नारद महा पुराण
तृतीय पाद: शैवदर्शन के अनुसार पति, पशु, एवं पाश आदिका वर्णन तथा दीक्षाकी महत्ता
शौनकजी बोले-साधु सूतजी! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके विज्ञ पण्डित हैं। विद्वन्! आपने हमलोगोंको श्रीकृष्णकथारूपी अमृतका पान कराया है। भगवान्के प्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीने सनन्दनके मुखसे मोक्षधर्मोका वर्णन सुनकर पुनः क्या पूछा? ब्रह्माजीके मानस पुत्र सनकादि मुनीश्वर उत्तम सिद्धपुरुष हैं। वे लोगोंके उद्धारमें तत्पर होकर सम्पूर्ण जगत्में विचरते रहते हैं। महाभाग! श्रीनारदजी भी सदा श्रीकृष्णके भजनमें संलग्न रहते हैं और उन्हीं के शरणागत भक्त हैं। उन सनकादि और नारदका समागम होनेपर सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली कौन-सी कल्याणमयी कथा हुई, यह बतानेकी कृपा करें?
सूतजीने कहा-'भृगु श्रेष्ठ! सनन्दनजीके द्वारा प्रतिपादित सनातन मोक्षधर्मोका वर्णन सुनकर नारदजीने पुन: उन मुनियोंसे पूछा।
नारदजी बोले- मुनीश्वरो ! किन मन्त्रोंसे भगवान् विष्णुको आराधना की जानी चाहिये। श्रीविष्णुके चरणारविन्दोंकी शरण लेनेवाले भक्तजनोंको किन देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। विप्रवरो! भागवततन्त्रका तथा गुरु और शिष्यके सम्बन्धको स्थापित करके उन्हें अपने अपने कर्तव्यके पालनको प्रेरणा देनेवाली दीक्षाका वर्णन कीजिये। तथा साधकोंद्वारा पालन करने योग्य प्रात: काल आदिके जो-जो कृत्य हों, उन सबको भी हमें बताइये। जिन महीनों में जप, होम आदि जिन जिन कर्मोके अनुष्ठानसे परमात्मा श्रीहरि प्रसन्न होते हैं, उनका आपलोग मुझसे वर्णन करें।
सूतजी कहते हैं- महात्मा नारदका यह वचन सुनकर सनत्कुमारजी बोले।
"शैव-महातन्त्र' के 'शैवागम', 'शैवदर्शन' तथा 'पाशुपत-दर्शन' आदि अनेक नाम हैं। इस अध्यायमें इसीके निगूढ़ तत्त्वोंका विशद विवेचन किया गया है। यहाँ भूमिकारूपसे उक्त दर्शनकी कुछ मोटी-मोटी बातें प्रस्तुत की जाती हैं, जिनसे पाशुपतसिद्धान्त और इस अध्यायमें वर्णित विषयको हृदयङ्गम करने में सुविधा होगी। शैवागमके अनुसार तीन पदार्थ (पशु, पाश तथा पशुपति) और चार पाद या साधन (विद्या, क्रिया, योग तथा चर्या) है। जैसा कि तन्त्र-तत्त्वज्ञोंका कथन है-"त्रिपदार्थ चतुष्पादं महातन्त्रम्
गुरुसे नियमपूर्वक मन्त्रोपदेश लेनेको दीक्षा कहते हैं। यह दीक्षा मन्त्र, मन्त्रेश्वर और विद्ये श्वर आदि पशुओंके ज्ञानके बिना नहीं हो सकती। इसी ज्ञानसे पशु, पाश तथा पशुपतिका ठीक-ठीक निर्णय होता है; अत: परमपुरुषार्थकी हेतुभूता दीक्षामें उपकारक उक्त ज्ञानका प्रतिपादन करनेवाले प्रथम पादका नाम 'विद्या' है। भित्र-भित्र अधिकारियोंके अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकारकी दीक्षा होती है। अतः अनेक प्रकारको साङ्गोपाङ्ग दीक्षाओंके विधि-विधानका परिचय करानेवाले द्वितीय पादको 'क्रिया' पाद कहा गया है। परंतु यम, नियम, आसन आदि अष्टाङ्मयोगके बिना अभीष्टप्राति नहीं हो सकती, अत: 'क्रिया' पादके पश्चात् 'योग' नामक तीसरे पादकी आवश्यकता समझकर उसका प्रतिपादन किया गया है। योगकी सिद्धि भी तभी होती है, जब शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान और निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग हो, अतः इन सब काँके प्रतिपादक 'चर्या' नामक चतुर्थ पादका वर्णन है।
पति या पशुपति
करने, न करने और अन्यथा करने में समर्थ, नित्य, निर्गुण, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सर्वथा स्वतन्त्र, परम सर्वज, परम ऐश्वर्यस्वरूप, नित्यमुक्त, नित्य-निर्मल, निरतिशय ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे सम्पत्र तथा सबपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् महेश्वर परम शिव ही 'पति' वा 'पशुपति' हैं।महेश्वरके पाँच कृत्य हैं-सृष्टि, स्थिति संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह। यद्यपि विद्येश्वर इत्यादि मुक्त जीव भी शिवभावको प्राप्त हो जाते हैं, किंतु ये सब स्वतन्त्र नहीं होते, अपितु परमेश्वरके अधीन रहते हैं। उपासनके लिये जहाँ परमेश्वर शिवके साकार रुपका वर्णन
सनत्कुमारजी कहते हैं-नारद! सुनो, मैं तुमसे भागवततन्त्रका वर्णन करूँगा। जिसे जानकर साधक निर्मल भक्तिके द्वारा अविनाशी भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है। (अब पहले शैवतन्त्रका वर्णन करते हैं।) शैव-महातन्त्रमें तीन पदार्थ और चार पादोंका वर्णन है, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं। भोग, मोक्ष, क्रिया और चर्या-ये शैवमहातन्त्रमें चार पाद (साधन) कहे गये हैं। पदार्थ तीन ही हैं-पशुपति, पशु तथा पाश; इनमें एकमात्र शिवस्वरूप परमात्मा ही 'पशुपति' हैं और जीवोंको 'पशु' कहा गया है। नारद! देखो, जबतक स्वरूपके अज्ञानको सूचित करनेवाले मोह आदिसे सम्बन्ध बना रहता है, तबतक इन सब जीवोंकी 'पशु' संज्ञा मानी गयी है। उनका पशुत्व द्वैतभावसे युक्त है। इन पशुओंके जो पाश अर्थात् ब-धन हैं, वे पाँच प्रकारके माने गये हैं। उनमेंसे प्रत्येकका लक्षण बताया जायगा। पशुके तीन भेद हैं- 'विज्ञानाकल', 'प्रलयाकल' और 'सकल'। इनमें प्रथम अर्थात् 'विज्ञानाकल पशु' 'मल' संयुक्त (मलरूप पाशसे आबद्ध) होता है। दूसरा प्रलयाकल पशु' 'मल' और 'कर्म'-इन दो पाशोंसे संयुक्त (बद्ध) होता है। तीसरा अर्थात् 'सकल पशु' 'मल', 'माया' तथा 'कर्म'-इन तीन पाशोंसे बँधा हुआ कहा गया है। उक्त त्रिविध पशुओंमें जो पहला- विज्ञानाकल है, उसके दो भेद होते हैं-'समाप्त-कलुष' और 'असमाप्तकलुष'। दूसरे- प्रलयाकल पशुके लिये भी दो भेद कहे गये हैं-'पक्ष-मल' और 'अपक्व मल' (अर्थात् पक्वपाशद्वय और अपक्व पाशद्वय) विज्ञानाकल और प्रलयाकल ये दोनों जीव (पशु) शुद्ध मार्गपर स्थित होते हैं और सकल जीव कला आदि तत्त्वोंके अधीन होकर विभिन्न लोकोंमें कर्मानुसार प्राप्त हुए तिर्यक् मनुष्यादि शरीरों में भ्रमण करता पाश पाँच प्रकारके बताये गये हैं-'मलज 'कर्मज', 'मायेय' (मायाजन्य), 'तिरोधानशक्तिज' और 'विन्दुज'। जैसे भूसी चावलको ढके रहती है, उसी प्रकार एक भी 'मल' पुरुषकी अनेक शक्ति-दृक्-शक्ति (ज्ञान) और क्रियाशक्तिका
है, वहाँ भी उनका शरीर प्राकृत नहीं है। यह निर्मल तथा कर्मादि बन्धनोंसे नित्यमुक्त होनेके कारण शाल (शक्तिस्वरूप एवं चिन्मय) है। उपनिषदोंमें महेश्वरके मन्त्रमय स्वरूपका वर्णन है। शैवदर्शनमें यह बात स्पष्ट शब्दोंमें कही गयी है-'मलाघसम्भवाच्छाक्तं व्युतादृशं प्रभोः।' 'तद्वपुः पञ्चभिर्मन्त्रैः।' इत्यादि।
पशु
जीवात्मा या क्षेत्रज्ञका ही नाम 'पशु' है। पशु उसे कहते हैं जो पाशोंद्वारा बँधा हो-'पाशनाच्च पशवः ।' जीव भी पाशबद्ध है, इसीसे उसे 'पशु' कहते हैं। वह वस्तुतः अणु नहीं, व्यापक है। नित्य है। 'आत्मनो विभुनित्यता' यह शैवतन्त्रकी स्पष्ट घोषणा है; परंतु पशु (जीव) दशामें यह परिच्छिन्न और सीमित शक्तिसे युक्त है, तथापि यह 'सांख्य' के पुरुषकी भाँति अकर्ता भी नहीं है, क्योंकि पाशोंसे मुक्त होकर शिवत्वको प्राप्त हो जानेपर यह भी निरतिशय ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। पशु तीन प्रकारका है-'विज्ञानाकल', 'प्रलयाकल तथा 'सकल'। (२) जो परमात्माके स्वरूपको पहचानकर जप, ध्यान तथा संन्यासद्वारा अथवा भोगद्वारा कर्माका क्षय कर डालता है और कोका क्षय हो जाने के कारण जिसको शरीर और इन्द्रिय आदिका कोई बन्धन नहीं रहटा उसमें केवल मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाता है, उसे 'विज्ञानाकल' कहते हैं। मल तीन प्रकारके होते हैं- आणव-मल, कर्मज-मल तथा मायेय मल। विज्ञानाकलमें केवल आणव-मल रहता है। वह विज्ञान (तत्त्वज्ञान)- द्वारा अकल-कलारहित (कलादि भोग-बन्धनों से शून्य) हो जाता है, इसलिये उसको 'विज्ञानाकल' संज्ञा होती है। (२) जिस जीवात्माके देह, इन्द्रिय आदि प्रलयकालमें लीन हो जाते हैं, इससे उसमें मायेय-मल तो नहीं रहना परंतु आणव और कर्मज-ये दो मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाते हैं, वह प्रलयकालमें ही अकल (कलारहित) होनेके कारण 'प्रलयाकल' कहलाता है। (३) जिस जीवात्मागे आणव, मायेय और कर्मज-तीनों मल (पाश) रहते हैं, वह कला आदि भोग-बन्धनोंसे युक्त होनेके कारण सकल कहा गया है।
आच्छादन कर लेता है और यही जीवात्माओंके लिये देहान्तरकी प्राप्तिमें कारण होता है। धर्म और अधर्मका नाम है कर्म, जो विचित्र फल-भोग प्रदान करनेवाला है। यह 'कर्म'प्रवाहरूपसे नित्य है। बीजांकुर-न्यायसे इसकी स्थिति अनादि मानी गयी है। इस प्रकार ये प्रथम दो (मलज और कर्मज) पाश बताये गये। ब्रह्मन् ! अब 'मायेय' आदि पाशोंका वर्णन सुनो।
('विन्दुज पाश' अपरामुक्ति-स्वरूप है और शिव-स्वरूपकी प्राप्ति करानेवाला है, उसका स्वरूप यह है-) सत्, चित् और आनन्द जिनका स्वरूपभूत वैभव है, वे एकमात्र सर्वव्यापी सनातन परमात्मा ही सबके कारण तथा सम्पूर्ण जीवोंके पतिरूपसे विराज रहे हैं। जो मनमें तो आता है, किंतु प्रकट नहीं होता और संसारसे निवृत्ति (वैराग्य) प्रदान करता है: तथा दृक् शक्ति और क्रियाशक्तिके रूपमें जो स्वयं ही विद्यमान है, वह उत्कृष्ट शैव तेज है। इसके सिंवा, जिस शक्तिसे समर्थ होकर जीव परमात्माके समीप दिव्य भोगसे सम्पन्न होता और पशु समुदायकी कोटिसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है, परमात्माकी उस एकान्तस्वरूपा आद्या शक्तिको चिद्रूपा कहते हैं। उस चिद्रूपा शक्तिसे उत्कर्षको प्राप्त हुआ 'विन्दु' दृक् (ज्ञान) और क्रिया-स्वरूप होकर शिव-नामसे प्रतिपादित होता है, उसीको सम्पूर्ण तत्त्वोंका कारण बताया गया है। वह सर्वत्र व्यापक तथा अविनाशी है। उसीमें संनिहित हुई इच्छा आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ उसके सकाशसे अपना-अपना कार्य करती हैं। मुने ! इसलिये यह सबपर अनुग्रह करनेवाला है। जड और चेतनपर अनुग्रह करनेके लिये विश्वकी सृष्टि करते समय इसका प्रथम उन्मेष नादके रूपमें हुआ है, जो शान्ति आदिसे युक्त तथा भुवन- स्वरूप है। विप्रवर! वह शक्ति-तत्त्व सावयव बताया गया है। इससे ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिका तथा उत्कर्ष और अपकर्षका प्रसार एवं अभाव होता है; अत: यह तत्त्व सदा शिवरूप है। जहाँ दृक-शक्ति तिरोहित होती है और क्रियाशक्ति बढ़ जाती है, वह ईभर नामक तत्त्व कहा गया है। जो समस्त मनोरथोंका साधक है, जहाँ क्रियाशक्तिका तिरोभाव और ज्ञानशक्तिका उद्रेक
विज्ञानाकल पशु (जीव)-के भी दो भेद हैं-'समाप्त-कलुष' और 'असमाप्त-कलुष'। (१) जीवात्मा जो कर्म करता है, उस प्रत्येक कर्मकी तह मलफ्र जमती रहती है। इसी कारण उस मलका परिपाक नहीं होने पाता, किंतु जब कर्मोका त्याग हो जाता है, तब तह न जमनेके कारण मलका परिपाक हो जाता है और जीवात्माके सारे कलुष समाप्त हो जाते हैं, इसीलिये वह 'समाप्त-कलुष' कहलाता है। ऐसे जीवात्माओंको भगवान् आठ प्रकारके 'विद्ये श्वर' पदपर पहुँचा देते हैं, उनके नाम ये हैं-
अनन्तश्चैव सूक्ष्मश्च तचैव शिवोत्तमः । एकनेत्रस्तथैवैकरुद्रश्चापि त्रिमूर्तिकः ॥
श्रीकण्ठश्च शिखण्डी च प्रोका विद्योश्वरा इमे।'
(१) अनन्त, (२) सूक्ष्म, (३) शिवोसम, (४) एकनेत्र, (५) एकरुद्र, (६) त्रिमूर्ति, (७) श्रीकण्ठ और (८) शिखण्डी।
(२) 'असमाप्त कलुष' वे हैं, जिनकी कलुषराशि अभी समाप्त नहीं हुई है। ऐसे जीवात्मा ओंको परमेश्व
'मन्त्र' स्वरूप दे देता है। कर्म तथा शरीरसे रहित किंतु मलरूपी पाशमें बंधे हुए जीवात्मा ही मन्त्र हैं और इनको संख्या सात करोड़ है। ये सब अन्य जीवात्माओंपर अपनी कृपा करते रहते हैं। तत्त्व-प्रकाश नामक ग्रन्थमें उपर्युक विषयके संग्राहक श्लोक इस प्रकार है-
पशवस्त्रिविधाः प्रोक्ता विज्ञानप्रलयाकलौ सकलः । मलयुक्तस्तत्राद्यो मलकर्मयुतो द्वितीयः स्यात् ।
मलमायाकर्मयुतः - सकलस्तेषु द्विधा भवेदाध: ।
आद्यः समाप्तकलुषोऽसमाप्तकलुषो द्वितीयः स्यात्।
आद्याननुराध शिवो विद्येशत्वे नियोजयत्यष्टौ ।
मन्त्रांच करोत्यपरान् ते चोक्ताः कोटयः सप्त ।
'प्रलयाकल' भी दो प्रकारके होते हैं 'पक्वपाशद्वय' और 'अपक्वपाशद्वय । (१) जिनके मल तथा कर्मरूपी
होता है, वह विद्यातत्त्व कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप एवं प्रकाशक है। नाद, विन्दु और सकल-ये सत्-नामक तत्त्वके आश्रित हैं। आठ विद्येश्वरगण ईशतत्त्वके और सात करोड़ 'मन्त्र' गण विद्यातत्त्वके आश्रित हैं। ये सब तत्त्व शुद्धमार्गके नामसे कहे गये हैं। यहाँ ईश्वर साक्षात् निमित्त कारण हैं। वे , ही विन्दुरूपसे सुशोभित हो यहाँ उपादानकारण बनते हैं। पाँच प्रकारके जो पाश हैं, उनका कोई सभय न होनेके कारण उनका कोई निश्चित क्रम नहीं है; उनका व्यापार देखकर ही उनकी कल्पना की जाती है। वास्तवमें विचित्र शक्तियोंसे युक्त एक ही शिव नामक तत्त्व विराजमान है। वह शक्तियुक्त होनेसे 'शाक्त' कहा गया है। अन्त:करणकी वृत्तियोंके भेदसे ही अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की गयी हैं, प्रभु शिव जड़-चेतनपर अनुग्रह होतं करने लिये विविध रूप धारण करके अनादि एवं मलसे आबद्ध जीवोंपर कृपा करते हैं। सबपर सर्व दया करनेवाले शिव सम्पूर्ण जीवोंको भोग और शिव मोक्ष तथा जडवर्गको अपने व्यापार में लगनेकी माया शक्ति-सामर्थ्य देते हैं। भगवान् शिबके समान माया रूपका हो जाना ही मोक्ष है, यही चेतन जीवोंपर हैं। ईश्वरका अनुग्रह है। कर्म अनादि होनेके कारण सदा वर्तमान रहते हैं; अतः उनका भोग किये बिना भी भगवत्कृपासे मोक्ष हो जाता है। इसीलिये भगवान् शङ्करको अनुग्राहक (कृपा करनेवाला) कहा गया है। अविनाशी प्रभु जीवोंके भोगके लिये सूक्ष्म करणोंद्वारा अनायास ही जगत् की उत्पत्ति करते हैं। कोई भी कर्ता किसी भी कार्य में उपादान और करणोंके बिना नहीं देखा जाता। (अब 'मायापाश'का प्रसङ्ग है-) यहाँ शक्तियाँ ही करण हैं। मायाको उपादान माना गया है। वह नित्य, एक और कल्याणमयी है। उसका न आदि है न अन्त; वह माया अपनी शक्तिद्वारा मनुष्यों और लोकोंकी उत्पत्तिका सामान्य कारण है | माया अपने कर्मोद्वारा स्वभावतः मोहजनक होती है। उससे भिन्न 'परा माया' है, जो सूक्ष्म एवं व्यापक है। इन विकारयुक्त कार्योसे वह सर्वथा परे मानी गयी है। विद्याके स्वामी भगवान् शिव जीवके कर्मोको देखकर अपनी शक्तियोंसे मायाको क्षोभमें डालते और जीवोंके भोगके लिये न मायाके द्वारा ही शरीर एवं इन्द्रियोको सधि करते हैं। अनेक शक्तियोस सम्पन्न माया पहले कालतत्वको
दोनों पार्टीका परिपाक हो गया है, वे 'पक्वपाशद्वय' मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं। (२) 'अपक्वपाशद्वय' जीव पुयष्टक देह धारण करके नाना प्रकारके कर्मोको करते हुए नाना योनियों में घूमा करते हैं।
"सकल' जीवोंके भी दो भेद हैं-'पक्व-कलुष' और 'अपक्च-कलुष'। (१) जैसे-जैसे जीवात्माके मल, कर्म तथा माया-इन पाशोंका परिपाक बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ये सब पाश शक्तिहीन होते जाते हैं। तब ये पक्व- कलुष जीवात्मा 'मन्त्रेश्वर' कहलाते है। सात करोड़ मन्त्ररूपी जीव-विशेषोंके, जिनका ऊपर वर्णन हो चुका है, अधिकारी ये ही ११८ मन्त्रेश्वर जीव हैं। (२) अपक्व-कलुष जीव भवकूपमें गिरते हैं।
पाश
नारदपुराणमें शैव-महातन्त्रकी मान्यताके अनुसार पाँच प्रकारके पाश बताये गये हैं-(१) मलज, (२) कर्मज, (३) मायेय (मायाजन्य), (४) तिरोधान-शक्तिज और (५) विन्दुज । आधुनिक शैवदर्शनमें चार प्रकारके पाशोंका उल्लेख है-मल, रोध, कर्म तथा भाया। रोधशक्ति या तिरोधानशक्ति एक ही वस्तु है। 'विन्दु' मायास्वरूप है, वह 'शिव-तत्त्व' नामसे भी जानने योग्य है। यद्यपि शिवपदप्रातिरूप परम मोक्षकी अपेक्षासे वह भी पाश ही है, तथापि विधेश्वरादि पदकी प्राप्तिमें परम हेतु होने के कारण विन्दु-शक्तिको 'अपरा मुक्ति' कहा गया है, अत: उसे आधुनिक शैवदर्शनमें 'पाश' नाम नहीं दिया गया है। इसलिये यहाँ शेष चार पाशों (मल, कर्म, रोध और माया)-के ही स्वरूपका विचार किया जाता है (३) जो आत्माकी स्वाभाविक ज्ञान तथा क्रिया शक्तिको हक ले, वह 'मल' (अर्थात् अज्ञान) कहलाता है। यह मल आत्मस्वरूपका केवल आच्छादन ही नहीं करता; किंतु जीवात्माको
सृष्टि करती है। भूत, भविष्य और वर्तमान जगत् का संकलन तथा लय करती है। तदनन्तर माया नियमन-शक्तिस्वरूपा नियतिकी सृष्टि करती है। यह सबको नियममें रखती है; इसलिये नियति कही गयी है। तत्पश्चात् सम्पूर्ण विश्वको मोहमें डालनेवाली आदि-अन्तरहित नित्य माया 'कला'- तत्त्वको जन्म देती है; क्योंकि एक ओरसे मनुष्योंके मलकी कलना करके वह उनमें कर्तृत्व-शक्ति प्रकट करती है; इसीलिये इसका नाम कला है। यह कला ही 'काल' और 'नियति' के सहयोगसे पृथ्वीपर्यन्त अपना सारा व्यापार करती है। वही पुरुषको विषयोंका दर्शन अनुभव करानेके लिये प्रकाशस्वरूप 'विद्या' नामक तत्त्व उत्पन्न करती है। विद्या अपने कर्मसे ज्ञानशक्तिके आवरणका भेदन करके जीवात्माओंको विड़योंका दर्शन कराती है, इसलिये वह कारण मानी गयी है, क्योंकि बह विद्या भोग्य उत्पन्न करती है, जिससे पुरुष उद्बुद्धशक्ति होकर परम करणके द्वारा महत्-तत्त्व आदिको प्रेरित करके भोग्य, भोग और भोक्ताकी उद्भावना करता है। अतः वह विद्या परम करण है। भोक्ता पुरुषको भोग्य वस्तुकी प्रतीति करानेसे विद्याको 'करण' कहा गया है। बुद्धिके द्वारा जो चेतन-जीवको विषयका अनुभव होता है, उसीको 'भोग' कहते हैं। संक्षेपसे विषयाकारा बुद्धि ही सुख-दुःख आदिके रूपमें परिणत होती है। भोक्ताको भोग्य वस्तुका अनुभव अपने-आप ही होता है। विद्या उसमें सहायकमात्र होती है। यद्यपि बुद्धि सूर्यकी भाँति प्रकाशमात्र करनेवाली है, तथापि कर्मरूप होनेके कारण उसमें स्वयं कर्तृत्व नहीं है। वह करणान्तरोंको अपेक्षासे ही पुरुषको विषयोंका अनुभव कराने में समर्थ होती है। पुरुष स्वयं ही करण आदिसे सम्बन्ध स्थापित करता और भोगोंकी उत्कण्ठासे स्वयं ही बुद्धि आदिको प्रेरित करता है। साथ ही उन बुद्धि आदिकी शुभाशुभ चेष्टाओंसे प्रास होनेवाले फलका उसीको भोग करना पड़ता है। इसलिये पुरुषका कर्तृत्व सिद्ध होता है। यदि
बलपूर्वक दुष्कर्मोमें प्रवृत्त करनेवाला पाश भी यही है। (२) प्रत्येक वस्तुमें जो सामर्थ्य है, उसे 'शिव-शक्ति' कहते हैं, जैसे अग्रिमें दाहक-शक्ति। यह शक्ति जैसे पदार्थमें रहती है, वैसा ही भला, बुरा स्वरूप धारण कर लेती है; अतः पाशमें रहती हुई यह शक्ति जब आत्माके स्वरूपको ढक लेती है, तब यह 'रोध-शक्ति' या 'तिरोधान- पाश' कहलाती है। इस अवस्थामें जीव शरीरको आत्मा मानकर शरीरके पोषणमें लगा रहता है, आत्माके उद्धारका प्रयत्न नहीं करता। (३) फलकी इच्छासे किये हुए 'धर्माधर्म' रूप कोको ही 'कर्मपाश' कहते हैं। (४) जिस शक्तिमें प्रलयके समय सब कुछ लीन हो जाता है तथा सृष्टि के समय जिसमेंसे सब कुछ उत्पन्न हो जाता है, वह 'मायापाश' है। अत: इन पाशोंमें बंधा हुआ पशु जब तत्त्वज्ञानद्वारा इनका उच्छेद कर अलता है, तभी वह परम शिवतत्त्व अर्थात् पशुपतिपदको प्राप्त होता है।
दीक्षा
दीक्षा ही शिवत्व-प्राप्तिका साधन है। सर्वानुग्राहक परमेश्वर ही आचार्य-शरीरमें स्थित होकर दीक्षाकरणद्वारा जीवको परम शिवतत्त्वकी प्राप्ति कराते हैं। ऐसा ही कहा भी है-
योजयति परे तत्वे स दीक्षयाऽऽचार्यमूर्तिस्थः।'
'अपव-पाशद्वय प्रलयाकल' जीव तथा 'अपक्व कलुष सकल' जीव जिस पुर्यष्टक देहको धारण करते हैं, वह पशभूत तथा मन, बुसि, अहंकार-इन आठ तत्वोंसे युक होनेके कारण पुर्यष्टक कहलाती है। पुर्यष्टक सरीर छत्तीस तत्त्वों से युक्त होता है। अन्तर्भोगके साधनभूत कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण-ये सात तत्व, पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, दुस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और पाँच शब्द आदि विषय-ये छत्तीस तत्व है। अपक्व पाशद्वय जीवोंमें जो अधिक पुण्यात्मा है, उन्हें परम दयालु भगवान् महेश्वर भुवनेश्वर या लोकपाल बना देते हैं।
नारदपुराणके इस अध्यायमें इन्हीं उपर्युक्त तत्त्वोंका क्रम या व्युत्क्रमसे विवेचन किया गया है। पाठकोंको मनोयोगपूर्वक इसे पढ़ना और हदयङ्गम करना चाहिये।
उसमें कर्तृत्व न स्वीकार किया जाय तो उसके भोक्तृत्वका कथन भी व्यर्थ होता है। इसके सिवा, प्रधान पुरुषके द्वारा आचरित सब कर्म निष्फल हो जाता। यदि पुरुष करण आदिका प्रेरक न हो और उसमें कर्तृत्वका अभाव हो तो उसके द्वारा भोग भी असम्भव ही है। इसलिये पुरुष ही यहाँ प्रवर्तक है। उसका करण आदिका प्रेरक होना विद्याके द्वारा ही सम्भव माना गया है।
तदनन्तर कला दृढ़ वज्रलेपके सदृश रागको उत्पन्न करती है, जिससे उस वज्रलेप-रागयुक्त पुरुषमें भोग्य वस्तुके लिये क्रियाप्रवृत्ति उत्पन्न होती है, इसलिये इसका नाम राग है। इन सब तत्त्वोंसे जब यह आत्मा भोक्तृत्व-दशाको पहुँचाया जाता है, तब वह पुरुष नाम धारण करता है तत्यक्षात् कला हो अव्यक्त प्रकृतिको जन्म देती जो पुरुषके लिये भोग उपस्थित करती है, वह अव्यक्त ही गुणमय ससग्रन्थि * विधानका कारण है। इसमें गुणोंका विभाग नहीं है; जैसे आधारमें पृथ्वी आदिके भागका विभाग नहीं होता। उनका जो आधार है, वह भी अव्यक्त ही गुद कहलाता है। गुण तीन ही हैं। उनका अव्यक्तसे ग्रह ही प्राकट्य होता है। उनके नाम हैं-सत्त्व, रज और तम। गुणोंसे ही बुद्धि इन्द्रिय-व्यापारका हैं नियमन और विषयोंका निश्चय करती है। गुणसे होस त्रिविध कर्मोके अनुसार बुद्धि भी सात्त्विक चेश राजस और तामस-भेदसे तीन प्रकारको कही आप गयी है। महत्-तत्त्वसे अहंकार उत्पन्न होता है. उनक जो अहं भावकी पत्तिसे युक्त होता है। इस और अहंकारके ही सम्भेद (इन्द्रिय और देवता आदिकेही रूपमें परिणति) से विषय व्यवहारमें आते हैं। एक अहंकार सत्लादि गुणोंके भेदसे तीन प्रकारका होता है। उन तीनोंके नाम है-तैजस, राजस और तामस अहंकार। उनमें तैजसरकारसे मनसहित ज्ञानेन्द्रियाँ प्रकट हुई हैं। जो सत्त्वगुणके प्रकाशसे युक्त होकर वियोंका बोध कराती हैं। क्रियाके हेतुभूत राजस अहंकारसे कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। तामस अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं, जो पाँचों भूतोंकी उत्पत्तिमें कारण हैं। इनमें मन इच्छा और संकल्पके व्यापारवाला है। अतः वह दो विकारोंसे युक्त है। वह बाह्य इन्द्रियों का रूप धारण करके, जो उसके लिये सर्वथा उचित है, सदा भोक्ताके लिये भोगका उत्पादक होता है। मन अपने संकल्पसे हृदयके भीतर स्थित रहकर इन्द्रियों में विषय-ग्रहणकी शक्ति उत्पन्न करता है; इसलिये ठसे अन्तःकरण कहते हैं। मन, बुद्धि और अहंकार-ये अन्त करणके तीन भेद हैं। 'इच्छा, बोध और संरम्भ (गर्व या अहंभाव)- ये क्रमश: इनकी तीन वृत्तियों हैं।
कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका-ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। मुने ! शब्द आदि इनके ग्राह्य-विषय "जानने चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध- ये शब्दादि विषय माने गये हैं। वाणी, हाथ, पैर, गुदा और लिङ्ग-ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। ये बोलने, ग्रहण करने, चलने, मल त्याग करने और मैथुनजनित आनन्दकी उपलब्धिरूपी कर्मोकी सिद्धिके करण हैं। क्योंकि कोई भी क्रिया करणोंके बिना नहीं हो सकती। कार्यमें लगाकर दस प्रकारके करणीद्वारा चेष्टा की जाती है। व्यापक होनेके कारण कार्यका आश्रय लेकर सब इन्द्रियाँ चेष्टा करती हैं, इसलिये उनका नाम करण है। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी-ये पाँच तन्मात्राएँ हैं। इन तन्मात्राओंसे ही आकाश आदि पाँच भूत प्रकट होते हैं, जो एक एक विशेष गुणके कारण प्रसिद्ध हैं। शब्द आकाशका मुख्य गुण है, किंतु यह पांचों भूतोंमें सामान्य रूपसे उपलब्ध होता है। स्पर्श जायुका विशेष गुण है, किंतु वह चाय आदि चारों भूतोगें
*कला, काल, नियमि, विद्या, राग, प्रकृति और गुण- ये सात ग्रन्थियाँ है, यही आन्तरिक भोग-साधन कहे गये हैं।
विद्यमान है। रूप तेजका विशेष गुण है, जो तेज आदि तीनों भूतोंमें उपलब्ध है। रस जलका विशेष गुण है, जो जल और पृथ्वी दोनों में विद्यमान है तथा गन्ध नामक गुण केवल पृथ्वीमें ही उपलब्ध होता है। इन पाँचों भूतॊके कार्य क्रमशः इस प्रकार हैं-अवकाश, चेष्टा, पाक, संग्रह और धारण। वायुमें न शीत स्पर्श है न उष्ण, जलमें शीतल स्पर्श है, तेजमें उष्ण स्पर्श है, अग्रिमें भास्वर शुक्लरूप है और जलमें अभास्वर शुक्ल । पृथ्वीमें शुक्ल आदि अनेक वर्ण हैं। रूप केवल तीन भूतोंमें है। जलमें केवल मधुर-रस है और पृथ्वीमें छ: प्रकारका रस है। पृथ्वीमें दो प्रकारको गन्ध कही गयो है-सुरभि तथा असुरभि । तन्मात्राओंमें उनके भूतोंके ही गुण हैं। करण और पोषण यह भूतसमुदायकी विशेषता है। परमात्मतत्त्व निर्विशेष है। ये पाँचों भूत सब ओर व्याप्त हैं। सम्पूर्ण चराचर जगत् पञ्चभूतमय है। शरीरमें जो इन पाँचों भूतोंका संनिवेश है, उसका निरूपण किया जाता है। देहके भीतर जो हड्डी, मांस, केश, त्वचा, नख और दाँत आदि है, वे पृथ्वीके अंश हैं। मूत्र, रक्त, कफ, स्वेद और शुक्र आदिमें जलकी स्थिति है। हृदयों, नेत्रोंमें और पित्तमें तेजको स्थिति है। क्योंकि वहाँ उसके उष्णत्व और प्रकाश आदि धोका दर्शन होता है। शरीरमें प्राण आदि वृत्तियोंके भेदसे वायुको स्थिति मानी गयी है। सम्पूर्ण नाड़ियों तथा गर्भाशयमें आकाशतत्त्व व्याप्त है। कलासे लेकर पृथ्वीपर्यन्त यह तत्त्वसमुदाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका साधन है। प्रत्येक शरीरमें भी यह नियत है। भोगभेदसे इसका निशय किया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पुरुषमे नियति कला आदि तत्त्व कर्मवश पास हुए सम्पूर्ण शरोरोने विचरते हैं। यह मायेब पाश' कहलाता है। जिससे यह सम्पूर्ण जगत् आता है। पृथ्वीसे लेकर कलापर्यत सम्पूर्ण जल समवाय अराजमार्ग माना गया है
(अब निरोध-शक्तिज पाशका वर्णन है-) भूमण्डलमें वह स्थावर-जङ्गमरूपसे विद्यमान है। पर्वत और वृक्ष आदिको स्थावर कहते हैं। जङ्गमके तीन भेद हैं-स्वेदज, अण्डज और जरायुज चराचर भूतोंमें चौरासी लाख योनियाँ हैं। उन सबमें भ्रमण करता हुआ जीव कभी कर्मवश मनुष्य-शरीर प्राप्त कर लेता है, जो सबसे उत्तम और सम्पूर्ण पुरुषार्थोंका साधक है। उसमें भी भारतवर्ष में ब्राह्मण आदि द्विजोंके कुलमें तो महान् पुण्यसे ही जन्म होता है। ऐसा जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। जन्म इस प्रकार होता है। पहले स्त्री- पुरुषका संयोग होता है, फिर रज-वीर्यके योगसे एक विन्दु गर्भाशयमें प्रवेश करता है। यह विन्दु द्वयात्मक होता है इसमें स्त्री और पुरुष-दोनोंके रज-वीर्यका सम्मिश्रण होता है। उस समय रजको अधिकता होनेपर कन्याका जन्म होता है और वीर्यकी मात्रा अधिक होनेपर पुत्रकी उत्पत्ति होती है। उसमें मल, कर्म आदि पाशसे बँधा हुआ कोई आत्मा जीवभावको प्राप्त होता है, वह (मल, माया और कर्म त्रिविध पाशसे युक्त होनेके कारण) 'सकल' कहा गया है। गर्भ में माताके खाये हुए अन्न-पान आदिसे पोषित होकर उसका शरीर पक्ष मास आदि कालसे बढ़ता रहता है। उसका शरीर जरायुसे ढका होता है और अनेक प्रकारके दु:ख आदिसे उसे पीड़ा पहुँचती रहती है। इस प्रकार गर्भमें स्थित जीव अपने पूर्वजन्मके शुभाशुभ कर्मोका स्मरण करके बार-बार दु:खमग्र एवं पीड़ित होता रहता है। फिर समयानुसार वह बालक स्वयं पीड़ित होकर माताको भी पीड़ा देता हुआ नीचे मुँह किये योनियन्त्रसे बाहर निकलता है। बाहर आकर वह क्षणभर निश्चेष्ट रहता है। फिर रोना चाहता है। तदनन्तर क्रमश: प्रतिदिन बढ़ता हुआ बाल, पौगण्ड आदि अवस्थाओंको पार करता हुआ युवावस्था में जा पहुँचता है। इस लोकसें देहधारियोंके शरीरका इसी क्रमसे प्रादुर्भाव होता है। जो सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेवाले दुर्लभ मानव-जीवनको पाकर अपने आत्माका उद्धार नहीं करता, उससे बढ़कर पापी यहाँ कौन है? आहार, निद्रा, भय और मैथुन-यह सम्पूर्ण पशु आदि जीवोंके लिये सामान्य कहा गया है। जो मूर्ख इन्हीं चार बातोंमें फंसा हुआ है, वह आत्महत्यारा है। अपने बन्धनका उच्छेद करना यह मनुष्योंका विशेष धर्म है।
बन्धनाशका उपाय
पाशबन्धनका विच्छेद दीक्षासे ही होता है, अतः बन्धनका विच्छेद करनेके लिये मन्त्रदीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। दीक्षा एवं ज्ञान-शक्तिसे अपने बन्धनका नाश करके शुद्ध आत्मा नामसे स्थित हुआ पुरुष निर्वाणपद (मोक्ष)-को प्राप्त होता है। जो अपनी शक्तिस्वरूपा दृष्टि से भगवान् शिवका ध्यान एवं दर्शन करता है और शिवमन्त्रोंसे उनकी आराधनामें तत्पर रहता है, वह अपना और दूसरोंका हितकारी है। शिवरूपी सूर्यको शक्तिरूपी किरणसे समर्थ हुई चैतन्यदृष्टिके द्वारा पुरुष आवरणको अपने में लीन करके शक्ति आदिके साथ शिवका साक्षात्कार करता है। अन्त:करणकी जो बोध नामक वृत्ति है, वह निगड (बेड़ी) आदिकी भांति पाशरूप होनेके कारण महेश्वरको प्रकाशित करने में समर्थ नहीं होती। दीक्षा हो पाशका उच्छेद करनेमें सर्वोत्तम हेतु है, अत: शास्त्रोक्त विधिसे मन्त्रदीक्षाका आचरण करना चाहिये। दीक्षा लेकर अपने वर्णके अनुरूप सदाचारमें तत्पर रहकर नित्य-नैमित्तिक कर्मोका अनुष्ठान करना चाहिये। अपने वर्ण तथा भापम सम्बन्धी आचारोना मनसे भी लजन न करे। जो मानव जिस आषम दीक्षित होकर दीक्षा ले, उसी में रहे और उसीके धोका निरन्तर पालन करे। इस प्रकार किये हुए कर्म भी बन्धनकारक नहीं होते। मन्त्रानुननित एक ही कर्म फलदायक होता है। दीक्षित पुरुष जिन-जिन लोकोंके भोगोंकी इच्छा करता है, मन्त्राराधनकी सामयसे वह उन सबका उपभोग करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य दीक्षा ग्रहण करके नित्य और नैमित्तिक काँका पालन नहीं करता, उसे कुछ कालतक पिशाचयोनिमें रहना पड़ता है। अतः दीक्षित पुरुष नित्य नैमित्तिक आदि कर्म अवश्य करे। नित्य-नैमित्तिक आचारका पालन करनेवाले मनुष्यको उसकी दीक्षामें त्रुरि न आनेके कारण तत्काल मोक्ष प्राप्त होता है। दीक्षाके द्वारा गुरुके स्वरूपमें स्थित होकर भगवान् शिव सबपर अनुग्रह करते हैं। जो लोक परलोकके स्वाध आसक्त होकर कृत्रिम गुरुभक्तिका प्रदर्शन करता है, वह सब कुछ करनेपर भी विफलताको ही प्राप्त होता है और उसे पग-पगपर प्रायशितका भागी होना पड़ता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुभक्तिमें तत्पर है, उसे प्रायश्चित्त नहीं प्रास होता और पग परापर सिद्धि लाभ होता है। यदि शिष्य गुरुभक्तिसे सम्पन और सर्वस्व समर्पण करनेवाला हो तो उसके प्रति मिथ्या मन्त्रका प्रयोग करनेवाला गुरु प्रायश्चित्तका भागी होता है*। (पूर्व0 अध्याय)
इस 'तृतीय पाद' में अधिकांश सकाम अनुष्ठानोंका प्रसङ्ग है। इसमें देवताओंक तथा भावान्के विभिन्न स्वरूपोंके ध्यान-पूजनका निरूपण है तथा आराधनकी सुन्दर-सुन्दर विधियों बतलायी गयी हैं। उन विधियकि अनुसार असा विश्वासपूर्वक अनुष्ठान करने से रिलखित फल अवश्य मिलता है। जैसे विविध तापोंकी निति तथा इष्ट्र पदार्थों की प्राप्तिके लिये अन्यान्य आधिभौतिक साधन है, वैये ही ये आधिदैविक साधन भी है एवं ये भौतिक साधनों की अपेक्षा अधिक निर्दोष तथा सहज हैं और प्रतिब-भकका नाश करके नवीन प्रारक निर्माण हेतु कौनके कारण पे तनकी अर्पणा अधिक लाभप्रद हैं ही। और स्वयं भगवानका ती सकाम आराधन करनेपर (यदि चे उनित समय ती काममा पूर्ति करने अथवा पर्ति न करके ११) अन्त:करणकी शुधिद्वारा आता मागती
प्राप्ति करा देते हैं, उस दृष्टि यस प्रकार निभाय ही सही उपादेयता है।