बारह महीनों के चतुर्थी-व्रतोंकी विधि और उनका माहात्म्य

सनातनजी कहते हैं- ब्रह्मन् ! सुनो, अब मैं तुमचतुर्थीकत बतलाता है, जिनका पालन करके स्त्री और पुरुष मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेते रे। तमासकी चतुर्थाको बासुदेवस्वरूप गणेशजीको भलीभांति पूजा करके ब्राह्मणको सवर्ण दक्षिणा दिनसमा सम्पूर्ण देवताओका वन्दनीय हो भगवान विष्णुक लोक जाता है। वैशाखको चातुर्मासंकर्षण गणेशको पूजा करके विधिज्ञ पुसमाधानीको शब दान करे तो वह संकर्षणलोकमें जाकर अनेक कल्पोंतक आनन्दका अनुभव करता है। ज्येष्ठ मासकी चतुर्थीको प्रद्युम्परूपी गणेशका पूजन करके ब्राह्मणसमूहको फल-मूलका दान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है। आषाढ़की चतुर्थीको अनिरुद्धस्वरूप गणेशको पूजा करके संन्यासियाँको बोका पात्र दान करनेसे मनुष्य मनोवालि पल पाता है। भारकी चतुर्थीको एक दूसरा परम तसत होता है, जिसे 'सतीवत' कहतेस प्रतका पालन करके की गणेशमाता पार्वतीके लोकमें जाकर उन्हीं के समान आनन्दकी भागिनी होती है। इसी प्रकार आषाढ़की चतुर्थीको एक दूसरा कल्याणकारी व्रत होता है, क्योंकि वह तिथि रथन्तर कल्पका प्रथम दिन है। उस दिन मनुष्य श्रद्धापूत हृदयसे विधिपूर्वक गणेशजीकी पूजा करके देवताओंके लिये दुर्लभ फल भी प्राप्त कर लेता है। मुने! श्रावणकी चतुर्थीको चन्द्रोदय होनेपर विधिों में श्रेष्ठ विद्वान् गणेशजीको अर्घ्य प्रदान करे। उस समय गणेशजीके स्वरूपका ध्यान करना चाहिये। ध्यानके पश्चात् आवाहन आदि सम्पूर्ण उपचारोंसे उनका पूजन करे। फिर लड्डूका नैवेद्य अर्पण करे, जो गणेशजीके लिये प्रीतिदायक है। इस प्रकार व्रत पूरा करके स्वयं भी प्रसादस्वरूप लड्डू खाय तथा रातमें गणेशजीका पूजन करके भूमिपर ही सुखपूर्वक सोये। इस व्रत के प्रभाव से वह लोक मे मनोवञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और परलोकमें भी गणेशजीका पद पाता है। तीनों लोकों में इसके समान दूसरा  कोई व्रत नहीं है।

तदनन्तर भाद्रपद कृष्णा चतुर्थीको बहुलागणेशका गन्ध, पुष्प, माला और घास आदिके द्वारा यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् परिक्रमा करके सामर्थ्य हो तो दान करे। दानकी शक्ति न हो तो इस बहुला गौको नमस्कार करके विसर्जन करे। इस प्रकार पाँच, दस या सोलह वर्षोंतक इस व्रतका पालन करके उद्यापन करे। उस समय दूध देनेवाली गौका दान करना चाहिये। इस व्रतके प्रभावसे मनुष्य मनोरम भोगोंका उपभोग करके देवताओंद्वारा सत्कृत हो गोलोकधाममें जाता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थीको सिद्धिविनायक-व्रतका पालन करे। इसमें आवाहन आदि समस्त उपचारोंद्वारा गणेशजीका पूजन करना चाहिये। पहले एकाग्रचित्त होकर सिद्धिविनायकका ध्यान करे। उनके एक दाँत है। कान सूपके समान जान पड़ता है। उनका मुँह हाथीके मुखके समान है। वे चार भुजाओंसे सुशोभित हैं। उन्होंने हाधोंमें पाश और अंकुश धारण कर रखे हैं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान देदीप्यमान है। उनके इक्कीस नाम लेकर उन्हें भक्तिपूर्वक इक्कीस यत्ते समर्पित करे। अब तुम उन नामों को श्रवण करो। 'समुखाय नमः' कहकर शमीपत्र, 'गणाधीशाय नमः' से भैंगरैयाका पत्ता, 'उमापुत्राय नमः' से बिल्वपत्र, 'गजमुखाय नमः' से दुर्वादल, 'लम्बोदराय नमः' से बेरका पत्ता, 'हरसूनवे नमः' से धतूरका पत्ता, 'शूर्पकांय नमः' से तुलसीदल, 'वक्रतुण्डाय नमः' से संमका पत्ता, 'गुहाग्रजाय नमः' से अपामार्गका पत्ता, 'एकदन्ताय नमः' से बनभंटा या भटकटैयाका पत्ता, 'हेरम्याय नमः' से सिंदूर (सिंदूरचर्व अथवा सिंदूर-वृक्षका पत्ता), 'चतुर्होत्रे नम: ' से तेजपात और 'सर्वेश्वराय नमः' से अगस्त्यका पत्ता चढ़ावे*। यह सब

*यहाँ इक्कोस नामोंसे इक्कीस पत्ते अर्पण करने की बात लिखकर तेरह नामोंका ही उल्लेख किया गया है। संग्रह ग्रन्थों में उपर्युक्त नामोंके अतिरिक्त आठ नाम और आठ प्रकारके पत्तों का निर्देश इस प्रकार किया गया

गणेशजीकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। तत्पश्चात् दो दूर्वादल लेकर गन्ध, पुष्प और अक्षतके साथ गणेशजीपर चढ़ावे। इस प्रकार पूजा करके भक्तिभावसे नैवेद्यरूपमै पाँच लड्डू निवेदन करे। फिर आचमन कराकर नमस्कार और प्रार्थना करके देवताका विसर्जन करे। मुने! सब सामग्रियोसहित गणेशजीकी स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्यको अर्पित करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। नारद! इस प्रकार पाँच वर्षांतक भक्तिपूर्वक गणेशजीकी पूजा और उपासना करनेवाला पुरुष इस लोक और परलोकके शुभ भोगोंको प्राप्त कर लेता है। इस चतुर्थीकी रातमें कभी चन्द्रमाकी ओर न देखे। जो देखता है उसे झूठा कलङ्क प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। यदि चन्द्रमा दीख जाय तो उस दोषको शान्तिके लिये इस पौराणिक मन्त्रका पाठ करे-

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

(ना० पूर्व० ११३। ३९)

'सिंहने प्रसेनको मारा और सिंहको जाम्बवान्ने मार गिराया। सुकुमार बालक! तू रो मत। यह स्यमन्तक अब तेरा ही है।' आश्विन शुक्ला चतुर्थीको पुरुषसूलद्वारा षोडशोपचारसे कपर्दीश विनायकको पूजा करे। कार्तिक कृष्ण चतुर्थीको 'ककांचतुर्थी' (करवा चौथ)-का व्रत बताया गया है। इस व्रतमें केवल स्वियोंका ही अधिकार है। इसलिये उसका विधान बताया है-स्त्रो स्नान करके वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो गणेशजीको पूजा करे। उनके आगे पकवानसे भरे हुए दस करले रखे और भकिसे को। समर्थपके समय यह कहना चाहिये कि भगवान् कपर्दि गणेश मुझपर प्रसत्र हों।' तत्पश्चात् सुवासिनी स्त्रियों और ब्राह्मणोंको इच्छानुसार आदरपूर्वक उन करवोंको बाँट दे। इसके बाद रातमें चन्द्रोदय होनेपर चन्द्रमाको विधिपूर्वक अर्घ्य दे। व्रतकी पूर्तिके लिये स्वयं भी मिष्टान्न भोजन करे। इस व्रतको सोलह या बारह वर्षोंतक करके नारी इसका उद्यापन करे। उसके बाद इसे छोड़ दे अथवा स्त्रीको चाहिये कि सौभाग्यकी इच्छासे वह जीवनभर इस व्रतको करती रहे; क्योंकि स्त्रियेकि लिये इस व्रतके समान सौभाग्यदायक व्रत तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है।

मुनीश्वर ! मार्गशीर्ष शुक्ला चतुर्थीसे लेकर एक वर्षतकका समय प्रत्येक चतुर्थीको एकभुक्त (एक समय भोजन) करके बितावे और द्वितीय वर्ष उक्त तिथिको केवल रातमें एक बार भोजन करके व्यतीत करे । तृतीय वर्षमें प्रत्येक चतुर्थीको अयाचित (बिना माँगे मिले हुए) अन्न एक बार खाकर रहे और चौथा वर्ष उक्त तिथिको उपवासपूर्वक रहकर बिताये। इस प्रकार विधिपूर्वक व्रतका पालन करते हुए क्रमश: चार वर्ष पूरे करके अन्तमें व्रत-नान करे। उस समय महाव्रती मानव सोनेकी गणेशमूर्ति बनवावे। यदि असमर्थ हो तो वर्णक (हल्दी-चूर्ण) द्वारा ही गणेश प्रतिमा बना ले। तदनन्तर विविध रंगोंसे धरतीपर सुन्दर दलोंसहित कमल अङ्कित करके उसके ऊपर कलश स्थापित करे। कलशके ऊपर ताँबेका पात्र रखे। उस पात्रको सफेद चावलसे भर दे। चावलके ऊपर युगल वस्त्रसे आच्छादित गणेशजीको विराजमान करे। तदनन्तर गन्ध आदि सामग्रियोंद्वारा उनकी पूजा करे। फिर गणेशजी प्रसन्न हों, इस उद्देश्यसे लड्डूका नैवेद्य अर्पण करे। रातमें गीत, वाद्य और पुराण-कथा आदिके द्वारा जागरण करें। फिर निर्मल

है- 'विकटाय नमः' से कनेरका पता, 'इभतुण्डाय नमः' से अश्मातपत्र, 'विनायकाय नमः' से आकका पत्ता, 'कापिलाय नमः' से अर्जुनका पता, 'बटवे नमः' से देवदास्का पत्ता, 'भालचन्द्राय नमः' से मरुआका पत्ता, 'सुराग्रजाय नमः" से गान्धारी-पत्र और 'सिद्धिविनायकाय नमः' से केतकी-पत्र अर्पण करे।

प्रभात होनेपर स्नान करके तिल, चावल, जौ, पीली सरसों, घी और खाँड़ मिली हवनसामग्रीसे विधिपूर्वक होम करे। गण, गणाधिप, कूष्माण्ड, त्रिपुरान्तक, लम्बोदर, एकदन्त, रुक्मदंष्ट्र, विघ्रप, ब्रह्मा, यम, वरुण, सोम, सूर्य, हुताशन, गन्धमादी तथा परमेष्ठी-इन सोलह नामोंद्वारा प्रत्येकके आदिमें प्रणव और अन्तमें चतुर्थी विभक्ति और 'नमः' पद लगाकर अग्निमें एक-एक आहुति दे। इसके बाद 'वक्रतुण्डाय हुम्' इस मन्त्रके द्वारा एक-साँ आठ आहुति दे। तत्पश्चात् व्याहृतियोंद्वारा यथाशक्ति होम करके पूर्णाहुति दे। दिक्पालोंका पूजन करके चौबीस ब्राह्मणोंको लड्डू और खीर भोजन करावे। इसके बाद आचार्यको दक्षिणासहित सवत्सा गौ दान करे एवं दूसरे ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भूयसी दक्षिणा दे। फिर प्रणाम और परिक्रमा करके उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी प्रसन्नचित्त होकर भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। मनुष्य इस व्रतका पालन करके गणेशजीके प्रसादसे इहलोकमें उत्तम भोग भोगता और परलोकमें भगवान् विष्णुका सायुज्य लाभ करता है। नारद! कुछ लोग इसका नाम 'वरव्रत' कहते हैं। इसका विधान भी यही है और फल भी उसके समान ही है। पौष मासकी चतुर्थीको भक्तिपूर्वक विनेश्वर गणेशकी प्रार्थना करके एक ब्राह्मणको लड्डू भोजन करावे और दक्षिणा दे। मुने! ऐसा करनेसे व्रती पुरुष धन-सम्मत्तिका भागी होता है।

माघ कृष्णा चतुर्थीको 'संकष्टवत' बतल्पया जाता है। उसमें उपवासका संकल्प लेकर वती पुरुष सबेरेसे चन्द्रोदयकालतक नियमपूर्वक रहे। मनको काबूमें रखे। चन्द्रोदय होनेपर मिट्टीको गणेशमूर्ति बनाकर उसे पीदेपर स्थापित करे गपोशजीके साथ उनके आयुध और वाहन भी होने चाहिये। मूर्तिी गणेशजीको स्थापना करके सोशोपचारसे विधिपूर्वक उनका पूजन को फिर मोदन तथा पुरुष जोर दिलाके लाइड्का नैवेद्य अर्पण करे। तत्पश्चात् ताँबेके पात्रमें ताल चन्दन, कुश, दूर्वा, फूल, अक्षत, शमीपत्र दधि और जल एकत्र करके चन्द्रमाको अर्घ्य दे। उस समय निम्राङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे-

गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।

गृहाणायं मया दतं गणेशप्रतिरूपक।

(ना० पूर्व० ११३। ७०)

'गगनरूपी समुद्रके माणिक्य चन्द्रमा दक्षकन्या रोहिणीके प्रियतम) गणेशके प्रतिविम्ब! आप मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार कौजिये।' इस प्रकार गणेशजीको यह दिव्य तथा पापनाशक अर्घ्य देकर यथाशक्ति उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन करानेके पश्चात् स्वयं भी उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे। ब्रह्मन् !इस प्रकार कल्याणकारी 'संकष्टवत' का पालन करके मनुष्य धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। वह कभी कष्टमें नहीं पड़ता। माघ शुक्ला चतुर्थीको परम उत्तम गौरीव्रत किया : जाता है। उस दिन योगिनी गणोंसहित गौरीजीकी पूजा करनी चाहिये। मनुष्यों और उनमें भी विशेषतः स्त्रियोंको कुन्द, पुष्प, कुडम, लाल न सूत्र, लाल फूल, महावर, धूप, दीप, बलि, गुड़, अदरख, दूध, खीर, नमक और पालक आदिसे  गौरीजीकी पूजा करनी चाहिये। अपनी सौभाग्यवृद्धिके लिये सौभाग्यवती स्त्रियों और उत्तम ब्राह्मणों की ने भी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं भी भोजन करे। विप्रवर! यह सौभाग्य तथा आरोग्य बढ़ानेवाला 'गौरीव्रत' की है। स्त्रियों और पुरुषोंको प्रतिवर्ष इसका पालन करना चाहिये। कुछ लोग इसे 'दुपिढवत' कहते की हैं। किन्हीं-किन्हींके मतमें इसका नाम 'कुण्ड- व्रत' है। कुछ दूसरे लोग इसे 'ललितावत' अथवा 'शान्तिव्रत' भी कहते हैं। मुने। इस के तिथिमें किया हुआ खान, दान, जप और होम सब कुछ गणेशजीकी कृपासे सदाके लिये का सहसगुना हो जाता है। फाल्गुन मासकी चतुर्थीको

मङ्गलमय 'दुण्डिराजव्रत' बताया गया है। उस दिन तिलके पीठेसे ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य स्वयं भी भोजन करे। गणेशजीकी आराधनामें संलग्न होकर तिलोंसे ही दान, होम और पूजन आदि करनेपर मनुष्य गणेशके प्रसादसे सिद्धि प्राप्त कर लेता है। मनुष्यको चाहिये कि सोनेकी गणेशमूर्ति बनाकर यत्रपूर्वक उसकी पूजा करे और श्रेष्ठ ब्राह्मणको उसका दान कर दे। इससे समस्त सम्पदाओंकी वृद्धि होती है। विप्रेन्द्र! जिस किसी मासमें भी चतुर्थी तिथि रविवार या मङ्गलवारसे युक्त हो तो वह विशेष फल देनेवाली होती है। शुक्ल या कृष्ण पक्षकी सभी चतुर्थी तिथियोंमें भक्तिपरायण पुरुषोंको देवेश्वर गणेशका ही पूजन करना चाहिये।