9 वामनचरित- वामनावतार, ब्रह्मा द्वारा वामनस्तुति, वामन का बलि के यज्ञ के लिए प्रस्थान

लोमहर्षण उवाच ।

इति दैत्यपतिः श्रुत्वा वचनं रौद्रमप्रियम् ।

प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः ॥ १

बलिरुवाच ।

प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि ।

पलावलेपमूढेन मयैतद्वाक्यमीरितम् ॥ २

मोहापहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम ।

यच्छतोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम् ।। ३

राज्यभ्रशं यशोभ्रंश प्राप्स्यामीति ततस्त्वहम् ।

विषण्णोऽसि यथा तात तथैवाविनये कृते ॥४

त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नातिदुर्लभम् ।

ससारे दुर्लभास्तात गुरवो ये भवद्विधाः ॥ ५

प्रसीद तात मा कोप कर्तुमर्हसि दैत्यप ।

स्वत्कोपपरिदग्धोऽह परितप्ये दिवानिशम् ।। ६

प्रह्लाद उवाच।

वत्स कोपेन मे मोहो जनितस्तेन ते मया ।

शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहृतो मम ।। ७

यदि मोहेन मे ज्ञानं नाक्षिप्तं स्यान्महासुर ।

तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं कचिच्छपाम्यहम् ॥ ८

यो यः शापो मया दत्तो भवतोऽसुरपुंगव ।

भाव्यमेतेन नून ते तस्मात्त्व मा विपीद वै ॥ ९

अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ ।

भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति ॥

शाप प्राप्य च मे चीर देवेश. सस्मृतस्त्वया ।

तथा तथा वदिष्यामि श्रेयस्त्व प्राप्स्यसे यथा ॥ ११

लोमहर्पण उवाच ।

अदितिवरमासाद्य सर्वकामसमृद्धिदम् ।

लोमहर्षण ने कहा-दैत्यपति बलि ने इस प्रकार के उग्र एव अप्रिय वचन सुनकर पुन पुन प्रणाम कर गुरु (प्रहलाद) को प्रसन्न किया। (१)

बलि ने कहा-हे तात ! आप प्रसन्न हों, मुझ मोहग्रस्त पर क्रोध न करें। बल के घमण्ड से विमूढ होकर मैंने यह वाक्य कहा था। (२)

हे दैत्यश्रेष्ठ ! मोह के कारण मेरा ज्ञान मारा गया था, में पापी हूँ। मुझ दुराचारी को आपने जो शप दिया, वह बहुत अच्छा किया।

हे तात। मेरे द्वारा उस प्रकार का अविनय किये जाने से यत आप विषण्ण हुए है अत में राज्यभ्रश एवं यशो भ्रश को प्राप्त करूँगा।

हे तात । ससार में त्रैलोक्य का राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य कोई (पदार्थ) अतिदुर्लभ नहीं है, किन्तु आप ऐसे गुरु दुर्लभ होते हैं।

हे दैत्यरक्षक हे तात । आप प्रसन्न हो कोप न करें। आपके क्रोध से परिदग्ध होकर मैं दिन-रात परितप्त हो रहा हूँ। (६)

प्रह्लाद ने कहा-हे वत्स ! फ्रोध के कारण मुझे मोह पैदा हो गया था और मोह ने मेरा विवेक भी नष्ट कर दिया था इसी से मैंने तुम्हें शाप दिया। (७)

हे महासुर । यदि मोह के कारण मेरा ज्ञान नष्ट नहीं हुआ होता तो भगवान् को सर्वव्यापी जानते हुए भी मैं शाप कैसे देता। (८)

हे असुरपुङ्गव । मैंने तुम्हें जो शाप दिया है वह निश्चय ही पूर्ण होगा । अतः तुम दुखी मत हो । (९)

आज से तुम उस देवेश्वर भगवान् अच्युत हरि के प्रति भक्तिमान बनो। वे ही तुम्हारे त्राता होंगे। (१०)

हे वीर । मेग शाप पाकर तुमने देवेश्वर का स्मरण किया है । अत में वही कहूँगा जिससे तुम्हें श्रेय की प्राप्ति होगी। (११)

रोमहर्षण ने कहा-अदिति के, सर्वकामनाओं को

क्रमेण युदरे देवो वृद्धि प्राप्तो महायशाः ॥ १२

ततो मासेऽथ दशमे काले प्रसव आगते ।

अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः ।। १३

अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वमरेश्वरे ।

देयाश्च मुमुचुर्दुःसं देवमाताऽदितिस्तया ।। १४

ववुर्वाताः सुसस्पर्शा नीरजस्कमभून्नमः ।

धर्मे च सर्वभूताना तदा मतिरजायत ।। १५

नोबॅगचाप्य द् देहे मनुजाना द्विजोत्तमाः ।

तदा हि सर्वभूताना धर्मे मतिरजायत ॥ १६

तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।

जातकर्मादिकां कृत्वा क्रियां तुष्टाय च प्रभुम् ।। १७

ब्रह्मोवाच ।

जयाधीश जयाजेय जय विश्वगुरो हरे ।

जन्ममृत्युजरातीत जयानन्त जयाच्युत ॥ १८

जयाजित जयाशेप जयाव्यक्तस्थिते जय ।

परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञान यार्थनि.सृत ।। १९

जयाशेष जगत्माक्षिजगत्कर्जगद्गुरो।

जगतोऽजगदन्तेश स्थिती पालयते जय ॥ २०

जयासिल जयाशेप जय सर्वहदिस्थित ।

जयादिमध्यान्तमय सर्वज्ञानमयोत्तम ॥ २१

मुमुक्षुभिरनिर्देश्य नित्यहष्ट जयेश्वर ।

योगिभिर्मुक्तिकामस्तु दमादिगुणभूषण ।। २२

जयातिसूक्ष्म दुर्जेय जय स्थूल जगन्मय ।

जय सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्वं जयानिन्द्रिय सेन्द्रिय ॥ २३

जय स्वमायायोगस्थ शेपभोग जयाक्षर ।

जपैकदष्ट्रप्रान्तेन समुद्धृतवसुंधर ॥ २४

नृकेसरिन् सुरारातिपक्षस्थलविदारण ।

साम्प्रतं जय विश्वात्मन् मायावामन केशव ॥ २५

समृद्ध परनेवाला, घर प्राप्त करने के उपरात उसके उदर मे महायशस्वी देव प्रमश पृद्धि प्राप्त करने लगे। (१२)

तदनन्तर दसवे मास में प्रसव काल के आने पर वे भगवान् गोविन्द वामनाकार में उत्पन्न हुए। (१३)

उन सर्वदेवेश्वर जगन्नाथ के अवतीर्ण होने पर देवताओं और देयमाता अदिति ने अपने दुस को छोड़ दिया । (१४)

स्पर्श में मुखारी पवन चलने लगा, आराश धूलिविहीन (निर्मल ) हो गया एव सभी जीवों की मति धर्म में लग गई। (१५)

हे द्विजोत्तमो। उस समय मनुष्यों के शरीर में उद्वेग नहीं रहा समस्त प्राणियों यी मति धर्म में लग गई। (१६)

लोरपितामह ब्रह्मा ने सच उत्पन्न प्रभु की जातकर्मादि प्रिया फरक स्तुति की। (१७)

ब्रह्मा ने कहा-हे अधीश । आपरी जय हो। हे अजेय । आपरी जय हो । हे विश्वगुर हरि । आपकी जय हो। हे जन्ममृत्युजरातीत अनन्त । आपकी जय हो।हे अच्युत । आपकी जय हो। (१८)

हे अजित । आपकी जय हो। हे अशेप । भापकी जय हो।हे अव्यत्तरियति याले । आपसी जय हो । परमार्था । हे शान और शेप अर्थ जिससे निम्त्य है

ऐसे सर्वज्ञ । आपकी जय हो। (१९)

हे अशेप । हे जगत्साक्षी। हे जगत्का । हे जगद्-गुरु। आपकी जय हो। हे जगत् (घर) एव अजगन् (अचर) के स्थिति, पालन एव प्रलय के ईश । आपकी जय हो। (२०)

हे अपिल | आपकी जय हो। हे अशेष । आपकी जय हो। हे सभी के हृदय में स्थित । आपरी जय हो। हे आदि, मध्य और अन्तस्वरूप । हे सर्वशानमय हे उत्तम आपकी जय हो। (२१)

हे मुमुक्षुओं के द्वारा अनिर्देश्य हे नित्यदृष्ट । हे ईन्धर  आपकी जय हो। हे मुक्ति पाइने याले योगियों से सेवित । हे दम आदि गुणों से विभूषित । आपकी जय हो। (२२)

"हे अतिसूक्ष्म । हे दुर्तेय ! आपकी जय हो। हे स्थूल' जाम आपरी जय हो। हे सूक्ष्मातिसूक्ष्म । आपकी जय हो 1हे अनिन्द्रिय हे सेन्द्रिय । श्रापी जय हो। (२३)

हे अपनी माया से योगस्य । आपरी जय हो। शेप की शपया पर सान यान अक्षर। आपकी जय हो। एकदंष्ट्रा के कोने पर यमुन्धरा को उठाने यार। आपकी जयदा (२४)

है नृसिंह । हे देव शत्रु फे यक्षस्थल का विधारण करने

निजमायापरिच्छिन्न जगद्धातर्जनार्दन ।

जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो ॥ २६

चर्द्धस्य वधितानेकविकारप्रकृते हरे ।

त्वय्येपा जगतामीशे मंस्थिता धर्मपद्धतिः ॥ २७

न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राधास्त्रिदशा हरे ।

ज्ञातुमीशा न मुनयः सनकाया न योगिनः॥ २८

त्वं मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते ।

कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश सत्प्रसादं विना नरः ।। २९

त्वमेवाराधितो यस्य प्रसादसुमुख. प्रभो।

स एव केवलं देवं घेत्ति त्वां नेतरो जनः ॥ ३०

तदीश्वरेश्वरेशान विभो वर्द्ध भावन ।

प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन ॥ ३१

लोमहर्षण उवाच ।

एव स्तुतो हुपीकेशः स तदा वामनाकृतिः ।

प्रहस्य भावगम्भीरसुवाचारूढसंपदम् ।। ३२

स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्रायः कश्यपेन च ।

मया च यः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥ ३३

भृयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि मयाश्रुतम् ।

यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥ ३४

सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः।

भविष्यति सहस्राक्षः सत्यमेतद् प्रवीमि वः ॥ ३५

वतः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान् ।

यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्य वृहस्पतिः ।। ३६

आषाढमददाद् दण्डं मरीचिह्मणः सुतः ।

कमण्डलु वसिष्ठश्च कौशं चीरमथाङ्गिराः।

आसनं चैव पुलह. पुलस्त्यः पीतवाससी ॥ ३७

उपतस्थुश्च तं वेदाः प्रणवस्वरभूपणाः ।

शास्त्राण्यशेपाणि तथा सांख्ययोगोक्तयश्च याः ॥ ३८

स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः ।

सर्वदेवमयो देवो घलेरध्वरमभ्यगात् ॥ ३९

वाल । हे विश्वात्मन् । हे मायागमन । हे पेशव । आपकी जय हो। (२५)

हे अपनी माया से परिच्छिन्न ! हे जगद्धाता ! हे जनार्दन । आपकी जय हो । हे अचिन्त्य । हे अनेकस्वरूप हे एकविध प्रभो। आपकी जय हो । (२६)

बढाये गये हैं अनेक विकार प्रकृति से जिनके द्वारा ऐसे हे हरि। आपकी वृद्धि हो । जगत् की यह धर्म- पद्धति आप ईश मे स्थित है। (२७)

हे हरे ! मैं, शकर, इन्द्रादि देव, सनकादि मुनि या योगीगण आपको जानने में समर्थ नहीं हैं। (२८)

हे जगत्पते । आप इस ससार में माया रूपी वस्र से आच्छादित है। हे सर्वेश । आपके प्रसाद के विना कौन मनुष्य आपको जान सकता है। (२९)

प्रभो। आपही आराधित होकर जिस पर प्रसन्न होते है केवल वही मनुष्य आपको जानता है, दूसरा नहीं। (३०)

हे ईश्वरेश्वर । हे ईशान । हे विभो । हे भायन । हे विश्वात्मन् । हे पृथुलोचन। इस विश्व के प्रभव ( उत्पत्ति सृष्टि ) के निमित्त आपकी वृद्धि हो। (३१)

लोमहर्पण ने कहा-तदनन्तर इस प्रकार स्तुत वामना-कृति हृषीकेश हँसार भावगम्भीर तथा ऐश्वर्ययुक्त वाणी बोले- (३२)

पूर्यकाल में आपने, इन्द्रादि देवों एव कश्यप ने मेरी स्तुति की थी। मैंने भी आप लोगों से इन्द्र के लिए त्रिभुवन देने की प्रतिज्ञा की थी। (३३)

तदनन्तर अदिति ने मेरी स्तुति की तो उससे भी मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं इन्द्र को निष्कण्टक त्रैलोक्य दूंगा। (३४)

अत' में ऐसा करूगा जिससे सहस्राक्ष इन्द्र जगत् के पति होंगे। आप लोगों से में यह सत्य कह रहा हूँ। (३५)

तदुपरात ब्रह्मा ने हृषीकेश को कृष्ण मृगचर्म दिया एव भगवान् बृहरपति ने उन्हें यज्ञोपवीत प्रदानकिया। (३६)

ब्रह्मपुत्र मरीचि ने उन्हें पालाशदण्ड दिया । वसिष्ठ ने कमण्डलु तथा अगिरा ने रेशमी वस्त्र दिया। पुलह ने आसन और पुलस्त्य ने दो पीले वस्त्र दिये। (३७)

ओंकार के स्वर से अलंकृत वेद, सभी शास्त्र तथा साख्ययोगादि दर्शनों की उक्तियाँ उन्हें उपस्थित हो (३८)

जटा, दण्ड, छत्र एवं कमण्डलुघारी सर्वदेवमय वे वामन बलि के यज्ञ में गये। (३९)

यत्र यत्र पदं विप्रा भूभागे यामनो ददौ ।

ददाति भूमिर्पिवर तत्र तत्राभिपीडिता ॥४०

स वामनो जडगतिर्मुद् गच्छन् मपर्वताम् ।

साधिद्वीपरतीं सोचालयामास मेदिनीम् ।। ४१

बृहस्पतिस्तु शनर्मार्ग दर्शयते शुभम् ।

तथा क्रीडाविनोदार्थमविनायगतोऽभवत् ॥ ४२

ततः शेपो महानागो नि.मृत्यासौ रसातलात् ।

साहाग्य कल्पयामास देवदेवस्य चक्रिणः ॥ ४३

तदद्यापि च पिरयातमहेरिलमनुत्तमम् ।

वस्य संदर्शनादेव नागेभ्यो न भयं भवेत् ॥ ४४

इति श्रीरामनपुराणे सरोमाहात्म्ये नवमोऽध्याय ॥९॥