नारद महा पुराण
राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति
मोहिनी बोली- मुनिश्रेष्ठ! पूर्वकालमें महाराज इन्द्रद्युमने श्रीकृष्ण आदिकी प्रतिमाओंका निर्माण कैसे कराया? भगवान् लक्ष्मीपति उनपर किस प्रकार संतुष्ट हुए? ये सब बातें मुझे बताइये।
पुरोहित वसुने कहा-चारुनयने ! वेदके तुल्य माननीय पुराणकी बातें सुनो। मैं श्रीकृष्ण आदिको प्रतिमाओं के प्रकट होनेका प्राचीन वृत्तान्त कहता हूँ, सुनी। राजा धुके अपमेयनामा महायज्ञके
अनुष्ठान और प्रासाद-निर्माणका कार्य पूर्ण हो जानेपर उनके मन में दिन-रात प्रतिमाके लिये चिन्ता रहने लगी। वेसोचने लगे-'कौन-सा उपाय कसै, जिससे सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले, सम्पूर्ण लोकोंके उत्पादक देवेश्वर भगवान् पुरुषोत्तमका मुझे दर्शन हो'-इसी चिन्ता निमय रहनेके कारण महाराजको न रातमें नींद आता था, नबिनमा वमता भाँति-भाँतिक भोग भोगते और न सान एवं प्रकार ही करते थे। इस पृथ्वीपर पत्थर, लकड़ी अथवा धातु, किससे भगवान् विष्णुको योग्य प्रतिमा हो सकती है, जिसमें भगवान्के सभी लक्षणोंका अकून ठीक-ठीक हो सके । इन तीनोंमेंसे किसकी प्रतिमा भगवान्को प्रिय तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होगी, जिसकी स्थापना करनेसे भगवान् प्रसन्न हो जायेंगे।' इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े-पड़े उन्होंने पाश्चरात्रकी विधिसे भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन किया और अन्तमें ध्यानमग्न हो राजाने इस प्रकार स्तुति प्रारम्भ की।
इन्द्रद्युम्न बोले-वासुदेव! आपको नमस्कार है। आप मोक्षके कारण हैं, आपको मेरा नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी परमेश्वर! आप इस जन्म-मृत्युरूपी संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये। पुरुषोत्तम! आपका स्वरूप निर्मल आकाशके समान है। आपको नमस्कार है। सबको अपनी ओर खींचनेवाले संकर्षण! आपको प्रणाम है। धरणीधर! आप मेरी रक्षा कीजिये। भगवन्! आपका श्रीअङ्ग मेघके समान श्याम है। भक्तवत्सल ! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण देवताओंके निवासस्थान ! आपको नमस्कार है। देवप्रिय आपको प्रणाम है। नारायण! आपको नमस्कार है। आप मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये। नील मेघके समान आभावाले घनश्याम ! आपको नमस्कार है। देवपूजित परमेश्वर ! आपको प्रणाम है। विष्णो! जगन्नाथ ! मैं भवसागरमें डूबा हुआ हूँ। मेरा उद्धार कीजिये। पूर्वकालमें महावराहरूप धारण करके आपने जिस प्रकार जलमें डूबी हुई पृथ्वीका रसातलसे उद्धार किया था, उसी प्रकार मेरा भी दुःखके समुद्रसे उद्धार कीजिये। कृष्ण! आपकी वरदायक मूर्तियोंका मैंने स्तवन किया है। ये बलदेव आदि जो पृथक् रूपसे स्थित है, इन सबके रूपमें आप ही विराजमान हैं। देवेश। प्रभो! अच्युत । गरुड़ आदि पार्षद भायुषासहित इन्द्र आदि विपाल आपके ही अङ्ग है। देवेश! आप मुझे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाला वर प्रदान करें। हरे! आप एकमात्र व्यापक, चेतनस्वरूप तथा निरञ्जन हैं। आपका जो परम स्वरूप है, वह भाव और अभावसे रहित, निर्लेप, निर्मल, सूक्ष्म, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, समस्त उपाधियोंसे विमुक्त और सत्तामात्ररूपसे स्थित है। प्रभो! उसे देवता भी नहीं जानते, फिर मैं कैसे जान सकता हूँ। उससे भिन्न जो आपका दूसरा स्वरूप है, वह पीताम्बरधारी और चार भुजाओंसे युक्त है। उसके हाथों में शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हैं। वह मुकुट और अङ्गद धारण करता है। उसका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे युक्त है तथा वह वनमालासे विभूषित रहता है। देवता तथा आपके अन्यान्य शरणागत भक्त उसीकी पूजा करते हैं। देव! आप सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ एवं भक्तोंको अभय देनेवाले हैं। मनोहर कमलके समान नेत्रोंवाले प्रभो! मैं विषयोंके समुद्रमें डूबा हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। लोकेश! मैं आपके सिवा और किसीको नहीं देखता, जिसकी शरणमें जाऊँ। कमलाकान्त! मधुसूदन! आप मुझपर प्रसन्न होइये। मैं बुढ़ापे और सैकड़ों व्याधियोंसे युक्त हो नाना प्रकारके दुःखोंसे पीड़ित हूँ तथा अपने कर्मपाशमें बंधकर हर्ष-शोकमें मग्न हो विवेकशून्य हो गया हूँ। अत्यन्त भयंकर घोर संसार-समुद्रमें गिरा हूँ। यह भवसागर विषयरूपी जलराशिके कारण दुस्तर है। इसमें राग-द्वेषरूपी मत्स्य भरे पड़े हैं। इन्द्रियरूपी भँवरोंसे यह बहुत गहरा प्रतीत होता है। इसमें तृष्णा और शोकरूपी लहरें व्यास हैं। यहाँ न कोई आश्रय है, न अवलम्ब। यह सारहीन एवं अत्यन्त चश्चल है। प्रभो! मैं मायासे मोहित होकर इसके भीतर चिरकालसे भटक रहा हूँ। हजारों भिन्न-भिन्न योनियों में बारंबार जन्म लेता है। प्रभो! देवता, पशु, पक्षी, मनुष्य तथा अन्य चराचर भूतोंमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ मेरा जाना न हुआ हो। सुरश्रेष्ठ! जैसे रहटमें रस्सीसे बंधी हुई घटी कभी ऊपर जाती, कभी नीचे आती और कभी बीच में ठहरी रहती है, उसी प्रकार मैं कर्मरूपी रज्जुमें बैंधकर दैवयोगसे ऊपर, नीचे तथा मध्यवर्ती लोकमें भटकता रहता हूँ। इस प्रकार यह संसार-चक्र बड़ा ही भयानक एवं रोमाञ्चकारी है। मैं इसमें दीर्घकालसे घूम रहा हूँ, किंतु कभी मुझे इसका अन्त नहीं दिखायी देता। समझमें नहीं आता, अब मैं क्या करूँ? हरे! मेरी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी हैं। मैं शोक और तृष्णासे आक्रान्त होकर अब कहाँ जाऊँ? मेरी चेतना लुप्त हो रही है। देव! इस समय व्याकुल होकर मैं आपको शरणमें आया हूँ। श्रीकृष्ण! मैं संसार-समुद्र में डूबकर दुःख भोग रहा हूँ, मुझे बचाइये। जगन्नाथ! यदि आप मुझे अपना भक्त मानते हैं तो मुझपर कृपा कीजिये। आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा बन्धु नहीं है जो मेरी तरफ खयाल करेगा। देव! प्रभो। आप-जैसे स्वामीकी शरणमें आकर अब मुझे जीवन-मरण अथवा योगक्षेमके लिये कहीं भी भय नहीं होता। हरे ! अपने कर्मोंसे बंधे रहनेके कारण मेरा जहाँ-कहीं भी जन्म हो, वहाँ सर्वदा आपमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे। देव! आपकी आराधना करके देवता, दैत्य, मनुष्य तथा अन्य संयमी पुरुषोंने परम सिद्धि प्राप्त की है, फिर कौन आपकी पूजा नहीं करेगा? भगवन्! ब्रह्मा आदि देवता भी आपकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, फिर मानवी बुखिसे मैं आपकी स्तुति कैसे कर सकता हूँ; क्योंकि आप प्रकृतिसे परे हैं। अत: देवेश्वर! आप भक्त-नेहके वशीभूत होकर मुझपर प्रसन्न होइये। देव! मैंने भक्तिभावित चित्तसे आपकी जो स्तुति की है, वह साङ्गोपाङ्ग सफल हो । वासुदेव! आपको नमस्कार है।