जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद-परमार्थका निरुपण तथा ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानका उपदेश

सनन्दनजी कहते हैं-नारदजी! ब्राह्मणका परमार्थयुक्त वचन सुनकर सौवीर-नरेशने विनयसे नम्र होकर कहा।

राजा बोले-विप्रवर! आपने सम्पूर्ण जीवोंमें व्याप्त जिस विवेक-विज्ञानका दर्शन कराया है, वह प्रकृतिसे परे ब्रह्मका ही स्वरूप है। परंतु आपने जो यह कहा कि मैं पालकी नहीं होता हूँ और न मुझपर पालकीका भार ही है। जिसने यह पालकी उठा रखी है, वह शरीर मुझसे भिन्न है। जीवोंकी प्रवृत्ति गुणोंको प्रेरणासे होती है और ये गुण कर्मोसे प्रेरित होकर प्रवृत्त होते हैं। इसमें मेरा कर्तृत्व क्या है? परमार्थके ज्ञाता द्विजश्रेष्ठ! आपको वह बात कानमें पड़ते ही मेरा मन परमार्थका जिज्ञासु होकर उसे प्राप्त करनेके लिये विह्वल हो उठा है। महाभाग द्विज । मैं पहलेसे ही महर्षि कपिलके पास जाकर यह पूछनेके लिये उद्यत हुआ था कि इस जगत्में थेग क्या है. यह मुझे बताइये। किंतु इसके बीच में ही आपने जो ये बातें कही हैं, उन्हें सुनकर मेरा मन परमार्थश्रवणके लिये आपकी ओर दौड़ रहा है। महर्षि कपिलजी सर्वभूतस्वरूप भगवान् विष्णुके अंश हैं और संसारके मोहका नाश करनेके लिये इस पृथ्वीपर उनका आगमन हुआ है-ऐसा मुझे जान पड़ता है। वे ही भगवान् कपिल मेरे हितकी कामनासे यहाँ आपके रूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए हैं, तभी तो आप ऐसा भाषण कर रहे हैं। अतः ब्रह्मन्! मेरे मोहका नाश करनेके लिये जो परम श्रेय हो, वह मुझे बताइये; क्योंकि आप सम्पूर्ण विज्ञानमय जलकी तरंगोंके समुद्र जान पड़ते हैं।

ब्राह्मणने कहा- भूपाल! क्या तुम श्रेयकी ही बात पूछते हो? या परमार्थ जाननेके लिये प्रश्न करते हो? राजन् ! जो मनुष्य देवताकी आराधना करके धन-सम्पत्ति चाहता है, पुत्र तथा राज्य (एवं स्वर्ग)-की अभिलाषा करता है, उसके लिये तो वे ही वस्तुएँ श्रेय हैं; परंतु विवेकी पुरुषके लिये परमात्माकी प्राप्ति ही श्रेय है। स्वर्गलोकरूप फल देनेवाला जो यज्ञ आदि कर्म है, वह भी श्रेय ही है; परंतु प्रधान श्रेय तो उसके फलकी इच्छा न करनेमें ही है। भूपाल ! योगयुक्त तथा अन्य पुरुषोंको भी सदा परमात्माका चिन्तन करना चाहिये, क्योंकि परमात्माका संयोगरूप जो श्रेय है, वही वास्तविक श्रेय है। इस प्रकार श्रेय तो अनेक हैं, सैकड़ों और हजारों प्रकारके हैं; किंतु वे सब परमार्थ नहीं हैं। परमार्थ मैं बतलाता हूँ, सुनो-यदि धन ही परमार्थ होता तो धर्मके लिये उसका त्याग क्यों किया जाता तथा भोगोंकी प्राप्तिके लिये उसका व्यय क्यों किया जाता? नरेश्वर। यदि इस संसारमें राज्य आदिकी प्रातिको परमार्थ कहा जाय तो वे कभी रहते हैं और कभी नहीं रहते हैं; इसलिये परमार्थको भी आगमापायी। मानना पड़ेगा। यदि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञकर्मको तुम परमार्थ मानो तो उसके विषयों में जो कहता है, उसे सुनो। राजन् । कारणभूत मृत्तिकासे जो कर्म उत्पत्र होता है, वह कारणका अनुगमन करनेसे मृत्तिकास्वरूप ही समझा जाता है। इस न्यायसे समिधा, घृत और कुशा आदि विनाशशील द्रव्योंद्वारा जो क्रिया सम्पादित होती है, वह भी अवश्य ही विनाशशील होगी; परंतु विद्वान् पुरुष परमार्थको अविनाशी मानते हैं। जो क्रिया नाशवान् पदार्थोंसे सम्पत्र होती है, वह और उसका फल दोनों निस्संदेह नाशवान् होते हैं। यदि निष्काम-भावसे किया जानेवाला कर्म स्वर्गादि फल न देनेके कारण परमार्थ माना जाय तो मेरे विचारसे वह परमार्थभूत मोक्षका साधनमात्र है और साधन कभी परमार्थ हो नहीं सकता (क्योंकि वह साध्य माना गया है)। राजन् ! यदि आत्माके ध्यानको हौ प पर्व नाम दिया जाय तो वह दूसरोंसे आत्माका भेद करनेवाला है। किंतु परमार्थमें भेद नहीं होता। अत: राजन् ! निस्संदेह ये सब श्रेय ही हैं, परमार्थ नहीं। भूपाल! अब मैं संक्षेपसे परमार्थका वर्णन करता हूँ, सुनो-

नरेश्वर! आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृतिसे परे है, उसमें जन्म और वृद्धि आदि विकार नहीं हैं। वह सर्वत्र व्यापक तथा परम ज्ञानमय है। असत् नाम और जाति आदिसे उस सर्वव्यापक परमात्माका न कभी संयोग हुआ, न है और न होगा ही। वह अपने और दूसरेके शरीरोंमें विद्यमान रहते हुए भी एक ही है। इस प्रकारका जो विशेष ज्ञान है, वही परमार्थ है। दैतभावना रखनेवाले पुरुष तो अपरमार्थवादी है। जैसे बासुराम एक हो वायु अभेदभावसे व्याप्त है; किंतु उसके छिद्रोंके भेदसे उसमें षड्ज, ऋषभ आदि स्वरोंका भेद हो जाता है, उसी प्रकार उस एक ही परमात्माके देव, मनुष्य आदि अनेक भेद प्रतीत होते हैं। उस भेदकी स्थिति तो अविद्याके आवरणतक ही सीमित है। राजन्! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास सुनो-

निदाघ नामक ब्राह्मणको उपदेश देते हुए महामुनि ऋभुने जो कुछ कहा था, उसीका इसमें वर्णन है। परमेष्ठी ब्रह्माजीके एक ऋभु नामक पुत्र हुए। भूपते ! वे स्वभावसे ही परमार्थतत्त्वके ज्ञाता थे। पूर्वकालमें पुलस्त्यमुनिके पुत्र निदाघ उनके शिष्य हुए थे। ऋभुने बड़ी प्रसन्नताके साथ निदाघको सम्पूर्ण तत्त्वज्ञानका उपदेश दिया था। समस्त ज्ञानप्रधान शास्त्रोंका उपदेश प्राप्त कर लेनेपर भी निदाघकी अद्वैतमें निष्ठा नहीं हुई। नरेश्वर ! ऋभुने निदाघकी इस स्थितिको ताड़ लिया था। देविका नदीके तटपर वीरनागर नामक एक अत्यन्त समृद्धिशाली और परम रमणीय नगर था, उसे महर्षि पुलस्त्यने बसाया था। उसी नगरमें पहले महर्षि ऋभुके शिष्य योगवेत्ता निदाघ निवास करते थे। उनके वहाँ रहते हुए जब एक हजार दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब महर्षि ऋभु अपने शिष्य निदाघको देखनेके लिये उनके नगरमें गये। निदाघ बलिवैश्वदेवके अन्तमें द्वारपर बैठकर अतिथियोंकी प्रतीक्षा कर न रहे थे। वे ऋभुको पाद्य और अर्घ्य देकर अपने घरमें ले गये और हाथ-पैर धुलाकर उन्हें आसनपर बिठाया। तत्पश्चात् द्विजश्रेष्ठ निदाधने आदरपूर्वक कहा- 'विप्रवर! अब भोजन कीजिये।'

ऋभु बोले-द्विजश्रेष्ठ! आपके घरमें भोजन को करने योग्य जो-जो अन्न प्रस्तुत हो, उसका नाम बतलाइये।

निदायने कहा-द्विजश्रेष्ठ। मेरे घरमें सत्तू, जौकी लपसी और बाटी बनी है। आपको इनमेंसे जो कुछ रुचे, वही इच्छानुसार भोजन कीजिये।

ऋभु बोले-ब्रह्मन्। इन सबमें मेरी रुचि नहीं है। मुझे तो मीठा अन्न दो। हलुआ, खीर और खाँडके बने हुए पदार्थ भोजन कराओ।

निदाघने अपनी स्त्रीसे कहा-शोभने! हमारे घरमें जो अच्छी-से-अच्छी भोजन-सामग्री उपलब्ध हो, उसके द्वारा इन अतिथि-देवताके लिये मिष्टान्न बनाओ।

पतिके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणपत्नीने स्वामीकी आज्ञाका आदर करते हुए ब्राह्मण देवताके लिये मीठा भोजन तैयार किया। राजन्! महामुनि ऋभुके इच्छानुसार मिष्टान्न भोजन कर लेनेपर निदाघने विनीतभावसे खड़े होकर पूछा।

निदाघ बोले-ब्रह्मन्! कहिये, भोजनसे आपको भलीभाँति तृप्ति हुई? आप संतुष्ट हो गये न? अब आपका चित्त पूर्णत: स्वस्थ है न? विप्रवर! आप कहाँके रहनेवाले हैं, कहाँ जानेको उद्यत हैं और कहाँसे आपका आगमन हुआ है? यह सब बताइये।

ऋभुने कहा-ब्रह्मन् ! जिसे भूख लगती है, उसीको अन्न भोजन करनेपर तृप्ति भी होती है। मुझे तो न कभी भूख लगी और न तृप्ति हुई। फिर मुझसे क्यों पूछते हो? जठराशिसे पार्थिव धातु (पहलेके खाये हुए पदार्थ)-के पच जानेपर क्षुधाकी प्रतीति होती है। इसी प्रकार पिये हुए जलके क्षीण हो जानेपर मनुष्योंको प्यासका अनुभव होता है। द्विज । ये भूख और प्यास देहके ही धर्म हैं, मेरे नहीं। अतः मुझे कभी भूख लगनेकी सम्भावना ही नहीं है। इसलिये मुझे तो सर्वदा तृप्ति रहती ही है। ब्रान् । मनको स्वस्थता और सांतोष ये दोनों चित्तके धर्ण (विकार) हैं।

अतः आत्मा इन धर्मोसे संयुक्त नहीं होता और तुमने जो यह पूछा है कि आपका निवास कहाँ है, आप कहाँ जायगे और आप कहाँसे आते हैं-इन तीनों प्रश्नोंक विषयमें मेरा मत सुनो।आत्मा सबमें व्याप्त है। यह आकाशकी मौत सर्वव्यापक है, अतः इसके विषयमें कहाँसे आये, कहाँ रहते हैं और कहाँ जायगे-यह प्रश्र कैसे सार्थक हो सकता है? इसलिये मैं न जानेवाला हूँ और न आनेवाला। (तू, मैं और अन्यका भेद भी शरीरको लेकर ही है) वास्तवमें न तू तू है, न अन्य अन्य है और न मैं मैं हूँ (केवल विशुद्ध आत्मा ही सर्वत्र विराजमान है)। इसी प्रकार मीठा भी मीठा नहीं है। मैंने जो तुमसे मिष्टान्नके लिये पूछा था उसमें भी मेरा यही भाव था कि देखें ये क्या कहते हैं। द्विज श्रेष्ठ ! इस विषयमें मेरा विचार सुनो। मीठा अन्न भी तृप्त हो जानेके बाद मीठा नहीं लगता तो वही उद्वेगजनक हो जाता है। कभी-कभी जो मीठा नहीं है, वह भी मोठा लगता है अर्थात् अधिक भूख होनेपर फीका अन्न भी मीठा (अमृतके समान) लगता है। ऐसा कौन-सा अन्न है, जो आदि, मध्य और अन्त–तीनों कालमें रुचिकर ही हो। जैसे मिट्टीका घर मिट्टीसे लिपनेपर स्थिर होता है, उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर पार्थिव परमाणुओंसे पुष्ट होता है। जौ, गेहूँ, मूंग, घी, तेल, दूध, दही, गुड़ और फल आदि सभी भोज्य-पदार्थ पार्थिव परमाणु ही तो हैं (इनमें से कौन स्वादिष्ट है और कौन नहीं)। अत: ऐसा समझकर जो मीठे और बे-मीठेका विचार करनेवाला है, उस मनको तुम्हें समदर्शी बनाना चाहिये; क्योंकि समता ही मोक्षका उपाय है।

राजन्! ऋभुके ये परमार्थयुक्त वचन सुनकर महाभाग निदाघने उन्हें प्रणाम करके कहा-

'ब्रह्मन्। आप प्रसन्न होइये और बताइये, मेरा हितसाधन करनेके लिये यहाँ पधारे हुए आप कौन है? आपके इन वचनोंको सुनकर मेरा सम्पूर्ण मोह नष्ट हो गया है।'

ऋभु बोले-द्विजश्रेष्ठ | मैं तुम्हारा आचार्य ऋभु हूँ और तुम्हें तत्त्वको समझनेवाली बुद्धि देनेके लिये यहाँ आया था। अब मैं जाता हूँ। जो कुछ परमार्थ है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। इस प्रकार परमार्थ तत्त्वका विचार करते हुए तुम इस सम्पूर्ण जगत्को एकमात्र वासुदेवसंज्ञक परमात्माका स्वरूप समझो। इसमें भेदका सर्वथा अभाव है।

ब्राह्मण जडभरत कहते हैं-तदनन्तर निदाघने 'बहुत अच्छा' कहकर गुरुदेवको प्रणाम किया और बड़ी भक्तिसे उनकी पूजा की। तत्पश्चात् वे निदाघकी इच्छा न होने पर भी वहाँसे चले गये। नरेश्वर! तदनन्तर एक सहस्र दिव्य वर्ष बीतनेके बाद गुरुदेव महर्षि ऋभु निदा को ज्ञानोपदेश करनेके लिये पुनः उसी नगरमें आयें। उन्होंने नगरसे बाहर ही निदाघको देखा। वहाँका राजा बहुत बड़ी सेना आदिके साथ धूम-धामसे नगरमें प्रवेश कर रहा था और निदाघ मनुष्योंकी भीड़-भाड़से दूर हटकर खड़े थे। वे जंगलसे समिधा और कुशा लेकर आये थे और भूख-प्याससे उनका गला सूख रहा था। निदाघको देखकर ऋभु उनके समीप गये और अभिवादन करके बोले-'बाबाजी। आप यहाँ एकान्तमें कैसे खड़े हैं?

निदाघ बोले-विप्रवर। आज इस रमणीय नगरमें यहाँक राजा प्रवेश करना चाहते हैं। अत: यहाँ मनुष्योंकी यह बहुत बड़ी भीड़ इकदी हो गयी है। इसीलिये मैं यहाँ खड़ा हूँ।

ऋभुने पूछा-द्विज | आप यहाँकी बातों के जानकार मालूम होते हैं। अतः बताइये, यहाँ राजा कौन है और दूसरे लोग कौन हैं?

निदाघ बोले-यह जो पर्वतशिखरके समान ऊँचे और मतवाले गजराजपर चढ़ा हुआ है, वही राजा है और दूसरे लोग उसके परिजन हैं

ऋभुने पूछा-महाभाग! मैंने हाथी तथा राजाको एक ही साथ देखा है। आपने विशेषरूपसे इनका पृथक् पृथक् चिह नहीं बताया; इसलिये मैं पहचान न सका। अत: आप इनकी विशेषता बतलाइये। मैं जानना चाहता हूँ कि इनमें कौन राजा है और कौन हाथी?

निदाघ बोले-ब्रह्मन् ! इनमें यह जो नीचे है, वह हाथी है और इसके ऊपर ये राजा बैठे हैं। इन दोनों में एक वाहन है और दूसरा सवार । भला, वाह-वाहक-सम्बन्धको कौन नहीं जानता?

ऋभुने पूछा-ब्रहान् । जिस प्रकार में अच्छी तरह समझ सकूँ, उस तरह मुझे समझाइये। 'नीचे' इस शब्दका क्या अभिप्राय है और 'ऊपर' किसे कहते हैं?

ब्राह्मण जडभरत कहते हैं-भुके ऐसा कहनेपर निदाघ सहसा उनके ऊपर चढ़ गये और इस प्रकार बोले-'सुनिये, आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे हैं, वह अब समझाकर कहता हूँ। इस समय मैं राजाकी भाँति ऊपर हूँ और श्रीमान् गजराजकी भाँति नीचे। ब्राह्मणदेव! आपको भलीभांति समझानेके लिये ही मैंने यह दृष्टान्त दिखाया है।

ऋभुने कहा-द्विज श्रेष्ठ! यदि आप राजाके समान हैं और मैं हाथीके समान हूँ तो यह बताइये कि आप कौन हैं और मैं कौन हूँ?

ब्राह्मण कहते हैं-ऋभुके ऐसा कहनेपर निदाघने तुरंत ही उनके दोनों चरणों में मस्तक नवाया और कहा-'भगवन् ! आप निश्चय ही मेरे आचार्यपाद महर्षि ऋभु हैं; क्योंकि दूसरेका हृदय इस प्रकार अद्वैत-संस्कारसे सम्पन्न नहीं है, जैसा कि मेरे आचार्यका। अत: मेरा विश्वास है, आप मेरे गुरुजी ही यहाँ पधारे हुए हैं।

ऋभुने कहा-निदाघ! पहले तुमने मेरी बड़ी सेवा-शुश्रूषा की है। इसलिये अत्यन्त स्नेहवश मैं तुम्हें उपदेश देनेके लिये तुम्हारा आचार्य ऋभु ही यहाँ आया हूँ। महामते! समस्त पदार्थोंमें अद्वैत आत्मबुद्धि होना ही परमार्थका सार है। मैंने तुम्हें संक्षेपसे उसका उपदेश कर दिया।

ब्राह्मण जडभरत कहते हैं-विद्वान् गुरु महर्षि ऋभु निदाघसे ऐसा कहकर चले गये। निदाघ भी उनके उपदेशसे अद्वैतपरायण हो गये और सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेसे अभिन्न देखने लगे। ब्रह्मर्षि निदाघने इस प्रकार ब्रह्मपरायण होकर परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। धर्मज्ञ नरेश! इसी प्रकार तुम भी आत्माको सबमें व्याप्त जानते हुए अपने में तथा शत्रु और मित्रमें समान भाव रखो।

सनन्दनजी कहते हैं-ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजाओंमें श्रेष्ठ सौवीर-नरेशने परमार्थकी ओर दृष्टि रखकर भेदबुद्धि त्याग दी और वे ब्राह्मण भी पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करके बोधयुक्त रो उसी जन्ममें मुक्त हो गये। मुनीश्वर नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हें परमार्थरूप यह अध्यात्मज्ञान बताया है। इसे सुननेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको भी यह मुक्ति प्रदान करनेवाला है।