सरोमाहात्म्ये 6 वामनचिरत-विष्णु द्वारा देवो को वरप्रदान अदिति की तपश्चर्या, अदिति द्वारा विष्णु की स्तुति

लोमहर्षण उवाच ।

नारायणस्तु भगवाछुत्वैवं परमं स्तयम् ।

प्रमजेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम् ॥१

उवाच वचनं सम्यक् तुष्टः पुष्ट पदाक्षरम् ।

श्रीमान् प्रीतमना देवो यद्वदेत् प्रभुरीश्वरः ॥२

पर वृणुध्वं भद्रं यो वरदोऽस्मि सुरोनमाः।

कश्यप उवाच।

प्रीतोऽसि नः सुरश्रेष्ठ सर्वेषामेव निश्चयः॥३

वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीना नन्दिवर्धनः ।

अदित्या अपि च श्रीमान् भगवानस्तु चै सुतः॥४

एव होमहेतु हैं। आप ही विश्वतेज के द्वारा अप्रथ और दिशाओं के द्वारा सुभाण्ड है अर्थात् दिशायें आपमे समाविष्ट हैं। आप इज्य, सुमेध, समिधा, मति, गति एव दाता है । आप ही मोक्ष, योग, स्रष्टा, धाता, परमयज्ञ, सोम, दीक्षित, दक्षिणा एव विश्व है। आप ही स्थविर, हिरण्यनाभ, नारायण, निनयन, आदित्यवर्ण, आदित्यतेज, महापुरुष, पुरुषोत्तम, आदिदेव, सुविक्रम, प्रभाकर, शभु, स्वयम्भू, भूतादि, महामूत, विश्वभूत एव विश्व है। आप ही ससार के रक्षक, पवित्र, विश्वभव, ऊर्ध्वकर्म, अमृत, दिवस्पति, वाचस्पति, घृतार्चि, अनन्तकर्म, यश, प्राग्वश, विश्वपा तथा वरार्थियों वे वरदाता है।

चार (आश्रावय), चार (अस्तु श्रीपड्), दो (यज) तथा पाच (ये यजामहे) और पुन दो (वफ्ट् ) अक्षरों (इस प्रकार ४+४+२+२+२-१७ अझरों) से पिसको हवन होता है उस होनात्मक को नमस्कार है।

॥ श्रीवामनपुराण के सरोमाहात्म्य में पाँचवा अध्याय समाप्त ।।५।।

लोमहर्पण ने कहा-इस प्रकार ब्रह्मज्ञ द्विभवर कश्यप द्वारा की गई श्रेष्ठ स्तुति को सुन कर श्रीमान, प्रभु, ईश्वर देव भगवान नारायण ने अत्यन्त तुष्ट होकर प्रसन्नमन से पुष्टपदाक्षरों से युक्त उपयुक्त पचन कहा-हे श्रेष्ठ देवताओ। यर मागो। तुम्हारा कल्याण हो, मैं वर दूंगा।

कश्यप ने कहा-'हे सुरश्रेष्ठ । यदि आप प्रसन्न है तो है सभी का यह निश्चय है कि आप श्रीमान् भगवान् स्वय इन्द्र के लघु भ्राता के रूप से अदिति के ज्ञातिजनों के आनन्द  वर्धक पुत्र बनें।" (१-४)

अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम् ।

पुत्रार्थ वरदं प्राह भगवन्त परार्थिनी ॥ ५

देवा ऊचुः।

निःश्रेयसार्थ सर्वेषां दैवतानां महेश्वर ।

त्राता भर्ता च दाता च शरणं भव नः सदा ।। ६

वतस्तानववीद्विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च ।

सर्वेपामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः।

मुहूर्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥ ७

हत्वाऽसुरगणान् सर्वान् यज्ञभागाप्रभोजिनः ।

हव्यादांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितॄनपि ।। ८

करिष्ये विजुषश्रेष्टाः पारमेष्ट्येन कर्मणा ।

यथायातेन मार्गेण निवर्तध्वं सुरोत्तमाः ॥ ९

लोमहर्षण उवाच।

ए यमुक्ते तु देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना ।

ततः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म त प्रभुम् ।। १०

विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च ।

नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसा ॥ ११

प्रयाताः प्राग्दिशं सर्वे विपुलं कश्यपाश्रमम् ।

ते कश्यपाश्रमं गत्वा कुरुक्षेत्रयनं महत् ॥ १२

प्रसाद्य हदिति तत्र तपसे तां न्ययोजयन् ।

सा चचार तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा ॥ १३

तस्या नाम्ना वनं दिव्यं सर्वकामप्रदं शुभम् ।

आराधनाय कृष्णस्य याग्जिता यायुभोजना ॥ १४

दैत्यनिराकृतान् दृष्ट्वा तनयानृपिसत्तमाः ।

वृथापुत्राऽहमिति सा निर्वेदात् प्रणयाद्धरिम् ।

तुष्टाव वाग्मिररयाभिः परमार्थाययोधिनी ॥ १५

शरण्यं शरण विष्णु प्रणता भक्तवत्सलम् ।

देवदैत्यमय चादिमध्यमान्तस्वरूपिणम् ॥ १६

अदितिस्वाच ।

नमः कृत्यार्तिनाशाय नमः पुष्फरमालिने ।

नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ॥ १७

नमः पङ्कजनेत्राय नम. पङ्कजनाभये ।

नमः पङ्कजसंभूतिसंभवायात्मयोनये ॥ १८

श्रियः कान्ताय दान्ताय दान्तश्याय चक्रिणे ।

वराथिती देवमाता अदिति ने भी वरदाता भगवान् से पुत्रार्थ इसी उत्तम प्रयोजन को कहा।

देवों ने कहा-हे महेश्वर। सभी देवों के परम कल्याण के निमित्त आप हमारे सदा रक्षक, भरण कर्ता, दाता एय शरण बनें। (६)

तदनन्तर भगवान् विष्णु ने उन देवताओं तथा कश्यप से कहा-आप सभी के जितने भी शत्रु होंगे वे क्षणमात्र भी मेरे सम्मुख नहीं ठहरेंगे।

हे देवश्रेष्ठो । पारमेष्ठ्य फर्म द्वारा में सभी असुरों को मार कर देवताओं को यज्ञभागाप्रभोजी एव हव्यमोजी तथा पितृगणों को कन्यभोजी धनाऊँगा। हे श्रेष्टदेवो । आप लोग जिस मार्ग से आये हैं उसी से लौट जाय। (८-६)

लोमहर्षण ने कहा-प्रभावशाली देव विष्णु के ऐसा कहने पर सभी महात्मा देवगण, कश्यप एव अदिति ने प्रसन्न मन से प्रभु का पूजन किया एव सुरेश्वर को प्रणाम करने के उपरान्त पूर्व दिशा में स्थित कश्यप के विपुल आश्रम को वेगपूर्वक चले गये । कुरक्षेत्रवन में स्थित कश्यप के महान आश्रम में पहुँच कर उन लोगों ने अदिति को प्रसन्न करने के उपरात उसे तप करने में नियोजित किया तदनन्तर उसने दश सहस्त्र वर्षों तक घोर तप किया। (१०-१३)

हे ऋपि श्रेष्ठो। ( जिस वन मे उसने तप किया) उस सर्व कामनाओं को देने वाले, कल्याणकारी दिव्य वन का उस ( अदिति ) के नाम पर ( अदितिवन) नाम पड़ा।

हे ऋषिश्रेष्ठो। दैत्यों के द्वारा अपने पुत्रों को तिरस्कृत देखकर अपने को व्यर्थपुत्रवाली समझती हुई कृष्ण की आराधना के लिए वाणी को जीतकर तथा वायु का भोजन करती हुई परमार्थ को जानने वाली अदिति ने ग्लानियुक्त तथा विनम्र होकर शरण्य, शरण, भक्तवत्सल, देवदैत्यमय, आदि मध्य अन्तस्वरूपी विष्णु की श्रेष्ठ याणियों से स्तुति (१४-१६)

अदिति ने कहा-कृत्या से उत्पन्न दुस के नाशक को नमस्कार है, पुष्कर की माला धारण करने वाले को नमस्कार है हे परम मगलकारी ! कल्याणस्वरूप आदिविधाता आप को नमस्कार है। (१७)

पकजनेन को नमस्कार है। पङ्कजनाभि को नमस्कार है। पङ्कजसम्भूति (ब्रह्मा) के सभव (उत्पत्तिस्थान) को एव आरमयोनि को नमस्कार है। (१८)

नम. पद्मासिहस्ताय नमः कनकरेवसे ॥ १९

तथात्मज्ञानयज्ञाय योगिचिन्त्याय योगिने ।

निर्गुणाय विशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ॥ २०

जगच तिष्ठते यत्र जगतो यो न दृश्यते ।

नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शाङ्गिणे ॥ २१

यं न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलं नराः ।

अपश्यद्भिर्जगद्यश्च दृश्यते हृदि संस्थिता ॥ २२

पहियोविरलक्ष्यो यो लक्ष्यते ज्योतिपः परः।

यस्मिन्नेव यतश्चैव यस्यैतदखिल जगत् ॥ २३

तस्मै समस्तजगताममराय नमो नमः ।

आधः प्रजापतिः सोऽपि पितृणां परमः पतिः ।

पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ।। २४

यः प्रवृत्तनिवृत्तैश्च कर्मभिस्तु विरज्यते ।

स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तम्मै गदाभृते ॥ २५

यस्तु सचित्यमानोऽपि सर्व पापं व्यपोहति ।

नमस्तस्मै विशुद्धाय परस्मै हरिमेघसे ॥ २६

ये पश्यन्त्यसिलाधारमीशानमजमव्ययम् ।

न पुनर्जन्ममरण प्राप्नुवन्ति नमामि तम् ॥ २७

यो यज्ञो यज्ञपरमैरिज्यते यज्ञसस्थितः ।

तं यज्ञपुरुष विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम् ॥ २८

गीयते सर्ववेदेषु वेदविद्भिर्तिदां गति ।

यस्तस्मै वेदवेद्याय नित्याय विष्णवे नमः ॥ २९

यतो विश्व समुद्भूत यस्मिन् प्रलयमेष्यति ।

विश्वोद्भवप्रतिष्ठाय नमस्तम्मै महात्मने ॥३०

आब्रह्मस्वम्मपर्यन्त व्यास येन चराचरम् ।

मायाजालसमुन्नडू तमुपेन्द्र नमाम्यहम् ॥ ३१

योत तोयस्वरूपस्थो निमसिलमीश्वरः ।

विश्वं विश्वपति विष्णुं त नमामि प्रजापतिम् ॥ ३२

मूतं तमोऽसुरमयं तद्विधो विनिहन्ति यः ।

रात्रिज सूर्यरूपी च तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३३

लक्ष्मीपति, इन्द्रियदमनकारी, सयमियों से दृश्य, चक्र- धारी, हाथ में कमल तथा तरबार धारण करने वाले कनारेता को नमस्कार है। (१६)

आत्मज्ञानयज्ञ, योगिचिरय, योगी, निर्गुण, विशेष, हरि एव हरूपी को नमस्कार है। (२०)

जिनमे जगत् स्थित है किन्तु जो जगत् से दृश्य नहीं है ऐसे स्थूल तथा अति सूक्ष्म उन शाधारी देव को नमस्कार है। (२१)

सम्पूर्ण जगत् को देखने वाले मनुष्य जिनको नहीं देख सकते, किन्तु जगत् को न देखने वाले जिन्हें हृदय स्थित देखते हैं, जो बहियोति एवं अलक्ष्य हैं तथा ज्योति में श्रेष्ठ लक्षित होते हैं एय यह सम्पूर्ण जगत् जिनमें (यित) है, जिनसे ( उत्पन्न ) है तथा जिनका है उन समस्त जगत् के देव को बार-बार नमस्कार है । जो आद्य प्रजापति, पितृगणों के श्रेष्ठ स्वामी एव देवों के पति हैं उन विधाता कृष्ण को नमस्कार । (२२-२४)

जो प्रवृत्त एव निवृत्त क्मों से विरक्त तथा स्वर्ग और मोक्ष फल को देने वाले हैं उन गदाधारी को नमस्कार है। (२५)

जो सम्यक् स्मरण करने पर सब पापों को नष्ट कर देते हैं, उन विशुद्ध हरिमेधा परमात्मा को नमस्कार है। (२६)

अखिलाधार, ईशान, अज और अव्यय भगवान को जो देखते हैं वे जन्म और मरण को पुन नही प्राप्त होते । उन भगवान को में प्रणाम करती हूँ। (२५)

परम यज्ञों द्वारा आराधित होते है उन यज्ञस्वरूप, यज्ञ- सस्थित, यज्ञपुरुष, ईश्वर, प्रभु विष्णु को में नमस्कार करती हूँ। (२८)

वेदों द्वारा सभी वेदों में प्रगीत, विद्वज्जनों की गति स्वरूप, वेदवेद्य, नित्यस्वरूप विष्णु को मेरा नमस्कार है। (२९)

विश्व जिनसे समुद्भूत हुआ है, जिनमें विलीन होगा तथा जो विश्व के उद्भव तथा प्रतिष्ठास्वरूप हैं उन महात्मा को नमस्कार है। (३०)

जिनके द्वारा मायाजाल से बंधा हुआ आयास्तम्ब चराचर (विश्व) व्याप्त है उन उपेन्द्र को मैं नमस्कार करती हूँ।

जो जल स्वरूपस्थ ईश्वर अखिल विश्वका भरण करते हैं उन विश्वपति एवं प्रजापति विष्णु को मैं नमस्कार करती (३२)

जो सूर्यस्पी उपेन्द्र असुरमय रानिज मूर्त तम या विनाश करते हैं में उनसे प्रणाम करती हूँ। (३३)

यस्याक्षिणी चन्द्रसूयौं सर्वलोकशुभाशुभम् ।

पश्यतः कर्म सततं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३४

यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्व सत्यमेवन्मयोदितम् ।

नानृत तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्ययम् ।। ३५

यद्येतत्सत्यमुक्तं मे भूयश्चातो जनादन ।

सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः ॥ ३६

इति श्रीयामनपुराणे सरोमाहात्म्ये पष्ठोऽध्याय ॥६॥