भगवान् नारायणके पूजनकी विधि

पुरोहित वसु कहते हैं-ब्रह्मपुत्री मोहिनी! देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्य प्राणियोंका तर्पण करने के पश्चात् मौनभावसे आचमन करके समुद्रके तटपर एक चौकोर मण्डप बनाये। उसमें चार दरवाजे रखे। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक हाथकी होनी चाहिये। मण्डप बहुत सुन्दर बनाया जाय। इस प्रकार मण्डप बनाकर उसके भीतर कर्णिकासहित अटदल कमल अङ्कित करे। उसमें अष्टाक्षर-मन्त्रकी विधिसे अजन्मा भगवान् नारायणका पूजन करे। हृदयमें उत्तम ज्योतिःस्वरूप ॐकारका चिन्तन करके कमलको कर्णिकामें विराजमान ज्योतिःस्वरूप सनातन विष्णुका ध्यान करे; फिर अष्टदल कमलके प्रत्येक दलमें क्रमश: मन्बके एक एक अक्षरका न्यास करे। मन्बके एक-एक अक्षरद्वारा अथवा सम्पूर्ण मन्त्रद्वारा भी पूजन करना उत्तम माना गया है। सनातन परमात्मा विष्णुका

द्वादशाक्षर-मन्त्रसे पूजन करे। तदनन्तर हृदयके भीतर भगवान्का ध्यान करके बाहर कमलकी कर्णिकामें भी उनकी भावना करे। भगवान्की चार भुजाएँ हैं। वे महान् सत्त्वमय हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी प्रभा कोटि-कोटि सूर्योके समान है। वे महायोगस्वरूप हैं। इस प्रकार उनका चिन्तन करके क्रमशः आवाहन आदि उपचारद्धारा पूजन करे।

आवाहन मन्त्र

मीनरूपो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः ।।

आयातु देवो वरदो, मम नारायणोऽग्रतः ।

ॐ नमो नारायणाय नमः ।।

(ना० उत्तर०५७। २६-२७)

'मीन, वराह, नृसिंह एवं वामन अवतारधारी वरदायक देवता भगवान् नारायण मेरे सम्मुख पधारें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।

* श्राद्धे हवनकाले च पाणिनैकेन निर्वयेत्।

तर्पणे तूभयं कुर्यादेष एव विधिः सदा।।

अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु।

तृप्यतामिति सिञ्चेतु नामगोत्रेण वाग्यतः।।

आसन-मन्त्र

कर्णिकायां सुपीठेत पाकल्पितमासनम्॥

सर्वसत्त्वहितार्थाय शिष्ठ वं मधुसूदन।

ॐ नमो नारायणाय नमः॥

(ना० उचर०५७।२७-२८)

'यहाँ कमलकी कर्णिकामें सुन्दर पीठपर कमलका आसन बिछा हुआ है। मधुसूदन! सब प्राणियोंका हित करनेके लिये आप इसपर विराजमान हों। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

अर्ध्य-मन्त्र

ॐ त्रैलोक्यपतीनां पतये देवदेवाय हृषीकेशाय विष्णवे नमः।

ॐ नमो नारायणाय नमः ।।

'त्रिभुवनपतियोंके भी पति, देवताओंके भी देवता, इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

पाद्य-मन्त्र

ॐ पाद्यं ते पादयोर्देव पद्मनाभ सनातन ।।

विष्णो कमलपत्राक्ष गृहाण मधुसूदन।

ॐ नमो नारायणाय नमः॥

(ना० उत्तर०५७। २८-२९)

'देवपद्मनाभ! सनातन विष्णो!! कमलनयन मधुसूदन !!! आपके चरणोंमें यह पाद्य (पाँव पखारनेके लिये जल) समर्पित है, आप इसे स्वीकार करें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।

मधुपर्क-मन्त्र

मधुपर्क महादेव ब्रह्मायैः कल्पितं तव।

मया निवेदितं भक्त्या गृहाण पुरुषोत्तम ।

ॐ नमो नारायणाय नमः॥

(ना उत्तर० ५७।२९-३०)

'महादेव । पुरुषोत्तम । ब्रह्मा आदि देवताओंने आपके लिये जिसकी व्यवस्था की थी, यही मधुपर्क मैं भक्तिपूर्वक आपको निवेदन करता हूँ। कृपया स्वीकार कीजिये। सचिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

आचमनीय-मन्त्र

मन्दाकिन्याः सितं वारि सर्वपापहरे शिवम्॥

गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम्।

ॐ नमो नारायणाय नमः।

(ना० उत्तर० ५७। ३०-३१)

'भगवन् । मैंने गङ्गाजीका स्वच्छ जल जो सब पापोंको दूर करनेवाला तथा कल्याणमय है, आचमनके लिये भक्तिपूर्वक आपको अर्पित किया है, कृपया ग्रहण कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

स्नान-मन्त्र

त्वमापः पृथिवी चैव ज्योतिस्त्वं वायुरेव च।

लोकेश वृत्तिमात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम्।

ॐ नमो नारायणाय नमः ।।

(ना० उत्तर० ५७। ३१-३२)

'लोकेश्वर! आप ही जल, पृथ्वी तथा अग्नि और वायुरूप हैं। मैं जीवनरूप जलके द्वारा आपको सान करता हूँ। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

वस्त्र-मन्त्र

देव तन्तुसमायुक्त यज्ञवर्णसमन्विते॥

स्वर्णवर्णप्रभे देव वाससी तव केशव।

ॐ नमो नारायणाय नमः॥

(ना० उत्तर० ५७ । ३२-३३)

'देव केशव। यह दिव्य तन्तुओंसे युक्त यज्ञवर्णसमन्वित तथा सुनहले रंग और सुनहली प्रभावाले दो वस्त्र आपकी सेवामें समर्पित हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

विलेपन-मनन

शरीरं तेन जानामिचेही चैवम केशव

मया निवेदितो गमः प्रतिगृह्य विलिप्यताम्।

ॐ नमो नारायणाय नमः।

(ना० उत्तर० ५७।३३-३४)

'केशव! मुझे आपके शरीर और चेष्टाका ज्ञान नहीं है। मैंने जो यह गन्ध (रोली-चन्दन आदि) निवेदन किया है, इसे लेकर अपने अनमें लगायें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

यज्ञोपवीत-मन्त्र

ऋग्यजुःसाममन्त्रेण त्रिवृतं पद्मयोनिना।

सावित्रीग्रन्थिसंयुक्तमुपवीतं तवार्पये।

ॐ नमो नारायणाय नमः॥

(ना० उत्तर० ५७।३४-३५)

'भगवन्! ब्रह्माजीने ऋक्, यजुः और सामवेदके मन्त्रोंसे जिसको त्रिवृत् (त्रिगुण) बनाया है, वह सावित्री ग्रन्धिसे युक्त यज्ञोपवीत में आपकी सेवामें अर्पित करता हूँ। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

अलंकार-मन्त्र

दिव्यरत्नसमायुक्ता वह्निभानुसमप्रभाः॥

गात्राणि शोभयिष्यन्ति अलंकारास्तु माधव।

ॐ नमो नारायणाय नमः ।।

(ना० उत्तर० ५७ । ३५-३६)

'माधव! अग्नि और सूर्यके समान चमकीले तथा दिव्य रत्नोंसे जटित ये दिव्य आभूषण आपके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ायगे। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

पूर्वोक्त अष्टदलकमलके पूर्व दलमें भगवान् वासुदेवका और दक्षिण दलमें श्रीसंकर्षणका न्यास करे। पथिम दलमें प्रद्युम्नका तथा उत्तर दलमें अनिरुद्धका न्यास करे। अग्रिकोणवाले दलमें भगवान् वराहका तथा नैर्ऋत्य दलमें नृसिंहका न्यास करे। वायव्य दलमें माधवका तथा ईशान दलमें भगवान् त्रिविक्रमका न्यास करे। अष्टाचार, देवस्वरूप भगवान् विष्णुके सम्मुख गरुड़जीकी स्थापना करनी चाहिये। भगवान्के वामपागमें चक्र और दक्षिणभागमें शसकी स्थापना करे। इसी प्रकार उनके दक्षिणभागमें महागदा कौमोदकी और वामभागमें शार्क नामक धनुषको स्थापित करे। दक्षिणभागमें दो दिव्य तरकस और वामभागमें खड्गका न्यास करे। फिर दक्षिणभागमें श्रीदेवी और वामभागमें पुष्टिदेवीकी स्थापना करे। भगवान् के सम्मुख वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ रखे; फिर पूर्व आदि चारों दिशाओंमें हृदय आदिका न्यास करे। कोणमें देवदेव विष्णुके अस्त्रका न्यास करे। पूर्व आदि आठ दिशाओंमें तथा नीचे और ऊपर क्रमश: इन्द्र, अग्नि, यम, निति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, अनन्त तथा ब्रह्माजीका उनके नाम-मन्त्रोंद्वारा पूजन करे। इसी विधिसे पूजित मण्डलस्थ भगवान् जनार्दनका जो दर्शन करता है, वह भी अविनाशी विष्णुमें प्रवेश करता है। जिसने उपर्युक्त विधिसे एक बार भी श्रीकेशवका पूजन किया है, वह जन्म मृत्यु और जरावस्थाको लाँधकर भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त होता है। जो आलस्य छोड़कर निरन्तर भक्तिभावसे भगवान् नारायणका स्मरण करता है, उसके नित्य निवासके लिये श्वेतद्वीप बताया गया है। 'नमः' सहित ॐकार जिसके आदिमें है और जो अन्तमें भी 'नम:' पदसे सुशोभित है, ऐसा नारायणका 'नारायण' नाम सम्पूर्ण तत्त्वोंका प्रकाशक मन्त्र कहलाता है।

(उसका स्वरूप है-ॐ नमो नारायणाय नमः)- इसी विधिसे प्रत्येकको गन्ध पुष्प आदि वस्तुएँ क्रमशः निवेदन करनी चाहिये। इसी क्रमसे आठ मुद्राएँ बाँधकर दिखावे। तदनन्तर मन्त्रवेत्ता पुरुष ॐ नमो नारायणाय' इस मूलमन्त्रका एक सी आठ बार या अहाईस बार अथवा आत बार जप करे। किसी कामनाके लिये जप करना हो तो उसके लिये शास्त्रोंमें जितना बताया गया हो उतनी संख्यामें जप करे अथवा निष्कामभावसे जितना हो सके उतना एकाग्र चित्तसे जप करे पद्य, शङ्ख, श्रीवत्स, गदा, गरुड, चक्र, खड्ग और शाषनुष-ये आठ मुद्राएँ बतायी गयी है।

शुभे ! जो लोग शास्त्रोक्त मन्त्रोद्वारा श्रीहरिकी पूजाका विधान न जानते हों वे 'ॐ नमो नारायणाय' इस मूलमन्त्रसे ही सदा भगवान् अच्युतका पूजन करें।