वामन महा पुराण
सर्वशी का निर्माण, प्रह्राद का राज्यभिषेक, प्रह्राद की नैमिष तीर्थ यात्रा एव नर नारायण के साथ युद्ध
पुलस्त्य उवाच ।
ततोऽनङ्ग विभुदृष्ट्वा ब्रह्मन् नारायणो मुनिः ।
प्रहस्यैवं वचः प्राह कन्दर्प इह आस्यताम् ॥ १
तदक्षुन्धत्यमीक्ष्यास्य कामो विस्मयमागतः ।
वसन्तोऽपि महाचिन्तां जगामाशु महामुने ।। २
ततचाप्सरसो दृष्ट्वा स्वागतेनाभिपूज्य च ।
वसन्तमाह भगवानेोहि स्थीयतामिति ॥ ३
ततो विहस्य भगवान् मञ्जरी कुसुमावृताम् ।
आदाय प्राक्सुवर्णाङ्गीमूर्वोर्वाला विनिर्ममे ॥ ४
ऊरूद्भवां स कन्दपों दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरीम् ।
अमन्यत तदाऽनङ्गः किमियं सा प्रिया रतिः ॥ ५
तदेव यदनं चारु स्वक्षिभृकुटिलालकम् ।
सुनासावंशाधरोष्ठमालोकनपरायणम् ॥ ६
तावैवाहार्यविरलौ पीवरौ मग्नचूचुकौ ।
राजेतेऽस्याः कुची पीनौ सजनाविध संहतौ ।। ७
तदेव तनु चावग्या चलित्रयविभूषितम् ।
उदरं राजते श्लक्ष्णं रोमावलिविभूषितम् ।।८
रोमावली च जघनाद् यान्ती स्तनतट त्यियम् ।
राजते भृङ्गमालेव पुलिनात् कमलाकरम् ॥ ९
जघनं त्वतिविस्तीर्ण भात्यस्या रशनावृतम् ।
क्षीरोदमथने नद्धं भुजंगेनेव मन्दरम् ।। १०
कदलीस्तम्भसदृशैरूर्वमूलरथोरुभिः ।
विभाति सा सुचाङ्गी पद्मकिसल्कसन्निभा ॥ ११
जानुनी गूढगुल्फे च शुभे जड्डे त्वरोमशे ।
विभावोऽस्यास्तथा पादावलक्तकसमत्यिपौ ॥ १२
इति संचिन्तयन् कामस्वामनिन्दितलोचनाम् ।
पुलस्त्य ने कहा-हे ब्रह्मन् । इसके अनन्तर विभु नारायण मुनि ने अनंग को देखकर हँसते हुए इस प्रकार वचन कहा-“हे कन्दर्प । यहाँ बैठो।"
काम उनकी उस अक्षुब्धता को देख कर विस्मयान्वित हुआ। हे महामुने । वसन्त को भी तसाल महनी चिन्ता हुई।
तदनन्तर अप्सराओं को देख कर स्वागत द्वारा उनकी पूजा पर भगवान् ने वसन्त से कहा-"आओ आओ वैठो।" (३)
तदुपरान्त भगवान नारायण मुनि ने हँस कर एक कुसुमावृत मञ्जरी ली और अपने ऊरु पर एक सुवर्णाङ्गो बाला की सुष्टि की। (४)
उरु से उत्पन्न उस सर्वाग-सुन्दरी को देखकर कन्दर्प मन में सोचने लगा-'क्या यह मेरी प्रिया रति है ?
वैसे ही सुन्दर नेत्र, भौंह एवं कुटिल अल्कों से युक्त, सुन्दर नासिका का वंश प्य अधरोष्ठ वाला तथा देसने मे अत्यन्त आम्र्पक यह मुख है।
इसके वे ही मनोहर, अस्यन्त तथा भग्नचूचुक वाले पीन कुच सजन पुरुषों के सदृश परस्पर संहत है। (७)
इस सुन्दरागी का वही कृश, त्रिवली विभूपित, कोमल तथा रोमावलि युक्त उदर शोभित हो रहा है। जघा से स्तनतट की ओर जाती हुई इसकी यह रोमावलि पुलिन से कमत्यकर की ओर जाती हुई भ्रमरमाला के सदृश सुशोभित हो रही है।
करधनी से आवृत अतिविस्तीर्ण इसका नितम्य प्रदेश इस प्रकार सुशोभित हो रहा है मानों क्षीरसागर के मन्थन काल में भुजगवेष्टित मन्दर पर्यंत हो । (१०)
कमल के केसर के समान गौरवर्ण वाली यह सुन्दरी कदली स्तम्भ के समान ऊर्यमूल ऊरुओं के द्वारा शोभित होरही है। (१२)
इसके दोनों घुटने, गूढगुल्फ, रोमहीन सुन्दर जघायें तथा आलक्तक के समान कान्ति वाले दोनों पाद अत्यन्न सुशोभित हो रहे है। (१२)
हे मुने! उस सुन्दर नेवाली के विषय में इस प्रकार
कामातुरोऽसौ संजातः किमुतान्यो जनो मुने ॥ १३
माधवोऽप्युर्वशी दृष्ट्वा संचिन्तयत नारद ।
किंस्वित् कामनरेन्द्रस्य राजधानी स्वयं स्थिता ॥ १४
आयाता शशिनो नूनमियं कान्तिनिशाक्षये ।
रविरश्मिप्रतापार्विभीता शरणमागता ।। १५
इत्थं संचितयन्नेव अवष्टम्याप्सरोगणम् ।
तम्यौ मुनिरिव ध्यानमास्थित. स तु माधवः ॥ १६
सत, स पिस्मितान् सर्वान् कन्दपोदीन् महामुने ।
दृष्ट्वा प्रोवाच वचनं स्मितं कृत्वा शुभवतः ।। १७
इयं ममोरुसंमृता कामाप्सरस माधव ।
नीयतां सुरलोकाय दीयतां वासवाय च ॥ १८
इत्युक्ताः कम्पमानास्ते जग्मुयोर्वशी दिवम् ।
सहस्राक्षाय तां प्रादाद् रूपयौवनशालिनीम् ॥ १९
आचक्षुश्चरितं ताभ्यां धर्मजाभ्यां महामुने ।
देवराजाय कामाद्यास्ततोऽभृद् विस्मयः परः ॥ २०
एतादृशं हि चरित ख्यातिमध्यां जगाम है।
पातालेषु तथा मत्ये दिक्ष्वष्टासु जगाम च ॥ २१
एकदा निहते रौद्रे हिरण्यकशिपो मुने ।
अभिपिक्तस्तदा राज्ये प्रहादो नाम दानवः ।। २२
तस्मिञ्शासति दैत्येन्द्र देवब्राह्मणपूजके ।
मखानि भुवि राजानो यजन्ते विधिवत्तदा ॥ २३
ब्राह्मणाश्च तपो धर्म तीर्थयात्राश्च कुर्वते ।
वैश्याच पशुवृत्तिस्थाः शूद्राः शुश्रूषणे रताः ॥ २४
चातुर्वर्ण्य ततः स्वे स्वे आश्रमे धर्मकर्मणि
आवर्तत ततो देवा वृत्त्या युक्ताभवन् मुने ॥ २५
ततस्तु च्यवनो नाम भार्गवेन्द्रो महातपाः ।
जगाम नर्मदां स्नातुं तीर्थ चैवाकुलीश्वरम् ॥ २६
तत्र दृष्ट्वा महादेवं नदी स्नातुमयातरत् ।
अवतीर्ण प्रजग्राह नागः केकरलोहितः ॥ २७
गृहीतस्तेन नागेन सस्मार मनसा हरिम् ।
सोचते हुए जब यह कामदेव ही काममोहित हो गया तो फिर अन्य पुरुषों की क्या बात है। (१३)
हे नारद । वसन भी उस उशी को देसार सोचने लगा-"क्या यह कामनरेश की स्वयं राजधानी अपस्थित है? (१४)
अथवा रात्रि का अन्त होने पर सूर्य की किरणों के ताप के भय से चन्द्रमा की कान्ति शरणागत हुई है। (१५)
इस प्रकार सोचते हुए अप्सराओं को रोक कर वसन्त, मुनि के सदृश ध्यानस्थ हो गया। (१६)
हे महामुने । तदुपरान्त शुभवत नारायण मुनि ने कन्दर्पादि सभी को विस्मयाम्वित देख कर हँसते हुए कहा- (१७)
"हे काम, हे अप्सराओं, हे वसन्त, मेरे ऊरु से उत्पन्न इस बाला को सुरलोक मे ले जाओ और इन्द्र को देदो।" (१८)
ऐसा कहे जाने पर वे सभी कॉपते हुए उर्वशी को लेकर स्वर्ग में गए और इन्द्र को वह रूप यौवन शालिनी बाला दे दिया। (२६)
हे महामुने । कामादि ने इन्द्र से उन धर्मजों-(नर और नारायण) का चरित्र कहा जिससे उन्हें अत्यन्त
विरमय हुआ। (२०)
(नर और नारायण का) ऐमा चरित्र सर्वोच्च ख्याति को प्राप्त हुआ तथा वइ पाताल, मर्त्यलोक एव आठों दिशाओं में व्याप्त हो गया।
हे मुने । प्राचीन काल में अति भयकर हिरण्यकशिपु के मारे जाने पर प्रहलाद नामक दानव राज्याभिषिक्त (२२)
देवता और ब्राह्मण के पूजक उस दैत्येन्द्र के शासनकाल में पृथ्वी पर राजा लोग विधिपूर्वक यज्ञानुष्ठान करते (२३)
ब्राह्मण लोग तपस्या, धर्मकार्य और तीर्थयात्रा, वैश्य लोग पशुपालन तथा शूद्र लोग शुश्रूषा करने लगे। (२४)
हे मुने। इस प्रकार चारों वर्ण अपने आश्रम मे अव-स्थित रह कर धर्मकार्यों के अनुष्ठान में तत्पर हुए। इससे देवता भी वृत्ति से युक्त हो गये । (२५)
तदनन्तर भार्गवश्रेष्ठ महातपस्वी च्यवन नामक ऋपि नर्मदा के अकुलीश्वर तीर्थ मे स्नान करने गये।
वहाँ महादेव का दर्शन कर वे नदी में स्नान करने के लिये उतरे। जल में अवतीर्ण ऋपि को केकरलोहित साँप ने पकड लिया। (२७)
संस्मृते पुण्डरीकाक्षे निर्विषोऽभून्महोरगः ।। २८
नीतस्तेनातिरौद्रेण पन्नगेन रसावलम् ।
निर्विपश्चापि तत्याज च्यवनं भुजगोचमः ॥ २९
संत्यक्तमात्रो नागेन च्यवनो भार्गवोत्तमः।
चचार नागकन्याभिः पूज्यमानः समन्ततः ॥३०
विचरन् प्रविवेशाथ दानवानां महत् पुरम् ।
संपूज्यमानो दैत्येन्द्रः प्रह्लादोऽथ ददर्श तम् ।। ३१
भृगुपुत्रे महातेजाः पूजां चके यथार्हतः।
संपूजितोपविष्टश्च पृष्टश्चागमनं प्रति ॥ ३२
स चोवाच महाराज महातीर्थ महाफलम् ।
स्नातुमेवागतोऽस्म्यद्य द्रष्टुश्चैयाकुलीश्वरम् ॥ ३३
नद्यामेवावतीर्णोऽस्मि गृहीतश्चाहिना बलात् ।
समानीतोऽस्मि पाताले दृष्टश्चात्र भवानपि ।। ३४
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यवनस्य दितीश्वरः।
प्रोवाच धर्मसंयुक्तं स वाक्यं वाक्यकोनिदः ॥ ३५
प्रहाद उवाच ।
भगवन् कानि तीर्थानि पृथिव्यां कानि चाम्परे ।
रसातले घ कानि स्युरेतद् वक्तुं ममार्हसि ॥ ३६
च्यवन उवाच।
पृथिव्यां नैमिपं तीर्थमन्तरिक्ष च पुष्करम् ।
चम्तीर्थ महानाहो रसातलतले विदुः ॥ ३७
पुलम्त्य उवाच ।
श्रुत्वा तद्भार्गववचो दैत्यराजो महामुने ।
नैमिपं गन्तुकामस्तु दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३८
प्रहाद उवाच।
उतिष्ठध्वं गमिष्याम. स्नातुं तीर्थ हि नैमिपम् ।
द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् ॥ ३९
पुलस्त्य उवाच।
इत्युस्ता दानवेन्द्रेण सर्वे ते दैत्यदानवाः ।
चक्रुरुयोगमतुलं निर्जग्मुश रसातलात् ॥ ४०
उस सौंप द्वारा गृहीत ऋषिने मन मे हरि का स्मरण किया । पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करने पर वह महान नाग विषहीन हो गया। (२८)
उस महाभयकर विषहीन महानाग ने च्यवन ऋषि को रसातल में ले जाकर छोड दिया। (२६)
नाग से मुक्त होते ही भार्गवश्रेष्ठ च्यवन वहाँ चारों ओर से नागकन्याओं द्वारा पूजित होते हुए विचरण करने (३०)
विचरण करते हुए वे दानवों के विशाल नगर में प्रविष्ट हुए। वहाँ श्रेष्ठ दैत्यों द्वारा पृजित प्रसाद ने उन्हें देखा। (३१)
महातेजस्वी प्रहलाद ने भृगुपुत्र की यथायोग्य पूजा की। पूजोपरान्त उनके बैठने पर उनसे आगमन का कारण (३२)
उन्होंने कहा-हे महाराज | आज मैं महाफलदायक श्रेष्ठतीर्थ मे स्नान करने तथा अकुलीश्वर का दर्शन करने आया था। (३३)
नदी में उतरते ही एक नाग ने मुझे हठात् परद
लिया । वह मुझे पाताल मे लाया और मैंने यहाँ आप को
भी देखा।
(३४)
च्यवन की इस बात को सुन कर वाक्य-योविद् दिती- श्वर ने यह धर्मसयुक्त वाक्य कहा। (३५)
प्रहलाद ने कहा-हे भगवन् । कृपया मुझसे यह कहिये कि पृथ्वी, आकाश और पाताल में कौन कौन से (३६)
च्यवन ने कहा-हे महाबाहो । पृथ्वी में नैमिप, अन्तरिक्ष मे पुष्कर और रसातल मे पक्रतीर्थे प्रसिद्ध है। (३७)
पुरस्त्य ने कहा-हे महामुने। भार्गव को इस पात को सुन र नैमिष तीर्थ में जाने के लिए इच्छुक दैत्यराज (३८)
प्रहलाद ने कहा-"उठो, हम सभी नैमिपतीर्थ में स्नान करने जायेंगे तथा यहाँ पीताम्बरधारी अच्युत पुण्डरी- काक्ष के दर्शन करेंगे।" (३६)
पुलस्त्य ने कहा-दानवेन्द्र के ऐसा कहने पर वे सभी दैत्य और दानव विपुल उद्योग किए एव रसातल से बाहर निकले (४0)
ते समभ्येत्य देतेया दानवाश्च महारलाः |
नैमिपारण्यमागत्य स्नानं चकुर्मुदान्विताः ॥ ४१
तो दितीधरः श्रीमान मृगन्यां स चचार ह ।
चरन् सरस्वती पुण्यो ददर्श पिमलोदकाम् ॥ ४२
तस्यादूरे महाशासं शालवृक्षं शरैचितम् ।
ददर्श पाणानपरान् मुखे लग्नान् परस्परम् ।। ४३
ततस्तानद्भुताकारान् वाणान् नागोपपीतकान् ।
दृष्ट्वाऽतुल तदा चके क्रोधं दैत्येश्वरः किल ।। ४४
स ददर्श ततोऽदूरास्कृष्णाजिनधरी मुनी।
समुन्नतजटाभारौ तपस्यासक्तमानसौ ॥४५
त्योच पार्श्वयोर्दिव्ये घनुपी लक्षणान्विते ।
शामिाजगवं चैव अक्षय्यौ च महेपुधी ।। ४६
तो दृष्ट्वाऽमन्यत तदा दाम्भिकायिति दानवः ।
तत. प्रोवाच वचनं तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ४७
किं भवद्भया समारब्धं दम्मं धर्मविनाशनम् ।
क तपः क जटाभारः क्व चेमो प्रघरायधी॥ ४८
अथोवाच नरो दैत्यं का ते चिन्ता दितीश्वर ।
सामर्थ्य सति यः कुर्यात् वत्संपयेव तस्य हि ।। ४९
अथोयाच दितीशस्ती का शक्तियुक्योरिह ।
मयि तिष्ठति देत्येन्द्र धर्मसेतुप्रवर्तके ॥५०
नरस्त प्रत्युवाचाथ आवाभ्यां शक्विर्जिता।
न कश्चिच्छक्नुयाद् योद्धु नरनारायणौ युधि ॥५१
दैत्येश्वरस्तम्त. शुद्धः प्रतिज्ञामारुरोह च ।
यथा कथंचिज्जेष्यामि नरनारायणौ रणे ॥ ५२
इत्येवमुक्त्वा वचन महात्मा
दितीश्वरः स्थाप्य पलं वनान्ते ।
वितत्य चापं गुणमानिकृष्य
तलघ्वनि घोरतरं चकार ।। ५३
ततो नरस्त्याजग हि चाप-
मानम्य वाणान् सुनहूशिवाग्रान् ।
उन महारलवान दितिनन्दनों एव दानों ने नैमिषारण्य मे आकर आनन्द से स्नान किया। (४१)
तदननर दितीश्वर श्रीमान् प्रहलाद मृगया करने के लिये विचरण करने लगे। भ्रमण करते हुए उहोंने पवित्र एष निर्मल जलयाली सरस्वती नदी को देसा। (४२)
वहाँ से थोड़ी दूर पर बाणों से विद्ध बड़ी घड़ी शाखाओं याले एफ शाल वृक्ष को देखा । अन्य बाण एक दूसरे के मुख से सलग्न थे। (४३)
तदनन्तर उन अद्भुत आकार वाले नागोपवीत चागों को देख कर दैत्येश्वर कोभयकर केध हुआ। (४४)
तदुपरान्त उन्होंने दूर से ही कृष्णाजिनधारी, समुन्नत जटायुक्त तथा तपस्या मे रहीन दो मुनियों को (४५)
उन दोनों के पार्थ में शाई और आजगव नामक सुलक्षणयुक्त दिव्य दो धनुष और दो अक्षय तथा षडे तरकस वर्तमान थे। (४६)
उन्हें देखकर दानव प्रहलाद ने उनको दाम्भिक समझा। तदनन्तर उन्होंने उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषों से कहा- (१७)
"तुम दोनों धर्मविनाशक दम्भ को क्यों कर रहे हो? कहाँ तुम्हारी तपस्वा, वहाँ तुम्हाय जटाभार और कहाँ ये दोनों श्रेष्ठ आयुध?" (४८)
तदनन्तर नर ने दैत्य से कहा-'हे दितीश्वर । तुम क्यों चिन्ताकररहे हो?सामर्थ्य रहने पर व्यक्ति जो कर्म करता उसका वह कार्य उसको शोभा देता है। (४६)
तदुपरान्त दितीवर प्रहलाद ने उन दोनों से कहा- धर्मसेतुप्रवर्तक मुझ दैत्येन्द्र के रहते यहाँ तुम दोनों की क्या शक्ति है? (५०)
तदनन्तर नर ने उन्हें प्रत्युत्तर दिया-"हम प्रचण्ड शक्ति से युक्त हैं। हम दोनों नर और नारायण से समर में कोई भी युद्ध नहीं कर सकता।
तदुपरान्त दैत्येश्वर ने क्रुद्ध होकर प्रतिज्ञा को-"मैं युद्ध में जिस किसी भी प्रकार नर और नारायण को जीतूंगा।" (५२)
ऐसा वचन कह कर महात्मा दितीश्वर ने वन की सीमा पर अपने सैन्य को स्थापित कर धनुष को फैलाया और प्रत्यश्चा चदा कर घोरतर तलम्पनि की।
तदनन्तर नर मे आजगव धनुप को झुका कर अनेक सुतीक्ष्ण वाणों को छोडा। किन्तु दैत्यपति ने अनेक स्वर्ण-
मुमोच तानप्रतिमैः पृपत्कै-
चिच्छेद दैत्यस्तपनीयपुङः ॥ ५४
छिन्नान् समीक्ष्याथ नरः पृपत्कान्
दैत्येश्वरेणाप्रतिमेन
क्रुद्धः समानम्य महाधनुस्ततो
मुमोच चान्यान् विविधान् प्रपत्कान् ॥ ५५
एक नरो द्वौ दिविजेश्वरश्व
त्रीन् धर्मसूनुश्चतुरो दितीशः।
नरस्तु याणान् प्रमुमोच पञ्च
पड् दैत्यनाथो निशितान् पृपत्कान् ॥ ५६
सप्तर्षिमुरयो द्विचतुश्च दैत्यो
नरस्तु पट् त्रीणि च दैत्यमुख्थे ।
पटनीणि चैक च दितीश्वरेण
मुक्तानि पाणानि नराय विप्र ॥ ५७
एकं च पटू पश्च नरेण मुक्ता-
स्त्वष्टौ शराः सप्त च दानवेन ।
पट् सप्त चाटौ नव पण्नरेण
द्विसप्ततिं दैत्यपतिः ससर्स ।। ५८
शतं नरस्त्रीणि शतानि दैत्यः
पड़ धर्मपुत्रो दश दैत्यराजः ।
ततोऽप्यसरयेयवरान् हि याणान्
मुमोचतुस्तौ सुभृश हि कोपात् ॥ ५९
ततो नरो वाणगणैरसरन्यै-
रखास्तरङ्गमिमथो दिशः सम् ।
स चापि दैत्यप्रवरः प्रपत्कै-
चिच्छेद घेगात् तपनीयपुत्रैः ॥ ६०
ततः पतत्रिमिवीरौ सुभृशं नरदानयो ।
युद्धे परास्वैर्युध्येता घोररूपै. परस्परम् ॥ ६१
ततस्तु दैत्येन परास्त्रपाणिना
चापे नियुक्त तु पितामहास्त्रम् ।
महेश्वरास्त्रं पुरुषोत्तमेन
सम समाहत्य निपेततुस्तौ ॥ ६२
ब्रह्मास्त्रे तु प्रशमिते प्रहादः क्रोधमूर्छितः ।
गदा प्रगृह्य तरसा प्रचस्कन्द रथोचमात् ॥ ६३
गदापाणिं समायान्तं दैत्य नारायणस्तदा ।
दृष्ट्वास्थ पृष्ठतश्चक्रे नरं यो मनाः स्वयम् ॥ ६४
पुंख वाले अप्रतिम बाणों से उन बाणों को छिन्न भिन्न पर दिया। (५४)
तदुपरान्त नर ने युद्ध में अप्रतिम दैत्येश्वर के द्वारा बाणों को छिन्न हुआ देख मुद्ध होकर अपने महान् धनुष को झुकाते हुए अन्य अनेक बाणों को छोड़ा। (५५)
नर के एक याण छोडने पर दितीश्वर ने दो बाण छोड़ा, धर्मपुत के तीन घाणों पर दितीश ने चार बाण छोडा । तदनन्तर नर के पाँच बाण छोडने पर दैत्यश्रेष्ठ ने छ तीव्र बाणों को छोड़ा। (५६)
हे विप्रा ऋषिमुख्य के सात बाण छोडने पर दैत्य ने आठ घाण छोडा । नर के द्वारा दैत्य पर नव बाण छोड़े जाने पर दैत्यपति ने नर पर दश बाण छोड़ा। (५७)
नर के बारह बाण छोडने पर दानव ने पन्द्रह माप छोडा । नर के छत्तीस बाण छोडने पर दैत्यपति ने बहत्तर बाण चराया। (५८)
नर के सौ घाणों पर दैत्य ने तीन सौ बाण चलाया। धर्मपुत्र के छ सौ बाग पर दैत्यराज ने एक हजार पाण छोड़ा। तदनन्तर उन दोनों ने अत्यन्त क्रोध से असख्य बाण छोडे । (५६)
तदनन्तर नर ने असख्य वाणों से पृथ्वी, आकाश और दिशाओं को आच्छन्न कर दिया। उस दैत्यप्रवर ने भी बड़े वेग से स्वर्णपुख वाले वाणों द्वारा उनके बाणों को काट दिया। (६०)
सदुपरान्त नर और दानव दोन चीर यावं तथा अय-पर श्रेष्ठ अस्त्रों से परस्पर सग्राम करने लगे। (६१)
वदतन्तर दैत्य ने श्रेष्ठ अस्त्र हाथ में लेकर धनुष पर है| ब्रह्मास्त्र नियोजित क्यिा एध पुरुषोत्तम नर ने माहेश्वरात्र का प्रयोग किया। वे दोनों अस्त्र परस्पर एक दूसरे को समाहत कर गिर गए। (६२)
ने ब्रह्मास्त्र व्यर्य होने पर क्रोधमूर्छित प्रहलाद वेग से गदा लेकर उत्तम रथ से कूद पड़े।
ततो दितीशः सगदः समाद्रवत्
सशाङ्गपाणिं तपसां निधानम् ।
ख्यातं पुराणर्पिमुदारविक्रम
नारायणं नारद लोकपालम् ॥ ६५
इति श्रीवामनपुराणे सप्तमोऽध्याय ॥७॥