वामन महा पुराण
हरललित-शङ्कर के कपाली होने का कारण(पूर्वानुवृत्त)
पुलस्त्य ने कहा- हे ब्रह्मन् । तदनन्तर परतल में दारुण कपाल के सस्थित रहने पर रद्र चिन्ता के कारण व्याकुलेन्द्रिय होने से सन्तप्त हुए।
तदुपरान्त नीलाञ्जन समूह के समान कान्तिवाली, रक्त केशवाठी, रौद्र एवं भयंकर ब्रह्महत्या महादेव के निस्ट आई। (२)
उस विकराल मूर्ति को आयी देस कर श्री शकर ने पूछा-'हे रौद्रे, यह पतलाओ कि तुम कौन हो एवं हे किस लिये आयी हो?
तय उस अत्यन्त दारुण ब्रह्महत्या ने कपाली से कहा-
नरो मदीयः पुरुपो महात्मा ॥ ५४
इत्येवमुक्तो यचनं त्रिनेत्रश्-
चिक्षेप सूर्ये पुरुषं विरिः।
नरं नरस्यैव तदा स विग्रह
चिक्षेप धर्मप्रभवस्य देवः॥ ५५
३
ब्रह्मवध्याऽस्मि संप्राप्ता मां प्रतीच्छ त्रिलोचन ॥४
इत्येवमुक्त्वा वचनं ब्रह्महत्या विवेश ह ।
त्रिशूलपाणिनं रुद्रं संप्रतापितविग्रहम् ॥ ५
ब्रह्महत्याभिभूतश्च शर्यो बदरिकाश्रमम् ।
आगच्छन्न ददर्शाथ नरनारायणावृपी ॥६
अदृष्ट्वा धर्मतनयो चिन्ताशोकसमन्वितः ।
जगाम यमुनां स्नातुं साऽपि शुष्कजलाऽभवत् ॥ ७
कालिन्दी शुष्कसलिलां निरीक्ष्य वृषकेतनः ।
को पराजित कहा जाना अभीर है तो यह तेरा ही नर है। मेरा पुस्प तो महाबली है। (५४)
ऐसा कहे जाने पर श्रीशंकर जी ने विरिति के पुरुष को सूर्यमण्डल में फेंका तथा उन्हीं शकर ने उस नर को धर्म पुत्र नर के शरीर म फेंक दिया। (५५)
३
" "मैं ब्रह्महत्या यहाँ आयी हूँ। हे निलोचन । आप मुझे स्वीकार करें।
ऐसा कह कर ब्रह्महत्या सन्तप्त शरीरवाले निशूलपाणि रुद्र में प्रविष्ट हुई।
ब्रह्महत्या से अभिभूत श्री शकर वदरिकाश्रम मे आए, किन्तु यहाँ नर एव नारायण पियों को नहीं देखा । (६)
धर्मतनय ऋषिद्वय को न देखकर चिन्ता और शोक से युक्त वे यमुना में स्नान करने गए, किन्तु उसका भी अल (७)
कालिन्दी नदी को शुष्कसलिला हुई देख कर वृपकेतन
तृतीयोऽध्याय
प्लक्षना स्नातुमगमदन्तान च सा गवा ॥ ८
ततोनु पुफरारण्यं मागधारण्यमेव च ।
सन्यवारण्यमेवासी गत्वा स्नातो यथेच्छया ॥ ९
तथैव नैमिपारण्यं धारण्य तयेवरः।
स्नातो नैव च सा रोद्रा ब्रह्महत्या व्यमुश्चत ॥ १०
सरित्सु तीर्थेषु तथाश्रमेषु
पुण्येषु देवायतनेषु शर्व।
समायुतो योगयुतोऽपि पापा
नावाप मोक्षं जलदधनोऽमौ ॥११
ततो जगाम निर्विष्ण. शंकरः पुरजाङ्गलम् ।
तर गत्ला ददर्शाथ चक्रपाणिं सगध्वजम् ॥ १२
तं दृष्ट्या पुण्डरीकाक्षं शहचरगदाघरम् ।
कृताअलिपुटो भूत्या हर स्तोत्रमुदीरयत् ॥ १३
हर उवाच ।
नमस्ते देवतानाय नमस्ते गरुडध्वज ।
राह चक्रगदापाणे वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ १४
नमस्ते निर्गुणानन्त अप्रताय वेधसे ।
(शंकर) प्लक्षजा (सरपती) नदी में स्नान करने गए। किंतु यह भी अन्तर्धान हो गई। (८)
तदुपरान्त पुकारण्य, मगधारण्य और सैन्धवारण्य में जाकर उन्होंने इच्छानुसार स्नान किया। (8)
इसी प्रकार शंकर ने नैमिपारण्य तथा धर्मारण्य में भी जारर स्नान किया किन्तु उस भयकर ब्रह्महत्या ने उन्हें नहीं छोड़ा। (१०)
जरदय शंकर ने अनेक नदियों, तीर्थों, आश्रमों एय पवित्र देयायतनों की यात्रा की तथापि योगी होने पर भी ये पाप से मुक्ति न प्राप्त कर सके।
तदनन्तर खिन्न शंकर जी कुरजागल में गये। वहाँ आरर उन्होंने गरयज घप्रपाणि (विष्णु) को देखा । (१२)
मन शंख-चक्र-गदापारी पुण्डरीकाक्ष (श्री नारायण) का दर्शन कर शंकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। (१३)
हर ने कहा-"है देयतामों क नाप | आपको नमाचार है, हे गरुडघ्यज। आपको प्रगाम है, हे शंखपक्रगदाधारी वासुदेव । आपो नमस्कार है।" (१४)
"हे निर्गुण, अनन्त,अप्रतयं,विधाता आप नमामर
ज्ञानाज्ञान निरालम्म सर्वालम् नमोऽस्तु ते ॥ १५
रजोयुक्त नमस्तेऽस्तु ब्रह्ममूर्ते सनातन ।
नया सर्वमिदं नाथ जगत्सृष्टं चराचरम् ॥ १६
सत्याधिष्ठित लोकेश पिष्णुमू अघोधज ।
प्रज्ञापाल महागाही जनार्दन नमोऽस्तु ते ॥ १७
वमोमूर्ते अहं घेप त्वदंशक्रोधसंभवः ।
गुणाभियुक्त देवेश सर्वव्यापिन् नमोऽस्तु ते ॥ १८
भूरिय त्वं जगन्नाथ जलापरहुताशनः ।
वायुप॑दिर्मनश्चापि शर्वरी स्व नमोऽस्तु ते ॥ १९
धर्मों यज्ञस्तपः मत्यमहिंसा शौचमार्जवम् ।
क्षमा दानं दया लक्ष्मीब्रह्मचर्य त्वमीश्वर ॥ २०
त्वं साझाश्चतुरो वेदास्त्वं वेद्यो वेदपारगः।
उपपैदा भवानीश सर्वोऽसि त्वं नमोऽस्तु ते ॥ २१
नमो नमस्तेऽच्युत चक्रपाणे
नमोऽस्तु ते माधव मीनमृते।
लोके भवान् कारुणिको मतो में
पायस्व मां केशव पापरन्धात् ॥ २२
ममाशुभं नाशय विग्रहस्थं
यद् ब्रह्महत्याऽभिभवं बभूव ।
दग्धोऽस्मि नष्टोऽस्म्यसमीक्ष्यकारी
पुनीहि तीर्थोऽसि नमो नमस्ते ॥२३
पुलस्त्य उवाच ।
इत्थं स्तुतश्चक्रधरः शंकरेण महात्मना ।
प्रोवाच भगवान् वाक्यं ब्रह्महत्याक्षयाय हि ॥ २४
हरिरुवाच ।
महेश्वर शृणुष्वेमां मम वाच कलस्वनाम् ।
ब्रह्महत्याक्षयकरी शुभदा पुण्यवर्धनीम् ।। २५
योऽसौ प्राइमण्डले पुण्ये मदंशप्रभवोऽव्ययः ।
प्रयागे वसते नित्यं योगशायीति विश्रुतः ॥ २६
चरणाद् दक्षिणात्तस्य विनिर्याता सरिद्वरा
विश्रुता वरणेत्येव सर्वपापहरा शुभा ॥ २७
सव्यादन्या द्वितीया च असिरित्येव विश्रुता।
ते उभे तु सरिच्छ्रेष्ठे लोकपूज्ये बभूवतुः ॥ २८
है। हे शानाज्ञानस्वरूप, निरालम्ब एव सर्यालम्य । आपको नमस्कार है।" (१५)
हे तोयुक्त, हे सनातन, हे ब्रह्ममूनि । आपको नमस्कार है। हे नाथ, आप ने इस सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि (१६)
हे मरवगुग के आश्रय, हे राकेश । हे विष्णुमति, हे अधोक्षन ।, हे प्रजापालक, हे महायाहु ।, हे जनार्दन आपको नमस्कार है। (१७)
हे तमोमूनि । में आपके असमूत शोध से उत्पन्न हूँ। हेगुगामियुक्त सर्वव्यापी दवेश आपको नमस्कार है। (१८)
है जगन्नाथ | आप हा पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, पायु, युद्धि, मन एव रात्रि है, आप को नमस्कार है। (१६)
द ईयर । आप ही धर्म, या, दपाया, सत्य, अहिंसा, पवित्रता, सरलता, क्षमा, दान, दया, सदमी एवं ब्रह्मा- धर्य है। (२०)
हे ईश। आप अङ्गों सहित पतुर्यदत्यल्प, घेघ एय घेदपारगामी है। आप ही पवेद पया सभी पुद आप ही है। आपको नमत्थर है। (२१)
हे अच्युत । हे चक्रपाणि । आपको बारबार नमस्कार है। हे मीनमूर्तिधारी माधय । आपको नमस्कार है। मैं आपको लोक में दयालु मानता हूँ। हे केशव । मुझे आप पाप-बन्धन से मुक्त करें। (२२)
मेरे शरीर में स्थित ब्रह्महत्या जन्य अशुभ को आप नष्ट करें। विना विचार किये कार्य करने वाला में दग्ध एव नष्ट हो गया हूँ। आप तीर्थ है । अत आप मुझे पवित्र क्रें। आपको बारंवार नमस्कार है। (२३)
पुलस्त्य ने कहा-महात्मा शकर द्वारा इस प्रकार स्तुति की जाने पर चक्रधर (भगवान विष्णु) ने ब्रह्महत्या के क्षय के हेतु कहा-(२४)
हरि ने कहा-“हे महेश्वर । आप श्रुतिमधुर, ब्रह्महत्या क्षयसरी, शुभप्रद एव पुण्य को बढ़ाने वाली मेरी बात सुनें। (२५)
पवित्र प्राइमण्डलान्तर्गत प्रयाग में मेरे अश से उत्पन्न योगशायी नाम से प्रसिद्ध अव्यय पुस्प निस्य निवास करते है। (२६)
उनके दक्षिण चरण से धरणा नाम से विश्रुत श्रेष्ठ नदी निकली है यह सर्वपापहारिणी तथा पवित्र है। (२७)
ताभ्यां मध्ये तु यो देशस्तरक्षेत्रं योगशायिनः ।
त्रैलोक्यप्रवरं तीर्थ सर्वपापप्रमोचनम् ।
न तादृशोऽस्ति गगने न भूभ्यां न रसावले ॥ २९
तत्रास्ति नगरी पुण्या ख्याता वाराणसी शुभा ।
यस्यां हि भोगिनोऽपीश प्रयान्ति भवतो लयम् ॥ ३०
विलासिनीनां रशनास्वनेन
श्रुतिस्वनैाह्मणपुंगवानाम् ।
शुचिस्वरत्वं गुरयो निशम्य
हास्यादशासन्त मुहुर्मुहस्तान् ॥ ३१
बजत्सु योपित्सु चतुष्पथेषु
पदान्यलक्तारुणितानि दृष्ट्वा ।
ययौ शशी विस्मयमेव यस्या
किंस्वित् प्रयाता स्थलपद्मिनीयम् ॥ ३२
तुङ्गानि यस्यां सुरमन्दिराणि
रुन्धन्ति चन्द्रं रजनीमुखेषु ।
दिवाऽपि सूर्य पवनाप्लुताभि-
र्दीर्घाभिरेवं सुपताकिकामिः ॥ ३३
भृङ्गाश्च यस्यां शशिकान्तभित्ती
प्रलोभ्यमानाः प्रतिविम्नितेपु ।
आलेख्ययोपिद्विमलाननाम्जे-
पीयुर्घमान्नैव च पुष्पकान्तरम् ॥ ३४
परिश्रमश्चापि पराजितेपु
नरेषु संमोहनखेलनेन ।
यस्यां जलक्रीडनसंगतासु
न स्त्रीपु शंभो गृहदीर्घिकासु ॥ ३५
न चैव कश्चित् परमन्दिराणि
रुणद्धि शंमो सहसा ऋतेऽक्षान् ।
न चावलानां तरसा पराक्रम
करोति यस्यां सुरतं हि मुक्त्वा ।। ३६
पाशग्रन्धिर्गजेन्द्राणां दानच्छेदो मदच्युतौ ।
यस्यां मानमदी पुंसां करिणां यौवनागमे ॥ ३७
प्रियदोषाः सदा यस्यां कौशिका नेतरे जनाः ।
तारागणेऽकुलीनत्वं गये वृत्तच्युतिर्विभो ॥ ३८
एव उनके वाम (पाद) से असि नाम से प्रसिद्धएक दूसरी नदी निग्ली है। ये दोनों श्रेष्ठ नदियाँ लोकपूज्य हुई हैं।(२८))
उन दोनों के मध्य का प्रदेश योगशायी का क्षेत्र है वह त्रैलोक्य मे सर्वश्रेष्ठ तथा सभी पापों से मुक्त करनेवाला तीर्थ है। उसके सदृश अन्य कोई तीर्थ आकाश, पृथ्वी एवं रसातल में नहीं है। (२६)
हे ईश। वहाँ पवित्र शुभप्रद विख्यात पाराणसी नगरी है जिसमे भोगी लोग भी आपके स्थान को प्राप्त करते हैं।(३०)
श्रेष्ठ ब्राह्मणों की वेदध्वनि विलासिनियों की रशनाध्यनि से मिश्रित होकर कल्याणप्रद स्वर का रूप धारण करती है। उस ध्वनि को सुन कर गुरजन वारंवार हास्यपूर्वक उनका शासन करते हैं। (३१)
चतुष्पथों पर भ्रमण करने वाली स्त्रियों के अलक से अरणित पदों को देख कर चन्द्रमा को यह विस्मय हो गया कि क्या स्थल कमलिनी इस मार्ग से गई है। (३२)
जिसमें रात्रि का आरभ होने पर ऊँचे-ऊँचे देवमन्दिर चन्द्रमा का अपरोध करते है एघ दिन में पवनान्दोलित दीर्घ पताकाओं से सूर्य को तिरोहित किया करते हैं। (३३)
जिस (वाराणसी) मे चित्र में निर्मिन स्त्रियों के विमल मुख कमलों को चन्द्रकान्त मणि की भित्तियों पर प्रति-विम्बित देखकर भ्रमवश उनपर लुब्ध भ्रमर दूसरे पुष्पों की ओर नहीं जाते। (३४)
और हे शम्भो ! जिस (वाराणसी) में समोइन खेलों से पराजित पुरुषों मे तथा गृह की बालियों में जलक्रीड़ा के लिए एकत्र हुई स्त्रियों में ही परिश्रम होता है, अन्यत्र नहीं। (३५)
जहाँ पासों के अतिरिक्त अन्य कोई भी दूसरे के घरों को सहसा नहीं रोक्ता तथा सुरत काल के अतिरिक्त कोई स्त्रियों के साथ आवेगयुक्त पराक्रम नहीं करता । (३६)
जहाँ हाथियों के बन्धन में ही पाशप्रन्थि, उनकी मद-च्युति में ही दानच्छेद एच नर हाथियों के यौवनागम मे ही मान और मद होते हैं (अग्यत्र नहीं)। (३७)
हे विभो। जहाँ उलूक ही सदादोपा (रात्रि) प्रिय होते हैं अन्य लोग दोपोंके प्रेमी नहीं है। तारागणों में ही अकुलीनत्व (पृथ्वी में न छिपना) है रोगों मे अकुलीनता नहीं, गद्य में ही वृत्तच्युति (छन्दोमन) है अन्यत्र वृत्त (परित्र) च्युति नहीं है। (३८)
भृतिलुब्धा विलासिन्यो भुजंगपरिवारिताः ।
चन्द्रभूपितदेहाश्च यस्यां त्वमिव शंकर ॥ ३९
ईदृशायां सुरेशान वाराणस्यां महाश्रमे ।
वसते भगयाँल्लोलः सर्वपापहरो रविः ॥ ४०
दशाश्वमेधं यत्प्रोक्तं मदंशो यत्र केशवः ।
तत्र गत्वा सुरश्रेष्ठ पापमोक्षमवाप्स्यसि ॥ ४१
इत्येवमुक्तो गरुडध्वजेन
वृपध्वजस्तं शिरसा प्रणम्य ।
जगाम वेगाद् गरुडो यथाऽसौ
वाराणसी पापविमोचनाय ॥ ४२
गत्वा सुपुण्यां नगरी सुतीयों
दृष्ट्वा च लोलं सदशाश्वमेघम् ।
स्नात्वा च तीर्थेषु विमुक्तपापः
स फेशवं द्रष्टुमुपाजगाम ॥ ४३
केशवं शंकरो दृष्ट्वा प्रणिपत्येदमत्रवीत् ।
त्वत्प्रसादाद् हृषीकेश प्रमहत्या क्षयं गता ॥ ४४
हे शंकर। जहाँ की विलासिनियाँ आप के सदृश 'भूति- लुन्धा' 'भुजंगपरिवारिता' एवं 'चन्द्रभूपितदेहा' होती हैं। (यहाँ 'भूति' पद 'भरम' और 'धन' के अर्थ में 'भुजङ्ग पद 'सर्प' एवं 'जार' के अर्थ में तथा 'चन्द्र पद 'चन्द्रा- भूपण' के अर्थ में प्रयुक्त है।) (३९)
हे सुरेशान । इस प्रकार की वाराणसी के महान् आश्रम में सर्वपापहारी भगवान लोक रवि निवास करते हैं। (४०)
हे सुरश्रेष्ठ । बहाँ दशाश्वमेध कहे जाने वाले स्थान पर, जहाँ मेरे अशस्वरूप केशव स्थित है, जाकर आप पाप से (४१)
गरडध्वज के ऐसा कहने पर वृपध्वज उन्हें शिर से प्रणाम कर पापविमोचनार्थ गरड के सदश वेग से वाराणसी गए। (४२)
उस परमपवित्रतया तीर्थमूद नगरी में जाकर दशाश्वमेघ के साथ भगवान टोलमा दर्शन किया तथा (वहाँ के) तीर्थों मे स्नान कर तथा पापमुक्त हो कर (उसके बाद) ये केशव का दर्शन करने गये। (४३)
शंकर ने केशरवो देस कर प्रणाम करने के उपरान्त
नेदं कपालं देवेश मद्धस्तं परिमुश्चति।
कारणं वेनि न च तदेतन्मे वक्तुमर्हमि ॥ ४५
पुलस्त्य उवाच।
महादेववचः श्रुत्वा केशवो वाक्यमब्रवीत् ।
निग्रते कारणं रुद्र तत्सा कथयामि ते ॥ ४६
योऽसौ ममाग्रतो दिव्यो हृद. पद्मोत्पलैयुतः ।
एप तीर्थवरः पुण्यो देवगन्धर्वपूजितः ॥ ४७
एतस्मिन्प्रवरे तीर्थे स्नानं शंभो समाचर ।
स्नातमात्रस्य चाचैव कपालं परिमोश्यति ॥ ४८
ततः कपाली लोके च रयातो रुद्र भविष्यसि ।
कपालमोचनेत्येवं तीर्थ चेदं भविष्यति ॥ ४९
पुलस्त्य उवाच
एवमुक्तः सुरेशेन देशवेन महेश्वरः।
कपालमोचने सस्नो वेदोक्तविधिना मुने । ५०
स्नातस्य तीर्थे त्रिपुरान्तकस्य
परिच्युतं हस्तवलात् कपालम् ।
नाम्ना यभूमाथ कपालमोचनं
ततीर्थवर्य भगवत्प्रसादात् ॥ ५१
इति श्रीवामनपुराणे तृतीयोध्याय।।३।।