नारद महा पुराण
अभिषेककालमें देवताओंद्वारा जगन्नाथजीकी स्तुति, गुण्डिचा-यात्राका माहात्म्य तथा द्वादश यात्राकी प्रतिष्ठाविधि
पुरोहित बसु कहते हैं- ब्रह्मपुत्री मोहिनी! उस समय इस प्रकार श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राका अभिषेक करके प्रसन्नतासे भरे हुए महाभाग देवगण उनकी स्तुति करते हैं।
देवता कहते हैं- सम्पूर्ण लोकोंका पालन करनेवाले जगन्नाथ। आपकी जय हो, जय हो। पानाभा धरणीधर। आदिदेव। आपकी जय हो। जासुदेव दिव्य मास्वरूप धारण करनेवाले परमेश्वर।
*नमस्ते देवदेवेश पुराणपुरुषोत्तम।।
सर्गस्थित्यन्तकृद्देव लोकनाथ जगत्पते। त्रैलोक्यशरणं देवं ब्रह्मण्यं मोक्षकारणम्।।
तं नमस्यामहे भक्त्या सर्वकामफलप्रदम्। (ना0 उत्तर0)
आपकी जय हो। देवश्रेष्ठ ! समुद्र में शयन करनेवाले माधव। योगेश्वर। आपकी जय हो। विश्वमूर्ते। चक्रधर श्रीनिवास! आपकी जय हो। कच्छपावतार। आपकी जय हो। शेषशायिन्। धर्मवास ! गुणनिधान ! आपकी जय हो। शान्तिकर ! ज्ञानमूर्ते। भाववेद्य ! मुक्तिकर! आपकी जय हो, जय हो। विमलदेह ! सत्त्वगुणके निवासस्थान । गुणसमूह ! आपकी जय हो, जय हो। निर्गुणरूप! मोक्षसाधक! आपकी जय हो। लोकशरण! लक्ष्मीपते! कमलनयन! सृष्टिकर! आपकी जय हो, जय हो। आपका श्रीविग्रह तीसीके फूलकी भाँति श्याम एवं सुन्दर है; आपकी जय हो। आपका श्रीअङ्ग शेषनागके शरीरपर शयन करता है; आपकी जय हो। भक्तिभावन ! आपकी जय हो, जय हो। परमशान्त! आपकी जय हो। नीलाम्बरधारी बलराम! आपको जय हो। सांख्यवन्दित ! आपकी जय हो। पापहारी हरे! आपकी जय हो। जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपको जय हो । बलरामजीके अनुज! आपकी जय हो। मनोवाञ्छित फल देनेवाले देव! आपकी जय हो। वनमालासे आवृत वक्षवाले नारायण! आपकी जय हो। विष्णो! आपकी जय हो। आपको नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुति करके इन्द्र आदि देवता, सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा अन्य स्वर्गवासी मन- ही-मन बड़े प्रसन्न होते हैं। वे तन्मय चित्तसे श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रादेवीका दर्शन, स्तवन एवं नमस्कार करके अपने-अपने निवासस्थानको चले जाते हैं। पुष्करतीर्थमें सौ बार कपिला गौका दान करनेसे अथवा सौ कन्याओंका दान करनेसे जो फल कहा गया है उसीको मनुष्य मञ्चपर विराजमान श्रीकृष्णाका दर्शन करनेसे पा लेता है। सबका आतिध्यसत्कार
करनेसे, विधिपूर्वक वृषोत्सर्ग करनेसे, ग्रीष्मऋतु, जलदान देनेसे, चान्द्रायण करनेसे, एक मासतक निराहार रहनेसे तथा सब तीर्थों में जाकर व्रत और दान करनेसे जो फल प्रास होता है, वह सब मकपर विराजमान सुभद्रासहित श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करनेसे मिल जाता है। अत: स्त्री हो या पुरुष सबको उस समय पुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये। मोहिनी ! भगवान् श्रीकृष्णके स्नान किये हुए शेष जलसे यदि विधिपूर्वक अभिषेक किया जाय तो वन्ध्या, मृतवत्सा, दुर्भगा, ग्रहपीड़िता, राक्षसगृहीता तथा रोगिणी स्त्रियाँ तत्काल शुद्ध हो जाती हैं। और सुप्रभे! जिन-जिन मनोरथोंको वे चाहती हैं उन सबको शीघ्र प्राप्त कर लेती हैं। अत: जलशायी भगवान् श्रीकृष्णके नानावशेष जलसे अपने सम्पूर्ण अङ्गोंको सींचना चाहिये। जो लोग स्रानके पश्चात् दक्षिणाभिमुख जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं वे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। पृथ्वीके सम्पूर्ण तीर्थोकी यात्रा करनेका जो फल कहा गया है तथा गङ्गाद्वार, कुब्जाम्र तथा कुरक्षेत्रमें एवं पुष्कर आदि अन्य तीथोंमें सूर्यग्रहणके समय स्नान करनेसे जो फल बताया गया है एवं वेद, शास्त्र, पुराण, महाभारत तथा संहिता आदि ग्रन्थों में पुण्यकर्मका जो फल बताया गया है, उसे मनुष्य दक्षिणाभिमुख जाते हुए श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राका दर्शनमात्र करके पा लेता है।
भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा-ये स्थपर विराजमान होकर जब गुण्डिचा मण्डपको यात्रा करते है तब समाबजी उनका दर्शन करते हो, वे बीहारिक साल में जाते हैं। गुपिकचा चालके समय फाल्गुनकी पूर्णिमाको विषुव योगमें जो
*गुण्डिचा नामक उद्यान-मन्दिर, जो पुरीमें इन्द्रद्युमसरोवरके तटपर स्थित है।इसके गुण्डिचा, गुडिचा आदि नाम भी मिलते है।
मनुष्य एक बार पुरुषोत्तमपुरीकी यात्रा करता है वह विष्णुलोकमें जाता है। ब्रह्मपुत्री ! जब वहाँकी बारह यात्राएँ पूर्ण हो जायें उस समय विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा (उद्यापन) करनी चाहिये, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें एकादशी तिथिको एकाग्रचित्तसे किसी पवित्र जलाशयपर आचमन करे और इन्द्रियसंयमपूर्वक पवित्र भावसे सब तीर्थोका आवाहन करके भगवान् नारायणका ध्यान करते हुए शास्त्रीय पद्धतिसे स्नान करे। स्नानके पश्चात् विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों, अपने पितरों तथा अन्य लोगोंका उनके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए तर्पण करे। फिर जलसे निकलकर दो स्वच्छ वस्त्र पहने और विधिसे आचमन करके सूर्योपस्थानके पश्चात् पुण्यमयी वेदमाता गायत्रीका एक सौ आठ बार जप करे । साथ ही सूर्यदेवतासम्बन्धी अन्य मन्त्रोंका जप करके तीन बार परिक्रमाके पश्चात् सूर्यदेवको प्रणाम करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-इन तीन वर्षों के लिये वेदोक्त विधिसे स्नान और जपका विधान है। वरारोहे ! स्त्री और शूद्रोंके स्नान और जप वैदिक विधिसे रहित होते हैं।
इसके बाद भक्तिभावसे मन्दिरमें स्थित श्रीपुरुषोत्तमके समीप जाय। वहाँ हाथ- पैर धोकर विधिपूर्वक आचमन करके भगवान् को पहले घीसे स्नान करावे, उसके बाद दूधसे । तत्पश्चात् मधुगन्धोदक एवं तीर्थचन्दनके जलसे उन्हें स्नान कराकर दो श्रेष्ठ वस्त्र भक्तिपूर्वक भगवान् को पहनावे। चन्दन, अगुरु, कर्पूर तथा कुंकुमका लेप लगावे। फिर कमलके फूलोंसे पराभक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे । इस प्रकार भोग और मोक्ष देनेवाले जगनाथ श्रीहरिकी पूजा करके उनके समक्ष अगुरु, पवित्र गुग्गुल तथा अन्य सुगन्धित पदार्थों एवं घृतके साथ धूप जलाये। फिर अपनी शक्तिके अनुसार घौसे भक्तिपूर्वक दीपक जलाकर रखे। मोहिनी! एकाग्रचित्त होकर गायके घी अथवा तिलके तेलसे बारह दीपक और जलाकर रखे। तदनन्तर नैवेद्यके रूप में खीर, गूआ, पूड़ी, बड़ा, लड्डू, खाँड और फल निवेदन करे। इस प्रकार पशोपचारसे श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा करके ॐ नमः पुरुषोत्तमाय'- इस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। तत्पश्चात् दण्डकी भौति पृथ्वीपर पड़कर भगवानको प्रार्थना द्वारा प्रसन्न करे। फिर एकाग्रचित्त हो भगवान्के ऊपर भँति भाँतिके पुण्यास एक सुन्दर एवं विचित्र शोभायुक्त मण्डलाकार पुष्पमण्डप बनाये और भावचिन्तन करते हुए रातमें जागरण करे। भगवान् वासुदेवकी कथा और गीतका भी आयोजन करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष भगवान्का ध्यान, पाठ और स्तवन करते हुए रात बितावे। तदनन्तर निर्मल प्रभात- काल आनेपर द्वादशीको बारह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। वे ब्राह्मण स्रातक, वेदोंक पारगामी, इतिहास- पुराणके ज्ञाता, श्रोत्रिय और जितेन्द्रिय होने चाहिये। इसके बाद स्वयं भी विधिपूर्वक स्रान करके धुला हुआ वस्त्र पहने और इन्द्रियसंयमपूर्वक भक्तिभावसे पहलेकी भाँति वहाँ विराजमान पुरुषोत्तमको स्नान करावे; फिर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, उपहार आदि नाना प्रकारके उपचारोंसे तथा प्रणाम, परिक्रमा, जप, स्तुति, नमस्कार और मनोहर गीत-वाद्योंद्वारा भगवान् जगन्नाथकी पूजा करे। भगवत्पूजनके पश्चात् ब्राह्मणों को भी पूजा करे। उनके लिये बारह गौएँ दान करके भक्तिपूर्वक सुवर्ण, छत्तरी, जूते और काँसपात्र आदि समर्पित करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको खोरसहित पक्वान्न भोजन करावे। उन भोज्यपदार्थोमें गुड़ और शक्करका मेल होना चाहिये। जब ब्राह्मण लोग भोजन करके भलीभाँति तृप्त एवं प्रसन्नचित्त हो जायँ, तब उनके लिये जलसे भरे हुए बारह घर दान करे। उन घड़ोंके साथ लडू और यथाशक्ति दक्षिणा भी होनी चाहिये। ब्रह्मपुत्री। तत्पश्चा, विष्णुतुल्य ज्ञानदाता गुरुकी पूर्ण भक्तिके साथ पूजा करनी चाहिये। विद्वान् पुरुष उन्हें सुवर्ण, वस्त्र, गौ, धान्य, द्रव्य तथा अन्य मनोवान्छित वस्तुएं देकर उनकी पूजा सम्पन्न करे; फिर नमस्कार करके निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे-
सर्वव्यापी जगन्नाथः शङ्खचक्रगदाधरः।
अनादिनिधनो देवः प्रीयता पुरुषोत्तमः ॥
(ना० उत्तर०६१ / ७४)
'शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले सर्वव्यापी, अनादि और अनन्त देवता जगदीश्वर भगवान् पुरुषोत्तम मुझपर प्रसन्न हों।'
यों कहकर गुरु एवं ब्राह्मणोंकी आदरपूर्वक तीन बार परिक्रमा करे; फिर चरणोंमें भक्तिपूर्वक सिर नवाकर आचार्यसहित ब्राह्मणोंको विदा करे। तत्पश्चात् गाँवकी सीमातक भक्तिपूर्वक उन ब्राह्मणोंके साथ-साथ जाय और उन्हें नमस्कार करके लौटे। फिर स्वजनों और बान्धवोंके साथ स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ऐसा करके स्त्री हो या पुरुष वह एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञोंका फल पाता है एवं सूर्यतुल्य विमानके द्वारा विष्णुलोकको जाता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रकी यात्राका फल बताया है, जो मनुष्योंको भोग और मोक्ष देनेवाला है।