मलय पर्वत पर इन्द्र का दानवो से युद्ध इन्द्र के पाकशासन तथा गोत्रभिद् होने का कारण एव दितिज मरुतो की उत्पत्ति

नारद उवाच ।

मलयेऽपि महेन्द्रेण यत्कृतं ब्राह्मणपभ ।

निष्पादितं स्वकं कार्य वन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १

पुलस्त्य उवाच ।

श्रूयतां यन्महेन्द्रेण मलये पर्वतोत्तमे ।

कृतं लोकहितं प्रमन्नात्मनश्च तथा हितम् ।।

अन्धासुरस्यानुचरा मयतारपुरोगमाः ।

ते निर्जिताः सुरगणैः पातालगमनोत्सुकाः ॥३

ददृशुर्मलय शैलं सिड्राध्युपितकन्दरम् ।

लतावितानसंछन्न मसत्त्वसमाकुलम् ।।४

चन्दनैरुरगाकान्तः सुशीतैरमिसेवितम् ।

माधवीकृसुमामोदं ऋष्यचितहरं गिरिम् ॥ ५

तं दृष्ट्या शीतलच्छायं श्रान्ता व्यायामकर्पिताः ।

मयवारपुरोगास्ते निवासं समरोचयन् ॥६

तेषु तवोपविटेषु प्राणप्तिप्रदोऽनिलः ।

विवाति शीतः शनकैदक्षिणो गन्धसंयुतः ॥७

अपनी भक्ति से भृङ्गी बना दिया। (९५)

हे महर्पि! मैंने आपसे हर की कीर्चि को बढ़ाने वाला यह पुण्य पवित्र एय शुभद आख्यान कहा। धर्म, आयु, आरोग्य एवं धन को चाहने वालों को श्रेष्ठ द्विजों मे सदा इप्समा कीर्तन करना चाहिए। (६६)

श्रीवामनपुराए में चदालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४४॥

४५

नारद ने पहा-हे द्विजश्रेष्ठ! महेन्द्र ने मलयपर्वत पर भी अपना जो कार्य सम्पन्न किया उसे आप मुझसे चाहिये।

पुलस्त्य ने कहा-हे प्रान् ! महेन्द्र ने भ्रष्ट मलयपर्यंत पर संसार के हित तथा अपने फल्याय के लिए जो कार्य किया था, उसे सुनिये। (२)

मय, तार आदि अन्धरामुर के अनुचर असुर देषताओं से पद्यजित दोग पाताल जाने की इच्छा करने स्टगे।

उन लोगों ने सिखों द्वारा सेवित कन्दराओं याले, लता- वितान से आच्छन्न मत्तमागियों से परिपूर्ण, सुशीतल सों से आकान्त चन्दन से युक्त तथा माघवीयुसुम के आमोद से पूर्ण ऋपियों से अचिंत हर फे मलय गिरि यो देसा।

व्यायाम से श्रीग एवं शिथिल मय, सार आदि दानों ने शीतल छायायाले उस पर्यंत को देस पर पदों निवास करने की इच्छा की।

उन लोगों के यहाँ पेठने पर प्राणों को तृप्ति प्रदान करने याला मुगन्धपूर्ण तथा शीतल दक्षिण थायु मन्दगति से प्रवाहित होने लगा। (७)

तत्रैव च रति चक्रः सर्व एव महासुराः।

कुर्वन्तो लोकसंपूज्ये विद्वेयं देवतागणे ॥८

ताज्ञात्वा शंकर शर प्रेपयन्मलयेऽसुरान् ।

स चापि ददृशे गच्छन् पथि गोमातर हरिः ॥९

वस्या. प्रदक्षिणां कृत्वा दृष्ट्या शैल च सुप्रभम् ।

ददृशे दानवान् सर्वान् संहृष्टान् भोगसयुतान् ॥ १०

अथाजुहाव पलहा सर्वाने महासुरान् ।

ते चाप्याययुरख्यग्रा पिकिरन्त. शरोत्करान् ॥ ११

तानागतान याणजालः रथस्थोऽद्भुतदर्शन. ।

छादयामास विप्र गिरीन् दृष्ट्या यथा धनः ।। १२

ततो पाणरवच्छाध मयादीन् दानवान् हरिः ।

पाकं जघान तीक्ष्णामार्गणै. कङ्कयाममः ॥ १३

तत्र नाम विभुलेंभे शासनत्वात् शरैः

पाफशासनतां शमः समरपतिर्विभुः ॥ १४

वथाऽन्य पुरनामानं वाणासुरसुत शरैः।

सुपुबैदारयामास ततोऽभूत् स पुरंदरः ॥ १५

हत्पत्यं समरेऽजैपीद् गोत्रभिद् दानवं बलम् ।

तचापि विनित ब्रह्मन् रसातलमुपागमत् ॥ १६

एतदर्थ सहस्राक्ष. प्रेपितो मलयाचलम् ।

त्र्यम्बकेन मुनिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १७

नारद उवाच ।

किमयं देवतपतिगोत्रभित् कथ्यते हरिः ।

एप मे सरायो ब्रह्मन् हदि सपरिवर्तते ॥ १८

पुलस्त्य उवाच।

श्रूयता गोत्रभिच्छक. कीर्तितो हि यथा मया ।

हते हिरण्यकशिपी यचकारारिमर्दनः ॥ १९

दितिनिष्टपुना तु कश्यपं प्राह नारद ।

विभो नाथोऽसि मे दहि शकहन्तारमात्मजम् ॥ २०

कश्यपस्तामुवाचाथ यदि त्वमसितेक्षणे।

शौचाचारसमायुक्ता स्थास्यसे दशतीर्दश ॥ २१

लोक-पूज्य देवताओं से विद्वेप करते हुए सभी श्रेष्ठ असुर सुसपूर्वक वहीं रहने लगे। (८)

उन असुरों को मलय पर्यंत पर जानार शङ्कर ने इन्द्र को वहाँ भेजा। इन्द्र ने जाते हुए मार्ग मे गोमाता को देसा।

उसरी प्रदक्षिणा करने के उपरान्त उन्होंने प्रभा सम्पन्न पर्वत पर भोगसयुत तथा प्रसन्न समस्त दानवों को देसा। (१०)

तदनन्तर इन्द्र ने सभी महासुरों को ललकारा। वे भी विना व्यग्रता के बाणों की वर्षा करते हुए आए । (११)

हे निर्पि । रथासीन अद्भुत दिसायी पडने वाले चन्द्र ने आये हुए उन दानों को बाणनाल से इस प्रकार आच्छादित कर दिया जैसे मेप पृष्टि से पर्वतों को आच्छादित करता है। (१२)

तदनन्तर भद्र ने मय आदि दानों को याण से आच्छादित पर कपश्युक्त सुतीदर याणों से पारु नामक दानय का यध किया। (१३)

दृढ बाणों द्वारा पाक का शासन करने के कारण सभी अमरों के पति विभु इन्द्र को पाकशासनता की प्राप्ति हुई। (१४)

इसी प्रकार उन्होंने सुन्दर पुच्छयुक्त बाणों से दूसरे पुर नामा वाणासुर के पुत्र का यध किया । इसी से वे पुरन्दर (१५)

हे ब्रह्मन् । इस प्रकार उन दानवों का वध कर इन्द्र ने युद्ध में दान सेना को पराजित कर दिया। विजित पह दानवसैन्य रसातल मे चला गया। (२६)

हे मुनिश्रेष्ठ। इसीलिये शङ्कर ने सहस्राक्ष को मलय पर्वत पर भेजा था। अब आप और क्या सुनना चाहते है? (१७)

नारद ने कहा हे ब्रह्मम् । मेरे हृदय मे यह सदेह है कि देवपति को गोनभिद् क्यों कहा जाता है? (१८)

पुलरत्य ने कहा-आप सुनें कि मैंने इन्द्र पो गोत्र भिद्' क्यों कहा तथा हिरण्यकशिपु के मारे जाने पर अरिमर्दन इन्द्र ने क्या दिया? (१६)

हे नारद । पुन के मर जाने पर दिनि मे कश्यप से यहा-हे प्रभु! आप मेरे पति है, मुझे इन्द्र को मारने पाला पुत्र दीजिए। (२०)

पश्यप ने उनसे कहा- देगनेत्रोंथाली । यदि तुम सी दिव्य यों तक शीयाचार से सम्पन्न होकर

संवत्सराणां दिव्यानां ततस्त्रैलोक्यनायकम् ।

जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शत्रुघ्नं नान्यथा प्रिये ॥ २२

इत्येयमुक्ता सा भर्ना दितिनियममास्थिता ।

गर्भाधानं ऋषिः कृत्वा नगामोदयपर्वतम् ॥ २३

गते तस्मिन् मुनिश्रेष्ट सहस्राक्षोऽपि सत्वरम् ।

तमाश्रममुपागम्य दितिं वचनमब्रवीत् ।। २४

करिष्याम्यनुशुश्रूषां भवत्या यदि मन्यसे ।

बाढमित्यत्रवीद् देवी भाविकर्मप्रचोदिता ।। २५

समिदाहरणादीनि तस्याश्च पुरंदरः ।

विनीतात्मा च कार्यार्थी छिद्रान्वेषी भुजंगवत् ॥ २६

एकदा सा तपोयुक्ता शौचे महति संस्थिता ।

दशवर्प शतान्ते तु शिर स्नाता तपस्विनी ॥ २७

जानुभ्यामुपरि स्थाप्य मुक्तकेशा निजं शिरः ।

सुष्पाप कैशप्रान्तस्तु संश्लिष्टचरणाऽभवत् ।। २८

वमन्तरमशौचस्प ज्ञात्वा देवः सहस्रदृक् ।

विवेश मातुरुदरं नासारन्ध्रेण नारद ।। २९

प्रविश्य जठरं ऋद्धो दैत्यमातुः पुरंदरः ।

ददर्शोर्ध्वमुखं वालं कटिन्यस्तकरं महद ॥ ३०

तस्पैवास्येज्य ददृशे पेशी मांसस्य वासवः ।

शुद्धस्फटिकसंकाशां कराभ्यां नगृहेऽथ वाम् ॥ ३१

ततः कोपसमाध्मातो मांसपेशी शतक्रतुः ।

कराभ्यां मर्दयामास ततः सा कठिनाऽभवत् ।। ३२

ऊनापं च ववृधे त्वघोऽधं ववृधे तथा ।

शतपर्वाऽथ कुलिशः संजातो मांसपेशितः ।। ३३

तेनैव गर्भ दितिजं वनण शतपर्वणा।

चिच्छेद सप्तधा ब्रह्मन् स रुरोद च विस्वरम् ॥ ३४

ततोऽप्ययुध्यत दिविरजानाच्छचेष्टितम् ।

शुश्राव पाचं पुत्रस्य रुदमानस्य नारद ॥ ३५

शत्रोऽपि प्राह मा मूढ रुदस्वैति सुघर्धरम् ।

इत्येवमुक्त्वा चैकैक भूयश्चिच्छेद सप्तधा ।। ३६

रहोगी तभी तुम त्रिलोकनायक शत्रुहन्ता पुत्र उत्पन्न फरोगी । हे प्रिये ! इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।  (२१-२२)

पति के ऐसा पहने पर दिति ने नियम का अवलम्बन किया। कश्यप ऋपि गर्भाधान परफै उदयगिरि पर चले गये। (२३)

उन मुनिश्रेष्ठ के चले जाने पर इन्द्र ने शीघ्रता से उस आश्रम में जारर दिति से यह यावय कहा- (२४)

यदि आप अनुमति प्रदान करें तो में आपकी सेया फरु। भयितव्यता से प्रेरित देयी ने कहा-ठीक है। (२५)

विनीतात्मा पुरन्दर अपने कार्य की सिद्धि हेतु भुजङ्ग- पत् छिद्रान्वेषण करते हुए उन (दिति) के लिये समिया आदि राने पावार्य करने लगे। (२६)

एक सहस्र वर्ष व्यतीत हो जाने पर एक दिन अतिशय शौचपरायण पह परिवनी शिर से स्नान करने के उपरान्त फेशों को सोले हुए अपने जानुओं पर शिर रख कर सो गई। उसके फेशमान्त से परण सदिलष्ट हो गए। (२७-२८)

हे नारद ! देय सहस्राक्ष इन्द्र अशौच के उस सिद्र को जानर नाफ के छिद्र से माता के उदर में प्रविष्ट हो गए। (२९)

क्रुद्ध पुरन्दर ने दैत्यमाता ये गद्दान् जठर में प्रवेश कर कटि पर हाथ रक्खे ऊपर को मुस किये एका बालक को देखा। (३०)

वासर ने उस बालक के मुँह में एक शुद्ध स्फटिक तुल्य मासपेशी को देखा। उन्होंने उस मांसपेशी को दोनों हाथों से पाड़ लिया। (३१)

वदनन्तर झोपान्ध शतक्रतु ने दोनों हाथों से उस मासपेशी को मर्दित किया जिससे यह कठोर हो गई। (३२)

उस पिड का आधा भाग ऊपर को और आधा भाग नीचे की ओर बढ़ गया। इस प्रकार उस मासपेशी से शतपर्वयुक्त वन बन गया। (३३)

हे ब्रह्मन् । (इन्द्र ने) उसी शतपर्व पक्ष से दिति के गर्भ यो सात भागों में दिन कर दिया। यह गर्भस्य पालक भीषण स्वर से रोने लगा। (३४)

हे नारद । तदनन्तर दिति जग गई एवं उन्हें इन्द्र का पत्य ज्ञात हो गया। उन्होंने रो रहे पुत्र की याणी को (३५)

इन्द्र ने भी यहा-हे मूर्स! घर शब्द से मत रदन करो। ऐसा कह फर उन्होंने प्रत्येक सण्ड को पुन सात- सात सण्टों में काटा। (१६)

ते नाता मरुतो नाम देवभृत्याः शतक्रतो ।

मातुरेवापचारेण चलन्ते ते पुरस्कृताः ।। ३७

ततः सकुलिशः शक्रो निर्गम्य जठरात् तदा ।

दितिं कृताञ्जलिपुटः प्राह भीतस्तु शापतः ॥ ३८

ममास्ति नापराधोऽयं यच्छस्तस्तनयस्तर ।

ववैवापनयाच्छस्तस्तन्मे न क्रोडुमर्हसि ।। ३९

दितिरुवाच ।

न तयात्रापराधोऽस्ति मन्ये दिरमिदं पुरा ।

संपूर्णे त्यपि काले नै या शौचत्वमुपागता ॥ ४०.

पुलस्त्य उवाच।

इत्येवमुक्त्या तान् पालान् परिसान्त्व्य दितिः स्वयम् ।

देवराज्ञा सहेतांस्तु प्रेपयामास भामिनी ॥४१

एवं पुरा स्वानपि सोदरान् स

गर्भस्थितानुअरितुं भयार्सः।

निभेद वज्रण ततः स गोत्रमित

ख्यातो महर्षे भगवान् महेन्द्रः ॥ ४२

इति श्रीवामनपुराणे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४॥