देवताओं से हरभिषेक एव सप्तकृच्छू का विधान वर्णन, हरिहर के सयोग मे विष्णु के हदय में शिव लिङ्ग की स्थिति, हरिहरस्वरुप वर्णन, शिव द्वारा शुक को सब्जीवनी विशा की शिक्षा मङ्कणकवृत्तान्त, सप्तशारस्वतीर्थमहिमा

पुलस्त्य उवाच ।

ततो मुरारिभवनं समभ्येत्य सुरास्ततः ।

ऊचुर्देवं नमस्कृत्य जगत्साधिकारणम् ॥ १

तच्छ्रुत्वा भगवान् प्राह गच्छामो हरमन्दिरम् ।

स वेत्स्यति महाज्ञानी जगान्ध चराचरम् ॥ २

सयोक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः ।

जनार्दनं पुरस्कृत्य प्रजग्मुन्दिर गिरिम् ।

न तत्र देवं न वृपं न वी न च नन्दिनम् ॥ ३

शन्यं गिरिमपश्यन्त अज्ञानतिमिरावृता.।

तान मूढदृष्टीन् संप्रेक्ष्य देवान् विष्णुमहाद्युतिः ।। ४

प्रोवाच किं न पश्यध्वं महेश पुरतः स्थितम् । त

तमृचुनैव देवेशं पश्यामो गिरिजापतिम् ।। ५

न विद्यः कारणं तच्च येन दृष्टिहवा हि नः ।

वानुवाच जगन्मूर्तियं देवस्य सागसः ॥ ६

पापिष्ठा गर्भहन्तारो मृडान्या. स्वार्थतत्पराः।

तेन ज्ञानविधेको वै हृतो देवेन शुलिना ॥ ७

येनाग्रतः स्थितमपि पश्यन्तोऽपि न पश्यय ।

तस्मात् कायपिशुद्धयर्थ देवदृष्टयर्यमादरात् ॥ ८

तप्तकुच्छ्रेण संशुद्धाः कुरुध्वं स्नानमीश्वरे ।

क्षीरस्नाने प्रयुञ्जीत साई कुम्भशतं सुराः ॥ ९

दघिस्नाने चतुःपष्टित्रिंशद्धविपोर्हणे

पञ्चगव्यस्य शुद्धस्य कुम्भाः पोडश कीर्तिताः ॥

मधुनोऽष्टौ जलम्योक्ताः सर्वे ते द्विगुणाः सुराः ।

ततो रोचनया देवमष्टोत्तरशतेन हि ॥ ११

अनुलिम्पेत् ककुमेन चन्दनेन च भक्तितः ।

बिल्वपत्रैः सकमलैः धत्तूरसुरचन्दनैः ॥ १२

३६

पुलस्त्य ने कहा-तदनन्तर सभी देयता विष्णु के यहाँ गये एव उन्हें प्रणाम कर उनसे जगत के सक्षोभ या कारण पृछा। (१)

भगयान् मुरारि ने उसे सुनकर कहा-हम रोग शिव के घर चलें। ये महाज्ञानी चराचर जगत् के व्याकुल होने का कारण जानते होंगे। (२)

पासुदेव के ऐसा कहने पर इन्द्र आदि देवगण जनार्दन को आगे कर मन्दर पर्यंत पर गये। वहाँ उन्होंने न महादेव फो, न प को, न देवी पार्वती को और न नन्दी को दी देखा। (३)

अज्ञानान्धकार से आवृत उन लोगों ने पर्यत को शून्य देसा। महातेजस्वी विष्णु ने देवों को मृदृष्टि हुआ देसकर यदा-पया आप लोग सम्मुस स्थित महादेव को नहीं देस रहे हैं ? उन्दोंने उत्तर दिया-हम लोग गिरिजा- पति देवेश को नहीं देख रहे हैं। (४५)

हम लोग उस कारए को नहीं जानते जिससे हमारी दृष्टि नष्ट हो गयी है। जगन्मूर्ति (विष्णु) ने उनसे कहा-आप लोग देव के अपराधी है।

तुम लोग स्वार्थतत्पर होकर मृडानी का गर्भ नष्ट करने से महापापप्रस्त हुए हो इस लिए शूलपाणि महादेव ने तुम लोगों का ज्ञान और विवेक अपहृत कर लिया है। (७)

इससे तुम लोग सम्मुस स्थित (शङ्कर) को देसर भी नहीं देख रहे हो । अत सब लोग श्रद्धा के साथ शरीर की शुद्धि और देव का दर्शन प्राप्त करने के लिए तप्त कृच्छ व्रत द्वारा शुद्ध होकर स्नान परा। हे देवो । ईश्वर के स्नानार्थ डेढ़ सौ पड़ों का दुग्ध (८-१)

( तदुपरान उनके स्नानार्थ ) चौसठ घड़ों की दधि, बत्तीस पड़ों का घृत एव सोलंद घड़े शुद्ध पञ्चगव्य का विधान किया गया है। (१०)

हे देवताओ। मधु का नान आठ पदों से तथा

मन्दारैः पारिजातैश्च अतिमुफ्तैस्तथापयेत् ।

अगुरुं सह कालेयं चन्दनेनापि धूपयेत् ।। १३

जप्तव्यं शतरुद्रीयं ऋग्वेदोक्तैः पदनमः ।

एवं कृते तु देवेशं पश्यध्वं नेतरेण च ॥ १४

इत्युक्ता वासुदेवेन देयाः केशवमत्रुवन् ।

विधानं तरकृच्छ्रस्य कथ्यतां मधुसूदन ।

यस्मिंश्चीर्णे कायशुद्धिर्भवते सार्यकालिकी ।। १५

वासुदेव उवाच ।

ज्यहमुष्णं पिवेदापः व्यहमुष्णं पयः पिवेत् ।

ध्यमुष्णं पिवेत्सपिर्यायुभयो दिनत्रयम् ।। १६

पला द्वादश तोयस्य पलाष्टौ पयसः सुराः ।

पटपलं सर्पिपः प्रोक्तं दिवसे दिवसे पिनेत् ॥ १७

पुलस्त्य उवाच।

इत्येवमुक्ते पचने सुराः कायविशुद्धये ।

तप्तकृच्छरहस्यं वै चक्रुः शक्रपुरोगमाः ॥१८

वतो व्रते सुरावीणे विमुक्ताः पापतोऽभवन् ।

विमुक्तपापा देवेशं वासुदेवमथाब्रुवन् ॥ १९

कासौ वद जगन्नाथ शंभुस्तिष्ठवि केशव ।

य क्षीराद्यभिषेकेण स्नापयामो विधानतः ॥ २०

अथोवाच सुरान्धिष्णुरेप तिष्ठति शङ्करः ।

मद्देहे किं न पश्यध्वं योगश्चार्य प्रतिष्ठितः ॥ २१

तमनु व पश्यामस्त्वत्तो वै त्रिपुरान्तकम् ।

सत्यं वद सुरेशान महेशानः क तिष्ठति ।। २२

ततोऽव्ययात्मा स हरिः स्वहृत्पङ्कजशायिनम् ।

दर्शयामास देवाना मुरारिलिगमैश्वरम् ।। २३

ततः सुराः क्रमेणैव क्षीरादिभिरनन्तरम् ।

स्नापयांचक्रिरे लिङ्गं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥ २४

गोरोचनया त्वालिप्य चन्दनेन सुगन्धिना।

जल का स्नान उन सभी के दुगुने घड़ों से कहा गया है। तदनन्तर भक्ति पूर्वक देव को एक सौ आठ यार गोरोचना, फुकुम और चन्दन का लेप करे। तदुपरान्त विल्वपत्र, फमल, धत्तुर, सुरचन्दन, मन्दार, पारिजात एघ अतिमुक्त नामक पुष्पों से देय का अर्चन करे एव अगुरु, फालेय तथा चन्दन का धूप दे । (११-१३)

तदनन्तर ऋग्वेद में कथित पदरमों के साथ शतरुद्रीय का जप करना चाहिए। ऐसा करने से आप लोग देवेश्वर का दर्शन कर सकेंगे। अन्य किसी उपाय (१४)

पासुदेय के द्वारा ऐसा पहने पर देवताओं ने पेशा से वहा-हे मधुमदन । तताछ (व्रत) या विधान चतरा जिसये परने से सार्यगरिरी पाय गुद्धि होती है।

वासुदेव ने कहा-तीन दिन उच्य जल या पान करे, तीन दिन उग दुग्धपान करे, तीन दिन उक्ष्य घृत का पान करे एवं तीन दिन यायुमान या भक्षण परे। (१६)

हे देवताओ। जस द्वादश पल, दुग्ध आठ पल एय पा , पल की मात्रा में कधित दिनों में पान घरना चाहिए।

पुखरप ने कहा-पेसा कहने पर इन्द्रादि देवताओं ने शरीर की शुद्धि के लिये तप्तकच्छू व्रत का अनुष्ठान (१८)

तदनन्तर उस व्रत का पालन हो जाने पर देवता पाप से मुक्त हो गये । पाप विमुक्त देवताओं ने देवेश वासुदेव से कहा। (१९)

हे जगन्नाथ । हे केशर  आप यतला कि शम्मु कहाँ अवस्थित है ? जिन्हें हम रोग दूध आदि के अभिषेक द्वारा विधिपूर्वक स्नान करायें। (२०)

तदुपरान्त विष्णु ने देवताओं से कहा-मेरे शरीर में ये शहर सयुक्त होकर स्थित है। क्या आप लोग नहीं देस रहे है? (२१)

उन लोगों ने उनसे पहा-हम लोग आप में भी निपुरान्तक शवर को नही देख रहे हैं। हे सुरेशान। सत्य यनरायें कि महेश यहाँ स्थित हैं। (२२)

तदनन्तर अव्ययामा मुरारि हरि ने देयताओं को अपने हृदय यगल में शयन यरने पाले ईपरीय रिङ्गका दर्शन कराया। (२३)

तदुपरान देवताओं ने पमश दुग्ध आदि ये द्वारा इस नित्य. स्थिर एवं अभय लिगको स्नान पराया। (२४)

तत्पश्चात् वे गोरोपन और मुगन्धित पन्दन का लेप कर विल्यपत्रों और इमों के द्वारा भक्तिपूर्वक देव की

बिल्वपत्रामुजैर्देवं पूजयामासु रजसा ।। २५

प्रधृप्यागुरुणा भक्त्या निवेद्य परमौषधीः ।

जप्त्वाऽष्टशतनामानं प्रणाम चकिरे ततः ॥ २६

इत्येवं चिन्तयन्तश्च देवावेतो हरीश्वरौ ।

कथं योगत्यमापनौ सत्त्वान्धतमसोद्भवौ ।। २७

सुराणां विन्तितं ज्ञात्या विश्वमूर्तिरभूद्विभुः ।

सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वायुधधरोऽव्ययः ।। २८

साई त्रिनेनं कमलाहिकुण्डलं

जटागुडाकैशलगमध्वजम् ।

समाधवं हारभुजङ्गवक्षसं

पीताजिनाच्छन्नकटिप्रदेशम् ॥ २९

चक्रासिहस्तं हलशाईपाणि

पिनाकलाजगवान्वितं च ।

कपर्दखट्वाङ्गकपालघण्टा-

सशङ्खटकाररवं महर्षे ॥३०

दृष्ट्चैव देवा हरिशङ्करं तं

नमोऽस्तु ते सर्वगताव्ययेति।

प्रोक्त्वा प्रणाम कमलासनाधा-

श्वर्मतिं चैकतरां नियुज्य ॥ ३१

तानेकचित्तान् विज्ञाय देवान् देवपतिहरिः।

प्रगृह्याम्यद्रवत्तूर्ण कुरुक्षेत्रं स्वमाश्रमम् ॥ ३२

ततोऽपश्यन्त देवेशं स्थाणुभृतं जले शुचिम् ।

दृष्ट्वा नमः स्थाणवेति प्रोक्त्या सर्वे ह्युपाविशन् ॥ ३३

ततोऽब्रवीत् सुरपतिरे हि दीयतां वरः ।

क्षुब्धं जगजगन्नाथ उन्मजस्व प्रियातिथे ॥३४

ततस्ता मधुरां वाणी शुश्राव वृषभध्वजः ।

श्रुत्योत्तस्थौ च वेगेन सर्वव्यापी निरञ्जनः ॥ ३५

नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यः प्रोवाच प्रहसन् हरः ।

स चागतः सुरैः सेन्द्रः प्रणतो विनयान्वितैः ॥ ३६

तमूचुर्देवताः सर्वास्त्यज्यतां शङ्कर दतम् ।

महाव्रतं त्रयो लोकाः क्षुब्धास्त्वत्तेजसायवाः ॥ ३७

अथोवाच महादेवो मया त्यक्तो महानतः ।

पूजा किये।  (२५)

तदनन्तर देवों ने भक्तिपूर्वक धूप दान कर परमौ- पधियों को अर्पित किया। एष (शङ्कर के) एक सौ बाठ नामों का जप करने के बाद उन्हें प्रणाम किया । (२६)

सभी देवता यह सोचने लगे कि सत्त्य गुण से उत्पन्न  हरि एवं तमोगुण से उत्पन्न शङ्कर में एक्त्व किस प्रकार (२५)

देवताओं के विचार को जानकर अव्यय, विमु, सर्वरक्षण संयुक्त एवं सर्वायुधधारी विश्वमूर्ति हो गये । (२८)

हे महर्षि! देवताओं ने एक ही शरीर में साथ-साथ अहिषुण्डल,जटा, धूप, मुजङ्गहार, पिनाक, शूल, आजगव धनुप, फपदं, सट्याग एव घण्टा से युक्त अजिनधारी त्रिनेत्र महादेव एवं कमलकुण्डल, गुडाकेश, गरुड पक्षी, हार, पीताम्बर, चक्र, असि, इल, शाई घनुप, शद्ध के टवार शब्द से समन्धित विष्णु को देसा । तटु परान्त 'सर्वगत अव्यय को नमस्कार है' ऐसा कहकर ब्रह्मादि देवताओं ने उन हरि एवं शङ्कर को समवेत रूप समझा। (२६-३१)

उन देवताओं को एक्त्त्वयुद्धि वाला जानकर देयपति हरि उन सभी को लेकर शीघ्र अपने आश्रम कुरुक्षेत्र में गये। (३२)

तदनन्तर उन लोगों ने जल के भीतर पवित्र स्थाणुभूत देवेश को देखा। उन्हें देखकर 'स्थाणु को नमस्कार है यह कहकर वे सभी बैठ गये। (३३)

तदुपरान्त इन्द्र ने कहा-हे जगन्नाथ ! हे प्रियातिथि ! संसार क्षुब्ध हो उठा है। आप बाहर निकलकर हमारे निकट आये और हम पर दें। (३४)

तदनन्तर वृषभधज महादेव नै उस मधुर वाणों को सुना । सुनकर वे सर्वव्यापी निरञ्जन हर वेग से उठ खड़े (३५)

उन्होंने हँसते हुए कहा-सभी देवताओ को नमस्कार है। विनयान्वित इन्द्रादि देवताओं ने उन आये हुए शङ्कर को प्रणाम किया। (३६)

सभी देताओं ने उनसे कहा-हे शहर! शीघ्र इस महायत को छोड़िये । आपके तेज से आवृत तीनों लोक क्षुब्ध हो उठे हैं। (३७)

तदनन्तर महादेय ने कहा-मैंने महावत का त्याग कर

ततः सुरा दिवं जग्मुर्हृष्टाः प्रयवमानसा. ॥ ३८

ततोऽपि कम्पते पृथ्वी सान्धिद्वीपाचला मुने ।

वतोऽभिचिन्तयद्रुद्रः किमर्थं क्षुभिता मही ॥ ३९

ततः पर्यचरच्छूली कुरुक्षेत्र समन्ततः ।

ददर्शीयवतीतीरे उशनसं तपोनिधिम् ॥ ४०

ततोऽब्रवीत्सुरपतिः किमर्थ तप्यते तपः ।

जगत्क्षोभकरं विप्र तच्छीघ्रं कथ्यतां मम ॥ ४१

उशना उवाच।

तवाराधनकामार्थ तप्यते हि महत्तपः ।

संजीवनी शुभा विद्यां ज्ञातुमिच्छे त्रिलोचन ॥ ४२

हर उवाच ।

तपसा परितुष्टोऽस्मि सुतप्तेन तपोधन ।

तस्मात् संजीवनी विद्याभवान् ज्ञास्यति तत्त्वत्तः ॥ ४३

वरं लब्ध्या ततः शुक्रस्तपसः संन्यवर्तत।

तथापि चलते पृथ्वी सान्धिभूभृन्नगावृता ॥ ४४

ततोऽगमन्महादेव. सप्तसारस्व शुचिः ।

ददर्श नृत्यमानं च सपि मरणसज्ञितम् ॥ ४५

भावेन पोप्लूयति पालयत् स

भुजौ प्रसार्यैव ननत वेगात् ।

तस्यैव वेगेन समाहता तु

चचाल भूर्भूमिधरैः सहैव ॥ ४६

तं शङ्करोऽभ्येत्य करे निगृह्य

प्रोवाच वाक्यं प्रहसन् मह ।

किं भावितो नृत्यसि केन हेतुना

पदस्व मामेत्य किमत्र तुष्टिः ॥ ४७

स प्राह्मणः प्राह ममाघ तुष्टि-

येनेह जाता शृणु सद् द्विजेन्द्र ।

बहून् गणान् वै मम तप्यतस्तपः

संवत्सरान् कायपिशोपणार्थम् ।। ४८

ततोऽनुपश्यामि करात् श्तोत्यं

निर्गन्छते शाकरसं ममेह ।

तेनाद्य तुष्टोऽस्मि भृश द्विजेन्द्र

दिया। तदनन्तर देवता प्रसन्न होकर सयतचित्त हो स्वर्ग चले गये। (३८)

हे मुनि। इतने पर भी समुद्र, द्वीप और पर्वतों सहित पृथ्वी कम्पित हो रही थी। तब रुद्र ने सोचा कि पृथ्वी क्यों क्षुब्ध हो रही है ? (३९)

तदुपरान्त त्रिशूलधारी (शङ्कर) कुरुक्षेत्र के चतुर्दिक विचरण करने लगे। उन्होंने ओघवती के तट पर तपोनिधि उशना को देखा। (४०)

तदनन्तर सुरपति शङ्कर ने उनसे कहा-हे विभ। मुझे शीघ्र बताओ कि जगत् को क्षुब्ध करने वाला तप क्यों कर रहे हो? (४१)

उशना ने कहा-आपकी आराधना की कामना से मैं महान तप कर रहा हूँ। हे त्रिलोचन । मैं मगलमयी सञ्जीवनी विद्या को जानना चाहता हूँ। (४२)

महादेव ने कहा-हे तपोधन ! मैं भलीभाँति की गई तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। अत. आप सभीवनी विद्या को यथार्थ रूप में जानेंगे। (४३)

शुक वर प्राप्त कर तपस्या से निवृत्त हुए । इस पर भी सागर, पर्वत, वृक्ष आदि के साथ पृथ्वी हिल रही थी। (४४)

तदनन्तर पवित्र महादेव सप्तसारस्वत मे गये। वहाँ उन्होंने मंकण नामक महर्षि को नाचते हुए देखा। (४५)

वे बालक के समान भाव विभोर होकर दोनों हाथ फैलाकर वेग से उछल-उछलकर नाच रहे थे। उसके वेग से आहत पृथ्वी पर्वतों सहित प्रकम्पित हो रही थी। (४६)

उनके निकट जाकर एवं उनका हाथ पकड़कर हँसते हुए शङ्कर ने यह कहा-हे महर्षि | क्या सोचकर एवं किस कारण से आप नाच रहे हैं ? मुझसे पतरायें कि आप क्यों प्रसन्न हैं? (४७)

उस ब्राह्मण ने कहा-हे द्विजेन्द्र । आज मुझे जिस कारण संतुष्टि हो रही है उसे सुनिये। शरीर शोषण के लिए तपस्या करते हुए मेरे अनेक वर्प व्यतीत हो (४८)

अब मैं देखता हूँ कि मेरे हाथ के घाव से शाकरस निकल रहा है। हे द्विजेन्द्र। इसी से मुझे बहुत आनन्द प्राप्त

नामि नमानि गुमारिगारमा || ४९

सं मार त्रि पश्य कर्म

सम्म एनोलिसागुनम् ।

गंगास्नान ।

ममाणि मन भतार प्रमगः ॥ ५॥

राप पार पापा

मरान पा।

नगर परिसर महिमिर

परन्त पानी निसान ॥५॥

मार मात्र गर मोर

प्रानी दुर्गममापदाय।

 गत म दिया

परम्पास्नु गम परेन ॥५२

मोनियम मुगपुराना

गन्धरपिपापरहिमगणाम् ।

महास्तु धर्मम्य निपानमा

मारगर पारि ॥५३

गुरगा सामानासी गुमनादरा।

मनोगौरी विशारा  गरमती ।। ५४

गर गम्पो नियनिन नियमः!

गोमानानं गरी. प्रमानित गुरप्रदाः ।। ५५

भाग पाप गर्गवमीम् ।

गपिप्पान मा प्रा. गर्गमम् ॥ ५६

एमी न रोग लापन।

मूर्णियाप्प र अमनोरमगाइ पनी ॥ ५७

गर्ने मगरे निमना गमापन।

मगागामिन्द गंसनिजमारम पिः।। ५८

एयन नगर द्विज शंकरस्तु

गतनागीन् तपमेन्ध शैले।

दृश्य हूँओर में भागरिमापा होकर माप रहा हूँ।(१)

गुनम पा-६ मि! मुरंगी। प्रार पानं पारी  भाग निदाद, गि सुख नहीना। भारत न गरे।

मह! गृपमा पार गुना परमे मानार मनमुनिने गायदा मिति ना दियापनप दोर के पानी में प्रधाम (११)

राम्गुने रन पदा-विमभार मा फे दुर्गम टोक को जाभो । यदी में पद मे तीर्थ पूरक शीय समान परापी होगा। (५२)

गु, मगर, गापर्व, विशाधर और शिमर होगा सहा पदः एपस्थित रहेंगे। यह भेष्ठ सारस्पर

शून्येऽम्यगाइ दुष्टमतिर्हि देव्या ।

संयोधितो येन हि कारणेन ॥५९

इति श्रीवामनपुराणे षट्त्रिंशोध्याय ॥३६॥