बारह महीनोंके दशमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा

सनातनजी कहते हैं- नारद! अब मैं तुम्हें दशमीके व्रत बतलाता हूँ, जिनका भक्तिपूर्वक पालन करके मनुष्य धर्मराजका प्रिय होता है। चैत्र शुक्ला दशमीको सामयिक फल, फूल और गन्ध आदिसे धर्मराजका पूजन करना चाहिये। उस दिन पूरा उपवास या एक समय भोजन करके रहे। व्रतके अन्त में चौदह ब्राह्मणोंको भोजन करावे और अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा दे। विप्रवर! जो इस प्रकार धर्मराजकी पूजा करता है, वह धर्मकी आज्ञासे देवताओंकी समता प्राप्त कर लेता है और फिर उससे च्युत नहीं होता। जो मानव वैशाख शुक्ला दशमीको गन्ध आदि उपचारों तथा श्वेत और सुगन्धित पुष्पोंसे भगवान् विष्णुको पूजा करके उनकी सौ परिक्रमा करता और यत्नपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें स्थान पाता है। सरिताओंमें श्रेष्ठ जहुपुत्री गङ्गा ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको स्वर्गसे इस पृथ्वीपर उतरी थी, इसलिये वह तिथि पुण्यदायिनी मानी गयी है। ज्येष्ठ मास, शुक्लपक्ष, हस्त नक्षत्र, बुध दिन, दशमी तिथि, गर करण, आनन्द योग, व्यतीपात, कन्याराशिके चन्द्रमा और वृषराशिके सूर्य इन दसोंका योग महान् पुण्यमय बताया गया है। इन दस योगोंसे युक्त दशमी तिथि दस पाप हर लेती है। इसलिये उसे 'दशहरा' कहते हैं। जो इस 'दशहरा में गहाजीके पास पहुँचकर प्रसन्नचित्त हो विधिपूर्वक गहाजीके जलमें मान करता है वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। मनु आदि स्मृतिकारोंने आषाढ़ शुक्ला दशमीको पुण्य-तिथि कहा है, अतः उसमें किये जानेवाले स्नान, जप, दान और होम स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाले हैं। श्रावण शुक्ला दशमी सम्पूर्ण आशाओंकी पूर्ति करनेवाली हैं। इसमें गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान् शङ्करकी पूजा उत्तम मानी गयी है। उस दिन किया हुआ उपवास या नक्तव्रत, ब्राह्मणभोजन, जप, सुवर्णदान तथा धेनु आदिका दान सब पापों का नाशक बताया गया है।

द्विजश्रेष्ठ! भाद्रपद शुक्ला दशमीको 'दशावतार व्रत' किया जाता है। उस दिन जलाशयों खान करके सध्याचन्दन तथा देवता, पषि और पितरोंका तर्पण करनेके पवार एकाचित हो दशावतार विग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, त्रिविक्रम (वामन), परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि-इन दसोंकी सुवर्णमयी मूर्ति बनवाकर विधिपूर्वक पूजा करे और दस ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें उन मूर्तियोका दान कर दे। नारद! उस दिन ठपवास या एक समय भोजनका व्रत करके ब्राह्मणों को भोजन करावे और उन्हें विदा करके एकाग्रचित्त हो स्वयं इष्टजनकि साथ भोजन करे। जो भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर अन्तमें विमानद्वारा सनातन विष्णुलोकको जाता है। आश्विन शुक्ला दशमीको 'विजयादशमी' कहते हैं। उस दिन प्रात:काल घरके आँगनमें गोबरके चार पिण्ड मण्डलाकार रखे। उनके भीतर श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न-इन चारोंकी पूजा करे। गोबरके ही बने हुए चार ढक्कनदार पात्रों में भीगा हुआ धान और चाँदी रखकर उसे धुले हुए वस्त्रसे हक देना चाहिये। फिर पिता, माता, भाई, पुत्र, स्त्री और भृत्यसहित गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे उस धान्यकी विधिपूर्वक पूजा करके नमस्कार करे। फिर पूजित ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकारको विधिका पालन करके मनुष्य निश्चय ही एक वर्धतक सुखी और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। नारद! कार्तिक शुक्ला दशमीको 'सार्वभौम-व्रत का पालन करे। उस दिन उपवास या एक समय भोजनका व्रत करके आधी रातके समय पर अथवा गाँवसे बाहर पूए आदिके द्वारा दसों दिशाओंमें बलि दे। गोबरसे लिपी हुई भूमिपर मण्डल बनाकर उसमें अष्टदल कमल अङ्कित करे और उसमें गणेश आदि देवताओंकी पूजा करे।

मार्गशीर्ष शुक्ला दशधोको 'आरोग्यवत का आचरण करे। दस साधणोंका गल्ब आदिसे पूजन को और पक्षिणा देकर लिया करे। स्वयं का दिन एक समय सोचन करके रहे। इस प्रकार व्रत करके मनुष्य इस भूतलपर आरोग्य पाता और धर्मराजके प्रसादसे देवलोकमें देवताकी भौति आनन्दका अनुभव करता है। पौष शुक्ला दशमीको विश्वेदेवोंकी पूजा करनी चाहिये। विश्वेदेव दस हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं-क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, मुनि, गुरु, विप्र और राम। इन सबमें भगवान् विष्णु भलीभाँति विराजमान हैं। विश्वेदेवोंकी कुशमयी प्रतिमाएँ बनाकर उन्हें कुशके ही आसनोंपर स्थापित करे। आसनोंपर स्थित हो जाने पर उनमेंसे प्रत्येकका गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिके द्वारा पूजन करे। प्रत्येकको दक्षिणा देकर प्रणाम करनेके अनन्तर उन सबका विसर्जन करे। उनपर चढ़ी हुई दक्षिणाको श्रेष्ठ द्विजों अथवा गुरुको समर्पित करे। विप्रर्षे! इस प्रकार एक समय भोजनका व्रत करके जो व्रती पुरुष उक्त विधिका पालन करता है, वह उभय लोकके उत्तम भोगोंका अधिकारी होता है। नारद! माघ शुक्ला दशमीको इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास करके अङ्गिरा नामवाले दस देवताओंकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनाकर गन्ध आदि उपचारोंसे उनकी भली भाँति पूजा करनी चाहिये। आत्मा, आयु, मन, दक्ष, मद, प्राण, बर्हिष्मान्, गविष्ठ, दत्त और सत्य-ये दस अङ्गिरा हैं। उनकी पूजा करके दस ब्राहाणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और उक्त स्वर्णमयी मूर्तियाँ उन्हींको अर्पित कर दे। इससे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है। फाल्गुन शुक्ला दशमीको चौदह यमों की पूजा करे। यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तका, वैवस्वत, काल, सर्वभूताय औदुम्बर एन, नील, परमेही, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त-ये चौदह यम है। गन्ध आदि उपचारोंसे इनकी भलीभाँति पूजा करके कुशसहित तिलमिश्रित जलकी तीन-तीन अञ्चलियोंसे प्रत्येकका तर्पण करे। तदनन्तर ताँबे के पात्र में लाल चन्दन, तिल, अक्षत, जौ और जल रखकर उन सबके द्वारा सूर्यको अघर्य मन्त्र इस प्रकार है-

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।

गृहणाघर्य मया दत्तं भक्त्या मामनुकम्पय।।

(ना0 पूर्व0)

सहस्त्रों किरणोंसे सुशोभित तेजोराशि जगदीश्वर सूर्यदेव! आइये, भक्तिपूर्वक मेरा दिया हुआ अघर्य स्वीकार कीजिये। साथ ही मुझे अपनी सहज कृपासे अपनाइये।

इस मन्त्रसे अघर्य देकर चौदह ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा रजतमयी दक्षिणा दे। उन्हें विदा करके स्वयं भी भोजन करे। ब्रह्मन् ! इस प्रकार विधिका पालन करके मनुष्य धर्मराजकी कृपासे इहलोकेके धन, पुत्र आदि देवदुर्लभ भोगोंको भोगता है और देहावसान होनेपर श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके लोकका भागी होता है।