वामन महा पुराण
क्षीग तेज की प्राप्ति के लिए शिव की तपस्या, शिव का तपश्चरण एव केदार तीर्थ की उत्पत्ति, शङ्कर के सरस्वती में निमग्न होने से मुषन का विक्षोभ, मुरासुरवध के प्रसङ्ग में विष्णु का चतुर्भूर्ति स्वरुप-वर्णन, सन्धकुमार का द्वादशपत्रक योग की प्राप्ति के लिए प्रयत्न एव ब्रह्मा से पुत्राम-नरक विषयक प्रश्न
नारद उवाच
क गतः शंकरो घासीद्यनाम्या नन्दिना सह ।
अन्धकं योधयामास एतन्मे वक्तुमर्हसि ॥ १
पुलस्त्य उवाच।
यदा वर्षसहस्रं तु महामोहे स्थितोऽभयत् ।
सदाप्रभृति निस्तेजाः क्षीणवीर्यः प्रदृश्यते ॥ २
स्वमात्मानं निरीक्ष्याथ निस्तेजोङ्गं महेश्वरः।
तपोहोय तथा चक्रे मविं मतिम वरः॥३
स महावतमुत्पाद्य समावास्याम्बिकां विभुः।
शैलादि स्थाप्य गोतारं विचचार महीतलम् ॥ ४
महामुद्रार्पितग्रीवो महाहिकतकुण्डलः ।
पारयाणः कटीदेशे महाशवस्य मेखलाम् ॥५
कपालं दक्षिणे हस्ते सव्ये गृह्य कमण्डलम् ।
एवं वृक्षों में होगा। अब तुम सभी निश्चित होकर जाओ। पार्वती के ऐसा कहने पर वे सभी अम्बिका को प्रणाम कर किन्नरों से स्तुत होती हुई समस्त दिशाओं में चली गयीं। अन्यक भी चेतना प्राप्त करने के उपरान्त गिरिजा को न देसकर तथा अपनी सेना को पराजित देखकर पाताल में चला गया। (४२-४६)
हे मुने! तदनन्तर कामयाण से आहत एवं काम के वेग से पीडित दुरात्मा अन्धक पाताल मे जाकर गौरी का स्मरण करता हुआ न दिन में पाता था और न यत में सोता था। (४७)
श्रीवामनपुपए में ततीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३॥
३४
नारद ने कहा-आप मुझे यह घतलायें कि शङ्कर वहाँ चले गये थे जिससे नन्दी सहित अम्यिा ने युद्ध (१)
पुलस्त्य ने कहा- जिस समय एक सहस्र वर्प तय महामोह में स्थित थे उसी समय से वे निस्तेज एपं शक्ति हीन प्रतीत होने लगे। (२)
बुद्धिमानों मे भेष्ठ महेचर ने स्वयं अपने अह्नों को तेजरहिन देसार तपस्या करने का निश्चय किया। (3)
वे रिमु शहर महावत का आलम्बन करने के उपरान्त अम्यिरा को आश्वस्त किये और शैलादि (नन्दी) को रक्षक नियुक्त कर पृथ्वी पर घूमने लगे। (१)
उन्होंने गले में महामुद्रा धारण कर, महासों का कुण्डल एवं कटि-प्रदेश में महान की मेखला धारण की।
दाहिने हाथ में नरकपाल एवं बायें हाथ में कमण्डलु
एकाहवासी वृक्ष हि शैलसानुनदीष्वटन् ॥ ६
स्थानं त्रैलोक्यमास्याय मूलाहारोऽम्युभोजनः ।
वाय्वाहारस्तदा तस्थौ नार्य शतं ऋमात् ॥ ७
ततो वीटां मुसे क्षिप्य निरुच्छ्वासोऽभवद् यतिः ।
विस्कृते हिमवत्पृष्ठे रम्ये समशिलातले ॥८
ततो वीटा विदायेंव कपालं परमेष्ठिनः ।
साचिप्मती जटामध्याग्निपण्णा धरणीवले ॥९
वीटया तु पतन्याऽद्रिर्दारितः मासमोऽभवत् ।
जावस्तीर्यवरः पुण्यः केदार इति विश्रुतः ।। १०
ततो हरो वरं मादात् केदाराय वृपध्वजः ।
पुण्यद्धिकरं प्रान् पापघ्नं मोक्षसाधनम् ॥ ११
ये जल वायके तीयें पीत्या सयमिनो नराः ।
मधुमासनिवृत्ता ये ब्रह्मचारिनते स्थिताः ॥ १२
पण्मासाद् धारयिष्यन्ति निवृत्ताः परपाकतः ।
तेषां इत्पङ्कजेग्वेय मल्लिङ्ग नविता ध्रुवम् ।। १३
न चास्य पापाभितिर्भविष्यति कदाचन ।
पितृणामक्ष्यं श्राद्धं भविष्यति न संशयः ॥ १४
स्नानदानवपांसीह होमजप्यादिका क्रियाः ।
भविष्यन्त्यक्ष्या नृणां मृतानामपुनर्भरः ॥ १५
एतद् परं हरा तीर्थ प्राप्य पुष्णाति देवताः ।
पुनाति पुंसां केदारस्त्रिनेत्रवचनं यथा ॥ १६
वेदाराय वरं दत्त्वा जगाम त्वरितो हरः।
स्नातुं भानुसुता देवी कालिन्दी पापनाशिनीम् ॥ १७
तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा जगामाथ सरस्वतीम् ।
वृतां तीर्थशतैः पुण्यैः प्लक्षां पापनाशिनीम् ॥ १८
अवतीर्णस्वतः स्नातुं निमग्नश्च महाम्मसि ।
द्रपदा नाम गायत्री जनापान्तर्जले हरः ॥ १९
निमग्ने शंकरे देव्यां सरस्सत्यां कलिप्रिय ।
साग्रः समत्सरो जातोन चोन्मजत ईश्वरः ।। २०
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् भुवनाः सम सार्णवाः
लेकरर चे वृक्षों के नीचे, पहाडों के शिरसरों पर तथा नदियों पे किनारे घूमने लगे।
कमल मूल, अम्बु एवं वायु का आहार परते हुए वे तीनों लोरों में नौ सौ वर्ष व्यतीत पिये। (७)
तदनन्तर हिमालय के ऊपर रमणीय तथा सम शिलातल पर आसीन उन यति ने मुरस में योटा लगार श्वासाय रोध किया। (८)
तदुपरान्त शहर में पाल को विदारित वर ज्वालायुक्त यह बीटा जटा के मध्य से निकली एवं पृथ्वी पर गिर पड़ी।
उस योटा फे गिरने से परत विदीर्ण होकर समतल पृथ्वी यासा हो गया और यहाँ वेदार नामक विदयात (१०)
ममन् । तदनन्तर वृपयज महादेय ने फेदार को पुण्यपद्धक, पाप-नाशक और मोशसाधक पर दिया । (२१)
मधु, मासस्य परामभोजन का स्यायसर तथा प्रमचर्य प्रद धारण फर तुम्हारा जल पीने हुए जो सयमी मनुष्य यहाँ प मास तक स्थित रहेंगे उनके द्वापन में निथप ही मेरा शिस्ट होगा। (१२-१३)
वे कमी पाप में रत नहीं होंगे तथा नि सन्देह उनके द्वारा किया गया पितरों का माद अभय होगा। (१४)
मनुष्यों द्वारा यहाँ की गई स्नान, दान, तपस्या, होम एवं जप आदि क्रियायें अक्षय होंगी तथा मरने पर उनय पुनर्जन्म नहीं होगा।
महादेव से ऐसा पर पारर यह केदारतीय गिनत्र महादेव के पचन के अनुसार लोगों को पवित्र एवं देवताओं को पुष्ट करने लगा। पेदार को वा देकर महादेव सूर्यतनया पापविनाशिनी, देवी यालिन्दी यमुना में स्नान करने के लिए शीघ्र चले (१७)
वहाँ मानकर तथा पवित्र होकर भगगन् शब्दर सैकड़ों पुण्यतीयों से घिरी हुई पापनाशिनी प्लक्ष वृक्ष से एत्पन्न सरस्वती के पास गये। (१८)
सदनन्तर वे स्नानार्थ उतरे एवं महान् जल में निमग्न होयर दुपदा गायत्री का जप करने रगे। हे टिप्रिय । देयी सरस्वती के जल में शङ्कर निमग्न हुए एक वर्ष से अधिर थीत गया किन्नु भगवान् ऊपर नहीं पठे। (२०)
हे ब्रह्मन् ! उसी समय सागरों सहित सत भुवा हिलने लगे और तारों के साथ न पृथ्वी पर गिरने
चेलुः पेतुर्धरण्यां च नक्षत्रास्तारकैः सह ॥ २१
आसनेभ्यः प्रचलिता देवाः शक्रपुरोगमाः ।
स्वस्त्यस्तु लोकेभ्य इति जपन्तः परमर्पयः ॥ २२
ततः क्षुब्धेषु लोकेषु देवा ब्रमाणमागमन् ।
दृष्ट्वोचुः किमिदं लोकाः क्षुब्धाः संशयमागताः ॥ २३
तानाह पद्मसंभूतो नैतद् वेमि च कारणम् ।
तदागच्छत यो युक्तं द्रष्टुं चक्रगदाधरम् ॥ २४
पितामहेनैवमुक्ता देवाः शक्रपुरोगमाः।
पितामहं पुरस्कृत्य मुरारिसदनं गताः ।। २५
नारद उवाच ।
कोऽसौ मुरारिदॆवर्षे देवो यक्षो न किमरः ।
दैत्यो राक्षसो वापि पार्थिवो वा तदुच्यताम् ॥ २६
पुलस्त्य उवाच।
योऽसौ रजःसत्त्वमयो गुणवांश्च तमोमयः ।
निर्गुणः सर्वगो व्यापी मुरारिर्मधुसूदनः ॥ २७
नारद उवाच
योऽसौ सुर इति रयातः कस्य पुत्रः स गीयते ।
कथं च निहतः संख्ये विष्णुना वद् पदस्व मे ॥ २८
पुलस्त्य उवाच । -
श्रूयतां कथयिष्यामि पुरासुरनिरहणम् ।
विचित्रमिदमाख्यानं पुण्यं पापप्रणाशनम् ॥ २९
कश्यपस्यौरसः पुत्रो रो नाम दनद्भवः ।
स ददर्श रणे शस्तान् दिविपुत्रान् सुरोत्तमैः ॥ ३०
ततः स मरणाद् भीतस्तप्त्या वर्षगणानहून् ।
आराधयामास विभुं ब्रह्माणमपराजितम् ॥ ३१
ततोऽस्य तुष्टो वरदः प्राह वत्स वरं वृणु ।
स च यो वरं दैत्यो परमेनं पितामहात् ॥ ३२
यं यं करतलेनाहं स्पृगेयं समरे विभो ।
स स मद्धस्तसंस्पृष्टस्त्यमरोऽपि मरत्वतः ।। ३३
बाढमित्याह भगवान ब्रह्मा लोकपितामहः ।
ततोऽभ्यागान्महातेजा मुरः सुरगिरिं बली ॥ ३४
समेत्याह्वयते देवं यक्षं किन्नरमेव वा ।
न कश्चिद् युयुधे तेन समं दैत्येन नारद ॥ ३५
ततोऽमरावती क्रुद्धः स गत्वा शक्रमाह्वयत् ।
लगे। (२१)
इन्द्रप्रमुख देवता अपने-अपने आसनों से हिल उठे और महर्षि गण 'ससार का भला हो' जप करने लगे। (२२)
तदनन्तर लोकों के क्षुब्ध होने पर देवगग ब्रह्मा के पास आये और उन्हें देखकर पूला-लोक क्षुब्ध होकर क्यों संशयास्त हुए हैं (२३)
पद्मयोनि ब्रह्मा ने उनसे कहा-इसका कारण में नहीं जानता। तुम लोग आओ, (इस के लिए) चक्र तथा गदा धारण करने वाले विष्णु के पास जाना उचित है। (२४)
पितामह के ऐसा कहने पर इन्द्रादि सभी देवता पितामह को आगे कर मुरारि के लोक मे गये । (२५)
नारद ने कहा-हे देवर्षि । आप यह बतलायें कि ये मुरारि कौन है ? क्या देवता, यक्ष, किन्नर, दैत्य, राक्षस या मनुष्य है? (२६)
पुलस्त्य ने कहा-सत्त्व रज तममय, गुणमय, निर्गुण, सर्वव्यापी मधुसूदन ही मुरारि नाम से प्रसिद्ध है। (२७)
नारद ने कहा-आप मुझे यह बतलाये कि यह मुर नामधारी दानव किसका पुत्र था? विष्णु के द्वारा युद्ध में वह कैसे मारा गया। (२८)
पुलस्त्य ने कहा-सुनो। मैं मुरासुर के वय की विचित्र पवित्र रब पापनाशक कथा कहता हूँ । (२६)
दनु के गर्भ से कश्यप का मुर नामक औरस पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने श्रेष्ठ देवों द्वारा युद्ध में दैत्यों को पराजित देखा। (३०)
तदनन्तर मृत्यु के भय से डरकर उसने अनेक वर्षों तक तपस्या कर अपराजित विभु ब्रह्मा की आराधना किया । (३१)
तदनन्तर उसके ऊपर प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने कहा- वत्स । वर माँगो। उस दैत्य ने पितामह से यह पर मोगा। (३२)
दे विभो ! युद्ध में मैं जिसे करतल से स्पर्श करूँ वह मेरे हाथ के स्पर्श से अमर होते हुए भी मर जाय । (३३)
लोकपितामह भगवान ब्रह्मा ने कहा-ऐसा ही होगा। तदनन्तर महातेजस्यी घलवान मुर सुरगिरि पर (३४)
हे नारद । यहाँ पहुँचकर उसने देवता, यक्ष, किन्नर आदि को युद्ध के लिये ललकारा, किन्तु किसी ने भी उसके साथ युद्ध नहीं किया। (३५)
तदनन्तर क्रुद्ध होकर वह अमरावती में गया एवं इन्द्र
न चास्य सह योधु वै मतिं चक्रे पुरंदरः॥३६
ततः स करमुद्यम्य प्रविवेशामरावतीम् ।
प्रविशन्तं न त कश्चिनिवारयितुमुत्सहेत् ।। ३७
स गत्वा शक्रसदनं प्रोवाचेन्द्रं मुरस्तदा ।
देहि युद्धं महस्राक्ष नो चेत् स्वगं परित्यज ॥ ३८
इत्येवमुक्तो मुरुणा ब्रह्मन् हरिहयस्तदा ।
स्वर्गराज्यं परित्यज्य भूचरः समजायत ॥ ३९
ततो गजेन्द्रकुलिशौ हतौ शक्रस्य शत्रुणा ।
सकलत्रो महातेजाः सह देवैः सुतेन च ।। ४०
कालिन्या दक्षिणे कूले निवेश्य स्वपुरं स्थितः ।
मृरुवापि महाभोगान् बुभुजे स्वर्गसंस्थितः ॥ ४१
दानवाश्चापरे रौद्रा मयवारपुरोगमाः ।
मुरमासाद्य मोदन्ते स्वर्ग सुकृतिनो यथा ॥ ४२
स कदाचिन्महीपृष्ठं समायावो महासुरः।
एकाकी कुञ्जरारूढः सरयूं निम्नगां प्रति ।। ४३
स सरय्वास्तटे वीरं राजानं सूर्यवंशजम् ।
ददृशे रघुनामानं दीक्षितं यज्ञकर्मणि ॥ ४४
वमुपेत्यानवीद् दैत्यो युद्धं मे दीयतामिति ।
नो चेन्निवर्ततां यज्ञो नेष्टव्या देवतास्त्वया ॥ ४५
तमुपेत्य महातेजा मित्रावरुणसंभवः ।
प्रोवाच बुद्धिमान् ब्रह्मन् वसिष्ठस्तपतां वरः ॥ ४६
किं ते जितैर्न रैदैत्य अजिताननुशासय ।
प्रहर्तुमिच्छसि यदि तं निवारय चान्तकम् ।। ४७
स पली शासनं तुभ्यं न करोति महासुर ।
वस्मिन्जिते हि विजितं सर्व मन्यस्व भूतलम् ।। ४८
स तद् वसिष्ठवचनं निशम्य दनुपुंगवः ।
जगाम धर्मराजानं विजेतुं दण्डपाणिनम् ॥ ४९
तमायान्तं यमः श्रुत्वा मत्याऽवध्यं च संयुगे ।
स समारुह्य महिएं केशवान्तिकमागमत् ॥५॥
समेत्य चाभिवाद्येनं प्रोवाच मुरचेष्टितम् ।
को युद्ध के लिए ललगरने लगा। किन्तु इन्द्र ने उसके साथ युद्ध करने का विचार नहीं किया। (३६)
तदुपरान्त हाथ उठाये हुए वह अमरावती में प्रविष्ट हुआ। किन्तु किसी ने भी उस प्रवेश करते हुए को रोकने का उत्साह नहीं किया। (३७)
तदन्तर इन्द्र के भवन में जाकर मुर ने इन्द्र से कहा- हे सहस्राक्ष मुझसे युद्ध करो, अन्यथा स्वर्ग छोड़ दो। (३८)
हे ब्रह्मन् । मुर के ऐसा कहने पर इन्द्र स्वर्ग का राज्य छोड़कर पृथ्वी पर विचरण करने लगे। (३९)
तदुपरान्त शत्रु ने इन्द्र के गजराज और वन को छीन लिया। महातेजस्वी इन्द्र अपनी पत्नी, पुत्र और देवताओं के साथ कालिन्दी के दक्षिण कूल पर अपना नगर यसार रहने लगे एय मुर भी स्वर्ग में रहते हुए महान् भोगों का उपभोग करने लगा। (४०-४१)
मय और तारक आदि दूसरे भयंकर दानव भी मुर के पास पहुँच कर स्वर्ग मे पुण्यवानों के समान आमोद प्रमोद करने लगे। (४२)
यह महासुर किसी समय पृथ्वी पर आया और अकेला हाथी पर सवार होकर सरयू नदी के तट पर उपस्थित हुआ।(४३)
उसने सरयू के तट पर सूर्यवश में उत्पन्न यज्ञकर्म में दीक्षित रघु नामक राजा को देखा। (४४)
उनके निकट जाकर उस दैत्य ने कहा-मुझ से युद्ध करो, नहीं तो यज्ञ बन्द कर दो। हुम देवताओं की पूजा नहीं कर सकते। (४५)
हे ब्रह्मन् । मित्रावरुणनन्दन, महातेजस्वी, बुद्धिमान और तपस्वियों में श्रेष्ठ वसिष्ट ने उस दैत्य के पास जाकर कहा- (४६)
दैत्य ! मनुष्यों को जीतने से तुम्हें क्या लाम होगा ? अजितों को पराजित करो। यदि आक्रमण करना चाहते हो तो उन यमराज को रोको ।
महासुर । वे बलपान हैं। तुम्हारा शासन नहीं मानते। उनके जीत लेने पर समस्त भूतल को विजित हुआ समझो। (४८)
वसिष्ट का यह वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ दण्डधारी धर्मराज को जीतने के लिए गया । (४९)
उसे आता हुआ सुनकर तथा 'संग्राम मे वह अवध्य हैं' ऐसा सोच कर वे यम महिष पर सवार होकर भगवान् केशव के पास गये।
उनके पास जाकर प्रणाम करने के उपरान्त (यमराज ने) मुर की चेष्टाओं को बताया। उन्होंने कहा-तुम जाकर
स चाह गच्छ मामय प्रेपयस्व महासुरम् ।। ५१
स वासुदेववचनं श्रुत्वाऽम्यागात् त्यरान्वितः ।
एतस्मिन्नन्तरे दैत्यः सप्राप्तो नगरी मुरः ।। ५२
तमागतं यमः प्राह किं मुरो कर्तुमिच्छसि ।
घदस्व वचनं कर्चा त्वदीयं दानवेश्वर ॥ ५३
मुरुरुवाच ।
यम प्रजासंयमनानिति
कर्तुमर्हसि ।
नो चेत् सपाध छित्त्वाऽहं मूर्धानं पातये भुवि ॥ ५४
तमाह धर्मराड प्रझन् यदि मां संयमाद् भवान् ।
गोपायति मुरो सत्यं करिष्ये वचनं तव ॥ ५५
सरस्तमाह भयतः कः संयन्ता बदस्य माम् ।
अहमेनं पराजित्य वारयामि न संशयः ॥५६
यमस्तं प्राह मां विष्णुदेवश्चक्रगदाधरः ।
श्वेतद्वीपनिवासी यः स मां संयमतेऽव्ययः ॥ ५७ ।
तमाह दैत्यशाल: क्यासी यसति दुर्जयः ।
स्वयं वन गमिष्यामि तस्य संयमनोद्यतः॥ ५८
तमुवाच यमो गच्छ क्षीरोदं नाम सागरम् ।
तत्रास्ते भगवान् विष्णुलोकनाथी जगन्मयः ॥ ५९
सुरस्तद्वाक्यमाकर्ण्य प्राह गच्छामि केशवम् ।
किं तु त्वया न तावद्धि संयम्या धर्म मानवाः ।। ६०
स प्राह गच्छ त्वं तावत् प्रपतिष्ये जयं प्रति ।
संयन्तुर्वा यथा स्याद्धि ततो युद्धं समाचर ॥ ६१
इत्येवमुक्त्वा वचनं दुग्धाब्धिमगमन्सरः ।
यत्रास्ते शेषपर्यके चतुर्मुर्तिजनार्दनः ॥ ६२
नारद उवाच।
चतुर्मूतिः कथं विष्णुरेक एव निगधते ।
सर्वगत्यात् कथमपि अव्यक्तत्वाच तद्वद ॥ ६३
पुलस्त्य उवाच।
अव्यक्तः सर्वगोऽपीह एक एव महामुने ।
चतुर्मूतिर्जगन्नाथो यथा ब्रह्मस्तथा शृणु ॥ ६४
अनवर्यमनिर्देश्यं शुक्लं शान्तं परं पदम् ।
वासुदेवारन्यमव्यक्तं स्मृतं द्वादशपत्रकम् ।। ६५
अभी उस महासुर को मेरे पास भेज दो। (५२)
वासुदेय के पाक्य शे सुनकर वे शीघ्र चले आये। इतने मे मुर दैत्य उनकी नगरी में आया। (५२)
उसके आने पर यम ने कहा-हे मुर। बतलाओ तुम क्या करना चाहते हो ? हे दानवेश्वर ! मैं तुम्हारी आजा का पालन करूँगा। (५३)
मुर ने कहा-हे यम ! तुम प्रजाओं का नियमन धन्द परो, नहीं तो मैं तुम्हारा मस्तक काट कर पृथ्वी पर गिरा दूंगा। (५४)
हे ब्रह्मन् ! धर्मराज ने उससे कहा- यदि तुम मेरे । नियामक से मेरी रक्षा कर ससे तो यस्तुत. में तुम्हारे वचन का पालन करूँगा। (५५)
मुर ने उनसे कहा-मुझे घतलाओ तुम्हारा नियामक फौन है? मैं निरसन्देह उसे पराजित कर रोक दूंगा । (५६)
यम ने उससे कहा-श्वेतद्वीपनिवासी, चम्गदाधर, अव्यय भगवान् विष्णु मुझे शासन मे रसते हैं। (५७)
दैत्यशार्दूल मुर ने यमराज से कहा-यह दुर्सय कहाँ रहता है? में वयं उसमा संयमन करने के लिए यहाँ (५८)
यमराज ने उससे कहा-तुम क्षीरसागर में जाओ। वहाँ लोकनाथ जगन्मय भगवान् विष्णु रहते है। मुर ने उनी बात सुनकर कहा-ई धर्मराज! में केशव के पास जाता हूँ। किन्तु तुम तब तक मनुष्यों का नियमन मत करना। (६०)
उस मुरु ने कहा-तुम जाओ। तब तक मैं तुम्हारे नियामक को जैसे भी हो जीतने का प्रयत्न करूँगा। तदनन्तर तुम युद्ध करना। (६१)
इतना कह कर, मुरु दैत्य क्षीर सागर मे पहुँचा । वहाँ चतुर्मूर्ति जनार्दन अनन्त नाग की शय्या पर (६२)
नारद ने कहा-आप यह बतलाएँ कि विष्णु को एक होने पर भी चतुर्मूर्ति क्यों कहा जाता है। क्या सर्वगत एवं अव्यक्त होने से तो नहीं कहा जाता? (६३)
पुलस्य ने कहा-हे प्रदान ! अव्यक्त एव सर्वव्यापी होने पर भी वे एक ही है। जगन्नाथ जिस पर चतुर्मूनि कहे जाते हैं उसे मुनो। (६४)
वासुदेव नामर श्रेष्ठ पद अप्रतयं अनिर्देस्य, शुक्ल, शान्त, अध्यक्त एवं द्वादशपरक कहा गया है।
नारद उवाच।
कथं शुक् कथं शान्तमप्रवर्यमनिन्दितम् ।
कान्यस्य द्वादशैवोक्ता पत्रका वानि मे वद ॥ ६६
पुलम्त्य उवाच ।
भृणुष्व गुह्यं परमं परमेष्ठिप्रभापितम् ।
श्रतं सनत्कुमारेण तेनाख्यातं.च तन्मम ।। ६७
नारद उवाच ।
कोऽयं सनत्कुमारेति यस्योक्तं ब्रह्मणा स्वयम् ।
तवापि तैन गदितं वद मामनुपूर्वशः ॥ ६८
पुलस्त्य उवाच ।
धर्मस्य भार्याहिंसारल्या तस्यां पुत्रचतुष्टयम् ।
संजातं मुनिशार्दूल योगशास्त्रविचारकम् ॥ ६९
ज्येष्ठः सनत्कुमारोऽभूद् द्वितीयश्च सनातनः ।
तृतीयः सनको नाम चतुर्थश्च सनन्दनः ॥ ७०
सांख्यवेत्तारमपरं कपिलं वोढुमासुरिम् ।
दृष्ट्वा पञ्चशिखं श्रेष्ठं योगयुक्तं तपोनिधिम् ॥ ७१
ज्ञानयोगं न ते दाव्यांसोऽपि कनीयसाम् ।
मानमुक्तं महायोगं कपिलादीनुपासतः ।। ७२
सनत्कुमारचा येत्य ब्रह्माणं कमलोद्भवम् ।
अपृच्छद् योगविज्ञानं तमुवाच प्रजापतिः ॥ ७३
ब्रह्मोवाच ।
कथयिष्यामि ते साध्य यदि पुत्रत्वमिच्छसि ।
यस्य कस्य न वक्तव्यं तत्सत्यं नान्यथेति हि ।। ७४
सनत्कुमार उवाच।
पुत्र एवास्मि देवेश यतः शिष्योऽस्म्यहं विभो
न विशेपोऽस्ति पुत्रस्य शिष्यस्य च पितामह ।। ७५
ब्रह्मोवाच ।
विशेषः शिष्यपुत्राभ्यां विद्यते धर्मनन्दन ।
धर्मकर्मसमायोगे तथापि गदतः शृणु ॥ ७६
पुन्नाम्नो नरकात् त्राति पुत्रस्तेनेह गीयते ।
शेपपापहरः शिष्य इतीयं वैदिकी श्रुतिः ॥ ७७
सनत्कुमार उवाच ।
कोऽयं पुनामको देव नरकात् त्राति पुत्रकः ।
कस्माच्छेपं ततः पापं हरेच्छिभ्यश्च तद्वद ॥ ७८
नारद ने कहा-किस प्रकार वे शुक्ल, शान्त, अप्र- तर्य एवं अनिन्दित हैं ? मुझे बतलाएँ कि उनके तथा- कथित द्वादशपत्रक कौन है? (६६)
पुलस्त्य ने कहा-पितामह ब्रह्मा के द्वारा कथित वह गुप्त वाक्य सुनिए। सनत्कुमार ने उसे सुना था और उन्होंने मुझसे कहा था । (६७)
नारद ने कहा--मुझे क्रमपूर्वक यह बतलायें स्वयं ब्रह्मा ने जिनसे कहा और जिन्होंने आपसे कहा वे सनत्कुमार कौन है? (६८)
पुलस्त्य ने कहा-धर्म की पत्नी अहिसा है। उससे चार पुत्र हुए । हे मुनिश्रेष्ठ । वे सभी योगशास्त्र में प्रवीण थे। (६९)
उनमे सनत्कुमार ज्येष्ठ, सनातन द्वितीय, सनक तृतीय एव सनन्दन चतुर्थ हुए। (७०)
वे सभी साल्यवेत्ता कपिल, वोढु, आसुरी एव योगयुक्त तपोनिधि श्रेष्ठ पश्चशिख नामक (ऋपियों) को देसकर ( उनके पास गये) बड़ा होने पर भी उन लोगों ने अपने से छोटों को ज्ञानयोग का का उपदेश नही दिया। कपिलादि की उपासना करने वालों को महायोग का परिमाण मान बतलाया गया। (७२)
सनकुमार ने कमलोद्भव ब्रह्मा के पास जाकर योग विज्ञान पूला । प्रजापति ने उनसे कहा- (७३)
हे साध्य | यदि तुम पुत्र होना चाहो तो मैं तुमसे कहूँगा । इसे जिस किसी से नहीं रहना चाहिए। क्योंकि यह सत्य है, अन्यथा नहीं है। (७४)
सनत्कुमार ने कहा-हे देवेश । मैं पुत्र ही हूँ। क्यों कि हे विभो । मैं शिष्य हूँ। हे पितामह ! पुन और शिष्य मे कोई अन्तर नहीं होता । (७५)
ब्रह्मा ने कहा-हे धर्मनन्दन! धर्म कर्मों के अनुष्ठान के समय शिष्य और पुत्र मे कुछ अन्तर होता है। उसे बताता हूँ, सुनो। (७६)
यह वैदिकी श्रुति है कि पुम् नामक नरक से उद्धार करने से पुत्र कहलाता है एव शेप पापों का हरण करने वाला शिष्य कहलाता है। (७७)
कुमार ने कहा- देव! यह आप बतलाएँ कि पुत्र जिस नरक से त्राण करता है वह पुम् नामक नरक कौन है एव शिष्य किससे अवशिष्ट पाप का हरण करता है। (७८)
प्रमोवाच ।
एतत् पुराणं परमं महर्षे
योगायुक्तं च सदैव यरु।
तथैव चोनं भयहारि मानयं
पदामि ते साध्य निशामयैनम् ॥ ७९
इति श्रीयामनपुराणे चतुतितस्त्रिंशोऽध्याय ॥३४॥