वामन महा पुराण
पुरुरवा की रुपप्राप्ति के प्रसङ्ग मे प्रेत एव वणिक् की कथा एव वणिक् से प्रेत द्वारा अपने वृत्ताम्त का कतन, प्रेत द्वारा श्रवणद्वादशी माहात्म्य का वर्णन गया में पिण्ड- दान करने से उसकी प्रेतयोनि से मुक्ति, पुरुरवा वो पूर्वजन्म मे सुरुपप्राप्ति
पुलस्त्य उवाच ।
कालिन्दीसलिले स्नात्या पूजयित्वा त्रिविक्रमम् ।
उपोप्य रजनीमेको लिङ्गमेदं गिरिं ययौ ॥१
तत्र स्नात्वा च विमले भवं दृष्ट्या च भक्तितः ।
उपोष्य रजनीमेकां तीर्थ केदारमाबजत् ।। २
तत्र स्नात्याऽयं चेशानं माधवं चाप्यमेदतः ।
उपित्वा वासरान् सम कुञानं प्रजगाम ह ॥ ३
ततः सुतीर्थे स्नात्वा च भोपवासी जितेन्द्रियः ।
हपीकेशं समभ्यर्च्य ययौ पदरिकाश्रमम् ॥ ४
सत्रोग्य नारायणमर्थ्य भक्त्या
स्नात्वाऽथ विद्वान् स सरस्वतीजले ।
वराहतीर्थे गरुडासनं “स
दृष्ट्वाऽथ संपूज्य सुभक्तिमांथ ॥५
भद्रकणे ततो गत्वा जयेशं शशिशेखरम् ।
दृष्ट्या संपूज्य च शिवं पिपाशामभितो ययौ ॥६
तम्यां स्नात्वा समभ्यय॑ देवढेवं द्विज प्रियम् ।
उपवासी इरावत्यां ददर्श परमेश्वरम् ॥ ७
यमाराध्य द्विजश्रेष्ठ शाकले चै पुरूरवाः ।
समवाप परं रूपमैश्वर्य च सुदुर्लभम् ।। ८
कुष्ठरोगाभिभूतच यं समाराध्य वै भृगुः ।
आरोग्यमतुलं प्राप संतानमपि चाक्षयम् ॥९
नारद उवाच ।
कथं पुरूरवा विष्णुमाराध्य द्विजसत्तम ।
विरूपत्वं समुत्सृज्य रूपं पाप श्रिया सह ।। १०
पुलस्त्य उवाच ।
श्रूयतां कथयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् ।
पूर्य त्रेतायुगस्यादी यथावृत्तं तपोधन ॥ ११
मद्रदेश इति ख्यातो देशो वै ब्रह्मणः सुत ।
५३
पुलस्त्य ने कहा-यमुनाजा में स्नान कर प्रहलाद ने त्रिविका की पूजा की एवं एक रात उपोषण करने के उपरान्त लिङ्गभेदनामक पर्वत पर चले गए।
यही विमल (जल) में स्नान कर उन्होंने भक्ति पूर्वक सादर का दर्शन किया एय एक रात नियास पर पेदार नामक तीर्थ में गए। (२)
पहाँ नानोपरान्त (उन्होंने) अभेद बुद्धि से शिव यं विष्णु का अर्चन किया प्य सार दिनों तक नियारा पर पुम्जान में चले गये। (३)
सदनन्तर उस गुन्दर तीर्थ में स्नान कर उपवास करने याले जितेन्द्रिय (मलाद) पीयेश या अर्चन फर पदरिफा आधम घले गये। (४)
पदा नियास करते हुए सरस्वती ये जल में स्नानार एन विद्वान् (प्रागार) मे नागय का पूजन किया। सदनन्तर अत्यम भक्तिपूर्वक उन्होंने यराहतीध में गरूडासन पिशुनदर्शन एवं पूजन किया।
पद से भद्रपर्ण में जार जयेश शशिशेखर शिष का दर्शन एवं पूजन पाने के उपरान्त विपाशा की ओर चले गये।
उस यिपाशा मे स्नानोपरान्त द्विजप्रिय देयाधिदेय का अर्चन र (प्रहलाद) उपवास परते हुए इरायती की ओर गा । हे द्विजश्रेष्ठ । (उन्होंने) यहाँ उन परमेश्वर या दर्शन किया जिनकी शारल में आराधना करने से पुस्रया को श्रेष्ठ स्प एघ मुदुर्लभ ऐश्वर्य प्राप्त हुआ था। (७-८)
शुष्टरोगाभिभूत भृगु ने उन परमेश्वर पी आराधार पर अतुल आरोग्य च अक्षय सन्तान प्राप्त किया (९)
नारद ने कहा-हे द्विजसत्तम । पुरूरया ने विष्णु की आराधना परने में उपरान्त किस प्रकार यस्पना यो छोडर ऐश्वर्य के साथ मुदुभ प प्राप्त पिया।
पुरम्त्य ने पहा-हे तपोधन ! सुनो, में प्रापीनराज में प्रेतायुग के आदि में पटिद पापनाशिनी कथा कहता है।
हे ब्रह्मपुत्र! प्रसिद्ध मद्रदेश में शामल नाम से प्रख्यात
शाकलं नाम नगरं ख्यातं स्थानीयमुत्तमम् ॥ १२,
तस्मिन् विपणिवृत्तिस्थः सुधर्माख्योऽभवद् वणिक् ।
धनाढयो गुणवान् भोगी नानाशास्त्र विशारदः ॥ १३
स त्वेकढा निनाद् राष्ट्रात सुराष्ट्रं गन्तुमुद्यतः ।
सार्थेन महता युक्तो नानाविपणपण्यवान् ॥ १४
गच्छतः पथि तस्याय मरुभूमौ कलिप्रिय ।
अभवद् दस्युतो रात्रौ अवस्कन्दोऽतिदुःमहः ॥ १५
ततः म हृतमम्बो वणिग् दुःराममन्धितः ।
अमहायो मरौ तस्मिश्चचारोन्मत्तयद् वशी ॥ १६
चरता तदरण्यं 4 दुःसाक्रान्तेन नारद ।
आत्मा इव शमीवृक्षो मरावासादितः शुभः ।। १७
तं मृगैः पक्षिणिय हीनं दृष्ट्वा शमीतरुम् ।
श्रान्तः क्षुतुटपरीवात्मा वस्याधः समुपाविशत् ॥ १८
सुमश्चापि सुविधान्तो मध्याहे पुनरुत्थितः ।
समपश्यदथायान्तं प्रेतं प्रेतशतैनम् ॥ १९
उद्याह्यन्तमथान्येन प्रेतेन प्रेतनायकम् ।
पिण्डाशिभिश्च पुरतो धावनी रूक्षविग्रहः ॥ २०
अथाजगाम प्रेतोऽसौ पर्यटित्या वनानि च।
उपागम्य शमीमूले वणिकपुत्रं ददर्श सः ॥ २१
स्वागतेनाभिवाद्यैनं समाभाष्य परस्परम् ।
सुसोपविष्टश्छायायां पृष्ट्या कुशलमाप्तवान् ।। २२
ततः प्रेताधिपतिना पृष्टः स तु वणिक्ससः ।
कुत आगम्यते हि क साधो वा गमिष्यसि ॥ २३
कथं चेदं महारण्यं मृगपक्षिविवर्जितम् ।
समापन्नोऽसि भद्रं ते सर्वमान्यातुमर्हसि ॥ २४
एवं प्रेताधिपतिना वणिक् पृष्टः समासतः ।
सर्वमाख्यातवान् ब्रह्मन् स्वदेशधनविच्युतिम् ।। २५
तस्य श्रुत्वा स वृत्तान्तं तस्य दुःसैन दुःसितः ।
वणिकपुत्रं ततः माह प्रेतपालः स्वबन्धुवत् ।। २६
एवं गतेऽपि मा शोकं कर्तुमर्हसि सुव्रत ।
उत्तम नगर है। (१२)
वहाँ सुधर्मा नाममा एक धनाढ्य गुणवान , भोगी एवं नानाशाख विशारद व्यापारी रहता था। (१३)
वह एक समय अपने राष्ट्र से सुराष्ट्र जाने को प्रस्तुन हुआ। हे कलिप्रिय ! अनेक पिमेय वस्तुओं से सम्पन्न व्यापारियों के महान समूह के साथ मार्गस्थ मरभूमि में से लाते समय रात्रि में (उसके ऊपर) डाकुओं या अति दु सह आक्रमण हुआ। (१४-१५)
तदनन्तर सर्वस्य अपहृत हो जाने से दुखित वह संयमी यणिक मरुभूमि में उन्मत्तथत विचरण करने लगा। (१६)
हे नारद ! दुःसामान्त होकर उस वन में विचरण करते हुए उसे मरुभूमि में आत्मीय के तुज्य एक शुभ शमी वृक्ष मिला। (१७)
उस शमीवृक्ष को पशु-पक्षियों से रहित देसर थका तथा भूप प्यास से अभिभूत यह वणिक उसके नीचे बैठ (१८)
शयन द्वारा पर्याप्त विश्राम कर वह मध्याह में उठा एवं सैकड़ों प्रेतों से आवृत एक प्रेत को आसे हुए (१०)
उस तनायक को एक अन्य प्रेत ढो रहा था । एवं रूक्ष शरीरयाले पिण्डाशी (प्रेत) उसके आगे दौड़ रहे थे। (२०)
पनों में पर्यटन करने के उपरान्त वह प्रेत लौटा एवं शमी वृक्ष के नीचे पहुँच कर उसने पणिक पुत्र को (२१)
स्वागत के साथ उसे अभिवादन करने के उपरान्त परस्पर वार्तालाप करके वह छाया में सुखपूर्वक पैठ गया और कुशल पूछकर जाना। (२२)
तदनन्तर प्रेनाधिपति ने वणिक बन्धु से पूछा- हे साधु । यह धतलाओ कि तुम कहाँ से आये हो एवं यहाँ जाओगे? (२३)
तुम्हारा क्ल्याण हो । मुझे यह बतलाओ कि पशु एवं पक्षियों से शून्य इस महान अरण्य में कैसे आये। (२४)
हे ब्रह्मन् ! प्रेतराज के ऐसा पूछने पर वणिर ने संक्षेप में उसे अपने देश तथा धन-नाश का पूरा विवरण चलाया। (२५)
मसका वृत्तान्त मुनने के उपरान्त उसके दुःस से दु.सित होकर प्रेतपति ने स्परन्धु के सदृश उस यणिक पुन से कहा- (२६)
हे सुव्रत ! ऐसा होने पर भी तुम्हें शोक नहीं करना
भूयोऽप्पाः भविष्यन्ति यदि भाग्यबलं च ॥ २७
भाग्यलयेाः क्षीयगे भवन्त्यम्युदये पुन. ।
क्षीणस्यास्य शरीरस्य चिन्तया नोदयोग्मवेत् ॥ २८
इत्युच्चार्य समाय स्वान् भृत्यान् वाक्यमनवीत् ।
अधातिथिरयं पूज्य. सदैव स्वजनो मम ।। २९
अस्मिन् दृष्टे घणिकाने यथा स्वजनदर्शनम् ।
अस्मिन् समागते प्रेता. ग्रीति वा ममातुला ॥ ३०
एवं हि यदतस्तस्य मृत्पातं सुदृढं नवम् ।
दभ्योदनेन संपूर्णमाजगाम यथेप्सितम् ।। ३१
क्या नया च मुढा संपूर्णा परमाम्भसा ।
वारिधानी च संप्रामा प्रेतानामग्रतः स्थिता ।। ३२
वमागतं मसलिलमगं वीक्ष्य महामतिः।
माहोचिष्ट वणिपुर समाहिकमुपाचर ।। ३३
वस्तु वारिधान्यास्ती मलिलेन विधानतः ।
कृताहिकाउभी नाती वणिर प्रेतपतिस्तथा ॥ ३४
ततो चणिसुतायादी दभ्योदनमधेच्छया ।
दत्त्वा तेभ्यश्च मम्य. प्रेतेभ्यो व्यददात् ततः ॥ ३५
मुक्तरत्सु च सर्वेषु कामतोऽम्भसि सेविते ।
अनन्तरं म उभुजे प्रेतपालो वराशनम् ।। ३६
प्रकामा प्रेतै च वारिधान्योदनं तथा ।
अन्तर्धानमगाद् ब्रह्मन् वणिक्वनस्य पश्यतः ॥ ३७
ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा स मतिमान वणिक् ।
पप्रच्छ त प्रेतपालं कौतूहलमना वशी ॥३८
अरण्ये निर्जने साधो पुतोऽन्नस्य समुद्भवः ।
कुतश्च वारिधानीयं संपूर्णा परमाम्भसा ।। ३९
तथामी का ये भृत्यास्त्वत्तस्ते पूर्णतः कृशाः ।
भवानपि च तेजस्वी किंचित्पुष्टवपुः शुभः ।। ४०
शुतरत्रपरीधानो यहनां परिपालकः ।
सर्वमेवन्ममात्रस्य को भवान् का शमी स्वियम् ॥४१
इत्यं वणिक्सुतवचः श्रुत्वाऽसौ प्रेवनायकः।
चाहिये। यदि तुम्हारा भाग्यवल होगा तो सम्पत्तियों सुन हो जायेगी। (२७)
भाग्य का क्षय होने पर धनों का क्षय हो जाता है रय पुन भाग्योदय होने से धनागम भी हो जाता है। इस ग्रीण शरीर की चिन्ता करने से उदय (वृद्धि) नहीं दोषा। (२८)
ऐसा कहकर उसने अपने भृत्यों को बुलाया पव उनमे पहा-मेरे स्यजन पे श सर्वथा इस अतिधि का हिश (२९)
हे प्रेतो । स्वजन दर्शन के तुल्य मुझे इस पणिर पुग्न पा दर्शन हुआ है। इससे समागम से मुद्दा अतुल प्रीति हुई। (३०)
उसपे इस प्रकार पहने पर यच्छ दघि और ओदन से पूर्ण अस्पतद एक नया मिट्टी या यनंन या गया। सीमार हराम जर से पूर्ण जलपात्र प्रेतों सम्मुख परिचत दुभा। (३१-२२)
पुरा मा ८५ जल को उपस्यिा देखार महामति प्रा ने कहा-६ बगिर पुत्र! तुम स्टो एवं आहिक (१२)
बदनन्तर गिर में प्रवपति दोनों ने पट जससे विधिपूरशिय माया। (३४)
तदुपरान्त (प्रेतपति ने) पहले पणिक पुत्र शे यथेच्छ दधि एवं ओपन दिया तथा तदनन्तर उन प्रेतों को दिया। (३५)
सभी के यथेच्छ भोजन एय जलपान करने के पश्चात् उस प्रेतप्रति ने उत्तम भोजन किया । (३६)
सम् । प्रेत ये पूर्ण रूप से सृप्त हो जाने पर यरिणम्पुन ये देखते ही देखते जलपात्र एच ओपन तिरोधित हो गया। (३७)
तदनन्तर मस अत्यन्त अद्भुत दृश्य को देखकर रस बुद्धिमान सयमी यणिर ने कोहल पूर्वक उस मेतपति से पूछा- (३८)
हे साधु! इस निर्जन अरण्य में अन्न ए५ गत्तम सप्ल से पूर्ण प्पट यहाँ से भाया? (३६)
तुम्हारी अपेक्षा पणे फी प्टि से पृश तुम्हारे ये मृत्य कौन हैं। बिना पुष्ट शरीर पुत सुन्दर तेज सम्पन्न रास्थयात्रपारी पहनों का परिपाटन पाने माण (आप भी पौन है? आप मुझे यह सम्पूर्ण पक्षाम पवासाय हि आप सीन पं यदीप पौन कौनपं हैं?
यणिकाध इस प्रथा के पपन को गुनमा
शशंस सर्वमस्यायं यथावृत्तं पुरावनम् ॥ ४२
अहमासं पुरा विप्रः शारले नगरोचमे ।
सोमशति विख्यातो बहुलागर्भसंभवः।। ४३
ममास्ति च वणिक थीमान प्राविवेश्यो महाधनः ।
स तु सोमश्या नाम विष्णुभक्तो महायशाः ॥ ४४
सोऽहं कदर्यो मृढात्मा धनेऽपि सति दुर्मतिः ।
न ददामि द्विजातिभ्यो न चाश्नाम्यन्नमुत्तमम् ।। ४५
प्रमादाद् यदि मुञ्जामि दधिक्षीरघृतान्वितम् ।
ततो रात्री नृमिर घोरस्ताड्यते मम विग्रहः ॥ ४६
प्रातर्भयति मे घोरा मृत्युतुल्या विचिका ।
न च कश्चिन्ममाम्यासे तत्र विष्ठति पान्धवः ॥४७
कथं कथमपि प्राणा मया संप्रतिधारिताः ।
एवमेतादृशः पापी निवसाम्यतिनिधृणः ।। ४८
सौवीरतिलपिण्याकसक्तशाकादिभोजनः ।
आपयामि कदनाघेरात्मानं फालयापनः ॥ ४९
एवं तत्रासतो मह्यं महान् कालोऽभ्यगादध ।
श्रवणद्वादशी नाम मासि भाद्रपदेऽभवत् ।। ५.
ततो नागरिको लोको गत. स्नातुं हि संगमम् ।
इरावत्या नड्वलाया प्रदक्षत्रपुरस्सरः॥५१
प्रातिवेश्यासंगेन तत्राप्यनुगतोऽस्म्यहम् ।
प्रतोपवासः शुचिमानेकादश्यां यत्रतः ।। ५२
ततः संगमतोयेन वारिधानी ढां नवाम् ।
संपूर्णी वस्तुसंवीतां छत्रोपानहसंयुताम् ।। ५३
मृत्पात्रमपि मिष्टस्य पूर्ण दध्योदनस है।
प्रदत्तं ब्राह्मणेन्द्राय शुचये ज्ञानयमिणे ।। ५४
वदेव जीता दत्तं मया दान पणिपसुत ।
वर्षाणां समतीनां वे नान्यद् दत्तं हि फिंचन ॥ ५५
मृतः प्रेतत्वमापन्नो दत्त्वा प्रेतायमेव हि ।
अमी चादत्तदानास्तु मदन्नेनोपजीयिनः ॥ ५६
एतत्ते कारणं प्रोक्तं यत्तदन्नं मयाम्भसा ।
प्रेतनायक ने उससे सम्पूर्ण प्राचीन वृत्तान्त कहा। (४२)
(उसने कहा-प्राचीनगल मे में उत्तम शारल नामक नगा में बहुला के गर्भ से उत्पन्न सोमशर्मा नामक विख्यात प्रामण था। (४३)
मेरा पड़ोसी एक अतिधनवान, लक्ष्मीवान सोमश्रया नामक पणिक् था। यह महान यशस्वी एवं विष्णुभक्त था। (४४)
कृपण एवं मूर्स में धन होते हुये भी न तो द्विजातियों को दान परता था और न उत्तम अन्न का भोग ही करता (४५)
यदि प्रमादयश में दधि, क्षीर एवं घृतयुक्त पदार्थ भोजन करता था तो रात्रि में भयङ्कर मनुष्य मेरे शरीर को (४६)
प्रातः फाल मुझे मृत्युतुल्य घोर विचिका (हैजा) हो जाया परती थी। उस समय पोई भी पन्धु मेरे समीप नदी उदाता था। (४७)
किसी प्रकार में अपने प्राणों को धारण करना था। इस प्रकार में अति निर्टन पापयुक्त जीवन व्यतीत कर रहा था। (४८)
घेर, विलपिण्याक, सत्तू एवं शादिसराप अन्नों को साकर फालयापन करते हुए में स्वयं को क्षीण पर रहाया। (४२)
मुझे इस प्रसार यहाँ रहते हुए बहुत वाल व्यतीत होगया। (एक पार) भाद्रपदमास में श्रवणद्वादशी की तिथि आई।(२०)
नदनन्तर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक लोग इरायती और नवला नदियों के संगम में स्नान करने के लिये (५१)
पड़ोसी के कारण में भी उनके पीछे-पीछे गया। एकादशी के दिन व्रत धारण कर पवित्रतापूर्वक मैंने उपवास किया। (५२)
सदनन्तर मैंने अनेक यस्तुओं, छाता एवं जूना सहित सनम के जल से पूर्ण नरीन एवं दृढ़ जलपान दया मिष्टान्न, दधि धं ओदन से पूर्ण मिट्टी सपात्र ज्ञान एवं धर्म से मुक्त पवित्र श्रेष्ठ प्रामण को प्रदान किया। (५३-५४)
हे यजिर पुत्र! मैंने अपने मत्तर वर्ण के जीयन में यही दान दिया था। इसके अतिरिक्त अन्य इन भी नहीं दान किया।
प्रेतान्न दान करके मृत्यु के उपरान्त में प्रेत हुआ। मेरे अन्न से जीरन धारण करने वाले इन लोगों ने भी दान नहीं किया है।
मैंने तुम्हें यह कारण घनसाया जिसमे मेरे द्वारा दिया गया जल एवं अन्न प्रतिदिन मभ्याड फे समय
दत्तं तदिदमायाति मध्याह्वेऽपि दिने दिने ॥ ५७
यावनाहं च भुआमि न तावत् क्ष्यमेति वै ।
मयि भुक्ते च पीते च सर्वमन्तर्हितं भवेत् ॥ ५८
यचादपत्रमददं सोय जातः शमीतरुः ।
उपानयुगले दत्ते प्रेतो मे पाहनोऽभवत् ।। ५९
इयं योक्ता धर्मज्ञ मया कीनाशवात्मनः ।
श्रवणद्वादशीपुण्यं वयोक्तं पुण्यवर्धनम् ।। ६०
इत्येवमुक्ते वचने यणिपुनोऽब्रवीद् ययः ।
यन्मया सात कर्त्तव्यं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ६१
तत् तस्य वचनं श्रुत्वा वणिक्षत्रस्य नारद ।
प्रेतपालो यचः प्राह स्वार्थसिद्धिकरं ततः ।। ६२
यत् त्वया वात कर्त्तव्यं मद्भितार्थ महामते ।
कथयिष्यामि तत् सम्यक तव श्रेयस्करं मम ॥ ६३
गयायां तीर्थजुष्टायां स्नात्वा शौचसमन्वितः ।
मम नाम सम्रदिश्य पिण्डनिर्वपण कुरु ।। ६४
वर पिण्डप्रदानेन प्रेतभावादहं ससे ।
मुक्तस्तु सर्वदातॄणां यास्यामि सहलोकताम् ॥ ६५
यथेयं द्वादशी पुण्या मासि प्रोष्ठपदे सिता।
बुधश्रयणसंयुक्ता साऽतिश्रेयस्करी स्मृता ॥ ६६
इत्येवमुक्त्वा वणि प्रेतराजोऽनुगैः सह ।
स्वनामानि यथान्यायं सम्यगारुयातवान्छुचिः॥६७
प्रेतम्कन्धे समारोप्य त्याजिनो मरुमण्डलम् ।
रम्येऽथ शूरसेनार ये देशे प्राप्त. स वै वणिक् ।।६८
सकर्मधर्मयोगेन धनमुचायचं बहु ।
उपार्जयित्वा प्रययौ गयाशीर्प मनुत्तमम् ॥ ६९
पिण्डनिर्वपणं तत्र प्रेवानामनुपूर्वशः।
चकार म्वपितृणां च दायादानामनन्तरम् ॥ ७०
आत्मनश्च महाबुद्धिर्महानोध्यं तिलविना
पिण्डनिपणं चके तथान्यानपि गोत्रजान् ॥ ७१
एवं प्रदत्तपय चै पिण्डेषु प्रेतभावतः ।
विमुस्तास्तै द्विज प्रेता ब्रह्मलोकं ततो गताः ॥ ७२
स चापि हि वणिकपुत्रो निजमालयमावजत् ।
(मेरे ममीप) उपस्थित होता है।
जम तक में नहीं पाता तय तक उसरा क्षय नहीं होता । मेरे पाने और पीने के उपरान्त सभी कुछ तिरोहित हो जाता है। (५८)
मैंने सो पत्र दान किया था पही इस शमी वृक्ष के रूप में उत्पन्न हुआ है। एक जोड़ी जूता पा दान करने से प्रेत मेरा पाहन यना है। (५९)
हे धर्मेश! अपने प्रेार प्राप्ति का यह समस्त पियाण मैंने तुमसे पदा तया परम पवित्र और पुण्य को पढ़ाने पाटी प्रणवादशी का भी वर्णन किया है। (६०)
प्रेत पंऐसा कहने पर यणिर-पुत्र ने पहा-ई तात ने मोजो करना हो उसकी आना। (६१)
हे नारद । परिणर-पुत्र पर यह ययन मुनरर प्रेतपनि ने अपने प्यार्य को सिद्ध करने पारा यपन पहा । (६२)
दमदामनि ! मेरे दिल पेटिस नुम्हारे द्वारा किये जाने
योग्य फर्म में मुम्हें पाता है। भली उमरो । सम्पादित करने मे मुम्दारा और मेरा फल्याप होगा । (६३)
गया गर्भ में नान से पवित्र होस मेरे नाम में तुम पिण्डदान फो। (६१)
हे गगा! पहा पिणदान परन से में मार से मुज
दोश्रसर्वस्व दान करने वालों के लेक को प्राप्त करूंगा । (६५)
पोप मास के शुक्ल पक्ष की घुध पथवण नक्षत्र से युक्त पुण्य पर्धिनी द्वादशी अत्यन्त मागलिक कही गई है। (६६)
यगिर से ऐसा कहकर प्रेतराज ने अपने अनुगामियों सहित पषित्रतापूर्वक यथोचित रीति से अपने नामों को बनाया। (६७)
प्रेत के कन्चे पर आरूद करार इसे मरुभूमि से पाहर विसर्जित किया गया। इस प्रकार यह यणिर रमगीक शुरसेन नामक देश में पहुँचा।
अपने धर्म तथा धर्म के द्वारा उसने प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट एवं दोन धन उपार्जित रिया। तदनन्तर यह उत्सम गयाशीर्प नामक तीर्थ मे गया । (६९)
यहाँ प्रमश प्रेतों के उद्देश्य से पिण्डदान करन के उपरान उसने अपने पितरों एवं दायादों को पिण्ड दान (७०)
उस महायुद्धि ने अपने लिप विटादित महायपशर पिण्डदान रिया। वदन्तर अन्य गोग्रजों के निमित भी पिण्डदान किया। (७१)
विज! हम पर निरने पर येत मनभाय से मुक्त होकर प्रमक पर्ने गये। (७२)
पद पगिर पुत्र भी अपने पर पला गया और
श्रवणद्वादशी कृत्या कालधर्ममुपेयिवान् ॥ ७३
गन्धर्वलोके सुचिरं भोगान् भुक्त्वा सुदुर्लभान् ।
मानुष्य जन्ममासाद्य स बभौ शाफले विराट् ॥ ७४
स्वधर्मकर्मवृत्तिस्थः थपणद्वादशीरतः ।
कालधर्ममवाप्यासी गुह्यकावासमाश्रयत् ।। ७५
वगोष्य सुचिरं कालं भोगान् मुक्त्वाऽथ कामतः ।
मर्त्यलोकमनुप्राप्य राजन्यतनयोऽभवत् ।। ७६
तत्रापि क्षत्रवृत्तिस्थो दानभोगरतो नशी।
गोग्रहेरिगणात्मिा कालधर्मसपेयिवान् ।
शरलोकं स संप्राप्य देवैः सर्वैः सुपूजितः ।। ७७
पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टः शाकले सोऽभवद् द्विजः ।
वतो विकटरूपोऽसौ सर्वशास्त्रार्थपारगः ॥ ७८
विवाहयद् द्विजसुवां रूपेणानुपमां द्विज ।
सावमेने च भारं सुशीलमपि भामिनी ।। ७९
विरूपमिति मन्नाना ततम्सोभूत् सुदुःसितः ।
ततो निर्वेदसंयुक्तो गत्वाश्रमपदं महत् ।। ८०
इरावत्यास्तटे श्रीमान् रूपधारिणमासदत् ।
ठमाराध्य जगन्नायं नक्षत्रपुरूपेण हि ।। ८१
सुरूपतामवाप्याग्रयां तस्मिन्नेव च जन्मनि ।
तत. प्रियोऽभूद् भार्याया भोगनांश्चाभयद् वशी।
श्रवणद्वादशीभक्तः पूर्वाभ्यासादजायत ॥ ८२
एवं पुराऽमी द्विजपुंगवस्तु
पुरूपरूपो भगवत्प्रसादात् ।
अनङ्गरूपप्रतिमो वभूव
मृतथ राजा स पुरूरवाऽभूत् ।। ८३
इति श्रीवामनपुराणे निपञ्चाशोऽध्याय 11५३॥
द्वादशी का पालन करते हुए वह भी यथासमय मर गया। (७३)
गन्धर्वलोक में चिरकाल तक अत्यन्त दुर्लभ भोगों का उपभोग करने के उपरान्त मनुष्य जन्म प्राप्त कर यह ! शाफलपुरी का सम्राट् बना। (७४)
अपने धर्म तथा कर्म में रत रहते हुए यह श्रवणद्वादशी मे अनुरक्त रहा। मृत्यु के उपरान्त उसने गुह्यकों के लोक को प्राप्त किया। (७५)
यहाँ बहुत समय रहकर इच्छानुसार अनेक भोग्य पदार्थों का भोग करने के पश्चात् मर्त्यलोक मे आकर षह राजपुन्न बना। (७१)
यहाँ भी क्षत्रियों की वृत्ति से निर्वाह करते हुए वह सयमपूर्वक दान और भोग मे लगा रहा। एक समय गीयों का अपहरण होने पर उसने शत्रुओं को जीत कर मृत्यु प्राप्त की। तदनन्तर वह इन्द्र लोक में गया एव सभी देवों से पूजित हुआ। (७७)
पुण्य का क्षय होने से स्वर्गच्युत होकर वह शाकल देश में माझए हुआ। उसका रूप अत्यन्न भयङ्कर था, किन्तु यद् सर्पशारनपारगत था। (७८)
हे द्विज । उस ने अनुपम सुन्दरी प्रामण पन्या से विवाह किया। वह भामिनी अत्यन्त शीटवान् पति का भी कुरूप समझ कर अनादर करती थी। इससे यह अत्यन्त दुखित हुआ। तदननर निदयुक्त होकर यह इरानी के तटपर स्थित महान आश्रम मे पहुँचा एवं नक्षत्र- पुरुप द्वारा तनाथ रूपधारी जगन्नाथ की आराधना की। (७९८१)
इस प्रकार उसी जन्म मे परम सुन्दररूप प्राप्त कर पद अपनी भार्या का प्रिय एव ऐश्वर्यसम्पन्न हो गया। पूर्व के अभ्यास से वह सयमी श्रमणद्वादशी का भक्त बना (८२)
इस प्रार पहले कुरूप रहने पर भी भगवान की कृपा से वह द्विजश्रेष्ट कामदेव के समान रूपवान हो गया और मृत्यु के बाद राजा पुरूरवा हुआ। (८३)
श्रीवामनपुराण में तिरपनवाँ का अध्याय समात॥५३॥