नारद महा पुराण
काशीकी गडाके बरणा-संगम, असी-संगम तथा पञ्चगङ्गा आदि तीर्थोंका माहात्म्य
पुरोहित वसु कहते हैं- भरे ! अब मैं तुम्हें काशीकी गङ्गाका उत्तम माहात्म्य बताता है, जो भोग और मोक्षरूप फल देनेवाला है। अविमुक्त- क्षेत्र में जो भी कर्म किया जाता है, वह अक्षय हो जाता है। कोई भी पापी अविमुक्तक्षेत्र (काशी)- में जाकर पापरहित हो जानेके कारण कभी नरकमें नहीं पड़ता। शुभे। अविमुक्तक्षेत्रमें किया हुआ पाप वजतुल्य हो जाता है। तीनों लोकोंमें जो मोक्षदायक तीर्थ हैं, वे सम्पूर्ण सदा काशीकी उत्तरवाहिनी गङ्गाका सेवन करते हैं। जो दशाश्वमेधघाटमें स्नान करके विश्वनाथजीका दर्शन करता है, वह शीघ्र ही पापमुक्त होकर संसारबन्धनसे छूट जाता है। यों तो पुण्यसलिला गङ्गा सर्वत्र ही ब्रह्महत्या-जैसे पापोंका निवारण करनेवाली हैं, तथापि काशीमें जहाँ उनकी धारा उत्तरकी ओर बहती है, वहाँ उनकी विशेष महिमा प्रकट होती है। वरणा और गङ्गाके तथा असी और गङ्गाके सङ्गममें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है। काशीकी उत्तरवाहिनी गङ्गामें कार्तिक और माघ मासमें स्नान करके मनुष्य महापाप आदि पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। सुन्दरी ! वहाँ धर्मनद नामसे विख्यात एक कुण्ड है। उसमें धर्म स्वरूपतः प्रकट होकर बड़े बड़े पातकोंका नाश करता है। वहीं धूली एवं धूतपापा भी है, जो सर्वतीर्थमयी एवं शुभकारक है। जैसे नदीका वेग तटवर्ती वृक्षोंको गिरा देता है, उसी प्रकार वह धूतपापा समस्त पापराशिको हर लेती है।
काशीमें किरणा, धूतपापा, पुण्य सलिला सरस्वती, गङ्गा और यमुना-ये पाँच नदियाँ एकत्र बतायी गयी हैं। इनसे त्रिभुवनविख्यात पशनद (पशगङ्गा) तीर्थ प्रकट हुआ है। उसमें 'हुबकी लगानेवाला मानव फिर पाङ्चभौतिक शरीर नहीं धारण करता। यह पाँच नदियोंका सङ्गम समस्त पापराशियोंका नाश करनेवाला है। उसमें नान करनेमात्रसे मनुष्य ब्रह्माण्डमण्डपका भेदन करके परम पदको प्रास होता है। प्रयागमें माघ मासमें विधिपूर्वक स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह काशीके पञ्चगङ्गातीर्थमें एक ही दिनके स्नानसे मिल जाता है। पञ्चगङ्गामें स्रान और पितरोंका तर्पण करके 'माधव' नामसे प्रसिद्ध भगवान् विष्णुको पूजा करनेवाला पुरुष फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जिन्होंने पञ्चगङ्गामें श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया है, उनके पितर अनेक योनियोंमें पड़े होनेपर भी मुक्त हो जाते हैं। पञ्चनदतीर्थमें श्राद्धकर्मको महिमाका प्रत्यक्ष दर्शन करके यमलोकमें पितरलोग यह गाथा गाया करते हैं कि 'क्या हमारे वंशमें भी कोई ऐसा होगा, जो काशीके पञ्चनदतार्थमें आकर श्राद्ध करेगा? जिससे हम लोग मुक्त हो जायेंगे।' पञ्चनदतीर्थमें जो कुछ धन दान किया जाता है, कल्पके अन्ततक उसके पुण्यका क्षय नहीं होता। वन्ध्या स्त्री भी एक वर्षतक पञ्चगङ्गातीर्थमें मान करके यदि मङ्गलागौरीका पूजन करे तो वह अवश्य ही पुत्रको जन्म देती है। वस्त्रसे छाने हुए पञ्चगडाके पवित्र जलसे यहाँ दिक्श्रुतादेवीको नान कराकर मनुष्य महान् फलका भागी होता है। पञ्चामृतके एक सौ आठ कलशों के साथ तुलना करनेपर पज्ञगङ्गाका एक बूंद जल भी उनसे श्रेष्ठ सिद्ध होता है। इस लोको पञ्चकूच (पञ्चगव्य) पीनेसे जो शुद्धि कही गयी है, वही शुद्धि श्रद्धापूर्वक पञ्चाङ्गाके जलकी एक बूंद पीनेसे पास होती है और उसके कुण्डमें खान करनेसे राजसूय तथा अवमेधयज्ञका जो फल कक्षा गया है, उससे सौगुना उत्तम फल उपलब्ध होता है। राजसूय और अश्वमेष-या केवल स्वर्गक साधक है, किंतु पञ्चगमाके चलसे ब्राह्मलोकतकके सम्पूर्ण द्वन्द्वोंसे मुक्ति मिल जाती है। सत्ययुगमें वह 'धर्मनद' के नामसे प्रसिद्ध हुआ, वामें उसीका नाम'धूतपापा' हुआ। द्वापरमें ठसे विन्दुतीर्थ' कहा जाने लगा और कलियुगमें 'पञ्चनद' के नामसे उसकी ख्याति होती है। पञ्चनदतीर्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थीका शुभ आश्रय है, उसकी अत्यन्त महिमाका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। भद्रे ! इस प्रकार मैंने तुम्हें काशीका उत्तम माहात्म्य बताया है। वह मनुष्योक लिये सुखद, मोक्षप्रद तथा बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। महापावकी एवं उपपातकी मानव भी अविमुक्तक्षेत्रके इस माहात्म्यको सुनकर शुद्ध हो जाता है। ब्राह्मण इसको सुनने और पढ़नेसे वेदोंका विद्वान् होता है। क्षत्रिय युद्ध में विजय पाता है, वैश्य धन-सम्पत्तिसे भरपूर होता है और शूद्रको वैष्णव भक्तोंका सङ्ग प्रास होता है। सम्पूर्ण यज्ञोंमें जो फल मिलता है, समस्त तीर्थों में जो फल प्राप्त होता है, वह सब इसके पाठसे और श्रवणसे भी मनुष्य प्राप्त कर लेता है। विद्यार्थी इससे विद्या पाता है, धनार्थी धन पाता है, पत्नी चाहनेवाला पत्नी और पुत्रकी इच्छावाला पुरुष पुत्र पाता है।