गयातीर्थकी महिमा

वसिष्ठजी कहते हैं-राजन्! तदनन्तर पापनाशिनी गङ्गाका यह उत्तम माहात्म्य सुनकर मोहिनीने पुनः अपने पुरोहितसे पूछा।

मोहिनी बोली-भगवन्! आपने मुझे गङ्गाका पुण्यमय आख्यान (माहात्म्य) सुनाया है। अब मैं यह सुनना चाहती हूँ कि संसारमें गयातीर्थ कैसे विख्यात हुआ?

पुरोहित वसुने कहा-गया पितृतीर्थ है। उसे सब तीर्थों में श्रेष्ठ माना गया है, जहाँ देवदेवेश्वर पितामह ब्रह्माजी स्वयं निवास करते हैं। जहाँ याग (श्राद्ध)-की अभिलाषा रखनेवाले पितरोंने यह गाथा गायी है-'बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे एक भी तो गया जायगा अथवा अपमेध-यज्ञ करेगा या नीलवृषभका उत्सर्ग करेगा।' देवि! गयाका उत्तम माहात्म्य सारसे भी सारतर वस्तु है। मैं उसका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। सुनो, पूर्वकालकी बात है। गयासुर नामसे प्रसिद्ध एक असुर हुआ था, जो बड़ा पराक्रमी था। उसने बड़ा भयंकर तप किया, जो सम्पूर्ण भूतोंको पीड़ित करनेवाला था। उसकी तपस्यासे संतप्त हुए देवता लोग उसके वधके लिये भगवान् विष्णुको शरणमें गये। तब भगवान्ने उसको गदासे मार दिया। अत: गदाधर भगवान् विष्णु ही गयातीर्थमें मुक्तिदाता माने गये हैं। भगवान् विष्णुने इस तीर्थकी मर्यादा स्थापित की। जो मनुष्य यहाँ यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान एवं स्नानादि कर्म करता है, वह स्वर्ग अथवा ब्रह्मलोकमें जाता है। गयातीर्थको उत्तम जानकर ब्रह्माजीने वहाँ यज्ञ किया तथा उन्होंने वहाँ सरस्वती नदीकी भी सृष्टि की और समस्त दिशाओंमें व्याप्त होकर उस तीर्थमें निवास किया। तदनन्तर ब्राह्मणोंकि प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजीने वहाँ अनेक तीर्थ निर्माण किये और कहा- ब्राह्मणो ! गया त्रास करनेसे पवित्र हुए लोग ब्रह्मलोकगामी होंगे और जो लोग तुम्हारा पूजन और सत्कार करेंगे, उनके द्वारा सदा में पूजित होऊँगा। ब्रह्मज्ञान, गयानाड, गोशालामें प्राप्त होनेवाली मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास-यह मनुष्योंके लिये चार प्रकारकी मुक्ति (-के साधन) हैं। ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी और गुरुपलीगमन तथा इन सबके संसर्गसे होनेवाला पाप-ये सब-के-सब गया श्राद्धसे नष्ट हो जाते हैं। मरनेपर जिनका दाह-संस्कार नहीं हुआ है, जो पशुओंद्वारा मारे गये हैं अथवा जिन्हें सर्पने डंस लिया है, वे सब लोग गयाश्राद्धसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं।

देवि! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास सुना जाता है। त्रेतायुगमें विशाल नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो विशालापुरीमें रहते थे। वे अपने सद्गुणोंके कारण धन्य समझे जाते थे। उनमें धैर्यका विलक्षण गुण था। उन्होंने श्रेष्ठ तीर्थ गयाशिरमें आकर पितृयाग प्रारम्भ किया। उन्होंने विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान दिया। इतनेमें ही उन्होंने आकाशमें उत्तम आकृतिसे युक्त तीन पुरुषोंको देखा, जो क्रमशः क्षेत, लाल और काले रंगके थे। उन्हें देखकर राजाने पूछा- 'आपलोग कौन हैं?'

सित (श्वेत)-ने कहा-राजन्! मैं तुम्हारा पिता सित हूँ। मेरा नाम तो सित है ही, मेरे शरीरका वर्ण भी सित (श्वेत) है । साथ ही मेरे कर्म भी सित (उज्ज्वल) हैं और ये जो लाल रंगके पुरुष दिखायी देते हैं, ये मेरे पिता हैं इन्होंने बड़े निष्ठुर कर्म किये हैं। वे ब्रह्महत्यारे और पापाचारी रहे हैं और इनके बाद ये जो तीसरे सज्जन हैं, ये तुम्हारे प्रपितामह हैं। ये नामसे तो कृष्ण हैं ही, कर्म और वर्णसे भी कृष्ण हैं। इन्होंने पूर्वजन्ममें अनेक प्राचीन ऋषियोंका वष किया है। ये दोनों पिता और पुत्र अवीचि नामक नरकमें पड़े हुए हैं, अतः ये मेरे पिता और ये दूसरे इनके पिता, जो दीर्घकालतक काले मुखसे युक्त हो नरकमें रहे हैं और मैं, जिसने अपने शुद्ध कर्मके प्रभावसे इन्द्रका परम दुर्लभ सिंहासन प्राप्त किया था, तुझ मन्त्रज्ञ पुत्रके द्वारा गयामें पिण्डदान करनेसे हम तीनों ही बलात् मुक्त हो गये।

एक बार गया जाना और एक बार वहाँ पितरोंको पिण्ड देना भी दुर्लभ है; फिर नित्य वहीं रहनेका अवसर मिले, इसके लिये तो कहना ही क्या है! देश-कालके प्रमाणानुसार कहीं-कहीं मृत्युकालसे एक वर्ष बीतनेके बाद अपने भाई-बन्धु पतित पुरुषोंके लिये गयाकूपमें पिण्डदान करते हैं। एक समय किसी प्रेतराजने एक वैश्यसे अपनी मुक्तिके लिये अनुरोध करते हुए कहा-तुम गयातीर्थका दर्शन करके सान कर लेना और पवित्र होकर मेरा नाम ले मेरे लिये पिण्डदान करना। वहाँ पिण्ड देनेसे मैं अनायास ही प्रेतभावसे मुक्त हो सम्पूर्ण दाताओंको प्राप्त होनेवाले शुभ लोकोंमें चला जाऊँगा । वैश्यसे ऐसा कहकर अनुयायियोंसहित प्रेतराजने एकान्तमें विधिपूर्वक अपने नाम आदि अच्छी तरह बताये। वैश्य धनोपार्जन करके परम उत्तम गयातीर्थ नामक तीर्थमें गया। उस महाबुद्धि वैश्यने वहाँ पहले अपने पितरोंको पिण्ड आदि देकर फिर सब प्रेतोंके लिये क्रमश: पिण्डदान और धनदान किया। उसने अपने पितरों तथा अन्य कुटुम्बीजनोंके लिये भी पिण्डदान किया था। वैश्यद्वारा इस प्रकार पिण्ड दिये जानेपर वे सभी प्रेत प्रेतभावसे छूटकर द्विजत्वको प्राप्त हो ब्रह्मलोकमें चले गये। गयाम किये हुए श्राद्ध, जप, होम और तप अक्षय होते हैं। यदि पिताकी क्षयाह-तिथिको पुत्रोंद्वारा ये कर्म किये जाये तो वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। पितृगण नरकके भवसे पीड़ित हो पुत्रकी अभिलाषा करते है और सोचते है-जो कोई पुत्र गया जायगा, वह हमें तार देगा।

गयामें धर्मपृष्ठ, ब्रह्मसभा, गयाशीर्ष तथा अक्षयवटके समीप पितरोंके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय होता है। ब्रह्मारण्य, धर्मपृष्ठ और धेनुकारण्य-इनका दर्शन करके वहाँ पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपनी बीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। महान् कल्पपर्यन्त किया हुआ पाप गयामें पहुँचनेपर नष्ट हो जाता है। गोतीर्थ और गृध्रवटतीर्थमें किया हुआ श्राद्धदान महान् फल देनेवाला होता है। वहाँ सब मनुष्य मतङ्गके आश्रमका दर्शन करते हैं और सब लोकोंके समक्ष 'धर्मसर्वस्व' की घोषणा करते हैं। वहाँ पवित्र पङ्कजवन नामक तीर्थ है, जो पुण्यात्मा पुरुषोंसे सेवित है, जिसमें पिण्डदान दिया जाता है। वह सबके लिये दर्शनीय तीर्थ है। तृतीयातीर्थ, पादतीर्थ, नि:क्षीरामण्डलतीर्थ, महारुद तथा कौशिकीतीर्थ- इन सबमें किया हुआ श्राद्ध महान् फल देनेवाला होता है। मुण्डपृष्ठमें परम बुद्धिमान् महादेवजीने अपना पैर दे रखा है। अन्य तीर्थो में अनेक सौ वर्षातक जो दुष्कर तपस्या की जाती है, उसके सपान फल यहाँ थोड़े ही समयके तीर्थसेवनसे प्राप्त हो जाता है। धर्मपरायण मनुष्य इस तीर्थमें आकर अपनी समस्त पापराशिको तत्काल दूर कर देता है, ठीक उसी तरह जैसे सौंप पुरानी केंचुलको त्याग देता है। वहीं मुण्डपृष्ठतीर्थके उत्तर भागमें कनकनन्दा नामसे विख्यात तीर्थ है, जहाँ ब्रह्मर्षिगण निवास करते हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य अपने शरीरके साथ स्वर्गलोकको जाते हैं। वहाँ किया हुआ शास. दान सदा समय कहा गया है। सुलोचने। वहाँ नि:क्षीरामें तीन दिलवक सान करके मानसरोवरमें नहाकर श्राद्ध करे। उत्तरमानसमें जाकर मनुष्य परम उत्तम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो अपनी शक्ति और बलके अनुसार वहाँ श्राद्ध करता है, वह दिव्य भोगों और मोक्षके सम्पूर्ण उपायोंको प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर ब्रह्मसरोवरतीर्थमें जाय, जो ब्रह्मयूपसे सुशोभित है। वहाँ श्राद्ध करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। सुभगे। तदनन्तर लोकविख्यात धेनुकतीर्थमें जाय। वहाँ एक रात रहकर तिलमयी धेनुका दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो निश्चय ही चन्द्रलोकमें जाता है। तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् महादेवजीके गृध्रवट नामक स्थानको जाय। वहाँ भगवान् शङ्करके समीप जाकर अपने अङ्गोंमें भस्म लगावे। देवि! ऐसा करनेसे ब्राह्मणोंको तो बारह वर्षोंतक किये जानेवाले व्रतका पुण्य प्राप्त होता है और अन्य वर्णके लोगोंका सारा पाप नष्ट हो जाता है।

तत्पश्चात् उदयगिरि पर्वतपर जाय; जहाँ दिव्य संगीतकी ध्वनि गूंजती रहती है। वहाँ सावित्रीदेवीका परम पुण्यदायक पदचिह्न दृष्टिगोचर होता है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण वहाँ संध्योपासना करे। इससे बारह वर्षोंतक संध्योपासना करनेका फल प्राप्त होता है। विधिनन्दिनि। वहीं योनिद्वार है। वहाँ जानेसे मनुष्य योनि संकटसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य शुक्ले और कृष्ण दोनों पक्षों में गयातीर्थमं निवास करता है, वह अपने कुलकी सात पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है। सुभगे। तदनन्तर महान् फलदायक धर्मपृष्ठ

*अग्निपुराणमें 'धर्मसर्वस्व' की घोषणाका स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट किया गया है। मतनवापीमें स्नान करके श्राद्धकर्ता पुरुष वहाँ पिण्डदान करे और मतने श्वरको, जो सुसिझोंके अधीश्वर हैं, नमस्कार करके इस प्रकार कहे-'सब देवता प्रमाण देनेवाले और समस्त लोकपाल भी साक्षी रहें, मैंने इस मतङ्गतीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार किया है' (देखिये अग्निपुराण अध्याय ११५ श्लोक ३४-३५)।

नामक तीर्थमें आय, जहाँ पितृलोकका पालन करनेवाले साक्षात् धर्मराज विराजमान हैं। वहाँ जानेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। तदनन्तर मनुष्य परम उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाय, वहाँ ब्रह्माजीक समीप जानेसे राजसूय यजका फल मिलता है। तदनन्तर फल्गुतीर्थमें जाय। वह प्रचुर फल- मूलसे सम्पन्न और विख्यात है। वहीं कौशिकी नदी है, जहाँ किया हुआ श्राद्ध अक्षय माना गया है। वहाँसे उस पर्वतपर जाय, जो परम पुण्यात्मा, धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा सुरक्षित रहा है। वहीं गयशिर नामका सरोवर है, जहाँ पुण्यसलिला महानदी विद्यमान हैं। ऋषियोंसे सेवित परम पुण्यमय ब्रह्मसरोवर नामक तीर्थ भी वहीं है, जहाँ भगवान् अगस्त्य वैवस्वत यमसे मिले थे और जहाँसनातन धर्मराज निरन्तर निवास करते हैं। वहाँ सब सरिताओंका उद्गम दिखायी देता है और पिनाकपाणि महादेव वहाँ नित्य निवास करते है। लोकपिण्याच अक्षयवट भी वहीं है। पूर्वकालमें यजमान राजा गयने वहाँ यज्ञ किया था। वहीं प्रकट हुई सरितामों में श्रेष्ठ गङ्गा गयके यज्ञोंमें सुरक्षित थीं। मुण्डपृष्ठ, गया, रैवत, देवगिरि, तृतीय, क्रौशपाद-इन सबका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। शिवनदीमें शिवकरका, गयामें गदाधरका और सर्वत्र परमात्माका दर्शन करके मनुष्य पापराशिसे मुक्त हो जाता है। काशीमें विशालाक्षी, प्रयागमें ललितादेवी, गयामें मङ्गलादेवी तथा कृतशौचतीर्थमें सँहिकादेवीका दर्शन करनेसे भी उक्त फलकी प्राप्ति होती है। गयामें रहकर मनुष्य जो कुछ दान करता है, वह सब अक्षय होता है। उसके उत्तम कर्मसे पितर प्रसन्न होते हैं। पुत्र गयामें स्थित होकर जो अन्नदान करता है, उसीसे पितर अपनेको पुत्रवान् मानते हैं।