नारद महा पुराण
उत्कलदेशके पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी महिमा, राजा इन्द्रद्युम्रका वहाँ जाकर मोक्ष प्राप्त करना
मोहिनी बोली- विप्रवर! मैंने आपके मुखारविन्दसे काशीका उत्तम माहात्म्य सुना। पुराणों में मुनियों और ब्राह्मणोंका यह वर्णन सुना जाता है कि पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुका क्षेत्र मोक्ष देनेवाला है। महाभाग ! अब उस पुरुषोत्तम- क्षेत्रका माहात्म्य कहिये।
पुरोहित वसुने कहा-देवि! सुनो, मैं तुम्हें ब्रह्माजीके द्वारा कहा हुआ पुरुषोत्तम-क्षेत्रका उत्तम माहात्म्य बतलाता हूँ। भारतवर्षमें दक्षिण समुद्र के तटतक फैला हुआ एक उत्कल नामका प्रदेश है, जो स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला है। समुद्रसे उत्तर बिरज मण्डलतकका जो प्रदेश है, वह पुण्यात्माओंका देश है। वह भू-भाग सम्पूर्ण गुणोंसे अलंकृत है। विशालाक्षि! समुद्के उत्तर तटवर्ती उस सर्वोत्तम उत्कल प्रदेशमें सभी पुण्य तीर्थ और पवित्र मन्दिर आदि हैं, जिनका परिचय जानने योग्य है। मुक्ति देनेवाला परम उत्तम एवं पापनाशक पुरुषोत्तम-क्षेत्र परम गोपनीय है। सर्वत्र बालुका आच्छादित भू-भागमें वह नाश करनेवाला पवित्र एवं धर्म और कामकी पूर्ति करनेवाला परम दुर्लभ क्षेत्र दस योजनतक फैला हुआ है। जैसे नक्षत्रोंमें चन्द्रमा और सरोवरोंमें सागर श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त तीर्थो पुरुषोत्तम-क्षेत्र सबसे श्रेष्ठ है। भगवान् पुरुषोत्तमका एक बार दर्शन करके, सागरके भीतर एक बार स्नान करनेसे तथा ब्रह्मविद्याको एक बार जान लेनेसे मनुष्यको गर्भमें नहीं आना पड़ता। देवेश्वर पुरुषोत्तम समस्त जगत् में व्यापक और सम्पूर्ण विश्वके आत्मा हैं। वे जगत्की उत्पत्तिके कारण तथा जगदीश्वर हैं। सब कुछ उन्हीं में प्रतिष्ठित है। जो देवताओं, ऋषियों और पितरों द्वारा सेवित तथा सर्वभोगसम्पन्न है, ऐसे पुण्यात्मा प्रदेशमें निवास करना किसको नहीं अच्छा लगेगा। इससे बढ़कर इस देशकी श्रेष्ठताके विषयमें और क्या कहा जा सकता है? जहाँ सबको मुक्ति देनेवाले जगदीश्वर भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं, उस उत्कल देशमें जो मनुष्य निवास करते हैं, वे देवताओंके समान तथा धन्य हैं। जो तीर्थराज समुद्रके जलमें स्नान करके भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करते है, वे मनुष्य स्वर्गमें निवास करते है।जो उत्कलमें परम पवित्र श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रके भीतर निवास करते हैं, उन उत्तम बुद्धिवाले उत्कलवासियोंका ही जीवन सफल है; क्योंकि वे भगवान् श्रीकृष्णके उस मुखारविन्दका दर्शन करते हैं, जो तीनों लोकोंको आनन्द देनेवाला है। भगवान् का मुख लाल ओष्ठ और प्रसन्नतासे खिले हुए विशाल नेत्रोंसे सुशोभित है। मनोहर भौंहों, सुन्दर केशों और दिव्य मुकुटसे अलंकृत है। सुन्दर कर्णलतासे उसकी शोभा और बढ़ गयी है। उस मुखपर मन्द-मन्द मुसकान बड़ी मनोहर लगती है। दन्तावली भी बड़ी सुन्दर है। कपोलोंपर मनोहर कुण्डल झिलमिला रहे हैं। नासिका, कपोल सभी परम सुन्दर और उत्तम लक्षोंसे सम्पन्न हैं।
देवि! प्राचीन कालकी बात है। सत्ययुगमें इन्द्रके तुल्य पराक्रमी एक राजा थे, जो श्रीमान् 'इन्द्रद्युम्र के नामसे प्रसिद्ध हुए। वे बड़े सत्यवादी, पवित्र, कार्यदक्ष, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, सौभाग्यशाली, शूर, दाता, भोक्ता, प्रिय वचन बोलनेवाले, सम्पूर्ण यज्ञोंके याजक, ब्राहाण-भक्त, सत्य-प्रतिज्ञ, धनुर्वेद तथा वेद-शास्वके निपुण विद्वान् एवं चन्द्रमाकी भाँति मधुर प्रकृतिके थे। राजा इन्द्रद्युम्र भगवान् विष्णुके भक्त, सत्यपरायण, क्रोधको जीतनेवाले, जितेन्द्रिय, अध्यारपषिघातत्पर, न्यायप्राप्त युद्धके लिये उत्सुक तथा धर्मपागण थे। इस प्रकार सम्पूर्ण गुणोंकी खानरूप राजा इन्द्रघुम सारी पृथ्वीका पालन करते थे। एक बार उनके मनमें भगवान् विष्णुकी आराधनाका विचार उठा। वे सोचने लगे-'मैं देवदेव भगवान् जनार्दनकी किस प्रकार आराधना करूँ? किस क्षेत्रमें, किस नदीके तटपर, किस तीर्थमें अथवा किस आश्रम में मुझे भगवान्की आराधना करनी चाहिये?' इस प्रकार विचार करते हुए वे मन-ही-मन समूची पृथ्वीपर दृष्टिपात करने लगे। जो-जो पापहारी तीर्थ हैं, उन सबका मानसिक अवलोकन और चिन्तन करके अन्त में वे परम विख्यात मुक्तिदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रमें गये। अधिकाधिक सेना और वाहनोंके साथ पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाकर राजाने विधिपूर्वक अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया और उसमें पर्याप्त दक्षिणाएँ दीं। तदनन्तर बहुत ऊँचा मन्दिर बनवाकर अधिक दक्षिणाके साथ श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राको स्थापित किया। फिर उन पराक्रमी नरेशने विधिपूर्वक पञ्चतीर्थ करके वहाँ प्रतिदिन स्नान, दान, जप, होम, देवदर्शन तथा भक्तिभावसे भगवान् पुरुषोत्तमकी सविधि आराधना करते हुए देवदेव जगन्नाथके प्रसादसे मोक्ष प्राप्त कर लिया।