदि नित्यकर्म करके संकल्पपूर्वक भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे। व्रती पुरुष 'नमो नारायणाय'-इस मन्त्रसे आवाहन, आसन तथा गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा भक्ति-तत्पर हो भगवान्की अर्चना करे और एकाग्रचित्त हो वह गीत, वाद्य, नृत्य, पुराण-पाठ तथा स्तोत्र आदिके द्वारा श्रीहरिकी आराधना करे। भगवान् के सामने चौकोर वेदी बनावे, जिसकी लंबाई-चौड़ाई लगभग एक हाथ हो। उसपर गृह्यसूत्रमें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार अग्निकी स्थापना करे और उसमें आज्यभागान्त* होम करके पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे चरु, तिल तथा घृतद्वारा यथाशक्ति एक, दो, तीन बार होम करे। सम्पूर्ण पापोंकी निवृत्तिके लिये प्रयत्नपूर्वक होमकार्य सम्पन्न करना चाहिये। अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार प्रायश्चित्त आदि सब कार्य करे। फिर विधिवत् होमकी समाप्ति करके विद्वान् पुरुष शान्तिसूक्तका

* अग्निस्थापनाके पश्चात् दायें हाथमें सव लेकर दाहिना घुटना भूमिपर रखकर ब्रह्मासे अन्वारम्भ करके मृतकी जो चार आहुतियाँ दी जाती हैं, उनमेंसे दो आहुतियोंकी 'आधार' संज्ञा है और शेष दो आहुतियोंको 'आष्यभाग' कहते हैं। 'प्रजापतये स्वाहा'-इस मन्त्रसे प्रजापतिके लिये जो घृतकी अविच्छिन्न धारा दी जाती है, वह 'पूर्व आधार' है। यह अग्निके उत्तरभागमें प्रज्वलित अग्निमें ही छोड़ी जाती है। इसी प्रकार अग्निके दक्षिणभागमें 'इन्द्राय स्वाहा'-इस मन्त्रसे प्रज्वलित अग्निमें इन्द्रके लिये जो अविच्छिन्न घृतकी धार दी जाती है, उसका नाम "उत्तर आधार' है। इसके बाद अग्निके उत्तरार्ध-पूर्वार्धमें 'अग्नये स्वाहा'-इस मन्त्रसे अग्निके लिये जो घृतकी एक आहुति दी जाती है, उसका नाम 'आग्नेय आज्यभाग' है और अनिके दक्षिणार्ध-पूर्वार्धमें 'सोमाय स्वाहा'-इस मन्त्रसे सोमके लिये दी खानेवाली आहुतिका नाम 'सौम्य आज्यभाग' है।

जप करे। तत्पश्चात् भगवान्के समीप आकर पुनः उनकी पूजा करे और अपना उपवासवत भक्तिभावसे |

भगवान्के अर्पण करे।

पौर्णमास्या निराहारः स्थित्वा देव तवाज्ञया।

भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष परेऽति शरणं भव।।

(ना० पूर्व० १८। १३)

'देव! पुण्डरीकाक्ष! मैं पूर्णिमाको निराहार , रहकर दूसरे दिन आपकी आज्ञासे भोजन करूँगा। आप मेरे लिये शरण हो।'

इस प्रकार भगवान्को व्रत निवेदन करके संध्याको चन्द्रोदय होनेपर पृथ्वीपर दोनों घुटने में टेककर श्वेत पुष्प, अक्षत, चन्दन और जलसहित अर्घ्य हाथमें ले चन्द्रदेवको समर्पित करे-

क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद्भव।

गृहाणायं मया दत्तं रोहिणीनायक प्रभो॥

(ना० पूर्व० १८६ १५)

'भगवन् रोहिणीपते ! आपका जन्म अत्रिकुलमें  हुआ है और आप क्षीरसागरसे प्रकट हुए हैं। मेरे देये हुए इस अर्घ्यको स्वीकार कीजिये।'

नारदजी! इस प्रकार चन्द्रदेवको अर्घ्य देकर उस पूर्वाभिमुख खड़ा हो चन्द्रमाकी ओर देखते हुए स्ट

हाथ जोड़कर प्रार्थना करे-

नमः शुक्लांशवे तुभ्यं द्विजराजाय ते नमः ।

रोहिणीपतये तुभ्यं लक्ष्मीभ्रात्रे नमोऽस्तु ते॥

(ना० पूर्व०१८। १७)

'भगवन् ! आप श्वेत किरणोंसे सुशोभित होते ना हैं, आपको नमस्कार है। आप द्विजोंके राजा हैं, आ आपको नमस्कार है। आप रोहिणीके पति हैं उन आपको नमस्कार है। आप लक्ष्मीजीके भाई हैं, आपको नमस्कार है।'

तदनन्तर पुराण-श्रवण आदिके द्वारा जितेन्द्रिय एवं शुद्ध भावसे रातभर जागरण करे। पाखण्डियोंकी बार दृष्टिसे दूर रहे। फिर प्रातःकाल उतकर अपने नित्य-नियमका विधिपूर्वक पालन करे। उसके

बाद अपने वैभवके अनुसार पुनः भगवान्को पूजा करे। तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन  करावे और स्वयं भी शुद्धचित्त हो अपने भाई-बन्धुओं तथा भृत्य आदिके साथ भोजन करे। भोजनके समय मौन रहे। इसी प्रकार पौष आदि महीनों में भी पूर्णिमाको उपवास करके भक्तियुक्त हो रोग-शोकरहित भगवान् नारायणकी पूजा-अर्चा करे। इस तरह एक वर्ष पूरा करके कार्तिकको पूर्णिमाके दिन उद्यापन करे। उद्यापनका विधान तुम्हें बतलाता हूँ! व्रती पुरुष एक परम सुन्दर चौकोर मङ्गलमय मण्डप बनवावे, जो पुष्प-लताओंसे सुशोभित तथा चेंदोवा और ध्वजा-पताकासे सुसज्जित हो। वह मण्डप अनेक दीपोंके प्रकाशसे व्याप्त होना चाहिये। उसकी शोभा बढ़ानेके लिये छोटी-छोटी घण्टिकाओंसे सुशोभित झालर लगा देनी चाहिये। उसमें किनारे-किनारे बड़े-बड़े शीशे और चँवर लगा देने चाहिये। कलशोंसे वह मण्डप घिरा रहे। मण्डपके मध्य भागमें पाँच रंगोंसे सुशोभित सर्वतोभद्र मण्डल बनावे। नारदजी!  उस मण्डलपर जलसे भरा हुआ एक कलश स्थापित करे। फिर सुन्दर एवं महीन वस्त्रसे उस कलशको ढक दे। उसके ऊपर सोने, चाँदी अथवा ताँबेसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी परम सुन्दर प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। तदनन्तर जितेन्द्रिय पुरुष भक्तिभावसे भगवान्को पञ्चामृतद्वारा स्नान करावे और क्रमश: गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि सामग्रियों तथा भक्ष्य, भोज्य आदि नैवेद्याद्वारा उनकी पूजा करके उत्तम श्रद्धापूर्वक रातमें जागरण करे। दूसरे दिन प्रात:काल पूर्ववत् भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक अर्चना करे। फिर दक्षिणासहित प्रतिमा आचार्यको दान कर दे और धन-वैभव हो तो ब्राह्मणोंको यथाशक्ति अवश्य भोजन करावे। उसके बाद एकाग्रचित्त हो विद्वान् पुरुष यथाशक्ति तिल- दान करे और तिलका ही विधिपूर्वक अग्रिमें होम करे। जो मनुष्य इस प्रकार भलीभांति लक्ष्मीनारायणका व्रत करता है, वह इस लोकमें पुत्र-पौत्रोंके साथ महान् भोग भोगकर सब पापों से मुक्त हो अपनी बहुत-सी पीढ़ियों के साथ भगवान् के वैकुण्ठधाम में जाता हैं, जो योगियों के लिये भी दुर्लभ हैं।