काशीके तीर्थ एवं शिवलिङ्गके दर्शन-पूजन आदिकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं- सुन्दरि! संगमेश्वर पीठके वायव्य भागमें राजा सारके द्वारा स्थापित किया हुआ चतुर्मुख शिवलिङ्ग है। उससे वायव्य कोणमें भद्रदेह नामक तालाब है, जो गौओक दूधसे भरा गया है। वह सम्पूर्ण पातकोंका नाश करनेवाला है। मोहिनी! सहस्रों कपिला गौओंक विधिपूर्वक दान करनेका जो फल है, उसे मनुष्य वहाँ स्नान करनेमात्रसे पा लेता है। जब पूर्वाभाद्रपद्य नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा हो, उस समय वहाँके लिये अतिशय पुण्यकाल माना गया है, जो अश्वमेध- यज्ञका फल देनेवाला है। वहीं श्मशानभूमिमें विख्यात देवी भीष्मचण्डिकाका दर्शन होता है। उनकी पूजा करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। अन्तकेश्वरसे पूर्व, सर्वेश्वरके दक्षिणभागमें और मातलीश्वरसे उत्तर दिशामें कृत्तिवासेश्वर नामक शिवलिङ्ग है। देवि! कृत्तिवासेश्वरका दर्शन और पूजन करके मनुष्य एक ही जन्ममें शिवके समीप परम गति प्राप्त कर लेता है। सत्ययुगमें पहले उसका नाम 'त्र्यम्बकेश्वर' था, त्रेतामें वही 'कृत्तिवासेश्वर' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। द्वापरमें उन्हीं भगवान् शिक्का नाम 'महेश्वर' कहा जाता है तथा कलियुगमें सिद्ध पुरुष उन्हें 'हस्तिपालेश्वर' कहते हैं। यदि सनातन मोक्षप्रद तारकज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो बारंबार भगवान् कृत्तिवासेश्वरका दर्शन करना चाहिये। उन देवाधिदेवका दर्शन करनेसे ब्रह्महत्यारा भी पापमुक्त हो जाता है। उनका स्पर्श और पूजन करनेपर सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है। जो उन सनातन महादेवजीका बड़ी अद्धासे पूजन करते हैं और फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशीको एकाग्रचित्त हो फूल, फल, बिल्वपत्र, उत्तम और साधारण भश्यपदार्थ दूध, दही, घी, मधु और जलसे उस उत्तम शिवलिगका अर्चन तथा अमरूके डिडिम घोष, नमस्कार, नृत्य, गीत, अनेक प्रकारके मुखवाद्य, स्तोत्र एवं मन्त्रीद्वारा शुभस्वरूप भगवान् शिक्को तृप्त करते हैं और मोहिनी! एक रात उपवास करके परम भक्तिभावसे पूजन करके श्रीमहादेवजीको संतुष्ट करते हैं, वे परम पदको प्राप्त कर लेते हैं।

जो चैत्र मासकी चतुर्दशीको परमेश्वर शिवकी पूजा करता है, वह धनके स्वामी कुबेरके समीप जाकर उन्हींकी भाँति क्रीड़ा करता है। जो वैशाखकी चतुर्दशीको पवित्रचित्तसे भगवान् शिवकी अर्चना करता है, वह स्वामिकार्तिकेयके लोकमें जाकर उन्हींका अनुचर होता है। जो ज्येष्ठ मासकी चतुर्दशीको श्रद्धापूर्वक भगवान् शङ्करकी पूजा करता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है और प्रलयकाल आनेतक वहाँ निवास करता है। भद्रे ! जो आषाढ़ मासकी चतुर्दशीको पवित्रभावसे कृत्तिवासेश्वर शिवकी पूजा करता है, वह सूर्यलोकमें जाकर इच्छानुसार क्रीड़ा करता है। जो श्रावणकी चतुर्दशीको वहाँ प्रकट हुए कामेश्वर शिवकी पूजा करता है, उसे भगवान् शिव वरुणलोक देते हैं। जो भाद्रपद मासकी चतुर्दशीको भाँति-भांतिके पुष्यों और फलोंद्वारा भगवान् शङ्करकी पूजा करता है, उसे इन्द्रका सालोक्य प्राप्त होता है। जो आश्विन कृष्णा चतुर्दशीको भगवान् शिवको पूजा करता है, वह पितरोंके लोकमें जाता है। जो कार्तिक मासको चतुर्दशीको देवेश्वर महादेवजीकी पूजा करता है, वह चन्द्रलोकमें जाकर जबतक इच्छा हो, तबतक वहाँ क्रीड़ा करता है। जो मार्गशीर्ष कृष्णा चतुर्दशीको पिनाकधारी भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है और वहाँ अनन्त कालतक क्रीड़ा-सुखमें निमग्न रहता है। जो पौष मासमें प्रसन्नचित्त होकर भगवान् शिवकी अर्चना करता है, वह नैर्ऋत्यलोकमें जाता है और निर्ऋतिके साथ ही आनन्दका अनुभव करता है। जो माघ मासमें सुन्दर पुष्प एवं मूल-फल आदिके द्वारा भगवान् शङ्करकी आराधना करता है, वह संसार- सागरका त्याग करके भगवान् शिवके लोकमें जाता है। अत: यदि शिवधाममें जानेकी इच्छा हो तो यत्नपूर्वक कृत्तिवासेश्वरका पूजन तथा अविमुक्त-क्षेत्रमें निवास करना चाहिये। काशीमें व्यासेश्वरके पश्चिम घण्टाकर्ण (या कर्णघण्या) नामक सरोवर है। देवि! उस सरोवरमें नान करके व्यासेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्यकी जहाँ- कहीं भी मृत्यु हो, उसे काशीमें मरनेका ही फल प्राप्त होता है। मोहिनी! यदि मनुष्य दण्डघात- तीर्थमें सान करके अपने पितरोंका तर्पण करे तो उसके नरक-निवासी पितर वहाँसे निकलकर पितृलोकमें चले जाते हैं। देवि! जो पापकर्मी मनुष्य पिशाचयोनिको प्राप्त हो गये हैं, उनके लिये यदि वहाँ पिण्डदान किया जाय तो उनका उस पिशाच-शरीरसे उद्धार हो जाता है। उस घातके दर्शनसे मानव कृतकृत्य हो जाता है। वहीं लोकको कल्याण प्रदान करनेवाली ललितादेवी विद्यमान हैं। यह मनुष्य जन्म दुर्लभ है। विद्युत्पातके समान चञ्चल है, उसे पाकर जिसने ललितादेवीका दर्शन कर लिया, उसे जन्मका भय कहाँसे हो सकता है ? पृथ्वीको परिक्रमा करके मनुष्य जिस फलको पाता है, वही फल उसे काशीमें ललितादेवौके दर्शनसे मिल जाता है। प्रत्येक मासकी चतुर्थीको उपवास करके ललितादेवीकी पूजा और उनके समीप रातमें जागरण करे। देवि! ऐसा करनेसे उसे सम्पूर्ण समृद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मोहिनी! तीनों लोकोंद्वारा पूजित नलकूबरकेश्वर सब सिद्धियोंके दाता हैं। उनकी पूजा करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। देवि। उनके दक्षिणभागमें मणिकर्णी नामसे प्रसिद्ध शिवलिङ्ग है। उसके आगे एक महान् तीर्थ (जलाशय) है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। भगवान् मणिकर्णीश्वर कुण्डमें विराजमान हैं। उनका दर्शन, नमस्कार और पून करनेसे फिर गर्भमें निवास नहीं करना पड़ता। मणिकर्णीश्वरके दक्षिण पार्श्वमें गङ्गाजीके जलमें स्थापित परम उत्तम गङ्गेश्वरलिङ्ग है। उसकी पूजा करनेसे देवलोककी प्राप्ति होती है। मोहिनी! अब मैं काशीके दूसरे मन्दिरका वर्णन करता है, जहाँ देवाधिदेव महादेवजीका रुचिर एवं अभीष्ट स्थान है। सुभगे। पूर्वकालमें कुछ राक्षस भगवान् चन्द्रमौलिका शुभ लिङ्ग साथ ले अन्तरिक्ष-मार्गसे बड़ी उतावलीके साथ जा रहे थे। जिस समय वह शिवलिङ्ग इस काशी- क्षेत्रमें पहुँचा, उस समय महादेवजीने सोचा- 'क्या उपाय किया जाय, जिससे मेरा अविमुक्तक्षेत्रसे वियोग न हो।' शुभे! देवेश्वर भगवान् शिव इस बातका विचार कर ही रहे थे कि उस स्थानपर मुर्गेका शब्द सुनायी दिया। देवि! उस शब्दको सुनकर राक्षसोंके मनमें भय समा गया और वे प्रात:काल उस शिवलिङ्गको वहीं छोड़कर वहाँसे भाग गये। राक्षसोंके चले जानेपर वहीं अत्यन्त रुचिर एवं सुन्दर स्थानमें वह लिङ्ग स्थित हुआ। साक्षात् देवदेव भगवान् शिव उस अविमुक्तक्षेत्रमें उस शिवलिङ्गके रूपमें विराजमान हुए। इसीलिये उसे 'अविमुक्त' कहते हैं। उस समय देवताओंने महादेवजीका नाम 'अविमुक्त' रख दिया, जो परम पवित्र अक्षरोंसे युक्त है। जो प्राणी वहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे स्थावर हों या जङ्गम, उन सबको वह शिवलिङ्ग मोक्ष देनेवाला है। भगवान् अविमुक्तके दक्षिण भागमें एक सुन्दर बावड़ी है, उसका जल पौनेसे इस लोकमें पुनरावृत्ति नहीं होती। जिन मनुष्योंने उक्त बावड़ीका जल पीया है, वे कृतार्थ हैं। उन्हें निश्चय ही तारक ज्ञान प्राप्त होता है। मनुष्य बावड़ीक जलमें खान करके यदि दण्डकेश्वर एवं अविमुक्तेश्वरका दर्शन करे तो वह क्षणमात्रमें कैवल्य-मोक्षका भागी। होता है। काशीपुरी, श्मशानघाट, अविमुलस्थान और अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य शिवगणोंका अधिपति होता है। अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करलेसे मानव सम्पूर्ण पापों, रोगों तथा पशुपाश (जीवके अज्ञानमय बन्धन)-से मुक्त हो जाता है। अविमुक्तके आगे एक शिवलिङ्ग स्थित है, जिसका मुख पश्चिमकी ओर है। भद्रे! वह 'लक्षणेश्वर नामसे विख्यात है। उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है। देवि! उसके उत्तरमें चतुर्मुख लिङ्ग है, जो चतुर्थेश्वरके-नामसे प्रसिद्ध है। वह श्रेष्ठ शिवलिङ्ग पाप-भयका निवारण करनेवाला है। वाराणसी नामक क्षेत्र पृथ्वीपर प्राणियोंके लिये मुक्तिदायक है। उसमें भी अविमुक्तेश्वर तो जीवन्मुक्त कहा गया है (वह जीवन्मुक्ति देनेवाला है)। काशी में जहाँ-कहीं भी जो रह चुका है, उसके लिये गणपति-पदकी प्राति बतायी गयी है और जो वहाँ प्राण-त्याग करता है, यह आत्यन्तिक मोक्षको प्रास करता है। उपर्युक्त सीमाके भीवरी क्षेत्रमें प्रथम आवरण बताया गया है। द्वितीय आवरणमें पूर्व दिशामें मणिकर्णिका है। उस स्थानमें सात करोड़ शिवलिङ्ग विद्यमान हैं। उनके दर्शनमात्रसे यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। ये सब सिद्ध लिन हैं। काशीमें जो पवित्र कूप, सरोवर, बावड़ी, नदी और कुण्ड कहे गये हैं, वे ही सिद्धपीठ है। जो एकाग्रचित्त हो इन सबमें स्नान करेगा और वहाँके शिवलिङ्गोंका दर्शन करेगा, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं ले सकता। पृथ्वीपर और अन्तरिक्षमें जो-जो तीर्थ हैं, उनमें मुख्य तीर्थोंका मैंने तुमसे वर्णन किया है। वरारोहे ! तीर्थयात्राको सब पापोंका नाश करनेवाली कहा गया है।